Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 521–530

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 521–530

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शौचविज्ञानोपनिषत धातु हैं, एवं त्रिधातु सूक्ष्मधातु हैं । इन सूक्ष्म धातुओं की ( प्राणमयकोश की ) प्रतिष्ठा मनोमय कोश है, जिसे अपनी परिभाषा में हम ' अन्तरात्मा ' ( कर्मात्मा ) कह सकते हैं । अथवा कह लीजिए कि, विज्ञानमयकोश अव्यक्त यज्ञ - महद्गर्भित बनता हुआ वैश्वानर - तैजस - प्राज्ञमूर्त्ति यो अन्तरात्मा का कारणशरीर है, विज्ञान- प्रज्ञानमनमनोमयकोशगर्भित प्राणमयकोश ( धातुत्रयी ) इसी अन्तरात्मा का सूक्ष्मशरीर है, एवं पार्थिवमयग्निचितिलक्षण अन्नमयकोश ( सप्तधातु ) श्रन्तरात्मा का स्थूलशरीर है । इस प्रकार ' विज्ञान- मन - प्राण - अन्न ' इन चार कोशों में अन्तरात्मा की शरीरत्रयी भुक्त है । सर्वाधार निराकार - गगनाकार - सर्वान्तरतम आनन्दकोश निर्विशेषलक्षण विशुद्ध आत्मा है । इस प्रकार पञ्चकोशदृष्टि से भी प्रतिज्ञात आत्मविवत्तों का समन्वय किया जा सकता है । १ १२- श्रानन्दमयकोशः " रसो वै सः " विशुद्ध श्रात्मा I २ - विज्ञानमयकोश: श्रव्यक्त - यज्ञ - महदवच्छिन्नः अन्तरात्मनः कारणशरीरम्. अन्तरात्मा ३- मनोमयकोशः विज्ञानप्रज्ञानावच्छिन्नः अन्तरात्मनः सूक्ष्मशरीरम ४- प्राणमय कोश: स्तौम्य प्रारणत्रयावच्छिन्नः ४ - कोशः पार्थिवभूतानि अन्तरात्मनः स्थूलशरीरम् } शरीरात्मा. चिकित्साशास्त्री के तीन चिकित्सा प्रकार --उक्त कोशमीमांसा से हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि, श्रानन्दर सैकधन विशुद्ध धात्मा को छोड़ कर शेष चारों कोश परस्पर सम्बद्ध हैं । चारों कोशों में उक्त क्रम से समन्वित शरीरत्रयी का परस्पर निष्ठ सम्बन्ध है । जब तक कारणशरीरावच्छिन्न अन्तरात्मा शरीर में प्रतिष्ठित है, तभी तक सूक्ष्मशरीरलक्षण मनोमय, तथा प्राणमयकोश स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित है । एवं जब तक सूक्ष्म-शरीर प्रतिष्ठित है, तभी तक स्थूलशरीर की स्वरूपरक्षा है । ठीक इसी भाँति स्थूलशरीर का स्वास्थ्य सूक्ष्मशरीर के स्वास्थ्य का कारण है, एवं सूक्ष्मशरीरोपलक्षित मनोराज्य की शान्ति कारण-शरीरोपलक्षित अन्तरात्मशान्ति की मूल प्रतिष्ठा है । तीनों में परस्पर उपकार्य - उपकारक सम्बन्ध हैं, यही इनका त्रिदण्डलक्षण त्रिस्थात्त्व है । एकमात्र इसी आधार पर स्थूलशरीर को अपनी ४५७

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श्राद्धविज्ञान चिकित्सा का प्रधान लक्ष्य बनाने वाले आयुर्वेदशास्त्र ने अन्तरात्मगत ' चेतना ' को शरीर का धातु है | चेतनायुक्त अन्नरसमय शरीर ही आयुर्वेद का ' चिकित्सापुरुष ' है । निम्नलिखित वचन स्पष्ट ही यह प्रमाणित कर रहे हैं कि, हमारा लक्ष्य यद्यपि स्थूलशरीर है, तथापि क्योंकि यह इतर दोनों शरीरों से अविनाभूत है । अतः तद्युक्त शरीर ही चिकित्स्य है । स्थूल शरीर कि चिकित्सा करते हुए प्रत्येक दशा में दोनों संस्थाओं की प्राकृतिक स्थिति को लक्ष्य बनाना अनिवार्य है -१– “ यतोऽभिहितं पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः ' पुरुषः ' इति । स एव कर्म्मपुरुषः ( कर्म्मा-त्मा ) चिकित्साधिकृतः " ( शु ० सा ० १ ) । २ - ' षड्धातवः समुदिताः ' पुरुष ' इति शब्दं लभन्ते । तद्यथा - पृथिव्यापस्तेजोवायुराकाशं ब्रह्म चाव्यक्तमित्येत एव - षड्धातवः समुदिताः ' पुरुष ' इति शब्दं लभन्ते " ( चरक ० शा ० ५। ) । ३- “ खादयश्चेतनाषष्ठा धातत्रः पुरुषः स्मृतः " ( चरक ० शा ० १1 ) । कारणशरीरोपलक्षित अव्यक्त - यज्ञ - महनमूत्ति अन्तरात्मा, सूक्ष्मशरीरोपलक्षित विज्ञान- प्रज्ञान-` धातुत्रयीलक्षण अन्तरात्मा, इन दोनों को अपनी प्रतिष्ठा बनाने वाला, दोनों से नित्य युक्त स्थूलशरीर की चिकित्सा ' आयुर्वेदशास्त्र ' करता है, यही पहिली ' कायचिकित्सा ' है । वात - पित्त - श्लेष्मा नाम की धातु ही इस चिकित्साकर्म की मूल प्रतिष्ठा हैं, जैसा कि निम्नलिखित वचन से प्रमाणित है-१ - विकारो धातुवैषभ्यं साम्यं प्रकृतिरुच्यते । सुखसंज्ञकमारोग्यं विकारो दुःखमेव च ॥ ( चरक सू ० ६। ) । २- याभिः क्रियाभिर्जायन्ते शरीरे धातवः समाः । सा चिकित्सा विकाराणां कर्म तद् भिषजां मतम् ॥ ( चरक सू ० १६ । ) । सूक्ष्मशरीर दूसरी लक्ष्यभूमि है, इसे ही ' सत्त्व ' भी कहा गया है । सत्त्व, रज, तम, नामक तीन धातु इस शरीर की मूलप्रतिष्ठा माने गए हैं । सत्त्वलक्षण सूक्ष्मशरीर को भगवान् व्यास ने सप्तदश-राशि से युक्त माना है । ५ ज्ञानेन्द्रियवर्ग, ५ कम्र्मेन्द्रियवर्ग, ५ प्राण, मन ( प्रज्ञान ), बुद्धि ( विज्ञान ), १७ कलाओं से युक्त प्राज्ञ - वैश्वानरगर्भित तैजस आत्मा ही ' सत्त्वात्मा है, जैसा कि निम्न लिखित

वचन से प्रमाणित है ।

सप्तदशकेनापि राशिना युज्यते पुनः ॥

-- महाभारत ४५८

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' आशौच विज्ञानोपनिषत् शरीराकृति प्रसादगुण से युक्त रहती है । एवमेव शरीराघात मानससंस्था को क्लान्त कर देता है । स्वस्थ शरीर मनःशान्ति का कारण बनता है । इस प्रकार यद्यपि आत्मा - शव - शरीर, तीनों का परस्पर उपककार्य्य - उपकारकसम्बन्ध है, तथापि इस सम्बन्ध में यह स्मरण रखना चाहिए कि, तीनों में पूर्व पूर्व संस्थाओं का विशेष महत्त्व है । स्थूलशरीर गौण है, सूक्ष्मशरीर प्रधान है, कारणशरीर सर्वप्रधान है । जो कर्म - द्रव्य - भोग्यादि स्थूलशरीर के उपकारक, किन्तु सत्त्व, आत्मा के पकारक हैं, वे त्याज्य हैं । जो भोग्यादि सूक्ष्मशरीर के उपकारक, किन्तु आत्मा के अपकारक हैं, त्याज्य हैं । इस दृष्टि से श्रात्मक्षेत्र ही प्रधान लक्ष्य बन रहा है । भारतीय शास्त्र इसी लक्ष्य को प्रधान बना कर प्रवृत्त हुए हैं । १ - अव्यक्त - यज्ञ - गर्भितः - प्राज्ञप्रधानः कर्मात्मा-- - आत्मा ( कारणशरीरम् ) । २ - महद् - विज्ञान- प्रज्ञान गर्भितः - तैजसप्रधानः कर्मात्मा - सच्चम् ( सूक्ष्मशरीरम् ) । ३ - त्रिधातु - सप्तधातुगर्भितः - वैश्वानर प्रधानः कम्र्मात्मा- - शरीरम् ( स्थूलशरीरम् ) । ( १ ) १ विद्या ( १ ) २ - काम: - श्रात्मा - दर्शनशास्त्रलक्ष्यः ( १ ) ३ – कर्म्म ( २ ) १ - सत्त्वम् ( २ ) २ -- रजः ( २ ) ३ -- तमः - सच्चम् - धर्मशास्त्रलक्ष्यम् - " श्रात्मा - सत्त्वं शरीरञ्च त्रयमेतत् त्रिदण्डवत् " ( ३ ) १ - वातः ( ३ ) २ -- पित्तम् - शरीरम् - आयुर्वेदशास्त्रलक्ष्यम् ) ( ३ ) ३ -- श्लेष्मा * * - इन सब विषयों का विशद वैज्ञानिक विवेचन गीताविज्ञानभाष्यभूमिका अन्तरङ्गपरीक्षात्मक ' द्वितीयखण्ड ' ग ' विभाग के कर्मतन्त्र का वर्गीकरण ' नामक प्रकरण में देखना चाहिए । ४६१

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स्थूलशरीर के अशुचिभाव -श्राद्धविज्ञान स्थूलशरीर से सम्बन्ध रखने वाले अशुचिभाव की मीमांसा के उपक्रम में शरीरत्रयी का दिग्-दर्शन कराना पड़ा । अब तत्सम्बन्धी ( स्थूलशरीरसम्बन्धी ) अशुचिभाव की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । जड़चेतनात्मक यच्चयावत् पदार्थों में एक स्वाभाविक विस्रसन - प्रक्रिया होती . रहती है | यही विस्रस्ति एक प्रकार से आदान की अधिष्ठात्री बनती हुई तत्तद्वस्तुस्वरूपरक्षा का कारण बनती है । विस्रसन ही वर्त्तमान भाषा में ' विसर्ग ' कहलाया है । तत्त्वदृष्ट्या यही ' गति ' है । वित्र'सन, विसर्ग, गति, तीनों अंशः: समानार्थक हैं । एवमेव सन्धान, आधान, आगति, तीनों अंशतः समानार्थक हैं । जिसे हम आदान कहते हैं, वह भी वस्तुतः क्रियारूप गतिभाव ही है । अतएव गतिपरिचायक विसर्गशब्द की सीमा में ही आगतिपरिचायक आदानशब्द प्रविष्ट है । इन उभय द्वन्द्वों को इसी दृष्टि से हम ' विसर्ग ' कह सकते हैं, एवं ऐसे उभयधम्र्म्मावच्छिन्न इस विसर्ग को ' क ' कहा जा सकता है, जैसाकि – ' विसर्गः कर्म्मसंज्ञितः ) ( गीता ) इत्यादि से प्रमाणित है । जिस प्राकतिक विश्व के गर्भ में विकारसमष्टिलक्षण जड़ चेतन पदार्थ प्रतिष्ठित हैं, वह विश्व भी विसर्गात्मक है, एवं तद्गर्भीभूत पदार्थ भी विसर्गात्मक हैं । विसर्गात्मक ( कर्मात्मक ) पदार्थों का ' प्रकृतिभूत विश्व गुणत्रय से आक्रान्त रहता हुआ गुण - दोष दोनों विभूतियों से आक्रान्त है । गुण-विभूति सत्त्वप्रधाना है, यही देवीसम्पत् है, आत्मबन्धनविमोक ही इसका मुख्यधर्म्म है । दोषविभूति तमःप्रधाना है, यही आसुरीसम्पत है, आत्मबन्धनप्रवृत्ति ही इसका मुख्य धर्म है । मध्यस्थ रजोगुण क्रियाप्रधान बनता हुआ ज्ञानप्रधान निष्क्रिय सत्त्वगुण, तथा अर्थप्रधान निष्क्रिय तमोगुण, दोनों का समन्वय कराता हुआ विश्वप्रभव बन रहा है । रज के अनुग्रह से ही दोनों विभूतियों का एकत्र समन्वय होता है, एवं यही समन्वय वस्तुस्वरूपोत्पत्ति का प्रधान हेतु है । इसी से यह भी सिद्ध हो जाता है कि, प्राकृतिक विश्व, एवं विश्वगर्भ में व्यष्टिरूप से प्रतिष्ठित पदार्थ, दोनों कर्म्मप्रधान बनते हुए गुण - दोष विभूतियों से नित्य आक्रान्त हैं । दूसरे शब्दों में ब्रह्म से आरम्भ कर स्तम्बपर्यन्त सर्वत्र त्रिगुणभाव का साम्राज्य है । जैसाकि निम्नलिखित वचन से प्रमाणित है -न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः । सत्त्वं - प्रकृतिजैषु'क्त ' यदेभिः स्यात् त्रिभिर्गुणैः ॥ ( गीता ० १८।५० 1 यद्यपि कर्म्मप्रधान विश्वप्रपञ्च में सत्त्वानुगता गुणविभूति, तमोऽनुगता दोषविभूति, दोनों हीं हैं । फलत. विस्र'सन लक्षण विसर्गधर्म के सम्बन्ध से प्रत्येक पदार्थ से गुण दोष, दोनों हीं विभूतियों का विस्रसन प्रकृतिसिद्ध है । तथापि तमोगुणप्रधान भौतिक विश्व में सत्त्वगुणा-पेक्षया तमोगुणानुगत दोषविभूतियों के विस्रसन का ही प्राधान्य स्वीकार करना पड़ता है । यही ४६२

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शौचविज्ञानोपनिषत कारण है कि, गुणविभूति के आधान के लिए संग्रह के लिए जहाँ प्रवत्त दोषविभूति स्वभावतः वस्तुगत गुणों को श्रावृत करती रहती है । प्रतिदिन प्रयास अपेक्षित है, वहाँ रना पड़ता है । क्योंकि दोषसंसर्ग स्वाभाविक है । प्राकृतिक मकान को झाड़ना - बुहा-आक्रमण है, एवं स्वगत विस्रस्त दोषाक्रमण दूसरा गौण आक्रमण विस्रस्त है दोषाक्रमण । पहिला, तथा मुख्य द्रव्यदोष, एवं शरीरदोषमीमांसा -उपयोग में आने वाले पात्र - द्रव्यादि को ही लीजिए । धातुपात्र स्वगत दोषरूप भी युक्त होते रहते हैं, एवं प्राकृतिक दोष भी इन्हें अशुचिभाव से युक्त करते रहते हैं किट । लौहादि ( मैल ) से एक धातु तो ऐसे हैं, जिन्हें दोष से पृथक किया ही नहीं जा सकता । सदा अशुचिभावापन्न कितने हैं | अतएव दैवीसम्पदनुगत द्विजाति वर्ग के लिए ऐसे पात्र - क्रयादि सर्वथा अव्यवहार्य माने रहते गए हैं । इसी प्रकार द्रव्यों में लशुन - गुज्जनादि, वस्त्रों में नीलवस्त्रादि, यदि वहा हैं । जिन पात्र - द्रव्य - वस्त्र आदि परिग्रहों के दोष हटाए जा सकते हैं, वे ही व्यवहार्य हैं । दोषतारतम्य इन परिग्रहों का विशोधन विभक्त है । प्राकृतिक तथा स्वात्मगत दोषों से युक्त द्रव्यादि परिग्रहों से उपयोग में लेने से तद्गत दोष का शरीराग्नि पर प्रभाव होता है, शरीर दोषावह बन जाता को गुणाधान अवरुद्ध हो जाता है । इसलिए आवश्यक है कि, शारीर - चित्यधातुओं को दोषसंसर्ग है से, बचाने के लिए व्यवहार्य्य द्रव्य - पात्रादि की शास्त्रोक्त शुद्धि कर के ही इन्हें उपयोग में लाया जाय । यही पहिली द्रव्यशुद्धि, किंवा द्रव्यशुद्धिसंस्कार है । धातुत्री के आधार पर प्रतिष्ठित सप्तधातुमूर्त्ति म्यूलशरीर भो उक्त विलसन धर्म से नित्य क्रान्त है । स्थूलशरीर मलों का कोश ( खजाना ) है । वे मल अन्तय्यम बहिय्यम सम्बन्ध से दो भागों में विभक्त माने गए हैं । मल - मूत्र - कफ - लाला - स्वेद -आदि शरीरमल जब तक शारीर पवमान आत्माग्नि की सीमा में अन्तर्याम सम्बन्ध से प्रतिष्ठित रहते हैं, तब तक ये श्रात्मा के ब्रह्मोदन बनते. हुए आत्मस्वरूपरक्षा के कारण बने रहते हैं । आत्मगत शुचिभाव इन्हें शुचिभाव में परिणत रखता है । इन आभ्यन्तर मलों का उच्छेद ही आत्मोच्छेद का कारण है । ये हो मल - मुत्रादि शारीरमल जब आत्माग्निमुक्ति से बहिर्भूत होकर प्रवर्ग्य सम्बन्ध में परिणत हो जाते हैं, तो श्रात्मसीमा से विनिर्गत ये मल शुचिभाव से त्यक्त बन कर अशुचिभाव में परिणत हो जाते हैं । अन्तम सम्बन्धेन लमाण्ड में प्रतिष्ठित जो मल श्रात्मप्रतिष्ठा का कारण बना रहता है, वही वहिमभाव में आकर आत्मक्लान्तिका कारण बन जाता है । आत्मा ( वैश्वानराग्नि ) शीघ्र से शीघ्र इसे शरीर से पृथक कर डालना चाहता है । यही अवस्था मूत्र - कफ - किन ( गोड़ ) - जाला - स्वेद -आदि इतर मलों हो जाती है । इन प्रवर्ग्यभूत मलों के विशोधन से ही शरीरशुद्धि होती है । अशुचिभावापन्न मलमूत्रादि त्याग में हस्तादि के स्पर्शमत्र से अशुचिभाव का संक्रमण हो जाता है । अतएव धर्मशास्त्र ने बड़े ४६३

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श्राद्धविज्ञान पाटोप के साथ इन शुद्धियों का विधान किया है । यदि इन शारीरमलों को शीघ्र नहीं हटा दिवा जाता, तो शारीर प्राणाग्नि निर्बल बन जाता है । फलतः शारीर प्राणाग्नि ( वैश्वानराग्नि ) की स्वस्थता द्रव्यशुद्धि शास्त्रोक्त शरीरशुद्धि भी आवश्यकरूप से अपेक्षित है । यही दूसरा शरीरशुद्धि-संस्कार है । हम जानते हैं - शरीर में हड्डियों का समावेश है । परन्तु ये कभी अशुचिभावप्रवृत्तिका नहीं बनतीं । शरीराग्नि के उत्क्रान्त होते ही वे ही हड्डियाँ आत्मविभूति से वश्चित होते ही अशुचि-भाव में परिणत हो जातीं हैं । इनका स्पर्श प्रत्येक दशा में दोषावह है । यही अवस्था केश - लोम-नखादि के सम्बन्ध में घटित है । इस प्रकार शरीरमल बहिर्य्यास - भाव में परिणत होते हुए अवश्य-मेव शुचिभाव के प्रवर्त्तक बन जाते हैं । इनका शोधन सतत अपेक्षित है । द्रव्यशुद्धिसंस्कार, तथा शरीरशुद्धिसंस्कार, दोनों का शरीर से सम्बन्ध है । शरीरगत प्राणाग्नि की रक्षा के लिए शरीरशुद्धि ( शारीर - भूतों कि शुद्धि ) अपेक्षित हैं, एवं शरीरगत भूताग्निरक्षा के लिए द्रव्यशुद्धि ( उपयोग में आने वाले शय्या - आसन पात्र - द्रव्य - आदि की शुद्धि ) अपेक्षित है । इस प्रकार इन दोनों शुद्धियों का त्रिधातुगर्भित - प्राज्ञ तेजसयुक्त - पाञ्चभौतिक म्थूलशरीरावच्छिन्न वैश्वानरात्मसंज्ञक भूतात्मा की शुद्धि से ही सम्बध है । यही मूलशुद्धि है । इसी श्राधार पर - श्राचारः परमो धर्मः ' - शरीरमाद्यं खलु धर्म्मसाधनम् ' इत्यादि सूक्तियाँ प्रतिष्ठित हैं । पाञ्चभौतिक शरीर द्रव्यदोष का पात्र है, वैश्वानरात्मा शरीरदोष का पात्र है, यही निष्कर्ष है । द्रव्यदोष से शरीरसंस्था रोगाक्रान्त हो जाती है । क्योंकि भौतिक शरीर प्रत्यक्ष दृष्ट है । अत्र द्रव्यदोष से उत्पन्न रोगादि भी प्रत्यक्ष में अनुभूत है । प्राणमूर्त्तिवैश्वानरात्मा शरीरदोष से निर्बल हो जाता है । क्योंकि यह वैश्वानराग्नि प्राणात्मक है, अतएव इस का दोष सर्वसाधारण के लिए अप्रत्यक्ष है । उद्धृत ५ अशुचिभावों में से Sher शारीर दोष ही प्रत्यक्ष का विषय बनता है, शेष चारों अप्रत्यक्ष, किन्तु उत्तरोत्तर महाभयावह गए हैं । भावदोषमीमांसा एवं चतुर्विध योग-तीसरा क्रमप्राप्त ' भावदोष ' है । इसे ही ' चारित्र्यदोष ' भी कहा जासकता है । इस का प्रधानतः वैश्वानर - प्राज्ञगर्भित तैजस श्रात्मा से युक्त प्रज्ञानात्मा ( मन ) से सम्बन्ध है | शरीराशुचि से कालान्तर में प्रज्ञानमन मलिन वासनाओं से युक्त हो जाता है । जिस प्रकार मलिन दर्पण-वेष्टन से वेष्टित स्वच्छ भी दीपशीखा से मलिन ही रश्मियाँ निकलतीं हैं, एवमेष- मलिन वासनापटल से वेष्टित स्वस्वरूप से स्वच्छ भी प्रज्ञानज्ञानधारा मलिन हो जानी है । इ मलिन वासना से मानस भाव अतिशयरूप से दुष्ट हो जाते हैं । अधर्म में धर्मबुद्धि, पाप में पुण्यबुद्धि, असत् में सद्भावना, सत् में असद्भावना, धर्म में अधर्मभावना, इत्यादि प्रकृतिविरुद्ध भावनाएँ हीं इस भावदोष का मुख्य फल है । प्रज्ञापराध से अशन - पान-४६४

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शौचविज्ञानोपनिषत् शिक्षा - सङ्ग आदि में विपर्य्यय करने से ही भावदोष उत्पन्न होता है । प्रधानतः अन्नदोष, शिक्षादोष, ये दोष ही प्रधान हैं । हीनयोग, प्रतियोग, मिथ्यायोग, प्रयोग, ये चारों पतन के कारण है, एवं समत्त्वयोग विकास का कारण है । उदाहरण के लिए अन्न को ही लिजिए । अपेक्षित हित - मित भोजन से भी स्वल्पमात्रा में भोजन किया, यही हीनयोग है । अपेक्षाकृत भोजन कर लिया, यही अतियोग है । मित भोजन तो किया, परन्तु हित भोजन - न किया, यही मिध्यायोग है । एवं कल्पित आधुनिक उपवासों के कुचक्र में पड़कर कुछ न खाया, यही प्रयोग है । हित - नित - नियत मात्रायुक्त भोजन करना समत्वयोग है । यही भावशुद्धि की, मूलप्रतिष्ठा है, शेष चारों भाव - अशुचि के प्रवर्त्तक हैं । इसी प्रकार विपरीत शिक्षा, दोषियों का सङ्ग ईश्वरोपासनाविरक्ति, नास्तिकता, शास्त्रनिन्दा, धर्मपथानुगमन, आदि अन्यान्य कारण भी भावदोष के उपोद्बलक बनते हैं । इस दोष से मनस्विता - गुण का उच्छेद हो जाता है । राग - द्वेष - मोह - मद- मात्सर्य - क्रोध - लोभादि सत्त्वधातु विकृत हो जाते हैं । धर्मभावना का आत्यन्तिक-रूप से उच्छेद हो जाता है । श्रभिनिवेश ( दुराग्रह - हठधर्मी ) उदित हो जाता है । कुतर्क पुष्पित पल्लवित हो जाता है । श्रतएव इस भावदोष को महषियों नें पाँचों में प्रबल दोष माना है । इतर दोषों का मार्जन जहाँ सरलता से सम्भव है, वहाँ भावदोष दुःसाध्य माना गया है " सबकुछ ठीक कहते हैं, परन्तु हम नहीं मानते ' यही इस भावदोष का भीषण परिणाम है, जो कि वर्त्तमान शिक्षाक्षेत्र की मूलप्रतिष्ठा बनता हुआ स्वधर्मपथ का अन्यतम शत्रु बन रहा है- ' न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत् ' । जिस प्रकार पीलिया रोगाक्रान्त के लिए सारा जगत् पीत है, एवमेव भावदुष्ट की दृष्टिमें सर्वत्र दोष का ही साम्राज्य है । गुणसाम्राज्य है - केवल दोष पक्ष में | अभ्युदयप्रवर्त्तक यच्चयावत् शास्त्रीय कर्म इस भावदुष्ट की दृष्टि में प्रत्यवायजनक हैं, एवं प्रत्यवायप्रवर्त्तक अशास्त्रीय कर्म अभ्युदय के जनक हैं । तत् में तद्भावना, तत् में अद्द्भावना को समाविष्ट करने वाले इसी भावदोष के अनुग्रह से आज भारतीय धर्म अपने ही शिक्षित? पूतों के अनुग्रह से संकट में पड़ रहा है । एनोदोषमीमांसा -. चौथा क्रमप्राप्त ' एनो ' दोष है । इसका प्रधानतः वैश्वानर - तैजस - गर्भित प्राज्ञयात्मा ( कर्मात्मा ) से सम्बन्ध है । कर्मात्मा का प्राज्ञभाग स्नेहगुणप्रधान है । इसी स्नेहगुण का शरीर- के कारण स्पर्श द्वारा स्पर्श किए जाने वाले पदार्थ में प्रतिष्ठित शुचि भाव सम्बधेन प्राज्ञ में सम्बन्ध हो जाता है । न केवल स्पर्श से ही, अपितु सहभाषण, सहगमन, के प्रवर्तक बन जाते हैं । समानशय्यासनानुगमन, आदि इतर व्यापार भी इस एनोदोष, दस्यु, म्लेच्छ ), प्रज्ञापराध ही इस का भी प्रवर्तक बनता है । जो मनुष्य ( अन्त्यज, अन्त्यावसायी ४६५

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श्राद्धविज्ञा जो पशु ( श्वान - गर्दभ - मार्जार आदि ), जो पक्षी ( काकादि ), जो द्रव्य ( भूमिष्ठ मल - मूत्र - नख-केश - अस्थि - चर्मादि ) दिति - पृथिवी से सम्बद्ध आसुर तमोमय आत्मज्योति के अवरोधक अत्रिप्रारण से सदा युक्त हैं, उनके स्पर्श से, एवं जो मनुष्य ( आचारविहीन मनुष्य ), जो पशु - पक्षी - द्रव्यादि प्राकृतिक समयविशेषाक्रमण से मलिन हैं, उनके स्पर्श से एनोदोष का संक्रमण होता है । इस दोष से आत्मा प्रत्यवाय का अनुगामी बनता हुआ स्व विकास से आवृत हो जाता है । अतएव एनस्वी को ' पापी ' कहा जाता है । प्रायश्चित ही इस की निवृत्ति का मुख्य उपाय है । ' एनस् ' शब्द का निर्वचन करते हुए ' अ - इन्- अस ' इस विभागत्रयी की ओर हमारा ध्यान आकर्षित होता है । ' नामैकदेशे नामग्रहणम् ' न्याय के अनुसार ' इन ' शब्दाभिप्राय से प्रयुक्त ‘ इन् ’ सेइन: का ग्रहण अभीष्ट है | स्वामी ही ' इन ' है । त्रैलोक्य का अधिपति सूर्य इसी अभिप्राय से ' इन ' नाम से व्यवहृत हुआ है । ' ' कार का अर्थ ' अभाव ' ( ' नहीं ' ) है । ' अस् ' का अर्थ भाव है । जिस कर्म से सौर तत्त्वांशभूत आत्मा अपने प्रभव स्वामी ( सूय्ये ) को सम्पत्ति से वचित हो जाता है, सौरसम्पत्ति - अवरोधक वही कर्म्मविशेष ' एनस् ' कहलाया है । वह कर्म्म, जो आत्मविकास को इनः सम्पत्ति से वञ्चित कर दे, वही ' एनस् ' कर्म है । उदाहरण के लिए रजःस्वला स्त्री को लीजिए । ऋतुमती स्त्री के रज में अशुचिभावप्रवर्तक धामच्छद सूर्य्यविरोधी अत्रिप्राण का पूर्ण विकास रहता है । अतएव ऋतुमती स्त्री ' आत्रेयी ' कहलाई है, जैसाकि ' आशौचनिमित्तपरिच्छेद ' में ' विस्तार से बतलाया जाने वाला है । इम आत्रेयी स्त्री के स्पर्श से आत्मज्योति अभिभूत हो जाती है । साथ ही भूतानुगता अशुद्धि का भी प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता । यही दोष ' एनोदोष ' है, तयुक्त द्विजाति ही ' स्त्री ' कहलाया है । पृश्य विवेकमीमांसा-यही अवस्था अस्पृश्य- शूद्रादि की है । दितिगत नमोमय सूर्यविरोधी सुरप्रारण इन के बीज में जन्मना अन्तर्याम-म सम्बन्ध से प्रतिष्ठित है । अतएव इन के स्पर्श से भी ' देवसमीकरण ' द्वारा द्विजाति एनस्वी बन जाते हैं । समीकरण प्राणों का स्वाभाविक धर्म है । अतिशयरूप से तप्त पानी में शीत पानी के समावेश से तप्त पानी अनुष्णाशीत बन जाता है । शीत का शैत्य धर्म उच्छिन्न हो जाता है, तप्त का तप्त धम्मँ उच्छिन्न हो जाता है । दोनों स्वधर्म से च्युत * काकपक्षी में जो अशुचिभाव है, वही रजःस्वला स्त्री में प्रतिष्ठित है । अतएव ऋतुमती माताएँ - अपने बच्चों को स्पर्शदोष से बचाने के लिए कहा करतीं हैं कि, ' देख! मुझे न छूना 1. मुझे कागला छूगया है ' ( ' कागलो भींट गयो छ, मन मन भींट जे'- प्रान्त यसूक्ति ) । ४६६

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शौचविज्ञानोपनिषत होते हुए अपना अपना प्रातिस्विक तप्त - शीत धर्म खो बैठते हैं समझिए । द्विजाति के वीर्य में जन्मना क्रमशः अग्नि - इन्द्र - विश्व देव । ठीक यही अवस्था यहाँ सम्बध से प्रवेश है । तीनों आग्नेय तप्त प्रारण हैं । अस्पृश्य - प्राणों का अन्तयम वारुण - आसुरप्राण अन्तर्याम सम्बध से जन्मतः प्रविष्ट है, शूद्र जिसे में आशुद्रवलक्षण तमोमय कथमपि नहीं हटाया जासकता । यह शौद्रप्राण शीतप्राण है, श्राप्यप्राण बाह्य शरीरशुद्धिमात्र से हो जाता है, तो समीकरणप्रिय उभयप्राण एक दूसरे में आत्मसमर्पण है । यदि दोनों का स्पर्श स्वरूप खो बैठते हैं । द्विजाति का द्विजातित्व उच्छिन्न हो जाता है करते हुए अपना अपना हैं । साथ ही आगन्तुक परधर्मज्ञक्षण - श्रतएव भयावह शूद्रधर्म, का शूद्र द्विजाति का शूद्रत्त्व के उच्छिन्न हो जाता सन्बन्ध न होकर बहियम सम्बन्ध हो जाता है । फलतः ऐसा सम्बन्ध साथ अन्तयम द्विजाति - कर्म से वञ्चित कर देता है, वहाँ इसे शूद्रकर्म के योग्य एक थोर द्विजाति को जहाँ से पतन हो जाता है । एवमेव आगन्तुक द्विजातिधर्म्म का शूद्र के साथ भी अन्तम नहीं होने देता सम्बन्ध । दोनों ओर हिम सम्बन्ध होता है । परिणामतः ऐसा सम्बन्ध एक ओर शूद्र को जहाँ न होकर कर देता है, वहाँ इसे द्विजातिकर्म के योग्य नहीं होने देता । यही वर्णसाङ्कर्य शूद्रकर्म से वञ्चित कारण बनता हुआ अन्ततो गत्वा वर्णसङ्करसृष्टि का उपोद्यलक बन जाता है, किसका व्यक्तिपतन का हितैषी बीजवपन करते हुए ही राष्ट्र स्वातन्त्र्य रक्षा की विफल कामना कर रहे हैं । इसी हमारे राष्ट्र-त्राण पाने के लिए कितनें एक ( ग्रहयागादि ) विशेष यज्ञकम्मों में तो शूद्र समीकरण - भय से के साथ सम्भाषण भी निषिद्ध माना गया है । मानवधर्म्मशास्त्र पर धूलिप्रक्षेप करने वाले उन अभिनिविष्टों का सन्तोष लिखित श्रुतिवचन से भी हो सकेगा, अथवा नहीं?, यह संदिग्ध है । क्यों?, का समाधान निम्न किया जा चुका है -" तन्न सर्व - इवाभिप्रपद्य ेत । ब्राह्मणो देव, राजन्यो वा वैश्यो वा । ते हि यज्ञियाः न सर्वेव संवदेत । देवान्वा एष उपावर्त्तते, यो दीक्षते । स देवतानामेको भवति । स वै वै देवाः सर्वेणेव संवदन्ते । ब्राह्मणेन वैव, राजन्येन वा, वैश्येन वा । ते हि यज्ञियाः । न तस्माद्यद्य ेनं शूद्र ेण संवादो विन्देत् एतेषामेवैकं ब्रूयात् - इममिति विचच्व, इममिति । विचच्व इति । एष उ तत्र दीक्षितस्योपचारः " ( शत ० ३।१।२२६, १० ) । स्मरण रखिए, जिस शूद्र के साथ श्रुति ने भाषण का भी निषेध किया है, वह अस्पृश्य शूद्र नहीं है । अपितु पार्थिव पूषाप्राण से अनगृहीत, अतएव अंशत: दिव्यभाव से युक्त व्यवहार्य सच्छूद्र ही यहाँ अभिप्रेत है । कारण ऐसा मानने का यही है कि, श्रुति ने द्विजातिवर्ग , अतएव ( वा ० ० ० ) के सम्बन्ध को उद्धृत करते हुए शूद्र का उल्लेख किया है । गोपनापितादि द्विजाति के लिए व्यवहार्य हैं । लौकिक - गार्हस्थ्य कम्मों में इनका ग्रहण दोषावह सच्छूद्र नहीं है 1 ४६७

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महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३, पृष्ठ 530 का मूल पृष्ठ
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श्राद्धविज्ञान यह स्पृश्य - व्यवहार्य्य सच्छूद्र भी न परन्तु ग्रहयागापरपर्यायक सोमभाग में दीक्षित यजमान के लिए भी नहीं कर सकता । यदि सामग्री -केवल अस्पृश्य ही बन जाता, अपितु इसके साथ यज्ञकर्त्ता भाषण , तो श्रुति आदेश देती है. कि, यजमान सम्भार आदि के सम्बन्ध में इससे बात करने का प्रसङ्ग वैश्य आजाय , तीनों में से किसी एक के द्वारा अपना स्वयं इससे भाषण न करे । अपितु ब्राह्मण, क्षत्रिय, आज साक्षान रूप से दिव्यप्रारूप में परिणत हो सन्देश इसे कहला दे । कारण, दीक्षित यजमान के साथ ही सम्बन्ध है । अतः विशेष रहा है । उधर प्राकृतिक देवत्रयी का केवल द्विजाति है । इसी दिव्यप्राणविज्ञानस्वभाव दिव्य कर्मों में व्यवहार्य्य - स्पृश्य शूद्र भी एकान्ततः अव्यवहार्य को लक्ष्य में रखते हुए श्रुति ने कहा है-बन सके, वहाँ तक तो " वह दीक्षित यजमान सब से व्यवहार न करे । अपितु से अधिक जहाँ तक क्षत्रिय, अथवा वैश्य से ब्राह्मण से ही व्यवहार रक्खे ( ब्राह्मणेन वैव ), अधिक यजमान सब से सम्भाषण न करे । व्यवहार रक्खे । क्योंकि ये ही तीनों वर्ण यज्ञिय हैं । वह होता है । दीक्षित यजमान स्वयं वह देवमण्डली की ओर आता है, जो यज्ञकर्म में दीक्षित का सबके साथ ( चारों वर्णों के देवताओं का एक अङ्ग वन जाता है । प्राकृतिक प्राणदेवताओं के द्वारा ) वा ० ० वै ० वर्णों के साथ ) सम्बन्ध नहीं हैं । अपितु ( गा ० त्रि ० ज ० ये छन्दों ही तीनों वर्ण यज्ञिय हैं । ऐसी परिस्थिति साथ ही इनका सम्बन्ध है । क्योंकि ( जन्मतः ) चीत करने का कोई प्रसङ्ग उप-में यदि दीक्षित यजमान के साथ व्यवहार्य सच्छूद्र से से बात बात न कर ब्रा ० क्ष ० वै ० इन तीनों में स्थित हो जाय, तो उसे चाहिए कि वह स्वयं शूद्र यह कह दीजिए, यह समझा दीजिए ' से किसी एक को मध्यस्थ बना कर इनके द्वारा ही - ' उसे दीक्षारक्षा की चिकित्सा है " । अपना यह सन्देश पहुँचादे । यही दीक्षित यजमान की , प्रज्ञान-शर रविशोधक १- द्रव्यशुद्धिसंस्कार, वैश्वानरात्मविशोधक २ - शरीरशुद्धिसंस्कार - ४ - एनः शुद्धिसंस्कार, इन गर्भित तैजसात्मविशोधक ३ - भावशुद्धिसंस्कार, एवं प्राज्ञ । आत्मविशोधक प्रकृत आशौच प्रकरण का सम्बन्ध है चार धर्मशुद्धिसंस्कारों का प्रकृत में कोई सम्बन्ध नहीं । यद्यपि है अशुचित्त्वेन इन पाँचों को ही ' आशौच ’ एकमात्र महानात्मविशोधक ५ अवशुद्धिसंस्कार से शब्द नियत हैं । यौगिकार्थ-लिए पाँच पृथक् पृथक् कहा जा सकता है । तथापि पाँचों के पार्थक्य के की जा सकतीं हैं, वहाँ रूढिमर्यादा से मर्यादा से जहाँ पाँचों अपवित्रताएँ ' आशौच ' नाम से व्यवहृत, अशुद्धि, ये शब्द नियत हैं । एवं पाँचों के लिए क्रमसः आशौच, पाप, अभिनिवेश, अपवित्रता, ये शब्द नियत हैं । इन पाँचों : - शौच, पुण्य - धर्म्म पवित्रता, शद्धि पाँचों शुचिभावों के लिए क्रमशः - अशुद्धिसंस्कार की का सिंहावलोकनन्यायेन तालिका द्वारा लक्ष्य में स्थापित कराते हुए ही पाँचवें ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । ४६५