Part IV Atmgativigyanopanishta Part 4 — पृष्ठ 121–130
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४ · पृष्ठ 121–130
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड श्रात्मगतिनिमित्तानि ( आकारभेद ) ही पदार्थ भेद प्रतीति का कारण है । इसी छन्दोभेद से वह एक नाना रूप में परिणत हो रहा है । इसी छन्दोऽनुगता भातिभेद ने तदवच्छिन्न अस्तितत्त्व के भेद को सुरक्षित रख रक्खा है । जिस क्षरण छन्दोरूप यह समस्त भातिभेद उच्छिन्न हो जाता है, विशुद्ध - प्रखण्ड सत्तातत्त्व रह जाता है, जो कि नाम - रूप - कर्मात्मक वयोनाध से प्रतिक्रान्त होता हुआ वाङ्मनसपथातीत बन जाता है, अगोचर बन जाता है । प्रच्छन्दस्क - भातिभेदविरहित इसी सत्तासामान्य का नाम ' ब्रह्म ' है, जैसा कि, निम्नलिखित वचन से स्पष्ट है-" प्रत्यस्ताशेषभेदं यत् सत्तामात्रमगोचरम् । वचसामात्मसंवेद्यं तज्ज्ञानं ब्रह्मसंज्ञितम् ॥ ” एक ही सत्तालक्षरण ब्रह्म अनेक क्यों बन गया? एक ही वय अनेक वय रूप में परिणत क्यों हो गया? इस प्रश्न का एकमात्र उत्तर यही वयोनाधलक्षण छन्दः पदार्थ है, जिसके वैज्ञानिकों ने मा, प्रमा, प्रतिमा, त्रिवि, गायत्री, त्रिष्टुप् जगति, अनुष्टुप् बृहती, पंक्ति, उष्णिक आदि सहस्रों भेद माने हैं । लोकभाषा में जिसे ' ढंग ' कहा जाता है, वही छन्दः पदार्थ है । यह ढंग स्वाभाविक, आगन्तुक भेद से दो भागों में विभक्त है । जन्म से मृत्युकाल पर्य्यन्त नियतरूप से प्रवाहित रहने वाला ढंग स्वाभाविक है, एवं क्षरण - क्षरण बदलने वाला ढंग श्रागन्तुक है । स्थूल शरीर प्रत्यगात्मा में स्वाभाविक ढंग ( छन्द ) है, एवं अवस्था परिवर्तनलक्षण ढंग प्रागन्तुक है । प्रत्येक पदार्थ धारावाहिक बलानुगत स्वाभाविक बाह्याकार लक्षण स्वाभाविक छन्द से आमरणान्त युक्त रहता हुआ परिस्थितिवश प्रागन्तुक आकार लक्षण कृत्रिम छन्दों का ग्रहण - परित्याग करता रहता है | शरीरापेक्षया व्यक्ति स्वाभाविक छन्दोऽनुवर्त्ती है, परन्तु कभी इसका बाह्याकार विकसित रहता है, कभी मुकुलित, कभी स्वस्थ, कभी रोगाक्रान्त । इन बाह्य परिस्थि तियों के सम्बन्ध से इसका यह आगन्तुक छन्द बदलता रहता है । आगन्तुक छन्द परछन्द है, स्वाभाविक छन्द ' स्वछन्द ' है । स्वच्छन्द इस वयलक्षण आत्मा का स्वधर्म है । परच्छन्द श्रात्मा का परधर्म्म । परधर्म लक्षण परछन्द जब तक आत्मा के स्वधर्मलक्षण स्वच्छन्द पर कोई आक्रमण नहीं करता, तब तक तो वह आगन्तुक परच्छन्द श्रागन्तुक धर्म है, एवं वही श्रागन्तुक धर्म्म ( परधर्म्म ) आत्मच्छन्द का नाशक बनता हुआ अधर्म्म बन जाता है । इस प्रकार परिस्थितिवश यह परछाद धर्म - अधर्म भावों का प्रवर्त्तक बनता हुआ भयप्रवृत्र्तक बन रहा है - ' परधम्र्मो भयावहः ' । वय - वयनाथ के समन्वितरूप लक्षण वयुन की मर्यादा से वह उत्क्रान्त प्रत्यगात्मा भी युक्त है । अवश्य ही पदार्थधर्म्म सामान्यलक्षण वयुन मर्यादा से भी वह भी नित्य प्राक्रान्त है । प्रवश्य ही उसमें भी वयलक्षण आत्मा तथा वयोनाधलक्षण शरीर ( छन्द ) दोनों का समन्वय है । बाह्याकारलक्षण शरीर-रूप इस छन्द के बिना इसकी स्थिति असम्भव है । मानना पड़ेगा कि, लोकान्तर जाने वाला यह प्रेतात्मा भी अपने स्थूलशरीररूप पूर्व छन्द का परित्याग कर अवश्य ही किसी अन्य छन्द से युक्त रहता है । कर्म्म– नाड़ी - वत् छन्द भी अवश्य ही प्रेतात्मा की परलोकगति ( आत्मगति ) का निमित्त बन रहा है । प्रश्न [ ११२ ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड श्रात्मगतिनिमित्तानि स्वाभाविक है कि, उत्क्रान्त उस प्रेतात्मा का जो कम्र्मानुगता शारीरनाड़ियों से उत्क्रान्त होकर परलोक-गमन के लिए सन्नद्ध है, उसके इस निमित्तभूत छन्द का क्या स्वरूप है? सामान्यतः इस प्रश्न का उत्तर ' सूक्ष्मशरीर ' से दिया जाता है । जीवितदशानुगता गति का निमित्त भूतछन्द जैसे स्थूलशरीर है, वैसे मृत्युदशानुगता गति का निमित्त भूतछन्द सूक्ष्मशरीर है । सूक्ष्मशरीरात्मक इस छन्द के कम्र्मानुसार दो विवर्त्त हो जाते हैं, एवं उन दोनों विवर्त्तो का स्पष्टीकरण ही प्रकृत परिच्छेद का निरूपणीय विषय 1 श्राध्यात्मिक संस्था से सम्बन्ध रखने वाले इस छन्द पदार्थ को कामछन्द, कामछन्द भेद से दो भागों में विभक्त माना जा सकता है । जो पुरुषपुङ्गव यावज्जीवन निष्कामकर्म्मलक्षण ' बुद्धियोग ' का अनुष्ठान करते हैं, उनका प्रत्यगात्मा अनासक्ति के प्रभाव से कर्म्मजनितसंस्कारले पबन्धन से विमुक्त रहता हुआ शरीर में रहता हुआ भी शरीरबन्धन से विमुक्त रहता है । प्रकाममयमान ऐसे जीवन्मुक्त पुरुषद्यौरेय ही ' निष्काम-कर्मयोगी ' कहलाए हैं । स्थूल सूक्ष्म - कारण तीनों में से कोई सा भी छन्द इनके आत्मा को परतन्त्र नहीं बना सकता । श्रतएव ये ' विदेह ' कहलाए हैं । इन विदेह आत्माओं का छन्द व्यापक आकाश है । यह आकाशच्छन्द ही इनका अकामछन्द है, जो परलोकगति से कोई सम्बन्ध नहीं रखता है । जिस प्रकार समुद्र ही समुद्र का अपना छन्द है, अतएव समुद्रछन्द नाममात्र के लिए छन्द रहता हुआ भी अच्छन्द है, एवमेव इन प्रकामयमान पुरुषों का अपना छन्द ( आकाश ) असीम है, सत्यसंकल्प - भालक्षण - प्रकाशात्मा ही इनका अपना छन्द है, अतएव यह अकामलक्षण आकाशछन्द नाममात्र के लिए छन्द कहलाता हुआ भी वस्तुगत्या अच्छन्द है । यही अच्छन्दलक्षण आकाशच्छन्द ( समुद्र छन्द ) इस मुक्तात्मा की सद्योलक्षणा स्थाना-न्तरगमनलक्षणा- अत्रैवसमवलयरूपा मुक्तिगति का निमित्त बनता है । यही प्रकामयमान आत्मानुगत पहले अकामच्छन्द का संक्षिप्त स्वरूप परिचय हैं । दूसरा कामच्छन्द है । उत्थाप्याकांक्षासहकृत कम्र्मों से उत्पन्न संस्कारलेप अवश्य ही हृद्ग्रन्थि का प्रवर्तक बनता हुआ शरीरबन्धन का कारण बनता है । अवश्य ही ऐसे कामकामी पुरुषों का कामासक्त ( विषयासक्त ) प्रत्यगात्मा किसी न किसी शरीरछन्दोबन्धन से युक्त होकर ही लोकान्तरगमन करता है । इन कामयमान संसारी पुरुषों की कामना से सम्बद्ध आत्मगतिनिमित्तकछन्द ही दूसरा कामच्छन्द है । कर्मानुसार इस कामच्छन्द के प्रधानतः दो विवर्त्त माने गए हैं । यदि कामात्मा के प्राज्ञभाव में विद्यासमु-च्चितप्रवृत्तिकर्म्म ( यज्ञ - तप - दान ) संस्कार का प्राधान्य है, तो इसका प्रारणभाग प्रबल रहता । इस प्राणप्राधान्य से श्रात्मगतिनिमित्तक स्थूलशरीररूप छन्द भी प्राणात्मक ( प्राणात्मक - भूगर्भितप्राणरूप ) ही होता है । यही प्राणच्छन्द ( प्राणप्रधान सूक्ष्मशरीर ) इसका ' देवच्छन्द ' है । यही देवच्छन्द छन्दोलक्षण ' देवयानः पन्थाः ' है । इस देवयानः पन्था लक्षण देवच्छन्द से छन्दित कामात्मा देवयान मार्ग को ही अपना लक्ष्य बनाता है । यदि प्राज्ञभाग में विद्यानिरपेक्षप्रवृत्तिसत्कर्म्मा ( इष्ट - प्रापूर्त - दत्त ) संस्कार का प्राधान्य है, तो इस प्राज्ञ का वाग्भाग ( भूतभाग ) प्रबल रहता है । इस वाक् - प्राधान्य से श्रात्मग तिनिमित्तक सूक्ष्मशरीररूप छन्द भी वागात्मक ( भूतात्मक - प्राणगर्भित वाग्रूप ) ही होता है । यही वाक्छन्द ( भूत-प्रधानसूक्ष्मशरीर ) इसका ' पितृच्छन्द ' है । यही पितृच्छन्द छन्दोलक्षण ' पितृयाणः पन्थाः ' है । इस पितृयाण पन्थालक्षण पितृच्छन्द से छन्दित कामात्मा आधिदैविक पितृयाणमार्ग को ही अपना लक्ष्य बनाता है । इस प्रकार कर्म्मभेद से प्रबल बने हुए आत्मगत प्राण - वाक् भागों की प्रधानता - अप्रधानता से आत्मगति-[ ११३ ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड आत्मगतिनिमित्तानि निमित्तक कामच्छन्द देवच्छन्द, पितृच्छन्द भेद से दो भागों में विभक्त हो जाते हैं । देवच्छन्द देवयानः पन्थाः है, पितृच्छन्द पितृयारण पन्थाः है । सौरदिव्यप्राण ही प्राण है, एवं पार्थिव भूतभाग ही वाक् है यह सौरप्राण तथा पार्थिवीवाक् दोनों दो - दो भागों में विभक्त हैं । सूर्योर्ध्वप्राण अमृतप्रारण है, यही आत्मप्राण है, एवं प्रात्यन्तिकरूप से प्रसङ्ग है । पृथिव्यनुगत सूर्य्याधः प्राण मर्त्यप्राण है, यही देवप्रारण है, पृथिव्यनुगति से अनुशयरूप से इसमें . भूतानुशय का सम्बन्ध रहता है । इस प्रकार ऊर्ध्व - अधः भेद से देवप्राणलक्षण सौरप्राण के अमृतप्रधान आत्मप्राण, मृत्युप्रधान देवप्राण, ये दो विवर्त्त हो जाते हैं । विद्यासमुच्चितनिवृत्तिकर्म्म, विद्यानिरपेक्ष-निवृत्तिकर्म्म, लौकिक निवृत्तिकर्म्म, इन त्रिविध निवृत्तकम्मों के अनुगामी प्राज्ञ प्रात्मा में ( प्रवर्ग्यरूप से • आगत- सौर ) आत्मप्राण का ही प्राधान्य रहता है । फलतः इनका आत्मगतिनिमित्तक छन्द ( सूक्ष्मशरीर ) भी आत्मप्रारूप ( देवप्राण - भूतगर्भित आत्मप्राणरूप ही रहता है । यही आत्मप्रारणलक्षण देवच्छन्द इन निवृत्तिकर्मानुगत प्रेतात्माओं का देवप्राणच्छन्दोलक्षण देवयानमार्गभुक्त छन्दोलक्षण ' ब्रह्मपथ ' है । ब्रह्मपथात्मक यही आत्मप्राणलक्षण देवच्छन्द इन निवृत्तकम्मियों की क्रममुक्तिगतिलक्षण मुक्ति का निमित्त बनता है । सूर्य्याधो लक्षण देवप्राण पृथिव्यनुगति से भूतानुगत है । विद्यासमुच्चितप्रवृत्तिकर्म से ( प्रवर्ग्यरूप से अध्यात्म में मुक्त सौर ) देवप्राण का ही प्राधान्य रहता है । फलतः इसका आत्मगतिनिमित्तकछन्द ( सूक्ष्मशरीर ) भी देवप्राणरूप ( आत्मप्रारण तथा भूतगर्भित देवप्राणरूप ) ही रहता है । यही देवप्राणलक्षण देवच्छन्द इन प्रवृत्तिकर्मानुगत प्रेतात्माओं का देवप्राग छन्दोलक्षण देवयानमार्गभुक्त छन्दोलक्षणं. ' देवपथ ' है । देवपथात्मक यही देवप्राणलक्षरण वि ० सा ० प्रवृत्तिकम्मियों की देवसर्गगति का निमित्त बनता है । आत्मप्राणलक्षण देवच्छन्दोनिमित्तभूता क्रममुक्ति में अपुनरावर्तन है, एवं देवप्राणलक्षण देवच्छन्दो . निमित्तभूता देवस्वर्गगति में - ' क्षीणेपुण्ये मर्त्यलोके वसन्ति के अनुसार पुनरावर्त्तन है । तात्पर्य कहने का यही है कि देवच्छन्दोलक्षण देवयानः पन्था में ही आत्मप्राण, देवप्राण भेद से ब्रह्मपथ, देवपथ, नामक दो छन्द प्रतिष्ठित हैं । अब पार्थिव वाग्भाग को लक्ष्य बनाइए । पृथिवी के अदिति, दिति भेद से दो विवर्त्त माने गए हैं । जो भू - भाग सूर्य की ओर रहता है, वह सौरज्योति से युक्त रहता हुम्रा अदिति नाम से प्रसिद्ध है, एवं सूर्य्यविरुद्ध दिगनुगत तमः प्रधान भू - भाग दिति है । विद्यानिरपेक्ष इष्टापूर्त्तादिलक्षण प्रवृत्तिकर्म का अदिति से सम्बन्ध है, अतएव इन्हें ' प्रदितिकर्म्म ' कहा गया है, एवं निरर्थक - विरुद्ध स्वार्थ इन तीन लौकिक प्रवृत्तिक कादितिभाग से सम्बन्ध है, अतएव इन्हें ' दिति कर्म ' कहा गया है, जैसा कि गीताभूमिकान्तर्गत ' कर्मयोग-परीक्षा ' में विस्तार से प्रतिपादित है । प्रदितिकर्म्म भी वाङ्मय हैं, दितिक भी वाङ्मय हैं । ' पितरो वाक्य मिच्छन्ति ' - ' मर्त्याः पितरः ' इत्यादि के अनुसार पितृतत्त्व मर्त्यवाक् प्रधान है । अतएव इन उभय-विधकर्म्मो को पितृयाणः पन्थाः ' कहा जा सकता है । अदिति पृथिवी से सम्बद्ध विद्यानिरपेक्ष प्रदितिलक्षण ... वाङ्मयकर्म संस्कार से अध्यात्म में अदिति प्राणात्मक ज्योतिर्लक्षण वाक्भाग की प्रधानता रहती है । इसकी प्रधानता से प्रेतात्मा के वाङ्मय - पितृयागः पन्थात्मक सूक्ष्मशरीर में ज्योतिर्लक्षणवाक् भाग ( तमोलक्षण वागूगर्भित ज्योतिर्म्मयीवाक् ) की प्रधानता रहती है । यही छन्दोलक्षण ' पितृपथ ' है, यही आधिदैविक पितृपथ द्वारा पितृस्वर्गगति का निमित्त बनता है । एवमेव यदि अध्यात्म में दिति पृथिवी से सम्बद्ध दिति-[ ११४ ]
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• श्राद्ध विज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि प्राणात्मक तमोलक्षण निरर्थक - विरुद्ध - स्वार्थकम्मों का संस्कार प्रतिष्ठित रहता है, तो आध्यात्मिक तमोमय वाग्भाग विकसित हो जाता है । इससे प्रेतात्मा के सूक्ष्मशरीर का भी तमोमय वाग्भाग ( ज्योतिर्मय वाग्गर्भित वाग्भाग ) प्रधान बन जाता है । यही छन्दोलक्षण ' यमपथ ' है, यही आधिदैविक यमपथ द्वारा नरकगति को निमित्त बनता । इस प्रकार अदिति - दिति भेद से पार्थिव वाक्भागरूप पितृयाणः पन्था में पितृपथ - यमपथ भेद से दो छन्दोविवर्त्त हो जाते हैं । देवयानः पन्थाः पितृयारणः पन्थाः - * १ - सूर्य्योर्ध्वप्राणानुगत आत्मप्राणः ब्रह्मपथः ( श्रात्मप्राणच्छन्दः ) २- सूर्य्याधः प्राणानुगत देवप्राणः - + देवपथ: ( देवप्रागच्छन्द ) - * १ - प्रदितिवागनुगतः + ज्योतिर्मयीवाक् + पितृपथ: ( ज्यो ० वाक् छन्दः ) २ - दितिवागनुगतः - * - +तमोमयीवाक्- -- + यमपथः ( त ० वाक् छन्दः ) → देवच्छन्दः १ + पितृच्छन्दः २ कामच्छन्दः इस प्रकार गतिनिमित्तक वयोनाधलक्षण - कामच्छन्दोरूप सूक्ष्मशरीर के आरम्भ में दो विवर्त्त हो जाते हैं । आगे जाकर प्रारणद्वयी, वागद्वयी से प्रत्येक के दो - दो विवर्त हो जाते हैं, जिनकी मूलप्रतिष्ठा एकमात्र कर्म्म तारतम्य ही माना गया है । देवप्राणात्मक देवछन्द ( देवप्राणात्मक सूक्ष्मशरीर ) के स्तोमभेद से प्रवान्तर तीन छन्द हो जाते हैं । पार्थिव कक्षा में व्याप्त देवप्राण में अग्निप्राणानुगत गायत्रीछन्द की, अन्तरिक्ष्य कक्षा में व्याप्त देवप्राण में मरुत्वानिन्द्रानुगत, किंवा वाय्वनुगत त्रिष्टुप् छन्द की, एवं दिव्यकक्षा में व्याप्त देवप्रारण में मघवेन्द्रानुगत, किंवा आदित्यानुगत जगतीछन्द की प्रधानता रहती है । इस छन्दोभेद से देवप्राणात्मक देवपथात्मक स्वर्गगतिनिमित्तक देवच्छन्द ( देवप्राणात्मक सूक्ष्मशरीर ) की भी तीन अवस्थाएँ हो जाती हैं । जबतक जीवात्मा उत्क्रान्त होकर पार्थिव कक्षा में रहता है, तब तक इसका देवच्छन्द ( सूक्ष्मशरीर ) प्राधिदैविकवस्वनुगत गायत्रीछन्द से युक्त रहता है । अन्तरिक्ष्यकक्षा में जाकर त्रिष्टुपच्छन्द से अनुगृहीत हो जाता है, एवं दिव्यकक्षा में पहुँच कर जगतीछन्द से युक्त हो जाता है । इस प्रकार स्वर्गगतिनिमित्तभूत देवच्छन्द ( सूक्ष्मशरीर ) के अवान्तर तीन विवर्त हो जाते हैं, जैसा कि निम्न-लिखित ब्राह्मण श्रुति से प्रमाणित है -१ - " छन्दांसि वै देवयानः पन्थाः - गायत्री, त्रिष्टुप् जगती । ज्योतिर्वै गायत्री, गौस्त्रिष्टुप्, आयुर्जगतीं । यदेते स्तोमा भवन्ति, देवयानेनैव तत् पथायन्ति । " ( तै ० सं ० ७/५1१ ) । [ ११५ ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड - * -१ १ - * १ - - विद्यासापेक्ष नि ० कम्र्मानुगतं । २ ३ - लौकिक नि ० कर्मानुगतं - लौकिकनिरर्थककर्मानुगतं २ - लौकिक विरुद्धकर्मानुगतं ४ . ३ - लौकिकस्वार्थ कर्मानुगतं ( ङ ) देवताः आत्मगतिनिमित्तानि → " देवपथ: " - १ " पितृपथः " - २ “ ब्रह्मपथः ” –३ " यमपथ: " -४ ' जायमानो वै जायते सर्वाभ्यो एताभ्य एताभ्य एव देवताभ्य: ' इस निगम वचन के अनुसार उत्पन्न होने वाले यच्चयावत् पदार्थ सम्पूर्ण देवताओं के प्रवर्ग्यभाग को लेकर ही उत्पन्न होते हैं । यद्यपि विज्ञान-परिभाषा की विलुप्ति से आज ' देवता, देव ' शब्दों को परस्पर पर्य्यायवाची शब्द माना जा रहा है, तथापि विज्ञानदृष्टया दोनों शब्द सर्वथा पृथग्भावों से सम्बन्ध रखते हैं । देवता शब्द व्यापकार्थ का सूचक है, देव [ ११६ ] २ – “ त्रयो वै देवयाना पन्थानः " ( गो ० ब्रा ० उ ० १।१ ) । १ - विद्यासमुच्चितकर्मानुगतानि देवप्राणात्मकानि सूक्ष्मशरीराणि – देवच्छन्दांसि देवयानः पन्थाः २ – विद्यानिरपेक्षकर्मानुगतानि भूतवागात्मकानि सूक्ष्मशरीराणि – पितृच्छन्दांसि + पितृयाणः पन्थाः [ १ - विद्यासमुच्चित प्र ० कर्मानुगतं - सूर्य्याधः प्राणात्मकं सूक्ष्मशरीरं देवच्छन्दः - देवयानान्तर्गतो --; [ १ - विद्यानिरपेक्ष प्र ० कम्र्मानुगतं प्रदितिवागात्मकं - सूक्ष्मशरीरं - पितृच्छन्दः - पितृयाणान्तर्गत-२ - विद्यानिरपेक्ष नि ० कर्मानुगतं - सूर्योर्ध्वप्राणात्मकं सूक्ष्मशरीरं देवच्छन्दः - देवयानान्तर्गतो - दितिवागात्मकं सूक्ष्मशरीरं - पितृच्छन्दः - पितृयाणान्तर्गतो-
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड wwwww आत्मगति निमित्तानि शब्द व्याप्य अर्थ का सूचक है । देव को देवता अवश्य कहा जा सकता है, परन्तु देवता को देव नहीं कहा जा सकता, जैसा कि शतपथब्राह्मण विज्ञानभाष्यान्तर्गत - प्रष्टविधदेवताविज्ञान ' नामक प्रकरण में विस्तार से प्रतिपादित है । ( देखिए शत ० वि ० भाष्य १ ) स्वायम्भुव ऋषिप्राण, पारमेष्ठ्य पितरप्राण, सौर देवप्राण, चान्द्रगन्धर्वप्राण, पार्थिव वैश्वानरप्राण, भौम असुरप्राण आदि भेद से प्राण की अनेक जातियाँ हैं । इन सब प्रारणसामान्यों के लिए ' देवता ' शब्द नियत है । चूंकि देवता शब्द ऋषि, पितर, गन्धर्वादिप्राणसामान्य का वाचक है, इसी आधार पर ऋषिदेवत्य, पितृदैवत्य, देवदैवत्य, गन्धर्वदैवत्य, असुरदैवत्य इत्यादि देवता - व्यवहार प्रतिष्ठित है । अपनी - अपनी भूतसंस्था का अध्यक्ष ( विधर्त्ता ) विधर्तप्राण अपनी - अपनी भूतसंस्था की अपेक्षा देवता है । जिस प्रकार स्थूलशरीर में यच्चयावत् भूतमात्रों का समन्वय है, एवमेव भूतप्रतिष्ठारूप उन सब ऋष्यादिप्राणों का भी स्थूलशरीर में भोग रहा है । किसके शरीर में कौनसी भूतमात्रा का प्राधान्य है, एवं कौनसा प्राणदेवता प्रधान है? इस प्रश्न का नियामक जन्मान्तरीय संस्कार है । उत्क्रान्त आत्मा को छन्दोलक्षण सूक्ष्मशरीर धारण करना पड़ता है, यह पूर्व परिच्छेद में स्पष्ट किया जा चुका है । स्थूलशरीरानुगतभूतों की उत्क्रान्ति के अनन्तर ' भस्मान्तं शरीरम् ' इस औपनिषद् सिद्धान्त के अनुसार पश्चत्वगत हो जाती है | शरीरभूत स्व - स्वप्रभव पृथिव्यादि महाभूतों में विलीन हो हो जाते हैं । इनके साथ ही प्रागन्तुक प्रारणदेवता भी तत्तत्प्रभवप्राणों में विलीन हो जाते हैं । हाँ, जिन भूतमात्राओं, तथा प्राण मात्राओं ( देवताओं ) का प्रत्यगात्मा के साथ अन्तर्य्यामात्मक स्वाभाविक सम्बन्ध रहता है, वे भूत - प्राण अवश्य ही कारग्रन्थि विमोक लक्षणमुक्ति पर्य्यन्त सुरक्षित रहते हैं । ' अन्यक्ष-वतरं कल्याणतरंरूपं कुरुते ' इस बृहदारण्यक सिद्धान्त के अनुसार उत्क्रान्त आत्मा भूतसूक्ष्मों ( सूक्ष्मभूत-( मात्रा ) से नवीन सूक्ष्मशरीर का कर्मानुसार निर्माण करता है । अथवा यों कह लीजिए कि, कर्मा -नुसार पारलौकिक शुभाशुभ कर्म्मभोग के लिए इसे नवीन शरीर मिल जाता है, जो कि आत्मगति ( परलोकगति ) निमित्तक छन्दोलक्षण सूक्ष्मशरीर परिमाणतः अङ्ग ुष्ठमात्र बनता हुआ ' प्रतिवाहिकशरीर ' नाम से प्रसिद्ध है | स्थूलशरीर जहाँ पुरुषार्थसाधन का निमित्त बनता हुआ ' कर्म्मशरीर ' कहलाया है, साथ ही सांसारिक भोगसाधन बनता हुआ भोगशरीर भी कहलाया है, वहाँ उत्क्रान्त्यनन्तर प्राप्त होने वाला अङ्ग ुष्ठमात्र यह सूक्ष्मशरीर स्वतन्त्र पुरुषार्थ से एकान्ततः वश्चित रहता हुआ केवल भोगशरीर ही कहलाया है । भोगशरीर में प्रतिष्ठित प्रेतात्मा कोई ऐसा स्वतन्त्र कर्म्म नहीं कर सकता, जिससे इसके परलोकभोग में किसी भी प्रकार की ह्रास वृद्धि हो जाय । स्थूलशरीरावस्था ही एक ऐसी अवस्था है, जिसमें प्रतिष्ठित कर्मात्मा कर्म्मभोग के साथ - साथ स्वतन्त्ररूप से ऐसे कर्म्म कर सकता है, जिनके अतिशय तारतम्य से यह अपने परलोकगत्यनुगत फलभोगों में बलाबल का प्राधान कर सकता है । इसी आधार पर - ' इह चेदवेदीत्-श्रथसत्यमस्ति इह चेन्नावेदीत् - महतीविनष्टि: ' - " भूतेषु भूतेषु निचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति " इत्यादि सिद्धान्त प्रतिष्ठित है । अस्तु कहना यही है कि, स्थूलशरीर निधनान्तर इसे आत्मगतिनिमित्तक कर्मानुसार छन्दोलक्षण सूक्ष्मशरीर प्राप्त होता है । भूतमात्रा से सर्वथा अविनाकृता है । अवश्यमेव भूतमात्रा के साथ प्रारणमात्रा [ ११७ ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि का भी इस प्रतिवाहिक सूक्ष्मशरीर में समावेश हो जाता है । सूक्ष्मशरीररूप छन्द ही इस प्राणतत्व का बाह्य आलम्बन बनता है । अतएव छन्द को देवता का ( भूत को प्राण का ) वाहन कहा जा सकता है । ' छन्दोरूप भूतभाग पर प्रारूढ यह देवतालक्षण प्रारण ही भूतभाग की स्वरूपरक्षा का अन्यतम कारण है । ' यावदनु भूतेषुप्राणस्तावदनु भूतरक्षा ' ही मुख्य सिद्धान्त है । विधर्त्ता प्राणदेवता ही क्षरभूतकूट को अपनें अच्छिन्नसूत्र में बद्ध कर उसे स्व - स्वरूप में प्रतिष्ठित रखता है । जिन अकामयमान पुरुषों का मुक्तात्मा शरीरबन्धन से विमुक्त होता हुआ सद्योमुक्त है, उनके सम्बन्ध में हमें कुछ भी विचार नहीं करना | विचार करना है कामयमान - कामासक्त उन कर्मात्माओं का, जिन्हें स्थूलशरीर परित्यागान्तर सूक्ष्मशरीर धारण कर देवयानादि मार्गों के द्वारा परलोकगति का अनुगमन करना पड़ता है । ऋषिप्राण ज्ञानप्रधान है, इसका आकाशभूत से सम्बन्ध है । अतएव तत्प्राणयुक्त प्रकामयमान मुक्तात्माओं का शरीर भी आकाशात्मक बन जाता है । यही इनकी सद्योमुक्ति हैं । ऋषिप्राण के अनन्तर पारमेष्ठ्य पितरप्राण है, तदनन्तर सौर दैवप्राण, अनन्तर चान्द्रगन्धर्वप्राण, अनन्तर पार्थिव वैश्वानरप्राण, सर्वान्त में भौमासुरप्राण है । इनमें चान्द्रगन्धर्वप्राण का तो पारमेष्ठ्य पितरप्राण में ही अन्तर्भाव हो जाता है । शेष चार प्रारण बच जाते हैं । इन चारों में पारमेष्ठ्य पितरप्राण तथा भौम प्रासुरप्राण दोनों -का एक युग्म है, एवं सौर देवप्राण तथा पार्थिव आग्नेयप्राण ( वैश्वानरप्राण ) दोनों का एक युग्म है । विद्या-सापेक्ष सौरपार्थिवप्राणयुग्म देवतालक्षण देवयानः पन्था है एवं पारमेष्ठ्य भौमप्राणयुग्म देवतालक्षण पितृयारणः पन्था है । देवयानः पन्थात्मक देवताप्राण अग्नि, वायु, आदित्य भेद से तीन भागों में विभक्त हैं, पितृयाण: पन्थात्मक देवताप्राण प्रापः - वायुः - सोम भेद से तीन भागों में विभक्त है । कर्मानुसार प्राप्त सूक्ष्मशरीर में जिस भूत का विकास रहता है, तद्भूतावच्छिन्न तत् प्रारणदेवता ही उस सूक्ष्मशरीर में प्रधानरूप में विकसित रहता है । विद्यासमुचित निवृत्तिकर्म्म, विद्यानिरपेक्षनिवृत्ति सत्कर्म्म, लौकिक निवृत्ति सत्कर्म्म, इन तीन कर्मों से सौर - असङ्ग - प्रग्नि- वायु- श्रादित्यात्मक देवताप्राण का देवच्छन्दोलक्षण सूक्ष्मशरीर में प्राधान्य रहता है । यही देवयान मार्गान्तर्गत देवताप्राण लक्षण ' ब्रह्मपथ ' है, यही क्रममुक्ति का निमित्त बनता है । विद्यासमुचित प्रवृत्ति कर्म्मसंस्कार से कर्मात्मा का पार्थिव ससङ्गासङ्ग अग्नि- वायु - प्रादित्यात्मक ( तौम्य ) देवताप्राण विकसित रहता है । तदनुकर्मात्मा के देवच्छन्दोलक्षरण सूक्ष्मशरीर में इसी देवताप्राण का प्राधान्य रहता है । यही देवयानमार्गान्तर्गत देवताप्राण लक्षण ' देवपथ ' है, यही देवस्वर्गगति का निमित्त बनता है । सौर प्राणाग्नित्रयी अग्नि है, पार्थिवप्राणाग्नित्रयी भी अग्नि है । सौरप्रवर्ग्याग्नि ही पार्थिवप्राणाग्नि है । अतएव इन दोनों का समानयुग्म मान लिया गया है । यही उभयविध श्राग्नेयप्राण देवता सूर्य्यप्राणापेक्षा ब्रह्मपथ, पार्थिवप्राणापेक्षया देवपथ बनता हुआ उभयपथात्मक ' देवयानः पन्थाः बन रहा है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रख कर मन्त्रश्रुति ने कहा है— " त्वं तन्तुरुत सेतुरग्ने! त्वं पन्था भवसि देवयानः । त्याग्ने पृष्ठं वयमारुहेम यत्र देवैःसद्यमादंमदेम ॥ " ( मै ० सं ० २।१३।२२ ) । [ ११८ ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड १ — ऋषिप्राणः स्वायम्भुवः ( सत्यः ) २ - पितरप्राणः + पारमेष्ठ्यः ( सौम्यः सोमः ). ३ – देवप्राणः -- सौरः ( आग्नेयः श्रग्निवाय्वादित्याः ) ४— गन्धर्वप्राणः → चान्द्रः ( वायव्य: वायुः ) -[ ११ ९ ] आत्मगतिनिमित्तानि * ऋषिदेवता + पितृदेवता देव देवता - गन्धर्व देवता विद्यानिरपेक्ष प्रवृत्ति सत्कर्म्म संस्कार से कर्मात्मा का सोमात्मक पितृप्राणदेवता विकसित रहता है, तदनुप्राप्त सूक्ष्मशरीर में भी सोमात्मक पितृप्राग देवता का ही प्राधान्य रहता है । यही सौम्य पितृ-देवता पितृयाणः पन्थान्तर्गत देवता लक्षण ' पितृपथ ' है, यही पितृस्वर्गगति का निमित्त बनता है । सोमवी है, आग्नेय ज्योति का ग्राहक है । अतएव प्रांशिकरूप से यह पितृप्राण अग्निवत् ज्योतिर्म्मय रहता है । इसका यह ज्योतिष्ट्व ही पितृस्वर्ग प्राप्ति का निमित्त बनता है । लौकिक निरर्थक कर्म्म, विरुद्धकर्म्म, तथा स्वार्थकर्म्म इन तीनों कर्मों से कर्म्मात्मा का भौम प्रासुरप्राण प्रवृत्त रहता है । परमेष्ठी में प्रापः - वायुः-सोमात्मक तीन मनोताओं ' का समन्वय । इनमें आप असुरप्राण की तथा सोम पितृप्रारण की प्रतिष्ठा बनता है | प्राप्यप्राण असुर है, वायव्यप्राणगन्धर्व है, सौम्यप्राण पितर हैं । इन तीनों पारमेष्ठ्य प्राणों में प्राप्यप्राण तो ' अद्भ्यः पृथिवी सिद्धान्त के अनुसार भूपिण्ड में भुक्त है । वायव्य ( गन्धर्व ) प्राण तथा सौम्य ( पितर ) प्राण दोनों ' चन्द्रमा वै गन्धर्वः, विधूर्ध्वभागे पितरो वसन्ति ' के अनुसार चन्द्रमा में भुक्त हैं । तीनों प्राणों का प्रभव स्थान चूंकि समान ( परमेष्ठी ) है, अतएव पारमेष्ठ्य ( चान्द्र ) पितृप्राण तथा भौम आसुरप्रारण, दोनों का हमने एक युग्म मान लिया है । जिस प्रकार विद्यानिरपेक्षप्रवृत्ति सत्कर्म्म से आध्यात्मिक सौम्य पितृप्रारण विकसित रहता है, एवमेव उक्त प्रसत्कर्म्मत्रयी से आध्यात्मिक आप्य आसुर प्राण विकसित रहता है । तदनुकर्मात्मा के पितृच्छन्दलक्षण सूक्ष्मशरीर में इसी आसुर प्राण का प्राधान्य रहता है । यही पितृयाणमार्गान्तर्गत ' यमपथ ' है, यही नरकगति का निमित्त बन रहा है । इस प्रकार छन्दोवत् कर्म्मतारतम्य से सूक्ष्मशरीरानुगत प्राणदेवताओं के भी चार विवर्त्त हो जाते हैं, जिन्हें उपक्रम-परिभाषानुसार ब्रह्मपथादि नामों से व्यवहृत किया जा सकता है । ५ — वैश्वानरप्राणः पार्थिवः सौम्य ( आग्नेयः – प्रग्निवाय्वादित्याः ) अग्नि देवता ६ - असुरप्राणः भौमः ( प्राप्य: - ग्रापः - असुर देवता १ – ऋषिप्राणः – ज्ञानघनः - प्रकाशात्मा - सद्योमुक्तेरधिष्ठाता १ – देवप्राणः - + सौराग्नित्रयी - लक्षणः - तेजोमयः - प्रसङ्गः — क्रममुक्तेराधिष्ठाता २ — वैश्वानरप्राणः पार्थिवाग्नित्रयी - लक्षणः – तेजोमयः - ससङ्गासङ्गः - देवस्वर्गगतेरधिष्ठाता १ --- सौम्यप्राणः → चान्द्रसोमलक्षणः - प्रापोमयः, वायुमयः, ससङ्ग - पितृस्वर्गगतेरधिष्ठाता ( चान्द्रगन्धर्वप्राणस्यात्रैवान्तर्भावः ) २ प्राप्यप्राणः पार्थिवभूतलक्षणः - भूतमयः - निषिद्धससङ्गः - नरक गतेरधिष्ठाता
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१ १ ): ' ३ देवपथ ' २. देवयानान्तर्गतों देवस्वर्गगतिनिमित्तभूतः ( देवदेवताः — ससङ्गासङ्गाः - अग्निवाय्वादित्यात्मिकाः-पार्थिव ---विद्यासमुच्चितप्रवृत्तिकर्मानुगताः १ पितृपथः’- ‘ – पितृयारणान्तर्गतः पितृदेवताः – ससङ्गाः – – सोमात्मिकाः वायु -चान्द्र -विद्यानिरपेक्षप्रवृत्तिसत्कर्मानुगताः १ । ) पितृस्वर्गगतिनिमित्तभूतः ( [ १२० ] आत्मगति निमित्तानि विद्यासापेक्षनिवृत्तिसत्कर्म्मानुगताः - १ विद्यानिरपेक्षनिवृत्तिसत्कर्मानुगताः लौकिकनिवृत्तिसत्कर्म्मानुगताः २ - – ३ ३ ४ लौकिकनिरर्थककर्मानुगताः १-लौकिकविरुद्धकर्मानुगताः - २ लौकिकस्वार्थकर्मानुगताः - ३ * ’ ब्रह्मपथः - ' + देवयानान्तर्गतो - देवदेवताः प्रसङ्गाः -- अग्निवाय्यादित्यात्मिकाः सौर → ) क्रममुक्तिगतिनिमित्तभूतः ( ४ ’ ' यमपथः -पितृयाणान्तर्गतोः पितृदेवताः -निबिडससंङ्गाः -: - भूतात्मिका – अब् भौम → । ) नरकगतिनिमित्तभूतः (
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड ( च ) आतिवाहिकाः ग्रात्मगतिनिमित्तानि ' पन्थानः, कर्माणि, नाड्यः, छन्दांसि देवता: ' जिन पाँच गतिनिमित्तों का अब तक क्रमिक रूपण हुआ है, एवं ' प्रतिवाहिक, आकाश, लोक ', जिन तीन गतिनिमित्तों का यहाँ से क्रमिक निरूपण प्रक्रान्त है, उन आठों गतिनिमित्तों के सम्बन्ध में अवस्थाभेद सहकृत कुछ एक विशेषताओं का स्पष्टीकरण कर लेना आवश्यक होगा । निरूपित तथा निरूपणीय इस निमित्तगायत्री ( ८ निमित्त ) में से ' कर्माणि: नाड्यः ' इन दो निमित्तों का स्थूलशरीरदशा से सम्बन्ध है, कारण स्पष्ट है । जन्मान्तरीय कर्म्म संस्कार तथा आयुर्भोगपर्य्यन्तकृत कर्म्मसंस्कार ही गति के मुख्य निमित्त माने गए हैं । जीवितदशा में कर्मात्मा जैसे भी कर्म्मसंस्कारों से युक्त रहता है, उसे तदनुगत नाड़ी विशेष से ही उत्क्रान्त होना पड़ता है । सूक्ष्मशरीरा-गता भावी - गति का प्रधान निमित्त परम्परया यह कर्म्मसंस्कार ही बनता है, इसीलिए तो इसे गतिनिमित्त मान लिया गया है । साथ ही चूंकि इसका विस्तार - सञ्चय जन्मान्तरीयसंस्कारानुगत - ऐहिकजीवन में ही होता है, इस दृष्टि से इसे स्थूलशरीरानुगत मान लिया जाता है । यही स्थिति ' नाड्यः ' निमित्त की है । जिन सुषुम्णादि व्याननाड़ियों का नाड़ी - परिच्छेद में विश्लेषण हुआ है, उन सब नाड़ी विवर्त्तो का भी ऐहिकजीवनानुगत स्थूलशरीर से ही सम्बन्ध । इस प्रकार कर्म्म तथा नाड़ी, इन दो निमित्तों का स्थूल-शरीर भुगता जीवनदशा से ही सम्बन्ध सिद्ध हो रहा है । छन्दांसि वह सूक्ष्मशरीर है, जिसे भोगायतन बना कर उत्क्रान्त कम्मतिमा लोकविशेषों में कर्म्मा-' नुसार शुभाशुभ भोग भोगने के लिए गमन करता है । देवता, वह प्राणतत्त्व है, जो कर्म्मतारतम्य से सूक्ष्म-भूतात्मक सूक्ष्मशरीर की प्रतिष्ठा बनता है । इन दोनों निमित्तों का उत्क्रान्त - लोकगति के लिए सन्नद्ध कर्मात्मा से सम्बन्ध है । पन्थानः वे नियतमार्ग हैं, जिनसे इसे जाना है । प्रतिवाहिक वे तत्त्व हैं, जिन पर वाहनवत् श्रारूढ होकर यह गमन करता है, प्रकाश वह गतित्रैलोक्य है, जो समष्ट्यात्मक गन्तव्य स्थान है एवं लोक वह गतिनिमित्त है, जो व्यष्ट्यात्मक गन्तव्य स्थान है । प्रतिवाहिक, आकाश, लोक, इन तीनों निमित्तों का, व चौथे उस ' पन्थानः ' निमित्त का, जिसका शेष ७ निमित्तों से देववान - पितृयारण सम्बन्ध बतलाने के उद्देश्य से सर्वप्रथम स्पष्टीकरण हुआ है, इन चार निमित्तों का ग्राधिदैविक ( प्राकृतिक ) संस्था से सम्बन्ध है । इसी स्थिति का यो भी स्पष्टीकरण किया जा सकता है कि, स्थूलशरीरानुगत कर्म्म-नाडी इन दो निमित्तों का सूक्ष्मशरीरानुगत छन्द, देवता इन दो निमित्तों का, इस प्रकार इन चार निमितों का तो अध्यात्मसंस्था से ( पूर्वयुग्म का स्थूल शरीर युक्त अध्यात्म संस्था से एवं उत्तरयुग्म का सूक्ष्मशरीरा-नुगत अध्यात्म संस्था से ) प्रधान सम्बन्ध है एवं शेष पन्थानः ग्रादि चारों निमित्तों का ग्रधिदैवत संस्था से सम्बन्ध है । इस सम्बन्ध प्रदर्शन से प्रकृत में कहना यही है कि, ' कर्म - नाड़ी - छन्द - देवता ' इन चारों आध्यात्मिक निमित्तों की मूल प्रतिष्ठा जीवक है । जीवकम् ग्रस्त - व्यस्त है, अतएव तत्सम्बद्धा यह - निमित्तचतुष्टयी श्रनियतभावाकान्त है । पन्धानः श्रातिवाहिकाः श्राकाश:, लोकः इन चार प्राधिदैविक निमित्तों की मूलप्रतिष्ठा ईश्वरकम है । सत्यसंकल्प ईश्वर का कर्म्म सर्वथा सुव्यवस्थित है । अतएव तत्सम्बद्धा किंवा तद्रूपा यह निमित्तचतुष्टयी नियत भावाकान्त है । जीवानुगता निमित्तचतुष्टयी [ १२१ ]