Part IV Atmgativigyanopanishta Part 4 — पृष्ठ 151–160

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४ · पृष्ठ 151–160

पृष्ठ 151

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड ब्रह्मपथातिवाहिक परिलेख: -आत्मगतिनिमित्तानि ब्रह्मपथः । देवपथः । देवयानः । उत्तरमार्गः । शुक्लमार्गः । प्रकाशमार्गः । अचिमार्गः । ब्रह्ममार्गः अशोकमहिम् ब्र अ मा न ५ सत्यम् ( चित् ) १६ ४ प्राण: ( प्राणाः ) १८ : Att ३ प्रज्ञा ( चित् - प्राण - सोमः ) १७ h २ वेदात्मा ( ब्रह्म ) १६ IT १ सूत्रात्मा ( ऋतसत्यात्मा ) १५ ७ प्रजापतिः ( अथर्वः ) १४ 129 ६ इन्द्रः( विद्य ुत् ) १३ ५ आदित्य: ( अङ्गिराः ) १२ मे ४ वरुणः ( आप्यः ) ११ I १० र वः ह्म का -लो म रु प्रः कः षः देवलोकः ३ II वायुः ( साम्ब सदाशिवः ) अग्निः ( बृहस्पतिः ) २ १ चन्द्र: ( ब्रह्मणस्पतिः ) १ सूर्य: ( हृदयम् ) ५ ४ IIII सम्बत्सरः ( उख्याग्निः ) उत्तराः षण्मासाः ( देवाग्निः ) चन्द्रमाः ( चान्द्रप्रातपपथः ) २ शुक्लपक्षः ( पूर्णमासाग्निः ) पि ल्य मान लो वाव र्त्तः श्र | मनुष्यलोकः १ अहः ( अग्निहोत्राग्निः ) १ चि: ( मण्डलाग्निः ) * अग्निः ( शारीराग्निः ) [ १३६ ] 9 ब्रह्म ४ >ु त विद्य सूय्यः १ प I ४ 1 . IIII थ > वायुः ५ २ b १ I ० श * + अग्निः १

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि देवयानपथान्तर्गत ब्रह्मपथ से सम्बन्ध रखने वाली आत्मगति में पुनरावर्तन का प्रभाव हैं, यह कहा जा चुका है । देवयानपथान्तर्गत देवपथ से सम्बन्ध रखने वाली आत्मगति तथा पितृयाणपथानुगत पितृपथ एवं यमपथ से सम्बन्ध रखने वाली आत्मगतियों में पुनरावर्तन है । देवपथ के प्रातिवाहिक क्रमश: " अच श्रहः, शुक्लपक्ष, चान्द्रश्रातपपथ, षण्मासात्मक उत्तरायण, सम्वत्सर " ये विवर्त्त बनते हैं । यावत् पुण्यातिशय सौरसम्वत्सरात्मक देवलोक में प्रतिष्ठित होकर पुण्यातिशय क्षीण होने के अनन्तर पुनः आत्मा का भूपिण्ड की ओर अवरोहण हो जाता है । सौरसम्वत्सरपर्यन्त जाकर वापस लौट आना देवगति है, सौरसम्वत्सर का भेदन कर ब्रह्मलोक में चले जाना ब्रह्मगति है । पितृपथ का शारीरतमोलक्षण सोम से सम्बन्ध हैं । इस गति के अनुगामी आत्मा को पहले कुछ समय के लिए स्वधूममण्डल में रहना पड़ता है । अनन्तर रात्रि में, अनन्तर कृष्णपक्ष में, अनन्तर षण्मासा-त्मक दक्षिणायन में जाना पड़ता है । सर्वान्त में चान्द्र छायापथ द्वारा चान्द्रप्रातपपथ में यावत् पुण्यातिशय प्रतिष्ठित रहना पड़ता है । पुण्यातिशय क्षीण हो जाने पर पुनः इसे उक्त अवरोह क्रम का आश्रय लेना पड़ता है । यमपथ का शारीरंतमोलक्षण सोम से ही सम्बन्ध है एवं इस गति के प्रतिवाहिक भी वे ही हैं, जो कि पितृगति के प्रतिवाहिक है । दोनों में अन्तर केवल चान्द्रप्रातिवाहिक में हैं । पितृगति में चान्द्र-छायापथ द्वारा चान्द्रप्रातपपथ की प्राप्ति होती है, यमगति में चान्द्रप्रातपपथ का प्रात्यन्तिक प्रभाव है । यहाँ विशुद्ध तम का साम्राज्य है । अतएव इस यमगति को दुर्गति कहा जाता है । सुप्रसिद्ध चतुरशीति ( ८४ ) नरकगतियों का इस गति में अन्तर्भाव है, जैसा कि आगे स्पष्ट किया जाने वाला है । देवलोक से पुनरावृत्ति हो, अथवा पितृलोक से, अथवा तो यमलोक से पहले इस पुनरावृत्तिलक्षणा प्रगति में चन्द्रमा ही प्रातिवाहिक बनता है । चान्द्रश्रद्धारस में परिणत इसकी प्रादित्याग्नि में आहुति होती है, सोमभाव उदित हो जाता है । सोमभावात्मक प्रात्मा की पर्जन्याग्नि में प्राहुति होती है, इससे यह वृष्टिभाव में परिणत हो जाता है । वृष्टिभावात्मक आत्मा की पार्थिवाग्नि में प्राहुति होती है, इससे यह अन्नरूप में परिणत हो जाता है । प्रन्नभावात्मक आत्मा की पुरुषाग्नि में आहुति होती है, इससे यह तोरूप में परिणत हो जाता है । रेतोभावात्मक प्रात्मा की योषिदग्नि में प्राहुति होती है, इससे यह गर्भ-रूप में परिणत हो जाता है । इस प्रकार - " इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति " इस सामश्रुति के अनुसार पुनरावर्त्तन में इस प्रेतात्मा के क्रमश: " चन्द्रमा, आकाश, वायु, वृष्टि, पृथिवी, अन्न, पुरुष, रेत योषित्, गर्भ " ये १० प्रतिवाहिक बनते हैं । मनु सम्बन्ध से ही यह मानवावर्त कहलाया है । देवपथ, पितृपथ, यमपथ तीनों गतियों में मनुसम्बन्ध सुरक्षित रहता है । अतएव तद्गतियुक्त प्रेतपुरुष मानवपुरुष कहलाया है । विद्या और कर्म्म ये दो विवर्त्त ही देवयान, पितृयाणपथों के नियामक माने गए हैं । विद्यासमुच्चित कर्म ' विद्या ' है, विद्यानिरपेक्षकर्म्म ' कर्म्म ' है । विद्यात्मक कर्म्म देवयानगति का नियामक है, विद्यानिरपेक्ष-कर्म पितृया गति का नियामक है । विद्यासापेक्ष निवृत्तिकर्म्म, विद्यानिरपेक्षक, लौकिक निवृत्तिक इन तीनों से ब्रह्मपथानुगत प्रतिवाहिकों की प्राप्ति होती हैं, श्रतएव इन प्रतिवाहिकों को देवयानपथान्तर्गत [ १३७ ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड w श्रात्मगति निमित्तानि ' ब्रह्मपथ ' कहा जा सकता है । विद्यासापेक्ष प्रवृत्तिक देवपथानुगत प्रतिवाहिकों अतएव इन अतिवाहकों को देवयानपथान्तर्गत ' देवपथ ' कहा जा सकता है । विद्यानिरपेक्षप्रवृत्तिक के निमित्त बनते हैं, पथानुगत प्रतिवाहिकों के निमित्त बनते हैं, अतएव इन्हें पितृयाणपथान्तर्गत पितृ-स्वार्थकर्म्म, विरुद्धकर्म्म, निरर्थककर्म्म ये तीनों कर्म्म यमपथानुगत प्रतिवाहिकों ' पितृपथ ' कहा जा सकता है । इन्हें पितृयाणः पथान्तर्गत ' यमपथ ' कहा जा सकता है । इस प्रकार प्रक्रान्त के निमित्त बनते हैं अतएव में भी चारों पथों का समन्वय हो रहा है । परिभाषानुसार प्रातिवाहिकों ब्रह्मपथ के जिन एकोनविंशति प्रतिवाहिकों का पूर्व में दिग्दर्शन कराया उनका आठ प्रतिवाहिकों में अन्तर्भाव मान लिया है । देवपथ के अचि, गया है, छान्दोग्य ने सम्वत्सर, आदित्य ये छः प्रतिवाहिक, सातवाँ ब्रह्मणस्पति चन्द्रमा, आठवाँ ग्रहः, शुक्लपक्ष, षडुत्तरमास, में सब का अन्तर्भाव है । सूत्र, वेद, प्रज्ञा, प्राण, सत्य ये पाँचों स्वायम्भुव प्रतिवाहिक विद्य ुत, इस प्रकार आठ ही से सम्बन्ध रखते हैं । इसी दृष्टि से इन्हें स्वतन्त्र प्रतिवाहिक नहीं स्वयं गन्तव्य ' ब्रह्म ' आदित्य ( अङ्गिरा ), इन्द्र, प्रजापति ये पारमेष्ठ्य श्रातिवाहिक ' विद्यत ' में माना अन्तर्भूत गया । अग्नि, वायु, वरुण, साध्य है । इस दृष्टि से श्रचि, श्रहः, शुक्लपक्ष, षडुत्तरमास, सम्वत्सर, आदित्य ( है सूर्य । ब्रह्मणस्पति चन्द्रमा ये आठ प्रतिवाहिक ब्रह्मपथ हैं । श्रचि, श्रहः, शुक्लपक्ष, षडुत्तरमास, सम्वत्सर ), चन्द्रमा, विद्युत, ( भू उपग्रह ) ये सात प्रतिवाहिक देवपथ हैं । धूम, रात्रि, कृष्णपक्ष, षड्दक्षिणमास ,, आदित्य पितृलोक, चन्द्रमा, आतपपथ ), आकाश, चन्द्रमा ये सात प्रतिवाहिक पितृपथ हैं, यहाँ सम्वत्सर का प्रभाव है ( चन्द्र-चन्द्रछायात्मक दितिलक्षण पितृपथ अदितिलक्षण सम्वत्सर चक्र से बहिर्भूत है, जैसा कि पूर्व । परिलेखों क्योंकि भू-स्पष्ट किया जा चुका है । यमपथात्मक प्रतिवाहिकों के सम्बन्ध में विशेष वक्तव्य यही है से तो सब प्रतिवाहिक पितृपथ से समतुलित हैं, केवल चान्द्रप्रातपपथ का इस गति में प्रभाव कि यहाँ और जहाँ चान्द्रच्छाया द्वारा चान्द्रप्रातपपथ रूप पितृस्वर्गावाप्ति होती है, वहाँ यमपथ में चान्द्रच्छाया है । पितृपथ में विश्राम होकर ही पुनरावर्तन हो जाता है । मात्र पर ब्रह्म, देव, पितृ, यम, पथों के अतिरिक्त ' प्रगति ' लक्षरण दो गतियाँ और हैं । ब्रह्मगति क्रमभुक्ति है, देवगति देवस्वर्गभुक्ति है, पितृगति पितृस्वर्गावाप्ति है, यमगति नरकावाप्ति है । एक गति ऐसी है, जिसमें भूमा अथवा तो अणिमा के द्वारा यहीं समवलय हो जाता है । यही भूमोदर्क क्षीरणोदर्कलक्षण परा-मुक्ति कहलाई है, जिसका कि दिग्दर्शन आगे कराया जाने वाला है । विशुद्धबुद्धियोग ही इस प्रगति गति लक्षणा समवलयगति का निमित्त है । परमोत्तमा इस प्रगति के प्रतिद्वन्द्व में एक नितान्त निकृष्ट प्रगति और है । घोरघोरतम दुष्कर्म्म करने वालों का श्रात्मा छायापथ पर श्रारूढ होने में भी असमर्थरह जाता है । ऐसे आत्मा ' जायस्व - म्रियस्व ' के अनुसार उनका इसी भूपृष्ठ पर जन्म - मरण हुआ दोनों प्रगति - गतियों में चूंकि लोकान्तर गमन का अभाव है, अतएव इनके सम्बन्ध में प्रतिवाहिकों करता है । इन का भी प्रभाव ही सिद्ध हो जाता है । निम्नलिखित वचनों से उक्त ६ गतिविवर्त्त प्रमाणित है— [ १३८ ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड - R ऋ ३ २ -8 -8 पुनरावर्त्ते - आतिवाहिकाः [ १३ ९ ] आत्मगति निमित्तानि ww ] + अगति: ( परमोत्तमा ) > ब्रह्मगति ( उत्तमगति ) १ पन्थाः देवयानः - देवगतिः ( सद्गतिः ) २ पन्थाः पितृयाणः यमगति: ( दुर्गतिः ) प्रगतिः ( निकृष्ट ) । १ । * - " न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति इहैव समवनीयन्ते । " १– “ ये चे मे ऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युपासते, तेऽचिषमभिसम्भवन्ति, अर्चिषोऽहः, श्रापूर्यमाणपक्षं, मासान्, सम्वत्सरम्, आदित्यं चन्द्रमसं, विद्य ुतम् । तत्पुरुषोऽमानवः । स एनान् ब्रह्म गमयति । " २– “ ये चे मे ऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युपासते, ते अविषमभिसम्भवन्ति, श्रचिषोऽहः, श्रापूर्यमाणपक्षं, मासान्, सम्वत्सरम् ( तत्पुरुषो मानवः ) एष देवयानः पन्थाः " ( १ ) १ – अथ य इमे ग्रामे - इष्टापूर्ते दत्तमित्युपासते, ते धूममभि-सम्भवन्ति । धूमाद्रात्रि, अपरपक्षम् । यान् षड्दक्षिणतिमा- पितृगतिः ( सुगतिः ), सांस्तान् । नैतेसम्वत्सरमभिप्राप्तुवन्ति । मासेभ्यः पितृलोकं, आकाश, चन्द्रमसम् । ” २ – “ अथ य इमे ग्रामे, ते धूममभिसम्भवन्ति, धूमाद्रात्रि, अपर-पक्ष, मासान् " ( एष पितृयाणः पन्थाः ) ( २ ) - " प्रथैतयोः पथोर्न कतरेण च न - तानीमनि क्षुद्राण्य सकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्वम्रियस्वेति । एतत् तृतीयं स्थानम् । तेनासौलोको न सम्पूर्यते । तस्माज्जुगुप्सेत " " तस्मिन् यावत् सम्पातमुषित्वाऽथैतमेवाध्वानं पुनर्नवर्तन्ते यथेतमाकाशम् । आकाशाद्वायुं वायुर्भूत्वा धूमोभवति, धूमो भूत्वाऽभ्रं भवति, अभ्रं भूत्वा मेघो भवति, मेघोभूत्वा प्रवर्षति । त इह ब्रीहियवाः, श्रौषधि - वनस्पतयः, तिल- माषाः इतिः जायन्ते । तो वै खलु दुनिष्प्रपतरं यो यो ह्यन्नमत्ति यो रेतः सिञ्चति, तद्भूय एव भवति । तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशी ह यत्ते रमरणीयां योनिमापद्येरन्-ब्राह्मणयोनि वा क्षत्रियोनिं वा, वैश्ययोनि वा । अथ य इह कपूयचरणाः अभ्याशो! ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन् - श्वयोनि वा सूकर योनि वा चाण्डालयोनि वा । "

पृष्ठ 155

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पन्थाः पितृयाणः : प्रतिवाहिका – तमोमयाः -क्षकर्मानुगताः विद्यानि २ चतुर्थ खण्ड १ २ प्रतिवाहिकाः -' देवपथः ' ससम्वत्सररूपाः देवयानान्तर्गतो → शुक्लपक्षोत्तरायणमा अचिरहः -ज्योतिर्म्मयाः – प्रवृत्तकर्मानुगताः विद्यासमुच्चित १ । ) निमित्तभूतः देवस्वर्गगति ( प्रातिवाहिकाः -मासपितृलोकचन्द्ररूपाः दक्षिण कृष्णपक्ष घूमरात्रि -ज्योतिराभासाः – म्र्मानुगताः विद्यानिरपेक्षप्रवृत्तक २ * विद्यासापेक्षनिवृत्तिसत्कर्मानुगता १ ३ विद्यानिरपेक्षनिवृत्तिसत्कर्मानुगता २ निवृत्तिसत्कर्मानुगता लौकिक ३ । ) ( पितृस्वर्गनिमित्तभूतः २ ' पितृपथः ' : रणान्तर्गतो पितृया → वायु-- वेद- -वरुण - प्रारंण - उत्तरषण्मास-अचिरूपाः -- प्रज्ञा आदित्य सम्वत्सर- अहः -- सत्य - इन्द्र- -- सूर्य शुक्लपक्ष चन्द्र -- प्रजापति -ज्योतिर्लक्षरणाः सूत्र चन्द्रमा अग्नि ' ३ ) - ' ब्रह्मपथः क्रममुक्तिगतिनिमित्तः ( देवयानन्तर्गतो + प्रतिवाहिकाः • [ १४० ] ४ कर्मानुगताः लौकिकनिक १ विरुद्धकर्मानुगताः लौकिक २ स्वार्थकर्मानुगताः लौकिक ३ दक्षिणायनमास--- - तमोमयाः कृष्णपक्ष -रात्रि -धूम चान्द्रछायापथरूपाः ४ ': यमपय - ' पितृयाणान्तर्गतो : आतिवाहिका -) निमित्तभूतः नरकगति ( मात्मगतिनिमित्तानि

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्डं प्रकारान्तरेण तालिका संग्रहः-विद्यासमुच्चितप्रवृत्तिकर्मानुगः विद्या मार्ग: ( १ ) देवपथः प्रवृत्ति प्रधानः श्रात्मग तिनिमित्तानि विद्यानिरपेक्षप्रवृत्तिकर्मानुगः कर्ममार्ग ( २ ) पुनरावृत्तिः पितृपथः प्रवृत्तिप्रधानः पुनरावृत्तिः " इति तु पञ्चम्या माहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति । सम्बत्सरः १ ( देवयानः ) चन्द्रः चन्द्रः चन्द्रः -I D उत्तरमासाः २ ( उत्तरमार्गः ) आकाश: पितृलोक: ( पितृयाण:) २ आकाशः ३ शुक्लपक्षः ( शुक्लमार्गः ) वायुः दक्षिणमासाः ( दक्षिणमार्गः ) ४ ४ अहः ( प्रकाशमार्गः ) वृष्टिः * अचिः ( ज्योतिमार्ग ) आरोहः १० III पृथिवी ५ III अन्न I ॰ II ॰ IIII ॰ योषिति IIII IIII अवरोहः कृष्णपक्षः वृष्टि: ( कृष्णमार्गः ) रात्रिः ( तमोमार्गः ) धूमः ( घूममार्ग:) आरोहः III I वायुः III पृथिवी ५ IIII अन्न ६ III पुरुष ॰ III ॰ योषिति IIIII 1 II अवरोहः गर्भः १० गर्भः [ १४१ ] भवंति सोमो गत्वा दिवि श्रद्धा : आप – १ भवति अन्नं भवति वृष्टिर्भवति तो गत्वा गत्वा गत्वा पर्जन्ये पृथिव्यां पुरुषे सोमः वृष्टिः अन्नं – – २ - ३४ भवति पुरुषो गत्वा योषिति रेतो -५

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्डे बुद्धियोगमार्गः विद्यामार्गः कर्म्ममार्गः लौकिकमार्गः आगमनमार्गः प्रतिवाहिकाः प्रतिवाहिकाः श्रतिवाहिकाः प्रतिवाहिकाः क्षीणेपुण्ये मर्त्य-लोकेवसन्ति ब्रह्मपथः देवपथः पितृपथ: यमपथः पुनरावृत्तिमार्ग: पुनरावृत्तिमार्गः पुनरावृत्तिमार्गः पुनरावृत्तिमार्गः पुनरावृत्तिमार्गः सत्य: १ सम्वत्सरः चन्द्रमाः चान्द्रछायापथः चन्द्रमा प्राणः २ प्रज्ञा ३ वेदाः ४ - स्वयंम्भूः चन्द्रमाः ब्रह्म उत्तराः षण्मांसाः प्रकाशः आकाशः _ आकाशः पितृलोक: पितृलोक: वायुः सूत्रम् ५ शुक्लः पक्षः दक्षिणाः षण्मासाः दक्षिणाः षण्मासाः धूमः प्र ० प ० ६ अहः कृष्णपक्षः कृष्णपक्षः अभ्रम् इन्द्रः ७ श्रादि वरुणः ६ वायुः १० श्रग्निः ११ - प्रजापतिः परमेष्ठी अचिः रात्रिः रात्रि: मेघः धूमः धूमः अग्निः अन्नम् ( ज्योतिः ) ब्र. स्प. १२ सोमः सोमः रेतः | सूर्य्य: १३ ] सूर्य्यः ( तमः ) ( तमः ) पुरुषः सम्व. १४ योषित् उ.मा. १५ चन्द्र. १६ । शु.प १७ अहः १५ प्रचि १६ पृथिवी गर्भः भूः अग्नि ( ज्यो. ) ] भूः ) अग्निगतिः - शुक्लगतिः देवयानः पन्थाः सोमगतिः - कृष्णगतिः पितृयाणः पन्थाः आगतिः [ १४२ ] --आत्मगतिनिमित्तानि ॥ ॥ ॥ ॥ भवति विद्यामार्गः स कर्म्मणा इति धूमाभ्रमेघवृष्ट्यन्नम् चन्द्रमथोऽग्निवायुवरुणेन्द्रान् नावर्त्तत पितृयाणः पुनराकाशंवायुंं । चन्द्र । सम्वत्सरमादित्यं मानवमिममावतं । सोऽयंदक्षिणमार्गः । मुक्तोऽसौ यत्र पितृलोकमाकाशम् शुक्लपक्षषण्मासान् प्रयाति सत्यं पुनरावृत्तिवर्त्तते प्राणं दक्षिणामासां प्रज्ञां इतीयं कथितोऽसावचिरहः पुरुष ब्रह्मपथः प्राजापत्यं धूमनिशापरपक्षान् रेतः ) ) ) ) ( ( ( १ २ ( ३ ४ छान्दोग्यनिष्कर्षः |

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड : - श्रमानवः पुरुषः सत्य:, प्रारणः, प्रज्ञा वेदात्मा, सूत्रात्मा ब्रह्मपथ: - अपरामुक्ति: -} } → स्वयम्भूः → ब्रह्म . * प्रजापतिलोक-इन्द्रलोकः वरुणलोकः → परमेष्ठी वायुलोकः अग्निलोक: सोमलोकः सूर्य्यलोकः सम्वत्सरः मासाः - * ] → सूर्य्यः { } -- विर शुक्लपक्षः पृथिवी → वायुः अहः अर्चिः अग्निः ] → भूः ] + अग्निः [ १४३ ] आत्मगतिनिमित्तानि । भवति प्रज्ञा प्रथमं ब्रह्मलोके " ॥ " भवति भवति प्राणो सत्यं स सः ततः ततः , ब्रह्म । सत्यं नाम सत्यं सर्वेऽप्यर्थाः ततोऽन्येच प्राणाश्च " देवाश्च । कोषीतकिनः इत्याहुः " पुनरावर्त्तते स - न ब्रह्मभूतः । सम्पद्यते तदयं

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड · विद्यया - देवलोकावाप्तिः ब्रह्मपथः । देवपथः । देवयानः । उत्तरमार्गः । शुक्लमार्गः । प्रकाशमार्गः । अचिर्मार्गः । ब्रह्ममार्गः । श्रात्मगतिनिमित्तानि कर्म्मणा - पितृलोकावाप्तिः कर्म्मपथः । पितृपथः । पितृयाणः । दक्षिणमार्गः कृष्णमार्गः । तमोमार्गः । धूममार्गः -कर्ममार्गः । ब्रह्मलोकः अ पुरुषः वः मान लो क शो अ विद्युत् कः १६ सत्यम् १८ प्राणः १७ प्रज्ञा १६ वेदात्मा १५ सूत्रात्मा १४ प्रजापतिः १३ इन्द्रः + १२ प्रादित्यः ११ वरुणः १० वायुः ल अग्निः द सोमः 4 चि. लो. | चन्द्रः ७ चन्द्रमाः ७ चन्द्रमाः १- चन्द्रमाः - श्रद्धाः v आ. लो. श्रादि. ६ सूर्य्यः २ - प्राकाशः - द्यौः ६ आकाश: र्त्तः व वा न मा लो वायु ५ सम्वत्सरः ३- वायुः क ; ५ पितृलोक: → सोमः ४- धूमः ४ उ ० मासा ४ वायुः ५० मासा ५- अभ्रम् + पर्जन्यः ६- मेघः ३ शुक्लपक्षः ३ कृष्णपक्षः ७ - वृष्टिः ( पृथिव्याम् ) २ अहः 1 २ रात्रिः ८ - अन्नम् ( पुरुषे ) १ov अर्चिः A - रेतः ( योषिति ) १ धूमः * प्र. लो. प्रग्निः B अग्निः * * सोमः * १० - गर्भ: ( पुरुष:) [ १४४ ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आतिवाहिकपरिशिष्टः-श्रात्मगतिनिमित्तानि देवयान, पितृयाण मार्गों से सम्बन्ध रखने वाले ब्रह्मपथ - देवपथ - पितृपथ - यमपथरूप चारों प्रति-वाहिकों का स्वरूप यद्यपि पूर्व सन्दर्भ से गतार्थ है, तथापि अभी इस सम्बन्ध में दो एक विप्रतियाँ ऐसी बच रहती हैं, जिनका समाधान करना श्रावश्यक हो जाता है । उसी परिशिष्ट प्रश्न समाधान के लिए प्रस्तुत सन्दर्भ आवश्यक समझा गया है । देवयान तथा पितृयाणमार्गों की जिस भूपिण्ड से अनुगति होती है, वह भूपिण्ड यदि स्थिर होता, तब तो ये मार्ग सदा सर्वदा नियतभाव के ही अनुगामी बने रहते । परन्तु -भूपिण्ड के स्वाक्षपरिभ्रमण से तथा क्रान्तिपरिभ्रमण से भूपिण्ड से सम्बद्ध इन दोनों मार्गों में ऋजु - कुटिल -भावों का समावेश हो जाता है । अवश्य ही अहोरात्र, शुक्ल - कृष्णपक्ष, उत्तर - दक्षिणायन, कालविशेषों में उत्क्रान्त आत्मा की परलोकगतियों में भी कालानुगत विशेष भावों का भी समावेश रहता है । सर्वप्रथम देवयानमार्ग से सम्बन्ध रखने वाले ऋजु - कुटिलभावों का ही दिग्दर्शन कराया जाता है । " भूपिण्ड से ऊर्ध्व सूर्य्य, सूर्य्य से ऊर्ध्व परमेष्ठी, परमेष्ठी से ऊर्ध्व स्वयम्भू ब्रह्म प्रतिष्ठित हैं " इस पर्वस्थिति सिद्धान्त के सम्बन्ध में जब हम दिक् - क्रम का विचार करने लगते हैं, तो हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि इन पर्वो की स्थिति दक्षिणा दिक् को उपक्रम बना कर प्रतिष्ठित है । भूपिण्डदक्षिण में प्रतिष्ठित है, इससे उत्तर सूर्य्य प्रतिष्ठित है, सूर्य्य से उत्तर परमेष्ठी विष्णु प्रतिष्ठित है । जिस स्थान पर आज उत्तरध्रुव प्रतिष्ठित हैं, ठीक इससे उत्तर पारमेष्ठ्य विष्णु की सत्ता मानी गई है । इसी विष्णु -तत्त्व से ' कदम्ब ' नामक ' नाक ' स्थान का सम्बन्ध है, जिसके चारों ओर २५ सहस्र वर्ष में ध्रुव एक परिक्रमा समाप्त कर लेता है । जिस प्रकार विश्वद्वृत्तीय पृष्ठीकेन्द्र ध्रुव नाम से प्रसिद्ध है, एवमेव क्रान्ति-वृत्तीय पृष्ठकेन्द्र कदम्ब नाम से प्रसिद्ध है । इसका तात्पर्य यही है कि, खगोलीय मध्यस्थ विष्वद्वृत्त को भूपिण्ड से सम्बन्ध है, एवं खगोलीय क्रान्तिवृत्त का ( जिस पर भूपिण्ड की साम्वत्सरिक गति प्रतिष्ठित है ) सूर्य्य से सम्बन्ध है । विष्वद्वृत्तपृष्ठ की प्रत्येक बिन्दु से उत्तर ध्रुव ठीक ९ ० अंश पर है एवं क्रान्तिवृत्त -पृष्ठ को प्रत्येक बिन्दु से कदम्ब ठीक ९ ० अंश पर है । विष्वत् तथा क्रान्ति का अन्तर २४ अंश का माना गया है । फलतः विष्वत्पृष्ठकेन्द्रभूत ध्रुव तथा क्रान्तिपृष्ठकेन्द्रभूत कदम्ब, दोनों हृद्स्थानों का अन्तर भी २४ अंश का ही हो जाता है । २४ अंश के व्यासार्ध से ध्रुव इस कदम्ब के चारों ओर परिक्रमा लगाया करता हैं । कदम्ब स्थान ही विष्णुपर है, जो कि उत्तर में प्रतिष्ठित है । निम्नलिखित मन्त्रश्रुति इसी कदम्ब का स्पष्टीकरण कर रही है-" तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षु राततम् । ” अस्तु इन सब विषयों का अगले प्रकरण में विस्तार से स्पष्टीकरण होने वाला है । प्रकृत में इस सम्बन्ध में केवल यही वक्तव्य है कि, अग्निदेवतावच्छिन्न भूपिण्ड दक्षिण में प्रतिष्ठित है एवं इन्द्रप्राणघन सूर्य्यं भूपिण्ड से उत्तर, विष्णुप्राणघन परमेष्ठी सूर्य्य से उत्तर तथा ब्रह्मप्राणघन स्वयम्भू परमेष्ठी से उत्तर [ १४५ ]