Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 531–540

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 531–540

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संख्यानम् ४६६ शौचपात्राणि --जातयः ) | शुचिभावाः अशुचिभावाः संस्काराः १ अधम् -मलं --महानात्मानो पितृप्राणमूर्त्तेरव्यक्तयज्ञगर्भितस्य )( ५ अघशुद्धिसंस्कारः शौनम् आशौचम् २ एनः - मलं-प्राज्ञात्मनो र्वैश्वानरतेजसगर्भितस्य सौम्यप्राणमूर्त्ते भावः -- मलं तैजसात्मनो प्रज्ञानावच्छिन्नस्यवैश्वानरप्राज्ञगर्भितस्य )( ४ एन्ःशुद्धिसंस्कारः पुण्यम् . पापम् ) ( ३ भावशुद्धिसंस्कारः धर्म्मः अभिनिवेशः शौचविज्ञानोपनिषत् मलम् - मलं-वैश्वानरात्मनो प्राज्ञगर्भितस्य प्रारणावच्छिन्नस्यतैजस ४ ५ संस्कारः शरीरशुद्धि पावित्र्यम् | अपावित्र्यम् शुद्धिः मालिन्यम् - मलं-शरीरस्य वैश्वानरगर्भितस्य धातुत्र्यावच्छिन्नस्य )( १ द्रव्यशुद्धिसंस्कारः शुद्धिः

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श्रद्धविज्ञान ( १ ) - अघदोषेण - महदात्मनः - अभ्युदयनिमित्तस्यावरोधः--- ततश्चात्मा- आशौचभावापन्नः । १ शौचभावापन्नः! ( २ ) श्रघशुद्धिसंस्कारेण - महदात्मनः - प्रत्यवायनिमित्तनिवृत्तिः- ततश्चात्मा । ( १ ) - एनोदोषेण - प्राज्ञात्मनः - प्रत्यवायमूलकाशुभ संस्कारप्रवृत्तिः -- ततश्चात्मा पापभावापन्नः ( २ ) - एनःशुद्विसंस्कारेण अभ्युदय मूलकशुभसंस्कारप्रवृत्ति: -( १ ) - भावदोषेण - तैजसात्मनः - अभ्युद्यनिमित्तविघातः--- ततश्चात्मा पुण्यभावापन्न: । -- ततश्चात्माभिनिवेशभावापन्नः । ३ । ( २ ) - भावशुद्धिसंस्कारेण तेजसात्मनः - प्रत्यवायनिमित्तविधातः - ततश्चात्मा धर्मभावापन्नः ( १ ) - मलदोषेण वैश्वानरात्मनः - विकासावरोधः क्लान्तिश्च- - ततश्चात्मा मलीमसः । निर्मलः । ( २ ) शरीरशुद्धिसंस्कारेण वैश्वानरात्मनः - विकासः स्वस्थता च - ततश्चात्मा रोगप्रवृत्तिश्च- -- ततश्चात्मा खिन्नः । ( १ ) - मालिन्यदोषेण शरीरस्य धातुवैषम्यं, ( २ ) - द्रव्यशुद्धिसंस्कारेण शरीरस्य - धातुसाम्य- नैरोग्यश्च----- ततश्यात्मा प्रसन्न । तो अन्तरात्मा में येशुद्धि - संस्कार अपेक्षित इसलिए मानें गए हैं कि, बिना इन शुद्धिसंस्कारों के न संस्कार ही सम्भव अतिशयाधानलक्षण गुणाधान ही सम्भव है, एवं न पूर्णताप्रवर्त्तक होनाङ्गपूरक, हैं । एकमात्र इसी आधार पर वैज्ञानिकोंनें इस संस्कारप्रक्रिया को दोषमार्जन बस्त्र , प्रतिशयाधान पर रङ्ग - रञ्जन-हीनाङ्गपूर्त्ति, भेद से तीन भागों विभक्त किया है । जिस प्रकार तैलयुक्त मलीमस तब तक सम्भव नहीं लक्षण अतिशयाधानसंस्कार, एवं आभाप्रवर्त्तक ' करप ' रूप हीनाङ्गपूर्तिसंस्कार दिया जाता । एवमेव यज्ञादि है, जब तक कि वस्त्रगत तैलादि किट दोषों को वस्त्र से पृथकू नहीं कर अपेक्षित हैं । इन दिव्यसंस्काराधान - योग्यता - सम्पत्ति के लिए प्रथम उक्त पाँच धर्म्मशुद्धिसंस्कार है, तो अनन्तर शुद्धि संस्कारों से जब अध्यात्मसंस्था निर्मल- निदुष्ट- गुणाधानयोग्या अन्तर्य्याम बन जाती - सम्बन्ध से आत्म-यज्ञ - तपो दानलक्षण विद्यासमुच्चित शास्त्रीय कर्म से उत्पन्न अतिशय ४७०

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आशीवविज्ञानोपनिषत् क्षेत्र में प्रतिष्ठित हो सकता है । यही गुणाधान, किंवा अतिशयाधान युक्त हो जाता है । यही गुणाधान संस्कार ' श्रौतसंस्कार ' नाम से प्रसिद्ध है है । इससे आत्मा प्रसादगुण से ' स्वस्त्ययन संस्कार ' नाम से प्रसिद्ध है । दोषोत्पादक परिग्रह का । तीसरा हीनाङ्गपूरक संस्कार आत्मा में प्रतिष्ठित दिव्यातिशय को सदा सुरक्षित बनाता हुआ निरोध करता हुआ जो संस्कार को यावज्जीवन स्वस्ति पूर्वक गमन कराता है, वही स्वस्त्ययन संस्कार उसे पूर्ण है, जिसका बनाए रखता गीताभाष्यान्तर्गत है, आत्मा ' हमारे स्वस्त्ययन कर्म्म ' नामक प्रकरण में विस्तार से निरूपण हुआ है । इन त्रिविध से दोषमार्जनसंस्कार, २१ भागों में विभक्त हैं । गर्भाधानादि १६ स्मार्त्तसंस्कार संस्कारों में . शुद्धयादि ५ धर्म्मशुद्धिसंस्कार, सम्भूय २१ संस्कार हो जाते हैं, जिनमें ( ब्राह्मसंस्कार ), अघ-का दिग्दर्शन कराया गया है । अतिशयाधायक श्रौतसंस्कार भी २१ हैं । स्वस्त्ययन से प्रकृत में ५ संस्कारों का इन सब संस्कारों में से प्रकृत में पञ्चधर्म्मशुद्धिसंस्कारान्तर्गगत अशुद्धिसंस्कार ही संस्कार प्रकृतप्रकरणार्थ असंख्य हैं । है । अघाशौचस्वरूपमीमांसा -बतलाया गया है कि अशुद्धिसंस्कार का प्रधानतः पितृप्राणमूर्त्ति महानात्मा सर्वप्रथम हमें ' अ ' नाम के तत्वार्थ की ही मीमांसा से सम्बध है । विहित यज्ञ - तप - दान- कर्मत्रयी से एवं इष्ट- आपूर्त - दत्त - अपेक्षित है । विद्यासापेक्ष शास्त्र-एक दिव्य अतिशय उत्पन्न होता है । इस अतिशय का लक्षण अन्तरात्मगत सत्कर्म्मत्रयी से फलात्मक अन्तम सम्बन्ध हो जाता है । इस दिव्य अतिशय ( कर्म महानात्मा के साथ न मिलने देने वाला अमेध्यलक्षण जो एक प्रतिबन्धक धर्म है संस्कार , अन्तराय ) को आत्मा के साथ है, वही ' घ ' नाम से प्रसिद्ध है । पुण्यकर्म अभ्युदय के जनक ( शुभसंस्कारों के जनक ) बनतेहुए ' वःश्रेयस् ' नाम से प्रसिद्ध हैं । अनुकूल निमित्तों के समन्वय से इन कम्र्मों की प्रवृत्ति प्रक्रान्त एवं प्रतिकूल निमित्तों की उपस्थिति से इनकी प्रवृत्ति अवरुद्ध हो जाती है । वायुनिमित्त रहती है, सहयोग से सूर्यप्रकाश व्याप्त हो जाता है, मेघनिमित्त के सहयोग से प्रकाश अवरुद्ध हो जाता के है । कारण के रहने पर भी प्रतिबन्धक के समावेश से कार्य का अवरुद्ध हो जाना ही अघ कीमती कृपा है । ' नामैकदेशे नामग्रहणम् ' न्याय से ' अ ' कार अभ्युदय का सूचक है, ' घ ' कार हिंसा भाव का द्योतक है । ' अकार - अभ्युदयसंस्काराभिभवपूर्णकं श्रभ्युदयजनककर्मनिमित्तं-हन्ति ' ही शब्द का निर्वचनार्थ है । जनन - मरणादि तत्तद्विशेष स्थितियों में स्वतः उत्पन्न श्रभ्युदयनिमित्तप्रतिबन्धक यही अशुचि-भाव ' अ ' कहलाया है । सौम्यमूर्त्ति महान् में प्रतिदिन वारुणसम्बन्ध से ' घ ' का उद्गम होता रहता है । इस दैनिक अवनिवृत्ति के लिए ही ' अघमर्षणसूक्त ' विहित है । द्रव्य, शरीर भाव, एन, इन चार अशुचिभावों का प्रज्ञापराध से सम्बन्ध है । साथ ही इन से केवल व्यक्तितन्त्र ४७१

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श्राद्धविज्ञान से सम्बद्ध द्रव्य - शरीर-काही सम्बन्ध है । कारण स्पष्ट है । शरीर वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ, चारों हैं । अतः इन भाव - एन: -ये चारों वैय्यक्तिक हैं । शरीरादि चारों प्रत्येक के पृथक् पृथक् नहीं है । अशुचिभावों का भोक्ता केवल व्यक्ति ही बनता है । परन्तु अघात्मक अशुचिभाव ऐसा से ही इसका न तो हमारे प्रज्ञापराध से ही इस का कोई सम्बन्ध है, एवं न केवल व्यक्ति के कारण सम्बन्ध है । जननादि निमित्तों से यह: स्वतः प्रादुभूत होता है । एवं महानात्मानुगति रहता है । कम्र्मात्मलक्षण अन्तरात्मा, के महद् - भाग इसका पुत्र - पौत्रादि सपिण्डों से सम्बन्ध हो जाता है । से सम्बद्ध अघ वास्तव में सांक्रामिक उपदंशादि रोगों भी भाँति तद्वंशधरों में भी व्याप्त सहोलतरण महानात्मा ही अघ - दोष का प्रधान आयतन है । पितृप्राणमय महानात्मा में प्रतिष्ठित पितृपिण्डों का पुत्र - पौत्र - भ्राता - पिता - स्त्री - सगोत्रबन्धुबान्धव - सब के साथ उसी सुपरिचित श्रद्धासूत्र के द्वारा घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है, जैसा कि - ' प्रजातन्तु वितानविज्ञानोपनिषत् एक व्यक्ति ' के में महानात्मा विस्तार से बतलाया जा चुका है । इसी अविच्छिन्न सूत्र के सम्बन्ध से यदि किसी ( पितृपिण्ड की दोष का उदय हो जाता है, तो उसके पुत्र पौत्रादि सब के महानात्मा में से समानता से, सापिण्ड्य सम्बन्ध से ) अघ का संक्रमण हो जाता है । अघात्मक मल के सम्बन्ध भावापन्न उस समान - कुल में उत्पन्न होने वाले सब व्यक्तियों की सशरीरा आत्मसंस्था ' अशुचि ' अशौच, हो जाती है । यही सांक्रामिक ' अघ ' पदार्थ धर्मशास्त्र में भिन्न भिन्न स्थलों में-आशौच, सूतक, अध, इत्यादि नामों से व्यवहृत हुआ है । ' अशुचेर्भात्रः, कर्म्म ' वा कहलाया ' निवर्चन है से । - ही अद्यपदार्थ आशौच कहलाया है । जनन सम्बन्धानुगत आशौच ही ' सूतक इस का क्योंकि उत्तरोत्तर कुलवर्ग में संक्रमण होता है, अतएव भी इसे ' घ ' कहना अर्थ बनता है । पिण्डदान, उदकदान, वेदस्वाध्याय, आदि दैव कम्मों का विरोधी नियतकाल में क्षौरस्ना-नादि से निवृत्त होने वाला महानात्मगत दोष ही ' शौच ' है । एक महानात्मा से सम्बद्ध यह आशौच उसके सबै समसम्बन्धियों में तत्काल संक्रात हो जाता है । एवं नियः कालानन्तर यह अशुचिभाव की व्यवस्था धर्मशास्त्र स्वतः हट जाता है । कैसा आशौच कितने काल में हटता है?, इन सब प्रश्नों कि, जो संसर्गी से गतार्थ है । शौच नामक घ दोष के सम्बन्ध में यह स्पष्टीकरण कर लेना चाहिए विशुद्ध चतुर्थाश्रम में दीक्षित हैं, जिनकी आध्यात्मिकसंस्था राग - द्वेषादि से वियुक्त है, जिन्होंने में कदापि पूर्वोक्त आशौच आत्मा के साथ ऐक्य प्राप्त कर द्वैत का उच्छेद कर डाला है, ऐसे योगी कुटुम्बियों पर कोई प्रभाव नहीं का संक्रमण नहीं होता । जिस प्रकार अन्य सांसारिक मल उनके विशुद्ध आत्मा कोई प्रभाव नहीं डाल डाल सकते, तथैव यह अघ भी उनमें संक्रान्त होता हुआ भी उन पर अपना परन्तु जो गृहमेधी हैं, सकता । उनका प्रवृद्ध ज्ञानाग्नि आगत अघ को तत्काल भस्मसात् कर देता अघसंक्रमण है । से अशुचिभाव को सांसारिक - लौकिक कम्र्मों में जिनका आत्मा आसक्त है, वे अवश्य ही प्राप्त होते रहते हैं । ४७२

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आशौच विज्ञानोपनिषत् जनन - मरणादिनिमित्तों से महानात्मा में प्रतिष्ठित यह अघ रूप दोषाशय कालभेद से तीन भागों में विभक्त माना गया है । जीवित दशा में यदि कोई सपिण्डबन्धु ( वंशज ) घोरतम कर्म कर बैठता है, तो उसका महानात्मा भी अघदोष से युक्त हो जाता है । श्रद्धासूत्र के द्वारा तद्वंशजों पर भी अवश्य ही इसका प्रभाव पड़ता है । वंश कलङ्कित हो जाता है, अतएव ऐसा क्रूरकर्मा ' कुलकलङ्की ' ' कुलशत्रु ' कहलाया है । यह पहिला निम्नश्रेणि का अतिशय है । इसमें महानात्मा का सम्पर्क शिक रहता है, प्रज्ञासम्पर्क विशेष रहता है । अतः एनोदोषवत् इत्थंभूत अघदोष का प्रधान लक्ष्य यही व्यक्ति रहता है | उदाहरणार्थ एक व्यक्ति ( ब्राह्मण ) मद्यपान करता है । यदि कुटुम्बी इससे सम्पर्क रखते हैं, तो अवश्यमेव वे भी संसर्गदोष पात्र बन जाते हैं । अतएव मद्यपी के सहवास - परित्याग का विधान हुआ है । क्योंकि इस अघ में प्रज्ञा का ही प्राधान्य है, अतः पिण्डवत् इसका नियमतः संक्रमण न होकर संसर्गमात्र से सम्बन्ध रहता है । किसी व्यक्ति के मर जाने पर उसका चन्द्रलोकगामी महानात्मा अघदोष से युक्त हो जाता है । इस अशुचि का प्रभाव महानात्मा के प्राधान्य से नियमतः इसके कुटुम्बियों पर होता है | नियतावधि के समाप्त हो जाने पर यह स्वतः निवृत्त हो जाता है । मृत पुरुष का वहन करने वाले इतर व्यक्तियों के साथ ही दोष का सम्पर्क होता है । यही ' निमित्तक घ ' कहलाया है । इसके निवृत्त होने की भिन्न भिन्न मर्यादा है । उदाहरणार्थ शत्रवहन करने वाले को एक दिन का आशौच होता है । काष्ठ - उपलादि प्रक्षेप करने वाले. निकट जातिबन्धुओं को तीन दिन का आशौच रहता है । केवल शवयात्रा में सहयोग देने वाले सद्यः स्नान- देवदर्शन से शुद्ध हो जाते हैं । हाँ, यदि इनके घर में उसी दिन कोई माङ्गलिक विवाहादि का हैं, तो उस दिन स्वस्त्ययनरक्षादृष्टि से इनके लिए गृहप्रवेश निषिद्ध है । इन तीनों में मुख्य अघ मध्यस्थ अघ ही माना जायगा । वस्तुतस्तु सपिण्डों में संक्रमण करने वाला यह मध्यस्थ अघही वस्तुगत्या अघ है । एवं इसीके लिए ' अध ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । जन्म - मृत्यु, ये दो इस अप्रवृत्ति के प्रधान कारण माने गए हैं । अतए आशौच - जननाशौच, मरणाशौच, भेद से विभक्त हो जाता है । जन्माशौच अभिषव सम्बन्ध से - ' सूतकाशौच ' ( सूतक ) कहलाया है, एवं मरणाशौच शवसम्बन्ध से ' शावाशौच ' कहलाया है । सूतकाशौच सम्बन्ध से ही प्रसवस्थान ' सूतिकागृह ' कहलाया है । इन दो प्रधान आशौचों के अतिरिक्त उत्तरक्रियाशौच, दोषाशौच, दो शौच और हैं । सम्भूय आशौच के ४ विवर्त्त हो जाते हैं । दोषाशौच सर्वथा गौरा है. उत्तर-क्रियाशौच गौरा है, जनन - मरणानिमित्तक सूतक - शावाशौच प्रधान हैं । ( १ ) - उत्पन्न होने वाले अपत्य के उत्पन्न हो जाने पर तन्मातापिता आदि सम्बन्धियों में जो नियतकाल पर्यन्त अशुद्धि उत्पन्न हो जाती है, वही जनननिमित्तक प्रथम सूतकाशौच है । ( २ ) - मरणासन्न ४७३

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श्राद्धविज्ञान व्यकि के मर जाने पर तन्मातापिता आदि सम्बन्धियों में नियतकालात्मिकां सक्रान्त अशुचि मरण-निमित्तक द्वितीय शाबाशौच है । ( ३ ) - मृत व्यक्ति के शवशरीर के वहन दाहादि उत्तरकम्मों से उत्पन्न अशुचि तृतीय ' उत्तरक्रियाशौच ' है । ( ४ ) - एवं मद्यपानादि क्र र कर्म करने वाले वंशज के सहयोग से उत्पन्न अशुचि चतुर्थ दोषाशौच है । १ - जनने मातृपितृसम्बन्धिवर्गेऽशुचिः २ - मरणे मातृपितृसम्बन्धिवर्गेऽचिः •तज्जन्माशौचम् -प्रधाने तन्मरणाशौचम् ३ --- मृतस्य दहनवहनादिसम्बन्धेनाशुचिः तदुचरक्रियाशौचम् | गौम् ४ - जीवितस्य क्र रकर्मणः संसर्गेणाशुचिः - तदोपाशौचम् ७ शौचत्रयी - मीमांसा-- सर्वथा गौणम् अधिष्ठान भेद से शाव - आशौच ( अधाशौच ) के तीन श्रोणि - विभाग हो जाते हैं । वे तीनों शौच क्रमशः स्पर्शाशौच, कर्म्माशौच, मङ्गलाशौच, इन नामों से प्रसिद्ध हैं । • जिस शौच में अन्य के स्पर्श का निषेध है, वही स्पर्शाशौच है । जिस में स्पर्श का तो निषेध-नहीं, किन्तु वैदिक यज्ञादि कर्म्म निषिद्ध हैं, वह कम्र्म्माशौच है । जिस में स्पर्श, तथा यज्ञादि कम्मों का तो निषेध नहीं है, अपितु विवाह, यज्ञोपवीत, कन्यादान, तीर्थयात्रा, आदि माङ्गलिक कार्य निषिद्ध हैं, वही मङ्गलाशौच है । प्रश्न स्वाभाविक है कि, इन तीन आशौचविशेषों की उपपत्ति ( मौलिक रहस्य ) क्या? । वहिः शरीर, अन्तःशरीर, सत्त्व, ये तीन स्थान इस अधाशौच की प्रतिष्ठा बनते हैं । ये ही तीन अशौच के पृथक पृथक तीन अधिष्ठान हैं । पिता की मृत्यु से पुत्र इस अघाशौच से युक्त हो जाता है । प्रथमस्थान बहि: शरीर बनता है । भूतात्माधिष्ठित बहिःशरीर ( स्थूलशरीर ) में प्रतिष्ठित वही आशौच शरीराशौच कहलाया है, इसी को अङ्गाशौच कहा गया है । ब्राह्मणपुत्र में यह शरीराशौच १० दिन पर्यन्त व्याप्त रहता है । १० दिन पर्यन्त यह अन्त्यजवत् अस्पृश्य है । • इस काल के मध्य में यदि इस के शरीर का अन्य शरीर से सम्बन्ध हो जायगा, तो स्पर्शद्वारा अन्य शरीर भी अन्त्यत्र स्पर्शवत् अशुचिभाव से युक्त हो जायगा । शरीराशौच के नियत काल में निवृत्त हो जाने पर भी इसके प्रारणात्मक अन्त शरीर में अरूप: आशौच कुछ समय पर्यन्त ओर प्रतिष्ठित रहता है । प्र ेतकर्म - समाप्तिपर्य्यन्त इस की प्राणसंस्था अशुचिभाव में परिणत रहती ४७४

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आशौचविज्ञानोपनिषत् हैं । क्योंकि इस आशौच का प्राणसंस्था से सम्बन्ध है, चर्म्मशरीरपर इस का कोई रह जाता । अतएव यह स्पृश्य - बन जाता है । परन्तु स्वाध्याय प्रभाव नहीं प्रेतपिण्डक्रिया को छोड़कर शेष पिण्डपितृयज्ञादि पितृकम्म, दान, प्रतिग्रहग्रहण, इतर देवकर्म्म, क्योंकि इन वैदिक कर्मों का प्रारण संस्था से सम्बन्ध है, एवं इस , इस आशौचकाल में निषिद्ध हैं । समय कर्माधारभूत प्राण अशुचि-भावापन्न है । इस कर्माशौचकाल में यदि यह वैदिक कर्मों का प्रतिबन्धक के कारण ) आत्मा में किसी प्रकार का अतिशयाधान अनुगमन करेगा, तो इनसे ( अंघ-न होगा । प्र तक समाप्त्यनन्तर इसकी प्रारणसंस्था भी अघदोष से विमुक्त स्पर्शवत् इसे वैदिक कम्मों का भी अधिकार मिल जाता है । परन्तु हो जाती है । फलतः अनन्तर ' घाशौच का अनुशय विद्यमान है । और तब तक यह विद्यमान रहता अभी इसके सत्त्वाधिष्ठान में पिता का प्रतमहानात्मा अपनी अमाङ्गलिक अश्रुमुखावस्था को छोड़कर है, जब तक कि इसके प्रोत हो जाता | जब तक महानात्मा ( प्रेतात्मा ) चन्द्रलोक में नही पहुँच जाता सापिण्ड्यभाव को प्राप्त नहीं , तब तक पार्थिवाकर्षण -जति दुख से यह क्लान्त रहता है, यही इसकी अश्रुमुखावस्था है, इसे वहाँ पहुँचने में लगता है । संवत्सरान्त में यह चन्द्रलोकस्थ स्व पितरों अमङ्गलावस्था है । एक सम्वत्सर से सापिण्डयभाव प्राप्त करता हुआ नान्दीमुख बन कर मङ्गलावस्था में परिणत होता है । अतएव मृतक लिए विवादादि माङ्गलिक कार्य्य निषिद्ध हैं । यही तीसरा साम्वत्सरिक मङ्गलाशौच के एक वर्षपर्यन्त गृहस्थ है । यह तो हुई मरणाशौच की मीमांसा । अव संक्षेप से जन्माशौच की भी स्त्री के सन्तति होती है, उसे, उसकी सपत्नी को, तथा पति को नियतकालपर्यन्त मीमांसाकर लीजिए । जिस दोनों का अनुगामी बनना पड़ता है ।. इतर सपिण्ड बन्धुओं के साथ केवल स्पर्शाशौच, कर्माशौच, होता है | यदि कोई तटस्थ व्यक्ति - स्पर्शाशौच युक्त स्त्री - पुरुष का स्पर्श कम्र्माशिौच का ही सम्बन्ध है, कर्माशौच नहीं । सद्यः स्नानसे वह कर्म में अधिकृत कर लेता है, तो उसे स्पर्शाशौच होता मैं केवल स्पर्श, कर्म, ये दो आशौच ही होते हैं । तीसरे मान मङ्गलाशौच लिया जाता का है जन्माशौच । इस प्रकार जन्मसम्बन्ध अभाव है । जैसा कि पूर्व में स्पष्ट किया गया है, पिता की मृत्यु पर तीनों शौचों का सम्बन्ध होता है । इतर सपिण्डों के साथ केवल पुत्र में स्पर्शाशौच स्पर्श, कर्म, मङ्गल, इन दो आशौचों का ही सम्बन्ध होता है । जो इस पुत्र से संसर्ग करता कर्माशौच, स्पर्शाशीच ही होता है । शववहन - दहनादि उत्तरक्रिया में योग देने वालों को स्पर्शाशौच है, उसे केवल साथ कर्माशौच का भी अनुगामी बनना पड़ता है । के साथ स्पर्शास्पर्शमीमांसा—-क्रमप्राप्त स्पर्शास्पर्श - व्यवस्था का भी विचार कर लीजिए । यह स्पर्श - कम्मे - मङ्गल, तीनों आशौचों का काल उत्तरोत्तर वसीयान् स्मरण रचना चाहिए कि-लक्षण माङ्गलिक आशौच पूरे १ वर्ष पर्यन्त रहता है । वैदिककर्मप्रतिषेधलक्षण है । मङ्गलकर्म्मप्रतिषेध-' शरीरस्पशेप्रतिषेधलक्षण स्पर्शाशौच, इन दोनों में प्रथम बहुकालानुगत कर्म्माशौच, तथा है । किसी विशेष परिस्थिति उत्पन्न न होने की दशा में ( सामान्य दशा है, में द्वितीय अल्पकालानुगत ) जितने समय पर्य्यन्त ४७५

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श्राद्धविज्ञान कर्माशौच बतलाया गया है, उसके प्रथम तृतीयांश में स्पर्शाशौच माना जायगा । प्रथम उदाहरण तृतीयांश के लिए - यदि कर्माशौच १ मास का है, तो स्पर्शाशौच कम्र्माशौचात्मक १० दिन मास का के है, तो स्पर्पाशौच पर्य्यन्त ( आरम्भ के १० दिन पर्यन्त ) माना जायगा । यदि कर्माशौच स्पर्शाशौच १ दिन का माना ३ दिन का माना जायगा । यदि कर्माशौच ३ दिन का हैं, तो स्नान से पहिले पहिले जायगा । यदि कर्माशौच ३ दिन से भी कम का है, तो स्पर्शाशौच माना जायगा । १ - माङ्गलिकाशौचकालः – वर्षात्मकः २ - कर्माशौचकाल: --मासात्मकः -पुत्रे ३ – स्पर्शाशौचकालः --- दशाहात्मकः m ४ * अन्यत्र सपिण्डादिषु माङ्गलिकाशौचाभावः । तारतम्येन च निम्ना व्यवस्था --१ - मासात्मकः - कर्माशौचकालः १० - दशाहात्मकः - स्पर्शाशौचकालः ** १० - दशाहात्मकः - कर्माशौचकालः ३- त्र्यहात्मकः --- स्पर्शाशौचकालः ३- त्र्यहात्मक: --कम्र्माशौचकालः १- अहात्मकः- - स्पर्शाशौचकालः * - त्र्यहोभिः पूर्वं -- कर्म्माशौचकालो यदि, * - तदा स्नानात् प्राक् स्पर्शाशौचकालः * ४७६

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" j आशौचविज्ञानोपनिषत् जिस प्रकार कर्माशौच के प्रथम तृतीयांश स्पर्शाशौच के लिए नियत है, एवमेव स्पर्शाशौच का प्रथम तृतीयांश अस्थिसञ्चय - काल माना गया है । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, चारों का पूर्ण स्पर्शाशौच-काल क्रमशः '१० -१२-१५-३०१ दिनों का माना गया हैं । इनका प्रथम तृतीयांश क्रमशः चतुर्थ, पञ्चम, षष्ठ, दशम - अहः, पड़ता है । एवं पूर्ण - स्पर्शाशौचपक्ष में ये ही दिन क्रमश: चारो वर्णों के अस्थिसञ्चय-काल हैं । यदि स्पर्शाशौच तीन दिन का है, तो उस दशा में चारों वर्णों के अस्थिसञ्चय के लिए द्वितीय दिन गृहीत मान लिया गया है । यही मरणाशौचसम्बन्धिनी स्पर्शास्पर्शव्यवस्था का दिग दर्शन है । जनननिमित्त सूतक शौचसम्बन्धी स्पर्शस्पर्श के सम्बन्ध में भी विशेषता ज्ञातव्य है । पुत्र, अथवा तो कन्या, दोनों की उत्पत्ति से प्रसवकर्त्री सूतिका के साथ दशरात्रिपर्यन्त अस्पृश्य-वलक्षण शरीराशौच ( स्पर्शाशौच ) का सम्बन्ध है । पिता स्नानमात्र से स्पर्शाशौच से विमुक्त है । माता पिता से अतिरिक्त सपिण्डों के साथ अपत्योत्पत्ति से स्पर्शाशौच का कोई सम्बन्ध नहीं है | यदि पति ( सूतिकापति ) सूतिका का स्पर्श कर लेता है, तो तद्गत अस्पृश्यता - प्रयोजक का स्पर्श द्वारा इस में भी संक्रमण हो जाता है । एवं उस दशा में इसे भी १० रात्रिपर्य्यन्त श्य रहना पड़ता है । यदि सपिण्डों में से कोई सूतिका का स्पर्श कर लेते हैं, तो स्नानमात्र से ' इन का स्पर्शजनित अशुचिभाव निवृत्त हो जाता है । कर्तव्याकर्त्तव्यमीमांसा-मरणाशौव, तथा जन्माशौच में कौन कौन कर्म ग्राह्य, तथा कौन कौन त्याज्य हैं? इस प्रश्न मीमांसा भङ्गिक है । शास्त्ररहस्यवेत्ता विद्वानों का इस सम्बन्ध में आदेश है कि, उभयविध शौच काल में भूत यज्ञ, मनुष्ययज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, ये पाँच महायज्ञ, नित्यविहित सन्ध्योः पासनकर्म्म, तथा यजन, याजन, अव्यापन, अध्ययन दान, प्रतिग्रह, ये ६ ओं नित्यकर्म छोड़ देनें चाहिएँ । ये १२ हों कर्म प्रत्येक गृहस्थी के लिए नित्यकर्म्म मानें गए हैं । एव अघान्तराय के सम्बन्ध शौचकाल में १२ हों कर्म्म वर्ज्य हैं । दाक्षिणात्य एवं गौड़ सम्प्रदायभेद से इन वर्ज्य सन्ध्योपासनादि कर्मों के सम्बन्ध में कुछ एक विशेष धम्मों का समावेश हो जाता है । उदाहरण के लिए सन्ध्योपासन-कर्म को ही लीजिए । १ - आचमन, २- प्राणायाम, ३- आचमन, ४ - मार्ज्जन ५ - श्राचमन, ६ - सूर्य्यार्घ्यदान, ७ - सूर्योपस्थान, ८ - गायत्री जप, इन आठ अवान्तर कम्मों से सन्ध्यावन्दन - कर्म का स्वरूप सम्पन्न होता है । अवान्तर कर्मकत्वर्थ हैं, तत्समष्टिलक्षण सन्ध्यावदन पुरुषार्थकर्म है । कितने एक धर्माचायों का इस सम्बन्ध में यह निर्णय है कि, आशौच प्राप्त होने पर आचमन, तथा सूर्योपस्थान नहीं करना चाहिए । प्राणायाम नहीं करना, यह एक पक्ष है । बिना मन्त्रप्रयोग के प्राणायाम करना, यह पक्षान्तर है । मान, तथा गायत्री जप नहीं करना, यह एक पक्ष है । मानसमन्त्रद्वारा गायत्री जप करना, पक्षान्तर है । ४७७

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महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३, पृष्ठ 540 का मूल पृष्ठ
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श्राद्धविज्ञान मन्त्रोच्चारणपूर्वक सूर्य्यार्घ्यदान करना ही चाहिए, यह एक पक्ष है । दाक्षिणात्य कहते हैं, केवल समन्त्रके सूर्य्यार्घ्यदान करना चाहिए । गौड़ कहते हैं, सूर्य्यार्घ्यदान भी नहीं करना चाहिए । अपितु ऐसी प्रदक्षिणापूर्वक मानसी सन्ध्या सूर्य्य का ध्यान करते हुए नमस्कारमात्र करना चाहिए । दर्भ - जल से विवर्जित ' आशौचकाल में भी अवश्य हो करनी चाहिए । यही सन्ध्यावन्दनकर्म में विशेष संशोधन है । पञ्चमहायज्ञान्तर्गत ब्रह्मयज्ञ का तात्पर्य है वेदाध्ययन, तथा वेदाध्यापन | आशौचकाल में - तर्पण यह, ब्रह्मयज्ञ सर्वथा वर्जित ही माना गया है । पिण्डदान श्राद्धकर्म है, उदकदान तर्पणकर्म्म है | में श्राद्ध भी ग्राह्य कर्म्म ही दूसरा पितृयज्ञ नामक महायज्ञ है । इनमें श्रभ्युदयिक श्राद्ध तो जननाशौचकाल कर १० वें दिन है । दूसरे मरणशौचसम्बन्ध में कुछ विशेषताएं और हैं । मरने के दिन से आरम्भ १६ श्राद्ध होते पर्य्यन्त ' दशगात्रश्राद्ध ' ' होता है. एवं श्रद्यश्राद्ध से आरम्भ कर सपिण्डीकरणपर्यन्त ये दोनों मरणाशाचकाल हैं । दशगात्रश्राद्ध, तथा षोडशश्राद्ध मरणाशौचकाल में हीं विहित हैं । अतः में अनिवार्य हैं । षोडश श्राद्धान्तर्गत सपिण्डीकरण के अनन्तर ही श्राद्धकर्त्ता का पुत्र आशौच सम्बन्ध से विमुक्त होता है । फलतः दोनों की आशौचकाल में अनिवार्य्यता सिद्ध हो जाती है । मातापिता के निधन ) भेद से तीन पर पुत्र के साथ दशाहव्याप्य, द्वादशाहव्याप्य, सम्वत्सरव्याप्य ( १०-१२ दिन, १ वर्ष जाने पर प्रकार से शौच का सम्बन्ध होता है । दशाहव्याप्य आशौच १० वीं रात्रि के समाप्त हो दशगात्रश्राद्धकर्म्म समाप्त हो जाने से निवृत्त हो जाता है । द्वादशाहव्याप्य आशौच १२ वीं रात्रि के समाप्त हो जाने पर षोडशश्राद्ध के अन्तिम कर्म स्थानीय सपिण्डीकरणकर्म से निवृत्त हो जाता है । एवं तीसरा सम्वत्सरव्याप्य श्राशौच पूरे चान्द्रसम्वत्सर के अवसान पर उस समय निवृत्त होता है, जब कि प्रेतात्मा चन्द्रलोक में जाकर सापिण्ड्यभाव को प्राप्त हो जाता है । सपिण्डबन्धुओं के साथ साथ त्र्यहव्याप्य, दशाव्याप्य इन दो आशौचों का ही सम्बन्ध होता है । इन में व्यहव्याप्य शौच तीसरी रात्रि के अवसान पर अस्थिसञ्चय - कर्मानन्तर निवृत्त हो जाता है, एवं दूसरा दशाहव्याप्य आशौच १० वीं रात्रि के अवसान पर दशगात्र श्राद्धानन्तर निवृत्त होता है । इस विवेचन से प्रकृत में यही बतलाया है कि, द्वाद्वंशगात्र श्राद्ध, तथा षोडशश्राद्ध, दोनों शौच - निवर्त्तक श्राद्ध हैं । अतएव ये आशौच काल में अवश्यमेव ग्राह्य हैं । ' अमावास्या ' नामक पर्व में होने वाला ' पिडण्डपितृयज्ञ ' नामक पितृयज्ञ अवश्यमेव शौच काल में विवर्ज्य है । वर्ज्य पितृकर्म से पिण्डपितृयज्ञ ही अभिप्रेत है । यही पितृयज्ञ के सम्बन्ध में विशेष व्य है । स्वयं यज्ञ करना, यजमान के यज्ञ में ऋत्विग्रूपेण वृत होना ' देवयज्ञ ' नामक महायज्ञ है ' । आशौचकाल में ऋत्विग्रूपेण वृत होना तो एकान्ततः वर्ज्य है । दूसरे शब्दों में याजनकर्म्म सर्वथा वर्ज्य है | दूसरे होमात्मक स्वकर्तृ के यजनकर्म में कुछ एक विशेष नियमों का अनुगमन करना पड़ता ४७८