श्रीगणेशाय नमः।

Part IV Atmgativigyanopanishta Part 4 — पृष्ठ 111–120

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४ · पृष्ठ 111–120

पृष्ठ 111

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 111 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

& श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड पञ्चभूतानुगत व्याननाड़ी - विवर्त्त परिलेख: -१ प्रस्थामि + ४८०० मधुरो रसः २ मास ४८०० पीती वर्णः ३- त्वचायां + ४५०० साम स्पर्शः पृथिव्यनुगताः सौरप्राणभुक्ता व्याननांड्य १४४०० १ - शुक्र - + ४८०० शिवो रसः २ - शोणित + ४८०० श्वेतवर्णः ३ – मज्जायां + ४८०० शीतः स्पर्शः जलानुगताः सौरद्यपानभुक्ता व्याननाड्यः १४४०० १ - क्षुधायां + ४८०० तीक्षणे रसः २ पिपासायां + ४८०० रक्तो वर्णः ३ – निद्रायां + ४८०० – उष्णः स्पर्शः तेजोऽनुगताः सौरउदानभुक्ता व्याननाड्यः १४४०० १ – धावने ४८०० - अम्लो रसः २ – चलने + ४८०० - चित्रो वर्णः ३ - भाषणे + ४८०० - समः स्पर्शः वाय्वनुगताः सौरसमानभुक्ता व्याननाड्यः १४४०० १ – द्वेषे – ४८०० – कटु रसः २ – लज्जायां + ४८०० - श्यामो वर्णः ३ – भये— → ४८०० – कटु स्पर्शः आकाशानुगताः सौरव्यानानुगता व्यानाड्यः १४४०० आत्मगतिनिमित्तानि प्राणे हृदये पृथिवीगृहे वसन् पृथिवी नाड़ीः पुष्णाति पृथिवीन्द्रिये नासामूळे पृथिवीतन्मात्रं गन्धप्रवेशयति, निर्गमयति च १- पृथिवी १४४०० अपाने गुदस्थाने जलगृहे वसन् जलनाड़ी: पुष्णाति जलेन्द्रिये जिह्वाशिष्णे जलतन्मात्रं रसंप्रवेशयति, निर्गमयति च २ - जलम् १४४०० उदाने कण्ठस्थाने तेजोगृहे वसन् तेजोनाड़ीः पुष्णाति तेजेन्द्रियं नेत्रं पादंच तेजस्तन्मात्रं रूपं प्रवेशयति, निर्गमयतिच ३- तेज: १४४०० समाने नाभौ वायुगृहे वसन् वायुनाड़ी: पुष्णाति, वरिवन्द्रिये पारिनभिरिन्द्रिये - वायुतन्मात्रं स्पर्श प्रवेशयति, निर्गमयति च ४ - वायुः १४४०० व्याने सर्वशरीरे व्योमगृहे वसन् व्योमनााड़ीः पुष्णाति, व्योमेन्द्रिये वाक् - श्रोत्रेन्द्रिये - व्योमतन्मात्रं शब्द प्रवेशशयति, निर्गगमयति च ५- श्राकाशाः १४४०० ७२००० द्वासप्ततिसहस्र संख्यामिताः [ १०३ ] तदित्यं पञ्चभूतानुगताः सौरप्राणपानोदान समानभुक्ताः व्याननाड्यः

पृष्ठ 112

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 112 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड पञ्चप्रारणानुगत - नाडीचक्र परिलेख: -आत्मगतिनिमित्तानि पृथिवी अप् तेजो १४४०० १४४०० १४४०० वायु १४४०० आकाशानुगताः १४४००-" प्राणनाड्यः " ७२००० पृथिवी अप् तेजो १४४०० १४४०० १४४०० वायु १४४०० आकाशानुगताः-१४८०० " उदाननाड्यः ' ७२००० पृथिवी अप् तेजो १४४०० १४४०० १४४०० वायु १४४०० आकाशानुगताः— १४४०० “ व्याननाड्यः ” ७२००० पृथिवी १४४०० अप् १४४०० तेजो १४४०० वायु १४४०० श्राकाशानुगताः-१४४०० “ समाननाड्यः ” ७२००० पृथिवी अप् १४४०० १४४०० १४४०० वायु १४४०० आकाशानुगताः-१४४०० ' अपाननाड्यः " ७२००० पृ ० नाड्यः प्र ० नाड्यः ७२००० ७२००० ते ० नाड्यः वा नाड्यः ७२००० ७२००० आकाश नाड्यः “ पञ्चप्राणनाड्यः ' ७२००० . ३६०००० पश्चभूतनाड्यः – ३६०००० तीन लाख साठ हज़ार-यह तो हुई इन पञ्चप्राण नाड़ियों की संख्या के सम्बन्ध में सूक्ष्म व्यवस्था । अब उस सुसूक्ष्म मीमांसा का भी समन्वय कर लीजिए, जिससे केवल इन पञ्चप्राण नाड़ियों की ही संख्या करोडों पर, किंवा अर्बादि संख्याओं पर विश्राम करती हुई - " सार्द्धत्रिकोट्याइयोहि स्थूलाः सूक्ष्माश्च देहिनाम् " इस पौराणिक सूक्ति का भी प्रतिक्रमण कर रही है । तत्वानाभिज्ञ यथाजात मनुष्य कहा करते हैं, पुराण कातत्ववाद अतिरञ्जित है, अतएव अविश्वसनीय है । इन कल्पित वेदश्रद्धालुओं को यह विदित नहीं है कि, स्वयं वेदशास्त्र के तत्त्वों का आनन्त्य पुराणानुगत तत्त्वानन्त्य का भी प्रतिक्रमण कर रहा है । उदाहरण यही नाड़ी संख्या है । पुराण समस्त आध्यात्मिक नाड़ियों के केवल स्थूल सूक्ष्मभेदों का विश्लेषण करता हुआ जहाँ ३५०००००० संख्याओं पर विश्राम कर लेता है, वहाँ वेदशास्त्र के ये संख्या विन दिसंख्या पर्यंत अनुधावन कर रहे हैं । [ १०४ ]

पृष्ठ 113

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 113 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि wwwwww केवल व्यान नाड़ी की संख्याओं का विश्लेषण करते हुए महर्षि पिप्पलाद ने कहा है कि, हृतस्थान में प्रतिष्ठित सौरत्रिलोकी के प्रान्तरिक्ष्य ' व्यान ' प्राण के आधार पर हृदय से एकशत ( १०१ ) नाड़ियाँ इतस्ततः वितत होती हैं । इन १०१ व्यान नाड़ियों में से प्रत्येक में से शत - शत ( सो - सौ ) शाखाएँ निकलती । इन शाखाओं का यदि संकलन किया जाता है तो १०१ मूलशाखा नाड़ियों के १०१०० विवर्त हो जाते हैं । श्रागे जाकर शाखारूप १०१०० इन व्यान नाड़ियों में प्रत्येक में से द्वासप्ततिसहस्र ( ७२००० ) प्रशाखा - नाड़ियाँ निकलती हैं । दस हजार सौ संख्यात्रों में विभक्त इन शाखानाड़ियों में से प्रत्येक में मुक्त ७२-७२ हजार प्रतिशाखा नाड़ियों का यदि संकलन किया जाता है, तब इन व्यान नाड़ियों की प्रतिशाखाओं की संख्या द्वासप्ततिकोटि, द्वासप्ततिलक्ष, दशसहस्र, द्विशत ( बहत्तर करोड़ बहत्तर लाख दस हजार दो सौ ) ७२७२१०२०० संख्या पर ठहरती है । इनमें द्वासप्ततिसहस्र ( ७२००० ) प्रशाखा नाड़ियों का, शतोत्तर-दशसहस्र ( १०१०० ) शाखानाड़ियों का तथा १०१ मूलनाड़ियों का समन्वय और कीजिए । केवल व्यान नाड़ी संख्या निम्नलिखित विवर्तरूप से हमारे सम्मुख उपस्थित होती है— मूलात्मिका व्याननाड्यः-→ १०१ शाखात्मिका व्याननाड्यः + १०१०० प्रशाखात्मिका व्याननाड्यः-- + ७२००० → व्याननाड्यः प्रतिशाखात्मिका व्याननाड्यः ७२७२१०२०० ७२७२६२४०१ " हृदि ह्येष श्रात्मा । अत्रैकशतं ( १०१ ) नाड़ीनां तासां शतं शतमेकैकस्यां ( १०१०० ), द्वासप्ततिद्वसप्ततिः ( ७२००० ) प्रतिशाखानाड़ी सहस्राणि ( ७२७२१०२०० ) भवन्ति । श्रासु व्यानश्चरति " ( पिप्पलादोपनिषत् ३।६ ) । [ १०५ ]

पृष्ठ 114

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 114 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड प्राणनाड्यः + ७२७२६२४०१ उदाननाड्यः ७२७२६२४०१ व्याननाड्यः ७२७२६२४०१ • पञ्चप्राणनाड्यः समाननाड्यः ७२७२६२४०१ आत्मगतिनिमित्तानि अपाननाड्यः + ७२७२६२४०१ ३६३६४६२००५ " तीन अर्बुद ( अर्ब ) त्रेसठ करोड़ चौसठ लाख बासठ हजार पाँच " क " प्राविर्भूतप्रकाशानामनभिप्लुतचेतसाम् अतीतानागतज्ञानंप्रत्यक्षान्नविशिष्यते । " दूसरी दृष्टि से धमन्यनुगत व्याननाड़ियों का समन्वय कीजिए । सर्वशरीरग, पञ्चेन्द्रियगुरगावह इन धमन्यनुगत व्याननाड़ियों के प्रशाखा भेद से द्वासप्ततिसहस्र ( ७२००० ) विवर्त्त हैं, यह स्पष्ट किया जा चुका है । प्रतिशाखात्मिका व्याननाड़ियों की अपेक्षा इन्हें स्थूलनाड़ी ही कहा जायगा । व्याननाड़ी के इन्हीं स्थूल विवर्त्ती को लक्ष्य में रख कर आचार्यों ने कहा है-द्विसप्ततिसहस्त्रन्तु तासां स्थूलाः प्रकीत्तिताः । देहे धमन्यो धन्यास्ताः पञ्चेन्द्रियगुणावहाः ॥ इन व्याननाड़ियों की मूलप्रतिष्ठा हृदयस्थान है । हृदयस्थान से ही यह ऊर्ध्वः - प्रधः - तिर्थ्यरूपेण सर्वशरीर में व्याप्त हैं । हृदय से ऊपर की ओर ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त व्याप्त व्याननाड़ियों का उत्तमाङ्ग से सम्बन्ध है, एवं हृदय से नीचे की ओर मूलरन्ध्रपर्यन्त व्याप्त व्याननाड़ियों का अधमाङ्ग से सम्बन्ध है । मूलनाड़ी विवर्त्त कुल १०१ हैं । इनमें एक नाड़ी तो ब्रह्मरन्ध्र से मूलद्वार पर्य्यन्त वितत है, शेष १०० * " हिता नाम नाड्यो द्वासप्ततिः सहस्राणि हृदयात् पुरीततमभिप्रतिष्ठन्ते । ताभिः-प्रत्यवसृप्य पुरीतति शेते । स यथा कुमारो वा, महाराजो वा, महाब्राह्मणो वाऽतिघ्नीमा-नन्दस्य गत्वाशयीते, एवमेवैषएतच्छेते । " ( बृ ० आ ० उ ० २।१।१६ ) । " ता वा अस्यैता हिता नाम नाडयो यथा केशः सहस्रधा भिन्नः, तावताऽरिणम्ना तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पिङ्गलस्य हरितस्य लोहितस्य पूर्णा । " ( बृ ० प्रा ० उ ० ४।३।२० ) । [ १०६ ]

पृष्ठ 115

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 115 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि नाड़ियों में से ५० दक्षिणपार्श्व में, तथा ५० वामपार्श्व में सन्तानित हैं । १-५०-५० तीन विवत्तों के हृदयमूलानुगत उत्तमाङ्ग - प्रधमाङ्ग भेद से दो - दो विवर्त्त हो जाते हैं । हृदय से ऊपर ब्रह्मरन्ध्र द्वारा सूय्यं - ' केन्द्र से स्पर्श करने वाली नाड़ी ऊर्ध्वनाड़ी है, हृदय से ऊपर के वामाङ्ग में ५०, दक्षिणाङ्ग में ५० नाड़ियाँ प्रतिष्ठित हैं । एवमेव हृदय से नीचे मूलद्वार द्वारा भूकेन्द्र से स्पर्श करने वाली नाड़ी प्रधोनाड़ी है, हृदय से नीचे के वामाङ्ग में ५०, दक्षिणाङ्ग में ५० नाड़ियाँ वितत हैं । इसी मूलनाड़ीवितान को लक्ष्य में रखते: -हुए श्रुति कहती है

- शतं चैका हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्द्धानमभिनिःसृतैका ।

तयोर्ध्वमायन्नमृततत्वमेति विष्वङ " ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥

( छा ० उ ० ८।६।६ ) ।

२ -- ततः कण्ठान्तरे योगी समूहं नाड़िसञ्चयम् ।

एकोत्तरं नाशितं तासां मध्ये वरा स्मृता ॥१ ॥

इ st रक्षतु वामेन पिङ्गला दक्षिणेन तु । तयोर्म्मध्ये वरं स्थानं यस्तं वेद स वेदवित् ( त्रयोघन सूर्य्यसम्बन्धात् ) । २ । हृदय से सर्वथा ऋजुभाव द्वारा शिरःकपाल द्वयमध्यगता ज्योतिर्मयी नाड़ी ही ' सुषुम्णा ' कहलाई.. है । इस नाड़ी का सूर्य्यकेन्द्र के साथ अविच्छिन्न सम्बन्ध बना रहता है । सूर्य्यकेन्द्र से प्रारम्भ कर अध्या-त्मसंस्था के हृदयावच्छिन्न प्रज्ञानकेन्द्र पर प्रतिबिम्वित ग्राध्यात्मिक विज्ञान सूर्य्यकेन्द्रपर्यन्त जो एक सुषुम्णा - नाड़ीलक्षण मार्ग वितत है, वही ' महापथ ' कहलाया है । जिस प्रकार दो ग्रामों को मिलाने वाला राजपथ एक व्यक्ति के गमनागमन का साधक बनता हुआ उभयग्राम प्राप्ति का कारण बनता है, एवमेव सूर्य्यग्राम तथा शरीरग्राम दोनों को मिलाने वाला नाड़ीरूप महापथ विज्ञानप्राण के गननागमन का साधक बनता हुआ उभयलोक सम्बन्ध का कारण बन रहा है । जीवितदशा में निरन्तर इसी मार्ग द्वारा विज्ञानात्मा सूर्यकेन्द्रस्थ हिरण्यमय पुरुष से सम्बन्ध होता रहता है । यही इसका ग्रहरहः स्वर्गगमन है । यही प्रहरह ज्ञ आयु: स्वरूप रक्षक है । वर्णरूपाधिष्ठाता इन्द्र के सम्बन्ध से वह सूर्य्यपथ ( रश्मिपथ ) शुक्लादिवर्णों से युक्त माना गया है । स्व - स्व - स्वस्वास्तिक के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति का यह अणु पन्थाः स्वतन्त्र है, स्व - स्व केन्द्रों से बद्ध है | विदेहपुरुषों ( विमुक्तात्मानों ) का इसी मार्ग से ( निधनान्तर ) क्षणमात्र में आदित्यलोक में गमन हो जाता है । जो विषयासक्त प्रविद्वान् लौकिक पुरुष हैं, उनके लिए यह मार्ग अवरुद्ध है । सुषुम्णा-नुगत इसी महापथ का निम्नलिखित वचनों से स्पष्टीकरण हुआ है-१ - " अणुः पन्था तेन धीरा

विततः पुराणो माँ स्पृष्टोऽनुवित्तो मयैव ।

पियन्ति ब्रह्मविदः स्वर्गं लोकमित ऊर्ध्वं विमुक्ताः ॥ १ ॥

[ १०७ ]

पृष्ठ 116

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 116 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्ध विज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि

तस्मिञ्छुक्लनीलमाहुः पिङ्गलं हरितं लोहितं च ।

एष पन्था ब्रह्मणा हानुवित्तस्तेनेति ब्रह्मवित् पुण्यकृत् - तैजसश्च ॥२ ॥

( बृ ० प्र ० उ ० ४।४।८ - ९ ) २ – “ अथ या एता हृदयस्य नाड्यस्ताः पिङ्गलस्थारिणम्नस्तिष्ठन्ति शुक्लस्य, नीलस्य, पीतस्य, लोहितस्य - इति । असौवा श्रादित्यः पिङ्गलः, एष शुक्लः, एष नीलः, एष पीतः, एष लोहितः ॥ १ ॥

-तद्यथा महापथ प्रातत उभौ ग्रामौ गच्छति इमं च, अमुञ्च । एवमेता आदित्यस्य रश्मय उभौ लोकौ गच्छन्ति - इमं च

प्रमुञ्च प्रमुष्मादादित्यात्प्रतायन्ते । ता प्रासु नाडीषु सूप्ता ।

श्राभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्ते । तेऽमुष्मिन्नादित्ये सृप्ताः ॥ २ ॥

३ – “ अथ यदबलिमानं नीतो भवति, तमभितआसीना आहुः जानासि -मां जानासि मामिति । यावदस्माच्छरीरादनुत्क्रान्तो भवति, तावज्जानाति ॥ १ ॥

अथ यत्रैतेदस्माच्छरीरादुत्क्रामति प्रथैतैरेव रश्मिभिरूर्ध्वमाक्रमते । सो

मिति वा, होद्वा मीयते । स यावत् क्षिप्येन्मनसस्तावदादित्यं गच्छति ।

एतद्वै खलु लोकद्वारं विदुषां प्रपदनं निरोधोऽविदुषाम् ॥ २ ॥

( छा ० उ ० ८ । ६ । १ - से पर्य्यन्त ) ।

४ — अनन्ता रशमयस्तस्य दीपवद् यः स्थितो हृदि ।

सितासिताः कद्रुनीलाः कपिलाः मृदुलोहिताः ॥ १ ॥

[ १०८ ]

पृष्ठ 117

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 117 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड नाड़ी निमित्त परिलेखः jealo : नाडय ५० वामाङ्गम् / 130 . वामाङ्गम् नॉडय ५० श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय जयपुर । ब्रह्मरन्ध्रम पितृ पथः मूलद्वारम् ५० नाइम ।: ग्रात्मगति निमित्तानि उ त्त ५० नाडय : दक्षिणाङ्गम् ' भूपिण्डः इस परिलेख में उल्लेखित ब्रह्मपथ, देवपथ, पितृपथ तथा यमपथ विद्यासापेक्ष कर्म्म प्रवृति से देवस्वर्ग, पितृस्वर्ग, नरक, निरर्थक, विरुद्ध तथा स्वार्थरूपी संस्कारों के प्रवर्त्तक हैं । यह नाड़ी निमित्त भी पन्थान परिभाषानुसार चार मार्गों में विभक्त हो रहा है । अर्थात् जो जैसा कर्म्म करता है उसका प्राणात्मा उसी नाड़ी मार्ग से उत्क्रान्त होता है । इस परिलेख का यही अभिप्राय है ।

पृष्ठ 118

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 118 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्ध विज्ञान चतुर्थ खण्ड ऊर्ध्वमेकस्थितस्तेषां यो भित्वा सूर्य्यमण्डलम् ॥ ब्रह्मलोकमतिक्रम्य तेन याति परां गतिम् ॥ २ ॥

यदस्यान्यद् रश्मिशतमूर्ध्वमेव व्यवस्थितम् ॥ तेन देवनिकायानां स्वधामानि प्रपद्यते ॥३ ॥

येनैकरूपाश्चाधस्ताद् रश्मयोऽस्य मृदुप्रभाः ॥ आत्मगति निमित्तानि इह कर्मोपभोगाय तैः संसरति सोऽवशः ॥ ४ ॥ ( मै ० उ ० ६ । ३० ) ।

उक्त व्याननाड़ी विवेचन से हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ा कि धमन्यनुगता - हृदयबिन्दु से ऊर्ध्व - अधः - वितत १०१ व्याननाड़ियाँ ही ( कर्म्मनिमित्तानुसार ) आत्मगति की निमित्त बनती हैं । हृदय से ऊपर उत्तमाङ्ग में प्रतिष्ठित नाड़ी विवर्त्त उक्त परिभाषानुसार ' देवयानमार्ग ' है, एवं हृदय से नीचे अधमाङ्ग में प्रतिष्ठित नाड़ी विवर्त्त ' पितृयाणमार्ग ' है । देवयानमार्गात्मिका १०१ नाड़ियों में ऋजुभावेन ऊर्ध्वविवता सूर्य्यकेन्द्रानुगता सुषुम्णा नाड़ी देवयानमार्गभुक्त ब्रह्मपथ है, यही विद्यासापेक्ष निवृत्ति से मुक्ति का प्रवर्तक है । उत्तमाङ्ग के दक्षिण वामपार्श्वों में वितत नाड़ीशत देवयानमार्गभुक्त देवपथ है, यही विद्या-सापेक्ष प्रवृत्ति कर्म्मसंस्कार से देवस्वर्गगति का प्रवर्तक है । एवमेव हृदय से नीचे अधमाङ्ग में प्रतिष्ठित वही एक शतमित नाड़ी विवर्त्त पितृयाणमार्ग ' है । पितृयाणमार्गात्मिका १०१ नाड़ियों में से ऋतुभावेन अधोवितता भूकेन्द्रानुगता नाड़ी पितृयाणमार्गभुक्त यमपथ है, यही लौकिक निरर्थक - विरुद्ध - स्वार्थ - कर्म-त्रयी संस्कार से नरक का प्रवर्तक है । अधमाङ्ग के दक्षिण - वाम भागों में वितत नाड़ीशत पिढयाणमार्ग-भुक्त पितृपथ है, यही विद्यासापेक्षप्रवृत्ति सत्कर्म्म संस्कार से पितृस्वर्ग का प्रवर्तक बनता है । निवृत्त-लौकिककर्म्म से प्राप्त मुक्तिगति का ब्रह्मपथ में ही अन्तर्भाव है । इस प्रकार कर्म्मनिमित्तवत् यह नाड़ी-निमित्त भी ' पन्थान: परिभाषानुसार चार मार्गो में विभक्त हो रहा है । जो जैसा कर्म्म करता है, उसका प्राणात्मा उसी नाड़ी मार्ग से उत्क्रान्त होता है । जहाँ से ( शरीर के जिस प्रदेश से प्राणात्मा निकलता है, वह अतिशय रूप से कठिन हो जाता है ) यही निर्गमनस्थान का परिचायक हैं । इसी के द्वारा शुभा - शुभ लोकगतियों का अनुमान लगाया जा सकता है, जैसा कि ' श्रात्मोत्कान्तिनिमित्तानि ' परिच्छेद में विस्तार से बतलाया जा चुका है । [ १०६ ]

पृष्ठ 119

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 119 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पन्थाः पितृयारणः --प्रधोनाड्यः -एकोत्तरशतमिताः – वितताः - प्रथमाङ्ग हृदयादधोभागे -कर्मानुगताः विद्यानिरपेक्ष ) २ ( * १ - ( १ ) ): → देवयानान्तर्गतो ( देवस्वर्गसाधक नाड्यः ' - ऊर्ध्व देवपथः ' - शतमिताः वितताः ) ( दक्षिणवामपार्श्वयोः हृदयादूर्ध्वभागे कर्मानुगताः-विद्यासमुच्चितप्रवृत्त १ [ [ ११० ] २ ) ( २ ) ( पितृस्वर्गसाधकः : ' पितृपथ ' पितृयारणान्तर्गतः → - प्रधोनाड्य शतमिताः -) वितताः वामपार्श्वयोः ( दक्षिण - हृदयादधोभागे प्रवृत्तकर्मानुगताः विद्यानिरपेक्ष १ [ चतुर्थं खण्डं ) ( ३ ) मुक्तिसाधकः ( -: " ' ब्रह्मपथ -देवयानन्तर्गतो ऊर्ध्वनाड़ी एका-वितता यावत् केन्द्रान्तं सूर्य -हृदयाद् + * कर्मानुगता निवृत्त विद्यासमुच्चित १ ३ विद्यानिरपेक्षनिवृत्तकर्मानुगता २ कर्मानुगता निवृत्त * लौकिक ३ निर्थककर्मानुगता लौकिक १ ४ विरुद्धकर्मानुगता लौकिक २ स्वार्थकम्र्मानुगत लौकिक ३ ” यमवयः - " पितृयाणान्तर्गतो : -प्रधोनाड़ी - एका-यावद्वितता भूकेन्द्रान्तं -) ( ४ ) नरकसाधकः ( श्रात्मगतिनिमित्तानि

पृष्ठ 120

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 120 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्डे ( घ ) छन्दांसि श्रात्मगतिर्निमित्तानि “ सर्वमिदं वयुनम् ” इस नैगमिक सिद्धान्त के अनुसार समष्टयात्मक यह सम्पूर्ण विश्व भी ' वयुन ' नमी है, एवं विश्वगर्भ में मुक्त जड़ - चेतन ( निरिन्द्रय - सेन्द्रिय ) यच्चयावत् पदार्थ ( प्राणी ) भी वयुन हैं । वय, वयोनाध, इन दो तत्त्वों की समष्टि ही ' वयुन ' है । भावितासिद्ध तत्त्व वय है, भातिसिद्धतत्त्व वयोनाध है, अस्ति भाति समष्टिलक्षरण वय- वयोनाध ही ' इदं ' स्वरूप के परिचायक हैं । मनःप्राणवाङ्मय तत्त्व ही अस्ति है, नामस्वरूपकर्म की समष्टि ही भाति है । अस्ति आत्मा है, ' भांति इस आत्मा का शरीर है । प्रत्येक पदार्थ में अस्तीत्यात्मक आत्मालक्षण वय तथा भातीत्यात्मक शरीरलक्षरण वयोनाध, दोनों का समन्वय हो रहा है । इसी समन्वितरूप का नाम आत्मन्वी है, यही आत्मन्वी ' वयुन ' है, और इस दृष्टि से अवश्य ही सबको वयुन कहा जा सकता है । सहज भाषा में इस उभयात्मक वयुन का यों भी स्पष्टीकरण किया जा सकता है कि प्रत्येक पदार्थ में पदार्थ, पदार्थ का बाह्याकार, भेद से दो विवर्त्त हैं, जिस वस्तुतत्त्व का बाह्याकार है, वह वस्तुतस्व तो वय है, एवं जिस बाह्याकार से वह वस्तुतत्त्व चारों ओर से सीमित है, वह बाह्याकारलक्षण सीमाभाव ' ही ' वयोनाध है । जिस प्रकार उदर सीमा में अन्न भुक्त है, तथैव बाह्याकार की सीमा में वस्तुतत्त्व भुक्त ( गर्भित ) है, इसी ..अनभुक्ति समतुलन से इस वस्तुतत्त्व को ' वय ' कहा जा सकता है । इसी आधार पर वय को अन्न कहा गया है । वय अन्न का पर्याय नहीं है, अपितु गर्भीभावमात्र की अपेक्षा से वय को अन्न कह दिया जाता है । अपिच जिस प्रकार अन्तरिक्षोदर में अन्नवत् प्रतिष्ठित पक्षी जैसे ' वय ' कहलाया है, एवमेव तत् संतुलित यह वस्तुतत्त्व शरीराकारोदर में चूंकि मुक्त है, इस पक्षी - सादृश्य से भी वस्तुतत्त्व को वय कहा जा सकता है । , एवं इसी आधार पर शरीरावच्छिन्न वस्तुतत्त्व वय को ( जीवात्मा को ) सुपर्ण ( गरुड पक्ष ) कहना ' अन्वर्थ बनता है । यह वय चूकि उस बाह्याकर लक्षण शरीर से चारों ओर से सीमित रहता है, बद्ध रहता है, अतएव इस बाह्याकारलक्षण सीमाभाव को अवश्य ही वय - बद्धता से वयोनाथ कहा जा सकता । यही वयातत्त्व यज्ञ परिभाषा में ' छन्द: ' नाम से व्यवहृत हुआ है- " छन्दांसि वै देवा वयोनांधाः छन्दोभि-हृदं सर्वं वयुनं तद्धम् ' ( शत ० ८।२।२१८ ) | जलतत्त्व स्वस्वरूप से समान है, एकरस है । परन्तु वापी, कूप, तड़ाग, जलयन्त्र ( टोंटी ), घट आदि योना ( बाह्याकार ) लक्षण छन्दों के भेद से भिन्न - भिन्न आकारों में परिपत हो रहा | सुवर्ण-तत्त्व स्वस्वरूप से एक है, परन्तु कटक - कुण्डल - नूपर - कावी आदि छन्दों के भेद से वही नाना नाम रूप-कर्म्मभावों में परिणत हो रहा है । ज्योति स्वस्वरूप से एक है, परन्तु सूर्य्य -- चन्द्रमा - अग्नि- विद्यत - नक्षत्र-दीप आदि आकार भेद से उसी के अनेक विवर्त्त हो रहे हैं । आत्मतत्त्व स्वस्वरूप से अखण्ड है, परन्तु पञ्चभूतानुगत गुणत्रयानुगत - प्रकृतिभाव वैविध्य से इस एक ही के नाना रूप हो रहे हैं । एक को अनेक रूप देने वाला यही वयोनाध तत्त्व छन्दः पदार्थ है । छन्दोभेद ही वस्तुतत्त्वलक्षण वयोभेद का एकमात्र मुख्य कारण है । यदि इन पुरोऽवस्थित - भेदक बाह्याकारलक्षण छन्दों को हटा दिया जाता है, तो सर्व-च्छन्दोऽतिगवद् विशुद्धतत्त्व स्वस्वरूप से प्रच्छन्दस्क बनता हुआ अखण्ड है, एकरस है । एकमात्र छन्दोभेद [ १११ ]