Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 481–490
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 481–490
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शौचविज्ञानोपनिषत् मान ही है । साथ ही उन समानाधिकारियों के प्रचार का कुरूत । नहीं तो श्राज के २०० वर्ष पहिले के ' भारत पर दृष्टि डालिए । जिस अन्त्यज प्रश्न ने उनकी कृपा से आज ऐसा भीषणरूप धारण कर रक्खा है, उसका उस युग में नामशेष भी न था । सम्भव भी कैसे होता, जब कि सभी अपनी अपनी अधिकार - मर्यादा पर आरूढ़ | आज तो सभी सब कुछ बन जाना चाहते हुए, किंवा बने हुए सम्पूर्ण राष्ट्रवैभव के विलयन के महानिमित्त प्रमाणित हो रहे हैं । देखिए!
' सर्वे यत्र नेतारः सर्वे पण्डितमानिनः ।
सर्वे सर्वस्वमिच्छन्ति तत्र सर्व बिलीयते ॥
उक्त भावना से जिस दिन से इस अधिकारपदा पर श्राघात हुआ, उसी क्षण से दुर्दिन का श्रीगणेश हो गया । चतुर राजनीति- विशारदोंनें गजनिमीलिका का आश्रय लेते हुए राष्ट्रवादियों की 7 इस लक्ष्यच्युति को परोक्षापरोक्षरूपेण उत्साहित किया । परिणामस्वरूप हमारा राष्ट्रियसमाज मूल लक्ष्य से पराङमुख बन कर आज इस गृहकलह प्रवृत्तिका कारण बन गया । भारतीय संस्कृति, साहित्य, धर्म्म, लोक - राज - धर्मनीति आदि किसी भी आवश्यक तथा उपादेय राष्ट्रिय कर्म की ओर आज हमा ध्यान नहीं है | ध्यान है - एकमात्र हिन्दूजाति के उस कलङ्कमार्जन पर, जो वस्तुगत्या सर्वस्व का मार्जन करने वाला बन रहा है । और यही है वर्त्तमान युग के ' रचनात्मक कार्य्यं का जर्जरित संक्षिप्त इतिवृत्त, जिसकी कृपा -समानाधिकारपङ्कनिमग्नता-ब्राह्मणों का ब्रह्मवोर्य पददलित है, क्षत्रियों का शौर्य - पराक्रम पतावित है, वैश्यों का अर्थी-पार्जन संकटापन्न है, एवं शूद्रवर्ग का शिल्प - कला - कौशल स्मृतिगर्भ में विलीन है । मानों किसी राष्ट्र को अपनी राष्ट्रसमृद्धि के लिए ब्रह्मवीर्थ्यानुगत सर्वाधारा ज्ञानराशि, क्षत्रवीर्य्यानुगत प्रवृद्ध शौर्य, विंड्-वनुगत प्रभूत अर्थ, एवं शूद्रानुगत शिल्प - कला - यदि कुछ भी अपेक्षित नहीं है । बहिराक्रमणों के झञ्झावातों से शताब्दियों से टक्कर लेते हुए भी भारतवर्ष ने अतीत शताब्दियों में समर्थरामदास, ज्ञानेश्वर, तुकोबा, तुलसी, सूर, जैसे सन्देशवाहक ब्राह्मण एवं साधु उत्पन्न किये, ' शूद्राणाम निरवसितानाम् ' वाले युग ने तक्षशिला - नालन्दा जैसे सांस्कृतिक - साहित्यिक क्षेत्रों को जन्म दिया, शिवाबा, प्रताप, हमीर, छत्रसाल जैसे वीरक्षत्रिय उत्पन्न किए, देश के कलाकौशल ने विदेशी शासकों को चकाचौंध में निमग्न बनाया । और आज!!! क्यों वह विशिष्ट उत्पादन क्रम टूट गया?, क्यों आज हमारी धम-नियाँ शिथिल हो गई, आघात के प्रत्युत्तर न देने को ही अहिंसा मानने की भूल हम क्यों कर रहे हैं?, " ये यथा मां प्रपद्यन्ते " तांस्तथैव भजाम्यहम् " वाला आदर्श कहाँ विलीन हो गया?, उत्तर एकमात्र वही समानाधिकार - पङ्क । सब कुछ आज इसी महापङ्क में निमज्जित हो गया है । ४१७
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शुचि - अशुचिभावमीमांसा ---श्राद्धविज्ञान जिस प्राकृतिक प्राणभेद के आधार पर स्पृश्य - अस्पृश्य - व्यवस्था प्रतिष्ठित है, उस प्राणभेद के , मलिन - तामस सम्यक् - बोधानन्तर ही आज का यह कोलाहल शान्त किया जा सकता है । मलशोधन पदार्थों का सान्निध्य, आदि सांक्रामिक दोषों का सर्वथा निराकरण न करते हुए भी इस सम्बन्ध में हमें यह नहीं भुला देना चाहिए कि, अस्पृश्यता का मूल वस्तुतः प्राकृतिक ' अशुचि ' भाव है, जिसका कि अनुपद में ही स्पष्टीकरण होने वाला है । अशुचिभाव का तद्रूप प्राण से संम्बन्ध अशुचिभावापन्न है । इस प्राण-का जिनमें जन्मतः प्राधान्य है, वे मनुष्य ही नहीं, पशु - पक्षी भी ( काक - श्वान - श्रादि ) होने से शुचिभावापन्न स्पृश्य प्राणियों के लिए अस्पृश्य हैं । साथ ही कर्म्मणा किंवा समयविशेषानुगत प्रकृति के सहयोग से जन्मतः स्पृश्य कहलाने वाले मनुष्यों में भी जब कभी यह अशुचिभाव प्रविष्ट हो जाता है, तब वे भी उस समय के लिए अस्पृश्य बन जाते हैं । जिन ब्राह्मणों पर अस्पृश्यता में की अणुमात्र प्रवृत्ति का कलङ्क लगाया जाता है, वे ब्राह्मण भी समय विशेष में अपने आपको अस्पृश्य कहने भी तो संकोच नहीं करते । जिन ब्राह्मणोंनें जिस प्राणानुगत अशुचिभाव को लक्ष्य में रख कर जिन जन्मजात अशुचिप्राणावच्छिन्न सच्छूद्रों के लिए अस्पृश्यता की व्यवस्था की है, उन्हीं ब्राह्मणों ' अशुचिभावप्रवर्त्तक कारणों के अनुगमन से स्वयं अपनी स्पृश्यं जाति के सम्बन्ध में क्या उद्गार प्रकट किए हैं?, यह देख कर सम्भवतः कलङ्कमाकों को यह बोध हो सकेगा कि, अस्पृश्यता घृणा मूलिका नहीं है, अपितु प्रकृतिमूला है, प्राणदोषमूला है । शुचिभावापन्न ब्राह्मण किसे माना गया है?, पहिले यही सुनने का अनुग्रह कीजिए ।
१ - जातकर्मादिभिर्यस्तु संस्कारैः संस्कृतः शुचिः ।
वेदाध्ययनसम्पन्नः षट्सु कर्मस्ववस्थितः ॥
२- - सत्यवाक - विघशासी तु शीलवांश्च गुरुप्रियः ।
सत्यवती सत्यपरः स वै ब्राह्मण उच्यते ॥
३ – तपः श्रुते च योनिश्वाप्येतत् ब्राह्मणकारणम् ।
सत्यं दानं तपो होम आनृशंस्यं क्षमा नृणाम् ॥
तपश्च दृश्यते यत्र स ब्राह्मण इति स्मृतः ॥
४ - देवेभ्यश्च पितृभ्यश्च भूतेभ्योऽतिथिभिः सह ।
दत्त्वा शिष्टन्तु यो भुङं ते तमाहुर्विघसाशिनम् ॥
जात्या शुचिभावप्रवर्त्तक ब्रह्मवीर्य्य से युक्त रहता हुआ ब्राह्मण उक्त नियमोपनियमों की रक्षा से ही अपना शुचिभाव सुरक्षित रख सकता है । विपरीत पथानुगमन से इसका शुचिभाव मलिन हो जाता ४१८
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शौचविज्ञानोपनिषत् है, एवं अशुचि - अस्पृश्य शूद्र की भाँति यह भी अव्यवहार्य बन जाता है, शूद्रसम स्थिति में आ जाता है । प्रसवृत्तानुगामी शूद्रसन अब्राह्मणलक्षण इसी ब्राह्मण का इतिवृत्त बतलाते हुए धर्माचायों ब्रह्माणात्मक ब्राह्मण के सम्बन्ध में ६ प्रकार के वर्गीकरण मानें है । देखिए!
१ - अब्राह्मणास्तु षट् प्रोक्ता ऋषिः शातातपोऽब्रवीत् ।
आद्य राजभृतस्तेषां द्वितीयः क्रयविक्रयी ॥
२– तृतोयो बहुयाज्यः स्यात्, चतुर्थोग्रामयाजकः ।
पञ्चमस्तु भृनुस्तेषां ग्रामस्य नगरस्य च ॥
३ – अनागतां तु यः पूर्वी सादित्यां चैत्र पश्चिमाम् । नोपासीत द्विजः सन्ध्यां स षष्ठोऽब्राह्मणः स्मृतः 11
४ - ब्रहावीजसमुत्पन्नो मन्त्र संस्कारवर्जितः ।
जातिमात्रोपजीवी च भवेदब्राह्मणस्तु सः ॥
५ - कूपमात्रोदकग्रामे विप्रः सम्वत्सरं वसन् ।
शौचाचारपरिभ्रंशाद् ब्राह्मणाद्धि प्रमुव्यते ॥
६ वृषो हि भगवान् धर्मस्तस्य यः कुरुते वलम् ।
वृषलं तं विदुर्देवाः सर्व्वधर्मकृतः ॥
9 - अनुपासितसन्ध्या ये नित्यमस्नानभोजनाः ।
नष्टशौचाः पतन्त्येते शूद्रतुल्याच धर्मतः ॥
८ - ये व्यपेत्य स्त्रकर्मभ्यः परपिण्डोपजीविनः ।
द्विजत्वमभिकाङक्षन्ति तांश्च शूद्रवदाचरेत् ॥
ह - न यस्य वेदो न जयो न विद्या च विशाम्पते ।
स शूद्र इव मन्तव्य इत्याह भगवान् मनुः ॥
१० - योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् ।
स जीवन्नेव शूद्रयमाशुं गच्छति सान्वयः ॥
'११ - हीनजातिस्त्रियं मोहादुद्वहन्तो द्विजातयः ।
कुलान्येव नयन्त्याशु ससंतानानि शूद्रताम् ॥
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श्राद्ध विज्ञान १२ - ' अथ योऽयंमनग्निकः स कुम्भे लोष्टः । तथा कुम्भे लोष्टः प्रक्षिप्तो नैव शौचार्थाय नैव कल्पते, नैव शस्यं निर्वर्त्तयति एवमेवायं ब्राह्मणोऽनग्निकः । तस्य ब्राह्मणस्यानग्निकस्य भवन्ति ” दैवं दद्यात्, न पित्र्यं, न चास्य स्वाध्यायाशिषः, न यज्ञ आशिषः स्वर्गङ्गमा गो ०० प्रा ० पू ० २ | २३ | १३ – “ श्रोत्रिया अननुवाक्या अनग्नयो वा शूद्रसधर्माणो भवन्ति ।
विद्वद्भोज्यान्यविद्वांसो येषु राष्ट्रषु भुञ्जते ।
तान्यनावृष्टिमृच्छन्ति महद्वा जायते भयम् ” ॥
- वसिष्ठः । न होगी उक्त वचनों के आधार पर यह मान लेने में अब सम्भवत: ( उन्हें? ) कोई दिनों आपत्ति के लिए प्रत्येक कि, अस्पृश्यता प्रारणाशुचिमूला है । इसी आधार पर प्रत्येक मास में परिगणित ' स्त्री अशुचिभावापन्न होती हुई अस्पृश्य मानी गई है । रजस्वला स्त्री के स्पर्श का निषेध क्या घृणामूलक है? | मार्गपतित केश, अस्थि, चर्म्म, आदि का स्पर्शनिषेध क्या घृणामूलक है? । साथ ही है चमरीगौकेश ? । मानना, शङ्खास्थि, कृष्णमृगचर्म की उपासनाकाण्डानुगता उपादेयता क्या ऋषियों की उन्मत्तता - केशप्राण जहाँ पड़ेगा, ये सब प्राणमूलक विधि - विधान है । साधारण अस्थि का प्राण - चर्मप्रारण प्रकार अशुचिभाव का प्रवर्त्तक हैं, वहाँ चमरी शङ्ख - मृगचर्म के प्राण शुचिभाव के प्रवर्तक हैं । इस एकमात्र प्राणविज्ञान के तारतम्य से व्यवस्थित अशुचि - शुचिभावमूला अस्पृश्यता - स्पृश्यता का उपहास करना क्या उन्मत्तप्रलाप नहीं है? । बाह्य - आभ्यन्तर - शुचिभाव-प्राणविद्यारहस्य से सर्वथा अपरिचित केवल भूतासक महानुभावों को दृष्टि में जहाँ केवल बाह्य शुचि ही प्रधान है, वहाँ प्राणाचार्यों की दृष्टि में प्रारणाशुचि का ही प्राधान्य है, जिसका हम अपने चर्म्मचक्षुओं से प्रत्यक्ष नहीं कर सकते । फिर स्थूलभूतों की अपेक्षा सूक्ष्मभूतानुगत कीटाणु-गत अशुचिभाव की मान्यता तो वे भी कर रहे हैं । शुक्लाम्बरधर- स्वच्छ - भव्याकृति - व्यक्ति भी सूक्ष्म-कीटाणु के दोष से अस्पृश्य मान लिया जाता है । न कीटाणु आँख से दिखलाई पड़ते, न उनका असत्- जाता प्रभाव ही तत्काल दृष्टि गोचर होता । फिर क्यों ऐसे रोगियों से सर्पवत् बचने का प्रयास किया है? | " कलान्तर में इस स्पर्श का रोगोदय से प्रत्यक्ष हो जाता है " इस समाध्यन का भी कोई तत्त्व नहीं है, जब कि यही समाधान हमारे पक्ष में भी सुरक्षित बन रहा है । कितने एक कीटाणुदोष वचपन होता में संक्रान्त होते हैं, वृद्धास्था में उनका प्रतिफल प्रकट होता है । कितने एक कीटाणुओं का बीजवपन है मूलपुरुष में, विकास होता है सन्तति में । यही व्यवस्था हमारी प्राण संक्रान्ति में घटित है | प्रारंग-' संक्रान्ति का विशेषत: आध्यात्मिक प्राण पर ही प्रभाव होता है । कालान्तर में यह प्रभाव भूतात्मा के ४२०
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श्राशौचविज्ञानोपनिषत् पतन का कारण वन जाता है । प्राणों के जातिभेद ही इस कालभेद के नियामक बनते हैं । किसी का कुफल है प्रकट हो जाता है, तो किसी का जन्मान्तर में । जिस प्रकार प्रत्यक्ष में तत्काल कुछ भी परिवर्त्तन न देखते हुए भी हमें कीटाणुपरीक्षक वैज्ञानिकों के वचनप्रामाण्य के अधार पर विश्वास करना पड़ता है, कर रहे हैं, वैसे ही इन्द्रियातीत प्राणों के उच्चावच भावपरिवर्तनों को न देखते हुए भी प्राणपरीक्षक वैज्ञानिकों के वचनप्रामाण्य पर क्या हमें विश्वास नहीं कर लेना चाहिए? | स्मरण रखिए! प्राणतत्त्व से सम्बन्ध रखने वाले इन उच्चावभावों का यद्यपि तत्काल हमारी दृष्टि में कोई परिणाम उपस्थित नहीं होता, परन्तु कालान्तर में यही प्रारणक्षोभ सर्वनाश का कारण बन जाता है । जिस प्रकार गौपशु सद्यः दुग्धफल प्रकट कर देता है, तथैव प्राणवैषम्य तत्काल फलप्रद प्रतीत नहीं होता, जबकि फलक्रिया आरम्भ तत्काल ही हो जाती है । जब कालान्तर में प्राणविवर्य का भूत पर आसन होता है, तभी वह फलाफल हमारी भूतदृष्टि के सामने आता है । प्राणतत्त्वानुगता इसी फलाफल व्यवस्था का निम्न लिखित शब्दों से समर्थन हुआ है-नाश्रतो लोके सद्यः फलति गौरिख । शनैरावर्त्तमानस्तु तु मूलानि कृन्तति ॥ ( मनुः ४ १७२ ) । प्राणतत्त्वानभिज्ञ जिन राष्ट्रोंनें विशुद्ध भूतदृष्टि के आधार पर अपने आपको प्रतिष्ठित किया, " जो जातियाँ भूतजगत् को अनन्योपास्य बना कर कर्मक्षेत्र में श्रवतं र्ण हुई, उनका आज नामशेष भी नहीं है । किन्तु प्राणतन्त्र को प्रतिष्ठा बना कर भूत क्षेत्र का अनुगमन करने वाली भारतीयप्रजा ने आज तक अपना जीवनसूत्र सुरक्षित रक्खा, जिसे श्राज उसी जाति के वे महानुभाव, जिनकी दृष्टि संसर्ग-दोष से भूतप्रधाना बन गई है, विच्छिन्न करने का भगीरथ प्रयत्न कर रहे हैं, यह देखकर किस व्यक्ति को कष्ट न होगा । प्राणवञ्चिता भूतानुगति तमोगुणप्रधाना बनती हुई अवश्य ही कुछ काल के लिए भूतसमृद्धि का कारण बन जाती है । दूसरे शब्दों में विशुद्ध बाह्यदृष्टि के उपासक भूतासक्क महानुभाव अवश्य ही भूतवैभव प्राप्त कर लेते हैं, किन्तु परिणाम में समूलविनाश का भी निश्चयेन अनुगमन करना ही पड़ता है । क्षण- प्राणविभूति से बञ्चित इनकी यह क्षणभावात्मिका तसमृद्धि ही क्षणमात्र में इन्हें स्मृतिगर्भ में विलीन कर देती है, जिसके क्षमिक प्रलोभनाकर्षण से आकर्षितमना अक्षणप्राणानुगत भारत अपने आपको भी क्षणधर्मा का पथिक बनाने को महाभूल करने जा रहा है । परिणाम क्या होगा?, यह प्राण चायों के ही मुख से सुनिए-ते तावत् ततो भद्राणि पश्यति । ततः सपत्नान् जयति, समूलस्तु विनश्यति ॥ ( मनुः ४।१७४ । ) । अशुचिभाव, और आशौच-श्यशूद्रवर्ग से सम्बन्ध रखने वाले उक्त सन्दर्भ से प्रकृत में हमें कहना केवल यही था कि, ' अस्पृश्यता ' का अशुचिभाव से सम्बन्ध है, एवं यह प्रशुचिभाव प्राणभाव से सम्बद्ध है । भौतिक ४२१
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श्राद्धविज्ञान शुचि इसे दूर नहीं कर सकती, भौतिक अशुचि इसे दृढमूल अवश्य बना देती है । फलतः भौतिक अशुचि से अपनी जन्मजात अशुचि को दृढमूल बनाए रखने वाले अवश्य ही अस्पृश्य माने जायँगे 1 यही अशुचिभाव हमारे प्रकृत विषय से सम्बन्ध रखता है । जन्म से तथा मृत्यु से तद्वंशजों में नियत समय पर्य्यन्त के लिए अशुचिभाव का समावेश हो जाता है, अतएव तत्समयपर्यन्त के लिए वे अशु-चिभावापन्न बनते हुए अस्पृश्य - अव्यवहार्य बन जाते हैं । अशुचि से सम्बन्ध रखने वाला यही प्राकृ-तिक धर्म ' आशौच ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । प्रकृत तृतीयपरिच्छेद इसी जन्म मरणाशौच की मीमांसा करने के लिए प्रवृत्त हुआ है । शौचपात्र स्वरूपमीमांसा किसी सद्गृहस्थ के घर में ' पुत्र की, स्वयं की, अथवा किसी सगोत्र - सोदक - सपिण्ड बन्धु को स्त्री ने प्रकृति नियमानुसार सन्तान प्रसव किया । इस उत्पन्न सन्तति से इन सत्र सपिण्डों में अपवित्रता कैसे गई?, किस अंश में ये अपवित्र हो गए? । इसी प्रकार किसी के मर जाने से १० अहोरात्र के लिए सब वंशज अपवित्र कैसे, क्यों हो गए?, सचमुच यह प्रश्नपरम्परा हम स्थूलदृष्टि - दर्शकों के लिए एक जटिल समस्या है । इस जनन तथा मरण से पाञ्चभौतिक शरीरों की तो कोई क्षय वृद्धि देखी नहीं जाती । शेष रहा श्रात्मा । आत्मा सर्वथा असङ्ग है, निर्लेप है । “ सङ्गोऽह्ययं पुरुषो न हि स-ज्जते न व्यथथे, न रिष्यति " इत्यादि श्रुति के अनुसार, तथा- " शरीरस्थोऽपि कौन्तेय! न करोति न लिप्यते " इत्यादि वचन के अनुसार आत्मा पर भी इस अशुचि का सम्बन्ध असम्भव है । फिर ' अशौच का क्या अर्थ? । इस प्रश्न समाधि के लिए सर्वप्रथम पात्रता की ही मीमांसा करना आवश्यक. हो जाता है । शरीर पर शौच धर्म का प्रत्यक्ष में कोई प्रभाव प्रतीत नहीं होता, शरीराधिष्ठाता आत्मा स्व - स्वरूप से सर्वथा असङ्ग है, ऐसी दशा में शौच का भोक्ता - पात्र कौन? इस प्रश्न की समाधि के लिए ' अध्यात्मविज्ञान ' से सम्बन्ध रखने वाले तीन आत्मविवर्त्तकों की ओर शुचिभावप्रेमियों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । “ १ – विशुद्ध आत्मा, २ – अन्तरात्मा, ३ – शरीरात्मा " इन तीनों में से सर्वप्रथम विशुद्ध आत्मस्वरूप का ही विश्लेषरण कीजिए । ( महामायावच्छिन्न सहस्रबल्शात्मक महा-विश्व की अपेक्षा से ) सर्वव्यापक ( विश्वव्यापक ) महामायावच्छिन्न, असंख्ययोगमायाप्रवर्त्तक षोडशीपुरुषपुरुषात्मक अखण्ड ( विश्वदृष्ट्या ) आत्मतत्त्व ही विशुद्ध आत्मा है । ' अविभक्त ' च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ' - ( गीता १३।१६ | ) ( समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ' ( गी ०१३।२७ | ) इत्यादि स्मार्त्त सिद्धान्तानुसार विभक्त भौतिक पदार्थों में विभक्तरूप से - समानैकरसरूप से विभूति सम्बन्धेन व्याप्त रहता हुआ, पदार्थोंपाधिभेद से भिन्नवत् प्रतीत होता हुआ, अन्तरङ्गप्रकृतिविशिष्ट ( क्षरक्षर -विशिष्ट ) परात्परानुग्रहीत अव्ययपुरुष ही विशुद्ध आत्मा है । वासना - भावनात्मक कर्म - ज्ञानसंस्कारों ४२२
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- II शौचविज्ञानोपनिषत् से संस्कृत संस्कारमय भौतिक विश्व का समष्टि व्यष्टिरूप से उथयथा सर्वप्रपञ्च का आलम्बन बनता हुआ भी यह विशुद्ध अव्ययात्मा विभूति नामक असङ्ग - बन्ध के कारण कर्म्मलेप से पृथक् रहता है । इस षोडशी आत्मा का अव्ययभाग ही यद्यपि क्षरकला के द्वारा भूतभावन बनता है, अक्षर कला द्वारा भूतभृत् बनता है । तथापि स्वस्वरूप से ( अव्ययरूप से ) यह भूतप्रपञ्च में आसक्त नहीं होता अतएव भूतों में आधार रूप से नित्य प्रतिष्ठित रहता हुआ भी यह भूतस्थ नहीं माना जा । सकता । क्योंकि आलम्बनरूप यह विशुद्धात्मा व्यापक है, विभूति - सम्बन्ध से सर्वत्र समरूप से अवस्थित है । अतएव उपाधिलक्षणा परिच्छिन्ना योगमाया से अनुगृहीत भूतसृष्टि: के सदसद्भाव, सुकृत- दुष्कृत-पाप - पुण्य इस पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकते । फलतः यह अपने स्वरूप से सर्वथा निर्लिप्त हैं । विशुद्ध व्ययात्मा की इसी अलिप्तता का स्पष्टीकरण करते हुए भगवान् ने कहा है -१ - न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा । -इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बद्धयते ॥ ( गी ०४ | १४ | ) | २ - न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः । न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्त्तते ॥ ( गी ०५।१४ । ) । ३ - नादत्ते कस्यचित् पापं न चैव सुकृतं विभुः । ज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥ ( गी ०५ । १५ । ) । ४- अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् । विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कत्तुमर्हति ॥ ( गी ०२।२७ ) । ५ - य एनं वेचि हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ ( गी ०२।१६ । ) । ५ - न जायते म्रियये वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ( गीता २२० । ६- श्रच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च । नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ ( गीता २।२४ । ) । ७- उपद्रष्टानुमन्ता च भर्चा भोक्ता महेश्वरः । परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन् पुरुषः परः ॥ ( १३।२२ ) । ८- सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽचिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति । ( १३।१३ । ) । ४२३
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श्राद्धविज्ञान ६ - सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । असक्त सर्वच निर्गुणं गुणभोक्तु च ॥ ( १३ । १४ । ) १० - बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ॥ सुक्ष्मत्रात्तद विज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ ( १३ । १५ । ) ११ - प्रविभक्त च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् । भूतभ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥ ( १३।१६ ) । १२ - समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् । विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥ ( १३।०७२ ) १३ - यदा भूतपृथग गवमेकत्वमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्मसम्पद्यते तथा ॥ ( १३,३० । ) ।
१४ - श्रनादिवान्निगुणत्वात् परमात्मायमव्ययः ॥
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय! न करोति न लिप्यते ॥ ( - ३।३ ' । ) १५ - यथा सर्वगतं सौम्यादाकाशं नोपलिप्यते । सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥ ( १३ । ३२ । ) । १६ - यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः । क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत! ॥ ( १३३३ । ) १७ क्षेत्र - क्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा । भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥ ( १३/३ । ) । 1 : है, उक्त श्लोकों में जिस आत्मतत्त्व का विश्लेषण हुआ है, वह वही बिशुद्ध में से व्यापक १६ वें अव्ययात्मा
श्लोक की ओर
जिसका जन्म - मृत्यु आदि द्वन्द्वभावों से कोई सम्बन्ध नहीं है । उक्त श्लोकों इस आत्म-विशेष रूप से ध्यान आकर्षित किया जाता है । भगवान् ने सूर्य को दृष्टान्त बनाते हुए समतुलित है । जिन तत्त्व का विश्लेषण किया है, जो कि हृष्टान्त विज्ञानदृष्टि से सर्वात्मना सूर्य से तीन आत्मसंस्थाओं का पूर्व में नामोल्लेख हुआ है, उनके स्वरूप - परिचय के लिए रक्खें हैं । अतिरिक्त अन्य विशिष्ट उदाहरण का अभाव है । भिन्न भिन्न प्रदेशों में अनेक जलपूरित पात्र हैं । प्रत्येक जलपात्र में सूर्य प्रतिबिम्ब - सम्बन्ध से प्रतिष्ठित है । जितने पात्र हैं, उतने ही प्रतिबिम्ब से तत्प्रतिष्ठ साथ ही पात्रों के आयतन भेद से, तथा पात्रस्थित जलों के मलिन - स्वच्छ - तारतम्य सौर-प्रतिबिम्ब भी तद्रूप में ही परिणत हो रहे हैं । प्रत्येक प्रतिविम्व के साथ त्रैलोक्य व्यापक ४२४
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शौचविज्ञानोपनिषत् ज्योति का हिम सम्बन्ध से भी समावेश हो रहा है । पात्रस्थ प्रतिबिम्ब अवश्य ही सौर प्रकाश से भी अनुग्रहीत है । प्रतिबिम्ब पृथक् - पृथक् हैं, विभूतिरूपेण व्याप्त सौरप्रकाश इन भिन्नों में अभि-नवत् व्याप्त हो रहा है । इस प्रकार व्यापक सौर ज्योति, सूर्यप्रतिबिम्ब, जलपूर्णपात्र, भेद से एक ही सूर्य्यं त्रिसंस्थ बन रहे हैं । वैज्ञानिक कहते हैं, पृथिवी पिण्ड सूर्य का ही उपग्रह है । ऋषि कहते हैं - पृथिवी सूर्य्य का ही प्रवर्यांश ( उच्छिष्ट - भाग ) है । सूर्य में मृत मर्त्य भेद से दो तत्त्वों का समन्वय है, जैसा कि ' निवेशयन्नमृतं मत्यं च ' ( यजुः संहिता ) इत्यादि मन्त्रवर्णन से प्रमाणित है । मर्त्यभाग क्षरप्रधान है, अमृत भाग अक्षरप्रधान है । मर्त्य तरभाग ही सर्वप्रथम रश्मिसंघर्ष से पानी के रूप में परिणत होता है । सूर्यरश्मिसंवर्षोत्पन्न यही पानी ' मरीचि ' नाम से प्रसिद्ध है । इसी मरीचि -मण्डल में दधि - मधु- घृतात्मक ' कश्यप ' का उदय होता है । एवं यही कश्यपप्रजापति रोदसी -त्रैलोक्य के प्रभव - प्र. तष्ठा- परायण बनते हैं । इस प्रकार सूर्य ही अपने क्षरप्रधान मर्त्यभाग से परम्परया पार्थिवविवर्त्त - स्वरूप में परिणत हो रहे हैं । ' तस्मादाहुः सर्वाः प्रजाः काश्यप्यः ' ( शतपथ ब्राह्मण ) इत्यादि निगम ही प्रमाणभूमि है । जलपात्र पार्थिव है, पार्थिवपात्र में भरा हुआ जल पार्थिव है । इस प्रकार सूर्य्यप्रतिबिम्बग्राहक जलपूरित पार्थिवपात्र परम्परया सूर्य्याश ( क्षरात्मक सूर्य का प्रवर्ग्य भाग ) ही है । अक्षरप्रधान ( प्राणप्रधान ) सूय्ये का भाग इसमें प्रतिबिम्ब-रूप से प्रतिष्ठित है । इस भाँति एक ही सूर्य प्रकाश, प्रतिबिम्ब, जलपूरितपात्र भेद से तीन विवर्त्त भावों में परिणत हो रहे हैं । जलपूरितपात्र शरीरात्मा है, प्रतिबिम्ब अन्तरात्मा है, प्रकाश विशुद्ध आत्मा है । ठीक यही अवस्था आत्मक्षेत्र में समझिए । क्षरप्रधान मर्त्य प्रवर्ग्य भाग से वही भौतिक-शरीरावच्छेदेन शरीरात्मा बना हुआ है, अक्षर प्रधान अमृतभाग से वही अन्तरात्मा बन रहा है, एवं प्रधान विभुभाव से वही विशुद्ध आत्मा बना हुआ है । विश्वमध्यस्थ सूर्य ही पार्थिव संस्था-नुगत आत्मत्रयी - भोग का कारण बनते हैं, जैसा कि - " सूर्य आत्मा जगतस्थुषश्च ' ( यजुः संहिता ) इत्यादि मन्त्रश्रुति से प्रमाणित है । एकमात्र इसी आधार पर भगवान् ने सूर्य्यदृष्टान्त का समावेश उचित माना है । तीनों में से अव्ययप्रधान विशुद्ध श्रात्मतत्त्व द्वन्द्वातीत है । इस के साथ जब अन्तरात्मा का अद्वैतभाव हो जाता है, तो उस दशा में पिता - पुत्र भ्राता - ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्य - शूद्र- सुरापी - तल्पग-भ्र राहा, आदि सब विशेष व्यवहार उच्छिन्न हो जाते है । " तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः " -" यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्, तत् केन कं पश्येत् " इत्यादि के अनुसार सर्वव्यापक उस विशुद्ध-अद्वयलक्षण अव्ययात्मप्रतिपत्ति के अनन्तर भेदमूलक मोह - शोक - द्रष्टा- दृश्यादि सम्पूर्ण द्वन्द्वभाव उच्छिन्न हो जाते हैं । इस समब्रह्मभाव में परिणत होकर यह कृतात्मा द्वन्द्वातीत बनता हुआ जीवन्मुक्त ४२५
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श्रद्धविज्ञान लक्षण विदेह भाव में परिणत हो जाता है । इसी शरीर में इस का देहाभिमान पलायित हो जाता है को । ऐसे त्रिदेह जीवन्मुक्त महापुरुष ही ' परमहंस ' कहलाए हैं, जो विधि - निषेधभावानुगत अन्तरात्मा हैं । विधि - निषेधातीत विशुद्ध आत्मसम्पत् में अपीत करते हुए विधि - निषेध से बहिर्भूत हो जाते ऐसे द्वन्द्वातीत, अतएव अलौकिक परमहंस विशुद्ध ब्रह्मवत - नित्य - शुद्ध - बुद्ध - मुक्त हैं । व्यापक सूर्य्यप्रकाश से जिस प्रकार अशुचि - शुचि - उभयस्थानों में समरूप से व्याप्त रहता हुआ इनके पुण्य - पापातिशय आसक्ति से संस्पृष्ट रहता है, एवमेव ऐसे परमहंस भी सर्वत्र समवस्थित बनते हुए लोक हैं । इनके साथ कभी अशुचि का सम्बन्ध नहीं हो सकता । नाहीं इन पर शुचि का ही कोई प्रभाव सम्भव । इनकी दृष्टि में सब रपृश्य हैं, सब कुछ भक्ष्य है, सब कुछ ग्राह्य है । निम्नलिखित उपनिषत् - ब्राह्मणश्रुतियाँ अव्ययविभूतिप्राप्तकर्त्ता ऐसे ही मुक्तात्मा - कृतपुरुषों का
स्वरूप स्पष्ट कर रहीं हैं -१ - यथोदकं शुद्ध शुद्ध मासिक्त तागेव भवति ।
एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥
२- सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुः-- कठोपनिषत् ४ १५ ॥
न लिप्यते चापैर्बाह्यदोषैः । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा -. न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥
३ - नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानां -एक बहूनां यो विदधाति कामान् ।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा -स्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥
- कठोपनिषत् ५ | ११, १३, १ ४ - यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । अथ मर्यो ऽमृतो भवति ब्रह्म समश्नुते || * * - कठोपनिषत् ६ । १४ । " ( १ ) - जिस प्रकार लोटे में भरा हुआ शुद्ध पवित्र जल आपूर्य्यमारण - प्रवहणशील शुद्ध पवित्र सामुद्र जल में प्रविष्ट हो कर अपनी सीमा तोड़कर तद्रूप ( असीम ) बन जाता है, एवमेव आत्मज्ञ-मुनि का अतरात्मा सर्वभूतान्तरात्मा में लीन होकर तप ही बन जाता है । " “ २, - जिस प्रकार ४२६