Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 511–520
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 511–520
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शौचविज्ञानोपनिषत् कारणशरीरावच्छिन्न प्राज्ञप्रधान कम्र्मात्मा में १ - स्वायम्भुव अव्यक्तात्मा, २ - पारमेष्ट्य यज्ञा-त्मा, ३ - चान्द्र महानात्मा, प्रज्ञाप्राणात्मक एकविंशस्तोमावच्छिन्न दिव्य सर्वज्ञ का प्रवर्ग्यभूत ४ - प्राज्ञ-श्रात्मा, ये चार पर्व हैं । चारों में से चौथे प्राज्ञ आत्मा के गर्भ में गौणरूप से पञ्चदशस्तोमावच्छिन्न ' श्रान्तरिक्ष्य हिरण्यगर्भ वायु का प्रवर्ग्यभूत तैजसात्मा, तथा त्रिवृत्स्तोमावच्छिन्न पार्थिव विराट् अनि का प्रवर्ग्यभूत वैश्वानरात्मा, दोनों अन्तर्भूत हैं । यदि इन दोनों आत्मकलाओं का भी संकलन कर लिया जाता है, तो प्राज्ञ नामक कम्र्मात्मा ' षट्कल ' बन जाता है । स्वायम्भुव अव्यक्तात्मा प्राणमूर्त्ति बनता हुआ सङ्ग बनता हुआ विशुद्ध आत्मा की भाँति शुचि - अशुचिभावों से संस्पृष्ट है । फलतः प्राज्ञ-कर्मात्मा का श्रव्यक्तां शौच सम्बन्ध से वहिर्भूत बन जाता है । पारमेष्ठ्य यज्ञात्मा अग्नीषोमा-त्मक है, इसी के आधार पर ' अहरहर्यज्ञ ' नामक जीवनयज्ञ प्रतिष्ठित है । यमप्राण के समावेश से जिस दिन यह यज्ञसम्बन्ध उच्छिन्न हो जाता है, तत्काल जीवन समाप्त हो जाता है । चान्द्र-महानात्मा सोमप्रधान है, तैजस- वैश्वानरगर्भित प्राज्ञ आत्मा अन्नमय है । इस प्रकार स्नेनगुणप्रधान सोम से युक्त रहते हुए यज्ञ, महान्, प्राज्ञ, तीनों ससङ्ग बन रहे हैं । इसी ससङ्गभाव के अनुग्रह से ये तीनों शुचि - अशुचिभावों के भोक्ता बन रहे हैं । इनमें यज्ञात्मा, महानात्मा, इन दोनों का अशुचिभाव तो ' घ ' कहलाया है, जो कि ' अघ ' नामक अशुचिभाव हमारे इस आशौचप्रकरण का मुख्य लक्ष्य है । तीसरे प्राज्ञ आत्मा का अशुचिभाव ' एन: ' कहलाया है । ( १ ) - कारणशरीरावच्छिन्नः कर्मात्मा - प्राज्ञप्रधानः १-१- स्वायम्भुवः अव्यक्तात्मा प्राणमयः} दोषासंस्पृष्ट ' २-२- पारमेष्ठ्यः यज्ञात्मा - अग्नीषोमात्मकः -दोषे संस्पृष्ट छाघ-३-३- चान्द्रः महानात्मा- - सोमात्मकः ४- दिव्यः ( २१ ) प्राज्ञात्मा तैजसात्मा अन्नमयः वैश्वानरात्मा ४ ५ - आन्तरीक्ष्य: ( १५ ) ६- पार्थिव: ( ६ ) } एनो - दोषेण संस्पृष्टः - कर्मात्मा कारणशरीरावच्छिन्नः ' प्राज्ञः ' सूक्ष्मशरीरावच्छिन्न तँ जसप्रधान कम्र्मात्मा में १ - सौर विज्ञानात्मा ( बुद्धि ), २ – चान्द्र प्रज्ञानात्मा ( मन ) आन्तरिक्ष्य ३ - तैजसात्मा, ये तीन पर्व हैं । तीसरे तैजसात्मा के गर्भ में दिव्य-प्राज्ञ, पार्थिव वैश्वानर, दोनों अन्तर्भूत हैं । इन दोनों के संकलन से यह तैजस नामक कम्मरमा पञ्चकल बन जाता है । इन में सौर विज्ञानात्मा ( बुद्धि ) सर्वथा प्रसङ्ग है । फलतः अव्यक्तांशवत् यह विज्ञानांश भी शुचि - अशुचिभावों से संस्पृष्ट है । चान्द्र प्रज्ञानात्मा ' अन्नमयं हि सोम्य मनः ' ४४७
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श्राद्धविज्ञान सिद्धान्त के अनुसार सोमात्मक अन्नमय बनता हुआ सङ्ग है । तद्युक्त प्राज्ञवैश्वानरगर्भित तैजस भी ससङ्ग है । इसी द्विकलं ( प्रज्ञानयुक्त तैजस ), किंवा चतुष्कल ( १ - प्रज्ञानयुक्त २- वैश्वानर ३ - प्राज्ञ-गर्भित ४- तैजस ) कर्मात्मा के साथ ' भाव ' नामक अशुचिभाव का सम्बन्ध माना गया है । स्थूलशरीरावच्छिन्न वैश्वानरप्रधान कम्र्मात्मा में भौम चित्याग्नि ( शरीर ), पार्थिव चितेनिवे-यामि, ये दो पर्व हैं । पार्थिव चितेनिधेयाग्नि ही नैश्वानर है, जिस के गर्भ में प्राज्ञ तैजस, दोनों प्रतिष्ठित हैं । इसी दृष्टि से यह चतुष्कल बन रहा है । चतुष्कल इस गैश्वानर के साथ-भूतानुगत अशुचिभाव का सम्बन्ध है, जो शरीराशुचि, द्रव्याशुचि, भेद से दो भागों में विभक्त है । २- सूक्ष्मशरीरावच्छिन्नः कर्मात्मा तैजसप्रधान: -१ १- सौर: विज्ञानात्मा ( बुद्धिः ) २ २. चान्द्रः प्रज्ञानात्मा ( मनः ) अन्नमयः ३- अान्तरीक्ष्यः भावदोषानुगत ३ ४- दिव्यः प्राज्ञात्मा तैजसात्मा भूतानुगतः ५- पार्थिवः वैश्वानरात्मा ( ३ ) - स्थूलशरीरावच्छिन्नः कर्मात्मा - वैश्वानरप्रधानः १ - प्राणाग्निः पार्थिवः २- प्राणाग्निरान्तरीक्ष्यः ३- प्राणाग्निर्दिव्यः ४ - दिव्याग्निभौमः पञ्चविध अशुचिभाव-वैश्वानरः ' तैजसः वैश्वानर प्राज्ञः शरीरम् शरीरम् शरीरात्मा - भूतदोषानुगतः ( शरीर - द्रव्यदोषानुगतः ) उक्त विश्लेषण से हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ा कि, विशुद्ध, श्रात्मा, अन्तरात्मा, शरीरात्मा, इन तीन श्रमवितों में से सामान्यतः अन्तरात्मा, शरीरात्मा, ये दो आत्मविवर्त्त शुचि - अशुचि-भावों से युक्त हैं । इन में भी अन्तरात्मा के कारणशरीर से सम्बद्ध श्रव्यक्कांश, सूक्ष्मशरीर से सम्बद्ध विज्ञानांश, दोनों दोषासंस्पृश्ष्ट हैं । यज्ञात्मा - महानात्मानुगत प्राज्ञभाग, प्रज्ञानानुगत तैजसभाग, शरीरानुगत वैश्वानरभाग, ये तीनों दोषों से संस्कृष्ट हैं । इन में यज्ञात्मगर्भित महान् के साथ १४५
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आशौचविज्ञानोपनिषत् ' अ ' का, प्राज्ञ के साथ ' एन ' का, प्रज्ञानानुगत तैजस के साथ ' भाव ' का, एवं शरीरानुगत वैश्वानर के साथ शरीराशुचि, तथा द्रव्याशुचि का सम्बन्ध है । इस प्रकार पाँच अशुचिभाव पाँच क्षेत्रों में विभक्त हो रहे हैं । अवश्य ही आशौच ' ' तत्त्व समन्वय के लिए इन पाँचों आधाराधेयभावों का यथास्थान सुव्यवस्थित समन्वय अपेक्षित है । पाँचों का वर्गीकरण ही आशौचस्वरूप - मीमांसा की मूल प्रतिष्ठा है । ' अघ ' नामक अशुचिभाव प्रधानतः महानात्मा को ही लक्ष्य बनाता है । ' एन ' नामक अशुचिभाव प्रधानतः प्राज्ञ आत्मा को ही लक्ष्य बनाता है । ' भाव ' नामक शुचिभाव प्रधानतः प्रज्ञान ( मन ) को ही अपना लक्ष्य बनाता है । एवं शरीर, तथा द्रव्यानुगत शुचिभाव प्रधानतः वैश्वानरात्मयुक्त शरीर को ही अपना लक्ष्य बनाते हैं । इसी प्राकृतिक स्थिति के आधार पर वैज्ञानिकोंनें अशुचिभावों को पाँच भागों में विभक्त माना है । एवं इन पाँचों के निराकरण के लिए पाँच प्रकार के शुद्धिसंस्कार मानें हैं, जिनका विशद वैज्ञानिक विवेचन गीताविज्ञानभाष्यभूमिका - कर्म्मयोगपरीक्षात्मक -- द्वितीयखण्ड के ' ग ' विभाग के ' संस्कार-विज्ञान ' नामक प्रकरण मे किया जाचुका है । १- महान त्मा - श्रघदोषपात्रम् १ - प्राज्ञः कर्मात्मा २- प्राज्ञ श्रात्मा -- एनोदोषपात्रम् २ ३- प्रज्ञानात्मा ---- भावदोषपात्रम् - तेजस: कर्मात्मा -शरीरी - कर्मात्मा ४- वैश्वानरात्मा - शरीरदोषपात्रम् ३ - वैश्वानरः कर्मात्मा ५- शरीरम् --- द्रव्यदोषपात्रम् १ – अघशुद्धिसंस्कारः ततो महानात्म विशुद्धिः २ - एनः शुद्धिसंस्कार: - - ततः प्राज्ञात्म विशुद्धिः ३ - भावशुद्धिसंस्कारः -- ततः - तेजसात्मविशद्धिः ४ - शरीरशुद्धि संस्कारः --शरीरशुद्धिसंस्कार: -: -ततः वैश्वानरात्मविशुद्धिः . ५ - द्रव्यशुद्धिसंस्कारः -- ततः शरीरविशुद्धिः ४४६ " त एते पञ्चधर्म्मशुद्धिसं-स्कारा भावका: "
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श्राद्धविज्ञान शुचिभाव पुण्यातिशय का प्रवर्त्तक है, एवं अशुचिभाव पापातिशय का प्रवर्तक है । ज्ञान. पूर्वक, किए जाने वाले सत्कर्म शुभसंस्कार के जनक बनते हैं, एवं अज्ञान सहकृत असत्कर्म शुभसंस्कारों के प्रवर्त्तक बनते हैं । इस प्रकार ज्ञान, अज्ञान - सहयोगियों के भेद से कर्म्मतन्त्र दो भागों में विभक्त हो रहा है । जिन कर्मों से शुभसंस्कार उत्पन्न होते हैं, वे पुण्यकर्म माने गए हैं, एवं जिन कम्मों से अशुभसंस्कार उत्पन्न होते हैं, वे पापकर्म माने गए हैं । शुभवासना पुण्यातिशय है, अशुभवासना पापातिशय है । पाप से ( पापप्रवत्तेक सत्कर्म से ) पाप ( पापसंस्कार ) होता है, पुण्य से ( पुण्यप्रवर्त्तक सत्कर्म से ) पुण्य ( पुण्यसंस्कार ) होता है । यही पुण्य - पाप - कर्म्मद्वयी आगे जाकर ६ भागों में विभक्त हो जाती है, जिसका उक्त गीता-खण्ड के ' उदर्कनिबन्धनपट्कर्म्म ' नामक प्रकरण में विशद वैज्ञानिक निरूपण हुआ है । प्रकरण-सङ्गति के लिए प्रकृत में नाम मात्र उदधृत कर दिए जाते हैं । १ .१ -- श्वःश्रेयसम् -- अभ्युदयमूलकशुभसंस्कारप्रवर्त्तकम् ( १ ) सत्कर्म्म -एनः - प्रत्यवायमूलका शुभसंस्कारप्रवर्त्तकम् ( १ ) असत्कर्म्म. १ - - प्रायश्चित्तम् -- प्रत्यवायनिमित्तप्रतिबन्धकम्. ( २ ) सुक - उपादेयानि २ २-- श्रघम् --- अभ्युदयनिमित्तप्रतिबन्धकम् ( २ ) विक -- हेयानि १ - - सुकृतम् - - प्रत्यवायनिमित्तविघातकम् ( ३ ) कर्म ३ २ -- दुष्कृतम् - - अभ्युदयनिमित्तविघातकम् ( ३ ) क ४५८
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प्रकान्तरेण-शौचविज्ञानोपनिषत् संख्यानम् कर्म नामानि कर्मवृत्तयः कर्म्मजातयः कर्मातिशयाः १-१-१ श्वः श्रेयसम् अभ्युदयमूलकशुभसंस्कारजनकम् शास्त्रविहित - ' सत्कर्म्म ' उपादेयः - पुण्यातिशयः १२-२-१ ) एनः प्रत्यवाय मूलका शुभसंस्कार जनकम् ३- १-२ प्रायश्चित्तम् प्रत्यवायनिमित्तप्रतिबन्धकम् ४-२-२ घम् अभ्युदयनिमित्तप्रतिबन्धकस् ५-१-३ सुकृतम् प्रत्यवायनिमित्तविघातकम् ६-२-३ दुष्कृतम् अभ्युदयनिमित्तविघातकम् आयुर्वेद का त्रिधातुवाद-शास्त्रप्रतिषिद्ध-‘ असत्कर्म्म ' हेयः - पापातिशय: शास्त्रविहितं - ' सुकर्म्म ' उपादेयः - पुण्यातिशयः शास्त्रनिषिद्ध - ' विकर्म | हेय: - पापातिशयः शास्त्रविहित- ' कर्म ' उपादेयः - पुण्यातिशयः शास्त्रविरुद्ध ' - ' अकर्म हेय: - पापातिशयः आत्मा की वह स्वाभाविक स्थिति, जिसमें प्रतिष्ठित रहता हुआ आत्मा स्वस्वरूप से विक सित रहता है, ' शुचि ' अवस्था है । एवं वह स्थिति, जिसमें आकर आत्मा स्वस्वरूप से मुकुलित हो जाता है. ' अशुचि ' अवस्था है । शुचिभावापन्न आत्मा पवित्र - पूत - शुद्ध रहता हुआ जहाँ स्वस्वरूप से विकसित है, वहाँ इसमें अन्य दिव्य शुभसंस्कार ग्रहण की भी योग्यता विद्यमान है । ठीक इसके विपरीत अशुचिभावापन्न अपवित्र - अशुद्ध - मलीमस - आत्मा जहाँ स्वस्वरूप से मुकुलित रहता है, यहाँ आगन्तुक दिव्य संस्काराधान से भी वश्चित रहता है, साथ ही दोषप्रवर्त्तक - दोषवर्द्धक - अशुभ-संस्कारों का भी अनुगामी बना रहता है । अतएव आवश्यक है कि, आत्मा को सदा उन अशुचि-भावों से बचाया जाये, जो दिव्य संस्कार के विरोधी हैं । यदि अगत्या अशुचिभाव का समावेश हो जाय, तो तब तक के लिए दिव्यकम्मों का परित्याग कर दिया जाय, जब तक कि प्राकृतिक शुचिभाव हट न जाय । साथ ही प्रज्ञापराध से यदि अशुचिभाव आ जाय, तो उसे उपायान्तर से हटाया जाय । साथ ही स्वाभाविक शुचिभावप्रवर्त्तक सत्कर्मों का सतत अनुगमन किया जाय, एवं आगन्तुक - अशुचिभावप्रवर्त्तके असत्कर्मों से अपने आपको बचाया जाय । अवश्य ही कर्म-तन्त्र से सम्बन्ध रखने वाले ये उच्चावचभाव जटिलतम हैं । कौन कर्म्म कत्र - कैसे - कहाँ - क्या 1 अतिशय उत्पन्न कर देता है?, इन अतीन्द्रियभावों के निर्णय के लिए शास्त्रप्रामाण्य ही हमारे लिए अनन्य श्रयभूमि है । ४५१
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' श्राद्धविज्ञान बतलाया गया है कि, आध्यात्मिक संस्था से सम्बन्ध रखने वाला अशुचिभाव अघ - एन - भाव-शरीर द्रव्य, भेद से पाँच श्रेणियों में विभक्त है । संक्षेप से इनका भी स्वरूप जान लेना अनावश्यक न होगा । सर्वप्रथम स्थूलशरीरानुगत अशुचिभावों की ओर ही दृष्टि डालिए । पितुःप्रवर्ग्यभूत शुक्र, तथा मातुःप्रवर्ग्यभूत शोणित, दोनों के समन्वय से भूतशरीर का निर्माण है । जिससे गर्भाधान होता है, वह शुक्र रस - असृक्- मांस - सेद - श्रस्थि - मज्जा - इन ६ धातुओं का अन्तिम परिणाम है । भुक्त अन्न शारीर वैश्वानराग्नि में आहुत होता हुआ रस - मल के क्रमिक विशकलन से सात धातुओं में परिणत होता हुआ शरीरसंस्था का अधिष्ठाता बनता है । इसी आधार पर पाश्र्वौतिक शरीर ' अन्नमयकोश ' कहलाया है । आयुर्वेदज्ञ विद्वानोंनें सप्तधातु-मूर्त्ति इस अन्नमयकोश की प्रतिष्ठा धातुत्रयी माना है । ' प्रत्यक्षमेवेति चार्वाकाः ' पथ का अनुगामी वर्त्तमानयुग का वैज्ञानिक चिकित्सक समाज इस भारतीय त्रिधातुवद को इस लिए अवैज्ञानिक कहने की धृष्टता कर रहा है कि, उसे अपनी स्थूल आँखों से इनका प्रत्यक्ष नहीं हो रहा । एक अङ्गुष्ठ के करोड़वें भाग में अपना आकार प्रतिष्ठित रखने वाले सूक्ष्मतम कीटाणु भी जब ' माइक्रसकोप ' यन्त्र से प्रत्यक्ष देख लिए जाते हैं, उस यन्त्र से भी जब धातुत्रयी अप्रत्यक्ष है, तो निश्चयेन यह केवल काल्पनिक वस्तु ही ठहरती है । इस प्रकार अपने वैज्ञानिक यन्त्रों से शरीर. के ' परमाणु- परमाणु की खाक छान डालने वाले इन बेज्ञानिकों को अब आयुर्वेदसम्मता धातुत्रयी शरीर में उपलब्ध नहीं हुई, तो कैसे वैज्ञानिक जगत् इस भारतीय त्रिधातुवाद को प्रामाणिक मान सकता है । नश्चयेन जैसे पचतत्त्ववाद इनका अवैज्ञानिक है, तथैव त्रिधातुवाद भी सर्वथा खपुष्प से ही समतुलित है । जबकि इनका मूल ही भ्रान्त हैं, तो भ्रान्तमूलाधार पर प्रतिष्ठित इनकी भ्रान्त-चिकित्सा प्रणाली क्यों कर मान्य हो सकती है । ये हैं उन ' द्राक्कर ' भावापन्न क्षणिक विज्ञानवादी नव्य चिकित्सों ( डॉक्टरों ) के प्रत्यक्ष - स्थूल दृष्टिमूलक प्रतिमानात्मक तत्त्वविरुद्ध अनर्गल उद्गार । क्या सचमुच हमारा त्रिधातुवाद निरी कल्पना है?, निर्भ्रान्त वेदप्रामाण्य पर प्रतिष्ठित आयुर्वेद सम्मत त्रिधातुवाद क्या सचमुच में शून्य कल्पना है?, हाँ । किनकी दृष्टि में?, उन वैज्ञानिकों को दृष्टि में, जिनकी दृष्टि भूतबाधा से भ्रान्त बन चुकी है । साथ ही उन भारतीय वैज्ञानिकों की दृष्टि में भी, जिन्होंनें उच्छिष्ट भोजन करते करते अपनी आत्मसंस्थ को अशुचि बना लिया है, साथ ही जिन्होंने ' विज्ञान ' पथ * को इसी उद्देश्य से अपने स्वार्थ का साधन बना रक्खा है । ना । किन की } * दुःख है कि, भारतवर्ष में ही वैद्यसमाज के एक मान्य व्यक्ति ने आयुर्वेदसिद्धान्त का मर्म्म न समझते हुए ' धातुवाद ' के प्रति विषवमन किया है । आपके तत्त्वावधान में ' विज्ञान ' नाम का एक पत्र भी निकलता है । आप ' हरिशरणानन्द ' नाम से प्रसिद्ध हैं । सुना है - आयुर्वेदशास्त्र के महत्त्व को सुरक्षित? रखने के लिए आपने ' त्रिधातुखण्डन ' लिखने का भी अनुग्रह किया है । सचमुच आपके इस लोकोत्तर पावन? कर्म से नासत्य - दस्र अतिशयरूप से आप पर अवर्षण करेंगे? । ४५२
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आशौचविज्ञानोपनिपत् ' दृष्टि में?, उन भारतीय ऋषियों की दृष्टि में, जिनकी दृष्टि इन्द्रियातीत विषयोंका प्रत्यक्षवत् साक्षात् कर लेती है । साथ ही उन भारतीय प्रमाणभक्तों की दृष्टि में भी, जिनकी आध्यात्मिकसंस्था अघशून्य अन्नादान से अद्यावधि शुचिभाव में परिणत हो रही है । ऐसे ही भारतीयों के सम्मुख तत्त्वात्मक, अतएव पञ्चतत्त्ववत् इन्द्रियातीत आयुर्वेदसम्मत त्रिधातुवाद का स्पष्टीकरण करते हुए निम्न लिखित वेदमन्त्र उपस्थित हो रहा है-( १ ) " त्रिन अश्विना दिव्यानि भेषजा, त्रिः पार्थिवानि त्रिरु दत्तमद्भ्यः । श्रमानं शंयोर्ममकाय सूनवे ' त्रिधातु ' शर्मा वहतं शुभस्पती " ( ऋक्सं ० १ ३४६। ) । ( २ ) " त्रिन अश्विना यजता दिवे दिवे परि त्रिधातु पृथिवीमशायतम् । त्रिस्रो नासत्या रथ्या परावत आत्मे वातः स्वसराणि गच्छतम् || ( ऋक्सं ० १ | ३४ | ७ | ) भारतीय त्रिधातुवाद-नासत्य, दस्र - नामक सान्ध्य दिव्यप्राणों के परीक्षक, अतएव नासत्य - दस्र नाम से ही प्रसिद्ध सुप्रसिद्ध प्राणाचार्य भगवन्तौ अश्विनीकुमारोंनें हीं " त्रिधातु " के आधार पर चिकित्साशास्त्र की प्रतिष्ठा की है । " त्रयो वा इमे त्रिवृतो लोकाः " के अनुसार ' दिव्याग्नि ' से उपलक्षित द्युलोक, ' पार्थिवाग्नि ' से उपलक्षित पृथिवीलोक, एवं- ' अद्भ्यः ' से उपलक्षित अन्तरिक्षलोक, तीनों क्रमशः अनिल - अनल-सोमात्मक बनते हुए विधायुक्त औषधियों के प्रभव वन रहे हैं, " यही मन्त्रतात्पय्र्य है । मन्त्रोपात्त का अर्थ करते हुए सर्वश्री स यरण चार्य ने कहा है - " त्रिधातु - वातपित्तश्लेष्मधातुत्रयशमन- ' त्रिधातु ' विषयम् " । लोकाधिष्ठाता सूर्य, सर्वलोकाधिष्ठाता वायु एवं अन्तरिक्ष लोकाधिष्ठाता चन्द्रमा, ये तीनों तत्त्व ही प्राकृतिक विश्व - मय्यं दात्रों के स्वरूपरक्षक माने गए हैं । यद्यपि - ' सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत् " इत्यादि श्रुति ने विश्वरचना में सूर्य ( अग्नि ), चन्द्रमा ( सोम ), इन दो तत्त्वों को ही प्रधानता दी है, साथ ही ' अग्नीषोमात्मकं जगत् ' ( वृ ० जा ० उपनिषत् ) रूप से उपनिषत् ने भी इसी प्रधानता का समर्थन किया है । तथापि श्रुत्यन्तर के अनुसार वायु को भी अवश्यमेव सृष्टिरचना में समाविष्ट मानना पड़ता है । ' तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति " ( ईशोपनिषत् ) - " वायुर्वे गौतम! तत्सूत्रम् " ( शतः ब्राह्मण ) - " वायुहीदं सर्वं करोति, यदिदं किञ्च " ( ० ० २३४ | ) इत्यादि श्रुतिवचन स्पष्ट ही वायु का भी सृष्टिनिर्माणत्त्व सिद्ध कर रहे हैं । वस्तुगत्या भी वायु का सहयोग आवश्यक रूप से अपेक्षित मानना पड़ता है । ' उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वम् ' ( अथर्वसंहिता ) इत्यादि अथर्व सिद्धान्त के अनुसार उच्छिष्ट नामक प्रवर्ग्य भाग से ही विश्व का निर्माण हुआ है । चन्द्रमा ब्रह्मौदनरूप से स्वस्वरूपरक्षा में उपभुक्त ४५३
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श्राद्धविज्ञान प्रजोत्पादक बनता है ।. है । इनका जो भाग प्रवृक्त होकर वायुधरातल में प्रतिष्ठित हो जाता है, को वही प्रवृक्त बना कर विश्व का गतिधर्म्मा वायु ही स्वस्थानस्थित सूर्य - चन्द्रमा के आग्नेय - सौम्य - रसों ( कौ ० -निर्माण करता है । यही कारण है कि, श्रुति ने – “ एतद्वै प्रजापतेः प्रत्यक्षं रूपं सूर्य्य यद्वायुः, चन्द्रमा ", के ब्रा ० १६ २। ) इत्यादिरूप से वायु को ही प्रत्यक्ष प्रजापति मान लिया है क्यों ।, फलतः सूर्य्य - चन्द्रमा जहाँ अपने साथ साथ वायु का भी सृष्टिकर्तृत्त्व भलीभाँति सिद्ध हो जाता है । यही प्रवर्ग्यभाग से विश्व के ( रोदसी ब्रह्माण्ड के ) केवल उपादानकारण हैं, वहाँ वायु उपादान होने के प्रजो-साथ साथ प्रवर्ग्यभावसम्पादन से निमित्तकारण भी है । ' वृष्टेरन्नं, ततः प्रजाः ' इत्यादि मानवीय त्पत्तिसिद्धान्त भी वायुतत्त्व के आधार पर ही प्रतिष्ठित है ' वायुर्वै वृष्ट्या ईशे ' - ' मरुतः सृष्टान्न है - । यन्ति ' - ' वायुरेव प्रवर्षति ' इत्यादि के अनुसार एकमात्र वायु ही वृष्टिकर्म का प्रधान में प्रवर्त्तक परिणत हो इन्हीं सब कारणों से मन्त्रसंहिता का द्विधातुवाद ( सूर्य्यचन्द्रवाद ) त्रिधातुवादरूप करता है, उसके रहा है । फिर जो आयुर्वेदशास्त्र पुरुषप्रजा ( मानव प्रजा ) की चिकित्सा का विधान लक्षीभूत अन्नर-लिए तो त्रिधातुवाद की मान्यता इसलिए आवश्यक हो जाती है कि, चिकित्सा का - प्रश्वास ) समयपुरुष वायुग चेतनाप्रधान है । मानवप्रजा के चैतन्य का आधार वायुतत्त्व ( श्वास . ही माना गया है, जैसा कि अन्यत्र भूतसर्गविज्ञानादि में विस्तार से प्रतिपादित है । सौरव अग्निप्रधान है, चान्द्र तत्त्व सोमप्रधान, किंवा जलप्रधान है, वायु तत्त्व उभयप्रधान के समन्वय-है । अनि उष्णतत्त्व है, सोम शीततत्व है. वायु श्रनुष्णाशीततत्त्व है । इन तीनों तत्त्वों का ही तारतम्य से ही यच्चयावत् पदार्थों का निर्माण हुआ है । उदाहरण के लिए पार्थिवसंस्था अन्वेषण कीजिए | भूसंस्था में अग्नि ( सूर्य ), जल ( चन्द्र, ) वायु, तीनों तत्त्वों का समन्वय हो:, रहा है । जलीय परमाणुओंनें पार्थिव मृत्परमाणुओं को स्वस्नेहधर्म से एकसूत्र में आबद्ध वेष्टन कर वैज्ञानिक रक्खा है | श्राग्नेय परमाणु घनता के प्रवर्तक बन रहे हैं । वायु के वेष्टन ने, जो कि सुरक्षित भाषा में " एमूषवराह ' नाम से प्रसिद्ध है, भूपिण्ड की इस आनेय, जलोय स्थिति को हो रहा बना रखा है । गर्भ में हीं दोनों विरुद्ध तत्त्वों के समन्वय से भूपिण्ड पिण्डरूप में परिणत । अग्नि है । इस प्रकार तीनों के समसमन्वयलक्षण साम्य से ही पार्थिवसंस्था स्वस्वरूप से सुरक्षित है * तत्त्व. की वृद्धि सर्वत्र ज्वालामुखी के दृश्य उपस्थित कर सकती है, जलीय परमाणुओं की वृद्धि पृथिवी को वज्रसम कठिन बनाकर इसे ऊसर बना सकती है, एवं वायुतत्त्व की वृद्धि इसे खण्ड-खण्डरूप में परिणत कर सकती है । समभावान इन्हीं पार्थिव तीनों धातुओं से ओषधि - वनस्पतियों का निर्माण होता है । भुक्त धियाँ रूप में परिणत होतीं हुई पुरुष का उपादानकारण बनतीं हैं । इस प्रकार पर परया पुरुषशरीर में प्रविष्ट प्रारणात्मक ( तत्त्वात्मक ) सौर अग्निधातु ही ' पित्त ' नाम से प्रसिद्ध ४५४
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आशौचविज्ञानोपनिषत् हुआ है । प्राणात्मक चान्द्र सोमधातु ही ' श्लेष्मा ' ( कफ ) कहलाया है, एवं प्राणात्मक वायु ही ' वात ' नाम से व्यवहृत हुआ है । तीनों धातु प्राणात्मक हैं । श्रतएव यन्त्रसहस्र की सहायता से भी आप भूतदृष्टि से इनका साक्षात्कार नहीं कर सकते । भिषगवर भूत की चिकित्सा नहीं करता, पितु भूत के आधार पर ( स्थूल औषधियों को माध्यम बना कर ) तद्गत प्राणों से धातुप्राणों की चिकित्सा करता है | अतएव उसे शरीराचार्य न कह कर ' प्राणाचार्य्य ' कहा जाता है । ये ही प्राणा-त्मक तीनों धातु स्थूलशरीर के प्रतिष्ठापक ' त्रिस्थाणु ' हैं, साथ ही ' त्रयमेतत् त्रिदण्डवत् ' न्याय से तीनों अन्योन्याश्रित हैं । धातुत्रयी की साम्यावस्था नैरोग्य है, विषमावस्था रोगोपक्रम है । वेदसिद्ध इसी त्रिधातुवाद का स्पष्टीकरण करते हुए आयुर्वेदज्ञोंने कहा है-१ - " त्र जिज्ञास्यं किं पित्तव्यतिरेकादन्योऽग्निः?, आहोस्वित् पित्तमेवाग्निरिति? | त्रोते - न खलु पित्तव्यतिरेकादन्योऽग्निरुपलभ्यते । श्राग्नेयच्चात् पित्ते -दहनपचनादिषु अभिप्रवर्त्तमाने अभिवदुपचारः क्रियते -- अन्तरग्निरिति । क्षीणे हि अग्निगुणे तत् समानद्रव्योपयोगात्, यतिवृद्धे शीतक्रियोपयोगात् । आगमाच्च पश्याम: - ' न खलु पित्तव्यतिरेकादन्योऽग्निरिति " ( सु ० सू ० २१। ) । २ - ' ' विसर्गादानविक्षेपैः सोम- सूर्य्या - निला यथा । धारयन्ति जगद्, देहं कफ - पित्ता- निलास्तथा ॥ ( सु ० सू ० २१। ) । ३ - " नर्ते देहः कफादस्ति न पितान्न च मारुतात् । शोणितादपि वा नित्यं देह एतैस्तु धार्यते ॥ " ( सु ० शा ० २। ) । ४ -- तत्र ( शरीरे ) वायोरात्मैवात्मा, पित्तमाग्नेयं, श्लेष्मा सौम्यः " ( सु ० सू ० ४३ ) । ) ५ -- " मरीचिरुवाच - अग्निरेव शरीरे पित्तान्तर्गतः कुपिताकुपितः शुभाशुभानि करोति । तद्यथा - पक्तिमपक्ति, दर्शनमदर्शनं मात्रामात्रच्चमूष्मणः, प्रकृति विकृतिवर्णं, शौर्य, भयं क्रोधं, हर्ष, मोहं, प्रमाद, इत्येवमादीनि चापराणि द्वन्द्वानीति " । - " तच्छ्रुत्वा मारीचच काप्य उवाच- सोम एवं शरीरे श्लेष्मान्तर्गतः कुपिताकुपितः शुभाशुभानि करोति 1 । तद्यथा दाढ्य, शैथिल्यं, उपचयं, कार्य, उत्साह, श्रालस्यं, वृषता, क्लीवता, ज्ञानं, अज्ञानं, मोहं, एवमादीनि चापराणि द्वन्द्वानीति " । ७- " तच्छुत्वा काप्यवचो भगवान् पुनर्वसुरात्रेय उवाच- सर्व एव भवन्तः सम्यगाहु: -अन्यत्रैकान्तिकवचनात् 1 । सर्व एव खलु वात- - 1 पित्त - श्लेष्माणः प्रकृतिभूताः पुरुष-४५५
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श्राद्धविज्ञान मव्यापन्नेन्द्रियं महतोपपादयन्ति । सम्यगेवाचरिता बल - - वर्ण च - सुखोपपन्नमायुषा धर्म्मार्थकामा इव निःश्रेयसेन महतोपपादयन्ति - पुरुषमिह, चामुष्मिंश्च लोके । विकृतास्त्वेनं महता विपर्य्ययेोपपादयन्ति, ऋतवस्त्रय इव विकृतिमापन्ना लोक-मशुभेनोपघातकाले, इति " ( चरकसंहिता - सू ० १२ अ ० | ११,१२,१३ । ) । धातुत्रयी के सम - विषमभाव -धातुयी के साम्य - वैषम्य से क्या लाभ हानि है?, धातुत्रयी के प्रभव, प्रतिष्ठा, योनि, आशय कौन कौन हैं?, किन ऋतुओं में किस धातु का उपचयापचय होता है?, इत्यादि प्रश्न अप्रा-कृत हैं । जिज्ञासुओं की यह जिज्ञासाएँ ' वेदस्य सर्वविद्यानिधानत्त्वम् ' नामक स्वतन्त्र निबन्ध से तार्थ हैं । प्रकृत में हमें इस सम्बन्ध में यही बतलाना है कि, स्थूलभूत प्रपञ्चों के आधारभूत वात - पित्त - श्लेषा - नामक तीन धातु प्राणवायु - प्राणाग्नि- प्राणसोमरूप से शरीर के धारक बन रहे हैं । प्राणात्मकत्त्वेन तीनों हीं धातु शक्तिरूप हैं, अतएव चर्म्मचक्षुओं से, किंवा रूप - रस - गन्ध-स्पर्श - शब्द, इन पाँचों तन्मात्राओं से अतीत हैं । केवल चर्म्मचक्षुओं को ही प्रधानता देने वाले को तो भूतवायु की सत्ता भी स्वीकार नहीं करनी चाहिए । जो चिकित्सक ( डॉक्टर ) चर्म-चक्षुर्म्मर्य्यादातिक्रान्त होने से ही धातुत्रयी की सत्ता में सन्देह करते हैं, अवश्य वे भी शरीर में ' फोर्स ' ( ताकत, बल, शक्ति ) नामक तत्त्व की सत्ता स्वीकार करते हैं । बाह्य कर्म्म ही प्राणसत्तात्मक इस आभ्यन्तर बलसत्ता का अनुमापक है । क्या कोई वैज्ञानिक यन्त्रसहस्रों से भी इस सर्वसम्मत स्वसम्मत फोर्स का आँखों से प्रत्यक्ष कर सकता है? । उदर में पीड़ा है, देखिए अणुवीक्षण यन्त्र से, बतलाइए! दर्द का रंग कैसा है? | उधर आत्मा, परमात्मा, प्राण, बुद्धि, अव्यक्त, आदि शतशः इन्द्रियातीत तत्त्वों की सत्ता स्वीकार करने वाले भारतीय के लिए तो कभी भी ये इन्द्रियातीत तत्त्व सन्दिहान नहीं हैं । क्या मुखविवर की शोभा इस में है कि, हम हर्रे को दस हाथ की बतलाने में भी लज्जा का अनुभव न करें? । अस्तु. ' न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः ' न्याय से आज वे भारतीय तत्त्ववाद का अवश्य ही मनमाना उपहास कर सकते हैं । परन्तु अवश्य ही एक समय आवेगा, जब प्रजा उनसे अपने इस अपमान का उत्तर माँगेगी । एवं निश्चयेन उस समय उन्हें अपनी भ्रान्ति पर पश्चात्ताप प्रकट करना पड़ेगा, जिसके परिशोध के लिए भारतीयों नें पहिले से हो प्राय-श्चित की व्यवस्था कर रक्खी है । पञ्चकोश परिचय -प्रासङ्गिक धातुचर्चा को समाप्त करते हुए स्थूलशरीरानुगत प्रक्रान्त अशुचिभाव की ओर पुनः पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । विषयोपक्रम कर हुए बतलाया गया है कि, पाञ्च-भौतिक स्थूलशरीर अन्नमयकोश है । इस अन्नमयकोश की प्रतिष्ठा प्राणमयकोश माना गया है । " रस, असृकू, मांस, भेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र " इन सात धातुओं की समष्टि अन्न-मयकोश है, एवं प्राणात्मिका धातुत्रयी प्राणमय कोश है । दूसरे शब्दों में सप्तधातु शरीर के स्थूल-४५६