Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 491–500
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 491–500
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. आशौचविज्ञानोपनिषत् सर्वलोकचक्षु बना हुआ सूर्य्य बाह्य चाक्षुष दोषों से संस्पृष्ट रहता है, एवमेव सम्मूर्ण भूतों में समरूप से प्रतिष्ठित रहता हुआ भी वह सर्वभूतान्तरात्मा अपने विभुलक्षण एकत्त्वधर्म से लोकदुःखों से सर्वथा बहिर्भूत रहता है " । ( ३ ) - " नित्य - सविशेष अन्तरात्माओं की वह विशुद्ध आत्मतत्त्व नित्य विभूति है, चेतन - चिदाभास - लक्षण अन्तरात्माओं का वह चिदंश है, एक साथ वह सबकी कामनाओं का प्रवर्त्तक बन रहा है । नित्य - चेतनालक्षण अन्तरात्मा में विभूति - सम्बन्ध से प्रतिष्ठित हैं । जो विद्वान इस विशुद्ध आत्मतत्त्व के दर्शन कर लेते हैं, वे ही पराशान्ति के अधिकारी बनते के इतर अनात्मज्ञ सर्वथा अशान्त रहते हैं " ॥ ( ४ ) - जिस समय निष्काम - कर्म्मलक्षण बुद्धियोग विमुक्त सम्यगनुष्ठान से व्यानलक्षण हृद्ग्रन्थि के विमोक हो जाने पर इस अन्तरात्मा के कामबन्धन हो जाते हैं, अव्यवहितोत्तरकाल में ही वह अमृतसम्पत्ति में लीन हो जाता है, एवं इसी स्थिति कर समब्रह्म के साथ सायुज्यमुक्ति का अनुगामी बन जाता है " ॥ ५- " तद्वा - अस्यैतदतिच्छन्दा, अपहतपाप्मा, अभयं रूपम् । तद्यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्य ' विश्ञ्चन वेद, नान्तरं, एवमयं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना सम्परि-वक्तो न वाह्यं किञ्चन वेद, नान्तरम् । तद्वा - अस्यैतत् श्राप्तकामं, आत्मकामं, कामं रूपं शोकान्तरम् । " ६ - " अत्र पिता पिता भवति, माताऽमाता भवति. लोका अलोकाः, देवा देवाः, वेदा अवेदाः ( भवन्ति ) । अत्र स्तेनोऽस्तैनो भवति, भ्रूणहा अभ्र राहा, चाण्डालोऽचाण्डालः, पौल्कसोडपौल्कसः, श्रमणोऽश्रमणः, तापसोऽतापसः, ( भवति ) । नन्वागतं पुण्येन, अनन्वागतं पापेन । तीर्णो हि तड़ा सर्वा-कान हृदस्य भवति " । ७– “ यद्व ै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति 1 । नहि द्रष्टु टेर्विपरिलोपो विद्यते, अविनाशित्वात् । न तु तद् द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्त यत् पश्येत् । तन्न जिघ्रति, न रसयते, न वदति, न शृणोति, न मनुते, न स्पृशति, न विजानाति - जिघ्रन् - रसयन् - वदन - शृण्वन् - मन्वानः - स्पृशन् - विजानन् वै तन्न जिघ्रति । नहि - प्रातुर्घातः, रसयितु रसयतेः " वक्त र्वक्त े :, श्रोतुः श्रुतेः, मन्तुर्मतेः, स्प्रष्टुः स्पृष्टेः ", विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते, अविनाशि-वात् । नतु तद्वितीयमस्ति, ततोऽन्यद्विभक्त - यज्जिघत्, यद्रसयेत्, यद्वदेत्, यच्छृणुयात्, यन्मन्वीत, यत् स्पृशेत्, यद्विजानीयात् । ४२७
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श्राद्धविज्ञान ८ यत्र वा अन्य दिवस्यात्, तत्रान्योऽन्यत् पश्येत् जिघ ेत्, रसयेत् वदेत्, शृणु-यात्, मन्वीत, स्पृशेत्, विजानीयात् । सलिल एको द्रष्टा तो भवति । एष ब्रह्मलोकः सम्राट - इति हैनमनुशशास याज्ञवल्क्यः । एषाऽस्य परमा गतिः, एपास्य परमा सम्पत्, एषोऽस्य परमो लोकः, एषोऽस्य परम आनन्दः, एतस्यै-. वानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपपजीवन्ति " । - बृ ० आ ० उ ० ४।३ । ५- ' सो यह इस अन्तरात्मा का अतिच्छन्दा ( निःसीम - व्यापक ), पाप्मसम्पत्ति से बिरहिन ( विशुद्ध ) कम्पनरहित ( स्थागु ' अभयरूप है ( जो कि विशुद्ध आत्मा है ) । अर्थात् अन्तरात्मा उसीका स्वच्छन्दस्क- पाप्म - सभयरूप है, एवं विशुद्ध आत्मा छन्दोऽतीत - शुद्ध - अभयरूप है । जिस प्रकार अभिलपित स्त्री से संश्लिष्ट ( दाम्पत्य भावापन्न पुरुष तन्मयता के कारण अपने आपको भूल जाता है, एवमेव प्राज्ञस्थित विभूतिसम्बन्धावच्छिन्न अपने इस प्रतिच्छन्दा - अपहतपाप्मा - अभयलक्षण विशुद्धात्मा से सम्परिष्वक्त होकर यह अन्तरात्मा अपने आपको भूल जाता है । यही अद्वया-वस्था इस अन्तरात्मा की आप्तकामाबस्था है, आत्मकामावस्था है, कामावस्था है । इस अवस्था आत्म - अनात्म - कामप्रपञ्चों से से पृथक् होकर निष्काम बन कर यह सर्वशोक - सम्प्लव सन्तरण कर जाता है " । ६ - " जब सविशेष अन्तरात्माइस निर्विशेष- ष - समब्रह्मभाव में लीन हो जाता है, तो उस स्थिति पिता - जाता है, माता अमाता बन जाती है, लोक ( गृहस्थसंस्था ) तो बन जाते हैं, देवता ( इन्द्रियवगं. ) अदेवता बन जाते हैं । यहाँ आकर स्तेन ( चौर ) तेन, हा अभ्र -गहा, चाण्डाल चाण्डाल, + पौल्कस पौल्कस, X श्रमण श्रमण: तापस अतापस, जाता है । शास्त्रविहित सत्कर्मानुष्ठान से उत्पन्न पुण्यातिशय से, तथा शास्त्रप्रतिषिद्ध असत्कर्मा-नुष्ठान से उत्पन्न पापातिशय से, दोनों से पृथक हो जाता है । सर्वद्वन्दविनिर्मुक्त होकर यह इस अवस्था में धर्म्म, अधर्म्म, कृत - अकृत, भूत - भव्य, पुण्य - पाप, वर्ण - अवर्ण, शुचि - अशुचि, सत् - असत्, आदि सम्पूर्ण द्वन्द्वों से पृथक हो जाता है । फलतः तन्मात्रानुगत द्वन्द्व से सम्बन्ध रखने वाले सम्पूर्ण शोकों का सन्तरण कर जाता है । यह अवस्था सर्वथा मर्यादातिक्रान्त है, यही तात्पर्य है । क्या ऐसा परमहंस सर्वथा अमर्यादित आचरण करता है?, ' नेति होवाच ' । समब्रह्म * " शूद्र से ब्राह्मणी में उत्पन्न पुरुष चाण्डाल है । + शूद्र से क्षत्रिय में उत्पन्न पुरुष पौल्कस है । परिवाद् । वानप्रस्थी । उभे पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति । ४२८
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शौचविज्ञानोपनिषत् शिक अनुग्रह से अनुग्रहीत नियति ( प्रकृति ) जब मर्यादा का अतिक्रमण नहीं कर सकती, तो स्वयं मर्य्यादाप्रवर्त्तक ब्रह्म अमर्याद कैसे बन सकता है । श्रुति का अभिप्राय यही है कि, विधि - निषेध की मर्यादा उन्हें अपेक्षित है, जो सविशेष आत्मानुगामी बनते हुए मर्यादा का अतिक्रमण किया करते हैं । अव्यययोगप्रभाव से ( बुद्धियोगप्रभाव से ) जो मर्यादा प्रवर्त्तक. विश्वे श्वर से भिन्न बन गए हैं, उनके सम्बन्ध में अमर्यादा की आशङ्का ही नहीं है । श्रुति ने एक स्थान पर यह कहा है कि, इस स्थिति पर पहुँचने वाले विदेहमुक्त के हाथ से यदि उसकी माता, किंवा पिता का भी वध हो जाता है, तब भी उसे पातक नहीं लगता । यही क्यों - आत्मवित् यदि चोरी करेंगा तो उसे कोई पाप नहीं लगेगा । यह भ्रूणहत्या कर सकता है, बुरे से बुरा काम कर सकता है । जिस प्रकार साधारण मनुष्यों का मुख उक पापकम्मों करने से मलिन हो जाता है, - वैसे घोरातिघोर दुष्कर्मों में प्रवृत्त रहने से भी इसकी मुखकान्ति ज्यों की त्यों सुरक्षित रहती है । देखिए! " स यो मां विजानीयात्, नास्य केन च कर्म्मणा लोको मीयते । ' न मातृवधेन, न पितृवधेन, स्तेयेन, न भ्र राहत्यया ( लोको-मीयते ) | नास्य पापं न चकृषो मुखान्नीलं वेतीति ” । - कौ ० ब्रा उ ० ३।१1-1 क्या विदेहमुक्त मुक्तात्मा के सम्बन्ध में आप यह कल्पना कर सकते हैं कि, वह अपने माता, पिता का वध कर सकता है, चोरी कर सकता है, घोर से घोर दुष्कर्म्म कर सकता है?, प्रश्न के हाँ-ना- दोनों उत्तर हो सकते हैं । यदि समब्रह्म पर प्रतिष्टित, अतएव प्रकृति - पुरुष के समन्वित रूप से अभिन्न ऐसा कृतात्मा अपनी ब्रह्मदृष्टि ( जोकि एकान्ततः निर्भ्रान्त है, ) से यह देखता है कि, मेरे माता - पिता के वध मात्र से संसार का अभ्युदय हो सकता है, तो निश्वरन उस दशा सें - स्वविश्वरक्षा के नाते वह इन का वध कर डालेगा । और उस दशा में निश्चयेन वह विभु-' नादत्ते कस्यचित् पारं, न चैव सुकृतं विभुः ' न्या से मातृ पितृवध - जनित पाप से सर्वथा असंस्पृष्ट रहेगा । इसी प्रकार स्तेयकर्म्म से, भ्रूणहत्या से, किंवा ओर किसी भयङ्कर दुष्कृताचरण के गर्भ में कोई विश्वाभ्युदय - भावना छिपी हुई है, तो अवश्यमेव वह इन का भी अनुगामी बन जायगा । अवश्य ही हम सविशेषों की विशेष - स्थूलदृष्टि में उसके ये अमर्यादित कार्य हैं, परन्तु तत्त्वतः इन का उद्देश्य विश्वमर्यादा की रक्षा ही माना जायगा । वीतराग कृतात्मा कब किस उद्देश्य से क्या लीला कर डालते हैं, इसका रहस्य हम लौकिक मनुष्य नहीं समझ सकते । हम जिसे धर्म मानते हैं, विशेष परिस्थितियों में वही अधर्म है, एवं उसका निरोध श्रवश्यमेव उसकी ओर से उन उपायों से होता है, जो उपाय हमें धर्म्मवत् प्रतीत होने लगते हैं । अपने डन्डों की मार से ४२८
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श्राद्धविज्ञान असाध्य रोगों का निवारण करने वाले बाबा भारती की गाथाएँ हमारे प्रान्त में आज भी श्रद्धा से गाईं जातीं हैं । भगवन्नामस्मरण में लीन शम्बूक का अवतारपुरुष ( भगवान् राम ) द्वारा बध कर दिया जाता है । स्वपितानुशासन से महात्मा परशुराम अपनी माता का वध कर डालते हैं । इस प्रकार धर्मसंस्थापक अवतारपुरुषों के, एवं तत्सम कृतात्माओं के कर्त्तव्यों में विशुद्ध लोका-अभ्युदयभावना निहित रहती है । एवं इसी दृष्टि से उक्त प्रश्न का ' हाँ ' में उत्तर दिया जा सकता है । एक सामान्य लौकिक पुरुष क्रोध - रागादि के आवेश में पड़कर यदि मातृवधादि उक्त-राध कर बैठता है. वह यदि शास्त्रसिद्ध स्पृश्यास्पृश्य व्यवस्था का अतिक्रमण कर वर्णधर्म्म का अतिक्रमण करने लगता है, अपने प्रच्छन्न पाप को प्रच्छन्न बनाने की कामना से ऐसा व्यक्ति यदि भ्रगृहत्या करता है, तो अवश्यमेव वह दोषभाक् है । एवं अवश्य ही उसे इन पापकम्मों का फल भोगना पड़ता है । परन्तु जो रागद्वषादि पाप्माओं से सर्वथा पृथक् होकर वीतराग बन चुका है, ' नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त्त एव च कर्म्मणि ' न्याय से जो कृतात्मा विशुद्ध लोकाभ्युदय नाते, लोकनिष्ठरक्षा के नाते अनासक्त बन कर कर्ममार्ग का अनुगामी बन रहा है, वह उक्त कर्म्म कर बैठेगा, स्वार्थ भावना से कर बैठेगा, इस की सम्भावना भी हमें प्रायश्चित का भागी बना रही है । एवं इसी दृष्टिकोण से उक्त प्रश्न का ' ना ' में समाधान किया जासकता है । निष्कर्ष प्रकृत वचन का यही है कि, उस स्थिति में पहुँचने के अनन्तर वह मनुष्य मनुष्य न रह कर साक्षात् ब्रह्म बन जाता है । अतएव उसके चरित्रों की नकल करना सर्वथा निषिद्ध हैं । उसके आदेशरूप शब्द ही हमारे लिए कर्त्तव्याकर्त्तव्य में प्रमाण हैं, जैसा कि- तस्माच्छास्त्र ' प्रमाणं ते ' इत्यादि से प्रमाणित है । 1 ७ - ८ - ऐसे कृतात्मा का देखना - सुनना- सूँघना स्वाद लेना - स्पर्श करना - बोलना - मनन करना-जानंना, सब कुछ न सुनने - सूँघने आदि के समान है । क्या उस की इन्द्रियाँ नष्ट हो जाती हैं?, क्या उस का मन, उस की बुद्धि अपना स्वरूप खो बैठते हैं?, नहीं, अपितु जिस प्रकार द्वैतसम्पत्ति में आसक्त अस्मदादि लौकिक मनुष्य इन्द्रियों के दास बन कर नानाभावानुगतां इन्द्रियासक्ति में आसक्त रहते हैं, वैसे वह इन्द्रियों का दास नहीं है । अपितु उसकी दृष्टि में द्रष्टा द्रश्य - सब का अभेद है । उस के लिए सौन्दर्य और विरूप दोनों समतुलित हैं । गन्ध- दुर्गन्ध समान हैं । ये भेद तभी तक हैं, जबतक कि हम भेद- प्रवर्त्तक सविशेष आत्मा के पाश में बद्ध रहते हैं । जिस प्रकार एक आपूर्य्यमारण समुद्र स्वरूप से सर्वथा अतिच्छन्दा है, अपहतपाप्मा है, एकद्रष्टा है, जब कि उसके गर्भ में विदित नहीं कितने दृश्य अन्तर्लीन हैं, तथैव यह भी उन सब भेददृष्टियों को अपने अद्वैत समुद्रगर्भ में लीन रखता हुआ लोकाभ्युदयभावना से कर्मानुगति का अनुगामी बना रहता है । उस स्थिति पर पहुँचने वाला यदि कुछ न भी करे, तब भी उसकी कोई हानि ४३०
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शौचविज्ञानोपनिषत् नहीं है । परन्तु लोक का सर्वनाश निश्चित है । अतएव ' उत्सीदेयुरिमाः प्रजाः ' की रक्षा के लिए उसे अवश्य ही कर्ममार्ग में प्रवृत्त रहना पड़ता है । अवश्य ही इस की यह लोकशिक्षा सर्वथा मर्यादित ही रहती है | परन्तु किसी विशेष प्रयोजन की पूत्ति के नाते कभी कभी इस के द्वारा ऐसे भी लोकोत्तर कर्म - जिह्नों हम अपनी स्थूलदृष्टि से अमर्थ्यादित समझने की भ्रान्ति कर बैठते हैं - हो जाते हैं, जिन के सत्परिमाणों की हम कल्पना भी नहीं कर सकते । समब्रह्म ( अव्यय ) के पूर्णावतार भगवान् कृष्ण की रासक्रीड़ादि लोकोत्तर लीलाएँ हीं इस सम्बन्ध में कतिपय उदाहरण हैं, जिनका गीताभाष्यान्तर्गत आचार्य रहस्य के ' वैहायस कृष्ण रहस्य ' में विस्तार से उपबृंहण हुआ है । " भौतिक दृष्टि में अहोरात्र आसक्त रहने वाले सामान्य मनुष्य जैसे कृतात्माओं के चरित्र रहस्यों को समझने में असमर्थ हैं, एवमेव उन कृतात्मा महर्षियों की पार्षदृष्टि से सम्बन्ध रखने वाले ऋतम्भराप्रज्ञादूत शब्दादेशों के रहस्य को यथावत् समझ लेना भी अस्मदादि साधारणों के लिए दुःसाध्य बना रहता है । उक्त वचनों में से प्रथम वचन के द्वारा ' amer प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्य किञ्चन वेद, नान्तरम् ' कहते हुए रतिलक्षण दाम्पत्यसुख के साथ ब्रह्मानन्द के सम्बन्ध में विषयैषणाप्रधान स्त्री - प्रसङ्गलक्षण विषयानन्द को दृष्टान्त बनाना हम सामान्य मन्दों की दृष्टि में अखरता है, अखरना चाहिए । बहुत सम्भव है, भारतीयता के नाते एक भारतीय इस दृष्टान्त को भी श्रद्धापूर्वक स्वीकार करले । परन्तु एक पर-सभ्यत नुवर्त्ती अभारतीय इसे देख कर निश्चयेन यह कल्पना किए बिना न रहेगा कि भारतवर्ष आत्मक्षेत्र की उच्चभूमिका में पहुँचकर भी विषयासक्ति की भावना से अपने आपको एकान्ततः पृथकू न रख्न सका । क्या उनकी यह कल्पना तथ्यपूर्ण मानी जायगी । यह तो निविवाद है कि, ब्रह्मानन्द की तुलना किसी भी लौकिक आनन्द से नहीं की जा सकती । श्रुति को स्वयं यह भय था कि, कहीं ' तद्यथा प्रियया स्त्रिया ० ' इत्यादि दृष्टान्तं आधार पर ब्रह्मानन्द को सचमुच लौकिक मानुष - विषयानन्द- समकक्ष न मान लिया जाय । यदि यह मान्यता हो गई, तो स्वभावत: विषयानुगत मानव हृदय ब्रह्मानन्द प्राप्ति लक्षण परम पुरुषार्थ से वञ्चित रह जायगा । एवं उस आर्षप्रजा के जीवन का भी वही लक्ष्य बन जायगा, जो लक्ष्य अनार्षप्रजा में प्रतिष्ठित है, जिसका कि अनार्षजा द्वारा - ' खाना पीना मौज उड़ाना ' इन शब्दों में साभि-मान अभिनय होता रहता है । इसी भयनिवृत्ति के लिए - एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुप-जीवन्ति " कहने के साथ ही, तदव्यवहितोत्तरकाल में हीं - ' स यो मनुष्याणां राद्ध: ' इत्यादि रूप आनन्दयों की मीमांसा करना आवश्यक होगया-शोभना- सुशीला - गुणवती- पतिरता- कामिनी, एतद्गुणयुक्त पुत्र, तद् गुणवती कन्या, पूर्ण स्वास्थ्य, पूर्ण भोग्य सम्पत्ति, पूर्ण आयु, पूर्ण भोग शक्ति, इत्यादि परिपूर्ण मानुष- भोगसम्पत्तियों से युक्त ४३१
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आशौचविज्ञानोपनिषत् गृहस्थी - मनुष्य पूर्ण सुखी माना जायगा । यही मानवसम्प्रदाय में मानुष परमानन्द माना जायेगा । मनुष्य - मनुष्यता के नाते इससे अधिक कुछ न चाहेगा । यही ' मानुष ( पार्थिव ) आनन्द ' नामक प्रथम आनन्दकता है । ऐसे मानुष आनन्द को शतगुण ( सौगुणा ) बना दीजिए । ऐसी १०० आनन्द मात्रा एक स्थान पर समन्वित कर दीजिए । वह जितलोक पैत्र्य ( चान्द्र ) अ नन्द कहा जायगा, यही आनन्द की दूसरी कक्षा होगी । ऐसे १०० पैत्र्य आनन्द मिल कर एक गन्धर्व ( चान्द्र-अन्तरिक्ष ) आनन्द होगा । ऐसे १०० गान्धर्व आनन्दों के मिलने से एक वह देवानन्द । सौर आनन्द ) होगा, जो विद्यासमुच्चितकर्म से देवयोनि में प्राप्त होने वालों की सम्पत्ति बनता है । ऐसे १०० दैवानन्दों की समष्टि एक जानदेवों का आनन्द होगा, जो प्रकृत्या सौर मण्डल में प्रतिष्ठित हैं । ऐसे १०० श्राजानदेवानन्दों की समष्टि एक प्राजापत्य ( पारमेष्ठ्य ) आनन्द होगा । एव ऐसे कल्पनातीत १०० प्राजापत्य आनन्दों की समष्टि एक ब्राह्म ( स्वायम्भुव अव्यक्त ) आनन्द होगा | यही परमानन्द माना जायगा । इस प्रकार पृथिवी, चन्द्रमा, चान्द्र - अन्तरिक्ष, मर्त्य सूर्य्यसंस्था, अमृतसूर्य्यसंस्था, परमेष्ठी, स्वयम्भू, भेद से मानुष - पैत्र्य गन्धर्व - कर्मानुगतदैव, श्राजानभावानुगत-दैव- पारमेष्ठ्य - स्वायम्भुव भेद से आनन्द को सात धाराओं में विभक्त किया जा सकता है । ' षड़ि-मा रजांसि ' ( ऋक्संहिता ) के अनुसार आरम्भ के ६ आनन्द तो मात्रानन्द हैं, रजोरूप हैं, सीमित आनन्द हैं । एवं- ' अजस्य रूपे किमपि स्विदेकम् ' बाला सातवाँ ब्रह्मानन्द अमात्र है, परम है । उसीके अंश - प्रत्यंश से ये ६ अ तारतम्येन आनन्दयुक्त बन रहे हैं । ये ६ अ जहाँ आनन्दवान् हैं, वहाँ यह परमानन्द श्रानन्दघन है । विज्ञानभाषा के अनुसार षडानन्द - समष्टि समृद्धानन्द हैं, ब्रह्मानन्द शान्तानन्द है । समृद्धानन्द भेदसम्पत्ति से युक्त रहता हुआ अनुभव का विषय बन जाता है । परन्तु ब्रह्मानन्द अद्वयभावानुगति से केवल स्वानुभवैकगम्य है, किंवा स्वानुभूति से भी परे की वस्तु है । इस दृष्टि से शान्तलक्षण ब्रह्मानन्द की समृद्धिलक्षण इन ६ श्रों में किसी भी आनन्द के साथ तुलना नहीं की जा सकती । जबकि इस आनन्दमीमांसा के द्वारा श्रुति विस्पष्ट शब्दों में ब्रह्मा-नन्द, तथा मानुष विषयानन्द का अहोरात्रवन अन्तर बतला रही है, तो इस दशा में आर्ष- अनार्ष कोई भी व्यक्ति इस कल्पनापाप का उत्थापक नहीं बन सकता कि, ऋषिदृष्टि उच्चभूमिका पर पहुँच कर भी विषययैषणा से अपने आपको एकान्ततः सुरक्षित न रख सकी । प्रश्न यह उपस्थित है कि, जब मानुषानन्द की तुलना में ब्रह्मानन्द सातवीं कक्षा पर प्रष्ठित है, तो ऐसी दशा में मानुषानन्द की अपेक्षा शतसहस्रगुरिणत मध्य की पाँच संख्याओं में से किसी एक को दृष्टान्त न बनाकर सर्वतः अधोऽवस्थित पार्थिव मानुष आनन्द को ही क्यों दृष्टान्त बनाया गया? | " उपदेश मनुष्य को दिया जा रहा है, पितर- गन्धर्व - कर्मदेवादि को नहीं । मानवीय दृष्टि से वे इतर मध्यस्थ आनन्द सर्वथा परोक्ष हैं । फलतः उन्हें द्रष्टान्त बनाना आनन्दमात्रादृष्टि से उपयुक्त होता हुआ भी लक्ष्यदृष्टि से व्यर्थ है । एकमात्र इसी दृष्टि से श्रुति ने मानुषदृष्टान्त को लक्ष्य बनाना न्यायसङ्गत समझा है " यह समाधान ठीक ही है । ४३२ F
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शौचविज्ञानोपनिषन् " ठीक ही है " इस अरुचि का कारण यही है कि, क्या दाम्पत्यभाव ही एकमात्र मानुष अनान्द है? | हम तो देखते हैं कि, पुत्रत्रात्सल्य, गुरुश्रद्धा, मित्रस्नेह, रसना - प्राणेन्द्रियादि को आनन्द पहुँचाने . वाले ओर ओर जड़काम, सभी तो मानुषानन्द हैं । इनमें से यदि किसी को दृष्टान्त वना तो लक्ष्यसिद्धि भी हो जाती, एवं स्त्री - सम्परिष्वङ्ग जैसी वैषधिक वृत्ति से भी मानव समाज दिया जाता, बचने की शिक्षा ग्रहण कर लेता । कम से कम शिष्टता के नाते तो अवश्य ही ऋषि को ओर ही कोई दृष्टान्त उपस्थित करना था । " क्षमा कीजिए! ऋषियों को आप की शिष्टता मान्यन थी, जो चाणीमात्र से ' शिष्टता ' शब्द का प्रयोग करते हुए आज के युग की अशिष्टता के जन्मदाता हैं | किंवा जिनकी दोषदूषिता दृष्टि में भारतीय शिष्टता अशिष्टता वन रही है, एवं भारतीय बने हुए शिष्टता - सभ्यता क्षेत्र को अपेक्षा सर्वथा अशिष्टा असभ्यता कहलाने योग्य वह वास्तविक -टता शिष्टता बन रही है । जो दाम्पत्यभाव सृष्टि का मूल है, उसे दृष्टान्तं मान लेना शिष्टता है, एवं बिना सोचे समझे अपनी दोषदृटि से मलिनान्तःकरण बन कर इस पवित्र -प्रजातन्तुवितान प्रतिष्ठाल क्षरण दाम्पत्यभाव के दृष्टान्त का विरोध करना शिष्टता है । सच बात तो यह हैं कि, हमारी वर्त्तमान दृष्टि में ' स्त्रियया सम्परिष्वक्तः ' का यही अर्थ समझ में आता है । कि, मानों ' कहीं का ईट कहीं का रोड़ा ' ही हमारा लक्ष्य हो । हमारे ये शिष्टबन्धु यह भूल जाते हैं कि, जिस युग के ऋषि जिस युग में यह दृष्टान्त दे रहे हैं, उस युग का - " न स्वेरी स्वैरिणी कुतः ' यह आदर्श था । लैङ्गिक सम्बंध की अशिष्टता - शिष्टता अमर्यादा -मर्यादा भावों पर अवलम्बित है । मातापिता पुत्र - पुत्रवधू के सुखी दाम्पत्यजीवन से अपने आपको पितृऋण से उन्मुक्त समझते हैं । ऐसीदशा में इस पवित्रतम दृष्टान्त के सम्बन्ध में हीनचरित्र खैरी मनुष्य के अतिरिक्त और कौन अशिष्ट अशिष्टता का लाञ्छन लगा सकता है? । अस्तु । श्रभ्युपगमवाद से मान लेते हैं दृष्टान्त सर्वथा अशिष्ट है । फिर भी यह इस लिए उपादेय है कि जिस ब्रह्मानन्द के स्वरूपबोध कराने के लिए ऋषि को लक्षीभूत मनुष्यप्रजा के लिए तत्समतुलित जिन मानुषानन्दों में से किसी एक को लक्ष्य बनाना है, उनमें से एकमात्र यह अशिष्ट उदा-हरण ही सर्वाङ्गीण दृष्टान्त बन सकता है । एवं इस तत्त्वदृष्टि से ऋषिने और कोई मानुषा-नन्द उदाहरण न मान कर एकमात्र इस प्रशिष्ट दृष्टान्त को ही प्रमुख स्थान दिया है । अवश्य ही तत्त्वापेक्षया यह अशिष्टता कम से कम अशिष्ट भारतीयों के लिए तो सर्वात्मना ग्राह्य है । जो इस अशिष्टता से क्लान्त हैं, वे उस ब्रह्मानन्दमीमांसा में ही जब अनधिकृत हैं, तो उनके अवाच्य-वादों में समय नष्ट क्वों किया जाय । चान्द्ररसमय प्रज्ञानमन से संयुक्त इन्द्रियों के द्वारा भूतात्मा का किसी अभिलषित भौतिक विषय की ओर उन्मुख बन कर स्नेदगुणप्रधान प्रज्ञानरस की कृपा से उस विषय के साथ बद्ध हो ४३३
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श्राद्धविज्ञान जाना ही ' प्रेम ' की वैज्ञानिक परिभाषा है । यही प्रेमलक्षण मानससम्बन्ध आनन्दानुभूति का कारण बनता है | आनन्दानुभूतिजनक मनोव्यापारलक्षण इस प्रेम - व्यापार में - " क: सारी -वा पूर्वं गच्छति, ऐव तत्रापरं गच्छति " ऐत ० ना ० ) सिद्धान्तानुसार प्राज्ञ-इन्द्रः, यत्र वा एष इन्द्रः । इन्द्रसंयुक्त प्रज्ञानमन का सोमरस, किंवा सोमरसमूत्तिं मन विषय के साथ बद्ध हो जाता है लक्षीभूत विषय, तथा मन, दोनों का पारस्परिक रसानुगमनागमन ही प्रेम है । यह विषय ( जिनके साथ प्रेम होता है ) जड़ - चेतन भेद से दो भागों में विभक्त है । चेतन प्राणियों के प्रति भी मनोरस प्रवाहित रहता है, एवं अचेतन - जड़भूतों के प्रति भो मनोरस प्रवाहित रहता है । इन दोनों विभागों के लौकिक - अलौकिक भेद से दो दो विवर्त्त हैं । ईश्वर, अवतारपुरुष, योगी, सन्त, आदि चेतनवर्ग लौकिक चेतनविभाग है, एवं शेप मनुष्य - पशु - पक्षी - वृमि - कीटादि लौकिक चेतन-विभाग है । अश्वत्थ, बट, शालग्रामशिला, तुलसी, गङ्गा, यमुना, यज्ञाग्नि, आदि अलौकिक अचे-तन विभाग है, एवं शेष जड़ पदार्थ लौकिक अचेतन विभाग है । अलौकिक चेतनवर्ग, तथा अलौकिक अचेतनवर्ग ( अपने अभिमानी देवता के सम्बन्ध से ) दोनों हम से उच्चश्रेणि में प्रतिष्ठित हैं । अतएव इन दो वर्गों के प्रति तो केवल ' श्रद्धा ' नामक प्रेम का ही सम्बन्ध रहता है । शेष लौकिक चेतनवर्ग त लौकिक अचेतनवर्ग, दो विभाग बच रहते हैं । इनमें से लौकिक चेतन वर्ग की प्रेमधारा पाँच भागों में प्रवाहित रहती है, एवं लौकिक अचेतन वर्ग की प्रेमधारा एक ही स्वरूप में परिणत रहती है । लौकिक चेतन वर्ग में प्राणिमात्र का समावेश है । तत्तदाराध्य प्राणदेवताओं के विशेषाधान से तत्तत्प्राणप्रधान बने हुए पशु - पक्षी - कृमि - कीटादि भी भारतीय आर्षप्रजा की दृष्टि में उच्च श्रेणि में प्रतिष्ठित रहते हुए श्रद्धेय मानें जा रहे हैं । गौपशु हमारा श्रद्धय है, श्याव - शबल ज के श्वान याम्यप्राण सम्बन्ध से हमारे श्रद्धेय हैं, हम श्रद्धापूर्वक इनके लिए पिण्डपितृयज्ञ ( श्राद्ध ) विधान करते हैं । शीतलावाहनत्त्वेन गईभपशु भी इस दृष्टि से कम श्रद्धेय नहीं है । अम्बावाहन सिंह का पूजन भी हम उसी प्रणतभाव से करते हैं । वराहप्राणमूर्ति शूकर भी हमारी दृष्टि में नमस्य है । बलिसम्बन्धेन काकपक्षी, दृष्टिसम्बन्धेन नीलकण्ठपक्षी, विष्णुवाहन सम्बन्धेन गरुड़पक्षी, आदि पक्षिविशेष भी हमारे लिए श्रद्धय हैं । एवमेव आगन्तुक महत् सम्बन्धेन सर्प-विशेष आदि कृमि भी हमारे लिए श्रद्धय हैं । सुप्रसिद्ध नागपञ्चमी इसी श्रद्धाभाव को प्रकट करने के लिए नियत है । निष्कर्षतः - ' ' यद्यत् - विभूतिमत् सत्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ' न्याय में विभूतिप्राण-विशिष्ट प्राणिविशेष भी इस प्राणदृष्टि से हमारे लिए श्रद्धय हैं । इस श्रद्धा के अतिरिक्त गौ- पशु गौवास आदि के साथ हमारा वात्सल्य भी रहता है । गृहस्थाश्रम में चिरकालिक सङ्गभाव से इनके साथ स्नेह भी प्रकान्त है । एवं दुग्ध - गोमयादि की दृष्टि से इनके साथ काम सम्बन्ध ( जड़प्रेम ) ४३४
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शौचविज्ञानोपनिषत् भी सुरक्षित है । इस प्रकार मानव - वर्गातिरिक्त अन्य लौकिक चेतनवर्ग के साथ ' श्रद्वा - वात्सल्य - स्नेह-काम ' इन चार प्रेमक्षेत्रों का समन्वय हो रहा है । जो विशुद्ध लौकिक अचेतनवर्ग है, उसके साथ ( द्रव्य - भवन अन्न - आभूषण - ओर ओर जड़परिग्रह के साथ ) न श्रद्धा है, न वात्सल्य है, न स्नेह है । है केवल काम सम्बन्ध | क्योंकि श्रद्धा वात्सल्य - स्नेह, तीनों में प्रेमकर्त्ता, तथा प्रेम पात्र, दोनों का चेतन होना आवश्यक है । जड़पदार्थों के साथ प्रेम करने वाला चेतन अवश्य है, किन्तु ये स्वयं अचेतन हैं । अस्तु, इन सब रहम्यों का गीताभाष्यान्तर्गत ' भक्तियोगपरीक्षा ' नामक ६ -ठे खण्ड में विस्तार से निरूपण किया जा चुका है । प्रकृत में हमें विचारविषयीभूत केवल मानुष - प्रेमधारा की ही मीमांसा करनी है । ( १ ) - यदि हमारा मन ( मानसवृत्ति, मनोमय श्रद्धासूत्र ) अपने से उच्चश्रेणि के व्यक्ति के प्रति ( माता, पिता, गुरू, जेष्ठ भ्राता, अन्य श्रेष्ठ पुरुष आदि के प्रति ) प्रवा हत है, तो यही ' अवर-प्रतियोगिक – परानुयोगिक ' प्रेम ' श्रद्धा ' कहलाएगा । सीधे शब्दों में अवरश्रेणि में प्रतिष्ठित व्यक्ति यदि उच्चश्रेणि में प्रतिष्ठित व्यक्ति से प्रेम करता है, तो उसका यह प्रेम ' श्रद्धा ' कहलाता है । प्रेमकर्त्ता का श्रासन नीचा है । जिसके साथ प्रेम किया जा रहा है, वह उच्चभूमिका में प्रतिष्ठित है । ( २ ) - यदि हमारा मन अपने से अवरश्रेणि में प्रतिष्ठित पुत्र - पौत्र - कनिष्ठभ्राता - शिष्य - आदि की ओर प्रवाहित है, तो यही प्रेम ' वात्सल्य ' कहलाएगा । सहजभाषा में उच्च श्रेणि में प्रतिष्ठित व्यक्ति यदि अवरश्रेणि में प्रतिष्ठित व्यक्ति से प्रेम करता है, तो वह प्रेम ' वात्सल्य ' कहलाता. है | ara इसे ' अवरानुयोगिक परप्रतियोगिक ' प्रेम माना गया है । इस प्रेमक्षेत्र में प्रेमकर्त्ता उच्चासन पर प्रतिष्ठित हैं, एवं प्रेमपात्र नीचे स्थान में प्रतिष्ठित हैं । ( ३ ) - यदि हमारा मन अपने समकक्ष बन्धु - सखा - मित्र आदि की ओर प्रवाहित है, साथ ही उस समकक्ष का मन भी हमारी ओर प्रवाहित है तो समानशीलव्यसनानुगत यही प्रेम ' स्नेह ' कहलाएगा | सहजभाषा में समानवयस्क - समानार्थस्थिति - समानव्यसन - शील दो व्यक्तियों का पारस्परिक समानाकर्षण ही स्नेह है । अतएव इसे ' समानानुयोगिक - समानप्रतियोगिक ' माना गया है । इस प्रक्षेत्र में दोनों हो प्रेमकर्त्ता हैं, दोनों हीं प्रेमपात्र हैं । न दोनों में कोई छोटा है, न कोई बड़ा है । उच्चावचभाव के समाविष्ट होते ही यह स्नेहबन्धन उच्छिन्न हो जाता है । व स्नेहबन्धनोपक्रम से पहिले ' समानशीलव्यसनेषु मैत्री ' निर्णय कर लेना श्रेयः पन्था माना गया है । ( ४ ) - यदि हमारा मन वस्त्र - गृह- आभूषण - पुस्तक - आदि जड़पदार्थों के साथ प्रवाहित हैं, तो यही प्रेम ' काम ' नाम से व्यवहृत होगा । सहजभाषा में जड़प्रेम ही काम प्र ेम है । इस प्रेमक्षेत्र में ४३५
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श्राद्धविज्ञान क्योंकि प्रेमकर्त्ता चेतन है, प्रेमपात्र जड़ है, अतएव इसे ' एकतोऽनुयोगिक - एकतः - प्रतियोगिक प्रेम कहा जाता है । कामप्रेम आत्मशान्ति का अन्य विघातक है । कामानन्द आनन्द नहीं, मोह है, मूर्च्छा है, मृत्यु का निमन्त्रण है | शरीरयात्रानुबन्ध ऋजुभाव से सुरक्षित रहे, तत्पर्य्यन्त • तो जड़काम उपादेय है । दूसरे शब्दों उत्थिताकाङक्षानुगत जड़काम जहाँ शरीरयात्रार्निर्वाहक बनता हुआ, आध्यात्मिक यज्ञसंस्था को सुरक्षित रखता हुआ अबन्धन है, वहाँ उत्थाप्याकांक्षानुगत जड़काम आसक्ति – बन्धन का कारण बनता हुआ - यज्ञार्थात् कर्म्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्म्म-बन्धनः ' के अनुसार बन्धन का ही प्रवर्त्तक माना गया है । ( ५ ) - हमारा मन एक ही व्यक्ति को अपने आप से उच्चश्रेणि में भी प्रतिष्ठित समझ रहा है, अवरश्रेणि में भी मान रहा है, समानश्रेणि में भी मान रहा है, अंशतः जड़श्रेणि में भी मान रहा है । इस प्रकार ' उच्च अवर - समान - जड़ ' चारों का लक्ष्य एक ही को मान कर मन उसके प्रति आसक्त है, तो वही सर्वसमदृष्टिलक्षण, अतएव सर्वोत्कृष्ट प्रेम ' रति ' नाम से व्यवहृत होगा । इस रतिप्रेम में विरुद्धाविरुद्ध सब धर्मों का समन्वय हो रहा है । अतएव ' सर्वधर्मोपपत्तश्च ' ( वेदान्तसूत्र ) इस दार्शनिक सिद्धान्त के अनुसार यह प्रेम ब्रह्मवत् सर्वधम्मपन्न बन रहा है । इस रतिप्रेम के ऐसे सर्वधर्मोपपन्न क्षेत्र केवल दो हैं । प्रथम तो ईश्वर के साथ ही रति सम्भव है, अथवा दूसरा क्षेत्र एकमात्र धर्मपत्नी ही बन सकती है । ' कृष्णं वन्दे जग-द्गुरुम् ' रूप से ईश्वर की श्रद्धारूप से उपासना होती है । ' गोधूलिधूसराङ्गो नृत्यति वेदान्तसिद्धान्तः ' न्याय से नन्दनन्दनस्वरूपद्वारा वात्सल्यभाव से भी उसकी उपासना शुद्धाद्वैतसम्प्रदाय ( वल्लभ-सम्प्रदाय ) में ग्राह्य है । नरावतार अर्जुन की भाँति नारायणवतार भगवान् कृष्ण की मित्ररूप से भी उपासना सम्भव है । एवं जड़प्रतिमोपासना से सम्बन्ध रखने वाला कामप्रेम तो आज पुष्पित-पल्लवित हो ही रहा है । इस प्रकार सर्वधर्मोपपन्न ब्रह्म की चारों हीं प्रकार से उपासना सम्भव है । एक लक्ष्य में चारों का समन्वय हो रहा है । दूसरा क्षेत्र धर्म्मपत्नी है! ' गृहिणी गृहमुच्यते ' - के अनुसार धर्मपत्नी घर की अधिष्ठात्री है । गृहस्थसंस्था में इसका वही महत्त्व है, जो महत्त्व पुरुष का बाह्य लोकसंस्था में है । स्वयं पुरुष इस क्षेत्र में इसका आसन अपने से ऊँचा समझता है । ' नार्यस्तु पूज्यन्ते ' इस भावना से इसकी. मानसिक पूजा करता है, इसे शक्ति - प्रतिमूर्ति मानता है । ( हन्त! ) कहीं आज का पुरुष समाज भी ऐसा मानता होता तो??? ) । गृहिणी जीवनयात्रा में समय समय पर उपस्थित होनें वालीं विषम समस्याओं को ( सन्मार्गप्रदर्शनपूर्वक ) सुलझाने वाली उपदेशिका है, पूज्या है, गृहलक्ष्मी है । एवं इस अंश में अवश्य ही यह श्रद्धाप्रेम की अनुगामिनी बनी हुई है । असमर्थ - बालावस्थापन्न - सौम्य ४३६