Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 501–510
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 501–510
पृष्ठ 501
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शौचविज्ञानोपनिषत् पुत्र - कन्या आदि के प्रति जिस प्रकार आपका स्वाभाविक वात्सल्यप्रेम रहता है, एवमेत्र सोम-प्रधाना, अतएव अबला, अतएव आश्रयाकांक्षिणी स्त्री के साथ वात्सल्यभाव का उदकं भी स्वाभाविक है । वात्सल्यप्रममूलक लालन - पालनादि जो कर्म एक पिता अपनी सन्तति प्रति करता है, वह सम्पूर्ण कर्म्म स्त्रीक्षेत्र से भी सम्बद्ध हैं । आप पति हैं, पालक हैं । वह पत्नी है, पालिता है । आप आश्रय हैं, वह आश्रिता है । आप स्वामी हैं, वह सेविका है । एवं इसी दृष्टि से वह वात्सल्यप्रेम की भी अनुगामिनी बन रही है । गृहस्थ के प्रत्येक कर्म्म में ' सहधर्म्म चरताम् ' इस आदेश के अनुसार स्त्री जीवनसङ्गिनी है । आप उसके सहयोग के बिना यज्ञ, दान, यात्रा, अन्य उत्सवादि में कभी भाग नहीं ले सकते । एक सन्मित्र की भाँति आपके शील- व्यसन- अर्थ -स्थिति- पारिवारिकस्थिति आदि से समतुलित रहती हुई वह जीवनपर्यन्त आप का साथ निभाती है । एवं इसी दृष्टि से यह स्नेहप्रेम की भी अनुगामिनी बन रही है । धर्मपत्नी के नूपुरों की ध्वनि, कटक - कुण्डलादि की आभा, अलक्तक को लालिमा, केशपाशों का आकर्षक विन्यास, वस्त्रादि की भव्यता, आदि जड़पदार्थ भी पति के मानस क्षेत्र के आकर्षक बने रहते हैं । यही चौथे कामप्रेम का संक्षिप्त निदर्शन है । इस प्रकार प्रेमचतुष्टयीलक्षण पाँचवाँ यह रतिप्र ेम ईश्वर -क्षेत्रवत् स्त्रीक्षेत्र में भी सर्वात्मना चरितार्थ हो रहा है । श्रद्धा वात्सल्य - स्नेह - काम, चारों में प्रारम्भ के तीन प्रेम उभयनिष्ठ चेतनधर्म से युक्त हैं, एवं चौथा कामप्रेम जड़ानुगत है । अपने अपने क्षेत्र में प्रतिष्ठित रहते हुए ही चारों का विशेष -महत्त्व है । आज चारों में से किस प्रेम का प्राबल्य है? उत्तर है - ' काम ' । यदि किसी पर श्रद्धा की जाती है, तो आत्मोद्धार के लिए नहीं, अपितु कामानुगता अर्थलालसा की समृद्धि के लिए । साधु - सन्त - महात्मा - विद्वान - आदि श्रद्धयोंनें यदि इस प्रेमपात्र को लोक - भूत लिप्सा -पूरक कोई उपाय बतला दिया, तो वें श्रद्धेय हैं । अन्यथा अन्यथासिद्ध हैं । यही दुद्द शा वात्सल्यप्रेम की है | पिता अपनी सन्तति से आज विशुद्ध अर्थ कामना रखता हैं, मास्टर ( गुरू ) का लक्ष्य केवल मासिक वेतन है । निष्काम वात्सल्यप्रेम सर्वात्मना पददलित है । स्नेह के सम्बन्ध में तो कुछ न कहना ही अच्छा है । आज मित्रता उन्हीं के साथ निभती है, जो मित्र की अर्थलालसा में सहयोग देता है । उधर सर्वधर्मोपपन्न स्त्रीक्षेत्र भी केवल कामक्षेत्र बनता हुआ सर्वथा जर्जरित हो रहा है । इस प्रकार आज चेतनप्र मंत्रयी का स्थान जड़ कामप्रे मने ग्रहण कर भारतीय अध्यात्मिक क्षेत्र को सर्वथा ऊसर बना डाला है । अस्तु, जिस उद्देश्य से इस प्रेमपञ्चक की अप्रासङ्गिक गाथा गाई गई है, उस उद्देश्य पर दृष्टि डालिए । श्रद्धा वात्सल्यादि पाँचों में स्त्रीक्षेत्र से सम्बन्ध रखने वाला केवल रतिक्षेत्र ही ' ऐसा है, जो अद्वैतानन्दवत् आत्मविस्मृति का कारण बन रहा है । रतिप्रेमासक्त उसी प्रकार अपने ४३७
पृष्ठ 502
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान को भूल जाता है, जैसे कि एक ब्रह्मरति आसक्त आत्मकाम मुमुक्षु उस विशुद्ध आत्मतत्त्व के साथ रतिभाव प्राप्त करता हुआ अपने सविशेषरूप को भूल जाता है । लौकिक विषयानन्दों में एकमात्र- यह ' स्त्रियया सम्परिष्वङ्ग ' लक्षण रतिप्रेम ही ऐसा प्रेमानन्द है, जिस में द्वैतभाव नहीं रहता । अन्य श्रद्धा - वात्सल्यादि में द्वैतानुभूति सुरक्षित रहती है । पारलौकिक पितृ - देवस्वर्गादि आनन्दों में एकमात्र ब्रह्मानन्द ही ऐसा है, जिसमें द्वैतभाव का आत्यन्तिक उच्छेद है । इस प्रकार द्वैतविच्युतिलक्षण - श्रद्वैतभावात्मक विषयानन्दों में रत्यानन्द, पारलौकिक आनन्दों में ब्रह्मानन्द, दोनों समतुलित हैं । दोनों में अन्तर केवल यही है कि, स्त्री - सम्बन्धी रतिप्र ेम इच्छाप्रधान बनता हुआ बन्धन का कारण है, क्षणिक है । एवं परमात्मसम्बन्धी रतिप्रेम निष्कामप्रधान बनता हुआ मुक्ति का प्रवर्त्तक है, शाश्वत है । इस सम्बन्ध में भी यह संशोधन कर लेना चाहिए कि, स्त्रीरति - शास्त्रानुगता बनती हुई, केवल प्रजातन्तुवितानोद्देश्य को लक्ष्य में रखती हुई यदि वैषयिक- इच्छा - भाव से पृथक् है, तो ऐसा अकाम श्रोत्रिय विद्वान् इस पद्धति से भीमगति का आश्रय लेता हुआ ब्रह्मानन्द में लीन हो जाता है । इसी संशोधन को लक्ष्य में श्रुति ने कहा है-" थ ये शतं प्रजापतिलोक आनन्दाः, स एको ब्रह्मलोक श्रानन्दः । यश्व श्रोत्रियः, अवृजिनः, अकामहतः " ( वृ ० प्रा ० उ ०४।३।३३ । ) । यदि विशुद्ध इच्छाभाव का ही साम्राज्य है, तो उस दशा में अवश्य हा स्त्री - रति बन्धन का मूल बन जाता है । ऐसी स्त्री - रति जहाँ बन्धनमूल है, वहां प्रत्येक प्रकार की आत्मरति मुक्ति दूसरी आत्मानन्द की चरमसीमा है । कामानुगता परिणत हो जाती है, बन्धन- विमोक हो जाता है । का मूल है । एक विषयानन्द की पराकाष्ठा है, यही वैषयिक रति जिस दिन आत्मरतिरूप में इसी भाव का बड़ा सुन्दर निरूपण करने वाली निम्न लिखित सूक्ति लोक में प्रचलित है । गोस्वामी-जी की धर्मपत्नी इच्छासक्क तुलसी की मोहनिद्रा भङ्ग करती हुई कहतीं हैं -"
जितनो हेत हराम सों, उतनो राम से होय ।
चल्यो जाय वकुण्ठ में रोक न राखै कोय " ॥
1 विषयानन्द को उक्त मीमांसा से विज्ञ पाठकोंने अब भलिभाँति यह जान लिया होगा कि, ब्रह्मानन्द साथ ऋषियोंनें स्त्री - रति का क्यों समतुलन किया? | दृष्टान्त एकमात्र यही ऐसा है जिसमें क्षणमात्र के लिए अद्वैतानुभूति है । एक दूसरा दृष्टान्त ' सुषुप्ति ' है । ' स्वमपीतो भवति ' के अनुसार सुषुप्तिकाल में भी अद्वैतसम्पत्ति प्राप्त हो जाती है । अतएव अन्यत्र उपनिषदों में हीं यह दृष्टान्त भी उद्धत हुआ है । परन्तु आनन्दानुभूतिलक्षण आनन्दमीमांसा में जैसा ४३८
पृष्ठ 503
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
आशौचविज्ञानोपनिषत् जाप्रदवस्थानुगत उदाहरण समतुलित बनता है, वैसा सुषुप्ति का नहीं । अतः ऋषि ने इस प्रकरण में यही दृष्टान्त देना अन्वर्थ समझा है । यहीं अन्वर्थता आज की कलपित अशिष्टता का सम्यक् समाधान है | " शतप्रजापति के आनन्द से समतुलित, वर्ण- अवर्ण, पशु, पक्षी, कृमि, कीट, स्थावर, जङ्गम आदि आदि यच्चयावत् पदार्थों में समरूप से व्याप्त रहने वाला क्षराक्षरगर्भित अव्यय ही पहिला ' विशुद्ध ' आत्मा है, यही हमारे सविशेष आत्मा का निर्विशेष प्रतिच्छन्दा- अपहतपाप्मा - अकाम रूप है ” उक्त उपनिषद् - ब्राह्मण - श्रुतिवचनों का यही निष्कर्ष है । यही वह आत्मतत्त्व है, जो प्राणियों, प्राणियों में सर्वत्र समरूप से प्रतिष्ठित है | शरीरोपाधियुक्त अन्तरात्मा का साक्षी बनता हुआ वह इस सोपाधिक सविशेष अन्तरात्मा की दृष्टि से विभक्तवत् प्रतीत होता हुआ भी स्व-स्वरूप से सर्वथा अविभक्त है | ' सर्वधर्मोपपत्रोच ' के अनुसार सर्वधर्मोपपन्न बनना हुआ ही वह ' निविशेष ' - उपाधि को चरितार्थ कर रहा है । वह कृष्ण - पीत - रक्त- लघु - गुरु - हम्व - दीर्घ-अणु - महान् - सबकुछ बनता हुआ इन सब से अतीत है । कृष्ण उसे इस लिए नहीं कहा जासकता कि, वह पीत है । पीत है, इस लिए कृष्ण नहीं । ह्रस्व है, इसलिए दीर्घ नहीं । दीर्घ है, इसलिए ह्रस्व नहीं । न्यायशास्त्र के अनुसार प्रत्येक शब्द की यत् किञ्चित्पदार्थतावच्छेदकावाछिन में ह्रीं शक्ति रहती है । उदाहरणार्थ - घट शब्द को ही लीजिए । कम्बुग्रीवादिमत्त्व ' घट ' पदार्थ के अवच्छेदक ( भेदक - घट को टपटादि धम्मों से पृथ वाले ) कम्बुग्रीवादि भावों में ' घट ' शब्द की शक्ति है । घटत्त्व विशेष्य है, घट विशेषण है । पटादि में क्योंकि कम्बुग्रीवादिसद् भावों का अभाव है, अतएव तत्सम्बन्धी घटशब्द वहाँ सम्बद्ध नहीं हो सकता । इसी व्यावृत्ति के आधार पर ' घटोऽयं, नायं पटः ' - ' पटोऽयं नायं घटः ' इत्यादि व्यवस्थाएँ व्यवस्थित हैं । प्रत्येक शब्द की गति ( व्याप्ति ) व्यवस्थित ज्ञानपर्यन्त ही विश्रान्त है । पूर्वोक्त सर्वधर्मोपन्न विशुद्ध व्यापक आत्मा को कोई भी धर्म एक दूसरे से पृथक् नहीं कर सकता । आप उसे जिस शब्द से कहना चाहें, कह सकते हैं । अतएव आप उसे किसी भी शब्द से व्यवहृत नहीं कर सकते । क्योंकि प्रत्येक शब्द व्यावृत्तिधर्म्मावच्छिन्न बनता हु उस अतद्-व्यावृत्त की सीमाओं में प्रवेश नहीं कर सकता । मान लेना पड़ता है कि, व्यावर्त्तक शब्दशास्त्र से इस व्यावृत्त विशुद्ध आत्मा का कोई सम्बन्ध नहीं है । शास्त्र इसके सम्बन्ध में केवल तटस्थलक्षण का आश्रय लेता हुआ अन्ततः ' नेति नेति ' कहकर विश्राम कर लेता है । सर्वत्र समवस्थित, अतएव वाङ ्म मनसपथातीत यह विशुद्ध विभु शास्त्रीय मर्यादाओं से एकान्ततः बहिर्भूत है । धर्माधर्म्म, पापपुण्य, सुखदुःख, उपचयापचय, श्राद्ध - तर्पण, इहलोकागमन, परलोकगमन, आदि सम्पूर्ण भावों से सर्वथा असंस्पृष्ट इसी आत्मतत्त्व का स्वरूप परिचय कराते हुए अभियुक्तोंने कहा है-४३६
पृष्ठ 504
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान १ - अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्म्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् ।. अन्यत्र भूताद् भव्याच्च यत् तत् पश्यसि तद्वद् ॥
२- संविदन्ति न यं वेदा विष्णुर्वेद न वा विधिः ।
यतो वाचो निवर्त्तन्ते प्राप्य मनसा सह ॥
३- यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः ।
विज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥
४ - " नेति नेतीति होवाच " । ५ - " प्रतीतः पन्थानं तव च महिमा वाङ मनसयो-रतद्व्यावृत्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि । स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः " ॥ इस सम्बन्ध में प्रसङ्गोपात्त. यह स्पष्ट ओर कर लेना चाहिए कि, महामायावच्छिन्न अव्यय को निर्विशेष मान कर उस के साथ उक्त श्र ति का समन्वय बतलाना आपेक्षिक भाव से ही सम्बन्ध रखता है । वस्तुतः सर्वधर्मोपपन्न श्रमायी परात्पर है, जिसे सर्ववलविशिष्टरस माना गया है । एवं विशुद्ध तत्त्व ही निर्विशेष है । इन सब सूक्ष्म दृष्टियों का ' आत्मविज्ञानोपनिषत् ' में विस्तार से निरूपण किया, अशेषबलवद्रसमूर्त्ति परात्पर, महामायावच्छिन्न जा चुका है । प्रकृत में विशुद्धरसात्मक निर्विशेष क्षराक्षरगर्भित अव्यय, तीनों को एक मानते हुए तीनों की समष्टि की अपेक्षा से ' शुद्ध आत्मा ' नामक प्रथम विवर्त्त का समन्वय हुआ है । उक्त लक्षण, किंवा लक्षण इसी विशुद्ध आत्मभावना के आधार पर आर्षप्रजा में करकरिण यह व्यंबहार प्रचलित है कि— “ आत्मा सर्वव्यापक हैं, अखण्ड हैं, अज है । न उसका जन्म होता, न मृत्यु होती, न वह कहीं आता, न जाता " । श्रात्मतत्त्वानभिज्ञ मूढधी महानुभाव इसी व्यवहार को आगे कर आत्मान्तर से सम्बन्ध रखने वाले श्राद्ध - श्राशौच आदि धार्मिक काय्यों से मुग्ध प्रजावर्ग को भ्रान्त पथ की अनुगामिनी बना रहे हैं । कौन कहता है - आत्मा व्यापक नहीं, कौन कहता है-सब में एक ही आत्मतत्त्व का साम्राज्य नहीं । कौन कहता है - इस व्यापक श्रात्मा के लिए श्राद्ध कर्म विहित हैं । कौन हता है जनन - मरणाद अशुचिभावों से यह व्यापक आत्मा धर्म से प्रान्त हो जाता है । अवश्य ही जनन - मरण - थर्माक्रान्त आत्मतत्त्व उस व्यापक से पृथक् तत्त्व है, एवं वही आत्मविवर्त्त प्रस्तुत आत्मप्रकरण का ' अन्तरात्मा ' नामक दूसरा आत्मविवर्त्त हैं, जिसको लक्ष्य बनाकर सम्पूर्ण शास्त्र प्रवृत्त हुए हैं । ४४०
पृष्ठ 505
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शौचविज्ञानोपनिषत् अव्ययात्मनामक विशुद्ध आत्मतत्त्व की अक्षरप्रकृति से सम्बन्ध रखने वाला आत्मतत्त्व ही ‘ अन्तरात्मा ' है, जिसके ‘ शरीर - आत्मा ' भेद से दो विशेष पर्व माने गए हैं । जीवभूतां महाबाहो! ययेदं धार्यते जगत् ' के अनुनार श्रव्यय - क्षरगर्भित अक्षरतत्त्व ही इस जीवात्मलक्षण अन्तरात्मा का प्रवर्त्तक है । जीवात्मलक्षण यह अन्तरात्मा प्रतिशरीर में भिन्न भिन्न है । यही द्वन्द्वभावों का भोक्ता है | हृदयस्थ इस भोक्ता के साथ सख्यभाव से प्रतिष्ठित पूर्वोक्त ईश्वरात्मा साक्षी है । वह निर्लेप है यह सप है । वह एक है, यह नाना है । जीवात्मलक्षण अन्तरात्मा भा यदि ईश्वरात्मवत् सब में समान होता, तो सुख दुःख का पारस्परिक संक्रमण उपलब्ध होता । उस दशा में एक जीवात्मा के सुखी हो जाने से यच्चयावत् जीवात्मप्रपञ्च सुखी हो जाते, एव ' एक के दुःखी हो जाने से सब दुःखी हो जाते । प्रतिशरीर में भिन्न भिन्न स्वस्वकर्मानुसार परस्पर विशेष भावों से युक्त, अतएव ' सविशेष ' 4 नाम से प्रसिद्ध यही सोपाधिक - साञ्जन - सावरण- आत्मा अन्तरात्मा है, जो सदा शरीरसम्बन्ध से आक्रान्त रहता है | वह देह में रहता हुआ भी देहाभिमान से पृथक् है, शरीर में विभूतिसम्बन्ध से रहता हुआ भी अशरीरी है । यह देह में रहता हुआ देहाभिमानी है, देही है, शरीरी है । यह परिच्छिन्न जीवात्मा ही उपनिषदों में ' भृतात्मा ' - भोक्तात्मा ' - ' कम्र्मात्मा ' - ' भोक्ता सुपर्ण ' ' अन्त रात्मा ' आदि नामों से व्यवहृत हुआ है । उक्त सर्वभूतान्तरात्मा एवं यह अन्तरात्मा, दोनों उसी हृत्प्रदेश में ( दहराकाश में. ) प्रतिष्ठित है । " उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानम् " में ' आत्मना ' - सर्व भूता-न्तरात्मनामक ईश्वरात्मा ( विशुद्ध श्रात्मा ) है, एव ' आत्मानम् ' अन्तरात्मनामक जीवात्मा है । यही समन्वय ' न हिनस्त्यात्मनात्मानम् ' वचन का है । ईश्वरात्मा का उत्थिताकांक्षा से सम्बन्ध है, यही ईश्वरेच्छा है | एवं जीवात्मा का उत्थाप्याकाक्षा से सम्बन्ध है, यही जीवेच्छा है । ईश्वरेच्छामूलक कर्म श्रवन्धन है, जीवेच्छा कर्म सबन्धन है । अर्जुन के सम्पूर्ण सन्देह, सम्पूर्ण जिज्ञासाएँ, सम्पूर्ण कारभाव, जीवात्मा को लक्ष्य बना कर प्रवृत्त हुए हैं । भगवान् के सम्पूर्ण समाधान ईश्व-रात्मा को लक्ष्य में रखकर प्रवृत्त हुए हैं । बतलाया गया है कि, यह जीवात्मा तीन शरीरों से नित्य युक्त रहता है । यह शरीरत्रयी पाँच परियों से सम्पन्न हुई है । वे ही पाँचों परिग्रह स्वायम्भुव अव्यक्तात्मा, पारमेष्ठ्य यज्ञात्मा, सौर विज्ञा-नात्मा, चान्द्र महानात्मा एवं प्रज्ञानात्मा, पाथिव शरीर, इन नामों से प्रसिद्ध हैं, जिनका आत्मविज्ञानो-पनिषत् में विस्तार से निरूपण किया जा चुका है । पार्थिव शरीर इस अन्तरात्मा का स्थूलशरीर है, चा-न्द्र प्रज्ञानात्मा ( मन ), सौर विज्ञानात्मा ( बुद्धि ), दोनों की समष्टि इसका सूक्ष्मशरीर है । एवं चान्द्र महान् पारमेष्ठ्य यज्ञ - स्वायम्भुव अव्यक्त, तीनों की समष्टि कारणशरीर है । कारणशरीरात्मिका श्रव्यक्त-यज्ञमहान - की समष्टि ' आत्मा ' है, सूक्ष्मशरीरात्मिका विज्ञान - प्रज्ञान की समष्टि ' प्राणा: ' है, इसी में इन्द्रियवर्ग का अन्तर्भाव है | एवं स्थूलशरीर ' पशवः ' है । आत्मा - प्राण- पशु, इन कारण- सूक्ष्म - स्थूल-४४१
पृष्ठ 506
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान परिग्रहों से युक्त वैश्वानर - तैजस प्राज्ञलक्षण भूतात्मा ही ' अन्तरात्मा है । पशुपरिग्रहावच्छेदन यही अन्तरात्मा प्राणात्मा है, एवं आत्मावच्छेदेन यही अन्तराला आत्मा है । इस प्रकार तीन परिग्रहों के सम्बन्ध से इस एक ही अन्तरात्मा की तीन अवस्था हो जाती है । दूसरी दृष्टि से समन्वय कीजिए । प्राणमूर्त्ति अक्कात्म का तो स्वासङ्गभाव की अपेक्षा से विशुद्ध आत्मकोटि में ही अन्तर्भाव हो जाता है । शेष मूर्त्ति यज्ञात्मी, वाङ मूर्त्ति विज्ञानात्मा, पितृप्राणमूर्त्ति -महानात्मा, अन्नमूर्त्ति प्रज्ञानात्मा, एवं मत्यग्निमूर्त्ति पार्थिव स्थूलशरीर, ये पाँच विवर्त्त बच रहते हैं । इनमें पार्थिव स्थूलशरीर पृथक् संस्था है, यही शरीरात्मा है । शेष चारों की समष्टि, एवं तद्य क्त वैश्वानर-तेजस - प्राज्ञमूर्ति जीवात्मा ' अन्तर'त्मा ' है । उस ओर अन्तिम सीमा में रहने वाले पार्थिव भौतिक स्थूलशरीर को यदि पृथक् मान लिया जाता है, तो मध्यस्थ - यज्ञ - विज्ञान - महत्- प्रज्ञानावच्छिन्न जीवात्मा अन्तरात्मारूप से अवशिष्ट बच रहता है । अव्यक्तानुगत विशुद्ध आत्मा ' ईश्वर ' है, पञ्चकल, अन्त-रामा ' जीव ' है, स्थूलशरीर इस जीवात्मा का जगत् है । यही सुप्रसिद्ध विशिष्टाद्वैत सम्प्रदाय का तत्त्ववाद है, जिसका इस दृष्टि से अभिनन्दन किया जा सकता है । आगे के परिलेखों से इस आत्म-विवर्त्ती का भलीभाँति स्पष्टीकरण हो जाता है ---I * - निष्कलः परात्परः - अर्द्ध मात्रा ( १ ) - पञ्चकलो. sa ऽिव्यय: -: -- अकारः ( ५ ) २ पञ्चकलोऽक्षरः -----उकारः ३-- पञ्चकलः दार--मकारः ( ५ ) > क्षराक्षरगर्भितः परात्पराभिन्नो-ऽव्ययः – “ ईश्वरः " -----( तस्य वाचकः प्रणवः-इत्याहुराचा:) १- - पञ्चकलोऽक्षरः २- पञ्चकलः क्षरः २३- पञ्चकलोऽव्ययः * - निष्कल. परात्परः ' श्रव्ययक्षग्गर्भितः - अक्षर: - ' जीवः ' ( तस्योपनिषदहमित्याहुराचार्य्या: ) । विशुद्धात्मा अन्तरात्मा साक्षी भोक्ता शरीरात्मा भोगायतनम् अव्ययः अक्षरः क्षरः अव्ययारगर्भितः - तर: - " जगत् " ( तस्योपनिषदह रित्याहुराचाय्र्याः ) । २- पञ्चकलः दारः २ - पञ्चकलोऽक्षरः ३ - पञ्चकलोऽव्ययः * - निष्कलः परात्परः ४५२
पृष्ठ 507
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
' याशीच विज्ञानोपनिषत् १- क्षराक्षरगर्भितः -- श्रव्ययपुरुषः -- तत्प्रधान: - विशुद्ध आत्मा ( ईश्वर: ) । २ - क्षरात्र्ययगर्भितः - अक्षरपुरुषः - नत्प्रधानः - अन्तरात्मा ( जीव: ) । ३ - अव्ययाक्षरगर्भितः - क्षरपुरुष - तत्प्रधानः-. --शरीरात्मा ( जगत् ) । १–१ षोडशीपुरुषः– सर्वव्यापकः - हृद्दे शे प्रतिष्ठितः - साक्षी – विशुद्धात्मा - " ईश्वर; " २- १ - अव्यक्तात्मा स्वायम्भुवः ३-२ - यज्ञात्मा ----- - पारमेष्ठ्यः ४-३ - विज्ञानात्-. --सौर: ५--४- महानात्मा -- चान्द्रः ६ - ५ - मज्ञानात्मा ---- चान्द्रः ( भोगसाधनानि २ अन्तरात्मा - " जीवः ' ७- १ - प्राज्ञः - ऐन्द्र: --२ ---- तैजस: -वायव्यः भोक्तात्मा ६- ३ - वैश्वानरः-आग्नेयः १० - १ - शरीरम् पार्थिवम् भोगायतनम्} शरीरांत्मा “ जगत् ” अथवा १ -- षोडशीपुरुष: - -- अमृतात्मा - विशुद्ध श्रात्मा १ २-- अव्यक्तात्मा स्वायम्भुव: - प्रसङ्गः प्राणमयः ४४३ - विशुद्धात्मा
पृष्ठ 508
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
-श्राद्धविज्ञान - यज्ञात्मा आपोमय: - पारमेष्ठ्यः २ - विज्ञानात्मा वाङमयः- - सौर: ३ – महानात्मा -- सोममयः - -चान्द्रः -अन्तरात्मा ४- प्रज्ञानात्मा - अन्नमयः--चान्द्रः ५ - कम्र्मात्मा - अन्नादमयः -- पार्थिवः 8 ३ १- शरीरात्मा मर्त्याग्निमय: - भौमः -शरीरात्मा * अथवा-१ १ -- षोडशीपुरुषः ] - शरीरेषु - अशरीरी ] - विशुद्धात्मा १ --- अव्यक्तात्मा स्वायम्भुवः ३ --- २ - यज्ञात्मा पारमेष्ठ्यः ४- ३ - महानात्मा पारमेष्ठ्यः ५- १ - विज्ञानात्मा सौरः ६ - २ - प्रज्ञानात्मा चान्द्रः ७-१ --- प्राज्ञः - एकविंश: ( २१ ) ८- २ - तैजसः -- -- पञ्चदशः ( १५ ) ६- ३ - वैश्वानरः - - त्रिवृतः 8 ( ६ ) -३ १०-१—– शरीरम् – भौमम् ४४४ शरीरी सूक्ष्मशरीरम् प्राणाः कारणशरीरम आत्मा -- अन्तःशरीरे . -- शरीरेषु शरीरी स्थूलशरीरम्. ( बाह्यशरीरम् ) पशवः - शरीरात्मा -अन्तरात्मा
पृष्ठ 509
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अथवा अमृतम् तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः आशौचविज्ञानोपनिषत् १ - सर्वव्यापकः षोडशी - शरीरेषु प्रतिष्ठितः - अशरीरी १ - अव्यक्त - यज्ञ - महदवच्छिन्नः कम्मरमा प्राज्ञः - आत्मा ( मनोमयः ) - कारण शरीरम् -विज्ञान- प्रज्ञानावच्छिन्नः कर्मात्मा तैजसः -- प्राणा: ( प्राणमयाः ) - सूक्ष्मशरीरम् ३ - शरीरावच्छिन्न: - कर्मात्मा वैश्वानरः -- पशव: ( वाङमयाः ) - स्थूलशरीरभू अथवा ----१ १ - कार्यकारणातीतः - सर्वातीतः - सर्वमयः - साक्षी - श्रसङ्गः ] - विशुद्धात्मा I अन्तरात्मा ससङ्गः १ - कारणशरीरावच्छिन्नः कम्मरमा - प्राश: २ २ --- सूक्ष्मशरीरावच्छिन्नः कम्मरमा - तैजसः ३ ३ -- स्थूलशरीरावच्छिन्नः कम्मरमा - वैश्वानरः ] - शरीरात्मा -- ससङ्ग: उक्त तीन आत्मविवों में से प्रथम विशुद्ध आत्मा तो सर्वथा असङ्ग रहता हुआ निर्लेप है । शरीर में विभूतिसम्बन्ध से प्रतिष्ठित रहने वाले शारीर, किंवा बाह्य दोषों का इस पर कोई प्रभाव. नहीं होता । साथ ही न गुणाधान ही सम्भव । गुण - दोष- सम्पर्क से अतीत यह यह विशुद्ध आत्मा ' शो ' मर्यादा से एकान्ततः अतिकान्त है । शेष बचे हुए अन्तरात्मा, शरीरात्मा, नाम के दो विव ही आशौच सम्बन्ध के पात्र बनते हैं । इन पर दोषों का संक्रमण भी स्वाभाविक है, एवं गुणाधान भी स्वाभाविक है । फलतः प्रस्तुत आशौचप्रकरण में इन दो आत्मविवन्तों को लक्ष्य में रख कर ही शौचस्वरूप की मीमांसा श्रभी बनती है । यही ' आशौचपात्रतामीमांसा ' का संक्षिप्त स्वरूप प्रदर्शन है । ४४५
पृष्ठ 510
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शौचस्वरूपमीमांसा-श्राद्धविज्ञान ' आशौचपात्रस्वरूपमीमांसा ' परिच्छेद में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि, आध्यात्मिक-संस्था से सम्बन्ध रखने वाले विशुद्धात्मा, अन्तरात्मा, शरीरात्मा, इन तीनों आत्मविवर्त्तो में से सङ्गप्राणमूर्त्ति स्वायम्भुव अव्यक्तात्मा से युक्त त्रिपुरुपपुरुषात्मक, अतएव ' षोड़षी ' नाम से प्रसिद्ध अव्ययप्रधान विशुद्ध आत्मा व्यापक है, अतएव व्याप्य ( परिच्छिन्न ) शुचि - अशुचि - धर्मा-धर्मों से श्रसंस्पृष्ट है, नित्यपूत है, नित्यसंस्कृत है, एकान्ततः शास्त्रानधिकृत है । अतएव इसके सम्बन्ध में हमारा ( ' अन्तरात्मा ' नामक जीवात्मा का ) कोई कर्त्तव्य शेष नहीं रह जाता । उस निविंशेष के साथ न तो सविशेष आत्मा का ही कोई ग्रन्थिबन्धन सम्बन्ध है, न सविशेष शरीर ही उस पर अपना कोई प्रभाव डा सकते । इस प्रकार तोनों में से प्रथम विशुद्ध-आत्मविवर्त्त तो सर्वथा अमीमांस्य बन जाता है । अब मोमांस्य हैं अन्तरात्मा, शरीरात्मा नामक दोम | इस सम्बन्ध में भी थोड़ा स्पष्टीकरण और कर लेना चाहिए । पूर्व परिच्छेद में स्पष्ट किया गया है कि, ' अन्तरात्मा ' नामक कम्मतिमा अपने कारण, सूक्ष्म, स्थूल, इन तीन शरीरों से युक्त रहता हुआ तीन क्षेत्रों में विभक्त हो रहा है । अव्यक्तयज्ञगर्भित महानात्मा इसका कारण -शरीर है, तदवच्छिन्न कम्र्मात्मा प्राज्ञप्रधान है । विज्ञानगर्भित प्रज्ञान ( बुद्धिगर्भित मन इसका सूक्ष्मशरीर है, तदवच्छिन्न कम्र्मात्मा तैजसप्रधान है । एवं प्राणाग्निगर्भित ( चितेनिधेयाग्निगर्भित ) भूताग्नि ( चित्याग्नि ) इसका स्थूलशरीर है, तदवच्छिन्न कर्मात्मा वैश्वानरप्रधान है । वैश्वा-नरप्रधान कर्मात्मा ' शरीरात्मा ' है, तैजस - प्राज्ञप्रधान वही कर्मात्मा अन्तरात्मा है । इस प्रकार | शरीर के सम्बन्ध से एक ही कम्मरमा के अन्तरात्मा, शरीरात्मा, ये दो विवर्त्त हो जाते हैं, जिन्हें किसी सीमापर्यन्त हम ' आशौचपात्र ' कह सकते हैं । कर्मात्मविवर्त्तसंग्रहः-१- स्वायम्भुवाव्यक्त- पारमेष्ठ्य यज्ञात्मगभितश्चान्द्रो महानात्मा कारण शरीरम २- सौर विज्ञानात्मगर्भितश्चान्द्रः प्रज्ञानात्मा ३- चितेनिधेयाग्निगर्भितः पार्थिवश्चित्याग्निः : १- कारण शरीरावच्छिन्नः कर्मात्मा वैश्वानर - तैजसगर्भितः प्राज्ञः २- सूक्ष्मशरीरावच्छिन्नः कम्र्मात्मा - प्राज्ञवैश्वानर गर्भितः - तैजसः ३ - स्थूलशरीरावच्छिन्नः कम्र्मात्मा प्राज्ञतैजसगभितः-सूक्ष्मशरीरम् स्थूलशरीरम् अन्तरात्मा. वैश्वानरः } शरीरात्मा ४४६