Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 61–70
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 61–70
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प्रजातन्तुवितान
" महाँ असि महिष वृष्णयेभिर्धनस्पृदुग्र सहमानो अन्यान् ।
rat विश्व भुवनस्य राजा स योधया च क्षयया च जनान् " ॥
( ऋक् सं ० ३।४६ २ ) । ऋषि- गन्धर्व देव- पुरुष, इन चारों प्राए- विरोधों के समन्वय से ही पारमेण्ज्य पितृप्राण गोत्र, उदक, पिण्ड, भावत्रयी मैं परिणत हो रहा है । स्वायम्भुव ऋषिप्राणसमन्वय से ऋषिमूलक २१ अङ्गिरा विकास सम्बन्ध से २१ भागों में वितत वही पितृगण ' सगोत्रपितर ' बन रहा है । गन्धर्व - प्राणसमन्वय से ही स्वस्वरूप से १४ विध ' सोदक पितर ' बन रहा है । एवं देव पुरुष प्राणी के समन्वय से वही सप्तसंस्थ अग्निमय बनता हुआ ' सपिएड पितर ' बन रहा है । सपिण्ड पितृसप्तकं सोदक भी हैं, सगोत्र भी हैं । क्योंकि सोदक पितृप्रारण की व्याप्ति २४ प है, सगोत्रपितृप्राण की व्याप्ति २१ पर्यन्त है, जैसा कि पूर्व में वतलाया जा चुका है । फलतः सप्तसंख्याक सपिण्ड पितरों में चतुर्दश संख्याक सोदक पितरों का, तथा एकविशति संख्याक सगोत्र पितरों का, दोनों का उपभोग सिद्ध हो रहा है । दूसरा विभाग ' सोदक पितर ' का है । इसके १४ विभाग हैं । इन चौदह सोदक पितरों का प्रथम सनक तो सपिएड भी है, सोदक भी हैं, सगोत्र भी है, किन्तु दूसरा तक सोदक सगोत्र ही है । तीसरा विभाग ' सगोत्रपिर ' का है, इसके २१ विभाग हैं । इन इक्कीस सगोत्रपितरों का प्रथम सड़क तो सपिण्ड, सोदक, सगोत्र है, दूसरा सप्तक सोदक, सगोत्र है, एवं तीसरा अन्तिम सप्तक विशुद्ध सगोत्र है । उक्त विभाग का ताल यही है कि, सोदक प्रथम सप्तक का, सगोत्र प्रथम सतक का सपिण्ड सप्तक में अन्तर्भाव हो रहा है । सतसपिएड वितर का अर्थ है - ' सप्तसोदक, सप्तसगोत्र पितरप्राणी-वच्छिन्न सप्तसपिण्ड पितर ' । इस से यह भी सिद्ध हो गया कि, सोहक पितरों का क्योंकि प्रथम सप्तक सपिण्ड तक में अन्तर्भाव है. अतः सोदक पितर उदकमर्थ्यादा से सात ही रह जाते हैं, जिनके गर्भ में गोत्र पितर का द्वितीय सप्तक अन्तभूत है । ससोदक पितर का अर्थ होता है - ' द्वितीय-arita as गति द्वितीय सोदक सप्तक ' । यही स्थिति सगोत्र पितरों की समझिए । सगोत्र - का प्रथम सप्तक तो सपिएड सनक में अन्तर्भूत है, मध्यम सनक सोदक के द्वितीय सतक में अन्तभूत है । फलतः विशुद्ध सगोत्र कहने के लिए सगोत्र का तृतीय सप्तक वच रहता है । एवं इस व्यवस्था की दृष्टि से सपिण्ड - सोदक - सगोत्र, तीनों की ७-७-७ संख्या ही अवशिष्ट रह जाती है । आगे आने वाली पिण्डस्वरूपनिरुक्ति में इन सब विषयों का विवेचन होने वाला है । अतः इस प्रासङ्गिक चर्चा को यहीं उपरत किया जाता है । २५
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: lità de सोदकाः १४. सपिण्डाः २१-७-X २०-X १६-३ --- * १८--४ ---- X X १६-२ X १५-१-- X १३-६ ---१२-४-११४-x x x x श्राद्धविज्ञान X - आर्षेयाः X. प्राप्याः x 99 x १०-३-X M ६-२-- X X X X 29 - शुद्धसगोत्राः सप्तपित्तरः ( दिव्या: - नान्दीमुखाः पितरः ) स्वायम्भुवाः १ 99 99 99 - सगोत्रगर्भिताः शुद्ध-सोदकाः सप्तपितरः ( श्रन्तरीच्या: - पार्वणाः पितरः ) पारमेष्ठाः ७-७ - वृद्धातिवृद्धप्रपितामहः X सौम्याः ६ - ६ -- अतिवृद्धप्रपितामहः x x ५ -- ५ - वृद्धप्रपितामहः ४-४-- प्रपितामहः १३-३ - पितामहः २ - २ - पिता १-१ --- प्रेवः X 39 99 x X X X 99 X X X * " X x X X संगोत्रसोदकगर्भिताः सप्त सपिण्डपितरः ( पार्थिवा: - अश्रुमुखाः ) साम्वत्सरिका:
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पितृसहः स्वरूपविज्ञान-प्रजातन्तुवितान प्रजातन्तुवितान से सम्बन्ध रखने वाले अब एक ऐसे तत्त्व की ओर श्राद्धकर्मप्रेमियों का ध्यान आकर्षित किया जाता है, जिसके आधार पर ही आर्ष श्राद्धकर्म्म प्रधानरूप से प्रतिष्ठित है । यही निरूपणीय प्रधान तत्त्व ऋग्वेदपरिभाषानुसार ' सह ' नाम प्रसिद्ध है । सर्वजगदालम्बन, ब्रह्म-कर्ममय, सदसन्मूर्त्ति अव्यय पुरुष की आनन्द - विज्ञान - मनः - प्रारण - वाकू नाम की पाँच कलाएं ' सुप्रसिद्ध हैं । पञ्चकल अव्यय पुरुष के कलात्मक विवर्त्त भाव का ही नाम इदं विश्वं ' है । प्रयास करने पर भी पाँच कलाओं के अतिरिक्त अन्य वस्तुतत्त्व सर्वथा अनुपलब्ध है । पाँच कलाओं की, दूसरे शब्दों में पञ्चकलोपेत अव्ययपुरुष की इसी सर्वाधाररूपा सर्वरूपता का स्पष्टीकरण करते हुए व्यावतार पूर्णेश्वर ( श्रीकृष्ण ) कहते हैं -मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय! मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥ ( श्रीमद्भगवद्गीता ७।७ । ) । इन पाँच अव्ययकलाओं के समन्वय से यह विश्व समष्टि, तथा व्यष्टि, दोनों प्रकार से पञ्चभावात्मक बन रहा है । उदाहरण के लिए व्यष्टि - समर्थक मानवशरीर को ही अपना लक्ष्य बना इए | क्योंकि श्राद्धप्रकरण में श्राद्धकर्मानुगत मानवोदाहरण ही सुसङ्गत माना जायगा । पुरुषसंस्था आनन्द, विज्ञान, मनः, प्राण, अन्न, ये पाँच कोश माने गए हैं । पाँचों में वाङमय अन्नकोश सर्वा-पेक्षया बहिःस्तर है, आनन्दमय कोश सर्वान्तरतम है । आनन्दमयकोश के आधार पर विज्ञानमय-कोश, इसके आधार पर मनोमयकोश, इसके आधार पर प्राणमयकोश, एवं इसके आधार पर अन्न-मयकोश प्रतिष्ठित है । प्रत्यक्षदृष्ट भौतिक पिण्ड ( शरीर ) ही अन्नमयकोश है । दूसरे शब्दों में रसासृङ मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्रात्मक सप्तधातुसमष्टि ही अन्नमयकोश है । एवं विकारक्षरभावानुबन्ध क्षरण क्षण शीर्य्यमाण होने से यह कोश ' शरीर ' नाम से " अथवा तो इतर आत्मविवत्त की आश्रय भूमि होने से शरीर नाम से प्रसिद्ध है । क्षरपरमाणु संघ को एक सूत्र में बद्ध रखने वाला विधर्त्तातत्त्व ही प्राणमयकोश है, जोकि शरीर चेष्टाओं का मूलप्रवर्त्तक माना गया है । प्राणोत्क्रान्ति से उसी प्रकार शारीरधातु श्लथावयव बन जाते हैं, जैसे कालातिक्रम से उत्क्रान्त प्रारणानुगत भृतपिण्ड जीर्ण - शीर्ण बन जाते हैं । क्रियाप्रवर्त्तक प्राण के क्रियाधर्म का मूलालम्बन कामनाप्रवर्त्तक तत्त्वविशेष ही मनोमय कोश है । मानसजगत् में चिच्छक्ति का सञ्चार करने वाला, मनोमयकोश को भृतासक्ति से बचाने चाला चेतनामय तत्त्वविशेष ही विज्ञानमयकोश है । विज्ञान- मनः - प्राण- अन्न, चारों को अपने आका शात्मक भूमाभाग में प्रतिष्ठित रखने वाला, स्वानुग्रह से ग्रन्थिविमोक द्वारा शाश्वत शान्ति प्रदान करने वाला ' रस ' नामक तत्त्व विशेष ही आनन्दमयकोष है । इन पाँचों में से मध्यस्थ मनोमयकोश का दोनों ओर सम्बन्ध है । यही मन विज्ञानानुगत बनता हुआ आनन्दसम्पत्ति के अनुग्रह से ' क बन जाता मुक्तिभावप्रक है, एवं यही मनः प्रारणानुगत बनता हुआ अन्नसम्पत्ति के अनुग्रह से
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श्राद्धविज्ञान सृष्टिभाव - प्रवर्त्तक बन जाता है, जैसाकि - ' मन एव मनुष्याणां कारणं - त्रन्धमोक्षयोः इत्यादि वचन से स्पष्ट है । उक्त पाँचों कोशों में से केवल ' अन्नमय ' कोश की ओर विशेष रूप से पाठकों का ध्यान आकर्षित करना है | अन्नाहुति से उत्पन्न होने वाले रसादि शुक्रान्त सात धातु, ओज, मन, तीनों वित्त का कोश में ही अन्तर्भाव है । त्रिभावापन्न यह अन्नमयकोश प्रारणमय अव्ययकोश पर प्रतिष्ठित है । अन्नरसमय ( तद्गत शुद्ध सोममय ) मन दिव्य धातु है, ऋन्नगत प्रारणात्मक प्रोज आन्तरिक्ष्य धातु है, एवं अन्नगत बागारिका सप्त धातुसमष्टि पार्थिव धातुवर्ग है । दिव्य मन, आन्त-रिक्ष्य ओज, पार्थिव सप्त धातु, तीनों विवत्तों की प्रतिष्ठा अन्न है । बतलाया गया है कि, अन्न की उत्पत्ति में चान्द्रसोम का प्रधान सहयोग है । दूसरे शब्दों मैं चान्द्रसोम ही वृष्टि द्वारा अन्नरूप में परिणत होता है । स्व सोमरस से वृष्टि द्वारा अन्न का उपादान बनने वाले इस सोममय चन्द्रमा के ' रेतः - श्रद्धा - यश: ' नामक तीन मनोता माने गए हैं । जिस तत्त्व के आधार पर जो स्व वरूप में प्रतिष्ठित रहता है, जिस तत्त्व का ह्रद्य मन स्वस्वरूपरक्षा के लिए जिस तत्त्व को आश्रय बनाता है, वह आश्रय ही ' मनांसि - श्रोतानि ' निर्वाचन से ' मनोता ' कहलाया है । चन्द्रमा का स्वरूप उक्त चीन तत्त्वों के आश्रय से ही प्रतिष्ठित है | तीनों के उत्क्रान्त हो जाने पर चन्द्रमा का कोई स्वरूप नहीं बच रहता, अतएव इन्हें हम अवश्य हो ' चन्द्र-मनोता ' कह सकते हैं । सिद्ध विषय है कि, चान्द्ररस इन तीनों मनोता - रसों से नित्य संश्लिष्ट होकर ही अन्न का उत्पादक बनता है । फलतः उत्पन्न अन्न में भी इन तीनों का समन्वय सिद्ध हो जाता है । उत्पन्न अन्न में चान्द्ररसानुगृहीता मनोत्रयी प्रतिष्ठित है । उधर उत्पन्न अन्न में पार्थिव - श्रन्तरिक्ष्य -दिव्य, तीनों धातु प्रतिष्ठित बतलाये गए हैं, एवं इन्हें क्रमशः सप्तधातुसमष्टि, प्रोज, मन, नामों से व्यवहृत किया गया है । चन्द्ररस द्वारा छान्न में भुक्त रेत: - यश - श्रद्धा, इन तीन मनोता रसों का क्रमशः शुक्र - योज - मन के साथ सम्बन्ध होता है । रेतोभाव शुक्र की प्रतिष्ठा बनता है, यशोभाक आज की प्रतिष्ठा बनता है, एवं श्रद्धात्तत्त्व मन का श्रालम्बन वनता है । श्रद्धा मन से होती है, यश ओजस्वी को मिलता है, रेतःप्रजाति शुक्र पर अवलम्बित है । इस प्रकार चान्द्ररस द्वारा अन्न में मुक्त मनोतात्रय इस क्रम से विभक्त होरहे हैं-रेतः ( पार्थिवशुक्रधात्वनुगतः ) - -ततो रेतः प्रजापतिः यश. ( आन्तरिक्ष्यत्रो धात्वनुगतः ) - ततो यशस्विता श्रद्धा ( दिव्यमनो धात्वनुगतः ) - - ततः श्रद्धोदयः २८ - चान्द्रमनोताविवर्त्तम्
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Y प्रजातन्तुवितान उक्त तीनों चान्द्र मनोताओं में से प्रकृत में शुक्रधातु से सम्बन्ध रखने वाला ' रेतः ' नामक प्रथम मनोता ही हमारे ' सह ' तत्त्व की प्रतिष्ठा है, जिसका निरूपण प्रक्रान्त है । चन्द्ररस का स्वा भाविक आकर्षण रेतोमय शुक्र के साथ नित्य सुरक्षित है, एवं इसका कारण एकमात्र सजातीयानु-बन्ध है | चान्द्ररस वृष्टिरूप में परिणत हुआ, वृष्टि अन्नरूप में परिणत हुई, मुक्तान्न शुक्ररूप में परि-रगत हुआ । इस प्रकार परम्परया अन्नद्वारा चान्द्रपितृतत्त्व शुक्र में प्रतिष्ठित हो गया, जिसेकि हमने पूर्व में भूतसंपरिष्वक्त ' महानात्मा ' कहा है, जोकि कम्मात्मोत्क्रान्ति पर ' प्रेतात्मा ' नाम से प्रसिद्ध होता हुआ उसी आगमन पथ से स्वप्रभव चन्द्रलोक में जाकर १३ मासानन्तर सापिङप्रभाव को प्राप्त होजाता है । जिस प्रकार इरारसमय पार्थिव कम्र्मात्मा परम्परया, साक्षात् रूप से दो प्रकार से अध्यात्म-संस्था में प्रतिष्ठित होता है, जिन दोनों रूपों का पूर्व में ' कम्मरमा ( प्रपद्वारा प्रविष्ट ) प्रतिष्ठात्मा ' ..नामों से विस्तार से निरूपण किया जाचुका है, एवमेव चान्द्ररेतोरसमय महानात्मा भी परम्परया, साक्षातूरूप से, दो प्रकार से ही शुक्र में प्रतिष्ठित होता है । परम्परया शुक्र में प्रतिष्ठित होने वाले ' पितृप्राणमूर्त्ति महानात्मा का अथातो ' रेतसः सृष्टि: ' रूपसे पूर्व में निरूपण किया जाचुका है । अन्नद्वारा परम्परया आगत यह चान्द्र महान कम्र्मानुसारिणी योनि का प्रदाता बनता है । इसी पर-म्परा सिद्ध योनिभावप्रवर्त्ती के चान्द्र महानात्मा के आगमन का रहस्य बतलाते हुए महर्षि कौषीतकि ने कहा है-" स्वर्गस्य लोकस्य द्वारं - यच्चन्द्रमाः । तं यः प्रत्याह - तमतिसृजते । अथ यः एनं न प्रत्याह- तमिह वृष्टिभूत्वा वर्षति । स इह कीटो वा, पतङ्गो चा, शकुनिर्वा, शादुलो वा, सिंहोबा, मत्स्यो वा, परश्वा वा, पुरुषो वा, अन्यो वा एतेषु स्था-नेषु प्रत्याजायते - यथाकर्म्स, बथाविद्यम् " - कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषत् शरा हमारे सम्मुख वह पितृप्रारण आता है, जोकि चान्द्रनाड़ी के द्वारा साक्षात् रूप से शु मैं वहाँ प्रतिष्ठित हुआ करता है, एवं साक्षात् रूप से प्रगत जिस पितृप्राण को हम ' सहः ' नाम से चिभूषित करने वाले हैं । जिस नक्षत्र में प्राणी का जन्म होता है, जन्मानन्तर उसी नक्षत्रप्रणाली को उपक्रम बनाकर वह चान्द्र पितृप्राण प्राणी के शुक्र में साक्षान रूप से आने लगता है । चन्द्ररस चिशुद्धरूप से न आकर नातत्रिक रसों से संपरिवक्त होकर ही आता है । जिस तिथि में चन्द्रमा का जिस नक्षत्र के साथ योग होता है, उस तिथि में वह चन्द्रमा उसी नक्षत्र के नाम से व्यवहत होता है । कारण इस नक्षत्रव्यवहार का यहीं है कि, उस तिथि में उस तिथिका चन्द्रर उस तिथि के नाक्षत्रिक रस से संश्लिष्ट रहता है । अश्विनी का चन्द्रमा, भरणी का चन्द्रमा, कृत्तिका का चन्द्रमा, इत्यादि लोकव्यवहारों का अर्थ है अश्विनी प्राणात्मक चन्द्रमा, I
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श्राद्धविज्ञान भरणी प्राणात्मक चन्द्रमा, कृत्तिकाप्रारणात्मक चन्द्रमा । इस नाक्षत्रिक स्थिति को सामने रखते हुए ही हमें चान्द्र सागमन की मीमांसा करनी है । कल्पना कर लीजिये - आज भूपिण्ड पर खगोलीय अश्विनी नक्षत्र का भोग हो रहा है, एवं सम्बन्ध से चन्द्रमा भी तद्रसप्रधान बनता हुआ ' अश्विनी का चन्द्रमा ' कहला रहा है । इस प्राकृतिक स्थिति चन्द्राड़ी के द्वारा समानाकर्षण के आधार पर शुक्र में जो चान्द्ररस श्रावेगा, वह भी अश्विनी -नक्षत्रप्राणप्रधान ही माना जायगा । अश्विनी प्राणसम्पृक्त चान्द्ररस आता है अवश्य, परन्तु दिन में नहीं, अपितु रात्रि में । ' एष वै सोमो राजा देवानामन्नं यच्चन्द्रमा: ' ( शत ० १ | ६ | ४ | ५ ) इस श्रौतसिद्धान्त के अनुसार चान्द्ररस इन्द्राग्मिय सौर प्रारणदेवताओं का अन्न है । सूर्योदय से सूर्यास्त पर्यन्त जितनी भी चान्द्ररसमात्रा प्रवर्ग्यरूप से भूपिण्ड की ओर आती है, उसे सूर्यरश्मिगत प्राणदेवता अपने उदर में प्रतिष्टित कर लेते हैं । जो सौर प्रारण रश्मियों के द्वारा पार्थिव द्रुत रसों तक का आदान कर लेते हैं, वे भला आन्तरिक्ष्य स्वान्नभूत चान्द्ररस को कैसे छोड़ सकते हैं । इसी रसादान से तो ये प्राणदेवता ' आददाना ' बनते हुए ' आदित्य ' नाम से प्रसिद्ध हो रहे हैं । सौरसावित्राग्नि, सौरमघवेन्द्र, दोनों हीं चान्द्रसोमान्न के लिये ' अन्ना ' हैं । इन प्रबल अन्नादों की सत्ता से आक्रान्त अहः काल ही सोमागमन का निरोधक बन रहा है । रात्रि में सूर्यास्त से सूर्योदय पहिले पहिले दोनों हीं अन्नाद सुप्त हैं । अतएव पार्थिव-प्रजा में रात्रि में ही चान्द्र रस आने पाता है । सोमदात्री रात्रि इसी सोमभाव के सम्बन्ध से ' सौम्या ' कहलाई है | हां, तो अब रात्रि में चान्द्ररस का आगमन आरम्भ होता है । सायंकाल से आगमन आरम्भ हुआ, सूर्योदय से पहिले पहिले आगमन प्रक्रान्त रहा, सूर्योदय पर आगमन द्वार बंद हो गया । इस अश्विनीनक्षत्रप्राणात्मक चन्द्रमा का जो रस रात भर आया, वह शुक्र में प्रतिष्ठित हो गया । दिन भर के सावित्राग्नि ने शुक्रस्थ चान्द्ररस का परिपाक किया । प्रातः सूर्योदय से जो पाकक्रिया आरम्भ . हुई, उसने सायं सूर्यास्त पर्यन्त उस चान्द्ररस को घनता में परिणत कर डाला । इसी घनत्व को लक्ष्य में रख कर ऋषियों ने शुक्रस्थ इस चान्द्ररस को ' पिण्ड ' नाम से व्यवहृत किया है । दूसरे दिन भरणी नक्षत्र का प्रवेश होता है, फलतः चान्द्ररस भरणीरस से संश्लिष्ट हो जाता है । रात्रि में पुनः एतन्नक्षत्ररसयुक्त चान्द्ररस का आगमन होने लगता है । रात्र्यनन्तर इसका भी अहः काल में परिपाक होता है, एवं यह भी एक स्वतन्त्र पिण्ड बन जाता है । प्रथम रात्रि में आगत चान्द्ररस क्योंकि दिन की गरमी से घन बन जाता है, अतएव द्वितीय रात्रि में आगत चान्द्ररस इस प्रथम पिण्ड से न मिल कर एक स्वतन्त्र पिण्ड रूप में ही परिणत होता है । अश्विन्यादि नक्षत्र = मानें गए हैं । नक्षत्र भेद से २८ दिन के चान्द्रमास में २८ चान्द्ररात्रियों में २८ बार चान्द्ररस का आगमन होता है, एवं शुक्र में इन २८ चान्द्ररसों के २८ पिएड बन जाते हैं । जो चान्द्र सौम्यरस शुक्र में एक रात्रि में आता है, उसे हम थोड़ी देर के लिए पिण्ड न कहकर ३०
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प्रजातन्तुवितान ' तन्दुल ' कहेंगे । जिस प्रकार अनेक तन्दुलों की समष्टि से एक पिण्ड बनता है, एवमेव २८ नाक्षत्रिक चान्द्ररात्रियों के तन्दुलस्थानीय २८ घनरसों की समष्टि से एक स्थूल पिण्ड का स्वरूप निष्पन्न होता है । चान्द्रमास के सम्बन्ध से २८ कल यही शुक्रपिण्ड ' मासिकपिण्ड ' नाम से व्यवहृत हुआ है । अष्टाविंशतिकलं एक मासिक पिण्ड एक चान्द्रमास का धन है । चान्द्र सम्बत्सर में ऐसे १३ मास हैं । फलतः त्रयोदशमासात्मक एक चान्द्रसम्बत्सर में शुक्र में १३ मासिक पिण्ड प्रतिष्ठित हो जाते हैं । इन तेरह मासिक पिण्डों के अतिरिक्त उत्तरायण, दक्षिणायन, भेद से दो चान्द्रपिण्ड और उत्पन्न होते हैं, एवं एक पिएड समष्टि रूप से पूरे सम्वत्सर में उत्पन्न होता है । वस्तुतस्तु पिण्ड केवल १३ ही हैं । मास भेद से जहाँ ये १३ हैं, वहां अयनभेद से तेरहों को दो भागों में विभक्त देखा जा सकता है, एवं पूर्ण सम्वत्सर की दृष्टि से एक ही भाग में देखा जा सकता है । मासिक, आयनिक, साम्वत्सरिक, तीनों ही अवस्थाएँ श्राद्धकर्म में गृहीत हैं । अतएव १३ मासिक, २ - आयनिक, १ - साम्वत्सरिक, इस दृष्टि से ' षोडशश्राद्ध ' विहित हुए हैं, जैसा कि आगे चलकर विस्तार से बतलाया जाने वाला है । यदि ओर भी सूक्ष्म दृष्टि से विचार किया जाता है, तो केवल २८ कल एक मासिक पिण्ड पर ही उक्त १६ पिण्डों का पर्यवसान मानना पड़ता है । मासिक पिण्ड ही मूलधन है । यह ऋणभाव में परिणत होता रहता है, पूर्ति के लिए पुनः धनभाव का आगमन होता है । इस धारा-वाहिक आदान - विसर्ग क्रम से २८ का ही परिवर्तन होता रहता है । २८ कल पिण्ड सदा शुक्र में प्रतिष्ठित रहता है, एवं यही " बीजी " नामक मूलधन है, जैसा कि अनुपद में ही स्पष्ट होने वाला है ।. ** २८ - घनभावापन्नाः सोमकला: --मूलधनम् १३ - मासिकाः, अष्टाविंशतिक तोपेताः पिण्डाः २ -- षाएमासिकः, ६॥ पिण्डात्मकौ पिण्डौं तू तरूपाणि १ - त्रयोदशमासात्मकः साम्वत्सरिकः पिण्डः नक्षत्रप्राणसंयुक्त जो चान्द्ररस शुक्र में प्रतिष्ठित होता है, वही ' सहः ' नाम से प्रसिद्ध है । शुक्रस्थ इसी सहःपिण्ड के प्रभाव से शरीर में ' साहस ' वृत्ति का उदय होता है । यह सहः पिण्ड पितृ-प्राणमय बनता हुआ तत्प्रधान है । जिस व्यक्ति की अध्यात्मसंस्था में यह सहोमूर्त्ति पितरप्रारण विकसित रहता है, उसके शरीर में एक प्रकार की स्फूर्ति रहती है । ऐसे व्यक्ति को आलस्य सर्वथा-प्रणम्य मानता है । ऐसा साहसी दुस्तर कर्म्म प्रवृत्ति में भी संकोच नहीं करता । ठीक इसके ३१
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श्राद्धविज्ञान विपरीत जिस व्यक्ति का यह सहोभाग शिथिल रहता है, किंवा मूच्छित रहता है, आलस्य देवता साहस पूर्वक इसका आतिथ्य स्वीकार कर लेते हैं । मुख पर मक्षिकासंघ का साम्राज्य रहता है, शरीर गिरा पड़ा रहता है, किसी काम में मनोयोग नहीं हो पाता । उत्साह एकान्ततः विलीन रहता है । सर्वत्र निराशा ही सम्मुख खड़ी रहती है । शुक्रस्थ पितरप्राण, न केवल पितृप्रारण ( जन्मदाता पिता का ऋणरूप पित्र्यंश ) ही मूति रहता, अपितु पितामहादि का भाग भी मूच्छित रहता है । शुक्र में प्रतिष्ठित ६ पीढ़ियों के प्रवर्ग्य भाग शिथिल बने रहते हैं ऐसे व्यक्ति की इसी स्थिति के स्पष्टी-करण के लिए प्रान्तीय किंवदन्ती प्रचलित है कि - " अमुक व्यक्ति को अमुक कर्म में क्यों नियुक्त किया गया । इसका हतप्रभ हंत श्री मुख कह रहा है कि, यह अमुक कम्र्म न कर सकेगा, इसके तो बापदादे से मर रहे हैं " । सचमुच इसके वाप - दादे ( पितरप्राण संघ ) मूच्छित हैं । ९ भर्ग:, मह:, यशः, ओजः, ऊ, वर्चस्, सहः, आदि भेद से बलतत्त्व अनेक श्रेणियों में विभक्त माना गया है । इन सब बलों में से प्रकृत में चान्द्रप्रभव ' सहोबल ' नामक बलविशेष ही लक्ष्य है । सूर्य - चन्द्रमा पृथिवी, तीनों प्रधानतः प्रजासृष्टि के आरम्भक माने गए हैं । ये निर्माता अपने प्रवर्ग्य भाग से ही अपने निर्माण कर्म में समर्थ होते हैं, जैसा कि ' उच्छिष्टाञ्जज्ञिरे सर्वम् ' ( अथर्व संहिता ) इत्यादि अथर्व सिद्धान्त से प्रमाणित है । इन का यह प्रवर्ग्य भाग अन्तर्याम, बहिर्य्याम, भेद से दो प्रकार से स्वसर्गों में प्रविष्ट होता है । पृथिवी को ही लीजिए । पार्थिव यसका अन्तम रूप कर्मात्मा ' ' है, जो अन्न द्वारा परम्परया औपपातिक रूप से आता है । एवं प्रपद से प्रविष्ट होने वाला पार्थिव इरामय रस साक्षात् रूप से आता हुआ वहिर्य्याम रूप से प्रतिष्ठित होता है, जो कि ' प्रतिष्ठात्मा ' नाम से प्रसिद्ध है । सौरतत्त्व अन्तय्यम सम्बन्ध से प्रविष्ट होकर आध्यात्मिक प्राणदेवता, बुद्धिरूप में परिणत होता है, जिस बुद्धि को हमने सौर हिरण्मय ' क्षेत्रज्ञ ' ( विज्ञानात्मा ) नाम से व्यवहृत किया है बहिय्यम सम्बन्ध से प्रविष्ट वही सौरव कर्म्मबल प्रदान करता है, चर्म्मगत दोषाणुओं का संहार करता है, जिसे कि हम ' ज्योति ' कह सब तें हैं । एवमेव चान्द्ररस अन्तर्यामि सम्बन्ध से अन्नद्वारा अध्यात्म में प्रविष्ट होता हुआ शुक्र- प्रोज-मन का निर्मापक बनता है, स्व पितृभाग से शुक्रस्थ ' महानात्मा ' का स्वरूप सम्पादक बनता है । बहिर्य्याम सम्बन्ध से आगत वही चान्द्ररस साक्षातरूपेण मनोजगत् के आह्लाद का कारण बनता है, एवं शुक्रस्थित महानात्मा में स्वपितृप्राण प्रदान द्वारा अष्टाविंशतिकल सह पिण्ड उत्पन्न करता है । इस प्रकार परम्परया अन्तर्यामि सम्बन्ध से, साक्षात् रूपेण बहिर्य्यामि सम्बन्ध से तीनों दो दो भावों से हमारी अध्यात्मसंस्था में प्रविष्ट रहते हैं, जैसा कि परिलेख से स्पष्ट हो रहा है -30
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प्रजातन्तुवितान १ - क्षेत्रज्ञात्मा ( परम्परया आगतः - सौरतत्त्वः ) - - अन्तर्वामसम्बन्धी २ – ज्योतिर्भावः ( साक्षाद्रपरेण आगतः-* --- बहिर्यामसम्बन्धी - सूर्य: .१ - महानात्मा ( परम्परया आगतः - चान्द्रतत्त्वः ) -- अन्तर्यमसम्बन्धी चन्द्रमाः २ - सहः पिण्डः ( साक्षाद्र पेण- श्रागत: - ) -- बहियमसम्बन्धी * १ - कम्र्मात्मा ( परम्परया आगतः - पार्थिवतत्त्वः ) - - - अन्तर्यामसम्बन्धी. २- प्रतिष्ठात्मा ( साक्षाद्र पेण- - आागत.- ): * सहस्तव के कादि चार पिण्ड -- वहियमसम्बन्धी - पृथिवी ' पितणां पितरोपनिषत् ' नामक प्रकरण में यह स्पष्ट किया गया है कि, सौरसंस्था में इन्द्र, धाता, भग, पूषा, आदि १२ प्राण प्रतिष्ठित हैं । इनमें से इन्द्रप्रमुख कतिपय आदित्यप्राण ' सोमपा ' हैं, सोमपान इन का प्रातिश्विक धर्म है । रात्रि में अन्यान्य असोमपा आदित्यप्राणों के विद्यमान होते हुए भी इन्द्रप्रमुख सोमपा प्राणों का अभाव रहता है । अतः रात्रि में उपर्युक्त सहोमूर्त्ति चन्द्रसोम का निर्विघ्न आगमन हो जाता है, जैसाकि पूर्व में स्पष्ट किया जाचुका है । रात्रिकाल में शुक्र में आगत यह एक दिन ( एक रात ) का, अतएव ' आह्निक ' नाम से व्यवहृत सहभाग अ रग्निके, तथा शारीराग्नि के परिपाक से धनभाव में परिरंगत हो जाता है । इसी आह्निक पिण्ड को वैज्ञानिकों ने- ' तन्दुल ' नाम से किया है । व्यवहृत सभी ओषधियों का निर्माण चान्द्रसोम से हुआ है, यह निःसंदिग्ध विषय है । परन्तु सभी ओषधियों का यह चान्द्रसोम आन्तरिक्ष्य वायुमत सोमपा मरुत्त्वानिन्द्र के द्वारा आंशिकरूप से उत्क्रान्त हो जाता है । मरुत्त्वानिन्द्र के अतिरिक्त सौररश्मिगत मघवेन्द्र भी इस कर्म में अपना हस्तक्षेप करते रहते हैं । फलतः ओषधियों में आगत चान्द्ररस परिपूर्ण न रहकर ' दत्त ' ( अपूर्ण ) बना रहता है । सभी औषधियाँ इस रसमात्रा की विच्युति ' क्षत ' हैं । ओषधियों में केवल तन्दुल ही एक ऐसी ओषधि है, जिसकी सोममात्रा इन्द्र नहीं ले सकते । कारण इसका यही है कि, पूर्वदिशा के लोक-पाल इन्द्र हैं, पश्चिम दिशा के लोकपाल वरुण हैं । इन्द्रज्योति के अधिष्ठाता हैं, वरुण अप-३३
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श्राद्धविज्ञान तत्त्व के अधिष्ठाता हैं । इन्हीं विरुद्ध धम्म के कारण दोनों में अश्वमाहिष्य है, सहज वैर है । विशुद्ध वरुणसाम्राज्य में इन्द्र का प्रवेश निषिद्ध है, विशुद्ध इन्द्र के साम्राज्य में वरुरण का प्रवेश निषिद्ध है । वायु में मरुत्त्वानिन्द्र रहता है । यही कारण है कि, जहाँ वायु का आत्यन्तिकरूप से भाव रहता है, वहाँ तत्प्रतिद्वन्द्वी वरुण का प्रवेश सहज वन जाता है, जैसाकि यह वातो नाभिवाति, तत्सर्वं वरुणदैवत्यम् " इत्यादि निगम से प्रमाणित है । चाँवल की खेती अपूप्रधाना है! जलाधिक्य ही चाँवल की उत्पत्ति का कारण है । पानी में इन्द्रविरोधी प्राण का प्रभुत्त्व है । अत-एव जलाधिक्य से प्रबल बने हुए वारुणक्षेत्र में इन्द्रप्रवेश अवरुद्ध है । सोम, तथा अप्तत्त्व, दोनों सजातीय हैं । अतएव अपप्रधानता से चावलों में सोममात्रा को स्वविकास की ओर भी अधिक सुविधा मिल जाती है । इस प्रकार वरुणप्राधान्य से चाँवल की सोममात्रा सर्वथा ' अक्षत ' रह जाती है । इसी रहस्य को सूचित करने के लिए वैज्ञानिकों ने इसे ' अक्षत ' नाम से कहना अर्थ समझा है । सोम से ही ओषधियों का आप्यायन होता है । इधर अक्षतों में इसका पूर्ण विकास है । यही कारण है कि, इतर ओषधियों की तुलना में चावल की खेती स्वल्पसमय में ही सम्पन्न हो-जाती है । प्रसङ्गोपात्त यह भी जान लीजिये कि, एकादशी विष्णुदेवता - प्रधाना तिथि है । विष्णुतत्त्व का उस आपोमय परमेष्ठी से सम्बन्ध • है, जिसमें – ' तृतीयस्यां वै इतो दिवि सोम आसीत् ' के अनुसार सोम की प्रतिष्ठा मानी गई है । इसी सोम - सम्बन्ध से विष्णुदेवता ' सोमवंशी ' माने गए.. हैं | एकादशी तिथि विष्णु उपासना का प्रधान काल है । मानस - धरातल पर विष्णुतत्त्व प्रकृत्या भी प्रतिष्ठित रहता है, उपवास प्रक्रिया द्वारा भी इसे आत्मसात् किया जाता है । मन सोममय है, इसमें सोममय विष्णुप्रारण ही आ रहा है । ऐसी दशा में यदि एकादशी को चावल खाए जायँगे, तो मनका आयतन परिपूर्ण हो जायगा । विष्णु प्रवेश के लिए स्थान ही न रहेगा । हम प्रकृतिप्रदत्त वैष्णवतत्त्वागमन से वश्चित न रहें, एकमात्र इसी उद्देश्य से एकादशी को चाँवल का भोजा एकान्ततः निषिद्ध माना लिया गया है । इस प्रासङ्गिक चर्चा को समाप्त करते हुए अन्त में हमें यही कहना है कि, अक्षत क्योंकि सचमुच अक्षत, सोम है, उधर ' पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति ' के अनुसार पुरुषोत्पादक शुक्र अप्रधान, अतएव वरुणप्रधान है । तएव इसमें सहोरूप से प्रतिष्ठित चान्द्ररस भी इन्द्र-प्रवेशाभाव से अक्षत बना रहता है । अतएव इसे ' तन्दुल ' - किंवा ' अक्षत ' नाम से व्यवहृत करना समीचीन होता है । अष्टाविंशतिकल आह्निक सहः पिण्ड का मासिक पिण्ड में अन्तर्भाव है । इस दृष्टि से १३ मासिक, २ - षाएमासिक, १ - साम्वत्सरिक, भेद से कुल १६ पिण्ड हो जाते हैं, जैसा कि पूर्व में स्पष्ट किया जा चुका है-३४