Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 71–80
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 71–80
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प्रजातन्तु वितान • * * आह्निकपिण्डः -- अक्षत भावात्मकः ( मासिकपिण्डे - अन्तर्भावः ) ** १ - मासिकपिण्डाः ( २८ कलात्मक प्रत्येकः ) -२ -- षाएमासिकपिण्डौ ( सार्द्ध षट्क - पटक पिण्डात्मकौ-३ - साम्वत्सरिकपिण्डः ( समष्टिरूपः ) -१३ २ पिण्डसम्पत्ति: - १६ सहभाग का पितृप्राणात्मकत्व-शुक्र में साक्षात रूप से आने वाले इस चान्द्ररस में ' सहः पिण्ड ' में रसात्मक सूक्ष्म भूत, प्राणात्मक सुसूक्ष्म देवता, ये दो तत्त्व प्रतिष्ठित हैं । दूसरे शब्दों में दोनों की समष्टि ही ' सह: ' है । रसभूतसम्परिष्वक्त यह चान्द्र प्राणरूप देवता ही ' पितर ' है । इसी प्राणपितर के सम्बन्ध से यह सहभाग ' पितृसह ', किंवा ' पित्र्यसह ' नाम से व्यवहृत हुआ है । यही श्रौत पितृसह स्मार्त्त -परिभाषा में ' पित्र्यंश ' कहलाया है । त्रयोदशमासात्मक चान्द्रसम्बत्सर के सम्बन्ध से शुक्र को त्रयो-दशमासिक पिण्डात्मक बतलाया गया है । इस सम्बन्ध में यह ध्यान रखना चाहिये कि, उत्तर उत्तर के मासिक पिण्डों की उत्पत्ति के साथ साथ पूर्व - पूर्व के सञ्चित मासिक पिण्ड इन्दियव्यापार से, प्रधानतः शुक्र द्वारा विगत ( खर्च ) भी होते रहते हैं । शुक्रक्षयमीमांसा - ' शुक्रव्यय के प्रधानतः तीन द्वार हैं, गौरणतः पाँच द्वार हैं । वाक् प्राण - चक्षुः श्रोत्र - मन - इन पाँचों इन्द्रियों के व्यापारों से जो शुक्र विनिर्गत होता है, वह इस का गौणात्मक व्ययीभाव है । प्रत्येक इन्द्रिय स्वव्यापार के लिये सर्वेन्द्रिय प्रज्ञान मन के सहयोग की अपेक्षा रखती है । मनका मूलाधार ओज है, आज की मूलप्रतिष्ठा शुक्र है । इस प्रकार शुक्र भोज के द्वारा मानस भाव में परिणत होता हुआ परम्परया पाँच द्वारों से खर्च होता रहता है । इन पाँच गौण द्वारों के अतिरिक्त तीन प्रधान द्वार हैं । प्रजोत्पत्ति कर्म में मूलेन्द्रिय द्वारा शुक्र - विनिर्गमन प्रथम व्ययीभाव है । यह व्ययी-भाव गृहमेधियों ( गृहस्थाश्रभियों ) से सम्बन्ध रखता है । प्रजातन्तुवितानकामुक ये ही गृहमेधी अधोभाग से शुक्र - व्यय करते हुए ' अधोरेता ' कहलाए जो विवाहित नहीं है, विवाहित ३५
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श्राद्धविज्ञान होते हुए भी जो गृहस्थी पूर्णसंयम के साथ लोकयात्रा का निर्वाह करते हैं, उनका शुक्र प्रवाह उनकी शोरपुटि के कार एनून रसाङ मांसादि की वृद्धि में उपयुक्त होता रहता है, एवं इन्ही को ' तिक स्रोता ' कहा गया है । जो ब्रह्मचारी सतत विद्याभ्यास में अनुरक्त हैं, जो वीतराग सन्यासधर्म में दीक्षित है, जो महर्षि अहर्निश तत्त्वान्वेषण कर्म में संलग्न हैं, चिन्ताशील इन पुरुषपुङ्गवों का शुक्र क्रमणः खोज, मनोरूप में परिणत होता हुआ शिरोभागाव स्थित ज्ञानाग्नि में आहुत होता रहता है । ये जितने अधिक चिन्ताशील होते हैं, उतनी ही अधिक मात्रा में शुक्रक्षय होता रहता है; एवं तद्नुरूप ही विज्ञान विकसित होता रहता है । यही कारण है कि, ज्ञानाग्नि में शुक्र की प्राहुति देने वाले विद्वान् शारीरिक श्रम करने में प्राय: असमर्थ रहते हैं । यही विभाग ' ऊर्ध्वरेता ' नाम से प्रसिद्ध है । शुक्रविनिर्गम की इन्हीं तीन अवस्थाओं के लिए क्रमशः ' अवपतन, आयतन, उत्पतन ' ये साङ्के-तिक शब्द प्रयुक्त हुए हैं । -गृहमेधिनः प्रजातन्तुप्रवर्त्तकाः । १ - अधोरेताः -- - वतनाः --! १२- तिर्य्यग्रेता:: . ३ - ऊर्ध्वरेताः-: -आयतनाः - संयमिनो मल्लाच - भूतत्तन्तुप्रवर्त्तकाः । : ------ उत्पतना.-- . - महर्षयः, संन्यासिनः, विद्वांसो ज्ञानतन्तुप्रवर्त्तकाः । तीनों में से किसी भी एक मार्ग से, तथा पञ्चेन्द्रिय व्यापार से शुक्रव्यय प्रत्येक दशा में ' निश्चित है । इस विसर्गक्रिया के साथ साथ उसी चान्द्रनाड़ी के द्वारा आदानप्रक्रिया भी प्रकान्त रहती है । इस साम्बरसरिक पिडादान, विसर्गक्रम परम्परा से युक्त पुरुष हो जीवनधारण में समर्थ - बनता है । यदि एक ही मासिक पिण्ड उत्पन्न होकर आगे चादानकम्मे उपरत हो जाय, तो अवश्यमेव प्रथम मासिक पिण्ड के उपर्युक्त किसी भी द्वार से व्ययभार का अनुगामी बनता हुआ विनाष्ट का कारण बन जाय । इस साम्वत्सरिक ज्यादान - विसर्ग के अनुग्रह से जीवनसत्तोषयिक एक मासिक पिण्ड अवश्य ही सुरक्षित रहता है । जिस दिन इसके स्वरूप पर भी आघात होजता है, तो क्षय-रोगाकान्त ऐसे व्यक्ति को शीघ्र ही कीनाशनिकेत नातिथ्य स्वीकार कर लेना पड़ता है । अपत्य - प्रत्यपुरुषमीमांसा-उक्त तीन श्रेणियों में से अधः स्रोतावस्थापन गृहस्थियों की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । इस वर्ग को ' अपत्यपुरुष, पत्यपुरुष ' भेद से दो श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है । परिभाषाज्ञानबिलुप्ति से, विशेषतः तत्त्वविज्ञान मूलक वैदिक स्वाध्याय परम्परा के उच्छेद से वर्त्तमान • परम्परा में अपत्य, सूनू, तनय, आदि शब्द अभिन्नार्थक माने जा रहे हैं, जबकि ये शब्द सर्वथा भिन्न भिन्न अर्थों के वाचक बन रहे हैं, जैसा कि निम्नलिखित ' पत्यापत्यमीमांसा ' से स्पष्ट हो रहा है । ३६ १
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प्रजातन्तुवितान धः, तिर्यक्, ऊर्ध्व, भेद से शुक्र का तीन मार्गों से विनिर्गम बतलाया गया है । इन तीनों मैं तिर्य्यक - ऊर्ध्व - विभागों में कोई विशेषता नहीं है । तीसरे अधःत्रता विभाग में ही शुक्र विनिर्गम के सम्बन्ध से अपत्य - पस्य रूप से दो अवस्था उत्पन्न हो जातीं हैं । ' प्रजातन्तु मा व्यवच्छेत्सीः ' इस श्रौत सिद्धान्त को शिरोधार्य मान कर एक सद्गृहस्थी ऋतुकाल में ( शास्त्र -निर्दिष्ट दाम्पत्यकाल में ) रतिप्रसङ्ग करता है । योषा ( स्त्री ) के गर्भाशय में प्रतिष्ठित आर्त्तव ( शोणित ) में रहने वाला त्रिप्राणसंश्लिष्ट, अतएव प्रजननधर्मशाली प्राणविशेष ' योषा ' कहलाया है । वृषा ( पति - पुरुष ) के शुक्र में प्रतिष्ठित पितृप्राणयुक्त ( सहोभागयुक्त ), अतएव प्रजननकर्म में समर्थ प्राणविशेष ' वृषा ' कहलाया है । पतिपत्नीरूप पुरुषस्त्री के दाम्पत्यलक्षण मिथुनसम्बन्ध से स्त्री के योषा प्राणप्रधान शोणिताग्नि में पुरुष के वृषाप्राणप्रधान शुक्र की आहुति होती है । इन श्रहुत सौम्य शुक्र, तथा आहुति-ग्राहक आग्नेय शोणित, दोनों के समन्वय से ' गर्भस्थिति ' होती है । ' प्राधिक्ये रेतसः पुस ः ' सिद्धान्त के अनुसार शुक्राधिक्य पुरुषसन्तान का कारण है । शुक्र सौम्य है, यही शोणिताग्नि में भित होकर पुत्ररूप में परिणत होता है । इसी सोमाभिषव ( शुक्राभिषव ) सम्बन्ध से पुत्र ' सूयते - इति - अभिषुतो भवति ' इत्यादि निर्वचनों से ' सूनु ' नाम से व्यवहृत किया गया है । शोणि-ताग्नि में सुत ( आहुत ) यह सोम ( शुक्र ) आठवीं सन्तान के लिये सुत्त होता है, अतएव इसे ' अपत्य ' कहा जाता है । ,, यही है कि, पितर पिण्ड शरीरत्यागानन्तर चान्द्रसम्वत्सरानुगत १३ महीनों के अनन्तर पूर्वप्रदर्शित क्रमानुसार स्वप्रभवस्थानीय चन्द्रलोक में प्रतिष्ठित होता है । उस प्रतपिण्ड का अंश जबतक भूपिण्ड़ पर प्रतिष्ठित रहता है, तबतक वह अपने स्वरूप से चन्द्र-लोक में प्रतिष्ठित रहता है । चन्द्रलोक से गिरने नहीं पाता । चन्द्र लोकस्थित प्रतपितर के कुछ अंश, जिनका कि अनुपद में ही स्पष्टीकरण होने वाला है, चान्द्र श्रद्धासूत्र के आधार पर ( द्वार से ) अपने पुत्र - पौत्र - पौत्रादि में सन्तान रूप से पृथिवी पर प्रतिष्ठित रहते हैं । इन पार्थिव पुत्र - पौत्र-प्रपौत्रादि सन्तानों में आने वाले अपने अंशों के बन्धन वे अशी पितर स्वलोक से च्युत नहीं होने पाते । जब उस प्रतपितर की सातवीं सन्तान पृथिवी पर जन्म लेती है, तभी यह प्रोतपितर स्वप्रतिष्ठा से च्युत होता है । तभी इस की चन्द्रलोक से च्युति होती है । पुत्र - पौत्रादि ६ सन्तानों में उस मूल-पितर के भिन्न भिन्न संख्यायुक्त स्वांश प्रतिष्ठित रहते हैं । पुत्रादि के लीलासंवरण पर तत्तदंश पुनः उसे मिलते जाते हैं । यही ' पिण्डप्रत्यर्पणकर्म्म ' है, जो स्वतः होता रहता है । इन ६ सन्तति-धाराओं में प्रतपितर के २१ अंश विभक्त हैं, उसके समीप केवल ७ अंश शेष रह जाते हैं । मूल इन ७ पितृसहों को लेकर ही वह चन्द्रलोक में गमन करता है । तत्तत् सन्तान के तत्तदंश सपिण्डी-करण द्वारा पुनः उस उस सप्तांशयुक्त मूलपुरुष में प्रत्यर्पित होते हैं ( वापस मिलते हैं ) । इन प्रत्यर्पित - सन्तानगत २१ पितृसहों से मूलपितर २८ अंशों से युक्त होता हुआ अपने पूर्णभाव को ३७
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श्राद्धविज्ञान प्राप्त हो जाता है । इस प्रत्यर्पण कर्म से प्रकृत में केवल यही कहना है कि, क्योंकि ये ६ सन्तान. · उसके द्वारा प्राप्त पितृसहों के आकर्षण से उन प्रतपितरों को चन्द्रलोकपतनभय से मुक्त बनाने " का हेतु बनतीं हैं, अतएव शुक्राहुति से उत्पन्न इन्हें ' अपत्य ' कहा जाता है । दूसरी दृष्टि से ' अपत्य ' शब्दका समन्वय कीजिए । बीजी पिता के शुक्र में प्रतिष्ठित सौम्य पितृसहः ही शुक्राति के द्वारा सन्तानरूप में परिणत होता है । सन्तानरूप में परिणत होने वाले इस पित्र्यसहः की गति निम्न है । अपने क्षेत्र से निम्न क्षेत्र की ओर गमन करता हुआ ही यह सन्ततिरूप में परिणत होता है । वही पितर ( पितृसह:) निम्नगति का आश्रय लेता हुआ सन्तानभाव के द्वारा पृथिवी पर प्रतिष्ठित होता है । व इसे ( सन्ततिरूपात्मक पितरभाग ) ' अपत्य ' कहना न्यायसङ्गत माना गया है । ' अ ' शब्द अधोभाव निम्नभाव का सूचक है । अपत्यशब्द का ' अधस्ताद्भवति ' ही निर्वचन है । ' अप् ' से ' अव्ययात् त्यप् ' सूत्र द्वारा ' त्यप् ' प्रत्यय होकर ' अपत्य ' शब्द निष्पन्न हुआ है । यह ' अपत्यभाव ' उन अधोरेता - गृहस्थियों से ही सम्बन्ध रखता है, जो सन्तान से युक्त होते हैं । मान लीजिए- किसी गृहस्थी ने जन्म पर्यन्त सन्तति के दर्शन न किए । वह निःसन्तान ( निरपत्य-निपूता ) ही मर गया । निःसन्तान मरने वाले इस व्यक्ति के स्वयं का, तथा इसके पिता, पितामहादि - का चन्द्रलोकस्थित पितृसहः ' पत्य ' ही कहलाएगा । सन्तान इसके हुई नहीं । शुक्रगत पितृसहः व्यर्थमैथुनादि में २१ मात्रा से विगत ( खर्च ) अवश्य हो गया । फलतः प्रतदशा में ७ भाग लेकर ही यह वापस चन्द्रलोक में पहुँचेगा । अब सन्तानाभाव से व्ययीभूत उन शेष २१ पितृसहों को वापस लेने. 1 का कोई साधन नहीं रहा । फलतः उसका पतन अवश्यंभावी हो गया । यहीं पर विश्राम नहीं हो जाता । अपितु निःसन्तान के शुक्रस्थ मासिक पिण्ड खर्च होते रहते हैं, सन्तान न होने से यह व्ययभाव व्यर्थ है । इस दृष्टि से यह प्रतिमास में ' पत्य ' है । ' अयोनि में, वन्ध्या स्त्री में सिक्त रेत व्यर्थ चला जाता है, और यही इस का पत्यभाव है । व्यर्थ में खर्च होने वाला शुक्र ( तद्गत पितरप्राण ) अपने स्वरूप से यों भी पत्य है । दूसरे शब्दों में स्वप्रतिष्ठा दूसरा नहीं है, जैसा कि -सें च्युत होता हुआ भी पत्य है । एवं एक गृहमेधी का इससे बढ़कर अमङ्गल ‘ अपुत्रस्य गतिर्नास्ति ' इत्यादि से प्रतिध्वनित है । इसी महा श्रमङ्गल के निरध के लिए ऋषियों का ' प्रजातन्तु ' मा व्यवच्छेत्सीः ' आदेश उद्घोषित हुआ है । इसी महामाङ्गलिक अपत्यभाव की रक्षा के लिए व्यर्थ मैथुन निषिद्ध माना गया है । इसी अपत्यसम्पत्ति की रक्षा के नाते ऋतुकाल में ही स्त्रीगमन विहित ( शास्त्रानुमोदित ) माना गया है । पितृसोमयज्ञद्वारा ऋणप्रवृत्ति-" स्व जन्मदाता पिता को, चन्द्रलोकस्थ पितामहादि को, एवं स्वयं अपने आपको भी अपत्यभाव से सुरक्षित रखने वाला पितृसहः सन्तानधारा में तन्तुरूप से प्रवाहित रहता है " यह कहा गया है । ३८
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प्रजातन्तुवितान अब इस सम्बन्ध में देखना यह हैं कि, मूलपुरुष ( बीजी पिता ) से आरम्भ कर उस की सातवीं पीढ़ी पर्य्यन्त वितत रहने वाली सन्तान परम्परा में मूलपुरुष के शुक्र में प्रतिष्ठित २ = कल पितृसहोरूप पितृधन किस क्रम विभक्त होकर ऋण रूप से आहुत होता है? । चान्द्ररस से अन्न द्वारा उत्पन्न होने वाले शुक्र में नक्षत्रसम्बन्ध से चान्द्रनाड़ी के द्वारा साक्षात रूप से प्रतिष्ठित २८ विंशतिकल पितृसहः-पिण्ड ही मूलधन है, यह पूर्वनिरूपण से गतार्थ है । यही पितृपिण्ड स्त्री के योषाप्राणप्रधान शोरिण-तान में होने वाले शुक्र के साथ साथ आहुत हो जाता है । यह सोममय शुक्र, किंवा शुक्रमय सोम पितरप्राणप्रधान है, अतएव इस अभिषोमीय सोमयज्ञ को सौम्यपितृप्रारण की प्रधानता से ' पितृसोमयज्ञ ' कहा गया है । यही सोमष्टोम - ( पितृसोम ) - यज्ञ प्रजासृष्टि की मूलप्रतिका माना गया है । देवसोमाहुति से सम्बन्ध रखने वाला ज्योतिष्टोमापरपर्यायक अग्निप्रधान ' देवसोमयज्ञ ' जैसे - ' सप्तसंस्थो वै ज्योतिष्टोमः ' के अनुसार अग्निष्टोम - प्रत्यग्निष्टोम - उक्थ्यस्तोम - षोडशीस्तोम-अतिरात्रस्तोम - वाजपेयस्तोम आप्तोरय मरतोम, भेद से सात संस्थाओं में विभक्त रहता है । ठीक उसी प्रकार सोमप्रधान यह ' पितृसोमयज्ञ ' भी - ' पिता - पुत्र - पौत्र - प्रपौत्र- वृद्धप्रपौत्र - अतिवृद्धप्रपौत्र - वृद्धातिवृद्ध-प्रपौत्र ' भेद से सात ही संस्थाओं में विभक्त रहता है । सगोत्र - सोदक- सपिण्ड नाम के पूर्वोक्त तीनों सप्तकों की समष्टि रूप पितरप्राणयुक्त, अतएव तृस्तोमयज्ञात्मक पित्र्यसहः पिण्ड जायाग्नि में आहुत होकर अपने से सातवीं पीढ़ी पर्यन्त ही वितत रहता है । शुक्र की आहुति होगी, शुक्र के साथ साथ ही तद्गत पितृसह: भी बहुत होगा । इस सम्बन्ध में प्रश्न है कि, दाम्पत्यकाल में क्या सम्पूर्ण शारीर शुक्र आहुत हो जाता है?, एवं क्या तद्गत पितृसहः की २८ कला आहुत हो जातीं हैं? । प्रश्नों का उत्तर ' सर्वथा नही ' में होगा । जीवनधारणोपयिक सम्पूर्ण शुक्रमात्रा, एवं तद्गत पित्र्यसहः की सों कला एक ही काल में यदि आहुत जाँय, तो उसी क्षण जीवनलीला समाप्त हो जाय । ऐसी दशा में स्वीकार करना पड़ेगा कि, एक समय में हो सम्पूर्ण शुक्र, एवं तदविनाभूत पितृसहः पिण्ड आहुत नहीं होता, अपितु अंशतः ही, इन सहोमात्राओं की आहुति होती है, जो अंशाहुति ' प्रवहुति ' - ' उच्छिष्टयज्ञ ' आदि नामों से व्यवहृत हुई है । प्राकृतिक उच्छिष्टयज्ञ भी इसी अंशदान का समर्थन कर रहे हैं । सौर प्रारण वनस्प-तियों में आहुत होता है, परन्तु अंशरूप से, प्रवर्ग्यरूप से । सम्पूर्ण मात्रोच्छेद हो जाता तो आज ब्रह्मा में सूर्यसत्ता ही उपलब्ध न e होती । एवमेव · नक्षत्र, ग्रह, चन्द्रमा, वायु, इन्द्र, वरुण, मरुत्त्वान्, वसु, रुद्र, पृथिवी, आदि आदि सभी प्राकृतिक प्रजापति ( स्रष्टा ) प्रजाति - ( स ) - कामना स्वांशदान से ही स्व - स्व सर्ग के प्रभव बन -३६
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श्राद्धविज्ञान रहे हैं । इस आंशिक नियमित मात्रा प्रदान के लिये ही ब्राह्मणग्रन्थों में ' विस्रस्ति ' शब्द प्रयुक्त है । सृष्टिकामु प्रजापति सर्वात्मना आहुत नहीं होते, अपितु अंशरूप से ही प्रजापति का विस्र-सन होता है । धरातल पर गिरी हुई जलबिन्दु को आगे हटाइये | अवश्य ही अनुशयरूप भाग स्वस्थान पर रह जायगा । यही आशिकप्रदान विस्रस्ति, किंवा विस्रसन है, जिसके लिए लोकभाषा में ' स्खलन ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । ठीक यही व्यवस्था शुक्राहुति के सम्बन्ध में सम-झिए ॥ शुक्र का सर्वात्मना उच्छेद नही होता, अपितु आंशिकरूप से विस्रंसन होता है । अतएव शुक्रविनिर्गम - प्रक्रिया ' रेतः स्खलन ' नाम से ही व्यहृत हुई है । विचार · पुरुषसृष्टि का प्रक्रान्त है, जिसके सम्बन्ध में ' त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादो-स्येहाभवत्पुनः ' ( यजुः संहिता ) यह नियम व्यवस्थित है । " तीन भागों की आहुांत, एवं एक भाग की ' इह ' से गृहीत आहुतिप्रदाता में प्रतिष्ठा " यही निष्कर्ष है । २८ कलात्मक पितृसह: के तीन भाग तो शोणिताग्नि में आहुत होंगे, एवं एक भाग स्वयं आहुति देने वाले पिता में प्रतिष्ठारूप से प्रतिष्ठित रह जायगा । यही ३ - ९ का क्रम आगे के आहुति - क्रम में चलेगा । आहुत होने वाला भाग ' सूयते ' - ' सुतो भवति ' - ( आहुतो भवति ) - ' अभिषुतो भवति ' निर्वचनों से ' सुतः ' कहलाएगा, एवं शेष अनाहुतभाग ' अत: ' ( अनाहुत: - शेषः ) कहलाएगा । भागत्रयरूप से जो पितृधन प्रजोत्पत्ति के लिए योषाग्नि में हुत होता है, वह तो सन्तान ( सन्तनन - विस्तार ) भाव में परिणत होता हुआ सप्तसंस्थ पितृस्तोम - यज्ञ का प्रवर्तक बनता है, एवं जो एक भाग आहुत नहीं होता, वह असुतभाग स्वयं आहुतिप्रदाता में ही प्रतिष्ठित रह जाता है । २८ कलात्मक आत्मपिण्ड का एक चतुर्थांश सप्तकलभाग आत्मप्रतिष्ठा का कारण बनता है, यही ' आत्मधारणाः पितरः ' हैं । बीज आवाप करने वाले पितर में ही यह सप्तकल पितृसहः प्रति-ष्ठित रहता है । दूसरे शब्दों में बीजी में इन सात पितृप्राणों का विशुद्ध पितृप्राणरूप से अव-' स्थान है, अतएव इस असुत पितृप्राणसमटि को ही अवश्य ही ' पितरः ' संज्ञा से व्यवहृत किया जासकता है । दूसरा भागत्रयात्मक पितृभाग क्योंकि नायाग्नि में अभिषत होता है, अतः इसे ' सूनु: ' शब्द से व्यवहृत करना न्यायसङ्गत बन जाता है । वार्त्ता ( शुक्रात्मक बीज की आहुति देने वाले ) के शुक्र में २ = पितृसहः प्रतिष्टित बतलाये गये हैं । इनमें से ७ इस में स्वप्रतिष्ठा के लिए प्रतिष्ठित रह जाते हैं, शेष २१ अंश योषि-- दग्नि में सुत हो जाते हैं । सप्तपितृप्राण धनभाग है, २१ पितृप्रारण ऋणभाग है । धनभाग असु है, यही ' पितर ' है । ऋणभाग सुत है, यही ' सून ' है । दम्पती - सम्बन्ध से जब भी पुत्र उत्पन्न होगा, २१ पितृसों का ऋण लेकर ही उत्पन्न होगा । उत्पत्ति के अनन्तर इस उत्पन्न पुत्र में अपने भी स्वतन्त्र २८ अंश उत्पन्न ओर हो जाते हैं यह कथान्तर है । परन्तु पुत्र के इस औपपातिकमा ४०
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1 प्रजातन्तुवितान का अपनी भौमजन्मसत्ता के लिए, भूपृष्ठ पर शरीर धारण करने के लिए अपने पिता से शुक्रद्वारा २१ अंश लेना परमावश्यक हो जाता है । बिना इस ऋण आदान के इसका प्रभव ही असम्भव है । अतएव पुत्ररूप में उपयुक्त पिता के इस २१ भागसंघात को शास्त्रकरों ने ' पितृ - ऋण ' नाम से व्यवहृत किया है । ६ धारा में वितत इन २१ मात्राओं को चन्द्रलोकस्थ पिता के ७ अंशों के साथ सपिएडीकरण के द्वारा जबतक यह ( पुत्र ) उस की ( पिता की ) पूरी ( २१ ) मात्रा लौटा कर उसे पूर्ण ( २ = कल ) नहीं बना देता, तबतक यह ऋणी रहता है । एवं तब तक इस का बन्धनविमोक नहीं हो सकता । इस पितृऋणमुक्ति के अनेक प्रकारों में से ' सन्तानोत्पत्ति ' एक मुख्य साधन माना गया है । इस पितृऋरण के अतिरिक्त पिता की अध्यात्मसंस्था में प्रतिष्ठित ऋषिमात्रा, देवमात्रा, का भी ऋणरूप से इसमें आगमन होता है । वे ही दोनों ऋ ऋषिऋण, देवऋण, नामों से प्रसिद्ध हैं । इन तीनों ऋणों का मोचन कैसे सम्भव है? इस प्रश्न की मीमांसा आगे के ' ऋणमोचनोपा-योपनिषत् ' नामक प्रकरण में की जाने वाली है । प्रकृत में इस ऋण धन भाव से यही बतलाना है कि, पिता के द्वारा पुत्र में उपादाने रूप से प्राप्त २१ सहः ही ' पितृऋण ' । इसका आगे किस क्रमसे वितान होता है, यही विजिज्ञास्य है । पितृधनावापमीमांसा-( १ ) - बीजी पिता की अपनी अर्जित सम्पत्ति ( कमाई ) के २८ पितृसहों में से २१ सहों को ऋण ( उधार ) ले कर पुत्र उत्पन्न हुआ । पुत्र में पिता से आने वाला एकविंशतिकलोपेत यह सहः पिण्ड ' प्रथमावाप नाम से प्रसिद्ध है । प्रथमपात्रस्थानीय पिता के इन २१ पितृसहों का प्रथम अधिकारी पुत्र ही बनता है । प्रथमपात्र ( पिता ) द्वारा प्रथमाधिकारी ( पुत्र ) में आहुत यह पितृसहः अवश्यमेव ' प्रथमावाप ' कहल सकता है । इन में पिता का शेष असुतलक्षण सप्तकल धन ' पितरः ' है, एवं पुत्र में आगत सुत एकविंशतिकल ऋण ' सूनवः ' है । इस प्रकार २८ पितृसहों के प्रथमावाप सम्बन्ध से ७-२१ भेद से ' पितरः - सूनवः ' ये दो श्रेणि- विभाग हो जाते हैं । सात की प्रतिष्ठा स्वयं पिता है, २१ पुत्र मैं' मुक्त है । ( २ ) - बीजीपिता से २१ मात्रा लेकर जन्मधारण करने वाले पुत्र में भी स्वतन्त्ररूप से २८ सहों का आगमन हुआ । यह अपने पुत्र को जहाँ स्वधन रूप में से उक्त नियमानुसार २१ मात्रा ऋण देखा, हाँ पिता से मिली हुई २१ मात्रा में से भी इसे अपने पुत्र को ऋण देना पड़ेगा । इस पारम्परिक धन के ऋणदान का क्रम वही होगा, जो प्रथमावाप में बतलाया जा चुका है । पिता से प्राप्त २१ में से १५ भाग तो यह पुत्र में ( बीजी के पौत्र में, एवं अपने पुत्र में ) प्रदान करदेता है, शेष ६ भाग इसमें प्रतिष्ठित रह जाते हैं । यह ६ कलाएँ सुत नहीं होतीं, असुतरूप से इसी में प्रतिष्ठित रहतीं हैं, अब पूर्वपरिभाषानुसार इन्हें ' पितरः ' कहा जायगा । एवं पौत्र स्थानीय पुत्र में सुत १५ कलाएँ ' सूनवः ' कहलाएँगी । इन १५ कलाओं का आवाप पुत्र के द्वारा होता है, अतएव यह द्वितीयपात्र है । पौत्र ४१
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श्राद्धविज्ञान स्थानीय पुत्र में बीजी के पुत्र द्वारा इनका श्रवाप होता है, अतएव यह पौत्रस्थानीय पुत्र ' द्वितीयाधिकारी " है । द्वितीयपात्र ( पुत्र ) द्वारा द्वितीयाधिकारी ( पौत्र ) में बहुत पञ्चदशकलोपेत यह पितृसहः अवश्यमेव ' द्वितीयावाप ' कहला सकता है । इस प्रकार २१ पितृसहों में द्वितीयावापसम्बन्ध से ६-१५ भेद से ' पितर: - सूनवः ' ये श्रेणि - विभाग हो जाते हैं । ६ की प्रतिष्ठा स्वयं पुत्र है, १५ पौत्र में मुक्त हैं । ( ३ ) -बीजी के पुत्रस्थानीय अपने पिता के द्वारा प्राप्त १५ की राशि को सुरक्षित रखने वाले पौत्र पुत्र उत्पन्न होता है । इसमें भी नियमानुसार २८ तो उत्पन्न होंगे ही, ओर यह भी अपने २८ में से २१ मात्रा अपने पुत्र ( बीजी के प्रपौत्र ) में देगा ही, साथ ही पिताद्वारा प्राप्त १५ राशि में से भी इसे ऋण - दान करना पड़ेगा । पिता से ( बीजी के पुत्र से ) प्राप्त १५ में से १० भाग तो यह पुत्र में ( बीजी के प्रपौत्र में, एवं अपने पुत्र में ) प्रदान कर देता हैं । शेष ( पौत्र ) में प्रतिष्ठित रह जाते हैं । ये ५ कलाएँ सुत नहीं होतीं, सुतरूप से ५ भाग स्वयं इस में इसी में प्रतिष्ठित रहतीं हैं, अतएब इन्हें- ' पितरः ' कहा जायगा । एवं प्रपौत्रस्थानीय पुत्र में सुत १० कलाएँ ' सूनवः ' कह · लाएँगी । इन १० कलाओं का आवाप पौत्रद्वारा होता है, अतएव यह तृतीयपात्र हैं । जिस प्रपत्र में आवाप होता है, वह तृतीयाधिकारी है । तृतीयपात्र ( पौत्र ) द्वारा तृतीयाधिकारी ( प्रपौत्र ) में आहुत दशकलोपेत यही पितृसह: ' तटीयावाप ' है । इस प्रकार १५ पितृसों में से तृतीयावाप सम्बन्ध से ५-१० भेद से ' पितरः - सूनवः ' ये दो श्रेणि - विभाग हो जाते हैं । ५ की प्रतिष्ठा स्वयं पौत्र हैं, १० प्रपौत्र में भुक्त हैं । ( ४ ) - जीजी के पौत्र स्थानीय अपने पिता के द्वारा प्राप्त १० राशि को सुरक्षित रखने वाले प्रपौत्र . के पुत्र उत्पन्न होता है । इस प्रपौत्र में २८ स्वतः सिद्ध हैं, जिन में से २१ का नियमानुसार यह अपने पुत्र ( बीजी के वृद्धप्रपौत्र ) में प्रधान करेगा । इस के अतिरिक्त पिता के द्वारा प्राप्त १० संख्याक पितृधन में से भी इसे ऋणदान करना पड़ेगा । पिता से ( बीजी के पौत्र से ) प्राप्त १० में से ६ भाग तो यह पुत्र में ( बीजी के वृद्धप्रपौत्र में, एवं अपने पुत्र में ) प्रदान कर देता है, शेष ४ भाग स्वयं इस में ( प्रपौत्र में ) प्रतिष्ठित रह जाते हैं । ये ४ कला असुतभाव से ' पितर ' हैं, सुत ६ कला ' सूनवः ' हैं । इन ६ कलाओं का आवाप प्रपौत्रद्वारा होता है, अतएव यह चतुर्थपात्र है । जिस वृद्धप्रपौत्र में आवाप होता है, वह चतुर्थाधिकारी हैं । चतुर्थपात्र ( प्रपौत्र ) द्वारा चतुर्थाधिकारी ( वृद्धप्रपौत्र ) में आहुत षट्कलोपेत यही पितृसहः ' चतुर्थावाप ' है । इस प्रकार १० पितृसहों में से चतुर्थावापसम्बन्ध से. ४-६ भेद से ' पितरः - सूनवः ' ये दो श्रेणि- विभाग होजाते हैं । ४ की प्रतिष्ठा स्वयं प्रपौत्र हैं, ६ कलाएँ वृद्धप्रपौत्र में भुक्त हैं । ( ५ ) - बीजी के प्रपौत्र स्थानीय अपने पिता के द्वारा प्राप्त ६ सहोभागों को सुरक्षित रखने वाले वृद्धप्रपौत्र के पुत्र उत्पन्न होता है । इसमें भी २८ स्वतः सिद्ध हैं, जिनमें से २१ का यह अपने पुत्र ४२
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प्रजातन्तुवितान ( बीजी के वृद्धप्रपौत्र ) में आधान करेगा । इसके साथ ही पिता से प्राप्त ६ संख्यायुत पितृधन में से भी इसे ऋणदान करना पड़ेगा । पितासे ( बीजी के प्रपौत्र से ) प्राप्त ६ से ३ भाग तो यह पुत्र में ( बीजी के अतिवृद्धप्रपौत्र में, एवं अपने पुत्र में ) प्रदान कर देता है, शेष ३ भाग स्वयं इसमें ( वृद्ध-- प्रपौत्र में ) प्रतिष्ठा रूप से रह जाते हैं । ये ३ क्ला असुतभाव की दृष्टि से ' पितरः ' हैं, सुत ३ कला ' सूनवः ' हैं । इन तीन सूनुकलाओं का आवाप वृद्धप्रपौत्र के द्वारा होता है, अतएव यह पञ्चमपात्र हैं । जिस अतिवृद्धप्रपौत्र में आवाप होता है, वह पञ्चमाधिकारी है । पञ्चमपात्र ( वृद्धप्रपौत्र पञ्चमाधिकारी ( अतिवृद्धप्रपौत्र ) में आहुत कलत्रयोपेत यही पितृसह: ' पञ्चमावाप ' है । इस ) प्रकार द्वारा ६ पितृसहों में से पञ्चमाबाप सम्बन्ध से ३ - ३ भेद से ' पितरः - सूनवः ' ये दो श्रेणि - विभाग हो जाते हैं । ३ की प्रतिष्ठा स्वयं वृद्धप्रपौत्र है, ३ कलाएँ अतिवृद्धप्रपौत्र में भुक्त हैं । ( ६ ) -बीजी के वृद्धप्रपौत्र स्थानीय अपने पिता के द्वारा प्राप्त ३ सहोभागों को सुरक्षित रखने वाले अतिवृद्धप्रपौत्र के पुत्र उत्पन्न होता है । इसमें भी २८ तो स्वतः सिद्ध हैं, जिनमें से २१ का यह अपने पुत्र ( बीजी के वृद्धातिवृद्धप्रपौत्र ) में आधान करेगा । एवं इसके साथ ही पिता से प्राप्त ३ संख्या बाले पितृधन में से भी इसे ऋण देना पड़ेगा । पिता से ( बीजी के वृद्धप्रपौत्र से ) प्राप्त ३ में से १ भाग तो यह पुत्र में ( बीजी के वृद्धातिवृद्धप्रपौत्र में, एवं अपने पुत्र में ) प्रदान कर देता है, शेष २ भाग स्वयं इसमें ( अतिवृद्धप्रपौत्र में ) प्रतिष्ठारूप से प्रतिष्टित रह जाते हैं । ये २ कला असुतभावा-पेक्षया ' पितरौ ' हैं, सुत १ कला ' सूनु: ' है । इस १ सूनु कला का आवाप प्रतिवृद्धप्रपौत्र के द्वारा होता है, अतएव यह षष्ठपात्र है । जिस वृद्धातिवृद्धप्रपौत्र में आवाप होता है, वह षष्ठ अधिकारी है । षष्ठपात्र ( अतिवृद्धप्रपौत्र ) द्वारा षष्ठ अधिकारी ( वृद्धातिवृद्धप्रपौत्र ) में आहुत एककल यहीं पितृसहः ' षष्ठावाप ' है । इस प्रकार ३ पितृसहों में से षष्ठयावाप सम्बन्ध से २ - १ भेद से ' पितरौ - सूनुः ' ये दो श्रेणि विभाग हो जाते हैं । २ की प्रतिष्ठा स्वयं अतिवृद्धप्रपौत्र है, १ कला वृद्धातिवृद्धप्रपौत्र में मुक्त है । ( ७ ) - बीजी के वृद्धातिवृद्धप्रपौत्र में बीजी की केवल १ सहोमात्रा रहती है । अतएव यहाँ आकर ऋणदान क्रम समाप्त हो जाता है । यह १ कला स्वयं इसकी प्रतिष्ठा में उपयुक्त हो जाती है । यदि इसमें पितृधन की १ कला भी न रहे, तो इसकी प्रतिष्ठा का ही उच्छेद हो जाय । इस प्रकार अतिवृद्ध-प्रतितामह से आने वाली यह १ कला स्वरूपरक्षा में उपयुक्त होती हुई आगे न जाकर केवल ' पितर ' रूप से ही प्रतिष्ठित रह जाती है । फलतः बीजी से आगे उत्तरोत्तर ' पितरः- सूनवः ' रूप से वितत होने वाला २८ कलात्मक पितृसहः ७ - २१ ६ - १५ ५ - १० ४-६ x ३-३ × २-१ + " इस क्रमधारा से छठी पीढ़ी पर ही समाप्त हो जाता है । एक कलोपेत सांतवीं पीढ़ी में आगे वितत होने योग्य पिएड का अभाव है । अतएव सातवीं पीढ़ी पर जाके सपिण्डता सम्बन्ध ( २८ कलात्मक एक पड का वितानक्रम) समाप्त है । इसी विज्ञान के आधार पर - - ' ' सापिण्ड्य ' साप्तपौरुषं, सपिण्डतातु पुरुषे सप्तमे विनिवर्त्तते " इत्यादि राद्धान्त प्रतिष्ठित हैं । ४३
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प्रथमावापः द्वितीयावापः ततीयावापः चतुर्थावापः पचमावापः षष्ठावापः * पात्रम्-१ अधिकारी-पात्रम्-* अधिकारी- | पात्रम्-३ अधिकारी-पात्रम्-अधिकारी-पात्रम्-अधिकारी-पात्रम्-अधिकारी-४ ६ ७ श्राद्धविज्ञान १ - पितरः - सप्तसहांसि - पितरिमूलपुरुषे ( ७ ) - सूनवः - एकविंशतिसहांसि -- पुत्रे ( २१ ) ११ - पितरः - षट्सहांसि - पुत्रे ( ६ ) २- सूनवः - पञ्चदशसहांसि - पौत्रे ( १५ ) १ - पितरः - पञ्चसहांसि - पौत्रे ( ५ ) २- सूनवः - दशसहांसि - प्रपौत्रे ( १० ) | १ - पितरः - चत्वारिसहांसि - प्रपौत्रे ( ४ ) २ - सूनवः - षट्सहांसि - वृद्धप्रपौत्रे ( ) - १ - पितरः- त्रीणिसहांसि - वृद्धप्रपौत्रे ( ३ ) * ॐ -१ - पिता -रे -- पुत्रः --३ - पौत्रः -४ - प्रपौत्रः - ५- वृद्धप्रपौत्रः 8 २- सूनवः - त्रीणिसहांसि - अतिवृद्धप्रपौत्रे ( ३ ) ६- प्रतिवृद्धप्रपौत्रः १ - पितरौ - द्वे सहसी - प्रतिवृद्धप्रपोत्रे ( २ ) ३ - सूनुः - एक सहः – वृद्धातिवृद्धप्रपौत्रे ( १ ) १- पिता - एक सहः वृद्धातिवृद्धप्रपत्रे ( 1 ) 3- वृद्धातिवृद्ध प्रपौत्रः X X * X ' X 88. 7