Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 471–480

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 471–480

पृष्ठ 471

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शौचविज्ञानोपनिषत् विषमा प्रकृति - ‘ मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् " ( गीता ६।१० ) के अनुसार विश्व का मूल-कारण बनी हुई है, जिस प्रकृतिपाश में आबद्ध पुरुष को भी ' परवश ' रहना पड़ता है, उस भिन्नप्रकृति-मूलक भिन्नवाद को सम देखने वाले तत्त्वदृष्ट्या सचमुच प्ररणम्य हैं, इन का समदर्शन प्रणम्य है, और प्रणम्य है तदाधारे ( कल्पिताधारेण ) प्रतिष्ठित उनका कल्पित समानाधिकारवाद । क्या पशु - पक्षी-कृमि - कीटों में आँख - नाक - कान- मन - बुद्धि नहीं हैं? | क्यों नहीं इन्हें भी समानाधिकार दे दिया जाता? । उस समदर्शी ईश्वर के साम्राज्य में उत्पन्न होने वाले अन्न का सारभाग तो हम निगरित कर जायँ, और पशुओं को केवल निस्तत्त्व तृण खाने मात्र का अधिकार दिया जाय, यह कैसा समदर्शन है?, कैसा समानाधिकार है? | आप हम शीत - ग्रीष्म- वर्षा से बचने के लिए सावरण प्रासादों में सुख भोगें, और ये बेचारे पशु - पक्षी हमारे जैसे ही आँख नाक - कान आदि रखते हुए भी शीतातपवर्षा के कष्ट सहते रहें । अवश्य ही आज से ही इसी क्षण से तृरण के स्थान में इनके लिए न केवल जौ - गेहूँ की ही, अपितु उन सब तिक्त - मधुर - लवणादि युक्त भोज्य पदार्थों की व्यवस्था करनी ही चाहिए । उनके लिए भी भव्य अट्टालिकाओं का निर्माण होना ही चाहिए । प्राणिमात्र की हितैषिता की घोषणा करने वालों की सर्वतन्त्र स्वतन्त्र - सत्ता में यह अनाचर?, यह अत्याचार?, यह विषम वर्त्तन? अब्रह्मण्यम्! अब्रह्मण्यम्!! जात्युपजा तिमीमांसा-हम भूल कर रहे हैं । हमें इतनी विदूर अनुधावन न कर केवल मनुष्यजाति को ही विचारविषय का केन्द्र बनाना चाहिए | श्रभ्युपगमवाद से अपनी भूल स्वीकार करते हुए थोड़ी देर के लिए ऐस भी माना जासकता है । अभ्युपगमवाद इस लिए कहना पड़ रहा है कि, जिन ' पशु ' - ' पक्षी ' आदि-जातियों को एक एक जाति मानने की भूल की जा रही है, उनमें प्रत्येक में उसी प्रकृतिवैषम्य से अनेक जात्युपजातियाँ व्यवस्थित हैं । अश्व- गौ - गर्दभ सिंह- मृग - वराह आदि पशुजाति की अनेक अवान्तर जातियाँ हैं । -वाजी - श्यामकर्ण - आदि अनेक अश्वोपजातियाँ हैं, जिनका ' अश्वशास्त्र ' नामक एक स्वतन्त्र ग्रन्थ में निरूपण हुआ है । वशा - कपिला कामधेनु - धूम्रा आदि भेद से गौजाति भी अनेक भागों में विभक्त है 1 । गर्दभ की अवान्तर उपजातियों का अन्वेषण कर्म तो आज के युग में सुकर है ही । इसी प्रकार सिंहादि की व्यवस्था समझिए । पक्षियों में अवान्तर असंख्य जाति - उपजातियाँ । कृमियों में यही व्यवस्था । सर्प नामक केवल एक कृमिविशेष की १ सहस्र उपजातियाँ | क्या महाभारत के सर्प - सत्र को देखने का कष्ट करेंगे? | इसीलिए हम अपनी भूल को अभ्युपगमवादमूला बतला रहे हैं । विशेष जिज्ञासा की पूत्ति के लिए गीताभाष्यभूमिका - कर्मयोगपरीक्षा प्रकरण का ' वर्णव्यवस्थाविज्ञान ' नामक प्रकरण देखने का कष्ट कीजिए । यदि पशुजाति की अवान्तरजातिमूला अश्व - गर्दभादि जातियों में प्रकृतिभेदद्वारा असंख्य उपजातियाँ हो सकतीं हैं, तो अवश्य ही मनुष्यजाति की अवान्तर जातिभूता हिन्दूजाति में भी प्रकृतिभेद भूला ब्राह्मणक्षत्रियादि अनेक उपजातियाँ हो सकतीं हैं । ४०७

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सर्वोच्छेदक दृष्टिकोण-श्राद्धविज्ञान जाति - तत्व का भी तो समन्वय करना पड़ेगा । ' जाति ' शब्द का मूलप्रभव कौन?, महत् - प्रकृति-रूप वह महानात्मा, जिसका इस श्राद्धविज्ञाननिबन्ध में आरम्भ से यशोगान किया जारहा है । " आकृति, प्रकृति, अहङ्क । ति ' एवं ' सत्त्व - रज - तम- ' इन ६ भावों के सम्बन्ध से यह जाति-( जाति - आयु-- भोग ) - प्रवर्त्तक षड्गुणक महानात्मा ही कार्यविश्व का मूलप्रवर्त्तक है । आकृति का तमोगुण से, प्रकृति का जो गुण से, अहङ्क ति का सत्त्वगुण से सम्बन्ध है । आकृति की प्रतिष्ठा प्रकृति है, प्रकृति की प्रतिष्ठा अहङ्क ति है । अतएव सत्त्वगुणानुगत अभाव - ( आत्मभाव ) - मूला-आत्मदृष्टि ही बाह्यष्टियों की मूलप्रतिष्ठा मानी गई है । आकृति - साम्य समदर्शन का मूल नहीं है, अपितु प्रकृतिसाम्य समदर्शन का मूल है । नहीं, नहीं, प्रकृति तो पूर्वकथनानुसार स्वयं दिषमा है । भला वह समदर्शन का मूल कैसे बन सकती है । तो क्या अहं साम्य समदर्शन का मूल है? । नहीं, महत्प्रकृत्यनुगत यह अहंभाव भी तो प्राधानिक सिद्धान्त के अनुसार प्रतिशरीर में भिन्न भिन्न ही है । प्रत्येक का सविशेष आत्मा अपने - अपने सुखदुःखादि द्वन्द्वों से पृथक् - पृथक् अतिशय रख रहा है । इस प्रकार महत्प्रकृति से सम्बद्ध, अतएव सर्वथा विषम आकृति - प्रकृति- अहङ्क ति ( संविशेष आत्मा ), तीनों में से किसी को भी समदर्शन का मूल नहीं माना जासकता । जब ये तीनों समदर्शन के मूल नहीं, तो इनके आधार पर समानाधिकार की कल्पना केवल खपुष्पकल्पना - स्वरूप में शेष रह जाती है । हमारा शरीर, हमारी इन्द्रियाँ, हमारा मन, हमारी बुद्धि, हमारा स्वभाव, हमारा सविशेष - कर्मफलभोक्ता - कर्मकर्त्ता भूतात्मा - प्रति- योगमाया के भेद से परस्पर एक दूसरे से विषम है । विषम उपकरणों के सम्बन्धी यच्चयावत् लौकिक जड़ - चेतन पदार्थ विषम हैं । इसी विषमता से सब के अधिकार परस्पर विषम हैं । इस प्रकार जिसे हम चलते फिरते समदर्शन कर रहे हैं, वह तो तत्त्वतः आत्यन्तिक रूप से विषमदर्शन है । एवं ऐसे विषमदर्शनात्मक समदर्शन के आधार पर जिसे हम समानाधिकार कहने चले हैं, वह तो वस्तुगत्या विषमाधिकार है । तत् को तद्रूप से देखना, एवं - तत् को तदधिकार में हीं सरक्षित रखना सृष्टि की स्वरूपरता है । एवं तत् को तद्रूप से देखना, एवं तत् को अधिकार के लिए प्रोत्साहित करना हीं सृष्टिस्वरूप का उच्छेद करना है । यह उच्छेद विश्वोच्छेद का कारण तो नहीं बनता, हाँ हमारे स्वरूप का उच्छेदक अवश्यक बन जाता है । समविषयभाव मीमांसा-तत्त्वदृष्टि को छोड़ कर भूतदृष्टि से ही विचार कीजिए । आपके आग्रह दुराग्रह - विशेष से मान लिया हमनें कि, मनुष्य - मनुष्य सब एक हैं, समान हैं, जब कि तत्त्वतः पूर्वकथनानुसार इस मान्यता में कोई सार नहीं है । क्या आप इस समदर्शन के आधार पर मनुष्यमात्र को समानाधिकार दे सकेंगे?, क्या आपने कभी किसी को ऐसा अधिकार दिया है? । अधिकार का अपहरण ही किया ४०८

पृष्ठ 473

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शौचविज्ञानोपनिषत् होगा आपने । अधिकार प्रदान की शक्ति आप में है ही कहाँ बड़ी निर्बलता है । उसी निर्बलता का नाम है- सविशेष आत्मा । से आप सम्बन्ध नहीं जानते, आप में एक बहुत जो कि आत्मातिमान साधारण भाषा में ' व्यक्तिप्रतिष्ठा ' कहलाया है रखने वाला आत्माविमान, । स्वभावतः प्रत्येक व्यक्ति अपने आप इतर: व्यक्तियों की तुलना में आगे बढ़ा हुआ देखना चाहता है । समदर्शन प्रपितामह भी मानव का इस प्रलोभन से त्राण नहीं कर सकता । निरोध कर सकती हैं का वृद्धातिवृद्ध-एकमात्र वह ब्रह्माद्वैतभावना, जिसे प्राप्त कर लेने पर मानव भेद की तो क्या कथा इस प्रलोभन का वैषम्य भी विस्मृत कर देता है । परन्तु जबतक हम व्यवहारजगत् में प्रतिष्ठित, जड़ - चेतन का समृद्धि के इच्छुक हैं, समाजोन्नति के पक्षपाती हैं, वैय्यक्तिक विकास के अनुगामी हैं, जबतक हम राष्ट्र-प्रलोभन से पीछा छुड़ाना सर्वथा असम्भव ही है । यही श्रात्माभिमान धागे जाकर हैं विषमाधिकार , तबतक उक्त प्रवर्त्तक बन जाता है । का आपादमस्तक इस विषमदर्शन, तथा समानाधिकार के कुचक्र में चङ मण करते रहने वाले, वाङ‌मात्रेण ' समदर्शन- समानाधिकार ' शब्दों का उद्घोष करने वाले उन कर्णधारों को केवल सभामञ्च के उच्च पीठ पर बैटने का अधिकार किसने दिया? | उन्हीं के समान आँख नाकवाले दर्शक नीचे अप्रतिष्ठा से बैठें, और वे समदर्शी भगवत्प्रतिमावत पीठ पर विराजमान रहें, यह कैसा समदर्शन?, और कैसा यह समानाधिकार? | गतानुगतिक इन दर्शकों का भगवद्दर्शनाधिकार सम्भवतः सुलभ किंतु ये श्रद्धालु उन सत्तापीठाधीश्वरों के दर्शनाधिकार के लिए विदित नहीं, कितना कष्ट उठाते रहते है हैं ॥ अनुग्रहदृष्टि तो असम्भव ही है । वे उपदेशक हैं, हम उपदिष्ट हैं । वे पथप्रदर्शक हैं, हम पथिक हैं । वे अनुशासक हैं, हम अनुशासित हैं । हमारी थोड़ी भी भूल हमारा महा अपराध है, उनकी महाभूल भी हमारी दृष्टि में कोई गुप्त - मङ्गलप्रद परोक्ष रहस्य है । और यह दर्शन अधिकार - वैषम्य इसलिए स्वाभाविक है कि, उनकी जन्मदात्री प्रकृति स्वयं विषमा है । अपने इस स्वाभाविक विषम - दर्शनात्मक समदर्शन के आधार पर इनकी ओर से जिस कल्पित समदर्शन का सूत्रपात हो रहा है, उसके दुष्परि-णाम आज हमारे सामने उपस्थित हैं । राष्ट्रिय व्यवस्था से आरम्भ कर व्यक्तितन्त्र पर्य्यन्त अनधिकार-चेष्टाओं का साम्राज्य हो रहा है । जो कल राष्ट्रवादी था, वही आज राष्ट्रविरोधी बन रहा है । आज्ञाएँ निकलतीं हैं, दण्डविधान बनते हैं । ' अनुशासन भङ्गे कर दिया ' का करुण क्रन्दन आरम्भ होता है, परन्तु सब निष्फल | सामाजिक व्यवस्था में भी यही दुर्गति सामने आ रही है । समाज के शिष्टों का अनुशासन आज वात्याहित तूल- तृरंगादि की अपेक्षा से भी निर्भर ( हल्का ) प्रमाणित हो रहा है । प्रत्येक व्यक्ति के अपने अपने सामाजिक विचार अपने अपने लिए नियत हैं । एक एक व्यक्तिएक एक समाज बनता हुआ - ' सममञ्चति ' लक्षण ' समाज ' शब्द का गला घोंट रहा है । व्यक्तिप्रतिष्ठा की रक्षा के नाते समयोचित आकर्षक - प्रभावोत्पादक वेश धारण कर यत्र तत्र सभा समितियों में पहुँचने ये बन्धुगुण आदर्शवाद के कर्म वीरता के समानाधिकार के समदर्शन के उद्घोषों से जहाँ भूभारवाही वाले ४०६

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श्राद्धविज्ञान 1 शेषमस्तक को स्त्रपदाघातों से कम्पित करते रहते हैं, मुष्टिप्रहारों से काष्ठमञ्च के अङ्ग - प्रत्यङ्ग विदीर्ण करने का परमपुरुषार्थ करते रहते हैं, वहाँ आस - पड़ौस के दुःखी -- बन्धुओं के लिए ये ही पुरुष-पुङ्गव गजनीमीलिकान्याय की उपासना करते रहते हैं । अधिक हुआ तो समाज के नियमों का भङ्ग कर उसे जलाञ्जलि से तृप्त करने का अनुग्रह कर देते हैं । व्यक्तिगत प्रवृद्ध आवश्यकताओं को उद्दाम-वासनाओं से भावितान्तःकरण इन समाजनेताओं की दिव्यदृष्टि में भारतीय सभी सामाजिक नियमो -पनियम रूढ़िवाद हैं, व्यर्थ के आडम्बर हैं । आदर्श समतुलन-' एको गोत्रे य भवति पुमान् सः कुटुम्बं विभर्त्ति से सम्बद्ध कौटुम्बिक व्यवस्था के रक्षक सामाजिक नियम रूढ़िबाद, एवं - ' भुञ्जते ते त्वयं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ' ( गीता ३ | १३ | ) के अनुसार केवल व्यक्तिगत पापमयी तुष्टि तृप्ति के अनुगामी इन दिव्य पुरुषों का आदर्श आदर्श? | देशभक्ति - स्वदेशभक्ति पर यत् किञ्चित् भी प्रहार न करने वाले? ध्वनियन्त्र ( रेडियो ) की उपासना तों आदर्श है, जिसे समाज के सभी व्यक्ति सुलभतया प्राप्त नहीं कर सकते । किन्तु विवाहाद्युत्सवों में भेरी-तालङ्कार आदि वाद्यों का वादन इनको दृष्टि में रूढ़िवाद है । बन्धु बान्धवों के साथ सोत्साह गज-तुरग पदाति द्वारा वरयात्रादि के प्रदर्शन तो रूढ़िवाद हैं, किन्तु विशुद्ध विदेशी जड़ यानसाधनों की. परम्परा का ग्रहण आदर्श है । वर - वधू के सम्मुख उपस्थित होकर उनके प्रणतमाव से प्रसन्न होकर साक्षात् रूप से उन्हें आशीर्वाद देना तो रूढिवाद है, किन्तु ' मेरे अमुक का विवाह है, कृपया आशीर्वाद भेजिए ' वाली आशीर्वादपद्धति - आदर्श है । भारतीय शिष्टमर्यादा मे आसनादि लगाकर भारतीय भोज्य पदार्थों से अतिथियों का सम्मान करना तो रूढिवाद है, किन्तु विद्येच्छाच्छादित वातावरण में कुर्सी टेबुल - अदि के महर्घ विन्यास द्वारा विविध प्रकार के फ्रूट्स, और सर्वतो मुख्य वह भारतीय पेय, जो गर्मी में भी बहुत ठंढक पहुँचाने वाला माना जा रहा है, श्रातिथ्य के लिए उपस्थित करना आदर्श है । यही दुर्व्यवस्था आज हमारी कौटुम्बिक व्यवस्थाओं की हैं । मानवीय मर्यादा का आत्यन्तिक स्खलन -प्रसङ्ग होती हुई भी हमारी संकुचित दृष्टिं में लाभ की है । हमारे एक अनन्य मित्र ने जो वैदिक साहित्य के अनन्य प्रेमी हैं, जिनका नामोल्लेख शिष्टता के नाते अप्राकृत है, एक बार हमारे सामने ' पॉलिसी ' ( बीमा ) का महत्त्व उपस्थित किया । " वर्त्तमान दशा में सभी व्यव स्थाओं के अस्तव्यस्त हो जाने से भले ही कुछ समय के लिए इस बीमापद्धति से हमें कहने भर को अर्थसुविधा मिल जाय, किन्तु भारतीय दृष्टिकोण से, विशेषतः भारतीय कौटुम्बिक व्यवस्था के -htm से यह व्यवस्था सर्वथा घातक है " इस प्रतिवाद से कहीं बड़ी कठिनता से उन्होंने अपना मन्तव्य बदला | पति - पत्नी - माता - पिता - पुत्रः कन्या - भ्राता - भगिनी - बन्धु - आदि की समष्टि से सम्बन्ध रखने वाली ४१०

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शौचविज्ञानोपनिषत् कौटुम्बिक व्यवस्था एक प्रकार का शासनतन्त्र है, राज्यतन्त्र है । कुटुम्ब के पर सम्पूर्ण कुटुम्ब का उत्तरदायित्त्व निर्भर है । उधर उक्त पॉलिसी व्यक्तिगत ज्येष्ठ स्वार्थ - श्र को े ष्ठ व्यक्ति के आधार इस व्यवस्था पर पूर्णरूप से आघात करतो है । अपनी व्यक्तिगत अर्थज्ञालसा प्रोत्साहन देती हुई यह पॉलिसी पिता को पुत्र से, भाई को भाई से पृथक् कर देती को उत्तेजित करने वाली कोई न्यूनता नहीं है । भारतीय आध्यात्मिक आदर्श ( है जिसने । उदाहरणों भारतीय की दुर्भाग्य से ज मानव को -' अमृतस्य पुत्रा अभूम ' यह दीक्षा दी है, जिस दीक्षा से दीक्षित यह सदा ' अमर-भावना ' का उपासक बना रहता है, ऐसे इस दिव्य सांस्कृतिक आदर्श ) मूलप्रतिष्ठा मानने वाले आस्तिक भारतीय मानव को, अपनो प्रकृतिसिद्ध को अपनी पारम्परिक आदर्श को लक्ष्य बनाते हुए इस आदर्श की महत्ता कौटुम्बिक व्यवस्था के विष्ट कर देने वाली घातक ' पॉलिसी ' के व्यामोहन से इसे अपने को परोक्षरूपेण आपको आमूलचूड़ बनाए रखना चाहिए | व्यक्तिगता विचैषणा को प्रोत्साहित करती हुई यह प्रतोच्य अस्पृष्ट ही रूपा ' पॉलिसी ' कालान्तर में लोकाणा की जननी बनती हुई कौटुम्बिक व्यवस्था ' पॉलिसी ' के साथ साथ व्यक्ति के आध्यात्मिक निःश्रवस् भाव का भी मूलोच्छेद कर डालती के उच्छेद है ब्रह्मानुगत समदर्शन-कौटुम्बिक व्यवस्था की दुर्दशा का प्रत्यक्ष निदर्शन आज भारतवर्ष का प्रायः प्रत्येक ( शिक्षित गृहस्थ है! “ हम भी मनुष्य, हमारा भी स्वतन्त्र स्वत्त्र ' इस प्रकार पूर्वप्रतिपादित विषाक्त समदर्शन- ) भावना के अनुग्रह • से आज पारस्परिक सद्भाव उच्छिन्न हो गया है । पुत्र कहता है - ' मैं प्रथम मनुष्य हूँ, पुनः आपका पुत्र हूँ ' । कन्या कहती है- ' सावधान! मैं शिक्षित हूँ, इसे मेरे न कार्यों भूलिए, हस्तक्षेप करने की भूल न कर बैठना ' । पत्नी कहती है- ' नारीजाति को पददलित में बीत गया है । हम देश की सम्पत्ति हैं । जितना जो अधिकार तुह्मारा करने का युग है ' । तदित्थं, आज सभी व्यक्तिवर्ग इस प्रकार अधिकारव्यामोहन है, उतना वही अधिकार हमारा पारस्परिक मानमर्यादा- संयम आदर्श सब कुछ स्मृतिगर्भ में विलीन से आत्मस्वरूपविमुग्ध बन रहे हैं । उक्त अव्यवस्थाओं का श्रेय है एकमात्र उस व्यक्तितन्त्र को, जिसने समदर्शनात्मक है । और राष्ट्र - समाज - कुटुम्ब की इन से अपना स्वरूप विस्मृत कर दिया है । हमारा व्यक्तित्त्व आज ' मनुष्या एवैकेऽतिक्रामान्ति विष्म दर्शन की भावना उद्गार को चरितार्थ कर रहा है । आज हम स्वयं अपनी अधिकारमय्र्यादा से ' इस श्रौत कहाँ - कबतक - क्या करना चाहिए?, इस कम्र्मोपनिषत् के ज्ञानाभाव से आज वञ्चित हैं । कब किस प्रकार-नियन्त्रण करने में असमर्थ होते हुए उत्पथ - गमन के अनुगामो बन रहे हैं । यही स्वयं हम अपना भी में, तद्द्वारा व्यक्तिसमष्टिरूप कुटुम्बों में, कुटुम्बसमष्टिरूप समाजों में, समाजसमष्टिरूप महादोष सर्वप्रथम व्यक्ति ' मिक महामारी की भाँति व्याप्त होगया है । अमर्यादित व्यक्ति - समष्टिरूप राष्ट्र में सांक्रा -त्तसमष्टिरूप राष्ट्र का यह समदर्शन, और यह समानाधिकार, कौन कह सकता कुटुम्ब है - त्तसमष्टिरूप समाज-करके ही विश्राम न लेगा । कि, हमारा सर्वनाश ४११

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श्राद्धविज्ञान प्रचलित समदर्शन के ( जो आज उन्हीं समदर्शियों की भाषा में ' साम्यवाद ' नाम से भी पुष्पित पल्लवित हो रहा है ), तथा तत्रप्रतिष्ठ समानाधिकारतत्त्व के उक्त इतिवृत्त से पाठकों को सम्भवतः यह स्वीकार कर लेने में कोई आपत्ति न होगी कि, भारतीय ऋषियोंनें जिसे - समदर्शन कहा है, उसका प्रकृतितन्त्र के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है । जिस गीतावचन के आधार पर अपनी कल्पना से मान्य विचारकों नें समदर्शन की उक्त परिभाषा की हैं, उसी गीताशास्त्र से इस की परिभाषा का समन्वय कराना चाहिए । सम्पूर्ण विश्वप्रपञ्च को गीतादृष्टि से - पुरुषदृष्टि, प्रकृतिदृष्टि, भेदसे दो भागों में विभक्त किया Saif के अव्ययदृष्टि, ईश्वरदृष्टि, ब्रह्मदृष्टि, समदृष्टि, आदि विविधरूप हैं । एवं प्रकृतिदृष्टि के ही अक्षरगर्भिता क्षरदृष्टि, जीवदृष्टि, विषमदृष्टि, विश्वदृष्टि, आदि अनेक विर्त्त हैं । समपुरुषतत्त्वाधार पर प्रतिष्ठित विषमा प्रकृति ही विश्व का निर्माण करती है । प्रकृति - पुरुष के समन्वित रूप का ही नाम ' इदं विश्वम् ' है । फलतः विश्व में परस्परात्यन्तविरुद्ध - भावों का समन्वय सिद्ध हो जाता है । जड़ - चेतन - सर्वविध पदार्थों में वह अभिन्न अविभक्तरूप से व्याप्त है । इस अभिन्ना - अखण्डा - पुरुषसत्ता के आधार पर भेदमूलक - भेदभावापन्न प्राकृतिक पदार्थ प्रतिष्ठित हैं । अपनी विज्ञानदृष्टि से सर्वानुस्यूत इस अभिन्नब्रह्म की भावना रखना ही समदर्शन है । इसी समदर्शन का नाम वास्तविक समदर्शन है । ' शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ' से ब्रह्मदर्शन अभिप्रेत है । क्योंकि यही ब्रह्म ' सम ' नाम से प्रसिद्ध है । निम्न लिखित वचन सर्वव्यापक ब्रह्म के इसी समत्व का स्पष्टीकरण कर रहे हैं-: १ - समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्व ेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मंयि ते तेषु चाप्यहम् ॥ ( गी ० ६२६ । ) । २ - समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् । विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥ ( गी ० १३।२७ । ) । ३ - समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् । न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥ ( गी ० १३२८ ) । ४ - यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति । तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तथा ॥ ( गी ० १३ । ३० । ) । ५ - क्षेत्र - क्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥ ( गी ० १३ । ३४ । ) । ६ - सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ad योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ ( गी ० ६ २६ । ) । ४१२

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आशौचविज्ञानोपनिषत् ७- यो मां पश्यति सर्वत्र सर्व च मयि पश्यति तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ ( गी ० ६ । ३७ । ) । ८- इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः । " निर्दोषं हि समं ब्रह्म " तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः ( गी ० ५।१६ । ) । अर्जुन, विचारशील अर्जुन समदर्शन की भावना को लेकर आगे बढ़ा था । " ये सब हमारे तो बन्धुबान्धव हैं, भला इन्हें मार कर हम कैसे सुखी हो सकते हैं? यही तो अर्जुन की समदर्शन ही मूला दयामयी भावना थी । परन्तु भगवान् ने इसका लेशतोऽपि समादर न किया । कारण • यह समदर्शन वस्तुतः विषमदर्शन था. प्रकृतिविरुद्ध दर्शन था । जो जैसा है, उसे वैसा न समझना, अर्जुन का विरोध है | अर्जुन ने स्वयं अपने आपको ही समझने में भूल की । वह भूल गया कि, " मैं ही प्रकृति-क्षात्रवीर्य मेरी प्रकृति है, जिसकी स्वरूपरक्षा एकमात्र आततायी वधं पर ही अवलम्बित क्षत्रिय हूँ, की दृष्टि विषमा थी, वर्त्तन सम था । विषमदर्शन - समवर्त्तन का अनुगामी बना हुआ है " । अर्जुन जब कर्त्तव्यविमुख हो आता है, प्रकृतिधर्धविरूद्ध अधर्म जब इस पर आक्रमण कर अर्जुन लेता इस प्रकार वान्. इसके सम्मुख प्रकृति - पुरुष के विवेक का विश्लेषण करते हुए यह सिद्धान्त स्थापित करते है, तो हैं भग- कि, वास्तविक समदर्शन अव्ययात्मानुगत है, एवं वास्तविक वर्त्तन प्रकृत्यनुगत है । ब्रह्म समहै, अतः इसे मूल बना कर सर्वत्र आत्मभावना का अनुभव करना चाहिए । प्रकृति विषमा है, अत: इसे मूल विषमवर्त्तन का अनुगामी बनना चाहिए । समदर्शन का सर्वशरीरों में समानरूप से बना कर से सम्बन्ध है, पुरुष से सम्बन्ध हैं, जो कि जन्म - मृत्यु प्रवाह से संस्पृष्ट रहता हुआ व्याप्त विभूतिसम्बन्ध अखण्डब्रह्म 1 सर्वत्र समरूपेणावस्थित है । समदर्शनमूलक इसी अखण्डपुरुष को लक्ष्य बना से कर भगवान् ने यह

व्यवस्था की कि -न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥

विश्वानुगत विषमवर्त्तन-- गीता २/२०१ कर्म्मप्रधान व्यावहारिक जगत् का सत्पात्र है प्रतिशरीर में भिन्न भिन्न प्राकृतिक सोपाधिक भूतात्मा, जो महानात्मा, विज्ञानात्मा, भूतादि से नित्य सम्परिष्वक्त रहता है । यह प्रतिशरीर में भिन्न भिन्न है । इस दृष्टि से प्रत्येक प्राणी का तन्त्र स्वतन्त्र है । इसका जन्म होता है, मृत्यु निर्विशेष के लिए जहाँ एक ओर भगवान् ' न जायते म्रियते ' कहते हैं, वहाँ इस सविशेष होती आत्मा है । उस लिए निम्न लिखित सिद्धान्त स्थापित करते हुए इसे जन्म - मृत्युप्रवाह से आक्रान्त बतला के रहे हैं-४१३

पृष्ठ 478

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श्राद्धविज्ञान

जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु ुवं जन्म मृतस्य च ।

तस्मादपरिहार्येर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥

: - गीता रा २७१ विषमभावापन्न विषम विश्व की मर्यादा -रक्षा के लिए व्यवहार के अनुबन्ध से इसे लक्ष्य बनाना केवल चाहिए, एवं पराशान्ति के लिए व्यवहारातीत उस समब्रह्म को लक्ष्य बनाना चाहिए । यदि हम विश्वासक्ति में अनुरक्त हो गए, तो सर्वनाश है । साथ ही यदि केवल ब्रह्मभावना में ही विलीन बने रह गए, तो लोकसंग्रह- लोकमा विश्वस्वरूप का उच्छेद है । क्या करना चाहिए?, भगवान् उत्तर देते हैं - सम-ब्रह्म को आधार बनाओ, विषम विश्व को आधेय बनाओ । व्यवहारजगत् में सविशेष आत्मा को प्रधान बनाओ, इससे तो लोकसंग्रह सुरक्षित रहेगा, मर्यादा सुव्यवस्थित बनी रहेगी । एवं अपने व्यवहारकाल के साथ साथ ही उस समब्रह्म की भावना सुरक्षित रक्खो । इससे विश्वासक्तिमूलक बन्धन अपना प्रभाव न डाल सकेगा । इस प्रकार समब्रह्ममूलक समदर्शन के आधार पर विषम प्रकृतिमूलक विषमवर्त्तन से उभयलोकनिष्ठा सुरक्षित बनी रहेगी ।

फलतः सुपरिणाम होगा - ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्ग त्यक्त्वा करोति यः ।

लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥

ऐच्छिक सर्वनाश का आमन्त्रण-- गीता ५।१० । भारतीय प्रजा ने उक्त आदेश का मूल्य समझा, और ऐसा समझा कि, सम्भवतः किसी अन्य जाति को इस समझ का सौभाग्य न प्राप्त हुआ होगा, न भविष्य में ह्रीं कोई आशा है । इसका समद-र्शन केवल चेतन जगत् पर ही विश्रान्त नहीं हो गया, अपितु जड़पदार्थों में भी इसकी यह ब्रह्मभावना । व्याप्त हो गई । इस समदर्शन के साथ इसने विषमवर्त्तनद्वारा लोकनिष्ठा का भी संग्रह किया एकत्त्व में अनेकत्त्व स्थापित कर, एवं अनेकत्त्व में एकस्व के दर्शन कर आर्षप्रजा ने उभयलोकनिष्ठा को सफल बना लिया । समदर्शन के प्रभाव से जहाँ इसने आध्यात्मिक आत्मजगत् पर विजय प्राप्त किया, वहाँ विषमवर्त्तन से आधिभौतिक बाह्यजगत् को पुष्पित- पल्लवित किया । एक ओर विषमवर्त्तनपक्षपाती भगवान् जहाँ अर्जुन को- ' युद्धाय कृतनिश्चयः ' यह आदेश दे रहे हैं, वहाँ समब्रह्ममूलकक समदर्शन के पक्षपाती भगवान् साथ साथ ही - ' समः शत्रौ च मित्रे च " ( १२।१८ ) यह भी आदेश देना अनिवार्य मान रहे हैं । विषमवर्त्तनानुगत ऐसा समदर्शन जहाँ उभयलोककल्याणकर भारतीय साम्यवाद है, वहाँ समवर्त्तनानुगत विषमदर्शन तमोगुणमूलक, श्रतएव धर्ममूलक सर्वथा काल्पनिक आज के मान्य बन्धुओं का आज का सर्वनाशक वह साम्यवाद है, जिसके व्यामोह में पड़कर हम अपने सर्वनाश का इच्छापूर्वक आमन्त्रण कर रहे हैं । ४१४

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I आशौचविज्ञानोपनिषत् शूद्र, वैश्य, स्त्री, क्षत्रिय, ब्राह्मण, राजा, प्रजा, स्वामी, सेवक, पुत्र, पिता, भ्राता, भगिनी, आदि भेदों का मूल प्रकृतितन्त्र है । प्रकृतितन्त्र से सम्बद्ध सविशेष भिन्न आत्माने ही इनके स्वरूपभेद को प्रतिष्ठित कर रखा है, यही भेद इनका स्वरूपरक्षक है । जिन नियम - व्यवहार - अधिकार - मर्यादाओं से इनका यह विशेषभाव सुरक्षित रहता है, वे ही इनके लिए धारणलक्षण धर्म हैं, विपरीत अधर्म हैं । ब्रह्म - क्षत्र - विट्शूद्र आदि विशेषताओं का प्राकृतिक वैशिष्ट्य से सम्बन्ध है । विज्ञानानुगत प्राकृतिक इस भेदवादमूलक वैशिष्ट्य के आधार पर व्यवस्थित स्पृश्य - अस्पृश्य व्यवथा का मूल धरातल प्राकृतिक जगत् है । एक वृक्षपत्र के ताड़न से जिस भारतीय का हृदय कम्पित हो जाता है, जो भारतीय कृमि - कीटादि तक के लिए अन्न व्यवस्था करता है, वह समसजातीय शूद्रवर्ग के लिए घृणा के आधार पर उन्हें अस्पृश्य मान बैठेगा, यह कौन विचारशील स्वीकार करेगा? 1 ' मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ' - ' परस्परं-भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ' - ' शूद्रोऽपि दशमी ज्यायान् ' आदर्श को सर्वप्रथम स्थापित करने - वाली भारतीय प्रजा शूद्रारपृश्यता के सम्बन्ध में घृणा को मूल मानती है, उनसे उद्वेग करती है, यह अभिनिविष्टों के प्रचार का कुफल है, जो अपने कल्पित सिद्धान्त की रक्षा के लिए शास्त्र के नाम से मिथ्या प्रचार कर सर्वनाश का बीज वपन कर रहे हैं । अवश्य ही यह अस्पृश्यता - विज्ञानमूला है, अतएव अवश्य ही स्पृश्य - अस्पृश्य दोनों भावों की स्वरूपरक्षिका है । स्त्री - शूद्र- वैश्यों को पापयोनि बतलाने वाले भगवान् से उन कृपालुओंोंने प्रश्न नहीं किया कि, भगवन्! आप तो समदर्शी हैं, आपने इन्हें पापयोनि कैसे, क्यों कह डाला? | सम्भवतः भगवान् उस समय यही उत्तर देते कि, समदर्शन हमारी अव्ययकला से सम्बन्ध रखता है, जिसका व्यावहारिक जगत् से कोई सम्बन्ध नहीं है । व्यवहार-काड में तो विषमा प्रकृति का ही साम्राज्य है । एवं तमोगुणप्रधाना रात्रि के कृष्णसोम से उत्पन्न स्त्री, दिति पृथिवीमूलक तमोभूत आसुरप्राण से उत्पन्न शूद्र, एवं सायंकालीन क्षयिष्णु छायामय जागतप्राण से उत्पन्न वैश्य अवश्य ही पापयोनियाँ हैं । प्राकृतिक विधिविधानों की उपयोगिता-यह स्पष्टतम विषय है कि, सनातनशास्त्र का प्रत्येक विधि - विधान प्रकृति को, वस्तु के आभ्य तर स्वरूप को, स्वभाव को स्वरूपधर्म को आधार बना कर ही उसकी रक्षा के लिए ही प्रवृत्त हुआ है । विज्ञानानुगता नित्या नियति इन विधि - विधानों का नियमन कर रही है, जिसे हम अन्तर्यामी का शासनसूत्र भी कहा करते हैं । इन्हीं नियतिमूलक नियत धर्म्मो ( स्वधम्मों ) की रक्षा के लिए वेदमूलक धर्मभेद प्रवृत्त हुआ है । विभिन्न अधिकारमय्र्यादा से सुरक्षित यह धर्मभेद आध्यात्मिकदृष्ट्या समदर्शन को अपनी आधारशिला बनाता हुआ अवश्य ही हमारा आराध्य है, एवं यही भारतीय धर्म ( प्राकृतिकधर्म्म ) का इतर समयानुबन्धी मानवमतों की तुलना में वैशिष्ट्य है, जिसका गीता - उपनि-दादि भाष्यों में विस्तार से उपबृद्द हुआ है । समदर्शन की भावना से घृणा को प्रवेश करने का ४१५

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श्राद्धविज्ञान असर नहीं मिलता, पारस्परिक सद्भाव सुरक्षित रहता है, ' समानानि मनांसि वः ' मूलक पारस्परिक सहयोग सुरक्षित रहता है । कोई भी अपनी प्रातिश्विक वर्णाधिकारमर्यादा को परस्पर की तुलना में. - श्रेष्ठ समझने की भ्रान्ति नहीं करता । अपने अपने स्थान पर सुरक्षित रहने वाले इन सबका आत्म-दृष्ट्या एक हा विन्दु में समन्वय हो रहा है । ऐसा समदर्शन - विषमवर्त्तनमूलक ' सममञ्चति ' लक्षण समाज ही भारतीय कौटुम्बिक समाज - ग्रामसमाज - नगरस नाज- तथा राष्ट्रियसमाज है । आँख - नाक-मुख - उद - पाद - आदि सभी परस्पर में अपना पृथक् - पृथक् स्वरूप रखने वाले हैं, सब का स्वरूप परस्पर में भिन्न नाम - आकृति - गुण - जाति - कर्म - स्वभाव - सब कुछ भिन्न भिन्न । परन्तु कोई किसी के अधिकार पर आघात कर परस्पर अधिकार - विनिमय की वाञ्छा नहीं कर रहा अपने अपने अधिकार पर सुरक्षित रहते हुए अहंभावात्मिका एक श्राध्यात्म संस्था के लिए आत्मसमर्पण किए हुए है । सब का आलम्बन एक है, लक्ष्य एक है, प्राप्तिस्थान एक है । परन्तु इस एक आलम्बन पर लम्बित सबका स्वरूप अधिकार - भिन्न - भिन्न है । अपनी अपनी अधिकारमय्र्यादा से कोई छोटा-बड़ा नहीं है । सबका स्व - स्वस्थान पर समान महत्त्व है 1 । कोई परस्पर ईर्ष्या - घृणा - श्रहमहमिका नहीं करता । एवं जबतक पाञ्चभौतिक आध्यात्मिक क्षेत्र में समानदर्शनमूला, तथा विभिन्नाधिकारमूला यह समाजव्यवस्था सुरक्षित है, तभी तक शरीर - समाज स्वस्वरूप से सुरक्षित है । दुर्भाग्य से यदि शरीरसमाज के व्यक्तिस्थानीय चक्षु श्रोत्र - पाद - उदरादि में कहीं अधिकारसाम्य को लेकर संघर्ष उपस्थित, इसका समाधान उन्हीं सम - अधिकारमय्र्यादा के पक्षपातियों हो जाय, तो क्या परिणाम हो? से ही कराना चाहिए | इसी व्यक्तितन्त्र - जक्षण आध्यात्मिक क्षेत्र के आधार पर हमारी कुटुम्ब समाज, तथा राष्ट्रिय अधिकारमय्र्यादाओं की प्रतिष्ठा हुई है । कहना न होगा कि, इन सब वर्त्तमान अव्यव स्थाओं का मूल एकमात्र व्यक्तिविकास्त्र का उच्छेदमात्र है । आज हमारा व्यक्तित्त्व आहारादि की विष-मता से, परशिक्षासंस्कार से सर्वथा विकृत हो गया है, विकृत व्यक्तित्व ने हमारे कुटुम्ब - समाज - राष्ट्र-सबको विकृत कर डाला है । यही है वर्तमान युग का कतुषित व्यक्तित्व, दारुण कुटुम्बव्यवस्था, मर्यादातिक्रान्त समाज, एवं अप्राकृतिक - धर्मविरुद्व - समानाधिकारमूला राष्ट्रवादियों को राष्ट्रियभावना, जिसे बड़े अभिमान से वे ' साम्यवाद ' जैसे पवित्र शब्द से उद्घोषित करने का दुःसाहस कर रहे हैं । " इन दुर्दान्त वासनाओं का, इनके भीषण दुष्परिणामों का उत्तरदायित्त्व किस पर है?, प्रश्न की मीमांसा स्वयं उन्हें ही अपने अन्तर्जगत् में मुकुलितनयन बन कर करनी चाहिए । तच्चमूला अस्पृश्यता-किसी प्राकृतिक कारण से असच्छूद्र अस्पृश्य है, एवं अवश्य ही अवश्य है । इस अस्पृश्यता .के. ' मूल में ' घृणा ' है, यह कौन बुद्धिमान स्वीकार करेगा । हमें तो यह कहने में भी संकोच नहीं करना चाहिए कि, आज जो वर्ण- प्रजाओं में परस्पर ईर्ष्या - द्रोह - घृणा आदि कुत्सित भावनाएँ जागृत हो रहीं हैं, इसका एकमात्र कारण विषमदर्शन ही है, एवं विषमदर्शन को प्रोत्साहित करने वाला आत्माति-४१६