Part IV Atmgativigyanopanishta Part 4 — पृष्ठ 161–170
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४ · पृष्ठ 161–170
पृष्ठ 161
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड winn आत्मगतिनिमित्तानि प्रतिष्ठित है । इस दक्षिणोत्तर दिक् की अपेक्षा देवयानपथान्तर्गत ब्रह्मपथ से सम्बन्ध रखने वाले प्रचि-ग्रहः - शुक्लपक्ष - उत्तरायण - सम्वत्सर - सूर्य्य - ब्रह्मणस्पति- अग्नि- वायु - वरुणादि परिगणित एकोनविंशति प्रतिवाहिक सर्वथा ऋजुमार्ग से सम्बद्ध हैं । इन ऋजुभावापन्न आतिवाहिकों से सम्बन्ध रखने वाला ब्रह्मपथात्मक देवयानमार्ग ही ( आत्मगत्यपेक्षया ) ऋजुदेवयानमार्ग है । भूपिण्ड का दक्षिणायन सूर्य का उत्तरायण है । सूर्य्योत्तरायणकाल ही वास्तविक उत्तरायणकाल है । इस उत्तरायणकाल में उत्तरदिक् का अनुगामी बनता हुआ तत्समतुलित परमेष्ठी - स्वयम्भू का ऋजुभावेन ग्राहक बना रहता है । यही कारण है कि, जिन पुण्यात्माओं का श्रात्मा उत्तरायणकाल में शरीर छोड़ता है, उनका आत्मा उक्त ऋजुभावापन्न देवयानमार्ग का आश्रय लेता हुआ ब्रह्मपथ का अनुगामी बनता है । इस मार्ग में भूलोक - सूर्य्य - परमेष्ठी -स्वयम्भू चारों समान रेखा से समतुलित हैं । एकमात्र इसी दृष्टि से ब्रह्मपथात्मक यह मार्ग ऋजुदेवयान मार्ग कहलाया है । उत्तरायणकाल में उत्क्रान्त श्रात्मा इसी देवयान का अनुगामी बनता हुआ छायापथादि की प्रतीक्षा न कर सीधा ब्रह्मलोक में चला जाता है । एकमात्र इसी आधार पर यह भी कहा जा सकता है कि, उत्तरायणादि काल गतियाँ भी अवश्य ही गति विशेषों की निमित्त बनती हैं । शरशय्यासीन भीष्मपितामह ने इसीलिए उत्तरायणकाल की प्रतीक्षा की थी । यदि दक्षिणायनकाल में, उसमें भी रात्रि में, कृष्णपक्ष में किसी ऐसे आत्मा का उत्क्रान्त होता है, जो कि निवृत्तकर्म्मबल से ब्रह्मपथ का अधिकारी . है, तो अवश्यमेव उसे प्रह: - शुक्लपक्ष - उत्तरायण कालागमन की प्रतीक्षा करनी पड़ती है । तब तक उसकी ऊर्ध्वगति अवरुद्ध रहती है । ठीक इसके विपरीत जिस ब्रह्मपथाधिकारी का प्रात्मा ग्रहः, शुक्लपक्ष, उत्तरा-यण में उत्क्रान्त होता है, वह आत्मा बिना प्रतीक्षा के ऋजुदेवयानमार्ग का आश्रय लेता हुआ बिना प्रतीक्षा के सीधा ब्रह्मलोक में चला जाता है । वरविशेषों से भीष्मादि की भाँति जो ' मृत्यु ' पर अपना अधिकार कर लेते हैं, उनका आत्मा मृत्युकाल आने पर भी शरीर से उत्क्रान्त नहीं होने पाता । यदि दक्षिणायनकाल नियत है, तो वे तत्कालपर्यन्त मृत्यु का निरोध करने में समर्थ हो जाते हैं । जब अहः-शुक्लपक्ष - उत्तरायणरूप अनुकूल समय आता है, तभी भीष्मादि की भाँति उनका ग्रात्मा उत्क्रान्त होता है । जिनका मृत्यु पर अधिकार नहीं है, और ऐसे ब्रह्मपथाधिकारियों का आत्मा यदि रात्रि - कृष्णपक्ष-दक्षिणायन में उत्क्रान्त हो जाता है, तो अवश्यमेव इन्हें ग्रहः - शुक्लपक्ष - उत्तरायण की प्रतीक्षा करनी पड़ती है । परिलेख द्वारा ऋजुदेवयानमार्ग का स्वरूप भलीभाँति स्पष्ट हो जाता है । दक्षिणायनकाल के सम्बन्ध से पूर्व प्रदर्शित देवयानमार्ग कुटिलभाव में परिणत हो जाता है । यही देवयानपथान्तर्गत देवपथ है । भूपिण्ड का उत्तरायण ही सूर्य का दक्षिणायन है एवं यही वास्तविक दक्षिणायनकाल है । उत्तरायण में जहाँ सूर्य्यं पृथिवी से उत्तर तथा पृथिवी सूर्य्य से दक्षिण में प्रतिष्ठित रहती है, वहाँ दक्षिणायनकाल में भूपिण्ड सूर्य्य से उत्तर में प्रा जाता है, एवं सूर्य्य भूपिण्ड से दक्षिण में आ जाता है । यही अवस्था अहः - शुक्लपक्ष की समझिए । ग्रहः, शुक्लपक्षात्मक श्रातपपथ भूपिण्ड से उत्तर में रहते हैं एवं रात्रि - कृष्णपक्षात्गक छायापथ भूपिण्ड से दक्षिण में रहते हैं । फलतः उत्तरायणकाल में अहः- शुक्लपक्ष - उत्तरायण तीनों ऋजुभाव में परिगत रहते हुए ऋजुदेवयान के साधक बन जाते हैं एवं दक्षिणायनकाल में अहः - शुक्लपक्ष - उत्तरायण तीनों सूर्य्य विरुद्ध स्थिति से कुटिलभाव में परिणत होते हुए कुटिल देवयान के साधक बन जाते हैं । विद्यासमुच्चित प्रवृत्तिकर्म करने वाले इसी कुटिल देवयान-[ १४६ ]
पृष्ठ 162
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड ऋजुदेवयान मार्ग परिलेख: -उत्तरा ठिक, स्वयम्भ परमेष्ठी ) अपरिभ्रमणमार्गः ( आत्मगतिनिमित्तानि ऋजु भावापन्न प्रतिवाहिकों से सम्बन्ध रखने वाला ब्रह्मपन्थात्मक देवयानमार्ग ही ( श्रात्म-गत्यपेक्षया ) ऋजु देवयानमार्ग हैं । परिलेखा-नुसार भूलोक - सूर्य- परमेष्ठी - स्वयम्भू चारों समान रेखाओं से समतुलित है । इसी दृष्टि से यह मार्ग ऋजुदेवयान मार्ग कहलाता है । उत्तरायणकाल में उत्क्रान्त ग्रात्मा इसी मार्ग का अनुगामी बनता हुआ सीधा ब्रह्मलोक में चला जाता है । श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय जयपुर ।
पृष्ठ 163
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड कुटिलदेवयान परिलेख: -उत्तरा दिक स्वयम्भूः परमेष्ठी आत्मगतिनिमित्तानि दक्षिणायन काल के सम्बन्ध से देवयान मार्ग कुटिलभाव में परिणत हो जाता है । इसे ही कुटिल देवयानमार्ग कहा जाता है । यदि किसी ' निवृत्तकर्मानु-यायी ' का आत्मा रात्रि - कृष्णपक्ष तथा दक्षिणायन में उत्क्रान्त होता है तो सर्वप्रथम उक्त उत्क्रान्त आत्मा को यही कुटिल देवयानमार्ग प्राप्त होता है । श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय जयपुर ।
पृष्ठ 164
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्डे आत्मगतिनिमित्तानि मार्ग का आश्रय लेते हैं । मान लीजिए एक व्यक्ति का आत्मा दक्षिणायनकाल में कृष्णपक्षकी रात्रि में ( आयु: सूत्र समाप्ति से ) उत्क्रान्त हो जाता है । इसके पास विद्यासमुच्चित प्रवृत्तिलक्षण वह संस्कार सम्पत्ति सुरक्षित है, जो देवयानपथान्तर्गत देवपथयति का निमित्त माना गया है । ऐसी उत्क्रान्त आत्मा रात्रि भर गतिभाव से वञ्चित हुआ सूर्य्यसत्तात्मक ग्रहः काल में गति का दशा में रात्रि में है । यदि कृष्णपक्ष की रात्रि है, तो पूरे १५ दिन तक इसे अहः काल में गमन, रात्रिकाल अनुगामी बनता पड़ेगा । जब षण्मासात्मक दक्षिणायनकाल समाप्त | जाता है, तदन्तर ही इसे उत्तरपथानुगत में विश्राम करना सम्वत्सर लोक का अनुगामी बनना पड़ेगा । इसी सम्बन्ध में यह भी स्पष्ट कर लेना चाहिए देव समुच्चित प्रवृत्ति कर्मी का आत्मा ग्रहः - शुक्लपक्ष तथा उत्तरायणकाल में उत्क्रान्त आत्मा अधिकारी कि, विद्या ऋजु - देवयानमार्ग का अवश्य बन जायगा, परन्तु ब्रह्मपथ से सम्बन्ध रखने वाली ब्रह्मगति तो केवल उत्तरस्वर्गगति पर ही इसका विश्राम हो जायगा । ठीक इसके विपरीत यदि किसी निवृत्तकर्म्मा- न होगी । नुयायी का आत्मा रात्रि - कृष्णपक्ष तथा दक्षिणायन में उत्क्रान्त होगा, तो प्रथमा धिकार इसे देवयान मार्ग का ही प्राप्त होगा, अनन्तर उत्तरमार्ग द्वारा इसे ब्रह्मलोकावाप्ति होगी कुटिल सुविधा - असुविधा के निमित्त बनते हैं । ऐसा नहीं है कि, जिनका आत्मा अहः - शुक्लपक्ष । काल विशेष केवल उत्क्रान्त हो, वे तो ब्रह्मगति के अधिकारी बन जायं, एवं जिनका आत्मा रात्रि, कृष्णपक्ष, - दक्षिणायन उत्तरायण में उत्क्रान्त हो, वे असद्गति के अनुगामी बन जायें । गति का प्रधान निमित्त तो एकमात्र कर्म्म- में ही है, जैसा कि, पूर्व में स्पष्ट किया जा चुका है । सम्वत्सर का कोई क्षण ऐसा तारतम्य की मृत्यु न हो । साथ ही विशिष्ट कालों में मरने वाले सभी प्राणी पुण्यात्मा भी नहीं नहीं जाता, जिसमें किसी का निमित्त आयुः सूत्र समाप्ति है, सद्सत् लोकगति का निमित्त कर्म्मतारतम्य है । किसी होते विशेष । उत्क्रान्ति हेतु से जो प्रायुःसूत्र पर अपना प्रभुत्व रख सकते हैं, वे गति सुविधाजनक उत्तरायणकाल गमनपर्य्यन्त मृत्यु विजय प्राप्त कर सकते हैं । जिनमें इस वैशिष्ट्य का अभाव रहता है, उनका आत्मा पर होते ही उत्क्रान्त हो जाता है, चाहे फिर उस समय रात्रि हो अथवा दिन, कृष्णपक्ष आयुः सूत्र के क्षीरण दक्षिणायन हो अथवा उत्तरायण । हाँ, इस सम्बन्ध में यह विशेषता अवश्य है कि हो, अथवा यदि रात्र्यादि शुक्लपक्ष,में उत्क्रान्ति है, साथ ही उत्क्रान्त श्रात्मा यदि ब्रह्मपथ का अधिकारी है, तो इसे पहिले कुटिल देवयान अनुगामी बनना पड़ेगा, अनन्तर ब्रह्मलोक गमन होगा । यदि देवपथ का अधिकारी है, का देवयानमार्ग द्वारा उत्तरस्वर्ग का अनुगमन करना पड़ेगा एवं पुण्यातिशयसमाप्ति के तो इसे कुटिल मृत्युलोक में आ जाना पड़ेगा । ब्रह्मपथगति में देवयान ऋजु ही रहता हो एवं देवपथगति अनन्तर में पुनः इसे कुटिल ही रहता हो, यह नियम नहीं है बहुत सम्भव है - ब्रह्मपथानुयायी को भी कुटिल देवयान का देवयान लेना पड़े । यह भी बहुत सम्भव है कि, देवपथानुगामी भी ऋजुदेवयान का अनुगामी आश्रय क्यों, विद्यानिरपेक्षसत्कर्म्म संस्कृत पितृपथानुगामी तथा विरुद्ध सत्कर्म्म संस्कृत यमपथानुगामी बन जाय । यही अहरादि उत्तरायणकाल में उत्क्रान्त हो सकते हैं । भी जिस प्रकार उत्तरायण - दक्षिणायनकाल भेद से देवयानमार्ग के ऋजु - कुटिलभेद जाते हैं, एवमेव इसी कालद्वयी के सम्बन्ध से पितृयाणमार्ग से दो विवर्त्त हो देवयान मार्ग का जहाँ प्रातपपथ ( ज्योतिर्लक्षणअग्नि ) से सम्बन्ध भी दो स्थितियों है, वहाँ पितृयाण में विभक्त हो रहा है । का छायापथ [ १४७ ]
पृष्ठ 165
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड आत्मगति निमित्तानि ( तमोलक्षणसोम ) से सम्बन्ध है, जैसा कि पूर्व में स्पष्ट किया जा चुका है । इसी से यह भी सिद्ध हो जाता है कि, जैसे अहः - शुक्लपक्ष - उत्तरायणकाल देवयान के उपोद्बलक बनते हैं, एवमेव रात्रि, कृष्णपक्ष, दक्षिणायनकाल पितृयारण के उपोद्बलक बनते हैं । भूच्छायात्मक छायापथ तथा चन्द्रच्छायात्मक छायापथ दानों मिलकर पितृयाणमार्ग के स्वरूप सम्पादक बनते हैं । भूच्छायात्मक छायापथ रात्रि है, चन्द्रच्छाया-त्मक छायापथ कृष्णपक्ष है एवं सूर्य्यदक्षिणायनात्मक षण्मासात्मककाल दक्षिणायनरूप छायापथ है । तीनों छायापथ मिल कर ऋजुपितृयाणमार्ग है । विद्यानिरपेक्षसत्कर्मानुयायी आत्मा धूमात्मक स्वच्छायापथ के अनन्तर पहले भूच्छायारूप रात्रि में, अनन्तर चन्द्रच्छायारूप कृष्णपक्ष में, अनन्तर दक्षिणायनमार्ग में आरूढ होता हुआ ऋजुभाव से पितृलोक में चला जाता है । इस प्रकार पितृयारणमार्ग में धूम - रात्रि -कृष्णपक्ष - दक्षिणायन ऋजुगति के प्रवर्तक बन जाते हैं । यदि प्रह: - शुक्लपक्ष - उत्तरायणकाल में इसकी उत्क्रान्ति होती है, तो पितृयाणमार्ग इसके लिए कुटिल हो जाता है । तत्काल प्रतीक्षा के अनन्तर ही इसे पितृलोकगमन सामर्थ्य प्राप्त होता है । यदि उत्क्रान्त आत्मा उत्तरमेरू निवासी है, तब तो यह कठिनता और भी जटिल हो जाती है । क्योंकि उत्तर-मेरू पर ( उत्तरायणकाल में ) पूरे ६ मास प्रकाश रहता है । जब तक प्रकाश रहता है, तब तक इसे भूपृष्ठ पर ही भटकना पड़ता है । दक्षिणयान कालागमनान्तर ही इसकी गति प्रारब्ध होती है । इसी से यह भी निष्कर्ष निकल आता है कि, उत्तरमेरु निवासियों के लिए उत्तरायणकाल में देवयानमार्ग ऋजु रहता है एवं दक्षिणायनकाल में कुटिल रहता है । एवमेव दक्षिणमेरु निवासियों के लिए दक्षिणायनकाल में पितृयाण मार्ग ऋजु रहता है एवं उत्तरायणकाल में कुटिल रहता है । साथ ही भारतभूमि से अपेक्षाकृत यहाँ अधिक-काल प्रतीक्षा करनी पड़ती है । कारण स्पष्ट है, मेरुस्थान सम्बन्धी जो परिवर्तन एक सम्वत्सर ( ३६५ अहोरात्र ) से सम्बन्ध रखता है, मध्यस्थ विषुव से सम्बन्ध रखने वाला वही परिवर्तन केवल एक अहोरात्र ( २४ घण्टों ) में भुक्त हो जाता है । फलतः विष्वद्वृत्तानुगत भारतीय प्रजा को ब्रह्मपथादिगमन में अधिक है— विलम्ब नहीं होता । यही भारतवर्ष का पुण्यभूमित्त्व है, जिसका निम्नलिखित शब्दों में यशोगान हुआ
गायन्ति देवा किल गीतकानि धन्यास्तु ये भारतभूमिभागे ।
स्वर्गापवर्गस्य च हेतुभूते ( फलार्जनाय ) भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात् ॥
( गरुड पु ० घ ० कां ० १ ०।२७ श्लोक ) ( छ ) आकाशः ( आत्मगतित्रैलोक्यम् ) प्रतिवाहिक - निमित्त के अनन्तर क्रमप्राप्त ' आकाश ' निमित्त की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । स्थूलशरीर परित्यागानन्तर भूलोक का परित्याग कर उत्क्रान्त आत्मा जिस अवकाश स्थान को स्वगति का निमित्त बनता है, वह ' अवकाश ' प्रदेश ही ' आकाश ' नाम से व्यवहृत हुआ है एवं वही आधिदैविक प्रकाश ' आत्मगतित्रैलोक्य ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । यह आत्मगतित्रैलोक्य देवयान पितृयाणमार्ग भेद से दो संस्थाओं में विभक्त हो रहा है, जैसा कि अनुपद में ही स्पष्ट होने वाला है । [ १४८ ]
पृष्ठ 166
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि वैज्ञानिक दृष्टि से त्रैलोक्य विभाग आठ भागों में व्यवस्थित माना गया है, जो कि आठ विभाग त्रैलोक्य-त्रिलोकी, स्तौम्यत्रिलोकी, कूम्र्म्मत्रिलोकी, उद्दढ त्रिलोकी, आत्मगतित्रिलोकी, भूतत्रिलोकी, शारीरत्रिलोकी, भौमत्रिलोकी इन आठों त्रिलोकियों का विशद विवेचन पुराणारहस्यान्तर्गत ' आण्डत्रिलोकी निरुक्ति ' नामक प्रकरण से गतार्थ है । यहाँ केवल ' आत्मगतित्रिलोकी ' का ही दिग्दर्शन कराना अभीष्ट है । ज्योतिष्चक्र ( खगोल ) से सम्बन्ध रखने वाला मान ' सावन, निरयण ' भेद से दो भागों में विभक्त माना गया है । इन दोनों में से ' सावनमान ' की अपेक्षा ३६० से अहोरात्र का एक सम्वत्सर माना गया हैं । एक - एक अहोरात्र में एक - एक अंश का भोग करता हुआ भूपिण्ड ३६० अहोरात्रों में अंशात्मक एक सम्वत्सरंचक्र की पूरी परिक्रमा लगा लेता है । सावनमानानुगत इस सामान्य परिभाषा के अनुसार प्रत्येक वृत्त ( छोटा अथवा बड़ा ) ३६० अंशात्मक मान लिया जाता है । फलतः सूर्य्य, चन्द्रमा, अष्टाविंशतिनक्षत्र ग्रह श्रादि ज्योतिः पिण्डों की प्रतिष्ठाभूत ज्योतिष्चक्र के भी ३६० ही अंश सिद्ध हो जाते हैं । ३६० अंशात्मक यह ज्योतिष्चक्र ( खगोल ) प्रदेश ही आत्मगतित्रिलोकीरूप ' आकाश ' की प्रतिष्ठाभूमि है । शरद ऋतु स्थिति का भलीभाँति प्रत्यक्ष हो जाता में आकाश प्रदेश निर्मल रहता है, नाक्षत्रिक है । आप देखेंगे आकाश में दक्षिण की ओर झुका हुआ अतिशयरूप से प्रदीप्त चाकचिक्य ( चमाचम ) भावापन्न, नीलवर्ण का एक तेजस्वी नक्षत्र प्रतिष्ठित है । यही नक्षत्र ' लुब्धक ' नाम से व्यवहृत हुआ है । जिस प्रकार सम्पूर्ण औषधियों के मिश्रण से उदुम्बरफल ( गूलर ) का स्वरूप निर्माण हुआ है, एवमेव लुब्धक नक्षत्र में खगोलीय यच्चयावत् नाक्षत्रिक प्राणों का समावेश है । इसी आधार पर लुब्धक ' पशुपति ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । अत्युग्र आग्नेय तेजः सम्बन्ध से यही ' रुद्र ' ( नाक्षत्रिरुद्र ) कहलाए हैं । जो वस्तु सौर तेज: से अनुपाततः २४ घण्टों में पिघलती है, उसे लुब्धक तेज क्षरंगमात्र में द्रुत बना सकता है वैज्ञानिकों का कहना है कि, दुर्भाग्य से यदि सूर्य्य लुब्धक के समीप चला जाय, तो क्षणमात्र में । में परिणत होकर सूर्य्यं विनष्ट हो जाय । सुप्रसिद्ध प्राजापत्य प्राख्यान की मूलप्रतिष्ठा यही लुब्धक वाष्परूप है, जैसा कि निम्नलिखित ब्राह्मण श्रुति से प्रमाणित है- नक्षत्र " प्रजापतिर्वै स्वां दुहितरमभ्यध्यायत् - दिवमित्यन्य आहुः, उषसमित्यन्ये । तामृश्योभूत्वा रोहितं भूतामभ्येत् । तं देवा अपश्यन् - प्रकृतं वै प्रजापतिः करोति, इति । ते तमैच्छन् य एनमारिष्यति । एतमन्योऽन्यस्मिन्नाविन्दन् । तेषां या एव घोरतमास्तन्व श्रासन् ता एकधा समभरन् । ताः सम्भृता एष देवोऽभवत् । तदैतत् - भूतवत् - नाम । XXX । स एतमेव वरमवृणीत- पशूनामाधिपत्यम् । तदस्यैतत् - पशुमत् - नाम । तमभ्यायत्याविध्यत् । स विद्ध ऊर्ध्व उदप्रपतत् । तमेतं मृग इत्याचक्षते । एऊ एव मृगव्याधः, स उ एव सः । या रोहित, सा रोहिणी । यो एवेषुस्त्रिकाण्डा, सो एवेषुस्त्रिकाण्डा । ” ( ऐतरेय ब्रा ० १३।१० ) । [ १४६ ]
पृष्ठ 167
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्ध विज्ञान चतुर्थ खण्ड श्रात्मगतिनिमित्तानि सुप्रसिद्ध ' कृत्तिका ' नक्षत्र से कुछ ही पूर्व में कुछ ही पूर्व में पाँच नक्षत्रों की समष्टिरूप एक रक्तवर्ण का ' रोहिणी नक्षत्र ' प्रतिष्ठित है । शकटाकार होने से इसे ' शकट ' कहा जाता है । सुप्रसिद्ध ' शकटवेध ' योग का इसी रोहिणी से सम्बन्ध है । यदि शनिग्रह इस शकटाकार रोहिणी नक्षत्र के भीतर से निकल जाता है, तो, रोहिणीभुक्त प्रदेश में १२ वर्ष तक दुष्काल का प्रभत्व रहता है । यही शकटाकार रोहिणी तन्त्रोक्त दशमहाविद्या - विज्ञान में ' कमला ' नाम से प्रसिद्ध है । इससे ठीक षड्भान्तर प्रदेश ( १८० अंश ) पर ज्येष्ठा नक्षत्र प्रतिष्ठित है, यही धूमावती नाम से प्रसिद्ध है । रोहिणी प्रारोहिणी है, लक्ष्मी है । ज्येष्ठा अंवरोहिणी है, अलक्ष्मी है, दरिद्रा है, निर्ऋति है । अतएव जन्मनक्षत्रों में इसे श्रमङ्गलविधायक माना गया है । रोहिणी नक्षत्र से ईशान दिशा में उत्तर की ओर ब्रह्महृदय नक्षत्रोपलक्षित प्रजापति मण्डल है | रोहिणी के समीप त्रिकाण्ड ( तीन नक्षत्रों की समष्टि ) नक्षत्र है, यहीं मृगशीर्ष नक्षत्र है, इससे पूर्व उक्त लुब्धक नक्षत्र है । कल्पना है कि, प्रजापति ने स्वदुहिताभूत रोहिणी पर अनुधावन किया, लुब्धक ने त्रिकाण्ड बाण से प्रजापति का शिरच्छेद कर डाला । वही शिर मृगशीर्ष है, जिसमें अद्यावधि त्रिकाण्डबाण प्रोत है । इसी आधार पर " त्यजति न मृगव्याधरभस ' ( महिम्न ) प्रसिद्ध है । इस प्रकार नैदानिक महर्षियों ने उक्त नाक्षत्रिक असदाख्यान से निदान द्वारा नक्षत्रविद्या का ही रहस्योद्घाटन किया है, जैसा कि अन्यत्र ' ऋषि रहस्यादि ' निबन्धों में विस्तार से प्रतिपादित है । उक्त प्राजापत्य नक्षत्र मण्डल में से प्रकृत में त्रिकाण्ड नक्षत्र की ओर विशेष रूप से पाठकों का ध्यान आकर्षित करना है । यह त्रिकाण्ड पूर्वा पर प्रतिष्ठित है । इन तीनों नक्षत्रों में से पूर्व के तीसरे नक्षत्र से पूर्वदिक् की ओर ईशान कोण की ओर झुका हुआ सप्ततारा समष्टिरूप सुप्रसिद्ध ' मघानक्षत्र ' है, जिसे श्राद्धकर्म की प्रतिष्ठा माना गया है । इसका आकार चूंकि S जैसा है, एतएव पाश्चात्य नक्षत्रविद्या में यह मघा S ( एस ) नाम से प्रसिद्ध है । मघानक्षत्र मण्डल में छठा तारा तेजस्वी है, एतएव इसे ' योग-तारा ' कहा गया है । पूर्वोक्त त्रिकाण्ड के तीसरे पूर्व तारे से, एवं मघामण्डलभुक्त इस योगतारे से, दोनों से स्पर्श करता हुआ जो खगोलीय पूर्वापरवृत्त बनता है, वही ' विष्वद्वृत्त ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । यही वृत्त उत्तर - दक्षिणगोलों का विभाजक है । इस विष्वद्वृत्त से उत्तर की ओर ठीक १० अंश पर उत्तरध्रुव एवं दक्षिण की ओर ठीक ६० अंश पर दक्षिणध्रुव प्रदेश है । विष्ववृत्तपृष्ठ की प्रत्येक बिन्दु से ध्रुव का घनिष्ठ सम्बन्ध है, इसी आधार पर विष्ववृत्तीय पृष्ठीकेन्द्र को ध्रुव मानना अन्वर्थ बनता है । उत्तर-दक्षिण ध्रुवों का अन्तर ६०-६० के संकलन से षड्भान्तर ( १८० ) हो जाता है । ठीक इतना ही भाग अधोभाग में है । उत्तरक्षितिज पर उत्तर ध्रुव है, दक्षिण क्षितिज पर दक्षिण ध्रुव है । आप पृथिवी के उस प्रदेश पर खड़े हो जाइए, जहाँ विष्वद्वृत्त आपके स्वस्वस्तिक ( मस्तक के ऊर्ध्वलम्बन ) से समतुलित हो जाय । अवश्यमेव उस प्रदेश से दक्षिणोत्तर ध्रुव दक्षिणोत्तरक्षितिज पृष्ठों से समतुलित प्रतीत होंगे । १८० अंशात्मक यह दृश्य खगोल एवं १८० अंशात्मक ही अदृश्य खगोल, सम्भूय खगोल के ३६० अंश हो जाते हैं | इसी खगोलचक्रात्मक प्रकाश के आधार पर हमें श्रात्मगतित्रैलोक्य का समन्वय करना है । अदृश्य अर्द्धखगोल को थोड़ी देर के लिए छोड़ते हुए पहले दृश्य अर्द्धखगोल की ओर आपका ध्यान आकर्षित किया जाता है, जिसके मध्य में ( उत्तरध्रुव ६० अंश पर, दक्षिण ध्रुव से भी ६० अंश पर [ १५० ]
पृष्ठ 168
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगति निमित्तानि प्रतिष्ठित मध्यस्थ दृश्य विष्वद्वृत्त के ठीक मध्य में ) सूर्य्यं प्रतिष्ठित है । इसी दृश्य अर्द्धखगोल आत्मगतित्रैलोक्य का प्रधान सम्बन्ध है । विष्वद्वृत्त से उत्तरध्र व पर्य्यन्त ९ ० अंश के साथ ० अंशात्मक उत्तरखगोलीय प्रदेश के ६६ - २४ ये मुख्य विभाग हैं बतलाए गए हैं । इस अंशात्मक उत्तरप्रदेश को छोड़ देने पर २४ अंशात्मक प्रदेश विष्ववृत्तपर्य्यन्त । उत्तरध्रुव बच से आरम्भ कर ६६ १२-८-४ क्रम से तीन विवर्त्त हो जाते हैं । विष्वद्वृत्त से ठीक चौथे, अंश पर रहता है । इसके एक पूर्वा पर वृत्त है । यहाँ से आठ अंश के अन्तर पर, विष्वत् से १२ वें अंश पर एक पूर्वा पर वृत्त है । यहाँ से अन्तर पर, विष्वत् से २४ वें अंश पर एक पूर्वापर वृत्त है । इस प्रकार मध्यस्थ बारह अंश के विष्वत् से उत्तर में भुक्त २४ अंशों के ४-८-१२ क्रम से तीन पूर्वापर वृत्त हो जाते हैं । ये ही तीन पूर्वापरवृत्त से विष्वत् से दक्षिण के २४ अंशों में प्रतिष्ठित हैं । तीन पूर्वापरवृत्त उत्तर में, तीन दक्षिण , ठीक में इसी , अनुपात पूर्वापरवृत्त स्वयं विष्वद्वृत्त, सम्भूय सात पूर्वापरवृत्त हो जाते हैं । अहोरात्र की स्वरूपनिष्पत्ति, तथा ह्रास समत्व, इन्हीं ' सप्तपूर्वापरवृत्तों पर अवलम्बित हैं ' अतएव इन्हें ' सप्ताहोरात्रवृत्त ' भी कहा गया - वृद्धि -रात्रात्मक सम्वत्सरयज्ञ के ये ही ' सप्तहोता ' हैं । दृश्यस्थिति की अपेक्षा से, विशेषतः विष्वद् है । अहो -में प्रतिष्ठित वैज्ञानिक महर्षियों की अपेक्षा से उक्त सातों अहोरात्र वृत्तों में क्रमशः से उत्तर भाग का समावेश माना गया है । विष्वदुत्तर से आरम्भ कर विष्वद्दक्षिणपर्य्यन्त व्याप्त सात उत्तरोत्तर ग्रहोरात्रवृत्त बृहद्भाव क्रमशः जगती, विष्टुप्, पंक्ति, बृहती, अनुष्टुप् उष्णिक्, गायत्री नाम से प्रसिद्ध हैं । स्थिति क्रमापेक्षया ही तीनों से समतुलित हैं, वहाँ उक्त दृष्टिक्रमापेक्षया जगती सबसे बड़ा है, गायत्रीवृत्त सबसे छोटा है १२ ( ४८ ), ११ ( ४४ ), १० ( ४० ), ९ ( ३६ ), ८ ( ३२ ), ७ ( २८ ), ६ ( २४ ) अक्षरयुक्त । गायत्र्यन्त छन्द ( वृत्त ) क्रमशः ह्रसीयान् हैं । जगत्यादि जिस प्रकार पूर्वापरवृत्त सात हैं, वैसे याम्योत्तर ( दक्षिणोत्तर ) वृत्त ३६० हैं । उत्तर ध्रुवों से संलग्न ये ही वृत्त ' ध्रुवप्रोतवृत्त ' नाम से प्रसिद्ध हैं । ये सभी वृत्त समतुलित हैं, इनमें - दक्षिण वैषम्य का प्रभाव है । सुप्रसिद्ध ' भूमध्यरेखा ' का सम्बन्ध इन्हीं याम्योत्तर वृत्तों से छोटे - बड़े को आधार बना कर देशान्तरादि व्यवस्थाएँ व्यवस्थित हैं । विज्ञान भाषा में ये माना गया है । इसी ही वृत्त ऋतसमुद्र सम्बन्ध से ' अप्सरा ' कहलाए हैं । इन ३६० वृत्तों में से एक वृत्त वह है, जो खगोल के ठीक मध्य में से छन्दः स्थित सूर्य्यं का वेध करता हुआ दक्षिणोत्तर वितत है । यही मध्यस्थ दक्षिणोत्तर वृत्त ' उर्वशी अप्सरा बृहती ' कहलाया है । यही मित्रदेवतायुक्त पूर्वकपाल तथा वरुणदेवतायुक्त पश्चिमकपाल का विभाजक माना गया. है । अद्यतनलक्षण अहः काल का मंत्र पूर्वक पाल से सम्बन्ध है, जैसा कि ' सापिण्ड्यविज्ञानोपनिषत् ' प्रकररणान्तर्गत ' ऋणमोचनोपायोपनिषत् ' में विस्तार से बतलाया जा चुका है । उज्जैन भुक्ता दक्षिणोत्तर रेखा भारतीय मध्यरेखा है एवं ' ग्रीनवीच ' भुक्ता मध्यरेखा पश्चिमदेशीया मध्य रेखा है ।
* यल्लङ्कज्जयिनी पुरोपरि कुरुक्षेत्रादि देशान् स्पृशत् ।
सूत्रं मेरुगतं बुधैनगदितं सा मध्यरेखा भुवः ॥
[ १५१ ]
पृष्ठ 169
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि जिन सात पूर्वापरवृत्तों का पूर्व में उल्लेख हुआ है, यदि उनके उत्तर - दक्षिण के २४ - २४ अंशों का संकलन किया जाता है, तो ४८ अंश हो जाते हैं । २४ अंशात्मक उत्तर खगोल, एवं २४ अंशात्मक दक्षिण खगोल, सम्भूय ४ ( १८० अंशात्मक दृश्य अर्द्ध खगोल के मध्य का ) ४८ अंशात्मक मध्य खगोलीय प्रदेश ही सूर्य, चन्द्रमा २८ नक्षत्र ६ ग्रह आदि प्रधान ज्योतिः पिण्डों की आधार भूमि है । इस परिसर से बाहर इनमें से कोई भी नहीं है । हाँ, केवल चन्द्रमा अवश्य ही दक्षिणोत्तर से २४ अंशों के बाहर भी निकल जाता है । इसी आधार पर पुराण ने चन्द्रमा की स्थिति यत्र तत्र सूर्य्य से ऊपर भी मान ली है । स्वगतिवैषम्य से चन्द्रमा कभी - कभी २८ अंश तक जा पहुँचता है । सुप्रसिद्ध ' स्वाति ' नक्षत्र विष्वद्वृत्त से लगभग २८ वें अंश पर प्रतिष्ठित है । २४ वें अंश की परमक्रान्ति से सम्बन्ध रखने वाले सौर तेज का योग स्वाति के साथ कदापि सम्भव नहीं । फिर भी ' स्वाति योग ' नामक योग विशेष की जो सत्ता स्वीकार की गई है, उसका एकमात्र कारण चन्द्रमा ही है । चान्द्रतेज सौरतेज ही प्रवर्ग्य भाग है । चूंकि चन्द्रमा २८ अंश पर्यन्त अनुधावन करता हुआ २८ अंशस्थित स्वाति से योग कर लेता है, अतएव परम्परया स्वातियोग उपपन्न हो जाता है, जैसा कि निम्नलिखित वचन से स्पष्ट है--सममुत्तरेण तारा चित्रायाः कीर्त्यते ह्यपां वासः । तस्यासन्ने चन्द्रे स्वातेर्योगः शिवो भवति ॥ वलयवृत्त, दीर्घवृत्त भेद से वृत्त के दो विवर्त्त माने गए हैं । एक नाभियुक्त वृत्त वलयवृत्त कहलाया है, यही वर्तुलवृत्त है एवं त्रिनाभियुक्तवृत्त ही दीर्घवृत्त कहलाया है, यही अण्डवृत्त है, यही प्रण्डत्रिलोकी ' है । लिङ्गाभिकाशिवोपासना की प्रतिष्ठा यही ग्राण्डत्रिलोकी है; जैसा कि - ' गीताविज्ञानभाष्यभूमिकान्तर्गत ' भक्तियोग परीक्षा ' में विस्तार से प्रतिपादित है । तीन वर्तुलवृत्तों की समष्टि से एक दीर्घवृत्त का स्वरूप निष्पन्न होता है । त्रिकेन्द्रत्व ही इसकी दीर्घता ( अण्डाकारता ) का प्रवर्तक है । सप्त अहोरात्रवृत्तात्मक क्रान्तिवृत्त में एक केन्द्र सूर्य्य स्थानीय है, एक केन्द्र मकरवृत्तानुगामी है, एक केन्द्र कर्कवृत्तानुगामी में परिणत है । इन तीन नाभियों ( केन्द्र ) के सम्बन्ध से ४८ अंशात्मक परिसर लक्षण क्रान्तिवृत्त दीर्घवृत्तरूप प्रतिष्ठित हो रहा है । दक्षिणान्त सीमा पर प्रतिष्ठित गायत्रीवृत्तात्मक मकरवृत्त तथा उत्तरान्त सीमा पर अन्तिम जगतीवृत्तात्मक कर्कवृत्त, दोनों के २४ वें अंश का स्पर्श करता हुआ ४८ अंशात्मक परिसर की को काटते सीमारूप दीर्घवृत्त ही क्रान्तिवृत्त है, यही भूपरिभ्रमणमार्ग है । सात अहोरात्रवृत्त इस क्रान्तिवृत्त तेज ही हुप्रतिष्ठित हैं । ये ही सात पूर्वापरवृत्त सात अश्व हैं, क्रान्तिपरिस्पर में व्याप्त सौर हिरण्मय सप्ताश्वयुक्त सुनहरी रथ है, स्वयं क्रान्तिवृत्त इस रथ का एक चक्र ( पहिया ) है । दृश्यस्थिति दक्षिणायन के अनुसार के प्रवर्त्तक बन इसी हिरण्यमय त्रिनेमि एक चक्र रथ पर प्रारूढ होकर भगवान सविता उत्तरायण रहे हैं सप्ताश्व सम्बन्ध से ही सूर्य्यनाड़ी सप्तधा विभक्त हो रही है, जिनमें से मध्यस्थ अथर्ववेदोपवर्णित विष्वद्वृत्तानुगमिनी वह मध्यनाड़ी ' सुषुम्णा ' नाम से व्यवहृत हुई है । क्रान्तिवृत्तावच्छिन्न यही सौरतेज । स्कम्भात्मक, ' स्कम्भ ' है, जिसका आगे के ' लोक ' ' निरुक्ति प्रकरण में दिग्दर्शन कराया जाने वाला है त्रिनेमि इसी हिरण्यमयमण्डल का स्पष्टीकरण करते हुए वेदमहर्षि ने कहा है— [ १५२ ]
पृष्ठ 170
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि www
१ - " प्रा सूर्य्यो यातु सप्ताश्वः क्षेत्रं यदस्योविया दीर्घयाथे ।
रघुः श्येनः: पतयदन्धो अच्छा युवा कविर्दोदयद् गोषुगच्छन् ॥
( ऋक् सं ० ५।४५।९ ) ।
२ - सप्त युञ्जन्ति रथमेकचक्रमेको अश्वो वहति सप्तनामा ।
त्रिनाभि चक्रमजरमनर्वं यत्रेमा विश्वा भुवनाधि तस्थुः ॥
३ - इमं रथमधि ये सप्त तस्थुः सप्तचक्रं सप्त वहन्त्यश्वाः ।
सप्त स्वसारो अभि संनवन्ते यत्र गवां निहिता सप्त नाम ॥
( ऋक् सं ० १।१६४।२,३ ) ।
४ – प्राकृष्णेन रजसा वर्त्तमानो निवेशायन्नमृतं मत्यं च ।
हिरण्मयेन सविता रथेनोदेवो याति भुवनानिपश्यन् ॥
( यजु ० ) । ४८ अंश के परिसर में भुक्त सूर्य्य, चन्द्र, ग्रह, नक्षत्रयुक्त यही हिरण्मयाण्ड आत्मगतित्रैलोक्य का ' पृथिवी ' लोक है | इस पृथिवीलोक की परिधि ही क्रान्तिवृत्त है, जिस पर एक सम्वत्सर में हमारा भूपिण्ड पूरी परिक्रमा लगा लेता है । पृथिविस्थानीय इस हिरण्मयाण्ड प्रदेश से ग्रह - नक्षत्र - चन्द्र तेजोयुक्त सौरतेज प्रबल वेग से भूपिण्ड पर आक्रमण कर रहा है । यही कारण है कि, भूपृष्ठ से उत्क्रान्त आत्मा इस प्रगत सौरज के आक्रमण को सहने में असमर्थ होता हुआ हिरण्मयाण्डप्रदेश की ओर गमन न कर उसके इतस्ततः ही गमन करता है । स्वल्पतेजोभुक्त उत्क्रान्त आत्मा उस घनतेज के आक्रमण सहने में असमर्थ है । हाँ, जो ब्रह्मपथ के अनुयायी हैं, उनका ग्रात्मा निवृत्तिकर्म्मप्रभाव से अवश्य ही सबल रहता है । इन योगियों का आत्मा हृदय से ब्रह्मरन्ध्र द्वारा सूर्य्यं केन्द्र पर्यंन्त वितत सुषुम्णानाड़ीरूप महापथ के द्वारा इस सौरमण्डल का छेदन करने में समर्थ हो जाता है । ऐसे मुक्तात्माओं का ब्रह्माण्ड ( कपाल ) भेदनपूर्वक ही उत्क्रमण होता है एवं क्षणमात्र में ये परज्योति में विलीन हो जाते हैं प्रतएव इन्हें सूर्य्यभेदी कहा जाता है । ब्रह्मपथ का अनुगमन क्रमभाव, सद्योभाव भेद से दो भागों में विभक्त माना गया है । भूपृष्ठ से उत्क्रान्त होकर पहले देवयानमार्ग का अनुगमन करना, अनन्तर देवयानमार्गान्तर्गत ब्रह्मपथ का अनुगमन करते हुए ब्रह्मलोक में चले जाना क्रमभाव है । अतएव इस गति को ' क्रममुक्ति ' कहा जाता है । यही क्रमगतिलक्षणा सायुज्यभावोपेता अपरामुक्ति है । ऋजुदेवयानमार्ग में यह गति सुविधापूर्वक होती है एवं कुटिल देवयान में प्रतीक्षा पूर्वक होती है, जैसा कि पूर्व के प्रतिवाहिक निरूपण में स्पष्ट किया जा चुका है । इस ब्रह्मगति का सुषुम्णा - नाड़ीरूप महापथ से सम्बन्ध न होकर देवपथ से ही सम्बन्ध है । उत्तरा-यणकाल को निमित्ति बनाने वाली गति यही देवपथानुगता गति है । निम्नलिखित श्रुति स्मृतिवचन इसी ब्रह्मगति का स्पष्टीकरण कर रहे हैं ---[ १५३ ]