Part IV Atmgativigyanopanishta Part 4 — पृष्ठ 131–140

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४ · पृष्ठ 131–140

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड आत्मगतिंनिमित्तानि परिवर्तनशीला है, ईश्वरानुगता निमित्तचतुष्टयी - याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्य: ' इस ईश्वरोपनिषत् ( ईशोपनिषत् ) के अनुसार प्राकल्पान्त यथापूर्वस्वरूप से सुव्यवस्थित है । इसी सम्बन्ध में एक विशेषता और पन्थानः, प्रतिवाहिकाः इन दो प्राधिदैविक ईश्वरीय निमित्तों का उपक्रम पृथिवी स्थान है । अतएव इन्हें पार्थिव निमित्त कहा जायगा । श्राकाशः, लोकाः इन दो निमित्तों की प्रतिष्ठा सम्वत्सरचक्र है । अतएव इन्हें सांम्वत्सरिक निमित्त कहा जायगा । पार्थिव आधिदैविक निमित्त-युग्म से स्थूलशरीरानुगत प्राध्यात्मिक निमित्तयुग्म अनुगृहीत है एवं साम्वत्सरिक प्राधिदैविक निमित्तयुग्म से सूक्ष्मशरीरानुगत आध्यात्मिक निमित्तयुग्म अनुगृहीत है । इस प्रासङ्गिक निमित्त वैशिष्ट्य को उपरत करते हुए क्रमप्राप्त प्रतिवाहिक निमित्त की प्रोर ही पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । * १ १ १ -- कर्मारिण २ २– नाड्यः }→ स्थूलशरीरानुगतनिमित्ते - प्राध्यात्मिक निमित्तचतुष्टयो-श्रवस्थिता ३ ३ १ – छन्दांसि → सूक्ष्मशरीरानुगत निमित्ते ४ ४ २– देवताः ५ ६ १ १ - पन्थानः → पृथिव्यनुगतनिमित्ते २ २ - प्रतिवाहिकाः आधिदैविकनिमित्तचतुष्टयी-सुव्यवस्थिता ७ ३ १ - श्राकाशः ४ २ - लोकाः } → सम्वत्सरानुगत निमित्ते " सोमसंज्ञोऽयं भूतात्मा ग्निसंज्ञोप्यव्यक्तमुखा इति " ( मैत्रायण्युपनिषत् ६ प्र ० १० ) इस औपनिषद वचन के अनुसार प्रत्यगात्मा भी अग्नीषोमात्मक है एवं ' श्रग्नीषोमात्मकं जगत् ' ( जाबालोपनिषत् २।१ ) के अनुसार क्षणिक परिवर्तन की अपेक्षा ' जगत् ' नाम से व्यवहृत इस कर्मात्मा का विश्वरूप स्थूलशरीर भी अग्नीषोमात्मक है । वैश्वानर - तेजस - प्राज्ञ की समष्टि ही कर्मात्मा है । वैश्वानर प्राग्नेयप्राण है, तैजस [ १२२ ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि wwwwwwwmani वायव्यप्राण है, प्राज्ञगत प्रज्ञात्मक प्राण ऐन्द्रप्राण है । तीनों एक ही अग्नितत्त्व के अवस्थाभेद निबन्धन तीन विवर्त्त हैं । प्रज्ञाप्राणात्मक इन्द्र की प्रतिष्ठारूप प्रज्ञाभाग में सोम, चिदंश, ये दो तत्त्व प्रतिष्ठित हैं । वी-सोम में प्रतिबिम्बित चिदंश के सम्बन्ध से ही यह चिद्विशिष्ट सोमभाग ' प्रज्ञा कहलाया है । इस प्रकार कर्मात्मा में सोम का भी भोग हो रहा है । प्रज्ञात्मकप्राण प्रज्ञा से अविनाभूत है, अतएव प्रज्ञा ( चिद् -विशिष्टसोम ) और प्राण ( इन्द्र ) दोनों को प्रभिन्न मान लिया जाता है, जैसा कि - " या वै प्रज्ञा - स प्राणः, यो वै प्राण: - सा प्रज्ञा । सह ह्य ेतावस्मिन् शरीरे वसतः सहोत्तिष्ठतः " ( कौ ० उ ० ३।३ ) इत्यादि श्रुति से प्रमाणित है । इस प्रकार कम्मत्मा का अग्नीषोममयत्व भलीभाँति सिद्ध हो जाता है । अतएव इसे ( भूतात्मा नामक कर्मात्मा को ) सोमसंज्ञक भी कहा जा सकता है, अग्निसंज्ञक भी माना जा सकता है । भौतिक शरीर का अग्निषोममयत्त्व तो स्पष्ट ही है । दोनों की अग्निषोमता में अन्तर केवल यही है कि कर्मात्मा भूताग्निसमगर्भित प्राणाग्निसोमप्रधान है, प्राणतत्त्व प्रव्यक्त है, अमूर्त है, अतएव इसे ' श्रव्यक्त-मुखा ' कहना श्रन्वर्थ बनता है एवं शरीर प्राणाग्निसामगर्भित भूताग्निसोमप्रधान है । ' सह्य तावस्मिन् शरीरे वसतः सहोत्क्रामतः ' के अनुसार यह भी सिद्ध हो जाता है कि, उत्क्रान्त कर्मात्मा भी अग्निषोम-मय है, एवं इस उत्क्रान्त आत्मा का स्थूलशरीर भी अग्निषोमात्मक ही है । इस प्रकार अनुत्क्रान्ति उत्-क्रान्ति दोनों अवस्थाओं में आत्मन्वी ( शरीरविशिष्टात्मा ) का अग्निसोममयत्व सिद्ध हो जाता है । अग्नितत्व ज्योति है, सोमतत्व तम है । ज्योतिर्लक्षण अग्नितत्व की मूलप्रतिष्ठा सूर्य्य है, तमोलक्षण सोम-तत्व की प्रतिष्ठा चन्द्रमा है । इस प्रतिष्ठा दृष्टि से आध्यात्मिक अग्निज्योति का सूर्य्यसंस्था से सम्बन्ध है, आध्यात्मिक सोमतम का चन्द्रसंस्था से सम्बन्ध है | अध्यात्म केन्द्र से बद्ध ज्यौतिर्म्मय सौरमण्डल देवयानः पन्थाः है, एवं अध्यात्म केन्द्र से बद्ध तमोमय चन्द्रमण्डल पितृयाणः पन्थाः है । स्थूलशरीर से उत्क्रान्त ज्योति स्तमोमय प्रेतात्मा ज्योतिस्तम के तारतम्य से इन्हीं दोनों में से किसी एक मार्ग का अनुगमन करता है । यदि इसका आध्यात्मिक ज्योतिर्भाग विकसित है, तब तो यह सौरज्योतिर्म्मय देवयानः पन्था का अनुगामी बनता है, यहाँ इसका प्राध्यात्मिक तमोभाग विकसित है, तो यह चान्द्रतमोमय पितृयाणः पन्था का अनुगामी बनता है । इन दोनों मार्गों में अध्यात्म केन्द्र से सूर्य्य - चन्द्र केन्द्र पर्य्यन्त वितत् ज्योति स्तमो मण्डल ही उत्क्रान्त आत्मा का वहन करते हैं । अतएव इन ज्योतिस्तमः पर्वों को अवश्यमेव ' प्रातिवाहिक ' कहा जा सकता है । यद्यपि छन्दांसि देवताः, इन दो निमित्तों की समष्टिरूप सूक्ष्मशरीर भी आत्मा का वहन करता है, अतएव इसे आतिवाहिकशरीर भी कहा जाता है तथापि इस शरीरलक्षण प्रतिवाहिक का ' ग्रात्मन्वी ' मर्यादा से चूंकि अध्यात्म संस्था में ही अन्तर्भाव है, अतएव इसका आत्मस्वरूप में ही अन्तर्भाव मानना उचित होता है । अश्व इसलिए आत्मन्वी का प्रतिवाहिक माना जाता है कि इस पर सशरीरी ग्रात्मन्वी प्रतिष्ठित होकर गमन करता है । ठीक यही परिस्थिति यहाँ । सशरीरी उत्क्रान्त आत्मा इन ज्योतिस्तमः पर्वों पर आरूढ होकर ही देवयान - पितृयाणलक्षण ज्योति - स्तमोमय सूर्य्य - चन्द्र मण्डलों में गमन करता है । ज्योतिर्मय प्रतिवाहिक कौन - कौन हैं? एवं तमोमय प्रतिवाहिकों का क्या स्वरूप है? इन प्रश्नों के विवेचन से पहले ज्योतिपर्व समष्टिलक्षण देवयानः पन्थाः का, तथा तमः पर्वसमष्टिलक्षण पितृयाणः पन्थाः का स्वरूप विश्लेषण आवश्यक होगा । इनमें से पहलें देवयानः पन्था का ही संक्षिप्त स्वरूप सन्मार्गियों के सम्मुख उपस्थित हो रहा है-[ १२३ ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मग तिनिमित्तानि ' देवयानः पन्थाः ' शब्द का सामान्य अर्थ है - ' देवताओं के आने जाने का मार्ग । ' फलतः इस शब्द के आधार पर ही देवता, उनकी गति, गतिप्रतिष्ठालक्षण मार्ग, ये तीन पर्व हमारे लक्ष्य में आ जाते हैं । देवता शब्द से सौरप्राणलक्षण देवदेवता गृहीत हैं, जैसा कि परिच्छेदारम्भ में स्पष्ट किया जा चुका है । इसीलिए तो यह पन्था देवतायानः पन्थाः कहला कर देवयानः पन्थाः कहलाया है । देवता शब्द से ऋषि-पितर- देव - गन्धर्वादि यच्चयावत् प्राण गृहीत हैं । देव शब्द केवल सौर देवतत्त्व का ही संग्राहक है, जिसका सौर- पार्थिव सम्वत्सर चक्रों में भोग हो रहा है । ऐसी स्थिति में उक्त शब्द का ' देवताओं के आने जाने का मार्ग ' अर्थ न कर ' देवों के ' अथवा ' देवदेवताओं के आने जाने का मार्ग ' यही अर्थ किया जायगा । सौरतत्त्व ' इन्द्र ' नाम से प्रसिद्ध है । इस सौरप्राणतत्त्व ( इन्द्र ) के साथ सौर सावित्राग्नि का घनिष्ठ सम्बन्ध .हैं । इन्द्राग्नि- लक्षण यही सौरप्राण पारमेष्ठ्य सोमाहुति सम्बन्ध बनता हुआ रश्मिरूप से सम्पूर्ण रोदसी त्रैलोक्य में व्याप्त हो रहा है । रोदसीत्रैलोक्यावच्छिन्न यही सौरप्राणलक्षण प्राकृतिक देवयानमण्डल है । यही मण्डल ( जिसे सावित्राग्नि सम्बन्ध से हिरण्मय मण्डल भी कहा जाता है ) सौरसम्वत्सर नाम से प्रसिद्ध . है । इस सौरसम्वत्सर चक्र के गर्भ में समाहित पार्थिव विवर्त्त भुक्त है । पार्थिवप्राणतत्त्व इन्द्र है, पार्थिव तत्त्व वैश्वानर है । सौर इन्द्र जहाँ ' मघवा ' कहलाया है, वहाँ पार्थिव इन्द्रप्राण पार्थिववस्वाग्नि के सम्बन्ध से ' वासव ' कहलाया है । एवमेव सौर अग्नितत्त्व जहाँ ' सावित्र ' कहलाया है, वहाँ पार्थिव अग्नि-तत्त्व ' अङ्गिरा ' नाम से व्यवहृत हुआ है । सौर सावित्राग्नि के भी अवस्थाभेदनिबन्धन अग्नि- वायु-आदित्य ये तीन विवर्त्त हैं, एवं पार्थिव प्राङ्गिरस अग्नि के भी अवस्थाभेदनिबन्धन अग्नि, वायु, आदित्य ये तीन ही विवर्त हैं । इस सम्बन्ध में यह स्मरण रखना चाहिए कि, यद्यपि सौर पार्थिव दोनों ही संस्थाओं में इन्द्र - अग्नि दोनों का समन्वय है, तथापि सौरमण्डल में इन्द्र का प्राधान्य है एवं पार्थिवमण्डल में अग्नि का प्राधान्य है । पृथिवी पृथिवी है, इसमें अग्नि का प्राधान्य है, सूर्य्य द्यलोक है, इसमें इन्द्र का प्राधान्य है । इसी आधार पर – “ यथाग्निगर्भा पृथिबी तथा द्यौरिन्द्रेागभरणी " यह निगम प्रतिष्ठित है । जहाँ तक सौरमण्डल की व्याप्ति है, वहाँ तक सौर इन्द्रप्रधान ज्योतिर्मयतत्त्व व्याप्त है । मण्डला-वच्छिन्न यही प्राणसीमा ' बृहत्साम ' नाम से प्रसिद्ध है । इस बृहत्साममण्डल गर्भ में सावित्राग्नि सम्बन्ध से अग्नि - वायु - प्रादित्य ये तीन सौरविवर्त्त भुक्त है । इन तीन अवसान भूमियों के सम्बन्ध से यह बृहत्-साम भी त्रिपर्वा हो जाता है । जहाँ तक सौर सावित्राग्नि व्याप्त है, उस सावित्राग्निमण्डल की अन्तिम सीमा बृहत् साम है, सावित्राग्निवायु ( रुद्रवायु ) सीमा ' वैराजसाम ' है एवं सावित्रादित्य की सीमा ' रैवतसाम ' है । तीनों की समष्टि सौरसम्वत्सरसाम है, जिसे बृहत्साम कहा जाता है । इस सम्वत्सरसामात्मक बृहत्-साम के केन्द्र में सूर्य्यपिण्ड प्रतिष्ठित है । यही स्थिति पार्थिव रथन्तरसाम की समझिए । जहाँ तक पार्थिव -मण्डल की व्याप्ति है, वहाँ तक पार्थिव अग्निप्रधान ज्योतिर्मय तत्त्व व्याप्त है । मण्डलावच्छिन्ना यही * इसी श्रौत ' देवता ' - ' देवदेवता ' व्यवहार के आधार पर लोक व्यवहार में ( प्रान्तीय भाषा में ) ' देई देवता ' शब्द प्रचलित है, जिसका एकमात्र तात्पर्य ' देवदेवता ' ही है । व्यवहार बतला रहा है कि, भारतीय सामान्य प्रजा में भी विज्ञानसिद्ध आर्षसिद्धान्त ज्यों के त्यों प्रतिष्ठित हैं । [ १२४ ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड www आत्मगति निमित्तानि प्राणसीमा रस्तमात्मक बनता हुआ रथन्तरसाम नाम से प्रसिद्ध है । यह पार्थिवसाम रथात्मक सूर्य्यपिण्ड से भी अतिक्रमण कर जाता है, इसलिए भी ' रथं - सूर्य्यं - तरति ' निर्वचन से रथन्तर कहलाया है । इस प्रकार रसाग्नि सम्बन्धं से तथा रथात्मक सूर्य्यसन्तरण से उभयथा इसका रथन्तरन्तत्त्व सिद्ध हो रहा है, जैसा कि निम्नलिखित श्रुतियों से प्रमाणित है— - " रसतमं ह वै तद्रथन्तरमित्याचक्षते परोक्षम् । ” ( शत ० ६।१।२।३६ ) । २ - " सौं वा आदित्य एष रथः । " ( शत ० ६।४।१।१५ ) । तं तरति इति रथन्तरम् । , इस पार्थिव रथन्तरसाम मण्डल के गर्भ में आङ्गिरसाग्नि के सम्बन्ध से अग्नि वायु - प्रादित्य ये तीन पार्थिव विवर्त्त भुक्त हैं । इन तीन अवसान भूमियों के सम्बन्ध से यह रथन्तर साम भी त्रिपर्वा बन जाता है । जहाँ तक पार्थिव प्राङ्गिरस श्रग्नि व्याप्त है, उस आङ्गिरस अग्निमण्डल की सीमा ' रथन्तर-साम ' है, आङ्गिरसवायु ( यमवायु ) की सीमा ' वैरूपसाम ' है एवं प्राङ्गिरस प्रादित्य की सीमा ' शाक्वरसाम है । तीनों की समष्टि पार्थिव सम्वत्सरसाम कहा जाता है । इस सम्वत्सरसामात्मक रथन्तरसाम काउस सौर सम्वत्सरसाम के साथ प्रतिमान सम्बन्ध हो रहा है । इस पार्थिव सम्वत्सर के सम्बन्ध में यह विशेषता कि जिस प्रकार सौरसम्वत्सर के मध्य में सूर्य्यं प्रतिष्ठित है, वैसे ही पार्थिव सम्वत्सर के मध्य में भूपिण्ड प्रतिष्ठित नहीं है । कारण यही है कि, सूर्य्य जहाँ स्वज्योतिर्मय पिण्ड हैं, वहाँ अर्द्धपार्थिव विवर्त तो सूर्य्य सम्बन्ध से परज्योतिर्मय है एवं अर्द्धपार्थिव विवर्त्त सूर्य्यज्योतिविच्छेद से अज्योतिर्मय अर्द्धपार्थिव भाग ही अदिति पृथिवी है, जिसका पार्थिव सम्वत्सर से सम्बन्ध है एवं तमोमय श्रर्द्धपार्थिव भाग दिति पृथिवी है, जो सम्वत्सरमण्डल से वश्चित है । क्रान्तिवृत्तावच्छिन्न सौरसम्वत्सर ही पार्थिव सम्वत्सर की प्रतिष्ठा है । क्रान्तिवृत्त पर परिभ्रममा भूपिण्ड का सूर्य्यविदिक्स्थ छायामय दितिभाग वास्तव मेंइस दृष्टि से भी सम्वत्सर मण्डल से बहिर्भूत है । सौरसम्वत्सरमण्डल ' आतपपथ ' है, पार्थिव वह सम्वत्सर ( पार्थिव अर्द्धभाग ) तो प्रतापथ है, जिसका सौरसम्वत्सरमण्डल में भोग हो रहा है, एवं वह पार्थिव दित्यात्मक अर्द्धभाग छायापथ है, जो सूर्य्यज्योति से वञ्चित है । इस प्रकार सौरसम्वत्सर मण्डल का केवल आतपपथत्व सिद्ध हो जाता है एवं प्रदिति - दिति भेद से पृथिवी में आतप - छाया दोनों पथों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । इसी पार्थिव छाया - श्रातप भावों का पञ्चचितिक पार्थिव अग्नि सम्बन्ध से विश्लेषण करते

हुए श्रुति ने कहा है-" ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्यलोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्द्ध ।

छायातपो ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥

( कठोपनिषत् १।३।१ ) [ १२५ ]

पृष्ठ 135

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्डं - * * १ - सावित्राग्निः बृहत्साम ( ज्योतिर्मयम् ) + पृथिवी ( ९ ) विवर्त्तम् सौरसंस्था -३ - सावित्रादित्यः रैवतंसाम ( प्रायुर्म्मयम् ) द्यौः ( २१ ) -83 + * विवर्त्त पार्थिवसंस्था -[ १२६ ] श्रात्मगतिनिमित्तानि - सौर सम्वत्सरः सामात्मिका बृहत्स्तौम्यत्रिलोक पार्थिवसम्वत्सरः स्तौम्यत्रिली रथन्तन्तरसामात्मिका सूर्य, पृथिवी दोनों के गर्म में उडुपति चन्द्रमा प्रतिष्ठित है । सौरज्योति के सम्बन्ध से ज्योतिर्मय ब ' हुए इस चान्द्रमण्डल में भी पृथिवीवत् साम का उपभोग हो रहा है । चूंकि यहाँ अग्नि का अभाव है, अतएव इस चान्द्रसाम के तीन पर्व नहीं होते । यही चान्द्रसाम ' राजनसाम ' नाम से प्रसिद्ध है, जिसके प्रतिमानं से श्रद्धा - रेत - यशों भावों की प्राप्ति हुआ करती है । सौरज्योतिर्मय अर्द्धचन्द्र प्रातपपथ इसकी सौरसम्वत्सर में भुक्ति है एवं सौरज्योतिर्वश्चित अर्द्धचन्द्र छायापथ है, इसका पार्थिव दितिभाग से सम्बन्ध है । इस प्रकार सूर्य्य चन्द्रमा के सम्बन्ध से दो तो प्रातपपथ हो जाते हैं एवं दो ही छायापथ हो जाते हैं । दोनों के प्रातपपथ सौरसम्वत्सरमण्डल में भुक्त हैं, दोनों के छायापथ सम्वत्सरसीमा से बहिर्भूत हैं । चान्द्र राजनसाम, सौरबृहत्साम, पार्थिव रथन्तरसाम इन तीनों में चान्द्रसाम सोमात्मक बनता हुआ अन्न है, इतर दोनों साम प्रग्न्यात्मक बनते हुए अन्नाद हैं । इन दोनों अन्नादसामों के ( सौर पार्थिवसामों के ) गर्भ ( उदर ) में भुक्त चान्द्र राजनसाम ( अन्नसाम ) स्वतन्त्ररूप से व्यवहार में नहीं आता, जैसा कि -' यदा उभौ समागच्छतः श्रतं वाख्यायते, नाद्यः ' ( शत ० ब्रा ० ) श्रुति से प्रमाणित है । पार्थिवान्नादसाम-त्रयी तथा सोरान्नादसामत्रयी दोनों का परस्पर प्रतिमान सम्बन्ध होता है । पार्थिव आग्नेयरथन्तर का सौर आग्नेय बृहत् के साथ, पार्थिववायव्य वैरूप का सौर वायव्य वैराज के साथ तथा पार्थिव आदित्य शाक्वर का सौर आदित्य रैवतसाम के साथ प्रतिमानसम्बन्ध हो रहा है । सामपर्वो की अन्तरान्तरीभाव से होने वाली पारस्परिक भुक्ति ही सामातिमान है । इसी सामभुक्ति से पार्थिव सौर रसों का एक दूसरे में आदान-प्रदान हुआ करता है, जो कि पार्थिव - सौर रस विज्ञान भाषा में ' श्येत - नौधस ' नाम से प्रसिद्ध हैं । यही सौर- पार्थिव प्राणदेवताओं का परस्पर आदान - प्रदानात्मक यज्ञसम्बन्ध है, जो कि द्यावापृथिव्य सम्वत्सर-यज्ञ भौमप्रजा की प्रतिष्ठा बन रहा है । जिन प्रतिवाहिकों का स्वरूप आगे बतलाया जाने वाला है, उनका देवयान- पितृयाण मार्गों से सम्बन्ध है, इन मार्गों का सौर पार्थिवसामों से सम्बन्ध है, अतएव प्रसङ्गतः इन सामस्वरूपों का दिग्दर्शन करना आवश्यक समझा गया है । * -सावित्राग्निगभितः- मघवेन्द्र प्राणप्रधानः - सूर्य्य पिण्ड: ( भूमि:) २ - सावित्रवायुः + वैराजंसाम ( गौर्म्मयम् ) + अन्तरिक्षम् ( १५ ) * –वासवेन्द्रगर्भितः → प्राङ्गिरसाग्निप्रधानः - भूपिण्ड: ( भूमि:) १ - प्राङ्गिरसाग्निः - रथन्तरंसाम ( वाङ्मयम् ) + पृथिवी ( 2 ) २ - प्राङ्गिरसवायुः + वैरूपं साम ( गौर्म्मयमयम् ) + अन्तरिक्षम् ( १५ ) ३ - प्राङ्गिरसादित्यः शाक्वरसाम ( द्यौर्म्मयम् ) द्यौः ( २१ )

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि पार्थिवसाम प्रतिकृतिः -आ ब प शाकरं साम वैरूपं साम रथन्तरं साम / 27 द्यौः २१ अन्तरिक्षम १५ पृथिवी II भूपिण्ड III रथन्तरसाममण्डलम् थः h श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय जयपुर । प्राणसोम को रथन्तरसाम कहा जाता है । इस पार्थिवसोम को " रथं - सूय्यं – तरति ” निर्वचन के कारण ही रथन्तर कहा जाता है । उक्त परिलेख में आङ्गिरस अग्नि के सम्बन्ध से अग्नि - वायु-आदित्य ये तीन पार्थिव विवर्त्त बतलाये गये हैं । इनमें प्राङ्गिरस अग्निमण्डल की सीमा रथन्तरसाम है । प्राङ्गिरस वायु ( यमवायु ) की सीमा वैरूपं साम है । आङ्गिरस आदित्य की सीमा शाक्वरं साम है । इन तीनों की समष्टि को ही पार्थिव सम्वत्सर साम या रथन्तर साम भी कहा जाता है ।

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श्राद्ध विज्ञान चतुर्थ खण्ड सौरसाम प्रतिकृतिः म ल ण्ड I X रैवतं साम वैराजं साम बृहत् साम श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय जयपुर । एकविंशस्तोमः पंचदशास्तोमः त्रिणवस्तीम २१ १५ सूर्य: सावित्राग्निः सावित्रवायुः सावित्रादित्यः आत्मगति निमित्तानि वृहत्‌साममण्डलम् I अ णे द्रः मु स जहाँ तक सौरमण्डल की व्याप्ति है, वहाँ तक सौर इन्द्रप्रधान ज्योतिर्म्मयतत्त्व व्याप्त है । यही व्याप्ति प्रारण " वृहत्साम " नाम से प्रसिद्ध है । इसके मण्डल के गर्भ में सावित्राग्नि सम्बन्ध से अग्नि वायु- श्रादित्य ये तीन सौरविवर्त भुक्त हैं । जहाँ तक सावित्राग्नि व्याप्त है उस मण्डल की अन्तिम सीमा " बृहत्साम " है, सावित्रवायु की सीमा ' वैराजसाम ' है तथा सावित्रादित्य की सीमा ' रैवतंसाम ' है । इन तीनों की समिष्टि ही सौरसाम या वृहत्साम मण्डल कहलाता है । उक्त प्रतिकृति में यही स्पष्ट किया गया है ।

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि सौर- पार्थिवसमातिमान-परिलेखः प Telah b रैवत्पृष्ठम् वैराजपृष्ठम् बृहत् पृष्ठम् त - क आ श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय जयपुर । सामपर्वो की अन्तरान्तरी भाव से होने वाली पारस्परिक भुक्ति ही सामतिमान है । इसी साम भुक्ति से पार्थिव - सौर रसों का एक - दूसरे में आदान-प्रदान हुआ करता है, जो कि पार्थिव - सौर रस विज्ञान भाषा में ' श्वेत- नौद्यस ' नाम से प्रसिद्ध है । उक्त परिलेख से पार्थिवान्नाद सामत्रयी एवं सौरान्नाद सामत्रयी का परस्पर अतिमान सम्बन्ध स्पष्ट किया गया है ।

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड श्रात्मग तिनिमित्तानि सौर पार्थिवसम्वत्सर भोग परिलेख: --अन्तरिक्षम् पृथिवी एकविंशः २१ पञ्चदशः १५ त्रिवृत् रह ज - * प रैवतम् क्रान्तिवृत्तम् -: मार्ग भूपरिभ्रमण वैराजम् वृहत् थः छा प अन्तरिक्षम् शाकपरम् पृथिवी वैरूपम् त्रिवृत् ए रथन्तरम भूपिण्डः ) आ : एकविंश २१ पञ्चदशः १५ थः b पार्थिव आग्नेय रथन्तर का सौर आग्नेय बृहत् के साथ, पार्थिव वायव्य वरूप का सौर वायव्य वैराज के साथ तथा पार्थिव ग्रादित्य शाक्वर का सौर आदित्य रैवत साम के साथ प्रतिमान सम्बन्ध हो रहा है । इसी सामातिमान के कारण हो पार्थिव सौर रसों का एक - दूसरे में प्रदान - प्रदान होता है । श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर ।

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श्राद्धविज्ञान चतुथे खण्ड - * १ - आङ्गिरसाग्निमयस्य रथन्तरसाम्नः-( २ ) सावित्राग्निमयेन बृहत् साम्ना - प्रतिमानम्-. * २ - आङ्गिरसवायुमयस्य वैरूपसाम्नः ---( २ ) सावित्रवायुमयेन वैराजसाम्ना - प्रतिमानम् -* ३ - प्राङ्गिरसादित्यमयस्य शाक्वरसामस्य -३ ( ३ ) सावित्रादित्यमयेन रैवतसाम्ना - अतिमानम् -- * * १ - सौर सम्वत्सरमण्डलम् — बृहत्सामात्मकम् ---२ - चान्द्रसम्वत्सरमण्डलम् - राजनसामात्मकम् -- * * [ १२७ ] श्रात्मगतिनिमित्तानि * रथन्तरंपार्थिवम्, - बृहत् सौरम् -- → वैरूपं पार्थिवम्, +१ वैराजं सौरम् शाक्वरं पार्थिवम् → रैवतं सौरम् ( अन्नादमयम् ). + ( अन्नमयम् ) I+ ३ – पार्थिवसम्वत्सरमण्डलम् - रथन्तरसामात्मकम् ( अन्नादमयम् ) सपरिलेख उक्त विवेचन से यह भलीभाँति सिद्ध हो जाता है कि, आध्यात्मिक संस्था में भुक्त प्रग्नि-सोम तत्त्व आधिदैविक संस्था में भुक्त अग्नि - सोम के युग्मभेद से दो - दो अवस्थाओं में परिणत हो जाते हैं । सौरज्योतिर्लक्षण अग्नितत्त्व है, पार्थिव ज्योति परज्योतिर्लक्षण अग्नितत्त्व है । सूर्य्यदिगनुगत चान्द्रसोम ज्योतिर्लक्षणसोम है एवं सूर्य्यविरुद्ध दिगनुगत चान्द्रसोम तमोलक्षण सोम है । ज्योतिर्लक्षणसोम, ज्योति -र्लक्षणसौर तथा पार्थिव अग्नितत्त्व में भुक्त है एवं तमोलक्षणसोम तमोलक्षण सूर्य्यविरुद्ध दिगनुगत पार्थिव छायापथ में भुक्त है । इस विवेचन से यह भी निष्कर्ष निकल आता है कि, जो ज्योतिर्मयसोम सौर- पार्थिव ज्योतिर्लक्षण अग्नितत्त्व में भुक्त है, वह तो आतपपथ ( देवयानमार्ग ) में ही अन्तर्भूत है, एवं जो तमोमय-सोम तमोलक्षण पार्थिव श्रग्नितत्त्व में भुक्त है, वह छायापथ ( पितृयाणमार्ग ) में अन्तर्भूत है । सौरप्रातप-पथ, पार्थिव प्रातपपथ दोनों की समष्टि ( जिनके गर्भ में ज्योतिर्मयसोम भुक्त है ), देवयानमार्ग है । पार्थिव छायापथ, चान्द्रछायापथ दोनों की समष्टि पितृप्रारणमार्ग है । यह स्मरण रखने की बात है कि, सूर्य्य का उत्तर से सम्बन्ध है एवं पृथिवी का दक्षिण से सम्बन्ध है । अदिति - दिति भेद से पृथिवी की दो अवस्था हो जाती हैं । स्तोमत्रयात्मिका ज्योतिर्लक्षण सूर्य्यदिगनुगता पृथिवी अदिति पृथिवी है । चूंकि इस पार्थिव संस्था में उत्तरात्मक सौरज्योति का प्राधान्य है, अतएव इसका भी सूर्य्यवत् उत्तरदिक् में ही अन्तर्भाव हो जाता है । स्तोमत्रयवश्विता - तमोलक्षणा - सूर्य्यविरुद्ध दिगनुगता पृथिवी दिति पृथिवी है । चूंकि