Part IV Atmgativigyanopanishta Part 4 — पृष्ठ 101–110

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४ · पृष्ठ 101–110

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श्राद्धविज्ञानः चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि द्वारा प्रज्ञान मन पर जब सोरतेज का प्रबल आक्रमण होता है, तो अमावस्या के चन्द्रमा की भाँति प्रज्ञान-मन एकान्ततः श्रभिभूत हो जाता है । इन्द्रिय सम्बन्ध छूट जाता है । प्रज्ञान की इस अभिभूतावस्था को ही निद्रा कहा जाता है । फलतः श्रीदान सोरतेजः सम्बन्ध से निद्रा का भी तेजोभूतत्त्व भलीभाँति सिद्ध हो जाता है । इन तीनों तैजस भूतों के प्रत्येक के साथ ४८०० तैजस व्यान नाड़ियों का सम्बन्ध है । तीनों के संकलन से इसके भी १४४०० ही विवर्त हो जाते हैं इनका रस तीक्ष्ण है, वर्ण रक्त है, स्पर्श उष्ण है । धावन, चलन, भाषण तीनों वायवीय द्रव्य हैं । धातुत्रय भेद से वायवीय व्यान नाड़ियाँ भी उसी ४८०० क्रम से १४४०० हैं । इनका रस अम्ल है, वर्ण चित्र है, स्पर्श अनुष्णशीत है । द्वेष, लज्जा, यम ये तीनों श्राकाशानुगत धातु हैं । द्वेष में प्रात्मकम्पन है, लज्जा में आत्मसंकोच है, भय में आत्मपतन हैं । कम्पन - संकोच - पतन तीनों अपकाशात्मक आकाशसापेक्ष है । नामरूप ही द्वेष - लज्जा भय के प्रवर्तक हैं, एवं ' प्रकाश वै नाम - रूपयोनिर्बहिता ' श्रुति के अनुसार आकाश ही उदर सम्बन्ध प्रवृत्ति द्वारा नाम-रूपोदय का कारण बनता है । अतएव अवश्य ही इन्हें आकाश धातु कहा जा सकता है । धातुत्रय भेद से श्राकाशात्मिका व्यान नाड़ियाँ भी उसी ४८०० क्रम से १४४०० हैं । इस प्रकार धातुत्रयभेदेन आरम्भ में ४८०० संख्यात्रों में पञ्चभूत सम्बन्धेन १४४०० संख्याओं में विभक्त इन पाँच व्यान नाड़ियों के सम्भूय ७-२००० ( बहत्तर हजार ) विवर्त्त हो जाते हैं । इन पाँचों व्यान नाड़ियों की पुष्टि पञ्चप्राणों से होती है । एक ही सौरप्रास ' पञ्चधात्मानं विभज्य ' इस प्रश्न श्रुति के अनुसार अपने संस्थाभेदों से शरीरसंस्था में पाँच भावों में परिणत होकर प्रतिष्ठित हो रहा है । वे ही पाँचों विवर्त्त क्रमशः प्राण, उदान, व्यान, समान, अपान इन नामों से व्यवहृत हुए हैं । पूर्व में जिन प्राणोदानादि पाँच प्राणों का दिग्दर्शन कराया गया था, उनका सौम्यपार्थिव त्रिलोकी से सम्बन्ध था, एवं इन पञ्चप्राणों का सौर्य रोदसी त्रैलोक्य से सम्बन्ध है । केवल नाम साम्य से तत्त्वभेद में भ्रान्ति नहीं होनी चाहिए । रोदसीत्रैलोक्य का प्राणपञ्चक चूंकि स्तौम्य त्रैलोक्य के प्राणपञ्चक से समतुलित है, साथ ही दोनों पञ्चकों के नाम भी समान हैं, प्रतएव व्यवहार में ' पञ्चप्राण ' शब्द ही प्रसिद्ध हो रहा है । तत्त्वतः दोनों पञ्चक सर्वथा भिन्न हैं, जैसा कि निम्नलिखित प्रासङ्गिक वक्तव्य से स्पष्ट हो जाता है । जिन अष्टविध त्रैलोक्यों का अगले अवान्तर परिच्छेदों में दिग्दर्शन कराया जाने वाला है, उनमें सेक्सी त्रैलोक्य तथा स्लौम्यत्रैलोक्य इन दो त्रैलोक्यों की ओर ध्यान आकर्षित किया जाता है । जिस चित्यपिण्ड पर अस्मदादि पार्थिव प्राणी चलते - फिरते हैं, वह भूपिण्ड है, यही रोदसी त्रैलोक्य का ' भूलोक ' है । भूपिण्ड से अत्यधिक दूर आकाश प्रदेश स्थित स्वज्योतिर्म्मय सूर्य्यपिण्ड रोदसी का ' स्वर्लोक ' है, एवं भूपिण्ड सूर्य्यपिण्डरूप दोनों भू - स्वर्लोकों को अपने गर्भ में प्रतिष्ठित रखने वाला रोदसी विश्वात्मक विराट् शरीरावच्छिन्न अन्तरिक्ष ही इस रोदसी का ' भुवर्लोक ' है । तीनों की मूलप्रतिष्ठा सूर्य है, अतएव इस त्रिलोकी को सूर्य्यत्रिलोकी कहा जायगा । सूर्य्य से प्रारम्भ कर भूपिण्डान्त एक ही सौरप्रारण व्याप्त है, यही सत्यप्राण है । व्यष्टिरूप से त्रिधाविभक्त इस एक ही सूर्य्यप्राण के ' प्राण- व्यान - श्रपान ' ये तीन विवर्त्त हो रहे हैं । तीनों में स्वर्लोकावच्छिन्न प्राण - प्राणं तथा भूलोकावच्छिन्न प्रपान प्रारण, दोनों प्रवारपारीण [ ६४ ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड सूर्य्यपिण्ड: -अन्तरिक्षम् भूपिण्ड: -[ ६५ ] आत्मगतिनिमित्तानि → स्वर्गलोकः → भुवलोकः + → भूलोकः सौर- भौमप्राण सूर्य्यात्मिक गायत्रीमात्रिक वेद के गायत्रप्रारण सम्बन्ध से ' ऐति - प्रेति ', इन दो भावों से युक्त होते हुए दो - दो भावों में परिणत हो रहे हैं । गायत्री के ' प्रेति ' धर्म से स्वर्लोकावच्छिन्न वही प्रारण सूर्य्याभिमुख बनता हुआ ' प्राण ' बन रहा है, एवं गायत्री के ' एति ' ( गच्छति ) धर्म से युक्त स्वर्लोकावच्छिन्न वही प्राण सूर्य्यविरुद्ध दिशनुगामी बनता हुआ उदान ' बन रहा है । साथ ही यही उदान पार्थिव प्रजा में आता हुआ प्राण बन रहा है, एवं प्राण पार्थिवप्रजा से निर्गच्छत् होकर उदानं बन रहा है । सूर्य्य के प्रारण - उदान पार्थिव प्रजा के उदाम - प्राण बन रहे हैं, यही निष्कर्ष है । सूर्य्यं के लिए जो प्रेति है, वही हमारे लिए एति है, एवं उसके लिए जो एति है वही हमारे लिए प्रेति है । सूर्य्य दृष्टया पराची तथा पार्थिव प्रजादृष्ट्या प्रर्वाची बनी हुई गायत्री से,. सूर्य दृष्ट्याएतिभावात्मक उदान बने हुए एवं पार्थिव प्रजादृष्ट्या प्रेतिभावात्मक प्राण बने हुए सौरतत्त्व से पार्थिव प्रजा का पोषण होता है । एवमेव पार्थिवप्रजादृष्ट्या पराची तथा सूर्य्यदृष्ट्या अर्वाची बनी हुई गायत्री से साथ ही पार्थिव प्रजादृष्ट्या एतिभावात्मक उदान बने हुए तथा सूर्य्यदृष्ट्या प्रेतिभावात्मक प्राण बने हुए सूर्य्यतत्त्व से सूर्य्यानुगता देवप्रजा का पोषण होता है । ठीक यही व्यवस्था सौरप्राणप्रवर्ग्य-भूत भौम अपान प्राण के सम्बन्ध में घटित है प्रेतिभावापन्न ( आगच्छत् ) भौम प्रपान ' समान ' है एवं एति ( निर्गच्छत् ) भावापन भौम प्रपान ' अपान ' है । इस प्रकार गायत्री के सम्बन्ध से दोनों के दो - दो विर्स हो जाते हैं । इसी गायत्री - सम्बन्ध का स्पष्टीकरण करते हुए श्रुति ने कहा है-" स वा ऽ एति च प्रेति चान्वाह । गायत्रीमेवैतदर्वाची ' च पराची ' च युनक्ति । प्रेति वै प्राणः, एत्युदानः प्राणोदानो वेवैतद्दधाति । पराव्यह ( गायत्री ) देवेभ्यो यज्ञं वहति, अर्वाची मनुष्यानवति ॥ " ( शत ० १ | ४ | १ | ३ ) |

पृष्ठ 103

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्डं आत्मगति निमित्तानि इसी त्रैलोक्य के सम्बन्ध में एक अनुप्रासङ्गिक स्पष्टीकरण और । सूर्य्य - भूपिण्डात्मक स्व - र्भूर्लोक को अपने गर्भ में रखने वाले जिस अन्तरिक्षात्मक भुवर्लोक का पूर्व में दिग्दर्शन कराया गया है, उस अन्त-रिक्ष के सायंतन - निरायतन भेद से दो विवर्त्त हो जाते हैं । दोनों लोकों को अपने गर्भ में रखने वाला अन्तरिक्ष निरायतन अन्तरिक्ष है, इसे ही ' अर्णवसमुद्र ' कहा गया है । ' समुद्रमभितः ' पिन्वमानम् ' ( यजुः सं ० ) इत्यादि मन्त्रवर्णन के अनुसार इसी अन्तरिक्षात्मक प्रणव समुद्र से सूर्य्य तथा भूपिण्ड, दोनों समन्तात् वेष्टित हैं । इस निरायतन प्रणव समुद्रात्मक अन्तरिक्ष में ' आपः - वायुः - सोम: ' ये तीन भार्गवतत्त्व प्रतिष्ठित हैं । प्यप्राण वरुण है, वायव्य प्राणगन्धर्व है, एवं सौम्यप्रारण पितर है । प्राप्य वरुणप्रारण ही कहीं कहीं ' वृत्र ' नाम से भी व्यवहृत हुआ है । इन तीनों में पितृप्राणात्मक सोम ही दिक्सोम है । निरायतन अन्तरिक्ष में व्याप्त यही दिक्सोमनि रायतन सोम कहलाया है । निरायतन अन्तरिक्षावच्छिन्न वरुण ( वृत्र ) गन्धर्व-पितृप्राणयुक्त आपः - वायुः सोम के प्रवर्ग्य भाग से ( भूपिण्ड द्वारा ) चन्द्रमा का स्वरूप निष्पन्न हुआ है । चूंकि चन्द्रमा में तीनों का समन्वय है, अतएव चन्द्रमा के सम्बन्ध में निम्नलिखित निगम वचन व्यवहृत हुए हैं-१ - " प्रथैष एव वृत्रोयच्चन्द्रमाः " ( शत ० १।६।४।१३ ) । - " अप्सु वै वरुणः " ( तै ० ब्रा ० १।६।५।६ ) । - " चन्द्रमा गन्धर्वः " ( शत ० ६ । ४ । १ । ε ) । - " योऽयं वायुः पवते, एष सोमः " ( शत ० ७।३।१।१ ) । - " पितृदेवत्यो वै सोमः " ( शत ० २।४।२।१२ ) । अर्णवसमुद्रात्मक - निरायतन - त्रैलोक्यव्यापक अन्तरिक्ष के गर्भ में जैसे सूर्य्य - भूपिण्ड प्रतिष्ठित हैं, तथैव तत् प्रवर्ग्यभूत अब् - वायु - सोमात्मक - वृत्र - गन्धर्व - पितृमूर्तिचन्द्रमा भी प्रतिष्ठित है । चान्द्रकक्षा-वच्छिन्न, सूर्य्य- भूपिण्ड मध्य पतित अन्तरिक्ष सायतन सोमात्मक चन्द्रमा के सम्बन्ध से सायतन अन्तरिक्ष्य है । वायुदृष्ट्या अन्तरिक्ष वायुमय है, चन्द्रदृष्ट्या चन्द्रमय है, गन्धर्व दृष्ट्या गन्धर्वमय है, प्रष्ट्या पोमय है । यही मध्यस्थ चान्द्रअन्तरिक्ष भुवर्लोक का स्वरूप सम्पादक है । अतः रोदसी त्रैलोक्य में निरायतन अन्तरिक्ष ( अर्णव समुद्र ) को अन्तरिक्ष न कह कर चान्द्र कक्षावच्छिन्न इस सायतन चान्द्रअन्त-रिक्ष को ही हम भुवर्लोक कहेंगे । जिस प्रकार सौरप्राण प्राणोदानात्मक अपान है, एवमेव मध्यस्थ चन्द्रा-वच्छिन्न वायव्यप्राण वरुण सम्बन्ध से व्यान है । ' चन्द्रमा वस्वन्तरा सुपर्णो धावति दिवि ' इत्यादि मन्त्रवर्णनानुसार निरायतनान्तरिक्ष लक्षण प्रर्णवसमुद्र में स्वदक्षकक्षावृत्त पर परिभ्रममाण चन्द्रमा ही धिष्ठाता है । तदवच्छिन्न वारुरणवाड्यात्मक प्रारण ही मध्यस्थ व्यानप्राण है । निरायतन प्रान्तरिक्ष्य व्यानप्रारण जहाँ सम्पूर्ण त्रैलोक्य में व्याप्त रहता हुआ ' सर्वशरीरगः ' है, वहाँ यह सायतन आन्तरिक्ष्य प्राण त्रैलोक केन्द्रभूता चान्द्रसंस्था में भुक्त होता हुआ हृदयस्थ है । ' रोदसी त्रैलोक्यस्य तदवच्छिन्न प्रारणपञ्चकस्य वा प्रतिकृति ' से पञ्चप्राणात्मिका इसी त्रैलोकी का स्पष्टीकरण हो रहा है । [ ६६ ]

पृष्ठ 104

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड ॐ आत्मगतिनिमित्तानि wwwww रोदसी त्रैलोक्यस्य तदवच्छिन्नप्राणपञ्चकस्य वा प्रतिकृतिः-2 स्वलेकि ( सर्वांची गायत्री ) प्राणः प्राणः भुवर्लोकः व्यानः Beible ( Ktelle frich ) Behte & श्रीवालचन्द्र यन्त्रालय जयपुर । निरायतन प्रान्तरिक्ष्य व्यानप्राण त्रैलोक्य में व्याप्त रहता हुआ ‘ सर्वशरीरम् जहाँ सम्पूर्ण यह सायतन आन्तरिक्ष्य प्रारण त्रैलोक्य ' है, वहाँ चान्द्र संस्था में भुक्त होता हुआ हृदयस्थ केन्द्र भूता से पचप्राणात्मिका इसी रोदसी त्रिलोकी है । परिलेख का स्पष्टी-करण हो रहा है ।

पृष्ठ 105

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि दूसरी तोत्रिलोकी है । जिस चित्यभूपिण्ड पर अस्मदादि प्राणी प्रतिष्ठित हैं, उस चित्यभूपिण्ड के आधार पर सूर्य्यदिक् की ओर वितत चितिनिधेय पार्थिव गायत्राग्नि प्रारण मण्डल ही इस त्रिलोकी की प्रधान प्रतिष्ठा है । जिस प्रकार पूर्वकथनानुसार सौरप्राणतत्त्व सौरत्रिलोकी ( रोदसी ) में व्याप्त होता हुआ पितृभेद से प्राणपञ्चकरूप में परिणत हो रहा है, एवमेव यह पार्थिवप्राण भी पार्थिव त्रिलोकी सूर्याः प्राणः ( प्राणः ) > पृथिवी समान : एकविंत्रास्तोमः पार्थि व प्राणं पंचदशास्तोमः म ण्ड त्रिवृत्स्तोमः ल ( अपान:). म् उड़ान : अपानः गौआग्नेयः सौ वायव्यः म्य त्रि दिव्यः कीं लो अन्तरिक्षम् ( व्यानः ) भूः [ ६७ ]

पृष्ठ 106

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड श्रात्मग्रतिनिमित्तानि ( स्तोम्या ) में व्याप्त होता स्तोमभेद से प्राणपञ्चकरूप में परिणत हो रहा | स्तोम्यत्रिलोकी का स्वरूप आगे विस्तार से बतलाया जाने वाला है । यहाँ इस सम्बन्ध में अभी यही ज्ञातव्य है कि त्रिवृत् ( 2 ) -पञ्चदश- ( १५ ) - एकविंश ( २१ ) पार्थिव स्तोम ही इस त्रैलोक्य के क्रमशः पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यलोक हैं । इनमें प्रतिष्ठित प्रपान - व्यान प्रारण ही प्राणत्रयी है । इनमें अवारपारीण अपान - प्राण ही उक्त गायत्री के एति - प्रेति भावों से प्रारणोदान, समान - प्रपान भेद से चार भावों में परिणत हो रहे हैं । जैसा कि उक्त परिलेख से स्पष्ट है— रोदसीत्रलोकी से जो सौर प्रारणपञ्चक ' पञ्चधाऽऽत्मानं विभ्रज्य ' - ' यस्मिन् प्रारणः पञ्चधा संविवेश ' न्याय से अध्यात्म संस्था में प्रविष्ट हुआ, उसकी स्थिति का क्रमशः हृदय, गुदा, नाभि, कण्ठ, सर्वाङ्गशरीर इन पाँच पर्वों से सम्बन्ध है । ' हृदिह्ययमात्मा ' इत्यादि श्रुति के अनुसार यह प्राण नामक सौर प्रारण ' स वा एष विज्ञानात्मा विज्ञानात्मना सम्परिष्वक्तः ' के अनुसार हृदयावच्छिन्न सायतन अन्तरिक्षरूप चान्द्रमन ( तदुपलक्षित हृदयस्थान में ) श्रात्मरूप से प्रतिष्ठित है । उदान कण्ठदेशस्था तेजोनाड़ी में प्रतिष्ठित है । समान ' नाभि ' केन्द्र में प्रतिष्ठित है, एवं अपान मूलग्रन्थि का आधार बना हुआ है । इस दृष्टि से पाँचों सौर सत्यप्राण अध्यात्म में प्रतिष्ठित हो रहे हैं । स्व - स्व स्थान में प्रतिष्ठित इन पाँचों सौर- सत्यप्राणों के दो - दो कर्म्म हैं, पञ्चभूत नाड़ियों को पुष्ट रखना, दूसरे शब्दों में तत्तद्भूतरसोपजनिता तत्तद्भूतमयी - तत्तन्नाडियों की तत्तद्भूतमात्राओं को स्वस्वरूप से सुरक्षित रखना प्रथम कर्म है । हृत्प्रदेशावच्छिन्न प्राण पार्थिवनाडियों की मूलद्वारावच्छिन्न प्रपान जलीय नाडियों की, कण्ठदेशावच्छिन्न उदान तेजोनाडियों की नाभिप्रदेशावच्छिन्न समान वायवीयनाडियों की, तथा सर्वशरीरग व्यान व्योमनाडियों की स्वरूप रक्षा कर रहा है । अध्यात्म संस्था में ' चक्षु, प्राण, श्रोत्र, रसना, त्वक् ' ये पाँच ज्ञानेद्रियाँ हैं, एवं ' वाक्, पारिण, पाद, पायु, उपस्थ ' ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं । इन दसों इन्द्रियों के प्रभव - प्रतिष्ठा - परायण स्थान भी ( शरीरवत् ) पाँचभूत ही हैं । पञ्चभूतात्मक इस दशेन्द्रियवर्ग की रक्षा भी इसी प्राणपञ्चक से हो रही है, एवं यही इसका दूसरा कर्म है । सौर प्रारणात्मकविवर्त्त परिलेख: -( १ ) हृदि - प्राणात्मक: ' प्राण: ' + प्रतिष्ठितः पार्थिवनाडयनुगतस्तत् स्वरूपरक्षकश्च । ( २ ) कण्ठे – उदानात्मकः ' प्राणः ' + प्रतिष्ठितः + तेजोनाडयनुगतस्तत् स्वरूपरक्षकश्च । ( ३ ) शरीरे — व्यानात्मकः ' प्राणः ' + प्रतिष्ठितः व्योमनाडयनुगतस्तत् स्वरूपरक्षकश्च । ( ४ ) नाभी - समानात्मकः प्राणः ' + प्रतिष्ठितः ( ५ ) गुदि - अपानात्मकः प्राणः ' + प्रतिष्ठितः [ 85 ] वायव्यनाड्यनुगतस्तत् स्वरूपरक्षकश्च । जलीयनाडयनुगतस्तत् स्वरूपरक्षकश्च ।

पृष्ठ 107

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड आत्मशतिनिमित्तानि * १ | १ - वासा ( १ ) ज्ञानेन्द्रिय ( १ ) + पार्थिवेन्द्रिय ] पृथिवी ( प्राणमण्डलम् ) * १ – जिह्वा ( २ ) → ज्ञानेन्द्रिय ( २ ) जलीयेन्द्रिय ) २ + जलम् ( अपानमण्डलम् ) २ – शिश्न ( ३ ) + कर्मेन्द्रिय ( ५ ) जलीयेन्द्रिय * १ - प्राणि ( ४ ) + कर्मेन्द्रिय ( ४ ) वायव्येन्द्रिय ३ | २ – नाभि ( ५ ) कर्मेन्द्रिय ( ३ ) वायव्येन्द्रिय वायुः ( समानमण्डलम् ) ३ त्वक् ( ६ ) ज्ञानेन्द्रिय ( ३ ) वायव्येन्द्रिय ४ * १ - श्रोत्र ( ७ ) + ज्ञानेन्द्रिय ( ४ ) + व्योमेन्द्रिय २ -- वाक् ( ८ ) + कर्मेन्द्रिय ( २ ) + व्योमेन्द्रिय + श्राकाशः ( व्यानमण्डलम् ) • * १ - चक्षु ( ६ ) + ज्ञानेन्द्रिय ( ५ ) तेजसेन्द्रिय ५ → तेजः ( उदानमण्डलम् ) ( २ - पाद ( १० ) + कर्मेन्द्रिय ( १ ) + तैजसेन्द्रिय $ अब क्रमप्राप्त पार्थिव प्राणपञ्चक की ओर दृष्टि डालिए । पार्थिव प्रारण व्यान अप्रान तीनों स्तोम्यप्राण क्रमशः स्नायु, शिरा, धमनी, नाडियों में प्रतिष्ठित हैं । स्नायुनाडियों में प्रतिष्ठित चेतता धातु प्राण की, शिरानाडियों में प्रतिष्ठित रस धातु प्रपान की एवं धमनी नाड़ियों में प्रतिष्ठित प्राणधातु व्यान की प्रतिष्ठा है । हृदय से नीचे - नीचे प्रपान का ऊपर - ऊपर प्रारण का, मध्य में व्यान का साम्राज्य है । श्वासरूप से शरीर में आता हुआ चेतनाधातु से युक्त होता हुआ प्राण प्राण है, निकलता हुआ वही प्राण उदान है । इस प्रकार श्वास - निश्वासरूप से यही प्राणोदानरूप में परिणित हो रहा है । प्रतिष्ठाप शरीर में आता हुआ रसानुग्रहक वही अपान समान है, एवं मूलद्वार से बहिविनिःसृत् वही पा 1 समान पान है । इन दोनों का नियामक मध्यस्थ प्राण ही व्यान है । सौरप्राणपञ्चक भी सत्य है, पार्थिवप्राणपञ्चक भी सत्य है । दोनों में अन्तर केवल यही है कि, सौरसत्य प्रारण जहाँ स्थिरधम्र्म्मा हैं, वहाँ पार्थिव सत्यप्राण पञ्चक ( व्यान को छोड़कर ) गतिधर्म्मा है । गतिधर्मावच्छिन्न यही प्राणपञ्चक नाड़ी भेद से सार्द्धत्रिकोटि संख्यामित बन रहा है, जैसा कि पूर्व में स्पष्ट किया जा चुका है । प्रासङ्गिकवक्तव्यानन्तर पुनः उस धमन्यनुगत व्यान प्रारण की ओर आपका ध्यान आकर्षित किया जाता है । कहा गया है कि, पृथिव्यादि-पञ्चभूतों के सम्बन्ध से १४४०० संख्यानुसार पाँचों भूतों की पञ्चधाविभक्त व्यान नाड़ियाँ ७२००० ( बहत्तर हजार ) हो जाती हैं । शेष प्रारण - उदान - प्रपान नाडियाँ भी इन्हीं पञ्चधाविभक्त पाँच भूतों के सम्बन्ध से प्रत्येक द्वासप्ततिसहस्रसंख्यामित बन जाती हैं । यदि इन पाँचों का संकलन किया जाता है, तो केवल [ εε ]

पृष्ठ 108

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि - पार्थिव प्राणपञ्चक से सम्बन्ध रखने वाली नाड़ियाँ ३६००००० ( छत्तीस लाख ) हो जाती हैं इनमें से प्रकृत आत्मगति प्रकरण में जीवनसत्तौपयिका धमन्यनुगता द्वासप्ततिसहस्रसंख्यामिता व्याननाड़ियाँ ही प्रधान लक्ष्य भूमि है । पृथिव्यादिपञ्चभूतानुगत पञ्चधाविभक्त इन व्यान नाड़ियों में ४ सन्धियाँ हैं । उक्त कथनानुसार पञ्चधा विभक्त व्यान सत्य प्रारण है, एवं इन ४ सन्धियों में प्रतिष्ठित ऋतवाकात्मिक चतुर्विध - आगन्तुक -प्रारण ऋतुप्राण है । चार ऋतप्रारण व्यष्ट्यात्मक हैं, एक ऋतप्रारण चारों का आधार बनता हुआ सर्वाधार लक्षण समष्टि प्राण है । इस प्रकार सत्यव्यान प्रारणवत् यह श्रागन्तुक, किन्तु सत्यप्राणपञ्चक प्रतिष्ठारूप ऋतप्राण भी पञ्चसंख्यामित ही बन जाता है । मूलद्वार से नाभिपर्य्यन्त एक प्रदेश है । इस अन्तरिक्ष में प्रतिष्ठित प्रागन्तुक ऋतवायव्य प्राण ' कूर्म्म ' नाम से प्रसिद्ध है । सुप्रसिद्ध तान्त्रिक ' कूर्म्मचन्द्र ' का इसी से सम्बन्ध है । नाभि से हृदय पर्य्यन्त एक प्रादेश है । इस अन्तरिक्ष में व्याप्त ॠतप्राण ' नाग ' नाम से प्रसिद्ध है । हृदय से कण्ठपर्य्यन्त एक प्रादेश है । इस प्रान्तरिक्ष में व्याप्त ॠतप्राण ' कृकल ' नाम से प्रसिद्ध है । कण्ठ से ब्रह्मरन्ध्र पर्य्यन्त एक प्रादेश है । इस प्रान्तरिक्ष में व्याप्त ॠतप्राण ' देवदत्त ' नाम से प्रसिद्ध है । ये चारों ऋतप्राण सत्यप्राणपञ्चक से वेष्टित हैं । उपक्रम में नान्दनस्थानीय प्राण नामक सत्य प्राण है, उपसंहार में मूलद्वार स्थानीय अपान नामक सत्यप्रारण है, मध्य में उक्त चारों ऋतप्राण प्रतिष्ठित हैं । इन चारों ऋतप्राणों को उपक्रमोपसंहार भाव से अपने गर्भ में रखने वाला ऋतप्राणपञ्चक यद्यपि ' ऋतं ' सत्येऽधायि ' को चरितार्थ कर रहा है, तथापि इन पांचों साक्ष्यप्राणों को अपने गर्भ में प्रतिष्ठित रखने वाले अवारपारण पांचवें ' धनञ्जय ' नामक समष्टिलक्षण ऋतप्रारण ने ' सत्यं ऋतेऽधायि ' इस सिद्धान्तपक्ष को ही सुरक्षित कर रक्खा है । ' ऋते भूमिरियं श्रिता ' ' ऋतं नान्येति किञ्चन ' ही सिद्धान्त पक्ष है । पञ्चप्राण से शरीर प्रतिष्ठित है, अतएवं यह अध्यात्म सम्पत्ति ( धन ) है । परन्तु इन धनात्मक पांचों सत्यप्रारणों पर, तथा तद्गर्भित ऋतात्मक प्रतएव ऋणात्मक इस समष्टयात्मक ऋतप्राण का प्रभुत्व है, अतएव इसे धनञ्जय कहना अन्वर्थ बनता है । ऋतात्मक नागप्राण उद्गारकर्म की प्रतिष्ठा है, नेत्रनिमेषोन्मेषव्यापार ऋतात्मक कूर्म्म पर प्रतिष्ठित है, क्षुत् - पिपासा का श्राश्रय कृकल है, जृम्भा ( जंभाई ) की प्रवृत्ति देवदत्त से होती है, एवं शोथ प्रवृत्ति धनञ्जय से होती है । इन पाँच ऋतप्राणों के अतिरिक्त — इडा - पिङ्गलादि १० नाड़ियाँ और हैं । किन्हीं के मतानुसार ये अवान्तर नाड़ी विवर्त्त १४ संख्यात्रों में विभक्त हैं । इन प्रवान्तर चतुर्दश नाड़ियों का द्विसप्ततिसहस्र व्याननाड़ियों में अन्तर्भाव है । निम्नलिखित परिलेखों से उक्त व्यान नाड़ी विव का, इतर नाड़ी विवर्त्तो का भलीभाँति स्पष्टीकरण हो जाता है— [ १०० ],

पृष्ठ 109

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड गतिधर्माणः पञ्च पार्थिवप्रारणा: - ( सत्याः ) - गृह्याः १ - प्राणः नान्दनमारभ्य हृदयपर्यन्तं व्याप्तः ( प्रेतिभावापन्नः ) — उदानः हृदयमारभ्यनान्दनपर्य्यन्तंव्याप्तः ( एतिभावापन्नः ) २ [ ३ – व्यानः – हृदये प्रतिष्ठितः- + सन्धाता ३२ t ( ४ – समानः + मूलद्वारमारभ्य हृदयपर्यन्तंव्याप्तः ( एतिभावापन्नः ) ५ - श्रपानः + हृदयमारभ्य मूलद्वारपर्यन्तं व्याप्तः ( प्रेतिभावापन्नः ) गतिधर्मारणः - पञ्चवायव्य प्रारणाः ऋताः - श्रागन्तुकाः-( १ ) नाग: - हृदयान्नाभ्यन्ते वितस्तिमात्रावकाशे व्याप्तः ( २ ) कूर्म्म: - नाभेर्मूलान्ते जलगृहमात्रावकाशे व्याप्तः ( ३ ) कृकलः - हृदयात्कण्ठान्ते तेजोगृहमात्रावकाशे व्याप्तः ( ४ ) देवदत्तः - नाभेः पार्श्ववाममात्रावकाशे व्याप्तः ( ५ ) धनञ्जयः - नाभेः पाश्वे दक्षिणमात्रावकाशे व्याप्तः गतिधर्माण: - पञ्च पार्थिवप्रारणाः - सत्याः - I १२( प्राणः नान्दनात् - सूर्य्य केन्द्रान्तमभिव्याप्तः - उदान - हृदयात् - नान्दनान्तमभिव्याप्तः १ [ व्यान + नान्दनात् - गुदान्तमभिव्याप्तः ३ समान: + + गुदस्यानात् दयान्तमभिव्याप्तः प्रपानः गुदस्थानात् - भूकेन्द्रान्तमभिव्याप्तः आमगतिनिमित्तानि • स्वायुनाड़ीषुव्याप्तः ' प्राणः ’ ] - धमनी नाडीषुव्याप्तो व्यानः • शिरा नाड़ीषुव्याप्तोऽपानः : - गृह्या: ( प्रकारान्तरेण ) > देवप्रागमननिर्गमन प्रवर्त्तकः प्राणः 1- → सन्धान्ता - उभयोः - व्यानः } [ १०१ ] →* भूतागमननिर्गमन प्रवर्त्तकोऽपानः

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड ॠ सत्यम् ( १ अ सूर्य प्रवेशयति विष्णु नान्दनद्वा: [ प्राणः ] ७२००० आत्मगतिनिमित्तानि www . + सत्यम् १ " प्राणः अन्तरिक्षम् [ देवदत्तः ] -→ ऋतम् ( १ ) * ऋतम् सत्यम ( २ ) - त १ श्रपानः ) ( E पृथिवी २ व्यानः १ ) ( अन्तरिक्षम् ) २१ ( द्यौः १ प्राणः सूर्य्यं निर्गमयति इन्द्रः कण्ठः [ उदानः ] ७२००० अन्तरिक्षम् [ कृकलः ] -देहे रसान् संनिवेशयति [ हृदयं [ व्यानः ] [ अन्तरिक्षम् [ नागः ]. ७२००० पृथिवीं प्रवेशयति विष्णुः _नाभि: [ समान: ] ७२००० अन्तरिक्षम् कुर्म्मः ] -पृथिवीं निर्गमयति इन्द्रः मूलद्वारम् [ अपान: ] ७२००० + सत्यम् २ " उदानः ' ऋतम् ( २ ) * → सत्यम् ३ व्यानः + ऋतम् ( ३ ) * * सत्यन् ४ समान: → ऋत्म् ( ४ ) * → सत्यम् ५ प्रपानः ऋतम् -स न सत्यम् त ( ३)-अ सत्यम् ( ४ धा ). यः - यि सत्यम् ) -x ( [ १०२ ]