Part IV Atmgativigyanopanishta Part 4 — पृष्ठ 21–30

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४ · पृष्ठ 21–30

पृष्ठ 21

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 21 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिविषये - प्रश्नपरम्परां सर्वथा जड़ हैं । यदि पुरुष केवल पञ्चभूतमय ही होता, तब तो उस अवस्था में उस ज्ञानधर्म का सर्वथा अभाव रहता, जिसके आधार पर यह ' ग्रहं जानामि, मया ज्ञायते, अहं करोमि, मया क्रियते ' इत्यादि व्यवहार करने में समर्थ होता है । कारण गुण ही कार्य्यगुण के प्रारम्भक बनते हैं । जब कि कारणभूत भूतों में ज्ञानधर्म का अभाव है, तो तत्कार्य्यभूत अन्नरसमय पुरुष में तब तक यह प्रत्यक्षानुभूत ज्ञानधर्म, किंवा चेतनधर्मं सर्वथा अनुपपन्न है, जब तक कि पाँचों भूतधातुत्रों से अतिरिक्त ज्ञानकसार एक छठे चेतना धातु का इसके साथ समन्वयं और न मान लिया जाय । अवश्य ही पाँचों व्यक्त भूतों की तरह सर्वव्यापक चेतना नामक छठे अव्यक्त धातु का भी इसके साथ सम्बन्ध मानना पड़ता है । " पृथिव्याप-स्तेजो वायुराकाशं ब्रह्मचाव्यक्तं इत्येत एव च षड्धातवः समुदिताः ' पुरुष ' इति शब्दं लभन्ते " ( चरक शा ० ५। ३ ) इत्यादि आर्षवचन इसी छठे चेतना धातु का समर्थन कर रहा है । प्रास्तां तावत् । चेतना धातु के स्वीकार कर लेने पर भी परलोकगति सर्वथा अनुपपन्न ही रह जाती है । पाञ्चभौतिक विश्व में व्याप्त पाँचों महाभूतों में जैसे शरीर पाँचों वैकारिक भूतों का अव्यय हो जाता है, एवमेव संगठन विघटनान्तर शरीरानुगत चेतना धातु भी विश्वव्यापक, किंवा सर्वव्यापक चेतना धातु में उसी प्रकार तत्क्षण ही विलयन हो जाता हैं, जैसे कि लोटे का पानी ' लोटा ' रूप सीमा के रहते ही समुद्र में जाकर तद्रूप हो जाता है । निम्नलिखित श्रुति चेतना धातु के इसी तात्कालिक अव्यय का समर्थन करती हुई क्रमगति लक्षण परलोक-गति का एक प्रकार से खण्डन करने वाली ही प्रमाणित हो रही है - .

" यथोदकं शुद्धे शुद्ध मासिक्तं तादृगेव भवति ।

एवं मुनेविजानत श्रात्मा भवति गौतम ॥

परेऽव्यये सर्व एकी भवन्ति ॥ " ( कठ ० ४।१५ ) । ( ३ ) कितने एक वैज्ञानिक चेतनाधातु मान लेने पर भी सन्तुष्ट होते दिखाई नहीं देते । उनकी इस सम्बन्ध में यह विप्रतिपत्ति है कि, चेतना ज्ञान प्रधाना है, पञ्चभूत अर्थप्रधान है । अर्थप्रपञ्च भी सर्वथा निष्क्रिय है, एवं ज्ञानमत्री चेतना भी क्रियाधम्र्म से प्रतिक्रान्त है । इस निष्क्रिय चेतना, निष्क्रिय भूतवर्गों का एकत्र समन्वित हो जाना तब तक सर्वथा असम्भव है, जब तक इन दोनों का सम्बन्ध कराने वाला एक तीसरा सक्रिय मध्यस्थ तत्त्व न मान लिया जाय । वही मध्यस्थ तत्त्व ' प्राण ' नाम से प्रसिद्ध है । प्राणतत्त्व सक्रिय तत्त्व है । इसी के द्वारा उस ओर की चेतना का तथा इस ओर के पश्चभूत वर्ग का समन्वय होता है । इस प्रकार प्रत्यगात्मा में ' चेतना, प्राण, पञ्चभूत ' इन तीन पर्वो की सत्ता सिद्ध हो जाती है | चेतनासम्बधेन अन्नरसमय पुरुष ज्ञानशक्तियुक्त है, प्राणसम्बधेन यही क्रिया शक्तिशाली है, एवं पञ्चभूतसम्बधेन यही अर्थशक्ति का भी अधिष्ठाता बन रहा है । ज्ञानशक्तियुक्त चेतना पर्व दृष्टि से यही आत्मा मनोमय है, क्रियाशक्तियुक्त प्राणपर्व दृष्टि से यही प्राणमय है, एवं प्रर्थशक्तियुक्त भूतपर्व की दृष्टि से यही वाङ्मय है । “ स वा एष श्रात्मा वाङ्मयः प्राणमयो, मनोमय: " ( बृ ० प्र ० ४ । ४ । ५ ) इत्यादि श्रुति स्पष्ट ही आत्मा को त्रिपर्वा प्रमाणित करती रही है । [ १४ ]

पृष्ठ 22

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 22 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड आत्मगतिविषये - प्रश्नपरम्परा आत्मा के उक्त तीनों पर्वों में मुख्य श्रात्मा कौन? इस सम्बन्ध में बड़ा विवाद है । प्राण मध्यस्थ है, अतएव इसमें उस ओर के चेतना धर्म्म का ही समन्वय है, एवं इस ओर के भूतधर्म्म का भी समन्वय है. इस दृष्टि से तो मध्यस्थ- प्रज्ञात्मक - प्रानन्दघन - अजर - अमृत - प्राण को ही मुख्य आत्मा कहना चाहिए । इसी आधार पर जीवात्मा सर्वलोक साधारण के व्यवहार में ' प्राणी ' नाम से ही व्यवहृत भी हुआ है । निम्नलिखित श्रुति भी मध्यस्थ, प्रतएव सर्वधर्मोपन प्राणमूर्ति प्रज्ञात्मा को ही मुख्य आत्मा मान रही है— " स प्राण एवैष प्रज्ञात्माऽऽनन्दोऽजरोऽमृतः । स मे श्रात्मा, इति विद्यात् " ॥ ( ब्र ० ४।४।२२ ) । उधर जब उसी श्रुतिशास्त्र के एक अन्य वचन पर जब हमारी दृष्टि जाती है, तो हमें उक्त आत्ममुख्यता- सिद्धान्त में सन्देह होने लगता है । श्रुति ने एक स्थान पर कहा है कि, " यह आत्मा शरीर के चक्षु भाग से, मस्तक भाग से, अथवा तो हस्त - पाद - उदर आदि किसी अन्य शरीरावयव से बाहर निकलता है । इसके बाहर निकलने के साथ ही प्रारण भी इसके साथ ही उत्क्रान्त हो जाता है । " लीजिए - प्राण को यहाँ श्रात्मा से पृथक् बतलाया गया है— " एष आत्मा निष्क्रामति - चक्षुष्टो वा मूर्ध्ना वा, वाऽन्येभ्यो वा शरीर-देशेभ्यः । तमुत्क्रामन्तं प्राणेऽनूत्क्रामति । " ( वृ ० आ ० ४।४।२ ) । उक्त दोनों ही वचन हमारे लिए प्रामाणिक हैं । परन्तु दोनों सन्देह के जनक हैं । मध्यस्थप्रारण आत्मा है? अथवा चेतना आत्मा है? ग्रथवा भूतसंघ आत्मा है? कुछ निर्णय नहीं किया जा सकता । आत्मा स्वरूप ही ' इदमित्यमेव ' रूप से जब कि अनिर्णीत है, तो ऐसे संदिग्ध आत्मतत्त्व से सम्बन्ध रखने वाली परलोकगति के विषय में किस आधार पर निश्चयात्मिका मीमांसा सम्भव है? ( ४ ) उक्त सिद्धान्त के आधार पर आत्मगति सम्बन्ध में सन्दिहान बनते हुए भी कम से कम हम इस निर्णय पर अवश्य पहुँच जाते हैं कि, भले ही चेतना, प्राणभूत तीनों में से मुख्य आत्मा कोई भी हो, परन्तु वह - " एष आत्मा निष्क्रामति " कथनानुसार शरीर से ग्रवश्य उत्क्रान्त होता है । परन्तु उसी श्रुति शास्त्र का एक अन्य वचन तो इस सम्बन्ध में भी हमें सन्देह में डाल देता है । एक स्थान पर आत्मस्वरूप का विश्लेषण करते हुए श्रुति ने कहा है-" श्रात्मैवाधस्तात्, श्रात्मोपरिष्टात् श्रात्मापश्चात्, श्रात्मापुरस्तात्, श्रात्मा दक्षिणतः, प्रात्मा - उत्तरतः । श्रात्मेवेदंसर्वम् । श्रहमेवाधस्तात्, श्रहमुपरिष्टात्, अहं पश्चात् अहं पुरस्तात्, श्रहं दक्षिणतः, श्रहमुत्तरतः । श्रहमेवेदं सर्वम् । " [ १५ ] ( छा ० उ ० ७।२५ )

पृष्ठ 23

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 23 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड आत्मगतिविषये - प्रश्नपरम्परा " आत्मा ही ऊपर - नीचे - पश्चिम - पूर्व - दक्षिण - उत्तर - सर्वत्र व्याप्त है " कहती हुई श्रुति - आत्मा को सर्वव्यापक बतला रही है । आगमन, गमन, उत्क्रान्ति ये सब परिच्छिन्न वस्तुतत्त्वों के साथ सम्बन्ध रखने वाले परिच्छिन्नधर्मं हैं । गतिलक्षण उत्क्रान्ति में पूर्व देशपरित्यागपूर्वक उत्तरदेश का संयोग अपेक्षित है । जो व्यापक है, उसके सम्बन्ध में ऐसा परिच्छिन्न परित्याग - संयोग सर्वथा अनुपपन्न है । इस प्रकार आत्मा कौनसा है? के साथ - साथ प्रात्म विभुत्व समर्थक उक्त वचन से – आत्मा का उत्क्रमण ही कैसे सम्भव है? यह एक नई विप्रतिपत्ति और उपस्थित हो जाती है । आत्मस्वरूप संदिग्ध, आत्मोक्रान्ति संदिग्ध । ऐसी दशा में आत्मपरलोकगति की मीमांसा क्या विप्रतिपन्न नहीं मानी जा सकती? ( ५ ) इसी प्रकार उत्क्रमण करने वाले संदिग्ध ग्रात्मस्वरूप के सम्बन्ध में अन्य कई एक विप्रतिपत्तियाँ ऐसी उपस्थित होती हैं, जिन्हें लक्ष्य में रखते हुए इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि वस्तुतः आत्मस्वरूप एकान्ततः संदिग्ध ही है । निम्नलिखित वचन पर दृष्टि डालिए-" यथाकारी यथाचारी तथा भवति । साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो भवति । पुण्यः पुण्येन कर्म्मरणा भवति, पापः पापेन । श्रथो खल्वाहुः - काममय एवायं पुरुष इति । स यथाकामो भवति, तत् ऋतुर्भवति, यत् ऋतुर्भवति, तत् कर्म कुरुते यत् कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते । ” ( वृ ० ग्रा ० उ ० ४।४।४–५ ) । " जैसी करनी, वैसी भरनी " इस लोकसूक्ति के अनुसार जो जैसा करता है, उसे वैसा फल भोगना पड़ता है । शुभकर्म करने वाला शुभ फल का, तथा अशुभ कर्म्म करने वाला अशुभ फल का अनुगामी बनता है । पुण्यजनक कर्म से उत्पन्न प्रात्मा पुण्यभाव में परिणत रहता है, पापजनककर्म्म से पापातिशय से युक्त रहता है । यह पुरुष काममय है, कामनाओं ( इच्छाओं ) का समुद्र है । यह जैसी कामना करता है, इसका ऋतु ( आभ्यन्तर व्यापार, प्राणव्यापारलक्षणतम ) तदनुरूप ही होता है । वस्तुतः मानससंकल्प का नाम ही ऋतु है । दूसरे शब्दों में मानससंकल्परूप कामना के अव्यवहितोत्तर काल में प्रक्रान्त प्राण-व्यापार ही ऋतु है एवं संकल्प ( काम ) से अनुगत ऋतु द्वारा होने वाले वाग्व्यापार लक्षण श्रम से उत्पन्न कर्मसिद्धि ही ' दक्ष ' है । इस प्रकार त्रिकल ग्रात्मा के मनःपर्व से कामना का प्रारणपर्व से ऋतु ( यत्न -चेष्टा - कोशिश ) का, एवं वाक्पर्व से दक्ष ( कर्म्म ) का स्वरूपं सम्पन्न होता है, जैसा कि - " स यदेव मनसा कामयते इदं मे स्यात् । इदं कुर्वीय इति, स एव ऋतुः । अथ यदस्मै तत् समृध्यते स दक्षः " ( शत. ४ । १ । ४ । १ ) इत्यादि ब्राह्मण श्रुति से प्रमाणित है । कामनानुगत ऋतु के अनुरूप कर्म का जैसा स्वरूप सम्पन्न होता है, उस कर्म का वैसा ही वासना संस्कार आत्मधरातल पर अन्तर्य्याम सम्बन्ध से प्रतिष्ठित हो जाता है । यही उक्त बृहदारण्यक श्रुति का तात्पर्य्यार्थ है । इसका निष्कर्ष यही है कि, आत्मा के साथ कर्म्मवासना संस्कार का सम्बन्ध होता है एवं इसी शुभाशुभ वासना संस्कार के तारतम्य से आत्मा को शुभाशुभ फलों का अनुगमन करना पड़ता 1 [ १६ ]

पृष्ठ 24

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 24 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड श्रात्मगतिविषये - प्रश्नपरम्परा मान लेते हैं । परन्तु यह मान्यता उस समय सर्वथा संदिग्ध बन जाती है, जब कि एक अन्य वचन की ओर हमारा ध्यान आकर्षित होता है । ध्यान दीजिए निम्नलिखित वचन किस प्रकार हमें उक्त कर्म्म-वासनालेप - सम्बन्ध में संदिग्ध बना रहा है— " स प्राण एवैष प्रज्ञात्माऽऽनन्दोजरोऽमृतः । न साधुनाकर्मणा भूयान्, नो एवासाधुना कर्म्मणा कनीयान् । एष लोकपालो, लोकाधिपतिः सर्वेश्वरः । स मे आत्मेति विद्यात् । " ( ब्र ० ४।४।२२ ) । लीजिए - प्राणात्मक हमारा ग्रात्मा न शुभ कर्म्म से समृद्धि को प्राप्त होता है, न अशुभ कर्म्म से इसका ह्रास ही होता । कर्म्मसंस्कार का आत्मा के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है । तुलना कीजिए इन दोनों सिद्धान्तों की । अवश्यमेव आत्मस्वरूप के सम्बन्ध में आपको सन्देह हुए बिना नहीं रहेगा । आत्मा का कर्म्मसंस्कार से कोई सम्बन्ध नहीं होता, इसी सिद्धान्त का निम्नलिखित वचन से और भी अधिक स्पष्टी -करण हो रहा है । देखिए -" स वा एष महानज श्रात्मा - योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु य एषोऽन्तहृ दये-श्राकाशः तस्मिञ्छेते । सर्वस्यवशी, सर्वस्येशानः, सर्वस्याधिपतिः । स न साधु-नाकर्मणा भूयान् नो एवासाधुनाकर्मणा कनीयान् । तदेतद् ऋचाऽभ्युक्तं " -एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य न वर्द्धते कर्म्मरणा नो कनीयान् । तत्येवे स्यात् पदवित्तं विदित्वा न लिप्यते कर्म्मणा पापकेन । ( बृ. आ. ४ । ४ । २२-२३ ) । और आगे बढिए । ' अविनाशी वा अयमात्मा अनुच्छित्तिधर्म्मा । मात्रासंसर्गस्त्वस्य भवति ' इत्यादि श्रुति जहाँ एक ओर नित्य - समरसेकमूर्ति आत्मा के साथ प्रज्ञा - प्राण - भूतमात्राओं का संसर्ग मान रही है, वहाँ दूसरी ओर " पुरुषस्तुपुष्करपलावन्निर्लेपः " इत्यादि प्राधानिक सिद्धान्त के अनुसार " असंङ्गोह्ययं पुरुषो, न सज्जते, न व्यथते न रिष्यति " इत्यादि श्रुति उसी श्रात्मा को मात्रासंसर्ग से एकान्ततः प्रसंस्पृष्ट बतलाती हमारे सन्देह को और अधिक पुष्ट कर रही है । निम्नलिखित वचन भी आत्मा के इस मात्रासंग-विरक्ति का ही समर्थन कर रहा है— " स एष विज्ञानात्मा सम्प्रसादे ( सुषुप्तौ ) वा, स्वप्नान्ते वा यत्तत्र किञ्चित्-. पश्यति, अनत्वागतस्तेन भवति । प्रसङ्गोह्ययं पुरुषः । " इति ( ६ ) अभी विश्राम न कीजिए । श्रुति कहती है- " सोऽयं पुरुषो जायमानः शरीरमभिसम्पद्यमानः पाप्मभिः संसृज्यते । स उत्क्रामन् म्रियमाणः पाप्मनो विजहाति । " ( बृ ० प्र ० ४ | ३ | ८ ) । तात्पर्य्य-[ १७ ]

पृष्ठ 25

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 25 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगति विषये - प्रश्नपरम्परा " आत्मा जब उत्पन्न दशा में आकर नवीन शरीर धारण करता है, उस समय वह पाप्मभावों से युक्त हो जाता है । एवं उत्क्रान्ति दशा में मरणानुगत वही आत्मा इन पाप्माओं को छोड़ देता है । " निष्कर्ष – जन्मकाल में जिन पाप्माओं का आत्मा के साथ सम्बन्ध होता है, मरणोत्तर आत्मा पुनः अपने विशुद्धरूप में आजाता । इस प्रकार केवल मृत्यु ही इसे मुक्त करने के लिए पर्याप्त है । जब शरीर त्यागान्तर शुद्धावस्था में आता हुआ ग्रात्मा मुक्त हो गया, तो इसकी परलोकगति, एवं शुभाशुभकर्मानुसारिणी परलोक मुक्ति का प्रश्न ही कहाँ रह जाता है । ( ७ ) आत्मा लोकान्तर में क्यों जाता है? इस आत्मगति का प्रधान कारण है - शुभाशुभ कर्म संस्कारानुसार तत्तच्छुभाशुभलोक विभूतियों का भोग | क्या उत्क्रान्त आत्मा में इन्द्रिय सहयोग सापेक्ष भोग साधन विद्यमान रहते हैं? जिनसे यह उन लोकभोगों का भोग कर सकता है? श्रुति कहती है-" स एष एव मृत्युर्य एष तवति एतस्मिन् मण्डले पुरुषः, यश्चायं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषः तस्य हैतस्य हृदयेपादावतिहितौ । तौ हैतदाच्छिद्योत्क्रामति । स यदोत्का-मति, अथ हैतत्पुरुषोम्रियते । एष उ 5 एव प्राणः तस्य स्वाः । स यदा स्वपिति, अथैनमेते प्राणाः स्वा पिपन्ति । स एतैः सुप्तो न कस्यचनवेद, नं मनसा संकल्पयति, न वाचान्नस्य रसं विजानाति, न प्राणेन गन्धं विजानाति, न चक्षुषा पश्यति, न श्रोत्रेण शृणोति । एतं स्येते तदा श्रपीता भवन्ति स एष एकः । " ( शत ० १०।५।२।१३ –१५ ) । सौरहिरण्यमय पुरुष माना गया है । यही हृदय में प्रतिष्ठित रहता हुआ अर्करूप से इसी दक्षिण क्षि सम्बन्ध से यह पुरुष जीवन, तथा मृत्यु, दोनों स्थितियों की मूल प्रतिष्ठा प्रवर्ग्यरूप से अध्यात्म संस्था में प्रतिष्ठित होकर उक्थ रूप से दक्षिणाक्षिगोल से प्रादेशामित प्रदेशपर्य्यन्त व्याप्त रहता है । ( आत्मा ) दाक्षिणाक्षिपुरुष, चाक्षुपुरुष इत्यादि नामों से व्यवहृत हुआ है । सौरहिरण्मयपुरुष अपने महतो महीयान् रूप से जहाँ रोदसी ब्रह्माण्ड में व्याप्त है, वहाँ यही अपने अणोरणीयानुरूप से हमारे हृत् प्रदेश में प्रतिष्ठित है । यही अन्तर्यामी नामक साक्षी सुपर्ण है । इस साक्षी सुपर्ण स्थान ( हृदयस्थान ) में ही इसके अभिन्नस्वरूप एतत्प्रवर्ग्यानारूप भोक्ता सुपर्ण नामक चाक्षुपुरुष प्रतिष्ठित रहता है । जब हृदयस्थ अन्तर्यामी हृत्प्रतिष्ठा छोड़ देता है, तो तदविनाभूत चाक्षुपुरुष भी शरीर से उत्क्रान्त हो जाता है । यही इसकी मृत्यु है । इस हृदयस्थ अन्तर्य्यामी सौरहिरण्मय के साथ तदंशभूत चाक्षुषपुरुष का दैनिक, साम्परायिक भेद से दो तरह से अप्यय सम्बन्ध हुआ करता है । सुषुप्तिकाल में सर्वेन्द्रिय सम्बन्ध से विमुक्त आत्मा हृदय में प्रतीत होता रहता है । इस अवस्था में ( सुषुप्ति में ) स्वपीति से सारे भोग सम्बन्ध तदपख्यापर्य्यन्त छूट जाते हैं । इसी हृदयावच्छिन्न अन्तर्य्यामी में ग्रात्म समर्पण कर जब यह आत्मा हृदय से सूर्य केन्द्र पर्य्यन्त वितत सुषुम्णा नाड़ी द्वारा उस परपुरुष में अपीत हो जाता है, तो यह इसकी साम्परायिकी अपीति कहलाती है । यही परमोत्क्रान्ति लक्षण महासुषुप्ति ( मृत्यु ) है । जिस प्रकार दैनिक [ १८ ]

पृष्ठ 26

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 26 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिर्विषये - प्रश्नपरम्परा सुषुप्ति में भोगसम्बन्ध का प्रभाव है, एवमेव इस साम्परायिकी सुषुप्ति में भी भोगसाधन इन्द्रिये वर्ग का प्रभाव है । उक्त शांतपथी श्रुति का यही निष्कर्ष है । इस निष्कर्ष से हमें इस निश्चय पर पहुँचना पड़ा कि, आत्मा से शरीर से निकल जाने पर उसके लिए न तो भोगसाधन ही रहते, न भोगसामग्री ही रहती । फिर भोगलोकानुगता आत्मगति का क्या अर्थ है? सचमुच यह एक विप्रतिपन्न समस्या बन रही है । ( 5 ) शरीर से आत्मा पृथक् है, यह एक दृष्टिकोण है । शरीर ही आत्मा है, यह एक दृष्टि-कोण है । शरीर भस्मान्त भी आत्मा नामक कोई नित्य पदार्थ बच रहता है, एवं वह लोकान्तर में गमन करता है, यह एक दृष्टि है एवं शरीर भस्मान्तर कुछ भी शेष नहीं रहता, फलतः आत्मगमन सिद्धान्त विशुद्ध कल्पना है, यह एक दृष्टि है । पहिला दृष्टिकोण प्रास्तिकों की प्रतिष्ठा है, दूसरा दृष्टिकोण नास्तिकों का मन्तव्य है । पहिले क्रमप्राप्त प्रास्तिक सम्मत ' अस्तीत्येके ' इस दृष्टिकोण की मीमांसा कीजिए । आस्तिक वर्ग का कहना है कि, सरवत् अपना स्वरूप सुरक्षित रखने वाला आत्मा अवश्य ही शरीर से पृथक् एक सत्तासिद्ध पदार्थ है, एवं स्थूल शरीर निधनान्तर अवश्य ही इसका जलवत् लोकान्त में गमन होता है । वर्षा ऋतु में जलपूर्ण सरोवर ग्रीष्म ऋतु में सूख जाता है । क्या सरोवर का जल ग्रीष्म ऋतु निमित्त से सर्वथा नष्ट हो गया? नहीं, अपितु मानना पड़ेगा कि सरोवर से उत्क्रान्त वाष्प-रूपावच्छिन्न यह जलमात्रा प्रान्तरिक्ष्य वायु के आधार से अवश्य ही आकाश के किसी न किसी प्रदेश में में प्रतिष्ठित हो जाता है । सौर नाड़ी द्वारा वायु संयोग से ही वाष्परूपानुगत जल का आरोहण होता है । पृथिवी तथा अन्तरिक्षोपलक्षित द्युलोक दोनों में इस प्रकार पार्थिव तथा दिव्य अहर्गणों द्वारा समान रूप से वृष्टि होती रहती है । अन्तर दोनों में केवल यही है कि, दिव्यलोकस्थ ( प्राकाशस्थ ) पानी आन्तरिक्ष्य पर्जन्यवायु ( मानसून ) द्वारा पृथिवी पर आता है । एवं पार्थिव पानी पार्थिव अग्नि के सहयोग लोक में जाता है । 9 पार्थिव अग्नि ही सौराग्नि समन्वय से पार्थिव जलों को वास्मरूप में परिणत पृथिवी से ऊपर की ओर ले जाता है । ' धामङ्गिरसो ययुः ' इत्यादि मन्त्रवर्णनानुसार पृथिवी से द्यलोक की ओर जाता हुआ अङ्गिरोऽग्नि वाष्पवस्थापन्न पार्थिव पानी को द्युलोक में ले जाते हैं । वहाँ जाकर यह पानी अन्तरिक्ष्य वायु धरातल में प्रतिष्ठित हो जाते हैं । यही इनका गर्भाधान काल है । पूरे ७॥ महिनों तक यह पानी उस वायु धरातल पर प्रतिष्ठित रहते हैं । अनन्तर जब कि आदित्य अपनी रश्मियों से पर्यावर्त्तन करते हैं, ७ ॥ मासान्तर पर्जन्यवायु के प्रत्याघात से ' न मुञ्चति ' लक्षण जलावरोधक नमुचि नामक असुर प्राण के शैथिल्य से पुनः वह पानी स्थूल रूप में परिणत होते हुए भूमि को ग्राप्लावित कर देते हैं । $ " नाड्यौ वायुसंयोगादारोहणम् । " " समानमेतदुदकमुञ्चेत्यवचाहभिः । भूमि पर्जन्याजिन्वन्ति दिव जिन्वन्त्यग्नयः ॥ ” $ नर्वा इतो वृष्टिमुदीरयति, मरुतः सृष्टां नयन्ति । यदा खल्वसावादित्योन्यङ्-रश्मिभिः पय्र्यावर्त्तते, अथ वर्षति । "

अष्टाधृतं गर्भ भास्करस्य गभस्तिभिः ।

रसः सर्वसमुद्राणां द्यौः प्रसूते रसायनम् ॥

[ १६ ]

पृष्ठ 27

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 27 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड श्रात्मगतिविषये - प्रश्नपरम्परा wwwwwww ठीक इसी प्रकार स्थूल शरीर परित्यागान्तर सूक्ष्म शरीर धारण कर यह आत्मा भी प्रान्तरिक्ष्य प्राणाग्नि, प्राणवायु, प्राणसोम, प्रारणादित्य आदि में से किसी न किसी लोक में ही प्रतिष्ठित हो जाता है । अवश्य ही जलवत् इसका लोकान्तर गमन होता है, एवं जलवत् यह अपने सुसूक्ष्म रूप से लोकान्तर प्रतिष्ठित रहता है । जीवित दशा में जो आत्मा तत्त्व सर्वथा सलक्षण बना रहता है, उसका अलक्षण शरीर निधन पर भी असद्भाव नहीं माना जा सकता । क्यों कि - ' नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ' इत्यादि गीता सिद्धान्त के अनुसार सत् का कभी प्रभाव नहीं होता एवं असत् कभी भावरूप में परिणत नहीं होता । स्वयं श्रुति ने भी निम्नलिखित शब्दों में इसी सुव्यवस्थित सदसद् द्वन्द्व का समर्थन किया है— " अन्नेव स भवति श्रसद् ब्रह्म ेति वेद चेत् । अस्ति ब्रह्मेति चेद् वेद, सन्तमेनं ततो विदः ॥ ” ( तै ०० २ । ६ । ५ ) । एक दूसरा नास्तिक दल इस सम्बन्ध में आत्मा को रथवत् मानता हुआ इसे उच्छित्तिधर्म्मा बतला रहा है । उसका कहना है कि, अपनी वास्तविक दशा से युक्त एक ' रथ ' के चक्र, प्रउग, इषा, कस्तम्भी आदि सम्पूर्ण अवयव शरणमयसूत्र से चारों ओर से परस्पर बद्ध रहते हुए रथ स्वरूप में परिणत हो रहे हैं । इस शरणसूत्रबन्धन से एकत्र समन्वित रथावयवों में एक अपूर्व बल उत्पन्न हो रहा है । वही अपूर्व तात्कालिक संयोगज - वल ' रथ ' नामक ' अवयवी ' है । रथावयवों से पृथक् ' रथ ' नामक कोई स्वतन्त्र अवयवी नहीं हैं । जब वह शरणसूत्रबन्धन शिथिल हो जाता है, अथवा उच्छिन्न हो जाता है, तो उसी क्षण रथा-वयवों का पारस्परिक समन्वय उच्छिन्न हो जाता है । फलतः अवयंवी रथ का स्वरूप भी तत्काल ही उच्छिन्न हो जाता है । ठीक यही रथदशा आत्मदशा के सम्बन्ध में घटित है । पृथिवी - जल - तेज -- वायु -आकाश, इन पाँचों भूतों के विकारलक्षण हस्त पाद - शिर - उर- उदर आदि श्रवयव वायुंसूत्र से चारों ओर से वेष्टित होकर परस्पर समन्वित रहते हैं । वायुसूत्रवेष्टन से समन्वित इन शरीरावयों में समन्वय द्वारा तात्कालिक एक अपूर्व प्रज्ञान बल उसी प्रकार उत्पन्न हो जाता है, जैसे कि भिन्न - भिन्न औषधि मात्राओं के एक पात्र में समन्वित होने से उनकी समष्टि में एक अपूर्व बल उत्पन्न हो जाता है । यही अपूर्व बल ' प्रज्ञानात्मा ', किंवा आत्मा नामक अवयवी रूप से व्यवहृत होने लगता है । परन्तु विश्वास कीजिए रथवत् यह प्रज्ञान उन शरीरावयों से कोई पृथक् नित्य अवयवी नहीं है । वायुसूत्रबन्धन के श्लथ होते ही शरीरा-वयों का समन्वय उच्छिन्न हो जाता है । तत्काल समन्वयसिद्ध प्रज्ञान बल भी उच्छिन्न हो जाता है । फलतः शरीरनिधन ही आत्मनिधन है । यही आत्ममुक्ति है । इस प्रकार प्रेतभाव के सम्बन्ध में निम्नलिखित रूप से हमारे सामने परस्परात्यन्तविरुद्ध दो विचिकित्सा उपस्थित हो रही । नहीं कह सकते, दोनों में कौनसा पक्ष ग्राह्य, तथा प्रामाणिक है । इस विचिकित्सा की दृष्टि से आत्मोत्क्रान्ति का विषय ही जब कि संदिग्ध बन रहा है, तो श्रात्मोत्क्रान्ति को मूल बना कर प्रक्रान्त होने वाली आत्मगति कैसे निभ्रान्त कही जा सकती है -[ २० ]

पृष्ठ 28

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 28 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिविषये - प्रश्नपरम्परा " येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्यऽस्तीत्येके, नायमस्तीति चैके " ( कठ ० १।२० ) । १ - प्रस्तीत्येके - " भूतेषु भूतेषु विचित्यधीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति । ( केन ० २२५ ) । " अथ खलु ऋतुमयः पुरुषः यथा ऋतुरस्मिल्लोके पुरुषो भवति, - तथेतः प्रेत्य भवति ' ( छा ० ३।१४ । १ ) । " एष म आत्मानन्तर्ह दये, एतद् ब्रह्म एतमितः प्रेत्यभि सम्भ-वितास्मि इति यस्यस्यादद्धा, न विचिकित्सास्ति इति ह स्माह . शाण्डिल्यः । " ( छां ० ३।१४।४ ) । २- नायमस्तीतिचैके - " यथा सैन्धवखिल्य उदकेप्रास्त उदकमेवानुविलीयते, न हास्योद्ग्रहणयेवस्यात् । यतो यतस्त्वाददीत, लवणमेव । एवं वा अरे इदं महद्भूतमनन्तमपारं विज्ञानघन एव एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रत्य संज्ञास्ति । " ( बृ ०० २।४।१२ ) । " वायुर्वे गौतम तत् सूत्रम् । वायुना वै गौतम सूत्रेरणायं च लोकः, परश्वलोकः, सर्वारिण च भूतानि संदृब्धानि भवन्ति तस्माद्वै गौतम पुरुषं प्र ेतमाहुः - व्यस्त्र सिषतास्याङ्गानि, इति । वायुनाहि गौतम सूत्रेण संरब्धानि भवन्ति । ” ( वृ ०० ३।७।२ ) । --( 2 ) दूसरी दृष्टि से प्रेत - विचिकित्सा का समन्वय कीजिए । मान लेते हैं, पाञ्चभौतिकशरीर से ' प्राण ' नामक पृथक् श्रात्मतत्त्व है । इस प्राणात्मा के सम्बन्ध में प्रश्न उपस्थित होता है कि पाच-भौतिक शरीर के निधनान्तर यह प्राणात्मा शरीर से निकल कर लोकान्तर में उत्क्रमण करता है? अथवा भूतों की तरह भूतों के साथ - साथ यहीं विलीन हो जाता है । इस प्रेतविचिकित्सा के सम्बन्ध में भी प्राप्त होने वाले ' ना- हाँ ' इन दो उत्तरों से आत्मगतिविषयक प्रश्न संदिग्ध ही बन रहा है । प्राणलक्षण आत्मा का उत्क्रमण नहीं होता, अपितु वह यही तत्काल शरीर निधन के साथ ही विलीन हो जाता है, यह एक समाधान है, जिसका निम्नलिखित वचन से समर्थन होता है— [ २१ ]

पृष्ठ 29

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 29 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिविषये पश्नपरम्परा " याज्ञवल्क्येति होवाच - यत्रायं पुरुषो म्रियते 1 उदस्मात् प्रारणाः - क्रामन्ति, श्रहो इनेति? ' नेति ' होवाच याज्ञवल्क्यः । अत्रैवसमवनीयन्ते । स उच्छ्वयति, मायति, आध्मात मृतः इति । " ( वृ ०० ३।२।११ ) । " प्राणलक्षणमात्मा का शरीर निधन के अनन्तर लोकान्तर गमन के लिए चक्षु, मस्तक, पाद, हस्त, आदि किसी न किसी शरीरावय से उत्क्रमण होता है " इस विरुद्ध सिद्धान्त को निम्नलिखित वचन से समर्थन प्राप्त है ---" तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते । तेन प्रद्योतेनैष श्रात्मा निष्क्रामति-चक्षुष्टोवा, मूर्ध्नावा, अन्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यः तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति । प्राणमनुत्क्रामन्तं सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति । ” ( बृ ० आ ० ४।४।२ ) । दोनों ही पक्ष शास्त्रीय पक्ष हैं, एतएव दोनों ही प्रामाणिक, किन्तु परस्पर सर्वथा विरुद्ध हैं । बतलाइए ऐसी परिस्थिति में क्या किया जाय? ( १० ) अपनी स्वाभाविक प्रास्तिकभावना के अनुग्रह से हम मान लेते हैं कि, प्राणलक्षण आत्मा मर्त्यशरीर से भिन्न अनुच्छित्तिधर्म्मा नित्य पदार्थ है । यह भी मान लेते हैं कि, शरीरनिधनानन्तर इसका लेने चक्षु, शिर, हस्त, पादादि किसी शरीरावयव से लोकान्तर में उत्क्रमण होता है । यह सब कुछ मान पर भी विप्रतिपत्ति के सर्वथा निराकरण का उपाय उपलब्ध होता दिखाई नहीं देता । स्वयं ' उत्क्रमण ' विचिकित्सा से युक्त हो रहा है । एक स्थान पर इस सम्बन्ध में हमें यह सिद्धान्त सुनना पड़ता है कि— मन " जिस समय प्राणात्मा इस भौतिक शरीर को छोड़ता है, उस समय जिस प्रकार क्षरणमात्र में हमारा जीवित दशा में विदूर से विदूर लोक में पहुँच जाता है, एवमेव उत्क्रान्त यह ग्रात्मा क्षणमात्र में आदित्य-लोक में पहुँच जाता है । " देखिए! “ अथ यत्रैतदस्माच्छरीरादुत्क्रामति प्रथैतैरेवरश्मिभिरुर्ध्वमाक्रमते । समिति वा, होद्वा मीयते । स यावत् क्षिप्येन्मनः, तावदादित्यं गच्छति । " ( छा ० उ ० ८।६।५ ) | उधर एक ओर वही श्रुतिशास्त्र इस उत्क्रान्ति के सम्बन्ध में अपना यह निर्णय प्रकट कर चलते रहा है कि- " जो भी प्राणी पाञ्चभौतिक शरीर त्यागान्तर इस पृथिवीलोक को छोड़ कर यहाँ से आगे प्रयन्ति, हैं, उन सबको निश्चयेन चन्द्रलोक में जाना पड़ता है । " इस प्रकार ' ये वै केचास्माल्लोकात् चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति " ( कौ ० उ ० १।२ ) इत्यादि वचन पूर्व सिद्धान्त का प्रतिद्वन्द्वी बनता हुआ हमें संदिग्धावस्था में परिणत कर रहा है । [ २२ 1

पृष्ठ 30

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 30 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड आत्मगतिविषये - प्रश्नपरम्परा ( ११ ) इसी उत्क्रान्ति के सम्बन्ध में अन्वेषण करने पर और भी कई एक ऐसे विरुद्ध सिद्धान्त उपलब्ध होते हैं, जिनके रहते आत्मगति सम्बन्ध में ' इदमित्यमेव ' रूप से निर्णय करना असम्भव बन जाता है । ' इस लोक से उत्क्रान्त आत्मा किस क्रम से गतिमार्गों का अनुसरण करता हुआ लक्ष्य पर पहुँचता है? ' प्रश्न का समाधान करती हुई श्रुति कहती है- " जब पुरुष ( पार्थिव शरीर त्यागान्तर सूक्ष्म शरीर धारण कर ) इस पृथिवीलोक से उत्क्रान्त होता है, तो ( सर्व प्रथम ) वह वायु में आता है । श्रागत - आत्मा के लिए वह वायुस्तर उसी प्रकार इसे अपने भीतर से ( मागे जाने के लिए ) मार्ग दे देता है, जैसे रथचक्र में आकाशात्मक छिद्र रहता है । इसी वायुच्छिद्र से यह आत्मा आदित्यस्तर में आता है । यह भी इसे आगे बढ़ने के लिए ) लम्बर ( ढोलक ) छिद्रपरिमाणवत् मार्ग दे देता है । इसी आदित्यच्छिद्र से यह आत्मा चन्द्रलोक में पहुँचता है । यह भी इसे दुन्दुभि ( नगाड़ा ) छिद्रसमतुलित मार्ग दे देता है । यहाँ से भी ऊर्ध्व आक्रमण करता हुआ अशोकमहिम ( एतन्नामक ' अपुनर्भार ' नाम से प्रसिद्ध पारमेष्ठ्य ) लोक में पहुँच जाता है, एवं यहाँ अनन्तकाल के लिए प्रतिष्ठित हो जाता है " इस अर्थ का स्पष्टीकरण वाले निम्नलिखित वचन को पहले लक्ष्य बनाइए— " यदा वै पुरुषोऽस्माल्लोकात् प्रैति स वायुमागच्छति । तस्मै स तत्र ' विजिहीते यथा रथचक्रस्य खम् । तेन स ऊर्ध्वं श्राक्रमते स श्रादित्यमागच्छति । तस्मै स तत्र विजिहोते, यथा लम्बरस्य खम् । तेन स ऊर्ध्व श्राक्रमते, स चन्द्र-मसमागच्छति । तस्मै स तत्र विजिहीते, यथा दुन्दुभेः खम् । ते न स ऊर्ध्व श्रक्रमते । स लोकमागच्छति अशोकमहिमम् । तस्मिन् वसति शाश्वतीः समाः । ” ( बृ ०० ५।१०।१ ) । यही श्रुतिशास्त्र उत्क्रान्ति के सम्बन्ध में उक्त निर्णय से भिन्न निर्णय प्रकटता हुआ कहता है— " शरीर का शव्य ( दाह ) कर्म किया जाय, अथवा न किया जाय, दोनों ही दशाओं में यह प्रेतात्मा सर्वप्रथम अर्चि - मार्ग में आता है । अचिमण्डल से ग्रहमण्डल में, अहमण्डल से शुक्लपक्षमण्डल में, यहाँ से षड्मासात्मक उत्तरायणमण्डल में, यहाँ से सम्वत्सरमण्डल में, यहाँ से प्रादित्यमण्डल में, यहाँ से चन्द्रमण्डल में, यहाँ से विद्यन्मण्डल में पहुँचता है । यही वैद्य तपुरुष प्रमानव पुरुष है । इसी के आकर्षण से वह प्रेतात्मा विद्य ुल्लोक में आकर स्वयमपि मृत्युधम्र्मों से एकान्ततः विमुक्त होता हुआ ' अमानवपुरुष रूप में परिणत हो जाता है । यही देवमय है, यही ब्रह्मपथ । इस मार्ग द्वारा ( श्रमानव विभूतिप्रवर्त्तक ) विद्य ुलोक में आने वाले प्रेतात्मायों को पुनः मानव शरीर में जन्म नहीं लेना पड़ता । " इस गतिभाव का समर्थन करने वाले निम्नलिखित वचनों भी लक्ष्य बनाइए -" अथ यदु चैवास्मिन् शव्यं कुर्वन्ति, यदि च न - प्राचिषमेवाभिसम्भवति । चिषोऽहः, अह्न आपूर्यमाणपक्षं, आपूर्यमाणपक्षात्- यान् षडुदङ ङति मासान्, [ २३ ]