Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 81–90
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 81–90
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पितृधनानि - पितरः प्रजातन्तुवितान पितृऋणानि - सूनवः १ - पितरि - 1 ७ सहांसि * मूलपुरुषः २- पुत्रे -६ सहांसि पुत्रे -२१ हांसि ३ - पौत्रे -.. ५ सहांसि पौत्रे-१५ सहांसि ४ ---- -प्रपौत्रे-४ हांसि प्रपौत्रे-१० हांसि ५ - वृद्धप्रपौत्रे -३ हांसि वृद्धप्रपौत्रे--६ सहांसि ६ - अतिवृद्धप्रपौत्रे-२ सहसी अतिवृद्धप्रपौत्रे-३ सहांस ७ - वृद्धातिवृद्धप्रपौत्रे--१ सहः वृद्धातिवृद्धप्रपौत्रे - " १ सहः पितरः ५६ सूनवः श्रवापिण्ड - बीजपिण्ड - मीमांसा -उपर्युक्त पितृसह: - पिण्ड के ' पितरः - सूनवः? भेद से दो विवर्त्त बतलाए गए हैं । अब - एक विभिन्न दृष्टि से इस वस्तुतत्त्व का समन्वय किया जाता है । इस दृष्टि से इस पितृसहः पिण्ड के ' वापपिण्ड - बीजपिण्ड ' भेद से दो विभाग मानें जा सकते हैं । श्रवापपिण्ड पितृऋण हैं, पिता ( बीजी ) का वह धन है, जिसे ऋणरूप से ग्रहण कर उत्पन्न होने वाले पुत्रादि स्वयं भी सहः पिण्ड के संग्राहक बनते हैं । इनके शुक्र में भी उसी क्रमानुसार नक्षत्रप्रारणावच्छिन्न अष्टाविंशतिकल पितृसहः पिड प्रतिष्ठित होता है, जिसे कि हम इनका अपना धंन कह सकते हैं । इन का यही अपना धन इनके पुत्र का बीज बनता है, अतएव इसे हम ' बीजपिएड ' कह सह सकते हैं । इस स्वार्जित धन का बीजत्त्व १६ वें वर्ष की समाप्ति पर ही पूर्णरूप से विकसित होता है । इससे पहिले पहिले इनका पितृसहः पिण्ड निर्वी ही रहता है । इन में जो मात्राएँ पितादि के द्वारा आती हैं, वे ही ' आवाद-पिण्ड ' कहलाई हैं । आवापपिण्ड के भी ' पितरः - सूनवः ' दो विभाग रहते हैं, एवं बीजपिण्ड के भी दोनों विभाग सुरक्षित हैं । उदाहरण के लिए २१ संख्यायुक्त पुत्र के आवापपिण्ड को ही लीजिए । यह २१ पितृधन है, जिसे ऋण लेकर पुत्र ने जन्म धारण किया है । यही आवापपिण्ड है । इस के ६ भाग तो पूर्व कथनानुसार इस में रह जाते हैं, शेष १५ भाग आगे की पुत्रसन्तति में स्वधन साथ हो जाते हैं । सप्तकल स्वात्मप्रतिष्ठभाग ' पितर: ' है, पञ्चदशकल सन्ततिप्रविष्टभाग ' सूनवः ' है । इसके अतिरिक्त २८ कलात्मक वीजपिण्ड भी इसमें प्रतिष्ठित है । इसमें से ७ कला इस में ४५
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श्राद्धविज्ञान रह जाती हैं, यही ' पितरः ' हैं, २१ कला पुत्र में चली जातीं हैं, यही ' सूनवः ' है । इस प्रकार भेद पितृ- से धनरूप आवापपिण्ड, तथा स्वात्मधनरूप बीजपिण्ड, दोनों पिण्डों के प्रतिष्ठित सन्ततिगत दो दो विभाग हो जाते हैं । इन परम्परया आगत आवापपिण्डकलाओं का, तथा स्वाजित वीजपिण्ड कलाओं का यदि संकलन किया जाता है, तो प्रत्येक पुरुष के शुक्र में चतुरशीतिकल ( ८४ ) सहः पिण्ड की सत्ता । इस सिद्ध के हो जाती है । प्रत्येक पुरुष के शुक्र में २८ सहोभाग तो स्वतन्त्र रूप से उत्पन्न होते से ही आते हैं हैं, १० अतिरिक्त २१ सहभाग तो इस में अपने पिता से आते हैं, १५ सहो भाग पितामह अतिवृद्धप्रपितामह सहभाग प्रपितामह से आते हैं, ६ सहोभाग वृद्धप्रपितामह से आते हैं, ३ सहभाग २ = के अति-से आते हैं, एवं १ सहभाग वृद्धातिवृद्धप्रपितामह से आता है । इस प्रकार स्वात्मधनरूप ऋणरूप से रिक्त अपने से ऊपर की ६ पितृपरम्पराओं से इसमें २१-१५- ६०-६-३-१, इतने सहभाग बीजपिण्ड है । ते हैं, जिनका संकलत ५६ कल होता है । यही ' आवापपिण्ड ' है, एवं २ कल भाग - बीजपिण्डात्मक, '५६ x २८ ' के संकलन से ८४ का निष्कर्ष निकलता है । शुक्राचारेण प्रतिष्ठित, बाप है । इसी चतुरशीतिकल इस पितृसहः पिण्ड की वपन भूमि शुक्रगत चान्द्र महानात्मा ही माना गया का प्रपर्त्तक ८४ के व्यूहन से योनिभावप्रवर्त्तक महानात्मा चतुरशीतिलक्ष ( ८४००००० ) योनियों बनता है । निवाप - पितृ - तन्य - पिण्डत्रयीमीमांसा -बीज पुरुष में अपनी स्वार्जित सम्पत्ति २८ कलात्मक है, यह कहा जा चुका है । अब इस सम्बन्ध में कुछ विशेषता ओर ज्ञातव्य है । इस बीजपिएड की ' निवापपिण्ड, पितृनिवापपिण्ड, तन्यपिण्ड " भेद से तीन अवस्थाएँ हो जातीं हैं । यह तीन तीन का क्रम बीजी से आरम्भ कर ति वृद्धप्रपौत्र नाम की ६ ठी पीढ़ी पर्य्यन्त समानरूप से भुक्त है । सर्वप्रथम बीजी का ही सहः विचार पिण्ड कीजिए ' निवाप - । नक्षत्रावच्छिन्न चान्द्ररस के द्वारा आगत, एवं शुक्र में प्रतिष्ठित २८ कलात्मक स्वार्जित सूनु कहा पिण्ड ' है, मूलधन है । इन में से पुत्रजनन में उपयुक्त होने वालीं २१ मात्रा हैं, इसे ही हमनें । सूनु आगे है । सूनु और तनय भिन्न भिन्न वस्तुतत्त्व हैं, अतएव दोनों को पर्य्याय मानना भ्रान्ति है सन्तति की अपेक्षा से निवापपिण्ड बनता है । यह सर्वात्मना ही वितत नहीं होता, अपितु इस का एकांश ( १५ भाग ) ही तनय रूप में परिणत होता है । अस्तु, कहना यह है कि, २८ कल पितृसहःपिण्ड ' पिड ' निवापपिण्ड ' है, २१ कल पितृसहः पिण्ड ' तन्यपिण्ड ' है, एवं सप्तकल पितृसहः पिण्ड ' पितृनिवाप है । मूल धनलक्षण श्रष्टाविंशति लक्षणनिवापपिण्ड का बीजी में ही रह जाने वाला सप्तकल पिण्ड प्रकार ' पितृनिवाप ' है, एवं पुत्र में बहुत हो जाने वाला एकविंशतिकल पिण्ड ' तन्यपिण्ड ' है । इस '२८ - ७ - २१ ' क्रम से स्वाजित सहः पिण्ड की तीन अवस्थाएँ हो जातीं हैं । ये ही तीन विभाग में '१० –४–६१ पुत्र में समझिए ' वहाँ ‘२१ –६ - १५ ' यह क्रम है । पौत्र में १५ - ५ - १० ' यह क्रम है । प्रपौत्र है । यह क्रम है । वृद्धप्रपौत्र में ' ६-३-३ ' यह क्रम है । अतिवृद्धप्रपौत्र में ' ३ - २ - १ ' यह क्रम वृद्धातिवृद्धप्रपौत्र में केवल एक सहः का निवापपिण्ड है । वितानमात्रा के अभाव से यहाँ पितृनिवापपिण्ड, तथा तन्यपिण्ड, दोनों का अभाव है । निम्नलिखित परिलेख से इस क्रम का भलीभाँति स्पष्टीकर हो जाता है-४६
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1 १ - निवापपिण्ड: - २८ सहांसि प्रजातन्तु वितान १ २- पितृनिवापपिण्डः-→→ √सहासि - पितृपिएडी ( बीजी ) । ३- तन्यपिण्ड: -: - २१ सहांसि १ - नित्रापपिण्डः - २१ सहांसि २-२- पितृनिवापपिण्डः -६ सहांसि - पुत्र पिण्डत्रयी ( पुत्र: ) । ३- तन्यपिण्ड'- - १५ सहांसि १ - निवापपिण्डः - १५ सहांसि ३-२- पितृनिवापपिएड: --: -- ५ सहांसि - पौत्रपिण्डत्रयी ( पौत्रः ) । I ३ - तन्यपिण्डः -- १० सहांसि १ - निवापपिएड: - १० सहांसि ४-२- पितृनिवापपिण्डः - ४ सहांसि - प्रपौत्रपिण्डत्रयी ( प्रपौत्रः ) । ३- तन्यपिण्डः -६ सहांसि १ - निवापपिण्डः - ६ सहांसि २- पितृनिवापपिण्डः - ३ सहांसि ३- तन्यपिण्ड: -: - ३ सहांसि १ - निवापपिण्डः -- ३ सहांसि - वृद्धप्रपौत्रपिण्डनयी ( वृद्ध प्रपौत्रः ) । ६ २- पितृनिवापपिण्डः - २ सहसी > - प्रतिवृद्धप्रपौत्र पिण्डत्रयी ( प्रतिवृद्धप्रपौत्रः ) ३- तन्यपिण्डः - १ सद्दः * -निवापपिण्ड: # ४७ -वृः श्र ० प्र ० पिण्डत्रयी ( वृद्धातिवृद्धप्रपत्र )
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श्राद्धविज्ञान शुक्र में प्रतिष्ठित महानात्मा में पूर्वप्रदर्शित ५६ कल आवापिण्ड, तथा २८ कल बीजपिण्ड के समन्वय से ८४ पितृसहों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । इन ८४ कलाओं में से २८ कलाएँ तो बीजी मूल पुरुष का स्वोपार्जित धन है, एवं ५६ कलाएँ पिता - पिता महादि द्वारा प्राप्त आगन्तुक ऋण है । ऋणात्मक ५६ कलात्मक यह आवापपिण्ड धनात्मक २८ कलात्मक बीजपिएड में प्रतिष्ठित रहता है । बीजपिण्ड में प्रतिष्ठित यही पितृधन ( पितृऋण ) बीजी की जीवन सत्ता का कारण बनता है । जिस प्रकार २८ कलात्मक स्वोपार्जित आत्मनीन पितृसहः पिण्ड बीजी के पुत्र - पौत्र- प्रपौत्रादि सन्तानभावों में सातवीं पीढ़ी पर्य्यन्त ( वृद्धातिवृद्धप्रपौत्र पर्यन्त ) ७ - २१, ६–१५, ५-१५, ४-६, ३-३, २–१, इस क्रम से ' पितर- सूनु - भेद से दो दो भागों में विभक्त रहता है, एवमेव उपर्युक्त ५६ कलात्मक आगन्तुक पितृऋण ( पितृधनरूप पितृसहः पिण्ड ) भी आत्मधेय, तन्य रूप से दो भागों में विभक्त हो जाता है । पितृऋण का जो अंश बीजी के आत्मा में ( २ कत्ल महानात्मा में ) जीवनसत्तार्थ प्रतिष्ठित रहता है, वह तो ' आत्मधेय ' पितृसह: कहलाता है । एवं जो पितृऋण अपनी कलाओं के साथ पुत्र - पौत्रादि के स्वरूप निर्माण में उपयुक्त हो जाता है, वह ' तन्य ' कहलाता है । सातवीं पीढ़ी का ( वृद्धातिवृद्धप्रपितामह का ) १ संख्या वाला पितृसहः केवल आत्मवेयरूप से ही प्रतिष्ठित रहता है । वितानमात्रा के अभाव से इस का आगे वितान नहीं होता, अतएव इस की तन्यरूप में परिणति न होकर केवल आत्मधेय रूप में ही बीज में ही स्थिति रहती है । पितृऋणात्मक पितृसह कलाओं का जो भाग बीजी में प्रतिष्ठित रहता हुआ आत्मधेय बनता है, उसका बीजी के महानात्मा के साथ अन्तर्यामि सम्बन्ध रहता है । इसी अन्तर्यामि सम्बन्ध से यह बीजी का ( महदात्मवत् ) उक्थ बन जाता है । जीवनसत्तोपयिक चान्द्ररस का ग्रहण करना उक्थ भावापन्न आत्मधेय इसी पितृसहः का काम है । क्योंकि यह आत्मधेय श्रागत पितृसहः पितृधन है, अतएव इस का प्रत्यर्पण आवश्यक हो जाता है । यदि इन आत्मधेयकलाओं का संकलन किया जाता है, तो २१ संख्या हो जाती है । इन २१ का ऋणभार स्वयं बीजी पर अवलम्बित है । वृद्धा-तिवृद्धप्रपितामह की १ कला, अतिवृद्धप्रपितामह की २ कला, वृद्धप्रपितामह की ३ कला, प्रतिमामह की ४ कला, पितामह की ५ कला, पिता की ६ कला, इस प्रकार १-२-३ - ४ - ५ - ६ क्रम से २१ कला इस का मन बना रहता है । कहा गया है कि - पितृधन की कुल ५६ कला आती हैं । ६६ में से २१ तो इस क्रम से आत्मधेय हैं । शेष ३५ कला तन्यरूप में परिणत हैं, जैसा कि अनुपद में ही स्पष्ट होने वाला है । स्वोपार्जित २८ कलाओं में से २१ कला तो तन्यरूप से पुत्र - पौत्रादि को ऋण रूप से दे दीं जातीं हैं, शेष ७ कला इस बीजी में हीं आत्मधेय रूप से प्रतिष्ठित रह जातीं हैं । इस प्रकार पितृऋण की ५६ में २१ कला के, तथा स्वात्मधन की २८ में से ७ कला के समन्वय से २ = कला हो जातीं हैं । यह २८ कल आत्मधेय भाग प्रत्येक पुरुष में नित्य प्रतिष्ठित रहता है । इसी आधार पर पूर्व में मासिक पिण्ड का स्वरूप बतलाते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि, पुरुष का महानात्मा ४८
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प्रजातन्तुवितान सदा २८ कल पितृसहः पिण्ड से युक्त रहता है । इस सम्बन्ध में यह ध्यान रखना आवश्यक है कि, महानात्मा में प्रतिष्ठित २८ कल सहः पिण्ड में से २१ कला तो ऋणात्मक धन है, एवं ७ कला स्वोपा-र्जित धन है, जैसा कि परिलेख से स्पष्ट हो जाता है-महानात्मनि प्रतिष्ठितानि - श्रात्मधेयानि -सहांसि-१ - एक सहः - वृद्धातिवृद्धप्रपितामहस्य २ - द्वे सहसी -- अतिवृद्धप्रपितामहस्य - षड्धनानि पितृऋणानि ३ - त्रीणि सहांसि - - वृद्धप्रपितामहस्य ४ - चत्वारि सहांसि - प्रपितामहस्य ५ - पञ्च सहांसि -- पितामहस्य ६- षट् सहांसि -- पितुः ७ - सप्त सहांसि - - आत्मनः २८ - अष्टविंशतिकलोऽयं महानात्मा - सप्तममेकमात्मधनम् यह तो हुई आत्मधेय कलाओं की व्यवस्था । अब तन्य - कलाओं की मीमांसा कीजिए । यद्यपि बीजी का अपना धन २३ कलात्मक है । परन्तु अपने क्षेत्र में ( महानात्मा में ) आत्मधेयरूप से ७ ही कला शेष रहतीं हैं । शेष २१ कला तनयोत्पत्ति में ऋणरूप से भुक्त हो जाती हैं । अतः इस २१ कलसमष्टि को हम ' तन्य ' ही कहेंगे । परम्परागत ५६ मात्राओं में १ २१ का भोग स्वयं इसी बीजी में होता है, शेष ३५ कलाएँ बीजी के पुत्रादि- प्रजनन में भुक्त हैं । जो ऋणकलाएँ प्रजनन में ऋणरूप से भुक्त हैं, उन्हीं को तन्य कहा जायगा, एवं उन की व्यवस्था का समन्वय यों किया जायगा । बीजी को अपने पिता से ऋण रूप में २१ मात्रा मिलती हैं । इन में से ६ मात्रा इस में आत्मघेष रूप से प्रतिष्ठित रहती हैं, शेष १५ मात्रा बीजी अपने पुत्र में ऋणरूप से प्रदान करता है । ऋण के ऋणरूप इसी पञ्चदशकल भाग को तन्य कहा जायगा । पितामह से बीजी को १५ मात्रा मिलती है । इन में से ५ मात्रा आत्मधेयरूप से इसी में प्रतिष्ठित रहतीं हैं, शेष १० मात्रा बीजी अपने पुत्र में दे देता है, यही तन्य भाग है । प्रपितामह से बीजी को १० मात्रा मिलती हैं । इन
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श्राद्धविज्ञान में से ४ मात्रा आत्मरूप से इसी में प्रतिष्ठित रहती हैं, शेष ६ मात्रा बीजी अपने पुत्र में दे देता है, यही तन्य भाग है । वृद्धप्रपितामह से बीजी को ६ मात्रा मिलतीं हैं । इन में से ३ मात्रा आत्मधेय रूप से इसी में प्रतिष्ठित रहती हैं, शेष ३ मात्रा यह अपने पुत्र में दे देता है, यही तन्य भाग है । प्रतिवृद्धप्रपितामह से बीजी को ३ मात्रा मिलती हैं । इनमें से २ मात्रा आत्मधेय रूप से इसी में प्रतिष्ठित रहती हैं, शेष १ मात्रा यह अपने पुत्र में समर्पित कर देता है । वृद्धातिवृद्धप्रपितामह से इसे १ ही मात्रा मिलती है । इस का समर्पण असम्भव है । अतएव यह तन्य न बन कर केवल बीजी प्रतिष्ठित रहती हुई आत्मधेय ही बनी रहती है । इस प्रकार “ २१-१५-१०-६- ३ १-१ प्राप्त होने चालीं इन ५६ कलाओं में से क्रमशः ६-५-४-३-२-१ ये २१ कला तो आत्मधेय रूप से बीजी में प्रतिष्ठित रह जातीं हैं । एवं ' १५-१०-६-३-११ ये ३५ कला बीजी के पुत्र में सन्तत होती हुई तन्य रूप में परिणत हो जातीं हैं । ऋणरूप से आगत ५६ में से २१ कलाएँ आत्मधेय हैं, ३५ कलाएँ न्य हैं, यही निष्कर्ष है । एवं स्वोपार्जित २८ में से ७ कलाएँ आत्मधेय हैं, २१ कलाएँ तन्य हैं, यही तात्पर्य है । ऋणात्मक २१ आत्मधेय स्वोपार्जित ७ श्रात्मधेय, दोनों के संकलन से २८ आत्मधेय पिण्ड हैं, सदा महानात्मा में प्रतिष्ठित रहने वाला धन है । ऋणात्मक ३५- तन्य, स्वोपार्जित २१ तन्य, दोनों के संकलन से ५६ कल तन्यपिण्ड है । यह शुक्र में प्रतिष्ठित रहने वाला ऋण है । जैसा कि अनुपद में ही बतलाई जाने वाली ऋण धन मीमांसा से स्पष्ट होने वाला है । १ - एक सहः --- वृद्धा तिवृद्ध पितामहस्य ३ -- त्रीणि सहांसि - अतिवृद्धप्रपितामहस्य ६- षटूसहांसि - - वृद्धप्रपितामहस्य १०. दश सहांसि - प्रपितामहरय १५- पञ्चदश सहांसि - पितामहस्य २१ - एकविंशतिसहांसि - पितुः -५६- कलात्मकं ऋणम् आत्मघन - श्रात्मऋण - स्त्ररूपमीमांसा -- परणानि श्रागतानि आत्मधनोपलक्षित २८ कल सहः पिण्ड, आत्मऋणोपलक्षित ५६ कल सहःपिण्ड, दोनों की श्रात्मधेय तन्य रूप से दो दो अवस्थाएँ बतलाई गई हैं । पूर्व निरूपण से यद्यपि चारों अव-“ स्थाओं का समन्वय हो जाता है, अथापि विषय दुरूहता के नाते इन सब का संकलनदृष्टि से • समन्वय ओर कर दिया जाता है । पहिले स्वोपार्जित, आत्मधनोपलक्षित, २८ कल सह. पिण्ड को ही लीजिए । इसकी ‘ पितरः- सूनवः ' भेद से दो अवस्था रहतीं हैं । वीजी से आगे उत्पन्न होने ५० "
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प्रजातन्तु वितान वाली पुत्रादि- वृद्धातिवृद्धप्रपौत्रान्त ६ पोढ़ी पर्य्यन्त प्रत्येक पीढ़ी में इस बीजी के आत्मधन के ' पितरः सूनुः ' - रूपसे दो दो विभाग हो जातें हैं । जो आत्मधन योषिदग्नि में आहुत न होकर आबाप-कर्त्ताओं की महत्संस्थां में अन्तर्य्याम सम्बन्ध से प्रतिष्ठित रहता जाता है, वह ' आत्मधेय ' कह-लाता है । एवं जो आत्मधन योषिदग्नि में आहुत होता जाता है, वह उत्तरोत्तर - सन्तत होता हुआ ' तन्य ' कहलाता है । आत्मवेयभाग धन है, तन्यभाग ऋण हैं । धनभाग ' पितरः ' है, ऋणभाग ' सूनवः ' है । ऋण - धन के इस क्रमिक धाराप्रवाह के कारण बीजी का आत्मधन ७ धनभावों में एवं ६ ऋणभावों में परिणत हो जाता है । लोकभाषा - दृष्टि से धनभाव ' जमा ' है, ऋणभाव ' खर्च ' है । ' जमा - खर्च ' की यह परम्परा सचमुच पितृसृष्टि का एक अपूर्व - मौलिक रहस्य है, जिसका यथावत समन्वय किए बिना ' सापिण्ड्य ' रहस्य गतार्थ नहीं बन सकता । स्वोपार्जित २ कल आत्मधन के इन ऋण धन भावों का परिलेख से भलीभांति स्पष्टीकरण हो रहा है । ऋणधनभावापन्नो महानात्मा श्राद्वकम्र्मोपनिषत् -२८ - कलात्मकः स्वोपार्जितः पितृसहः पिण्डः ( श्रात्मधनम् ) पितरः सूनवः पितरि -२१ -पुत्रे पुत्रे. ६. -१५--पौत्रे पौत्रे--१० -प्रपौत्रे प्रपौत्रे-६ - वृद्धप्रपोत्रे वृद्धप्रपौत्रे-- अतिवृद्धप्रपौत्रे प्रतिवृद्धप्रपत्रे--२. - वृद्धातिवृद्धप्रपौत्रे वृद्वातिवृद्धप्रपौत्रे---- -२८ धनानि ऋणानि ५६ ऋण ( ५६ ) - धन ( २८ ) भावापन्नः - चतुरशीतिकलः ( ८४ ) महानात्मा श्राद्धकर्म्मणः - उपनिषत् ४१
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श्राद्धविज्ञान art के शुक्रात्मक महानात्मा में रहने वाले स्वोपार्जित - श्रात्मधनरूप - २८ कलात्मक पितृसहः पिण्ड के ' पितरः- सूनवः ' इन विभागों के अनन्तर बीजी के महानात्मा में प्रतिष्ठित, पिता - पितामहादि के द्वारा ऋणरूप से आगत- श्रतएव आत्मऋणरूप ५६ कलात्मक पितृसहः पिण्ड के त्य, तथा तन्य पिण्डों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित होता है । यह निश्चित है कि, पिता-पितामहादि से आने वाली ऋरणात्मिका सभी सहः कला बीजी में प्रतिष्ठित नहीं रह सकतीं । अपितु कुछ अंश प्रतिष्ठित रहता है, शेषांश बीजी के पुत्रादि में ' ऋणरूप से चला जाता है । ५६ कला-त्मक पितृऋणरूप पितृसहः कलाओं में जो जितनीं कला बीजी में प्रतिष्ठित रह जातीं हैं, उन्हें ' आत्मधेयपिण्ड ' कहा जाता है, एवं जितनी कला पुत्रादि में ( सन्तानपरम्परा से ) भुक्त हो जातीं हैं, वे ' तन्यपिण्ड ' कहलाई हैं । मन भी आत्मय, तन्य भेद से ऋण धन भावात्मक है । श्रात्मऋण भी श्रात्म-धेय, तन्य भेद से ऋण धन भावात्मक है । सर्वत्र धनभाव श्रात्मधेय है, ऋणभाव तन्य है । आत्म-धन के २८ में से ७ भाग आत्मधेय है, यही ' पितर ' हैं, यही धन है । आत्मधन के २८ हैं से २१ तन्य हैं, यही ' सूनवः ' हैं, यही ऋण है । एवमेव आत्मऋण के ५६ भागों में से २१ आत्मधेय हैं, यही पितर है, यही धन है । श्रात्मऋण के ५६ में से ३५ तन्य हैं, यही सूनवः हैं, यही ऋण हैं, आत्मधन के धनरूप ७ आत्मधेय, आत्मऋण के धनरूप २१ आत्मधेय इस प्रकार बीजी में २८ आत्मकला प्रतिष्ठित हैं । आत्मऋण के ऋणरूप ३५ तन्य, आत्मधन के ऋण २१ तन्य, इस प्रकार बीजी में ५६ तन्यकला प्रतिष्ठित हैं, जैसा कि परिलेख से स्पष्ट हो रहा है-
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4 ५६ कलात्मकः पितृणरूपः सहः पिण्डः ( आत्मऋणम् ) श्रात्मधेयाः तन्याः वृद्धातिवृद्धप्रपितामहस्य- १. अतिवृद्धप्रपितामहस्य-वृद्धप्रपितामहस्य-प्रपितामहस्य-पितामहस्य-पितु: -1 आत्मनः - वृद्धातिवृद्धप्रपौत्रे ३ - अतिवृद्धप्रपौत्रे ६ - वृद्धप्रपौत्रे १० -प्रपौत्रे -१५. -पौत्रे -२१ २८ धनानि ऋणानि ५६ प्रत्येक पुरुष में अपने से ऊपर की क्रमिक ६ पीढ़ियों से ऋणरूप से ५६ सहोमात्रा प्रतिष्ठित रहतीं हैं, एवं यह स्वयं २८ अपनी स्वतन्त्ररूप से उत्पन्न करता है । फलतः कुल ८४ मात्रा का संग्रह होता है । ५६ मात्रा ऋण है, २८ मात्रा धन है । धनात्मिका २८ मात्राओं में से इसके समीप ७ मात्रा रहने पातीं हैं, २१ पुत्र में चलीं जातीं हैं । ५६ मात्रा का ऋण इसे चुकाना है । इन में से ३५ मात्राओं का परिशोध तो पुत्रोत्पत्ति - मात्र से हो जाता है । क्योंकि जहाँ पुत्र में इसके अपने आत्मधन के २८ में से २१ भाग जाते हैं, साथ ही आत्मऋण के ३५ भाग भी तन्यभाव से पुत्र में चले जाते हैं । अब ऋणभाग में से केवल २१ कला इसके पास शेष रह जाती हैं । इन २१ ऋणभागों को, एवं ७ धनभागों को लेकर पुरुष यावदायुर्भोगपर्य्यन्त जीवनसत्ता - धारण में समर्थ होता है । इसकी बन्धनमुक्ति तभी सम्भव है, जब कि यह २१ ऋणभागों का तो परिशोध कर दे, एवं ५३
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-श्राद्धविज्ञान:.. ७ भागों को पूर्ण ( २८ ) बना दे । इसी ' पितृऋणमुक्ति ' के लिए श्राद्धकर्म विहित हुआ है । यही इसका नृय है, जैसा कि अगले प्रकरण में विस्तार से बतलाया जाने वाला है । प्रकृत में इस ' सहः ' स्वरूपमीमांसा से यही बतलाना है कि, मूलपुरुष से आरम्भ कर उसकी सातवीं पीढ़ी पर्य्यन्त शुक्रस्थित एक ही पिण्ड का वितान होता है । इसी पिण्ड समानता से. सातों का सापिण्ड्य सम्बन्ध माना गया है । जिस सूत्र द्वारा यह सम्बन्ध सातों में सुरक्षित रहता है, वही सूत्र ' श्राद्धकर्म ' की मूलप्रतिष्ठा बनता है । इन सात सपिण्डों में पिता, पितामह, प्रपितामह, तीन सहभाग संख्याधिक्य से ' पिण्डभाजः ' कहलाए हैं, एवं वृद्धप्रपितामह, अतिवृद्धप्रपितामह, वृद्धाति-वृद्धप्रपितामह, ये तीन संख्याल्पता से ' लेपभाजः ' कहलाए हैं । २१ संख्यायुक्त बीजी ( पुत्र ) पिण्डद माना गया है, जैसा कि निम्न लिखित वचन से प्रमाणित है ।
ले r भाजश्वतुर्थाद्या: पित्राद्याः पिण्डभागिनः ।
पिण्डदः सप्तमस्त्वेषां सापिण्डयं साप्तपौरुषम् ॥
शुक्रस्थित महानात्मा चतुरशीतिकल पितृप्राणात्मक सहः पिण्ड के द्वारा ही प्रजातन्तुवितान में समर्थ होता है । जिस प्रकार वस्त्रनिर्माण प्रक्रिया में ताना - बाना लगा करता है, ठीक वही प्रकार प्रजातन्तुवितान में है । ६ ऊपर के आगतसूत्र, ६ नीचे के विततसूत्र, पुनः प्रत्येक की अवान्तर शाखा - प्रशाखाएँ, कैसा अद्भुत प्रजातन्तु - वितान है, और कैसी है उन अतीन्द्रियतत्त्वज्ञ महर्षियों की दृष्टि, जिन्होनें प्रजातन्तुवितानविज्ञान का साक्षात्कार किया, एवं तदाधार पर आनृण्यभाव-प्रवर्त्तक श्राद्ध नामक वैज्ञानिक प्रक्रिया का आविष्कार किया, जोकि तात्त्विक प्रक्रिया आज उन ऋषिसन्तानों के द्वारा ही उपहास का क्षेत्र बनी हुई है । इससे अधिक हमारा और क्या पतन होगा । तन्तुवितानसम्बन्धी - प्रमाणवाद--प्रजातन्तुवितानात्मक, साप्तपौर षलक्षण उक्त सापिण्ड्य - स्वरूप के सम्बन्ध में प्रमाणा-नन्तर इसलिए अनपेक्षित है कि, प्रत्यक्ष प्रमाणभूत ज्योतिःशास्त्र के प्रत्यक्ष चन्द्रदेवता के सौम्य -प्राण का नक्षत्रभेद से २८ भागों में विभाजन हो रहा है, एवं वही तत्सजातीय सौम्यशुक्र में प्रतिष्ठित होकर प्रजातन्तुवितान का कारण बन रहा है । प्रजातन्तुवितानात्मक सापिण्ड्यभाव इस व्यवस्थित क्रम से सप्तपुरुषपर्यन्त व्याप्त हो रहा है, जिस के यथावत् विमर्श के अनन्तर बुद्धिक्षेत्र से काम लेने वाले विचारशील को अणुमात्र भी सन्देह नहीं हो सकता । परन्तु अभि-निबिष्ट प्रजावर्ग की दृष्टि में इस प्रत्यक्ष स्थिति का भी तबतक कोई महत्त्व नहीं है, जब तक कि उसे प्रमाणों से सन्तुष्ट न कर दिया जाय । जिन का यह आग्रह है कि, प्रत्येक विषय के लिए - प्रमाण होना चाहिए, फिर भले ही वह विषय बुद्धिगम्य ही क्यों न हो, प्रमाण भी वेदशास्त्र का, तत्रापि भी मूल संहिताभाग का प्रमाण ही वस्तुगत्या प्रमाण माना जायगा । प्रमाणवादियों की संहिता-५४