Part IV Atmgativigyanopanishta Part 4 — पृष्ठ 141–150
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४ · पृष्ठ 141–150
पृष्ठ 141
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्ध विज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि यह पार्थिवसंस्था भूपिण्डानुगत दक्षिणभाव से युक्त है, अतएव तदनुगतादिक् दक्षिणदिक् ही मानी गई है । इन दोनों पार्थिवसंस्थानों के मध्य में दोनों का विभाजक वह चित्य भूपिण्ड है, जो क्रान्तिवृत्त पर परिक्रमा लगाता हुआ देवासुर संग्राम का प्रवर्तक बन रहा है । अदिति पृथिवी में ज्योतिर्म्मयप्राण देवदेवतानों का साम्राज्य है, दिति पृथिवी में तमोमय प्राणासुर देवतात्रों का साम्राज्य है । यदि भूपिण्ड अपने क्रान्तिवृत्त पर चन्द्रमा की भाँति स्वाक्षपरिभ्रमण से वञ्चित रहता हुआ साम्वत्सरिकगतिभाव प्रवर्त्तक केवल क्रान्ति-गति का ही अनुगामी होता, तब तो देवासुर प्रतिस्पर्द्धा को अवसर न मिलता । क्योंकि उस दशा में अदिति - दिति संस्थाएँ सर्वथा नियत रहतीं, परन्तु देखते हैं, क्रान्तिगति के साथ - साथ ' यद्भूमिव्यवर्त्तयत् ' सिद्धान्त के अनुसार भूपिण्ड अपनी अक्षगति का भी अनुगामी बना रहता है । इसी स्वाक्षपरिभ्रमण से दैनंदिन गति का स्वरूप निष्पन्न होता है, इसी गति से मानुष अहोरात्र की उत्पत्ति होती है । कभी देव-स्थान ( अदिति ) को असुर घेर लेते हैं, कभी असुरस्थान पर देवता आक्रमण कर लेते हैं, और इस प्रकार भूपिण्डाधारेण व्यवस्थित प्रादित्य- दैत्यों में ( देवासुरों में ) भूविण्ड के स्वाक्षपरिभ्रमण से प्रतिस्पर्द्धा चलती रहती है । भूपिण्डावच्छेदेन प्रदिति - दिति भाव परिवर्तनशील हैं, यही तात्पर्य है । स्वाक्षपरिभ्रम-गावच्छिन्ना भूपिण्डानुगता इसी अस्थिर - विचाली प्रदिति - दिति के सम्बन्ध से उत्तर - दक्षिणमार्ग भी कुटिलभावात्मक बने रहते हैं, जैसा कि अनुपद में ही स्पष्ट होने वाला है । श्रुति कहती है कि, स्वाक्षपरिभ्रमण के आधार पर इस प्रकार देवता और असुरों में परस्पर स्पर्द्धा होने लगी । दोनों में अन्ततोगत्वा देवताओं की विजय हुई, असुरों का पराजय हुई । देवताओं की इस विजय का श्रेय मिला एकमात्र अग्नि के दैत्यकर्म को । झगड़ा केवल भूपिण्ड के लिए था । असुर चाहते थे, इसका हमारी ओर आगमन हो जाय, देवता कहते थे, इस पर हमारा स्वत्त्वाधिकार हो जाय । दोनों ने अग्नि, सहरक्षा नाम के अपने - अपने दूत भेजे और यह साधा ( शर्त ) की कि, जिसके दूत के साथ भूपिण्ड सौर ग्रावेगा, वह विजेता समझा जायगा, अन्य विजित माना जायगा । परिणाम यह हुआ कि, देवदूत अग्नि की ओर भूपिण्ड लौटाया, देवदेवता विजेता बन गए, सुर देवता पराभूत हो गए । स्वाक्षपरिभ्रमणानुगता दैनंदिन गति के साथ - साथ क्रान्तिपरिभ्रमणनानुगता सम्वत्सरगति का कथानकरूप से रहस्योद्घाटन करती हुई श्रुति कहती है— -१ – “ दैवाच ह वा असुराश्च उभये प्राजापत्याः पस्पृधिरे । तान्स्पर्द्धमानान् गायत्री अन्तरा तस्थौ । या बॅ सा गायत्री - श्रासीत् इयं वै सा पृथिवी इयं देवतदन्तरा तस्थौ " ( दैनंदिन गतिः ) । २ – “ त उभय ऽ एव विदाञ्चकुः – यतरान्वै न इयमुपावर्त्स्यति ते भविष्यन्ति परे तरे भविष्यन्ति ( इतरे पराभविष्यन्ति ) इति । तामुभयएवोपमन्त्रयाञ्चक्रिरे । अग्निरेव देवानां दूत आस, सहरक्षा-[ १२८ ]
पृष्ठ 142
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि इत्युसुरक्षसमसुराणाम् । सा - अग्निमेवानुप्रेयाय । तस्मादाह - ' अग्नि तं वृणीमहे ' इति । स हि देवानां दूत श्रासीत् " ( सम्वत्सरगतिः ) । पृथिवी के स्वाक्षपरिभ्रमण से ( जो कि भूपिण्ड की अपनी प्रातिस्विकगति है ) अहोरात्र का जन्म होता है । पृथिवी की चन्द्रानुगता गति से ( जो कि चन्द्रमा की अपनी प्रातिस्विकगति है ) शुक्ल - कृष्णपक्ष का जन्म होता है । पृथिवी की सूर्य्यानुगतागति से ( जो कि सौर सप्ताहोरात्ररूप सप्तछन्दोऽनुगत क्रान्ति-वृत्त से सम्बद्ध है ) उत्तरायण दक्षिणायन का जन्म होता है । ग्रहः, शुक्लपक्ष, उत्तरायण ये तीन भाव श्रदितिमूलक हैं । रात्रि, कृष्णपक्ष, दक्षिणायन ये तीन भाव दितिमूलक हैं । अहर्मूला अदिति भूपिण्डा-नुगता है, शुक्लपक्षमूला प्रदिति चन्द्रमानुगता है, उत्तरायणमूला अदिति सूर्य्यानुगता है । रात्रिमूला दिति भूपिण्डानुगता हैं, कृष्णपक्षमूला दिति चन्द्रमानुगता है, दक्षिणायनमूला अदिति पृथिव्यनुगता है । जिस प्रकार भूपिण्ड, चन्द्रपिण्ड में प्रदिति - दिति दोनों भावों का भोग है, वैसे- सूर्य्यसंस्था में दोनों का भोग न होकर ( स्वज्योतिर्भाव से ) केवल अदिति का ही भोग है, और यही सूर्य्यमूला स्थिर अदिति मानी गई है । इस स्थिर अदिति का सौर सम्वत्सर में भोग हो रहा है । सम्वत्सरगतिलक्षण क्रान्तिगति के अनुग्रह से ही भूपिण्ड इस सौर स्थिर अदिति से युक्त होता है । सौर अदिति से युक्त हो जाना ही पार्थिव अदिति-गर्भित देवदेवताओं की विजय तथा पार्थिव दितिगर्भित असुरों की पराजय हुई है और इसका श्रेय पूर्वकथनानुसार पार्थिव प्रदितिमण्डलावच्छिन्न उस प्राणाग्निदूत को है, जो एति प्रेति भाव से सूर्य्यसंस्था से सम्बद्ध रखता है । स्वाक्षपरिभ्रमणमूलागति ही यदि अन्तिम गति होती, तब तो देवासुर प्रतिस्पर्द्धा का कभी अवसान न था । यद्यपि विशुद्ध स्वाक्षगति की दृष्टि से तो आज भी देवासुर प्रतिस्पर्द्धा का अवसान नहीं है, क्यों कि इस गति से भूपिण्ड का जो अर्द्धभाग कभी सूर्य्य - प्रकाश से युक्त होता हुआ ग्रहलक्षण ( ज्योतिर्लक्षण ) देवदेवताओं के अधिकार में रहता है, यही अर्द्धभाग सूर्य अर्द्धभाग से वश्चित होता हुआ तमोलक्षण असुर देवताओं के अधिकार में आ जाता है । " अहर्वे देवा अश्रयन्त, रात्रिमसुराः इस श्रुति के अनुसार ग्रहमण्डलस्थ देवस्थान कभी ( रात्रि में ) असुरों का साम्राज्य हो जाता है, एवं रात्रिमण्डलस्थ असुरस्थान में कभी ( दिन में ) देवदेवताओं का साम्राज्य हो जाता है । इस प्रकार भूपिण्डोपलक्षित दिति - प्रदिति के सम्बन्ध में देवासुर प्रतिस्पर्द्धा शाश्वत हैं, तथापि क्रान्तिवृत्ति की दृष्टि से देवासुर प्रतिस्पर्द्धा में असुरों का पराभव हो रहा है, एवं देवतानों की विजय हो रही है । इस विजय की मूलप्रतिष्ठा है - सूर्य्यमण्डलोप-लक्षिता प्रदिति । सौर सम्वत्सरमण्डल में तमोमय प्रसुरप्राण का अभाव है, जिसके गर्भ में पार्थिव अदिति प्रतिष्ठित है । सौरमण्डल इन्द्रप्राण प्रधान है, यह पूर्व में स्पष्ट किया जा चुका है । भौमवासवेन्द्र के साथ स्वाक्षपरिभ्रमण द्वारा असुर प्रतिस्पर्द्धा जहाँ स्वाभाविक है, वहाँ सौर मघवेन्द्र के साथ कभी * इस विषय का विशद्वैज्ञानिक विवेचन ' शतपथ हिन्दी विज्ञानभाष्य ' के ' सामिधेनी रहस्य ' प्रकरण में देखना चाहिए । [ १२६ ]
पृष्ठ 143
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड आत्मगति निमित्तानि असुर प्रतिस्पर्द्धा सम्भव नहीं है । इसी प्रसप: न सौर सम्वत्सरावच्छिन्न मघवेन्द्र की शाश्वत विजय का दिग्दर्शन कराते हुए मन्त्रश्रुति ने कहा है-न त्वं युयुत्से कतमच्च नाहर्त ते ऽमित्रो मघवन् कश्चनास्ति । मात् सा ते यानि युद्धान्याहुर्नाद्य शत्रुं न तु पुरा युयुत्से ॥ afrost or सूर्य्यकेन्द्रस्थ इन्द्रप्रारण से आकर्षण होता है । निश्चित था कि, यदि केवल भूपिण्ड यह में सौर इन्द्राकर्षणही होता, तो भूपिण्ड सूर्य्य गोलक में विलीन हो जाता । परन्तु इस सौर आकर्षण के साथ - साथ ही भूपिण्ड स्वयं भी प्रशयनायामूलक विष्णु देवता के प्रत्याकर्षण में भूपिण्ड जहाँ सूर्य्यविरुद्धदिक् में जाना चाहता है, वहाँ सूर्य्याकर्षण से सूर्य्यं में भुक्त होना चाहता है । इन दोनों बलों के समतुलन से न तो भूपिण्ड सूर्य्यगोलक में ही भुक्त होता, न तो सूर्य्यविरुद्धदिक् में ही चला जाता । श्रपितु सूर्य के चारों ओर कुटिलात्मिका बिन्दु से इसकी सर्वत्सरलक्षणा सम्वत्सरगति हो जाती है । यदि भूपिण्ड सूर्य्यगोलक में भुक्त हो जाता, तब तो भीम आसुरप्राण का सर्वथा विनाश था । यदि भूपिण्ड सूर्य्यविरुद्धदिक् में सीधा लोकालोक स्थान में भुक्त हो जाता है, तो पार्थिव देवप्राण का विनाश था । परन्तु इस सम्वत्सरगति से पार्थिव देवप्राण के अधिकार में भूपिण्ड श्रा जाता है, भौम असुरप्राण का पराजयमात्र होता है । कहने का तात्पर्य यही है कि, सोरसम्वत्सर सूर्य्यमूला स्थिर अदिति है । पार्थिव सम्वत्सरमूला अदिति भी इस सौर सम्वत्सरमूला प्रदितिगर्भ में प्रतिष्ठित होती हुई तद्रूप बनती हुई स्थिर अदिति बन रही है । इस प्रकार सम्वत्सरगति के अनुग्रह से प्राप्त स्थिर अदितिभाव द्वारा देवताओं की ( पार्थिव देवताओं की ) विजय हो रही है, पार्थिव असुरों की पराजय हो रही है । वस्तुतत्त्व में भेद नहीं है, केवल कोण में अन्तर है । विशुद्ध स्वाक्षपरिभ्रमण से जब प्राप पार्थिव अदिति - दिति भावों का विचार करेंगे, तो उस दशा में केवल अहोरात्रचक्र पर आपकी दृष्टि जायगी और इस चक्र में आप देखेगें कि कभी अदिति स्थान पर असुरों का, कभी दिति स्थान पर देवताओं का आक्रमण हो रहा है । जब आप सौर • सम्वत्सरानुगता क्रान्तिगति पर दृष्टि डालेंगे, तो आपको विदित होगा कि, पार्थिव अदिति में न तो कभी असुरप्राण का प्रवेश ही सम्भव एवं न भूपिण्ड कभी सम्वत्सरचक्र से ही वञ्चित । इसी सम्बन्ध में इस मस्थिति को भी लक्ष्य में रखना पड़ेगा, यद्यपि पार्थिव प्रदितिभाग ( पार्थिव सम्वत्सर ) सौर प्रदिति ( विशुद्ध प्रातपपथ ) मण्डल में भुक्त होकर विशुद्ध श्रातपपथ ही है, तथापि भूपिण्ड की साम्वत्सरिकगति से इस. पार्थिव अदिति में ऋजु - वक्रभावों का समावेश रहता है । षण्मासात्मक उत्तरायणकाल में जहाँ पार्थिवदिति सर्वथा ऋजुभाव में परिणत रहती है, षणमासात्मक दक्षिणायणकाल में यही पार्थिवदिति सूर्य को स्वदक्षिणभाग में लेती हुई वक्रभाव में परिणत हो जाती है । इस ऋजु वक्रभाव का परिणाम यह होता है कि, पपथात्मक देवयान भी दो भावों में परिणत हो जाता है एवं छायापथात्मक पितृयाण भी दो भावों में परिणत हो जाता है, जैसा कि अनुपद में ही स्पष्ट होने वाला है । इसमें कोई सन्देह नहीं कि पार्थिव अदिति, सौर अदिति गर्भ में भुक्त होकर असुरप्राणाक्रमण से बहिर्भूत है, यह भी निर्विवाद है [ १३० ]
पृष्ठ 144
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बीबालचन्द्र यन्त्रालय जयपुर । श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड सोर आतपपथ: -( नात्र छायापथः ) चान्द्र छायातपोः आतप-पथश्चान्दः : 112 ) 17325-22 ( छायापथः सौम्यः अदितिः 17 सूर्य आत्मविनिमित्तानि से चान्द्र पितृ-इस दृष्टि ही ॥ इस एक है हैं से होता कहते भेद भी पितृपक्ष पोमण्डल छायापथ सोम एक का पन्थान्तर्गत लक्ष पितृयाण - दिति आप के को या चन्द्रमासान्गाविव ।है स्पष्ट से परिलेख । प्रस्तुत हैं जाते हो विस दो के पथ । है इसमें । सायुज्य किया हैसाथ स्पष्ट के यही कहलाता में तत्व ब्रह्मपथ परिलेख मार्ग उक्त । यह । है है होता देवयानपत्थान्तर्गत होता प्रभाव निमित प्रातपपथ का सौरछायाप्राप्तिका
पृष्ठ 145
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड पार्थिवछायतपौ-पार्थिव-आतपपथ श्रात्मगतिनिमित्तानि २१ अदितिद्यौरदिति नारिर्माट अन्तरिक्षम आदितिगर्भस्यादेवा मर्माता स पिता सपुत्र: 24 पृथिवी पृथिवी भूमिः दिति ( भूच्छाया ) श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय जयपुर । सौर संस्था में सूर्य, चन्द्रमा, भूपिण्ड इन तीनों पिण्डों के तीन प्रतपपथ हैं । इनमें चन्द्रमा और भूपिण्ड के प्रातपपथों के साथ - साथ छायापथ भी सम्बन्धित हैं । इन दोनों छायापथों में से पार्थिव छायापथ पितृयाणान्तर्गत यमपथ कहलाता है । उक्त परिलेख में यही स्पष्ट किया गया है ।
पृष्ठ 146
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्डं आत्मगतिनिमित्तानि कि, सौर स्थिर अदितिमण्डल में भुक्त होने से पार्थिव अदिति भी स्थिरधर्म से प्राक्रान्त है, परन्तु अपनी प्राति स्विकगति से पार्थिव प्रदिति ( पार्थिव प्रातपपथ ) गतिशील ही बन रहा है और इसी पार्थिव अदिति में भूपिण्ड - चन्द्रमा - क्रान्तिवृत्त इन तीन अनुबन्धों से क्रमश: अहोरात्र, शुक्ल - कृष्णपक्ष, उत्तरायण-दक्षिणायन इन विरुद्ध द्वन्द्वों का भोग हो रहा है । उधर सूर्य्यमूला अदिति में केवल ग्रहः शुक्लपक्ष, उत्तरायण इन्हीं तीन भावों का प्राधान्य है । सौरसंस्था में रात्रि, कृष्णपक्ष, दक्षिणायन तीनों प्रतिद्वन्द्वियों का एकान्ततः प्रभाव है ।. सूर्य, चन्द्रमा, भूपिण्ड इन तीनों के तीन आतपपथ हैं एवं चन्द्रमा तथा भूपिण्ड इन दोनों के साथ प्रातपपथ के साथ - साथ छायापथ का भी सम्बन्ध है । इस प्रकार तीन प्रातपपथ हो जाते हैं एवं दो छायापथ हो जाते हैं । इन तीन प्रातपपथों की समष्टि देवयानः पन्थाः है एवं दो छायापथों की समष्टि पितृयाणः पन्थाः है । तीन प्रातपपथों में से सौर प्रातपपथ देवयानपथान्तर्गत ब्रह्मपथ है, पार्थिव प्रातपपथ देवयानान्तर्गत देवपथ है । इस दृष्टि से सौर- पार्थिव - अदितिलक्षण ग्निज्योतिमंण्डल भेद से एक ही देवयानः पन्थाः के दो विवर्त हो जाते हैं । तीसरा चान्द्र प्रातपपथ दोनों पथों में अन्तर्भूत है । तात्पर्य, ब्रह्मपथ में भी चान्द्र प्रातपपथ भुक्त है, एवं देवपथ में भी चान्द्रपथ मुक्त है । इसीलिए तीन श्रातपपथों अन्ततोगत्वा दो ही प्रातपपथ रह जाते हैं । दोनों छायापथों में से चान्द्रछायापथ पितृयाणः पथान्तर्गत पितृपथ है एवं पार्थिवछायापथ पितृयाणान्तर्गत यमपथ है । इस दृष्टि से चान्द्र - पार्थिवदितिलक्षण सोमतमो-मण्डल भेद से एक ही पितृयागः पन्था के दो विवर्त हो जाते हैं । पहले परिलेख द्वारा इन चारों पथों को लक्ष्य बनाइये, अनन्तर प्रतिवाहिकभावों का समन्वय कीजिए । - * १ - सौर आतंपपथः २ - चान्द्र प्रातपपथः ३ – पार्थिव प्रातपपथः → ब्रह्मपथः १ → देवपथः २}- देवयानः पन्थाः ( शुक्लगतिः ) -- श्रात्मगतिः --- * १ - चान्द्र छायापथ: -पितृपथ: ३ - पितृयारण: पन्थाः ( कृष्णगतिः ) ) २– पार्थिव छायापथः--8 → यमपथः ४ उक्त प्राकृतिक स्थिति को लक्ष्य में रखते हुए ही प्रतिवाहिकों का समन्वय करना है । इन प्रतिवाहिकों के ' तत्वात्मक, कालात्मक ' भेद से ये चारों शब्द वस्तुतः ज्योतिर्भाग के वाचक हैं । व्यवहृत होने लगे दो - दो विवर्त्त हैं । अहः - शुक्लपक्ष - उत्तरायण - सम्वत्सर आगे जाकर तत्वभोगात्मक काल की महरादि नामों से | हराग्नि का जितने समय में भोग होता है, वह समय भी ताच्छब्ध - न्याय से अहः [ १३१ ]
पृष्ठ 147
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगति निमित्तानि कहलाने लगा है । यही अवस्था पक्ष - उत्तरायण - सम्वत्सर शब्दों में समझिए । एवमेव रात्रि, कृष्णपक्ष, दक्षिणायन ये तीनों शब्द सोमतत्त्व के वाचक हैं । श्रागे जाकर तत्त्वभोगात्मक काल भी रात्र्यादि नामों से व्यवहृत होने लगे हैं । अवश्य ही कालात्मक ग्रहादि, रात्र्यादि का तत्त्वात्मक प्रहरादिरात्र्यादि पर विशेष प्रभाव पड़ता है । अतएव तत्तत्कालविशेषों में उत्क्रान्त आत्मा तत्तद्विशेषतत्वात्मक प्रतिवाहिकों को ही अपनी परलोकगति का निमित्त बनाता है । अब हमें देखना यह है कि, उक्त चार पथों में उत्क्रान्त आत्मा के कौन - कौन पर्व प्रातिवाहिक बनते हुए आत्मगति के निमित्त बनते हैं? सर्वप्रथम सौरप्रातपपथ लक्षण ब्रह्मपथ में भुक्त प्रतिवाहिकों का विचार कीजिए । यह कहा जा चुका है कि, सौरमण्डल में तम ( छाया ) का प्रभाव है । केवल पार्थिव प्रातपपथ के भुक्ति सम्बन्ध से, दूसरे शब्दों में भूपिण्डावच्छिन्न दैनंदिनगति के, दक्षवृत्तानुगता चान्द्रगति ( पाक्षिकगति ) के, तथा क्रान्तिवृत्तानुगता साम्वत्सरिकगति के सम्बन्ध में सौर प्रातपपथ अहः, शुक्लपक्ष, उत्तरायण, सम्वत्सर ये चार पर्व हो जाते हैं । अहोरात्र, शुक्ल - कृष्णपक्ष, उत्तरायण - दक्षिणायन इन द्वन्द्वभावों का वहीं समन्वय सम्भव है, जहाँ छाया का प्रवेश सम्भव हो । सौरसम्वत्सरमण्डल जब कि विशुद्धज्योतिर्म है, तो इसमें रात्र्यादि का समन्वय कैसे सम्भव है । वस्तुतस्तु इन सौर पर्वो को केवल ' अहः ' शब्द से ही व्यवहृत करना चाहिए । पक्षादिपर्व नाम तो आपेक्षिक हैं | स्वयं अपने प्रातिविक ज्योतिर्भागापेक्षया तो सौर ज्योतिर्म्मण्डल तथा तद्भोगकाल ' ग्रहः ' है, जैसा कि - ' स्वहर्देवाः सूर्य्यः ' इत्यादि ब्राह्मणश्रुति से प्रमाणित है । अतएव वषट्कारमण्डल ' अहर्गण -मण्डल ' नाम से ही व्यवहृत हुआ है । सौर प्रातपपथ भुक्त पर्वो के अतिरिक्त आध्यात्मिक अग्निज्योति भी अतिवाहिक बनता है । शारीर अग्निज्योति ही ' श्रचि ' नामक पहला प्रतिवाहिक पर्व है । उत्क्रान्त आत्मा पहले इसी आतिवाहिकपर्व में श्राता है, अनन्तर अहः पर्व में, अनन्तर पक्षपर्व में, अनन्तर चन्द्रपर्व में, अनन्तर उत्तरायण पर्व में, अनन्तर सम्वत्सर पर्व में पहुँचता है । कहा जा चुका है कि, चान्द्रप्रातपपथ अन्तर्भुक्त है । सपिण्डताप्रवर्त्तक महानात्मा के साथ सम्बद्ध इस उत्क्रान्त कर्मात्मा को एक बार श्रर्चिः-अहः - पक्ष द्वारा पहले चान्द्र प्रातपपथ में लाना पड़ता है, यहाँ से उत्तरायणपर्व का अनुगामी बनना पड़ता है । चूंकि श्रातपपथात्मक चान्द्रपर्व का अन्नात्मकत्वेन शुक्लपक्षात्मक सौरपर्व में अन्तर्भाव है, अतएव इसका श्रुति में पृथक्रूप से ( चान्द्रपर्व रूप से ) ग्रहण नहीं हुआ है । सम्वत्सरानन्तर स्वयं सूर्य केन्द्र प्रतिवाहिक • बनता है, यही श्रादित्य नाम से प्रसिद्ध है । इस प्रतिवाहिक के द्वारा उत्क्रान्त श्रात्मा इस क्रमगति से ब्रह्मलोक में पहुँचकर सायुज्यमुक्ति नामक अपरामुक्ति का पात्र बन जाता है । इस प्रकार ब्रह्मपथानुगता मुक्तिगति में अचिः श्रहः, शुक्लपक्षः, चान्द्रश्रातपपथः, षण्मासा- उत्तरायणम्, सम्वत्सरः सूर्यः, ये सात प्रतिवाहिकपर्व हो जाते हैं । अब इस ब्रह्मपथ के सम्बन्ध में प्रश्न यह उपस्थित होता है कि, सौर प्रातपपथात्मक इस देवयानः पन्था को ' ब्रह्मपथ ' क्यों कहा गया? यद्यपि लोकनिरुक्ति - परिच्छेद में इन पथों का वैज्ञानिक विश्लेषण होने वाला है, तथापि सन्दर्भसङ्गति के लिए यहाँ भी दो शब्दों में प्रकृत प्रश्न का समाधान कर दिया जाता है । उत्क्रान्त प्रेतात्मा इस ब्रह्मपथात्मक देवयानमार्ग से अचिरादि प्रतिवाहिकों पर क्रमश: प्रारूढ होता हुआ अन्ततोगत्वा ब्रह्मलोक में पहुँच जाता है । चूंकि यह मार्ग ब्रह्मतत्त्व के साथ सायुज्यप्राप्तिका निमित्त [ १३२ ]
पृष्ठ 148
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि है, अतएव इसे ' ब्रह्मपथ ' कहना श्रन्वर्थ बनता है । साथ ही ' ब्रह्म ' नामक तत्त्व विशेष के साथ सायुज्य मुक्ति प्राप्त करने वाले उत्क्रान्त आत्मा की यह आत्मगति का ' ब्रह्मगति ' नाम से व्यवहृत -चरितार्थ बनता है । ' आज्ञाचक्र ' सिद्धा, सुषुम्णा - नाड्यनुगता यही आत्मगति ' स यावत् होना भी वदादित्यमुपगच्छति ' ( छा ० उ ० ८।६।५ ) इस सामश्रुति को चरितार्थ बना रही है । तत्त्वविशेषात्मक क्षिप्येत मनस्ता ' ब्रह्म ' का क्या स्वरूप है? इस सम्बन्ध में भी दो अक्षर कह देना प्रप्रासङ्गिक न होगा - उस आत्मन्वी प्रजापति को सामान्यरूप से " निधर्म्मक, सर्वधर्मोपपन्न, सावररण " इन तीन संस्थाओं विभक्त माना जा सकता है । सर्वव्यापक, अन्यत्र धर्माधर्म्मात्, अन्यत्र में कृताऽकृतात्, अन्यत्र भूताद्भव्यात् अखण्ड तत्त्व ही निर्धर्मक प्रजापति है, जिसका श्रात्मन्वी लक्षण प्रजापतित्त्व शेष दोनों संस्थाओं के समन्वय पर निर्भर है । ज्ञान - क्रिया - अर्थमूर्ति, अतएव सर्वज्ञ ( ज्ञान ), सर्वशक्ति ( क्रिया ), सर्ववित् ( से प्रसिद्ध महामायात्मक महाविश्वलक्षण महाशरीरावच्छिन्न महापुरुष ही सर्वधर्मोपपन्न प्रजापति अर्थ ) नाम सप्तदश राश्यवच्छिन्न, अल्पज्ञ, अल्पशक्ति, अल्पवित्, योगमाया क्षुद्रशरीरलक्षण क्षुद्रशरीरावच्छिन्न है । ( प्राणी ) ही सावरणप्रजापति है । सर्वबलविशिष्टमूर्ति परात्परब्रह्म ही निर्धर्म विश्वातीतब्रह्म पुरुष एवं विशुद्ध व्यय भी मायापुर से प्रतीत रहता हुआ तदभिन्न है । अक्षर - क्षर विशिष्ट महामायावच्छिन्न है, अव्ययपुरुष ही सर्वधर्मोपन्न विश्वचर ब्रह्म है । अव्यय - क्षरविशिष्ट योगमायावच्छिन्न अक्षरपुरुष सावरण विश्वब्रह्म है । इसी से यह भी निष्कर्ष निकल आता है कि विशुद्ध व्यय निर्धक है, सोपाधिक ही अव्यय ईश्वर है, सोपाधिकअक्षर जीव है । इस सोपाधिक जीवब्रह्म में ही क्षरधम्र्मों का प्राधान्य है क्षरधर्म्मो के समावेश से यह अपनी वास्तविक अखण्ड ब्रह्मविभूति से वञ्चित रहता । इन्हीं हुआ क्रमश्वत्थवृक्ष का आश्रय लेता हुआ इतस्ततः भटकता रहता है । कर्माश्वत्थानुगता आत्मगति के चक्र में परिभ्रममाण जीवात्मा जिस दिन ब्रह्माश्वत्थ प्रतिष्ठा का अनुगामी बन जाता है, उस दिन जन्म यह हो जाता है । ब्रह्माश्वत्थ से सम्बन्ध रखने वाली गति ही ब्रह्मगति है एवं स्वयं ब्रह्माश्वत्थ - मृत्यु ही द्वन्द्व ' ब्रह्म का ' उच्छेद हैं | भूः भुवः स्वः, महः, जनः ( जनत् ), तपः, सत्यं ये सातों लोक ब्रह्माश्वत्थ में भुक्त हैं । सप्त-लोकात्मिका यही बल्शा विज्ञानभाषा में ' पञ्चपुण्डीराप्राजापत्यबत्शा ' नाम से प्रसिद्ध है । महामायावच्छिन्न उस एक महापुरुष के मायिक केन्द्र से ऐसी - ऐसी सहस्र धाराम्रों का विनिर्गम हुआ है, जिन सहस्रवल्शात्रों में से केवल एक बल्शा ही एक वल्शागर्भित प्राणियों का सर्वस्व है । वल्शा का हृदयावच्छिन्न ' ब्रह्म ' है, यही सातवाँ सत्यलोक है । इसी सत्यब्रह्म की दृष्टि से सहसा बल्शात्मक सर्वधर्मोपपन्न सगुणेश्वर भाग ही ' ब्रह्मश्वत्थ ' कहलाया है । वृक्ष इव स्तब्ध इस ब्रह्माश्वत्थ की एक बल्शा में स्वयम्भू परमेष्ठी चन्द्रमा, पृथिवी ये पाँच प्रधान पुण्डीर ( पर्व - पोर ) है, अतएव इस बल्शा ( टहनी ) को ' पञ्चपुण्डीरा , सूर्य्य, कहना अन्वर्थ बनता है । पृथिवी भूः है, सूर्य्य स्व: है, चान्द्र अन्तरिक्ष स्व: है, परमेष्ठी जनत् है, सूर्य्य- ' परमेष्ठी का मध्यस्थान महः है, स्वयम्भू सत्य है, स्वयम्भू - परमेष्ठी का मध्यस्थान तपः है । इस दृष्टि से एक बल्शा में सप्तलोक उपभुक्त हैं । चन्द्रमा भूपिण्ड के चारों ओर परिक्रमा लगा रहा है, भूपिण्ड के चारों ओर, सूर्य्य परमेष्ठी के चारों ओर तथा परमेष्ठी स्वयम्भू के चारों ओर परिक्रमा सूर्य्य लगा रहा है । स्वयं स्वयम्भू स्थिर है, यहाँ श्राकर उक्त हृत्प्रतिष्ठा के सम्बन्ध में गतिधर्म्म उच्छिन्न हो जाता है । सातों [ १३३ ]
पृष्ठ 149
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि लोकों में भूरादि ६ लोक गति सम्बन्ध से ' बळिमा ' रजांसि ' हैं, सातवाँ सत्य स्वयम्भू ' ब्रह्म वै सर्वस्य प्रतिष्ठा ' ( शत ० ६ | १ | १ | ६ ) के अनुसार प्रतिष्ठालक्षणं स्थिर ' परोरजा ' है । इस स्थिर परोरजा के आधार पर इतर छनों रज प्रालम्बित हैं, जैसा कि निम्नलिखित मन्त्रवर्णन से प्रमाणित है -१ - तित्रोमातृस्त्रीन् पितृन् बिभ्रदेक ऊर्ध्वस्तस्थौ नेमव ग्लापयन्ति । मन्त्रयन्ते दिवो अमुष्य पृष्ठे विश्वमिदं वाचमविश्वमिन्वाम् ॥ ( ऋक् ० सं ० १।१६४।१० ) ।
-प्रचिकित्वाञ्चिकितुषश्चिदत्र कवीन् पृच्छामि विद्मने न विद्वान् ।
वि यस्तस्तम्भ षळिमा रजांस्यजस्यरूपे किमपि स्विदेकम् ॥
( ऋक् सं ०१।१६४।६ ) । उत्तरायण मार्ग द्वारा सूर्य्यलोक का भेदन कर सत्यब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाना ही ब्रह्मपथानुगता ब्रह्मगति है, जिसे ' अपरामुक्ति ' भी कहा गया है । सत्यस्वयम्भू वस्तुतः प्राकृत विवर्त्त है, अतएव इसमें समवलय का अभाव है । अतएव इसे ' अपरामुक्ति ' कहना श्रन्वर्थ बनता है । सूर्य्य भेदन के अनन्तर क्रमशः पारमेष्ठ्य, स्वायम्भुव ये दो लोक आते हैं । पारमेष्ठ्यलोकगति जहाँ ' अपुनर्मार ' तथा ' कामप्र ' नामों से व्यवहृत हुआ है, वहाँ स्वायम्भुवलोकगति ' अशोकमहिम ' नाम से प्रसिद्ध हुई है । मृत्युप्रवर्त्तक सूर्य की सीमा से बाहर ( ऊर्ध्व ) जन्म - मृत्यु का प्रभाव है, इसलिए तो सूर्योर्ध्वलोक ' यत्रगत्वा न पुनम्रयते ' निर्वचन से ' अपुनर्मार ' कहलाया है एवं इस लोक में ' यं यं कामयते, तं तमाप्नोति ' न्याय से पारमेष्ठ्य-लोकावाप्ति के अनन्तर आत्मा यथाकाम, यथाचार बन जाता है, अतएव ' कामपु ' लोक कहना श्रन्वर्थ बनता है । स्वायम्भुवब्रह्मलोक स्वःपद बनता हुआ भूमभाव परिणति का कारण बन दुःखासंभिन्न है, अतएव इसे ' अशोकमहिम ' कहना प्रन्वर्थ बनता है, जैसा कि निम्नलिखित वचनों से प्रमाणित है । १
- यन्न दुःखेन सम्भिन्नं यच्च ग्रस्तमनन्तरम् ।
अभिलाषोपनीतञ्च तत् पदं स्वः पदास्पदम् ॥
२ -- " तद्वा एतत् परमं धाम यत्र न सूर्यस्तपति, यत्र न वायुर्वाति, यत्र न चन्द्रमा भाति, यत्र न नक्षत्राणि भान्ति, यत्र नाग्निर्दहति, यत्र न मृत्युः प्रविशति, यत्र न दुःखम् । सदानन्दं शान्तं सदाशिवं ब्रह्मा-दिवन्दितं, योगिध्येयं परमं पदम् । यत्र गत्वा न निवर्त्तन्ते योगिनः ” ( नृ ० पू ० उ ० ५।८ ) । [ १३४ ]
पृष्ठ 150
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड ww आत्मगतिनिमित्तानि ३ – " स तत्र विजिहीते, यथा दुन्दुभेः खम् । तेन से ऊर्ध्व श्राक्रमते, स लोकमागच्छति - अशोकमहिमम् । तस्मिन् वसति शाश्वतीः समाः । ” -धीर १ - स्वयम्भूः सत्यम् ( ७ ) ( बृ ००० ५।१०।१ ) * अन्तरिक्षम् + तपः ( ६ ) → ब्रह्मलोकः २ - परमेष्ठी + जनत् ( ५ ) ३ – सूर्य्यः--अन्तरिक्षम् + महः ( ४ ) : स्वः ( ३ ) ] + देवलोकः + क्रमभुक्तिः अपरा * - श्रन्तरिक्षम् भुवः ४ – पृथिवी भूः ( २ ) ] + पितृलोक: ( १ ) ] मनुष्यलोकः -सूर्योर्ध्व ब्रह्मगति है, तदनुगतमार्ग ब्रह्मपथ है, यही उक्त कथन का निष्कर्ष है । इस ब्रह्मपथानुगता ब्रह्मगति में १ ९ प्रतिवाहिक उत्क्रान्त श्रात्मा का वहन करते हैं । शारीराग्निमण्डल पहला प्रतिवाहिक है । जैसा कि प्रकरणारम्भ में स्पष्ट कर दिया गया है, आध्यात्मिक प्राग्नेयमण्डल ही पहला ' च ' नामक प्रतिवाहिक है । ज्ञानविधूतपाप्माओं का यह बहिर्म्मण्डल ज्योतिर्मय बनता है । उत्क्रान्त आत्मा सर्वप्रथम इसी आध्यात्मिक प्रचिर्लक्षरण बहिर्म्मण्डल में कुछ क्षणों तक ठहरता है । अनन्तर ' हर्भाग ' प्रतिष्ठित रहता है । हर्भाग से ' शुक्लपक्ष ' को अपना प्रतिवाहिक बनाता है । यहाँ से ' चान्द्रछायापथ ' का अनुगामी बनता है । अनन्तर षण्मासात्मक ' उत्तरायण ' को श्रालम्बन बनाता है । तदनन्तर देवप्राण-घन ' सम्वत्सर ' चक्र प्रतिवाहिक बनता है । अनन्तर स्वयं ' सूर्यकेन्द्र ' प्रातिवाहिक बनता है । सूर्य से आगे क्रमशः ब्रह्मणस्पति नामक पारमेष्ठ्य चन्द्रमा, बृहस्पति नामक अङ्गिरोऽग्नि, शिव-वायु, ( साम्ब सदाशिव ), प्राप्य वरुण, अङ्गिरात्म श्रादित्य, विद्युल्लक्षण इन्द्र, स्वेदवेदात्मक अथर्व प्रजापति, ये सात पारमेष्ठ्य तत्त्व प्रातिवाहिक बनते हैं । अनन्तर सूत्रात्मा, वेदात्मा, अन्तर्य्यामी ये तीन स्वायम्भुव तत्त्व प्रतिवाहिक बनते हैं । इनमें तीसरे अन्तर्यामी प्रतिवाहिक के प्रज्ञा, प्रारण, सत्य ये तीन विवर्त्त हैं । ब्रह्मलोक प्राप्त प्रात्मा प्रारम्भ में प्रज्ञात्मक रहता है, अनन्तर प्राणात्मक बनता हुआ सर्वान्त में सत्यरूप परिणत हो जाता है । यही अपरामुक्ति का अन्तिम अवसान है । इस प्रकार ब्रह्मपथानुगता ब्रह्मगति के सम्भूय एकोनविंशति ( १६ ) प्रतिवाहिक हो जाते हैं, जैसा कि परिलेख से स्पष्ट है-[ १३५ ]