श्रीगणेशाय नमः।

Part IV Atmgativigyanopanishta Part 4 — पृष्ठ 91–100

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४ · पृष्ठ 91–100

पृष्ठ 91

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड श्रात्मगतिनिमित्तानि १ - यज्ञः ( स्वार्थ: ) २ - तपः ( परार्थः ) ३ - दानम् ( परमार्थ ): १. – इष्टम् ( स्वार्थः ) २ - प्रातः ( परमार्थः ) ३– दत्तः ( परार्थः ) → सूर्य्यः उत्तमाधिकारिणाम् O--→ परमार्थ कर्माणि ( देवप्राणमयानि ) • + विद्यासापेक्षं कर्म - सौरम् परमपुरुषार्थः ( १ ) O → परार्थकर्माणि ( पितृप्राणमयानि ) चन्द्रमाः मध्यमाधिकारिणाम् - विद्यानिरपेक्षंकर्म - चान्द्रम् - पुरुष: ( २ ) * लौकिकानि कर्माणि} ( इन्द्रियार्थः ) + भूपिण्ड: सामान्याधिकारिणाम् → स्वार्थ कर्माणि } ( वैश्वानरप्राणमयानि ) → श्रविद्यासह कृतं कर्म - पार्थिवम् + स्वार्थः ( ३ ), [ ८४ ]

पृष्ठ 92

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड I श्रात्मगतिनिमित्तानि wwwww उस ओर सूर्य्यं है, इस ओर भूपिण्ड है, मध्य में ( सृष्टिदृष्टि की अपेक्षा से ) चन्द्रमा है । थोड़ी देर के लिए मध्यस्थ चन्द्रमा को छोड़कर अवार - पारस्थित भूपिण्ड तथा सूर्य्य की ओर ध्यान आकर्षित कीजिए । स्वम्भू -- परमेष्ठी - सूर्य्य - चन्द्रमा - भूपिण्ड इन पाँच पर्वों की समष्टिरूप विश्व के केन्द्र में सूर्यं प्रतिष्ठित है । सूर्य के उस ओर परमेष्ठी, स्वयम्भू हैं, एवं सूर्य के इस ओर चन्द्रमा - भूपिण्ड है । विश्व-व्यापक विश्वकर्मा सर्वहुतयज्ञात्मक प्रभूप्रजापति का स्वयम्भू - परमेष्ठीयुग्म परमधाम है, चन्द्रमा - भूपिण्ड-युग्म मध्यमधाम है, एवं मध्यस्थ सूर्य्य मध्यमधाम है । मध्यमधामात्मक सूर्य्य वास्तव में विश्व का केन्द्र बन रहा है, जैसा कि - ' बृहद्धतस्थौ भुवनेस्वन्तः ' - ' बिभ्राबृहत् पिबतु सौम्यम् ' - ' श्रादित्यो वै विश्वस्य हृदयम् ' - ' नवोदेतानास्तमेता मध्ये एकल एवस्थाता ' इत्यादि वचनों से प्रमाणित है । सूर्य्य से ऊपर अमृततत्त्व का साम्राज्य है, दूसरे शब्दों में सूर्य्य से ऊपर ग्राभूप्रजापति की ब्रह्मकला ( ज्ञानकला ) का प्राधान्य है । सूर्य्य से नीचे मृत्युतत्त्व का साम्राज्य है, दूसरे शब्दों में सूर्य्य से नीचे प्रभूप्रजापति की ककला का प्राधान्य है । मध्यस्थ सूर्य्य में अमृत - मृत्युलक्षण ज्ञान - कर्म, दोनों कलाओं का समन्वय है । जैसा कि - ' तस्माद्यत् किञ्चार्वाचीनमादित्यात्, सर्वं तन्मृत्युनाऽऽप्तम् ' - ' निवेशायन्नमृतं मत्यं च ' इत्यादि मन्त्र - ब्राह्मण श्रुतियों से प्रमाणित है । सूर्य का वह ऊर्ध्वभाग, जो शुद्ध चिदंश से युक्त है, अमृत नाम से प्रसिद्ध है, एवं सूर्य का वह अधोभाग, जो विशुद्ध कर्मातिशय से युक्त रहता है, मृत्यु नाम से प्रसिद्ध है । यद्यपि सूर्य्यं के मृत्युलक्षण अधोभाग से अनुग्रहित सूर्य से नीचे अवस्थित चन्द्रमा तथा पृथिवी, दोनों में प्रधानता मृत्युलक्षण कर्म्म की ही मानी गई है, तथापि गौणरूप से सूर्य्यं के ऊर्ध्वभागस्थित अमृतलक्षण चिदंश का भी इनमें अवश्य ही भोग होता है । क्योंकि उभयात्मक सूर्य्यं का ही उपग्रह भूपिण्ड है, अतएव सूर्य्यवत् भूपिण्ड का भी उभयधर्म्मावच्छिन्नत्वसिद्ध हो जाता है । उभयधर्मात्मक भूपिण्ड का ही उपग्रह प्रत्रिप्राणसहकार से उत्पन्न चन्द्रमा है, अतएव भूपिण्डवत् चन्द्रमा का भी उभयधर्म्मावच्छिन्नत्व सिद्ध हो जाता है । सूर्य्य, चन्द्रमा, पृथिवी तीनों क्रमशः वाक्प्रजापति, अन्नप्रजापति, अन्नादप्रजापति ( इन्द्रप्रजापति, सोमप्रजापति, अग्निप्रजा-पति ) हैं । तीनों चूंकि अमृतमृत्युमय हैं । अतएव प्रजापति के स्वरूप के सम्बन्ध में ' अर्द्ध ह वै प्रजापते-रात्मनो मर्त्यमासीदर्द्धममृतम् ' यह व्यवस्था हुई है । तीनों संस्थानों में भुक्त चिदंशलक्षण अमृतकला तथा मृत्युलक्षण कर्मकला के भेद से तीनों से सम्बन्ध रखने वाले दिव्य - पितृ- पार्थिव कर्मों के प्रत्येक के दो - दो विभाग हो जाते हैं । अमृतलक्षण चित्कला से अनुगृहीत वही कर्म निवृत्तिप्रधान है, एवं मृत्युलक्षण कर्म्मकला से अनुगृहीत वही कर्म्म प्रवृत्ति प्रधान है । कर्म पाप्मा है, प्रासक्तिधर्म्मावच्छिन्न बनता हुआ संस्कार लेपबन्धन का कारण है । ' न कर्म्मणा न प्रजया धनेन ० ' के अनुसार प्रवृत्तिप्रधान यज्ञादि दिव्य-कर्म्म अशाश्वत स्वर्गादि सुखों के कारण बनते हुए भी निवृतिप्रधान संस्कार लेपत्यागलक्षण निष्काम-यज्ञादि दिव्यक द्वारा सिद्ध ब्रह्मनिर्माण के कारण नहीं बन सकते । यदि इन्हीं प्रवृत्ति कम्मों से मृत्यु-लक्षण कर्म्मकला के साथ उस अमृतलक्षणा चित्कला को आधार बनाते हुए इन्हीं कम्र्मों को निवृत्तिप्रधान बना दिया जाता है, तो ये ही दिव्यादि कर्म्म प्रसङ्ग - प्रकर्म्मलक्षण चिदंशानुग्रह से प्रकर्म्म बनते हुए बन्धनविमोक के कारण बन जाते हैं । यही बुद्धियोगलक्षण कर्म्मयोग का मौलिक रहस्य है । विशुद्ध अकर्म्म ( ज्ञान ) निरर्थक, विशुद्ध कर्म्म पाप्मा का उत्पादक, दोनों का समन्वयलक्षण बुद्धियोग ही एक-मात्र उपादेय । इसी कम्र्मोपनिषत् का विश्लेषण करते हुए भगवान ने कहा है-* स्थितिदृष्टि की अपेक्षा से चन्द्रमा भूपिण्ड के अन्त में माना गया है । चन्द्रपर्व पर पञ्चपर्वात्मक विश्व का अवसान है । अतएव चान्द्रमास ' निधन ' नाम से व्यवहृत हुआ है । [ ६५ ]

पृष्ठ 93

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड " कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्म्मरिण च कर्म्म यः । श्रात्मगति निमित्तानि स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥ ( गीता ४।१८ ) । यही अवस्था चान्द्रपितृ कर्म की समझिए । सूर्य्यानुगत अर्द्ध ज्योतिर्मय चान्द्र पितृप्राण चित्प्रधान है, तदनुगत पितृकर्म निवृत्तिप्रधान बनता हुआ बन्धनविमोक का कारण है । सूर्य्यविरुद्ध दिक्स्थ अर्द्ध तमोम चान्द्रभाग वृत्रप्रधान बनता हुआ आवरककर्म्म प्रधान है । तदनुगत वृत्रात्मक पितृक प्रवृत्ति का कारण है । इस प्रकार चान्द्र स्थिति भेद से अमृत - मृत्युलक्षरण इस अन्नप्रजापति से अनुग्रहित पितृक के भी दिव्यकर्म्मवत् दो ही विवर्त्त हो जाते हैं । यही अवस्था पार्थिवकर्म की है । भूपिण्ड का आधाभाग सूर्य्य की ओर रहता है, श्राधा भाग ' विरुद्ध में रहता है । सूर्य्यविदिक् में प्रतिष्ठित, अतएव तमोमय आधा भाग प्रकाशविच्छेद से ' दिति कहलाया है, एवं सूर्य्यदिक् में प्रतिष्ठित, अतएव ज्योतिर्मय आधा भाग प्रकाशाविच्छेद से ', श्रदिति दिति ' कहलाया है | अदिति भाग में त्रयस्त्रिशद्दे वतात्मक दिव्य ' होता ' नामक अग्नितत्त्व प्रतिष्ठित होता है अग्नि भाग में नवतीर्नव ( ६६ ) सुरभावात्मक श्रासुर ' सहरक्षा ' नामक अग्नितत्त्व प्रतिष्ठित है । से युक्त पार्थिव अदिति प्रारण अमृत प्रधान है, तद्रूप लौकिक कर्म्म निवृत्ति प्रधान बनता हुआ प्रबन्धन है, एवं सहरक्षा नामक अग्नि से युक्त पार्थिव दितिप्राण मृत्युप्रारण है, तद्रूप लौकिक कर्म्म प्रवृत्तिप्रधान बनता हुआ सबन्धन है । अबन्धन पार्थिव लौकिककर्म्म भी अवश्यमेव उस दशा में ग्राह्य बन जाते हैं, जब कि इनका लोकयात्रा निर्वाहमात्र के लिए प्रासक्तिपूर्वक अनुगमन किया जाता है । अर्थसञ्चयानुगत पार्थिव लौकिककर्मों से यदि न्यायपूर्वक शरीरयात्रा का निर्वाह होता है, साथ ही ऐसे पार्थिवकर्म से सञ्चित अर्थ का परार्थ - परमार्थ में उपयोग होता है, तो ऐसे पार्थिव लौकिककर्म्म भी अमृतप्रधान बनते हुए बन्धन-विमोक के कारण बन जाते हैं । वे पार्थिव लौकिककर्म्म, जिनमें दित्यवच्छिन्न सहरक्षा नामक असुरंप्राण का प्राधान्य है, जिनका कि पूर्व में विशुद्ध स्वार्थलिप्सा से सम्बन्ध बतलाया गया है, सर्वथा सबन्धन है । इन सबन्धन पार्थिव - दिति - कम्मों के दो विवर्त्त हो जाते हैं । दितिमण्डल में कुछ दूर तक सौरज्योति का अनुशय व्याप्त रहता है । तदवच्छिन्न दिति भाग छायामय बनता हुआ सामान्यरूप से तमः प्रवृत्ति का कारण बनता है । इसके समावेश से पार्थिवकर्म्म अकर्म्मरूप से परिणत हो जाते हैं । कम्मलक्ष्यलक्षण अकर्मण्यता भी अकर्म है, एवं जिन कर्मों का न तो शास्त्र में विधान ही हुआ, न निषेध ही हुआ है, निरर्थक कर्म्म भी कम ही कहलाए हैं । आगे जाकर दितिमण्डल सौर प्रतिच्छाया से भी वञ्चित होता हुआ घनतमोरूप में परिरगत हो जाता है । इसके समावेश में पार्थिव कर्म्म विकर्म्मरूप में परिणत हो जाते । शास्त्रविरुद्ध विशुद्धस्वार्थमूलक यच्चयावत् लौकिककर्म्म तथा ब्रह्महत्या, सुरापान, भ्रूणहत्या, अगम्यागन, अभक्ष्याभक्षरण श्रादि महापातक लक्षण पापकर्म्म ही ' विकर्म्म ' नामक दिति कर्म्म है । पहले कर्मात्मक दितिकर्म का उदय होता है । अनन्तर यही अकर्म्म कालान्तर में विकम्र्मात्मक दितिक प्रवृत्ति का कारण बन जाता है । इस प्रकार प्रदितिमूलक उपादेय पार्थिव लौकिक अबन्धनकर्म्म, अदिति प्रतिच्छायानुगत- पार्थिव लौकिक - बन्धन प्रवर्तक कर्मात्मक दितिकर्म तथा विशुद्ध दितिभावात्मक-निबिडबन्धन प्रवर्त्तक विकम्मत्मिक दितिक भेद से पार्थिवकर्म के तीन विवर्त हो जाते हैं । तीनों में प्रथम निवृत्ति प्रधान है, २ - ३ प्रवृत्तिप्रधान है । इस प्रकार अमृत मृत्यु तारतम्य से तीनों कर्मों में दो - दो भावों का समावेश हो रहा है, जैसा कि परिलेखों से स्पष्ट है-[ ८६ ]

पृष्ठ 94

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U श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि ? ( १ ) २. तमः १- यज्ञः विद्यासापेक्षानि - निवृत कर्माणि - अबधनानि ३. दानम् : अमृतय * सूर्य: दिव्यकर्माणि ( १ ) मृत्यु १- यज्ञः २. २ ( ) २- तफ ३- दानम् विद्यासापेक्षानि प्रवृत कर्माणि - सम्बंधनानि १- इष्टम् १ ( ३ ) २ - आपूर्तः विद्यानिरपेक्षानि निवृतसत्कर्माणि अबधनानि । ३. दत्तः अमृतम् * → चन्द्रमाः पितृकर्माणि ( २ ) मृत्युः सूत्र: १- इष्टम् २४ २ - आपूर्तः विद्यानिरपेक्षामि - प्रवृत्तसत्‌कर्माणि - सबधनानि ३- दत्तः लौकिकानि- निवृत्तसत्कर्माणि - अवधनानि अमृतम मृत्युः दितिः → पृथिवी पार्थिवकर्माणि ( ३ ) ३ 2 ( 2 ) विकर्म अकमम लौकिकानि साधन परमार्थ श्रीकिकानि निरर्थकानि लौकिकानि २६ विरुद्धानि लौकिकानि स्वार्थ साधक लौकिकानि - प्रवृत्तहीन कर्माणि सबधनानि [ ६७ ]

पृष्ठ 95

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि ww भगवान विज्ञानसिद्ध उक्त षट्कर्म्म को कर्म्म, कर्म, विकर्म्म भेद से तीन भागों में विभक्त किया है । विद्यासमुच्चितनिवृतिसत्कर्म्म, विद्यासमुच्चितप्रवृत्तिकर्म्म, विद्यानिरपेक्ष निवृत्तिकर्म्म, विद्यानिरपेक्ष-G प्रवृत्तिकर्म्म, लौकिक निवृत्तिसत्कर्म्म इन पाँच कम्मों की समष्टि तो सत्कर्म्मलक्षण ' कर्म ' है, एवं लौकिक-प्रवृति - हीन कर्मों से लौकिक निरर्थककर्म ' कर्म ' हैं, तथा लौकिक शास्त्रविरुद्ध कर्म्म तथा लौकिक स्वार्थसाधक कर्म्म ' विकर्म ' हैं । सत्कर्म लक्षण कर्म्मपञ्चक ' सुकर्म्म ' है, निरर्थककर्म्मलक्षरंग अक ' मन्दकर्म्म ' हैं, एवं शास्त्रविरुद्ध तथा स्वार्थलक्षण विकर्म ' दुष्कर्म्म ' हैं । इस प्रकार प्रधानतः तीन भागों में विभक्त यह कर्म्मतन्त्र स्वप्रतिष्ठालक्षरण बलतत्त्व के प्रानन्त्य से आगे जाकर अनेक शाखाओं में परिणित होता हुआ अतिशय रूप से जटिल बन रहा है । इसी कर्म्मविवर्त्त का दिग्दर्शन कराते हुए भगवान ने कहा है-१२ २ ९ कर्म्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः । कर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥ ( गी ० ४।१७ ) -( १. १ - विद्यासमुच्चितनिवृत्तकर्माणि + प्रबन्धन सत्कर्माणि - अमृतानि २.२ - विद्यासमुच्चितप्रवृत्तानिकर्माणि— - + सबन्धन सत्कर्माणि मर्त्यान ( १. ३ - विद्यानिरपेक्षनिवृत्तानि सत्कर्माणि श्रबन्धन शुभकर्माणि अमृतानि ( कर्म्म ( सुकर्म्म ) → १२. ४ विद्यानिरपेक्षप्रवृत्तानि सत्कर्म्माणि + सबन्धनशुभकर्माणि - मर्त्यानि २२ f ( १. ५ - लौकिकानि निवृत्तानि सत्कर्माणि श्रबन्धन श्रेष्ठ कर्माणि अमृतानि १ - लौकिकानि निरर्थककर्मारिण- + सबन्धनहीन कर्माणि - मर्त्यानि २. २१ – लौकिकानि विरुद्धकर्माणि दृढबन्धननीच कर्माणि - मर्त्यानि -] कर्म्म ( मन्दकर्म्म ) १- लौकिकानि स्वार्थकम्पसि - निवितवन्धनदेयकम्मति - मत्यति } → * विक ( दुष्कर्म्म ) प्रवृत्ति - बुद्धि से कर्म्मजनित संस्कारकासक्ति का उदय हो जाता है । इसी प्रासक्ति से प्रज्ञानमन के द्वारा प्रत्यगात्मा के प्राज्ञभाग के साथ वासनासंस्कार का ग्रन्थिबन्धन सम्बन्ध हो जाता है । यही प्रवृत्ति-मूलक वासनासंस्कारबन्धन प्रत्यगात्मा की तत्तल्लोकगतियों का निमित्त बनता है । विद्यासमुच्चित प्रवृत्तिकर्मानुगाती का प्रत्यगात्मा यज्ञादिजनित दिव्य संस्कारबन्धन से युक्त रहता है । इसी बन्धनमूत्र द्वारा यह स्थूलशरीर निधनानन्तर देवयान मार्ग द्वारा देवस्वर्ग का अधिकारी बनता है । यदि विद्यानिरपेक्षत्रवृत्ति-8. संस्कारबन्धन का कारण नहीं है, अपितु संस्कारबन्धन बन्धन का कारण है, जैसा कि गीता-भाष्य में विस्तार से प्रतिपादित है । [ ८८ ]

पृष्ठ 96

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगति निमित्तानि कर्म्म का प्राधान्य है, तो उस दशा में पितृप्राण प्रबल रहता है । इस कर्म्मजनित पितृसंस्कार बन्धन से यह आत्मा पितृयाणमार्ग द्वारा पितृस्वर्ग का अधिकारी बनता है । निवृत्ति- बुद्धि से कर्म्मजनितसंस्कार का प्राज्ञभाग के साथ ग्रन्थिबन्धन नहीं होनें पाता । फलतः विद्यासापेक्ष निवृत्तिकर्म्म से, विद्यानिरपेक्ष निवृत्तिकर्म से, तथा लौकिक निवृत्तिकर्म से इन तीनों कर्मों से श्रागत संस्कारबन्धन का निरोध ' जाता है, सञ्चितसंस्कारबन्धन उच्छिन्न हो जाता है । प्रारब्धसंस्कार-बन्धन भोगानन्तर यह विमुक्त प्रत्यगात्मा देवयान द्वारा ब्रह्मपथारूढ होकर विमुक्त हो जाता है । देवस्वर्ग-पितृस्वर्ग से पुनरावर्त्तन होता है, किन्तु ब्रह्मपथानुगता मुक्ति में पुनरावर्तन का अभाव है । लौकिक निरर्थक कर्म्मो से विरुद्ध कम्र्मों से तथा स्वार्थ कम्र्मों से प्राज्ञ पर असुसंस्कारबन्धन का साम्राज्य हो जाता है । ऐसा आत्मा पितृयानान्तर्गत यमपथ के द्वारा नरक का अनुगामी बनता है । इस प्रकार कर्म्म तारतम्य से हमारी अध्यात्मसंस्था में ही गतिचतुष्टयी प्रवर्त्तकिका मार्ग चतुष्टयी प्रतिष्ठित है । विद्यासमुच्चितकर्म्म देवयानः पन्थाः है, विद्यानिरपेक्षक पितृयाणः पन्थाः है । विद्या समुच्चित प्रवृत्तिकर्म्म देवयानान्तर्गत देवपथ है, विद्यासमुच्चित निवृत्तिकर्म देवयानान्तर्गत ब्रह्मपथ है । विद्यानिरपेक्ष निवृत्तिकर्म्म, लौकिकनिरपेक्षक दोनों का भी विद्यासापेक्ष निवृत्तिकर्म्मवत् देवयानान्तर्गत ब्रह्मपथ में ही अन्तर्भाव है । विद्यानिरपेक्ष प्रवृत्तिकर्म पितृयाणान्तर्गत पितृपथ है, एवं लौकिक निरर्थक - विरुद्ध - स्वार्थ-कर्म्मत्रयी पितृयाणान्तर्गत यमपथ है । लोकगति के प्रधान निमित्तभूत कर्मात्मक चारों आध्यात्मिक मार्गों का यही संक्षिप्त इतिवृत्त है । प्राज्ञभाग में संस्कारात्मक जो पथ पहले से ( अध्यात्म में ) प्रतिष्ठित हो जाता है, देहत्यागान्तर उसी आधिदैविकपथ का इसे अनुसरण करना पड़ता है, यही निष्कर्ष है । कर्म्म-निमित्त मीमांसा समाप्त हुई, अथ क्रमप्राप्त नाडी- निमित्त की और पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है-१. विद्यासमुच्चितानि कर्माणि देवयानः पन्थाः २. विद्यानिरपेक्षानि कर्माणि पितृयाणः पन्थाः १. [ १ – विद्यासमुचित प्रवृत्तकर्माणि देवयानान्तर्गतो देवपथः ( देवस्वर्गसाधकः ) ( १ ) २. [ २ -- विद्यानिरपेक्षप्रवृत्तकर्माणि पितृयाणान्तर्गत: पितृपथ: ( पितृस्वर्गसाधकः ) ( २ ) - १ - विद्यासमुच्चितनिवृत्तकर्मारिण ३. २ - विद्यानिरपेक्षनिवृत्तकर्माणि • → देवयानन्तर्गतो - ब्रह्मपथ: ( मुक्तिसाधक: ) ( ३ ) ०३ - लौकिक निवृत्तकर्माणि [ 5 ]

पृष्ठ 97

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४. विज्ञान चतुर्थ खण्ड १-२ -लौकिकानिनिरर्थककर्माणि २ - लौकिकानिविरुद्धकर्माणि 1- लौकिकानि स्वार्थककर्माणि आत्मगतिनिमित्तानि + पितृयाणान्तर्गत - यमपथ: ( नरकसाधक: ) ( ४ ) --( ग ) नाड्य शरीर चेतनाधातु, शारीर प्राणवायु, शारीर रस जिन नियत मार्गों से लोम - केश - नखाग्र भागों को छोड़कर सर्वाङ्गशरीर में प्रभावित रहते हैं, वे नियत मार्ग ही ' नाड़ी ' नाम से प्रसिद्ध हैं । चेतनाधातु की बहन करने वाली नाड़ियाँ ' स्नायु ' नाम से प्रारंणवायु का वहन करने वाली नाड़ियाँ ' धमनी ' नाम से एवं शारीर रसों का वहन करने वाली नाड़ियाँ ' शिरा ' नाम से प्रसिद्ध हैं । दूसरे शब्दों में ज्ञानवाहिनी नाड़ी स्नायु है, क्रियावाहिनी नाड़ी धमनी है एवं प्रर्थवाहिनी नाड़ी शिरा है । इन तीनों नाड़ियों के प्रत्येक के असंख्य भेद हैं । जिस प्रकार किसी जलपूर्ण सरोवर के द्वारा नियत जलमार्गों ( जल प्रणालिकाओंों ) से सरोबर मैं केन्द्रित जलप्रवाह से जाता रहता है, एवमेव ज्ञान - क्रिया - अर्थमूत्ति प्रत्यगात्मा की प्रतिष्ठांभूत हृदयरूपं समुद्र से हृदय से बद्ध इन उक्त त्रिविध मार्गों से ज्ञान - क्रिया - अर्थरूप चेतना - प्राण - रसों का सर्वाङ्गशरीर में गमन होता है । इसी प्रणालिका भाव से हृदयमूल इन मार्गों को ' नाड़ी ' ( नाली ) शब्द सैं व्यवहृत किया है, जैसा कि निम्नलिखितं वचन से स्पष्ट हैं— तस्यातिमात्रगमनाद्गतिरित्यतश्च-नाड़ीव यद्वहति तेन मता तु नाड़ी । तत्तत् शारीर कर्म्मकलाप भेद से इन्हीं तीन नाड़ियों के प्रागे जाकर दन्तनाडी, वायुवहा, मूत्रविडा-स्थिरसवाहिनी, हावा हिनी, कायवाहिनी, सोमवाहिनी, अग्निवाहिनी, वातनाड़ी, पित्तनाड़ी, श्लेष्मनाड़ी, इत्यादि अनेक विवर्त हो जाते हैं । शरीर में प्रतिष्ठित शरीरी प्रत्यगात्मा का पार्थिवस्तौम्य देवतात्रों से सम्बन्ध माना गया है । भूपिण्ड के आधार पर वितत महिमापृथिवी के गर्भ में त्रिवृत् पञ्चदश - एकविंश स्तोम भेद से पृथिवी - अन्तरिक्ष्य - द्यौ ये तीन लोकभुक्त हैं, एवं इन तीन पार्थिव लोकों में ( ६- १५ - २१ स्तोमात्मक तीनों लोकों में ) क्रमश: अर्थमूर्ति पार्थिव विराडग्नि, क्रियामूर्ति आन्तरिक्ष्य हिरण्यगर्भवायु तथा ज्ञानमूर्ति दिव्य सर्वज्ञेन्द्र ये तीन प्रतिष्ठावा देवता प्रतिष्ठित हैं । इन तीनों की समष्टि ही प्राधि-दैविक देवसत्यात्मा है । यही साक्षीसुपर्ण है । इस साक्षी सुपर्ण के प्रवर्ग्य भूत शारीर प्रत्यगात्मा में भी वे ही तीनों तत्त्व क्रमशः वैश्वानराग्नि, तैजसवायु, प्राज्ञेन्द्र रूप से समन्वित है । इन तीनों की समष्टि ही आध्यात्मिक देवसत्या है, यही भोक्ता सुप । इस भोक्ता सुपर्ण ( प्रत्यगात्मा ) वैश्वानराग्नि भाग के साथ [ ६० 1

पृष्ठ 98

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि wwwww त्रिवृत्स्तोमावच्छिन्न पार्थिव ' पान ' नामक प्राण का सम्बन्ध है, तैजसवायु के साथ पञ्चदशस्तोमावच्छिन आन्तरिक्ष्य ' व्यान ' नामक प्राण का सम्बन्ध है, प्राज्ञेन्द्र के साथ एकविंशस्तोमावच्छिन्न दिव्यभावरूप ' प्राण ' नामक प्राण का सम्बन्ध है । अर्थशक्तिप्रधान पार्थिव वैश्वानराग्नि से सम्बद्ध प्रपान अर्थप्रधान हैं, क्रियाशक्तिप्रधान आन्तरिक्ष्य तेजस से सम्बद्ध व्यान क्रियाप्रधान है, एवं ज्ञानशक्तिप्रधान दिव्य प्राज्ञेन्द्र से. समतुलित प्राण ज्ञानप्रधान है । हृदयाकाशस्थद भ्राकाश में प्रतिष्ठित वैश्वानर - तेजस - प्राज्ञेन्द्रमूर्ति प्रत्यगात्मा के साथ युक्त प्रपान - व्यान - प्राण ही क्रमशः शिरा - धमनी - स्नायु नाड़ियों की मूल प्रतिष्ठा माने गए हैं । इसी आधार पर शिरा को प्रपान नाड़ी, धमनी को व्यान नाड़ी एवं स्नायु को प्रारण नाड़ी कहा जा सकता है । चूंकि इन तीनों नाड़ियों का प्रज्ञानात्मावच्छिन्न हृदयाकाश से सम्बन्ध है, अतएव तीनों को ही हृन्मूल-नाड़ी कहा जा सकता है । यद्यपि ज्ञानवाहिनी स्नायुनाम्नी प्राणनाड़ी भी जीवनसत्ता का प्राधार है, अर्थवाहिनी शिशमानि पानमाड़ी तथा क्रियावाहिनी धमनीनाम्नी व्याननाड़ी भी जीवनसत्ता की प्रतिष्ठा है, तथापि तीनों में प्राधान्य मध्यस्था व्याननाड़ी ( धमनी ) का ही माना जायगा । कारण स्पष्ट है, जब तक व्यानवायु हृदय में प्रतिष्ठित रहता है, तभी तक हृदय से ऊपर प्राणोदानरूप से गमनागमन करने वाले प्राणेन्द्र की तथा हृदय से नीचे प्रपान – समान रूप से गमनागमन करने वाले अपानाग्नि की स्वरूप सत्ता सुरक्षित रहती है । दूसरे शब्दों में जीवनोपयिक प्राणोदान तथा अपानसमान व्यापारों की प्रतिष्ठा मध्यस्थ व्यानवायु ही बन रहा है । दिव्य प्राण, पार्थिव प्रपान, दोनों मध्यस्थ - प्रादेशामित प्रान्तरीक्ष्य व्यान पर अवलम्बित है । प्राणावरोध से मूर्च्छा हो जाती है, परन्तु मृत्यु नहीं होती । एवमेव प्रपानावरोध से भी मूर्च्छा सम्भव है, मृत्यु नहीं । जब तक कि व्यान स्वस्थिति से च्युत नहीं होता, परन्तु व्यान के उत्क्रान्त हो जाने पर मृत्यु निश्चित है । अतएव इसे ही जीवनसत्ता की प्रतिष्ठा मानना न्याय है । ज्ञान - क्रिया - अर्थ तीनों का समन्वय ही जीवनधारण का कारण बनता है, एवं क्रियामूर्ति मध्यस्थ व्यान ही उस ओर के ज्ञानमूर्ति प्राण का, इस ओर के अर्थमूर्ति अपान का सम्बन्ध कराता हुआ तीनों के समन्वय का कारण बनता है । फलतः व्यानात्मिका - धमनी - नाड़ियों का, किंवा धमनी नाड़ियों में भुक्त क्रियामूर्ति व्यान का ही जीवन सत्तौ-पयिकत्व सिद्ध होता है, जैसा कि निम्नलिखित वचनों से प्रमाणित है— " न प्राणेन, नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन । इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुभाश्रितौ ॥ " ( श्रुतिः ) " अङ्ग ुष्ठस्य तु मूले या धमनी जीवसाक्षिरणी । तस्या गतिवशाद्विद्यात् सुखं दुःखञ्च देहिनाम् || " ( संग्रहः ) [ ११ ]

पृष्ठ 99

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श्रविज्ञान चतुर्थखण्ड श्रात्मगतिनिमित्तानि ८१ - प्राज्ञः - सर्वज्ञांश ः + इन्द्र: ( ज्ञानम् ) + चेतना - ( प्राणः ) स्नायवः ( ज्ञानवाहिन्यो नाड्यः ) १२ तैजसः - हिरण्यगर्भांश: वायुः + प्राणः ---( क्रिया: ) → - ( व्यान:) + धमन्यः ( वायुवाहिन्यो नाड्यः ) १३- वैश्वानरः – विराजोंऽश: श्रग्निः ( अर्थः ) ) - → रसः - ( पानः ) → शिराः ( रसवाहिन्यो नाड्यः ) स्थूल – सूक्ष्म - सूक्ष्मतर - सूक्ष्मतम अवस्थाओं के भेद से उक्त तीन नाड़ियों के ३५०००००० ( सार्द्धं-त्रिकोटिमित - साढे तीन करोड़ ) अवान्तर विवर्त्त हो जाते हैं । रोमकूपों से सम्बन्ध रखने वाले नाड़ीविवर्त्त सपादत्रिकोटिमित ( ३२५००००० तीन करोड़ पच्चीस लाख ) हैं । हस्त - मुख - पाद भागों से सम्बन्ध रखने वाले नाड़ी विवर्त्त लक्षमित ( एक लाख ) हैं । उदर तथा पायुस्थानों में भुक्त नाड़ी विवर्त्त पश्ञ्चलक्षमित ( पाँच लाख ) हैं । तीनों हृदय से प्रारम्भ कर सर्वाङ्ग शरीर में स्वतन्त्र धारा से भुक्त व्यानानुगत नाड़ी-विवर्त्त नवलक्षमित ( नौ लाख ) हैं । पार्श्व, चर्म, शारीर सन्धिपर्वों में भुक्त नाड़ीविवर्त विराल्लक्षमित ( दस लाख ) हैं । सम्भूयसार्द्धत्रिकोटिमित नाड़ीविवर्त्त हो जाते हैं, जिनके विशेष विश्लेषण का न तो प्रकृत आत्मगति से कोई सम्बन्ध ही है, एवं न उन सबका यथावत् विश्लेषण कर देना मादृशलौकिक स्थूल-दृष्टा के लिए सम्भव ही है । लोमकूपेषु सपादत्रिकोटयः → हस्तमुख पत्सु + अग्निलक्षः → ३२५००००० १००००० पावुदरयोः पश्ञ्चलक्षाः— → ५००००० + सार्द्धत्रिकोटिमिता नाड्यः दादिसर्वगात्रेषु - → नवलक्षाः + पार्श्व च सन्धिषु विराड्लक्षाः + १०००००० ३५००००००

श्रीदेव्युवाच- - " सार्द्धत्रिकोटिनाड़ीनामालयञ्च कलेवरम् ।

क्रमेण श्रोतुमिच्छामि तद्वदस्वमयि प्रभो! ॥१ ॥

श्रीशिव उवाच - " लोम्निकूपे सपादार्द्धकोटयश्चैव सुन्दरि! हस्ता- -स्ये च - तथापादेऽग्निलक्षनाड्यः स्थिताः ॥२ ॥

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आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 100 का मूल पृष्ठ
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड श्रात्मगतिनिमित्तानि

उदरे च तथा पायौ पञ्चलक्षाः प्रकीत्तिताः ।

हृदादि- सर्वगात्रेषु नवलक्षाः प्रकीर्तिताः ॥३ ॥

अथ पार्श्व तथा चम्मे तथैव सन्धिषु ।

रुद्रान्न्यूनं स्थितं लक्षं शरीरे नाड्यः प्रिये ॥४ ॥

सार्द्ध त्रिकोटयोनाड्यो हि स्थूलाः सूक्ष्माश्च देहिनाम् । नाभिकन्दनिबद्धास्तस्तिर्य्यगूर्ध्वमधः स्थिताः ॥ ५ ॥ ( संग्रहः )

सप्तधातु समष्टि, प्रज्ञा, प्रारण, इन्द्रियवर्ग, पञ्चप्राण नाड़ीत्रयी आदि शारीरविवर्त्त भोगायतन लक्षण पाञ्चभौतिक शरीर में ही प्रतिष्ठित है । चूंकि पञ्चीकृत पश्ञ्चभूतों से भौतिकशरीर का निर्माण हुआ है, अतएव शरीरभूत समष्टि ' महाभूतसमष्टि ' कहलाई है । आत्मगति से सम्बन्ध रखने वाली व्याम नाड़ियों ( धमनियों ) के सामान्य विवर्त्त ही प्रकृत में मीमांस्य हैं । समानलक्षण ये व्यान नाड़ियाँ ' पृथिवी-जल - तेज - वायु - प्रकाश ' इन पाँच भूतों के पार्थक्य से पाँच संस्थानों में विभक्त हो रही हैं । पृथिवीनाड़ी, जलनाड़ी, तेजोनाड़ी, वायुनाड़ी, प्रकाशनाड़ी इन पाँच व्यान नाड़ियों के १४४०० ( चौदह हजार चार सौ ) विवर्त्त हैं, जिनका ' प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य ' में विस्तार से विश्लेषरण हुआ है । हृदयाकाशस्थ दभ्राकाश में उक्थरूप से प्रतिष्ठित व्यान इन पञ्चनाड़ियों के द्वारा सर्वाङ्ग शरीर में व्याप्त हो रहा है । अतएव इसे ' सर्वशरीर कहा गया है । पञ्चधाविभक्त इन व्याननाड़ियों का पृथिवी - जलादि - प्रायतन भेद से रस भिन्न है, पर्णभिन्न है, एवं स्पर्श भिन्न है । उदाहरण के लिए पृथिवी नामक पार्थिव व्यान नाड़ी को ही लक्ष्य बनाइए । अस्थि, मांस, त्वचा, तीनों धनद्रव्य हैं एवं ' यत् कठिनं सा पृथिवी ' श्रुति से तीनों पार्थिव हैं । स्थि सम्बन्ध से पार्थिव व्यान नाड़ियाँ ४८०० ( चार हजार आठ सौ ) हैं, मांस सम्बन्ध से भी एतावत्यः ही हैं एवं चर्म्म सम्बन्ध से भी एतावत्यः ही हैं । सम्भूय तीनों पार्थिव धनद्रव्यों के नाड़ी - संकलन से पार्थिव व्यान नाड़ियाँ १४४०० हो जाती है । इनका रस मधुर है, वर्ण पीत है, स्पर्श साम ( न उग्र मृदु हैं | शुक्र, शोणित, मज्जा तीनों तरल द्रव्य है । कफ - लार आदि का इन्हीं तीनों में अन्तर्भाव है । ' यद्रवं तदापः ' श्रुति से तीनों जलीय हैं । प्रत्येक में ४८०० जलीय व्यान नाड़ियाँ भुक्त हैं । संकलन से ये भी १४४०० ही हो जाती हैं । इनका रस शिव है, वर्ण श्वेत है, स्पर्श शीत है । क्षुधा तृषा - निद्रा तीनों तेजस ( आग्नेय- रौद्र ) द्रव्य हैं । क्षुब्ध शारीराग्नि प्रन्नाहुति से शान्त होता हुआ शिवरूप में परिणत हो जाता है । अतएव रुद्राग्नि को शिवभाव में परिणत करने वाला यह रुद्रान्न ' शान्तरुद्रिय ' नाम से व्यवहृत हुआ है, जो कि परोक्ष भाषा में ' शतरुद्रियं ' नाम से प्रसिद्ध है ( शत ० ७ । १ । १ । १ ) | अन्नाभाव में शारीर-रुद्राग्नि प्रज्ज्वलित रहता है । प्रनिक्षोभ ही इसका ज्वलन है, यह क्षोभलक्षण ज्वलन ही ' क्षुधा ' है, यही तृषा है । इसी आधार पर क्षुधा तृषा को तेजस धातु माना गया है । उदान नाम से प्रसिद्ध तेजो नाड़ी [ ६३ ]