Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 541–550
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 541–550
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शौच विज्ञानोपनिषत् है । यदि पूरे दिन पर्यन्त आहुति सम्बन्ध के बिना भी आहवनीयानि कुण्ड में सुरक्षित है, अग्निवि च्छेद नहीं हुआ है, तो उस दशा में आशौचकाल में अग्निहोम नहीं करना चाहिए । आशौचानन्तर उसो अविच्छिन्न अग्नि से होमकर्म्म यथावत् प्रक्रान्त हो जायगा, एवं पुनराधान की आवश्यकता न पड़ेगी । यह पक्ष बह्वचों से सम्बन्ध रखता है । इनका अग्नि वैध समिद्धाग्नि है । अतएव यह १० दिन पर्यन्त-विच्छिन्न रह जाता है । तैत्तिरीयादि का अग्नि समिन्धनाभाव से अधिक से अधिक ४ दिन पर्यन्त आहुतिसम्बन्ध के बिना अविच्छिन्न रह सकता है । चौथे दिन तो यह लौकिक अग्नि की कक्षा में आजाता है | क्योंकि अग्नि का अविच्छेद अपेक्षित है, वह बिना आहुति सम्बन्ध के सम्भव नहीं है अतएव इस पक्ष में आशौच रहने पर भी शुष्कान्न से, किंवा फलादि से अन्य ब्राह्मण के द्वारा होम कराते रहना आवश्यक है । 7 इसी प्रकार स्मार्तहोम में भी शौच प्राप्त होने पर स्वयं न करते हुए ब्राह्मण के द्वारा अकृतान्न कृताकृतान्न, दोनों में से किसी एक द्रव्य से स्मार्त्त होम कराते रहना आवश्यक है । प्रत्येक दशा में आशौच काल में कृतान्न का सम्बन्ध सर्वथा वर्ज्य ही माना गया है । ओदन भात ), सक्तु ( संत्तू, लाज ( खील ), मोदक, आदि ' कृतान्न ' हैं । तण्डुल, माष, मुद्ग, आदि ' कृताकृतान्न ' हैं । एवं ब्रीहि, गोधूमादि अकृतान्न ' हैं । वैध स्नान ( तीर्थादि स्नान, तथा नित्यविहित समन्त्रक शुद्धिस्नान ), पञ्चदेवतापूजनात्मक नित्यवि-हित उपासना, आदि स्मार्त्त कर्म आशौचकाल में ब हैं । आगमशास्त्रोक्त ( तन्त्रमार्गानुगत ) अनुष्ठान सकाम, निष्काम, भेद से दो भागों में विभक्त हैं । ये भी देवयजुनकर्म में ही अन्तर्भूत हैं । यदि आगमोक्त अनुष्ठान काम्य है, विशेषकामना सिद्धि के लिए इसका आरम्भ हुआ है, और उसी मध्य में यदि आशौच उपस्थित हो जाता है, तो बाह्य क्रियाकलाप छोड़ देना चाहिए । केबल मानसी प्रक्रिया के द्वारा ध्यानयोग से अमन्त्रक अपने संकल्प को सुरक्षित रखना चाहिए । यदि यही अनुष्ठान निष्काम है, तो आशौच में भी यह यथावत् प्रक्रान्त रहेगा । न सकाम का नियम है, न निष्काम का, उस दशा में आशौचावसर पर इसे सर्वथा छोड़ ही देना पड़ेगा | आशौच - निवृ-त्यनन्तर पुनः यह कर्म्म प्रक्रान्त होगा । ये ही श्रौतस्मार्त्त लक्षण इस देवयज्ञ - कर्म की कुछ एक विशेषताएँ हैं । दान देना, तथा प्रतिग्रहग्रहण करना, दोनों की समष्टि भूतयज्ञ है । अन्य के लिए श्रद्धा-पूर्वक दिया जाने वाला द्रव्य धर्म्मपरिभाषा में ' बलि ' नाम से व्यवहृत हुआ है । इस बलि का प्रदान दान है, ग्रहण प्रतिग्रह है, समष्टि भूतयज्ञ है । पुत्रोत्पन्न हो जाने पर नालच्छेद से पि पहिले सुवर्ण, भूमि, पशु, धान्य, गुड़, तिल, घृत, वस्त्र, तुरंग, रथ, छत्र, मत्स्य शय-नाशनादि उपकरण, इनका दान अवश्यमेव हो सकता है । साथ ही इनका ग्रहण भी किया जा सकता है । नालच्छेदानन्तर ही दाता में आशौचदोष का उदय होता है । अतः इससे पहिले दाता -४७६.
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श्राद्धविज्ञान ' प्रतिग्रहीता, दोनों की भूतयज्ञमर्यादा सुरक्षित रहती है । नालच्छेदानन्तर आशौच का संक्रमण हो जाता है उस दशा में श्राशौच से युक्त गृहस्थी के लिए इस भूतयज्ञ का निषेध है । हाँ, इस आशौचदशा में भी लवण, मधु, पुष्प, फल, शाक ( अग्नि सम्बन्ध निरहित, काष्ठ, लोष्ट, तृण, पर्ण, दधि, घृत, तैल, मृगचर्म्म, औषधि, त्री ह, गोधूमादि शुष्कान्न, इत्यादि परिगणित पदार्थ अशौची की अनु-मति से अन्य व्यक्ति अपने व्यवहार में ला सकता है । अन्य परिपक्व अन्नादि लक्षण दान — प्रतिग्रह रूप भूतयज्ञ सर्वथा वर्ज्य है । ये ही भूतयज्ञ के विशेष अनुबन्ध हैं । नियत काल में याकांक्षी आगत मनुष्यों का भोजन - स्थानादि से सत्कार करना हीं मनुष्ययज्ञ है । जनन - मरणलक्षण दोनों हीं आशौचों में आगत अतिथियों को आशौच से युक्त कुल का आतिथ्य स्वीकार करना वर्ज्य है । क्योंकि भोजनादि के सम्पर्क से अतिथि भी आशौचदोष से ' युक्त हो जाता है । यदि अतिशय स्नेह के कारण कोई आगत मित्रादि इस आशौच से ममत्त्व रखता है, तो उस दशा में यह ऐसे अन्न का भी ग्रहण कर सकता है । परन्तु इस आशौचसंसर्ग में आकर नियतकाल पर्यन्त इसे भी अवश्य ही इस अशुचिसन्बन्ध से युक्त रहना पड़ता है । अतएव यह भी तत्सम पन्त के लिए आशौचविरहित शुचिभावापन्न गृहस्थियों के लिए अव्यवहार्य बन जाता है | यही मनुष्ययज्ञानुगत विशेष वक्तव्य है । इन श्रौत पाँच महायज्ञों से ही यजन - याजनादि इतर स्मार्त्त कर्म भी गतार्थ हैं । बतलाया गया है कि, बहिः शरीर, अन्तःशरीर, सत्त्व, इन तीन अधिष्ठानों के सम्बन्ध से आशौच कर्म स्पर्शाशौच, कर्म्माशौच मङ्गलाशौच, भेद से तीन भागों में विभक्त है । इस शौचत्री के सम्बन्ध में कुछ एक विशेषताएँ ज्ञातव्य हैं । श्राद्धकर्त्ता पुत्र को १० दिन का स्पर्शाशौच होता है, सपिण्डवंशजों को ३ ही दिन का स्पर्शाशौच होता है । आशौचावस्था-पन्न श्राद्धकर्त्ता पुत्र को बड़े पवित्रभाव से रहना चाहिए । ब्रह्मचर्य, इन्द्रियनिग्रह, अधः शयन, पराङ्ग-स्पर्शवर्जन, शुचिभावापन्न जड़ तथा चेतनों के स्पर्श का वर्जन, तैलाभ्यङ्गादि परिवर्जन, आदि नियम-विशेषों का इसे पालन करना चाहिए । अशुचिभावापन्न ( अघदोषापन्न ) व्यक्ति के कर्त्तव्य, अकर्त्तव्य-भावों की यही संक्षिप्त मीमांसा है । शौचनिमित्तमीमांसा जन्म, मृत्यु, क्रिया, दोष, भेद से अधाशौच के चार निमित्त बतलाए गए हैं । अब इस सम्बन्ध विचार यह करना है कि, ये चारों भाव घाशौच के निमित्त कैसे, तथा क्यों बनते हैं?, एवं कैसे इनके समावेश से परम्परया अन्तरात्मा अशुचिभावापन्न हो जाता है? । चारों में से क्रमप्राप्त पहिले जन्मनिमित्तक सूतकाशौच की ही मीमांसा कीजिए । जन्माशौच की मूलप्रतिष्ठा योनिस्थानीय स्त्री का वह ' रज ' माना गया है, जो पुरुष के शुक्र से मिथुनीभाव में परिणत होकर गर्भस्थिति का ४५०
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" शौचविज्ञानोपनिषत् का कारण बनता है । योनिस्थानीय यह ' रज ' किसी विशेष प्राण त हो जाता है । इसी मलिन रज के सम्बन्ध से रजःस्वला स्त्री सम्बन्ध से अशुचिभाव में परि-' मलिना ' कहलाई है । सृष्टि के आरम्भक तत्त्व असङ्ग, ससङ्ग, भेद से दो भागों में विभक्त हैं । प्रारणमात्रा असङ्ग तत्त्व है, भूतमात्रा ससङ्ग तत्त्व है । ससङ्ग भूतमात्रा - गर्भित असङ्ग प्रारणमात्रा से प्रसङ्ग प्राणसृष्टि होती हैं, जिसे ' गुणसृष्टि ' भी कहा जाता है । एवं असङ्ग प्राणमात्रा - गर्भित ससङ्ग भूतमात्रा ससङ्ग भूत-सृष्टि होती है, जिसे कि विकारसृष्टि भी कहा जाता है । गुणात्मिका प्राणसृष्टि अक्षरसृष्टि है, एवं इसमें प्राण का प्राधान्य है । असङ्ग प्रारणमात्रा को प्रधान आरम्भक बनाने वाली अक्षर सृष्टि अमूर्त-सृष्टि है । एवं ससङ्ग भूतमात्रा को प्रधान आरम्भक बनाने वाली क्षरसृष्टि मूर्त्तसृष्टि है । अमूर्त -सृष्टि अमृतप्राधाना है, मूर्त्त सृष्टि मृत्युप्रधाना है । 7 दोनों में असङ्ग प्राणतत्त्व अपने सङ्ग धर्म से जहाँ अधामच्छद है, वहाँ यह प्राणतत्त्व भूतमात्रा से बहिर्भूत रहने से रूप - रस- गन्ध - स्पर्श - शब्दातीत बनता हुआ इन्द्रियातीत भी है । अपनी अवस्थिति के लिए भूतवत् स्थान न रोकने वाले इस अमूर्त्त प्राणतत्त्व का जिस भौतिक पदार्थ पूर्ण विकास रहता है, वह भौतिक पदार्थ भी प्राणपूर्णता से अधामच्छद बन जाता है । एवं यह श्रेय पाँचों भूतों में केवल तेज को, तथा तत्प्रवर्ग्यभूत चतुरिन्द्रिय को ही प्राप्त है । ' प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ' इत्यादि प्रश्नोपनिषत् के अनुसार सौर प्रकाश ( तेजो नामक भूत ) में प्राण का पूर्ण विकास है । अग्नि, दीपक, विद्युत, चन्द्रमा, आदि में उपलब्ध तेज ( प्रकाश ) सौर इन्द्रप्राण का ही प्रवर्ग्याश है, जैसा कि “ रूपं रूपं मघवा बोभवीति " - " इन्द्रो रूपाणि कनिक्रदचरत् " - " इत्था चन्द्रमसो गृहे " - " विद्य द्वा-आदित्यः " इत्यादि श्रुतिवचनों से प्रमाणित है । ' त्वं ज्योतिषा वि aat aa ' इत्यादि ऋग्वन के अनुसार दा सोमतत्त्व ही दाहक सावित्राग्निमय सौर ' मघवा ' नामक इन्द्र से युक्त हो कर प्रकाश स्वरूप में परिणत होता है । कहना यही है कि, प्राणपूर्णता से ही यह प्रकाश अधामच्छंद, तथा असङ्ग बन रहा है । एक प्रासाद में १० दीपक रख दीजिए, दसों का प्रकाश निर्विरोध सङ्गरूप से एक ही प्रासाद में अन्तर्भुक्त हो जायगा । यदि पार्थिव भूतादिवत प्रकाश भी धामच्छद होता, तो एक दीपप्रकाश-मण्डल में अन्य दीपप्रकाशमण्डल का प्रवेश असम्भव था । प्राणपरिपूर्ण, अतएव धामच्छद, तथा असङ्ग बने हुए इस सौर तेजोभाग से चक्षुरिन्द्रिय का निर्माण हुआ है । अतएव यह भी अधामच्छद, तथा सङ्ग है । पुरोऽवस्थित पदार्थों के सभी प्रतिविम्व सूक्ष्मताराग्रवत चक्षुपटल पर निर्विरोध ' समाविष्ट हो जाते हैं । ऐसी स्थिति में वर्त्तमान वैज्ञानिकों का पदार्थमात्र को धामच्छद बतलाना क्या प्रौढ़िवाद नहीं माना जायगा? । अस्तु, प्रकृत में वक्तव्य यही है कि, असङ्गप्राणात्मिका भूतगर्भिता प्राणसृष्टि अमूर्त्ता है । इस अमूर्त्तलक्षणा प्राणसृष्टि का मुख्य उद्गमस्थान प्राणमय - स्वयम्भू - विवर्त्त माना गया है । स्वयम्भू के ' ४८१
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श्राद्धविज्ञान अनन्तर आपोमय परमेष्ठी विवर्त्त प्रतिष्ठित है । यहीं से ससङ्ग भूतमात्रात्मिका ( विकारसृष्टि, भूतसृष्टि ) का उपक्रम होता है । पारमेष्ठ्य स्नेहगुणप्रधान भृगु मूर्त्तलक्षणा मैथुनी सृष्टि उभयात्मक अत्रि, इन तीन तत्त्वों की समष्टि ही ' आप ' हैं । इनमें घन - तरल, - विरलभेद तेजोगुणप्रधान से अङ्गिरा की भी, आपः, वायुः, सोमः, ये तीन अवस्था हैं । एवं अङ्गिरा की भी अग्निः, यमः, श्रादित्यः, भेद भृगु से अवस्था हैं | परन्तु तीसरे अत्रि की एक ही अवस्था है । अतएव ' न त्रिः ' निर्वचन से इस तीन मेष्ठ्यप्राण को ‘ अत्रि ' कहना अन्वर्थ बनता है । इसी अत्रिप्राणसमन्वय से पारमेष्ठ्य सोम तृतीय पार-परिणत होकर धामच्छद बनता हुआ सुप्रसिद्ध चन्द्रमा - रूप में परिणत होता है । अत्रिप्राणसम्बन्ध पिण्डरूप में से ही पुराणशास्त्र ने चन्द्रमा को अत्रिपुत्र माना है ( देखिए ब्रह्माण्डपुराण १३०अ ० ) । स्नेहगुणक पारमेष्ठ्य सोम के प्राधान्य से अत्रिप्राण प्राणात्मक रहता हुआ धामच्छद बन जाता है । सर्वथा विभक्त भौतिक परमाणुओं को एकत्र समन्वित रखना भी श्रागे जाकर का कर्म्म माना जा सकता है । मूर्तसृष्टि का अधिष्ठान सोमावच्छिन्न यही त्रिप्राण है इसी अत्रिप्राण तथा आङ्गिरस अग्नि, दोनों के चितिलक्षण अन्तर्य्याम सम्बन्ध का संयोजक बन कर । भार्गव सोम, डालना इसी त्रिप्राण का कर्म है । तत्तत् विशेष पदार्थों में यह अत्रिप्राणमात्रा तारतम्य इन्हें मूर्तरूप दे रहती है । पाषाणादि घनतम द्रव्यों में त्रिप्राण अधिक मात्रा में निशिष्ट है । मएमयपात्र से से प्रतिष्ठित सौर रश्मियाँ अवारपारीण सम्बन्ध करने में असमर्थ हैं । यदि मिट्टी में से अािरण का अधिकांश भाग जाता है, तो यही मिट्टी ' काच ' बन जाती है । सौररश्मियाँ अवारपारीण बन जाती हैं । निकाल दिया में अत्रि-मात्रा और भी स्वल्प है । परमाणुओं को घनता प्रदान करना यद्यपि श्रत्रिप्राण का कर्म वायु गया है, तथापि वस्तुगत्या यह घनता ' अश्मा सोम ' का ही धर्म माना जायगा । त्रिप्राण को बतलाया केवल अश्मसोम का सहायक माना जायगा । अत्रिप्राण का अपना प्रातिस्त्रिक धर्म तो एकमात्र पारदर्शकता प्रतिबन्धकत्त्व ही माना गया है । तमःप्रधान मलभाग को वस्तुओं में अन्तम सम्बन्ध -कर उन वस्तुओं की पारदर्शकता का अभिभव कर डालना हीं श्रत्रिप्राण का मुख्य से प्रतिष्ठित प्रत्यक्ष प्रमाण रही है कि, यद्यपि एक मिट्टी का पात्र काचपात्र की अपेक्षा स्वल्परूप से कर्म्म संघठित है । है इसका , एवं काचपात्र के परमाणु मृणमयपात्र मी अपेक्षा कहीं अधिक संश्लिष्ट हैं । तथापि सौर रश्मियाँ मृण्मयपात्र को को छेद कर बाहिर नहीं निकल सकतीं, किन्तु काचपात्र से बाहिर निकल जातीं हैं । एक तिल, जो किकाच की अपेक्षा सर्वथा श्लथात्रयव है, सौररश्मि का अवरोधक बन जाता है । आगत रश्मि के आगे एक रख दीजिए, रश्मि तिल से टकराकर वापस प्रतिफलित हो जायगी । उधर तिल से अपेक्षाकृत अधिक तिल संश्लिष्टावयव काच रश्मि का प्रतिफलन करने में असमर्थ हो जायगा । हाँ यदि इसीकाच के पृष्ठभाग में अनुकूलभूत सहयोग से अत्रिप्राण का सहयोग करा दिया जायगा, तो वही काच दर्पणरूप में परिणत होता हुआ अवश्यमेव रश्मि का अवरोधक बन जायगा । इसी आधार पर पारदर्शकता प्रतिबन्धकत्वही अत्रि का मुख्य धर्म माना जायगा । पार्थिव भूमा ( भूछाया ), तथा चान्द्रभूभा, दोनों में त्रिप्राणका ४६२
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शौचविज्ञानोपनिषत् साम्राज्य है | पार्थिव छायामय अत्रि से चन्द्रग्रहण होता है । फलतः ग्रहणकाल में चान्द्र - सौर तेज भी होता है, एवं चान्द्रच्छायामय अत्रि से सूर्य्यग्रहण से उसी प्रकार अघाचिभाव में परिणत हो जाता इस मलीमस - ज्योतिर्विरोधी अत्रिप्राण के सम्बन्ध है, जैसे कि जननादि निमित्तों भाव में परिणत हो जाता है । ग्रहणकाल में पार्थिव से महानात्मा अशुचि-ग्रहणकाल में ' हम अस्पृश्य क्यों बन जाते हैं?, भोजनादि प्रजा आशौचसम्बन्ध से क्यों युक्त हो जाती है?, की मौलिक उपपत्ति यही अत्रिप्राणजनित अशुचिभाव कर्म ग्रहण में क्यों निषिद्ध हैं?, इत्यादि प्रश्नों प्रजा अपने आपको नहीं बचा सकती । अत्रिप्राण के इन है, जिसके सम्पर्क से सूर्य चन्द्रमण्डलमुक्का पार्थिव साक्षात्कार किया, साक्षात्कार करके लोक में प्रवृत्त गुप्त रहस्यों का जिस वैज्ञानिक ने सर्वप्रथम प्रणाली के अनुसार ' अत्रि ' नाम से ही प्रसिद्ध हुए किया , जैसाकि , वहीं वैज्ञानिक, एवं तद्वंशधर भी तत्समय की इत्यादि मन्त्रवर्णन से प्रमाणित है । – ' अत्रयस्तमन्वविन्दन् न ह्यन्येऽशक्नुवन् ' उक्त अत्रिप्राणमीमांसा का निष्कर्ष यही हुआ कि पारदर्शकता प्राण ही अग्नि- सोमसमन्वय से मैथुनी सृष्टि का प्रधान प्रतिबन्धक, ज्योतिर्विरोधी, अत्रि-अधिष्ठाता बनता है । अत्रप्राण बिना केवल अग्निसोम का समन्वय भूतसृष्टिकर्म में सर्वथा के सहयोग के का उदय होता है, अतएव इसे कायाकल्प कहा जाता है । असमर्थ इसकी है । कल्पचिकित्सा में नवीन शरीर सड़ाना - गलाना पड़ता है, अनन्तर नवीन अङ्क रोदय होता सिद्धि के लिए पहिले पूर्वशरीर को प्राप्तिका द्वार है । बिना उसके सहयोग के कल्पचिकित्सा है । यह सड़ान - गलान उसी अत्रिसम्पत्ति-उदाहरण बना लीजिए । सर्वत्र आपको मलीमस अत्रिप्राण भी असम्भव है । किसी भी भूतसृष्टिको स्वाभाविक सृष्टिनियमानुसार पुरुषसृटि में भी अवश्यमेव के सम्बन्ध का साक्षात्कार होगा । इस त्रिप्राण का सहयोग स्वीकार करना पड़ता है । स्त्री के गर्भाशय में प्रतिष्ठित रज ( रक्त - खून ) अग्नि स्खलित शुक्र सोम है । दोनों का मिथुनभाव रजः प्रतिष्ठित है, पुरुष के अण्डकोश में प्रतिष्ठित समर्थ होता है | स्त्री के रज की शुद्ध, मलिन, भेद से दो अत्रिप्राण के सहयोग से ही गर्भाधान में भावों का प्रतिक्षण विस्र सन किया करता है । यही विस्रस्तभाग अवस्था मानी गई हैं । प्रत्येक पदार्थ स्वानुगत प्रवर्ग्य है, यही मलभाग है सञ्चयभाव में आकर कालान्तर में अशुचिभाव का कारण, यही बन जाता है । इसी प्रवर्ग्य -आधार पर शरीरादि मलों की शुद्धि विहित है, जैसा कि पूर्वपादित मलीमसभाव के विस्तार से बतलाया जा चुका है । शुद्ध रज से भी इस स्वाभाविक पञ्चधर्म्मशुद्धिसंस्कार - व्याख्या में प्रवर्ग्यभूत मलभाग ( दग्ध रज ) विस्रस्त होता रहता है । यह वित्रसन मर्य्यादा के प्रभाव से तिथियों में प्रभूतमात्रा में परिणत होता हुआ बाहिर निकल सचित होते होते प्रतिमास में नियत मलिनरज है । निर्गमन से आरम्भ कर निर्गमन समाप्ति पड़ता है । यही रज की मलिनावस्था, किंवा पर्यन्त इती मलिन रज के सम्बन्ध से स्त्री ४८३
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श्राद्धविज्ञान मूर्त्तसृष्टिप्रवर्तक अत्रिप्राण विकसित रजःस्वला कहलाई है । इसी मलिनरज में पारदर्शकताप्रतिबन्धक कहलाई है । रजः प्रतिष्ठित यह अत्रिप्राण एक ओर रहना है । अतएव रजः स्वला स्त्री ' आत्रेयी ' अपने पारदर्शकता प्रतिबन्धक धर्म्म से सूर्य्यगत जहाँ मूर्त्तसृष्टि का प्रवर्त्तक है, वहाँ दूसरी ओर यही का विरोधी है । दूसरे शब्दों में सौर प्रारणात्मक अमूर्त्त प्राणतत्त्व से अनुगृद्दीत प्राणात्मक अन्तरात्मा का विरोधी है । इसे इस रजोगत मलीमस अत्रि-शुक्रगत ब्रह्म - क्षत्र - विड्भावप्रवत्तक दिव्यवीर्य बचाने के लिए ही आत्रेयी स्त्री के स्पर्श का दृढतम सम्बन्ध से, तद्गत अशुचिसम्बन्ध - संक्रमण से से स्पर्शकर्त्ता एनोदोष का पात्र बनता हुआ ' एनस्वी ' निषेध हुआ है । अवश्य ही रजःस्वला स्त्री के स्पर्श आदेश दिए ही हैं, साथ ही साक्षात् श्रुति ( पापी ) बन जाता है । स्मृति ने तो इस सम्बन्ध में अनेक ने भी इस स्पर्शदोष से द्विजाति को एन वी बतलाया है । देखिए! - अत्रेवत्या ३ दिति । “ तद्धैतद्द ेवाः - रेतश्चर्म्मन् वा, यस्मिन्वा बभ्रुः, तद्वस्म पृच्छन्ति योषायै वाचो देवताया ततोऽत्रिः सम्बभूव । तस्मादप्यात्रेय्या योषितैनस्वी । एतस्यै हि एते सम्भूता: " - शत ० १।४।५।१३ । राज को आग्नेय माना गया है । उधर-अत्रि का रज के साथ सम्बन्ध बतलाया गया है । एवं इस अग्नितत्त्व - वाङमय बनता ' तस्य वा एतस्याग्नेर्वागेवोपनिषत् ' ( शत ० १० ही | ५ | रज ३ | ३ में | ) प्रतिष्ठित के अनुसार होता है, अतएव प्राणात्मक इस हुआ छामच्छद है । अत्रप्राण तद्रूप बन कर कि - ' वागेवात्रि: ' ( शत ० १४ | ५ | २ | २ | ) इत्यादि अत्रितत्त्व को ' वाङमय ' मी मान लिया गया है, जैसा है, एवमेव रक्त में राक्षसप्राण का निगम से प्रमाणित है । जिस प्रकार मांस में पिशाचप्राण रहता राक्षस-करना चाहिए कि, रक्तगत यही प्राधान्य रहता है । पाठकों को यह जान कर कोई आश्चर्य नहीं पुरुषरेत के प्रधान का कारण प्राण अपनी स्वाभाविक अवरोध - शक्ति से स्त्री के शोणित में आहुत । जिस इस राक्षसप्राण का मुख्य धर्म है बनता है । आगत वस्तु को अपने अधिकार में कर लेना ही इसी रेत की रक्षा में असमर्थ है । एकमात्र स्त्री के शोणित का राक्षसप्राण शिथिल होता है, वह बहुत राक्षसप्राण का असृक् से सम्बन्ध है, निम्न आधार पर राक्षसप्राण को रेतोधा मान लिया गया है । . लिखित वचन इसी स्थिति का समर्थन कर रहे हैं-) का प्रादुर्भाव होता है, जो कि रोग * इसी मांसगत पिशाचप्राण के हास से शुष्करोग ( सूखा वाले बच्चों के अपने बच्चों को ' सूखा ' रोग उपदंशादिवत् सांक्रामिक रोग माना गया है । अतएव माताएँ संसर्ग से बचाती रहतीं हैं । ४८४
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I श्राशौचविज्ञानोपनिषत् १ - " सृग्भाजनानि वै रक्षांसि " ( कौ ० ना ० १० । ४ । ) । २ - " रक्षसां ह्येष भागः, यदसूक " ( शत ० ३२८ । २ । १४ । ) । ३ - " रक्षांसि योषितमनुसचन्ते । तदुत रक्षांस्येव रेत आदधति " --शत ० ३।८।२।१४ | मूर्त्तसृष्टिप्रवर्तक त्रिप्राण राक्षसप्राणयुक्त इसी रज ( रक्त मैं प्रतिष्ठित रहता है । अतएव इसकी राक्षसप्राण ' तुलना की जा सकती है । वही गर्भाधान इसका भी व्यापार है । राक्षसप्राणा-वच्छिन्न, मलीमस, मलिनरजः प्रतिष्ठित, अतएव सर्वथा अशुचिभावात्मक तत्त्व के इसी स्वरूप-धर्म का निम्न लिखित शब्दों में स्पष्टीकरण हुआ है-१ – त्रिो वै रक्षांसि " ( ० ० ३।१ । ) । २ -- " पाप्मानोऽत्रिणः " ( ० ० ३ । १ । ) । ३ - " रचांसि वै पाप्मा - अत्रिणः " ( ऐ ० वा ० २२ । ) । एक प्रासङ्गिक रहस्य का विश्लेषण और । उक्त कथन से यह भलीभाँति सिद्ध हो जाता है, कि, स्त्री का राज ऋतुकाल में पाप्मा त्रिप्रारण के विकास से आत्यन्तिकरूप से मलिन हो जाता है । प्रतिमास स्त्री इस पाप्मा से युक्त रहती है । ऋतुस्नानानन्तर यद्यपि ऋतुकाल को छोड़ कर यह शेष दिनों में पवित्र रहती है, तथापि अनुशयरूप से यह पाप्मा सदा ही ( यावज्जीवन ) इस के रज में प्रतिष्ठित रहता है । अतएव वेदस्व. ध्यायादि दिव्यप्राणप्रधान कम्मों में शूद्रवत इसे भी अनधिकृत ही माना गया है । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, इन ४ वर्णों में से तो जन्मना इस पाप्मा से युक्त है ही, साथ ही जगतीछन्दोयुक्त सायंकालन वैश्वदेव तेज से शूद्र सम्भूत वैश्य भी सर्वथा पूत नहीं है । सायंकालगत तमोमय आसुर पाप्मा के अनुशय से यह भी पापसम्भूतही माना गया है । इसी आधार पर भगवान् ने - ' स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रा येऽपि स्युः पापयोनयः ' ( श्रीभगवद्गीता ) रूप से स्त्री- वैश्य - शूद्र- तीनों को पापयोनि माना है । इसी अनुशय के सम्बन्ध शूद्रवर्णाधिष्ठाता पूषा को इस विड्वीर्य्यं का भी अधिष्ठाता मान लिया गया है, जैसा कि, -इत्यादि वचन से प्रमाणित है । क्योंकि वैश्य में बनता हुआ भी वेदाधिकारसिद्ध योग्यता का पात्र " पूषा विशां विट्पतिः ' ( तै ० प्रा ० २।५७ । ४ । ) विश्व देव का प्राधान्य है, अतएव यह पापयोनि मान लिया गया है । विशुद्ध प्राणविज्ञान से सम्बन्ध रखने वालीं ये व्यवस्थाएँ अवश्य ही तत्त्वपूर्ण, अतएव सर्वथा मान्य हैं, जिनका निम्न लिखित शब्दों में विश्लेषण हुआ है-१ – “ स पत एव प्रतिष्ठाया एकविंशतिमसृजत । तमनुष्टुवछन्दोऽत्यसृज्यत । न काचन देवता शूद्रो मनुष्यः । तस्माच्छूद्र उत बहुपशुः श्रयज्ञियो, विदेवो हि । न हि तं काचन देवतान्वसृज्यत । तस्मात् पादावनेज्यन्नातिबर्द्धते । पत्तो हि सृष्टः " ( तां ० ना ० ६।१।११ । ) । ४८५
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श्राद्धविज्ञान २ - " असतो वा एष सम्भूतः यच्छूद्रः " ( तै ० ब्रा ० ३।२।३।६ । ) । ३ - " सूर्यः शूद्रः " ( तै ० ना ० १२६७ ) । ४ - " श्रनृतं - स्त्री, शूद्रः, श्वाः, कृष्णः शकुनिः । तानि न प्रेक्षेत " ( शत ० १४ | १ | १ | ३१ । ) । अनेक-इसी सम्बन्ध में प्रसङ्गतः हमें उस प्रश्न को भी मीमांसा कर लेनी चाहिए, जिसने प्रकार के सन्देहों को प्रकट कर रक्खा है । स्त्रीरज में ऋतुकाल में ( स्नानानन्तर ) गर्भाधान होता है । शुक्र - शोणित के मिथुनभाव में प्रविष्ट औपपातिक जीवात्मा को मातृगन रज, तथा पितुः शुक्र, दोनों के विशेष धर्मों का पात्र बनना पड़ता है । यदि पिता के शुक्र में उपदंश के कीटाणु विद्यमान हैं, तो तदपत्य को भी संक्रमणप्रवाह से इसका कुफल भोगना पड़ता है । एवमेव माता के मलिनर अनुशय से भी यह अपत्य वञ्चित नहीं रह सकता । दग्ध - प्रवर्ग्य- मलीमस - अशुचिभावा-पन्न - सांक्रामिक इस दूषित मातृरज के आत्रेय अनुशय का गर्भस्थ डिम्भ के साथ अन्तर्याम सम्बन्ध हो जाता है । दशमासानन्तर जब यह गर्भ भूमिष्ठ होता है, तो इस में स्वतन्त्ररूप से चितिप्रवर्त्तक अग्नियज्ञ आरम्भ होता है । ज्यों ज्यों शरीराग्निचिति प्रवृद्ध होती जाती है, त्यों त्यों. आयतन बढ़ता जाता है । अन्ततोगत्वा महानात्मरूप बीज की नियत आयतन - सीमा पर जाके अनि कर्म्म अवरुद्ध हो जाता है, आयतनवृद्धि उपरत हो जाती है । इस विशुद्ध शारीराग्नि की वृद्धि से गर्भस्थितिकाल में अन्तर्यामि सम्बन्ध से प्रतिष्ठित वह सांक्रामिक मलिन मातृरज क्षुब्ध हो पड़ता है । परिणामस्वरूप शारीराग्नि के प्रत्याघात से यह वीजातीय क्षुब्ध मातृरज सर्वाङ्गशरीर से फूट निकलता है । क्योंकि यह मातृरज है, अतएव भारतीय प रभाषा में यह रोग सर्वसाधारण में ' माता ' नाम से प्रसिद्ध है । आशौचवत् यह भी सांक्रामिक है । अतएव माता के रोगी को स्वस्थ बालकों से दूर रक्खा जाता है । यही मातृरोगसम्बन्धिनी - पहिली भूतदृष्टि है । प्राणतत्त्व के अन्वेषक ऋषि इस सार्वजनीन भूतदृष्टि पर ही विश्राम नहीं कर लेते । अपितु वे इस मातृरज में मातृशक्ति के भी दर्शन करते हैं । किस मातृशक्ति के?, शीतला शक्ति के । दग्धरज मूर्च्छित है, area यह आग्नेय धर्म से वजित है, अतएव इसे शैत्यधर्मयुक्त मानना न्याय-संगत है । शैत्य सोमधर्म है, सोमगत प्राण ही शक्तितत्त्व है, अग्निगत प्राण ही रुद्रतत्त्व है । इस तत्त्वदृष्टि के आधार पर इसे शीतला माता का प्रकोप माना गया है । रजः प्रतिष्ठित यही मलीमस भाग रासभ ( गर्दभ ) में प्रतिष्ठित है । इसी अशुचि - भावसम्बन्ध से गर्दभ को पशुओं में शूद्र माना गया है, जैसा कि ' शूद्र ' चानु रासभ: ' ( शतः ६ | ४ | ४ | १२ ) इत्यादि वचन से प्रमाणित है । नैदानिक महर्षियोंनें इसी समान धर्म के आधार पर रासभ ( तद्गत प्राण ) को शीतलामाता का वाहन माना है । गर्दभपशु अग्नि का उच्छिष्ट है, प्रवर्ग्यात्मक अनुष्ण पशु है, जैसा कि - " यदर-संदिव, स रासभोऽभवत् " ( शत ० ६ | १ | १ | ११ ) से स्पष्ट है । प्रबल निदाघ भी इस पशु को इसी ४८६
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1 श्राशौचविज्ञानोपनिषत् प्रवर्ग्य- अनुष्ण - रस अनुग्रह से सह्य है । वसन्तऋतु श्रग्नि का उपक्रम है । यहीं से अग्निबल प्रवृद्ध होने लगता है, तथा सोमबल क्षीण होने लगता है । यही शीतलाप्रकोप का प्रधान काल माना गया है । यातयाम ( बासी ) गतरस भोजन, शीतलापूजन, आदि आध्यात्मिक - आधिभौतिक चिकित्साओं का यही मौलिक रहस्य है, जिसका ' हिन्दू - त्यौहारों का वैज्ञानिक रहस्य ' नामक निबन्ध में विस्तार से उपबृ ंहण हुआ है । मलिनी ( रज: स्वला ) स्त्री के शरीर से चार दिवस पर्यन्त इसके गर्भकमल में दग्ध - अशुचि-भावापन्न - अत्रिप्राणात्मक पुराणरज प्रतिष्ठित रहता हैं । प्रवर्ग्य - सम्बन्धेन आत्मगत पावक धर्म से चि रहने से, अत्रिप्राणसम्बन्ध से, गर्भस्वरूपसम्पादक मलीमस कीटाणुओं ( भ्रूणों ) के सम्बन्ध से यह पुराणरज सर्वथा दुष्ट रहता है । इस पुराणरज में प्रतिष्ठित भ्रू कीट म्रियमाण हैं, अतएव इनके सम्बन्ध से यह शोणित सर्वथा अशुचिभावापन्न है । इसके, तथा एतद्युक्ता स्त्री के संसर्ग से सौरप्राणा-गत आयुःसूत्र निर्बल हो जाता है, दिव्यभावानुगत प्रज्ञा मन्द हो जाती है, स्वाभाविक द्विजातिवीर्य्यं अभिभूत हो जाता है, अतएव इस स्पर्शदोष को एक महादोष माना गया है । इस आशौच को हम दोषाशौच कहेंगे, जिसकी शुद्धि के लिए प्रायश्चित्तादि का विधान हुआ है । इस दोषाशौच का निमित्त स्त्री ही बनता है । दूसरे दोषाशौच का शारीर मलों से सम्बन्ध माना गया है । गुणदोषमयं सर्वं स्रष्टा कौतुकी ' न्याय से उत्पन्न होने वाले यच्चयावत् जड़ - चेतन पदार्थ दिव्यभावानुगत गुणों, तथा सृजति श्रसुर-भावानुगत दोषों से, दोनों से युक्त रहते हैं । सुतरां शारीर - धातुओं का भी दोनों से युक्त रहना अनिवार्य बन जाता है । आत्मसीमा में अन्तर्याम सम्बन्ध प्रतिष्ठित, अतएव आत्मगत शुचिधर्म्म से युक्त, अतएव शुद्ध रस, असृक, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्रादि धातु प्रसादगुणक बनते हुए गुण - कोटि में प्रविष्ट हैं । परन्तु इन्हीं विशुद्ध - प्रसादगुणात्मक आत्मधातुओं का वह भाग सर्वथा मलिन है, जो प्रवर्ग्यसम्बन्ध से आत्मसीमा से पृथक होकर बहिर्य्याम बन जाता है । यही व्यक्त धातु मलिन धातु हैं । कफ - लाला - स्वेदादि इसी कोटि के द्रव्य हैं । स्त्री का ऋतुकालगत रज भी इसी प्रवर्ग्यभाव से है | चेतना - सत्त्व - शरीर, तीनों की समष्टिलक्षण अध्यात्मसंस्था के लिए ये सभी मल अशुचिभाव के कारण बनते हैं । अवश्य ही आत्मा से परित्यक्त मलभाग कथमपि आत्मा के लिए हितकर नहीं माने जा सकते । जिस प्रकार मूत्रपुरीषादि की विनिर्गमदशा में शरीर नाशुचिभावापन्न रहता है, एवमेव ये मल भी विनिर्गमदशा में अवश्यमेव शरीराशुचि के प्रवर्त्तक बनें रहते हैं । इस मलाब-स्थापन्न शरीर के स्पर्श से स्पर्शकर्त्ता में अवश्य ही इस मलाशुचि का संक्रमण हो जाता है । किस मलाशुचि के स्पर्शद्वारा स्पर्शकर्त्ता में कैसा - कहाँ - कितना - कबतक - क्या प्रभाव होता है?, इनकी विशुद्धि के क्या उपाय हैं?, इत्यादि प्रश्न निबन्धग्रन्थों में विस्तार से समाहित हैं । ४८७
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श्राद्धविज्ञान मूत्र - पुरीष - कफ आदि के संसर्ग से यदि तद्गत कीटाणुओं का शरीर में संक्रान्त हो जाना वर्त्तमान विज्ञान के लिए इष्टापत्ति है, यदि एक डाक्टर साधारण से फोड़े का ऑपरेशन कर संसर्ग-दोष से बचने के लिए अपना अमूल्य समय साबुन से हाथ धोने में खर्च करना आवश्यक समझता है, तो अवश्य ही इन वैज्ञानिकों को यह मान लेने में संम्भवतः कोई आपत्ति न होगी कि, स्त्री के दुष्टरज से युक्त उसका शरीर, एवं अन्याय धातु मलों से युक्त शरीर भी अवश्य ही अस्पृश्य है । अवश्य-मेव जन्मगत सुर प्रारणगत अशुचिभाव से युक्त असच्छूद्रवर्ग का शरीर अस्पृश्य है । इसी सम्बन्ध में यह स्पष्टीकरण और कर लीजिए कि कितनें एक फीटाणुओं का संसर्गदोष हाथ धोने मात्र से नष्ट हो जाता है, कितनें एक संसर्गदोष टिन्चर - आदि सुतीक्ष्ण द्रव्यों के सम्बन्ध से नष्ट हो जाते हैं । एवं उपदंश, राजयक्ष्मा, आदि कितनें एक कीटाणुओं का संसर्गदोष चिरकालिक, किंवा याव-जीवन के लिए प्रतिष्ठित हो जाता है । यही परिस्थिति यहाँ समझिए । कितनें एक मलों की शुचि सद्यः स्नानादि से निवृत्त हो जाती है, कितनें एक अशुचिभाव कुछ दिनों पर्यन्त नियमतः रहते हैं, एवं अवधि समप्त हो जाने पर वे स्वतः निवृत्त हो जाते हैं । जनन - मरणाशौच इसी लिए कालयाध्य दोष माने गए हैं । एवं कितनें एक अशुचिभाव ऐसे हैं, जिनका यावज्जीवन सम्बन्ध बना रहता है । जिन अशुचिभावों का वीर्य के साथ अन्तर्यामि सम्बन्ध रहता है, वे जीवन पर्यन्त अशुचि हैं । शूद्रादि की अस्पृश्यता इसी अन्तर्य्याम सम्बन्ध पर प्रतिष्ठित है । मलसंसर्गानुबन्धी इसी तारतम्य के आधार पर मलिन कर्मों के मलिनीकरण, संकरीकरण, जातिभ्रंशकर, महापातक, पातक, उपपातक आदि अनेक अवान्तर विवर्त्त मानें गए हैं । रजः स्वला स्त्री का स्पर्श, शूद्रादि का स्पर्श, इत्यादि प्रभावों को ही हम ' दोषाशौच ' कहेंगे, जिसका प्रधानत: ' एनोदोष ' में न्तर्भाव है । साथ ही इस दोषाशौच को सर्वथा गौण माना जायगा, जैसा कि पूर्व में स्पष्ट कर दिया गया है । ( १ ) अब उस जन्माशौच की मीमांसा कीजिए, जिसके स्पष्टीकरण के लिए ही आशौचस्वरूप G प्रदर्शन के साथ साथ मलिना स्त्री के मलिन रज की अब तक मीमांसा की गई है । शुक्रशोणित के समन्वय से सम्पन्न, तद्गत विशेषतः अशुचिभावापन्न रजोदुष्ट से अशुचिभावापन्न गर्भ को कलल- डिम्भ--गर्भादि अनेक अवस्था मानीं गई हैं । द्रवभावापन्न गर्भ कलल है, आंशिकरूप से घनावस्थापन गर्भ डिम्भ है । डिम्भावणपर्य्यन्त शुक्रशोणित के मिथुनात्मक इस गर्भ में चेतनालक्षण औपातिक आत्मा का समावेश नहीं होता । जब गर्भ कुक्षिगत होता है, तभी इसमें जीव का संयोग होता है, एवं तभी इसकी वस्तुतः गर्भसंज्ञा होती है । कलल, किंवा डिम्भ यदि प्रत्याघातादि किसी कारण विशेष से शनैः शनैः वित्रस्त होने लगता है, तो इस स्थिति को डिम्भपात कहा जाता है । इस डिम्भादि ara पात से स्त्री अतिशयरूप से अशुचिभावापन्ना बन जाती है । साथ ही इस स्त्रो का यह अशुचिभाव उसी सम्बन्धसूत्रद्वारा पति आदि में व्याप्त हो जाता है । यही गौणात्मकं प्रथम जन्माशौच है । कलल-डिम्भादि का स्राव - पात न हुआ । गर्भपुष्टि प्रक्रान्त रही । कुक्षिगतावस्था में औपपातिक श्रात्मप्रवेश से ४८८