Part IV Atmgativigyanopanishta Part 4 — पृष्ठ 171–180

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४ · पृष्ठ 171–180

पृष्ठ 171

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगति निमित्तानि wwwwwww - " तद्य इत्थं विदुः- ये चेमेऽरण्ये श्रद्धा - तप इत्युपासते, तेऽचिषमभिसम्भवन्ति, अर्चिषोऽहः, अह्न आपूर्यमाणपक्षं प्रपूर्यमाणपक्षाद्यान् षडुदङ ङ ेति मासांस्तान् । मासेभ्यः सम्वत्सरं, सम्वत्सरादादित्यं, आदित्याच्चन्द्रमसं, चन्द्रमसो विद्युतम् । तत् पुरुषोऽमानवः । स एनान्ब्रह्मगमयति । एष देवयानः पन्थाः " इति । ( छा ० उ ० ५।१०।१,२ ) । २ -- " अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदोजनाः ॥ ” ( गीता ८।२४ ) अग्निप्रधाना सौरज्योति, सोमप्रधाना चान्द्रज्योतिर्भेद से भगवान ने गीता में दो ही गतियों का स्पष्टीकरण किया है । इनमें अग्निज्योति को शुक्लगति बतलाते हुए इसे अपुनरावृत्तिमार्ग बतलाया है एवं सोमज्योति को कृष्णगति मानते हुए इसे पुनरावृत्तिमार्ग बतलाया गया है । उधर भगवान ने ही एक स्थान पर एक ऐसी स्वर्गगति का भी समर्थन किया है, जिसका सम्बन्ध तो — ' स्वरहर्देवाः सूर्य्य: ' इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार देवयानमार्गात्मक उत्तरायण से ही है, परन्तु — ' क्षीणपुण्ये मर्त्यलोके वसन्ति ' ( गीता ६।२१ ) के अनुसार इस शुक्लगति में पुनरावर्त्तन माना है । " प्लवा ह्यते श्रढा यज्ञरूपा अष्टा-दशोक्तमवरं येषु कर्म्म ” ( मुण्डक १२/७ ) इत्यादि रूप से स्वयं उपनिषच्छ्र ुति ने भी प्रवृत्तिप्रधान विद्या-सापेक्षक ( यज्ञादि ) से प्राप्त इस स्वर्गगति को प्रदृद्ध ही माना है । इस आधार पर हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि, सौरज्योतिः प्रधाना शुक्लगति, किंवा देवयानमार्गगति, किंवा उत्तरायण कालगति पुनरावृत्तिगति, पुनरावृत्तिगति भेद से दो विवर्त्त हो जाते हैं । निवृत्तिकर्म से ब्रह्मगतिलक्षण अपुनरा-वृत्तिगति होती है, विद्यासापेक्ष प्रवृत्तिकर्म से देवगतिलक्षण पुनरावृत्तिगति होती है । ब्रह्मगति में विद्युत द्वारा क्रमशः ब्रह्मलोकावाप्ति है, देवगति में सम्वत्सर मात्र प्रतिष्ठा है, यहाँ से पुन: पुनरावर्त्तन हो जाता है । इस प्रकार एक ही देवयानमार्गभुक्ता शुक्लगति के ब्रह्मपथ - देवपन्थ भेद से पुनरावृत्तिलक्षण ब्रह्मगति, पुनरावृत्तिलक्षण देवगति ये दो विवर्त्त प्रमाणित हो जाते हैं । यही स्थिति चान्द्रज्योतिप्रधाना कृष्णगति की है । इस गति के सम्बन्ध में भगवान ने कहा है कि, योगभ्रष्टात्मा इस चान्द्रज्योति का अनुगमन करते हैं । अनन्तर उन्हें पुनः ससृति में आना पड़ता है । इसके अतिरिक्त – “ पतन्ति नरकेऽशुचौ " ( गी ० १६ । १६ ) इत्यादि रूप से भगवान एक ऐसी भी अधोगति मानते हैं, जहाँ पापात्मा गमन करते हैं । अवश्य ही नरकगति योगियों द्वारा प्राप्तव्या चान्द्रज्योतिर्लक्षण कृष्णगति से पृथक् होनी चाहिए । इसी आधार पर पितृयाणमार्गभुक्ता कृष्णगति के भी पितृपथ - यमपथ भेद से पुनरावृत्तिलक्षण पितृस्वर्गगति, यमनरकगति ये दो विवर्त्त प्रमाणित हो जाते हैं । इस प्रकार तीन पुनरावृत्तियाँ हो जाती हैं, एक अपुनरावृत्तिगति हो जाती है । प्रकाश ही देवदेवता है । ब्रह्मगति, देवगति में तो साक्षात् सौर प्रकाश है ही, तीसरी चान्द्रज्योतिः प्रधाना पितृस्वर्गगति में भी परम्परा सिद्ध ( सूर्य्य से चन्द्रमा में भुक्त ) सौर प्रकाश प्रतिष्ठित है । इस प्रकार तीन दिव्यगति हो जाती है । सुरगति ( विशुद्ध [ १५४ ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगति निमित्तानि यमगति ) हो जाती है । दिव्यज्योति का द्य लोक से सम्बन्ध है । इसी आधार पर तीनों दिव्यगतियों के तीन लोक माने जा सकते हैं । ब्रह्मपथानुगत द्यलोक स्वायम्भुव है, देवपथानुगत द्यलोक सौर है । इन दोनों ' का उत्तरायण प्रधान देवयानमार्ग से सम्बन्ध है एवं पितृपथानुगत द्युलोक चान्द्र है, इसका दक्षिणायन-मार्गप्रधान पितृयाण से सम्बन्ध है । दक्षिणायन चूंकि दक्षिणदिक्स्थ यंम के अधिकार में है, अतएव इस - पितृ द्युलोक को याम्यद्य लोक माना जा सकता है । चौथा यमपथ विशुद्ध असुरलोक है । निम्नलिखित मन्त्र इन्हीं तीनों दिव्यलोकों का विश्लेषण कर रहा है—-तिस्रो द्यावः सवितुर्द्धा उपस्थाँ एका यमस्य भुवने विराषाट् ॥ आरिंग न रथ्यममृताधि तस्थुरिह ब्रवीतु य उ तधिकेतत् ॥ ( ऋक् ० १।३५।६ ) । पाठक प्रश्न करेंगे कि, पूर्वप्रकरण में जब इन चारों पथों का स्पष्टीकरण हो गया था तो पुनः सिंहावलोकन की क्या आवश्यकता थी? एक सज्जन ने ' श्राद्धविज्ञान ' नाम का १२५ पृष्ठ का एक लेख लिखा है । केवल देवयान, पितृयाणमार्ग स्वरूप के प्रतिरिक्त निबन्ध - प्रतिपाद्य सभी विषय यद्यपि प्रौढिवादग्रस्त हैं, परन्तु समालोचना प्रवृत्ति से उन्मुक्त उन प्रतिपाद्य विषयों के सम्बन्ध में मौनावलम्ब ही श्रेयःपन्थाः । उदाहरण के लिए प्रापने कर्म्मभोक्ता प्रत्यगात्मा के लिए ही श्राद्ध विहित माना है, जो कि एकान्ततः प्रसङ्गत । ऐसी ही कुछ एक विरुद्धा विरुद्ध सङ्गतियों के अन्त में लोकगति के सम्बन्ध में ' सीधा भगवान व्यास पर आक्षेप करते हुए यह सिद्ध करने की चेष्टा की गई है कि, व्यास को भी इस सम्बन्ध में भ्रान्ति हो गई है । श्रवणेनापि पापोत्पादक प्रापके वे शब्द निम्नलिखित हैं--" उपरोक्त श्रुति का यही अर्थ लगाने से उत्तरायणमार्ग और दक्षिणायनमार्ग की द्योतक श्रुतियाँ सार्थक होती हैं, अन्यथा मार्ग प्रदर्शक श्रुतियों का अस्तित्व ही उड़ जाता है, क्योंकि जब यदि हरेक समय में ही गतियों का प्रारम्भ होता मान लिया जाय तो फिर कालरूपी मार्ग प्रतिपादक श्रुतियों का मूल्य ही क्या रहता है, इसलिए मालूम होता है कि, सबसे प्रथम ' बादरी ' श्राचार्य ने ही इन मार्ग प्रदर्शक श्रुतियों का गला घोटना आरम्भ किया था, तथा इसी का अनुकरण शङ्कराचार्य आदि भाष्यकारों ने भी किया है कि, जिससे यह अन्धपरम्परा अब तक चली आती है । किसी भी भाष्यकार ने देवयान और पितृयाण के विषय में कुछ भी स्वतन्त्र विचार नहीं किया, किन्तु सबने " बादरी " और शङ्कराचार्य का ही अनुकरण किया है । " ( श्रा ० वि ० पृष्ठ ११२ ) । विद्वान लेखक की दृष्टि में भगवान व्यास गतिप्रतिपादिका श्रुतियों का तात्पर्य्यं नहीं समझ सके । जिस प्रकार वेद का वास्तविक अर्थ प्राज तक विलुप्त था, जिसका उद्धार एकमात्र स्वामीजी ने किया, वैसे ही उत्तरायण - दक्षिणायन पर स्वतन्त्र विचार तथा मार्गप्रद श्रुतियों का वास्तविक रहस्योद्घाटन चुरू निवासी विद्वान् ने किया । श्राद्धकर्म को अवैदिक मानने वाले स्वामीजी ने कम से कम व्यासादि श्रार्थ-* पं ० शिवलालजी मल्लिनाथजी चौमाल चूरू, ( राजस्थान ) । [ १५५ ]

पृष्ठ 173

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड श्रात्मगतिनिमित्तानि वचनों की प्रामाणिकता पर आक्षेप करने की कृपा नहीं की थी, पर श्राज एक सनातनधर्मी ही अपने व्यास जैसे प्रतीतानागतज्ञ उस आचार्य के वचनों को न केवल सन्देहास्पद ही बतला रहा है, अपितु उन्हें श्रततात्पर्य्यावगम में प्रयोग्य ठहराता हुआ अपने आपको व्यास से भी उच्चासन पर प्रतिष्ठित देखने का स्वप्न देख रहा है । अब्रह्मण्यम्! अब्रह्मण्यम्!! श्राद्धप्रेमियों की श्रद्धा का कैसा नग्न चित्र है? बड़े श्राटोप के साथ उत्तरायण - दक्षिणायनकाल का निरूपण करते हुए लेखक ने यह सिद्धान्त स्थापित किया है कि — अहः शुक्लपक्ष, उत्तरायण कालमें मरने वाना ब्रह्मपथानुगामी आत्मा ऋजुदेवयान से ब्रह्मलोक चला जाता है एवं रात्र्यादि में उत्क्रान्त आत्मा को प्रतीक्षा करनी पड़ती है । फलतः गति के साथ उत्तरायण - दक्षिणायनकाल का घनिष्ठ सम्बन्ध हो जाता है । उत्तरायणानुगत कुटिल मार्गापेक्षया यही श्रेष्ठता है । तात्पर्य यही है कि शुक्लमार्ग की सुविधा में ऐसे आत्मा सीधे गमन करते हैं, कृष्णमार्ग के अवरोध से इन्हें शुक्लमार्ग की प्रतीक्षा करनी पड़ती है । ये चेमेऽरण्ये ० ' पूर्वोक्त ( १५४ पृ ० ) श्रुति वचनों का तभी समन्वय सम्भव है, जब कि गति के सायंकाल सम्बन्ध मान लिया जाय । उक्त सिद्धान्त सर्वथा श्रविप्रतिपन्न है, अतएव मान्य है । अवश्य ही निवृत्ति कर्मानुयायी पुरुषों का ब्रह्मपथानुगत आत्मा कालसापेक्ष ब्रह्मपथादि का अनुयायी है । अवश्यमेव इनके सम्बन्ध में क्रमगति के अनुरोध से कालवाचक वचनों का तथ्यपूर्ण मूल्य है । परन्तु बुद्धियोगानुगता सद्योमुक्ति से सम्बन्ध रखने वाले अनुत्क्रान्त- उत्क्रान्त मुक्तात्मानों के लिए काल का कुछ भी महत्त्व नहीं है । सूर्य्यभेदी आत्मा की स्थिति का दिग्दर्शन कराते हुए पूर्व में ( १५३ पृ ० ) में यह स्पष्ट किया गया है कि, ब्रह्मपथानुगत अनुगमन क्रमभाव, सद्योभाव भेद से दो भागों में विभक्त है । निवृत्तिकर्मानुयायी क्रमभावात्मक देवयानमार्गभुक्त ब्रह्मपथ का अनुगमन ` करते हुए क्रमशः ब्रह्मगति को प्राप्त होते हैं एवं ऐसे क्रमगन्ताओं की अपेक्षा से अवश्यमेव काल का विशेष महत्त्व है । दूसरा सद्योमुक्तिभाव है, जिसका बुद्धियोगी विदेह पुरुषों से सम्बन्ध है । उत्तरायणकाल की प्रतीक्षा करने वाले महात्मा भीष्म निवृत्तकर्म्म सम्बन्ध से क्रमभावात्मक ब्रह्मपथ के अधिकारी थे, अतएव उनके सम्बन्ध में तत्काल प्रतीक्षा करना सुसङ्गत था । परन्तु विदेह जनक - व्यासादि मुक्तात्माओं का सद्योमुक्ति से सम्बन्ध था । फलतः इनके सम्बन्ध में कालप्रतीक्षा व्यर्थ थी । सद्योमुक्ति के अनुत्क्रान्ति, उत्क्रान्ति भेद से दो विवर्त्त हैं । भूमोदर्क से सम्बन्ध रखने वाली सद्योमुक्ति अनुत्क्रान्ति परा-मुक्ति है एवं क्षीणोदर्क से सम्बन्ध रखने वाली सद्योमुक्ति उत्क्रान्तिलक्षण परामुक्ति है । देवपथानुगत ब्रह्मपथ से सर्वथा विभिन्न इन दोनों परामुक्तिगतियों का श्रुति ने निम्नलिखित शब्दों में समर्थन किया है— अनुत्क्रान्तिलक्षण सद्योमुक्तिः " प्रथाकमयमानः – यो कामः, निष्कामः, प्राप्तकामः, न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति । ब्रह्मव सन् ब्रह्माप्येति । तदेष श्लोको भवति -• यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येहृदिश्रिताः । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ [ १५६ ]

पृष्ठ 174

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि तद्यथाऽहिनियनी वल्मीके मृता प्रत्यस्ता शयीत एवमेवेदं शरीरं शेते । प्रथायमशरीरोऽमृतः प्रारणो ब्रह्मव तेज एव । ” ( बृ ० उ ० ४।४।६,७ ) । बुद्धियोगानुष्ठान कामनाओं को निःशेष करने वाला निष्काम योगी अकाम बन जाता है । ' कामस्य क्रिया............ ' ' इत्यादि मानव सिद्धान्त के अनुसार ऐसे अकामपुरुष का क्रियाभाव सर्वथा विलीन हो जाता है । अतएव प्राण का गतिधर्म्म उच्छिन्न हो जाता है, एवं यहीं भूमोदर्कलक्षण ' समवलय ' नाम की क्रान्तिमुक्ति हो जाती है । निष्कामभाव अवश्य प्राप्त हो गया, परन्तु क्षीणोदर्क सम्बन्ध से इसी शरीर में हृद्ग्रन्थिलक्षण व्यानग्रन्थि का विमोकन हुआ, उस दशा में इस योगात्मा को उत्क्रान्तिलक्षण सद्योभुक्ति का अनुगमन करना पड़ता है । हृदय से बद्ध सुषुम्णापथ द्वारा क्षणमात्र में यह सूर्य्यभेदन करता हुआ परज्योति में विलीन हो जाता है । जितनी देर में ( क्षणमात्र में हमारा मन विदुरलोक में पहुँच जाता है, ठीक क्षणमात्र में, किंवा निमेषमात्र में हृदय से ब्रह्मरन्ध्र द्वारा सूर्य्य केन्द्रपर्यन्त सुषुम्णानाड़ीमय ब्रह्मपथ से ( महापथसे ) मुक्त हो जाता है । इस आत्मा की गति में रात्रि - कृष्णपक्ष - दक्षिणायनादि कोई प्रतिबन्ध नहीं आ सकता । रात हो, अथवा दिन शुक्लपक्ष हो अथवा कृष्णपक्ष, उत्तरायण हो अथवा दक्षिणायन, रश्म्यनुसारी ऐसे आत्मा की गति निर्बाध है । निम्नलिखित वचन इसी उत्क्रान्तिलक्षण सद्योभुक्ति का स्पष्टीकरण कर रहा है— उत्क्रान्तिलक्षणसद्योमुक्ति--१ - तदेतेश्लोका भवन्ति - अणुः पन्था विततः पुराणो मां स्पृष्टोऽनुवित्तो मयैव । तेन धीरा पियन्ति ब्रह्मविदः स्वर्गं लोकमित ऊर्ध्वं विमुक्ता ॥

तस्मिञ्छुक्लमुत नीलमाहुः पिङ्गलं हरितं लोहितं च ।

एष पन्था ब्रह्मणा हानुवित्तस्तेनैति ब्रह्मवित्पुण्यकृत्तैजश्च ॥

- " यस्मादर्वाक् सम्वत्सरोऽहोभिः परिवर्तते ।

तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम् ॥

यस्मिन् पञ्चपञ्चजना प्रकाशश्च प्रतिष्ठितः ।

तमेव मन्य आत्मानं विद्वान् ब्रह्मामृतोऽमृतम् ॥

प्राणस्य प्रारणमुत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो ये मनोविदुः । ते निचिक्युर्ब्रह्म पुराणमग्यम् । ” ( ब्र ० प्रा ० उ ० ४।४।१६,१७,१८ ) । ३ - " अथ या एता हृदयस्य नाड्यस्ताः पिङ्गलस्याणिम्नस्तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पीतस्य लोहितस्य । असौ वा श्रादित्यः पिङ्गलः, एष शुक्लः, [ १५७ ]

पृष्ठ 175

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्डं आत्मगति निमित्तानि एष नीलः, एष पीतः, एष लोहितः । तद्यथा महापथ प्रातत उभौ ग्रामौ गच्छति इमं च, अमुं च, एवमेवैता आदित्यस्यरश्मय उभौलोकौ गच्छन्ति: इमं च - अमुं च । प्रमुष्मादादित्यात् प्रतायन्ते । तेऽसुष्मिन्नादित्ये सृप्ताः । " " अथ यत्रैतदस्माच्छरीरादुत्क्रामति प्रथैतैरेव रश्मिभिरूर्ध्वमाक्रमते । स श्रोमिति वा, होद्वामीयते । स यावत् क्षिप्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छति । एतद्वै खलु लोकद्वारं विदुषां प्रपदनम् । निरोधोऽविदुषाम् । " ( छां ० उ ० ८।६।१,२,५ ) । उक्त श्रुतियों के आधार पर हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि, कर्म्मभेद से प्रत्यगात्मा की ६ गतियाँ हो जाती हैं । देवयानान्तर्गत ब्रह्मपथ, देवपथ, पितृयाणान्तर्गत पितृपथ, यमपथ इन चारों पथों से सम्बन्ध रखने वाली ब्रह्मगति ( क्रममुक्तिलक्षण अपरामुक्ति ) देवस्वर्गगति, पितृस्वर्गगति, नरकगति ये चार तो क्रमगतियाँ हैं । संद्योमुक्तिगति, जायस्व - म्रियस्व - लक्षण असुर्यगति ये दो सद्योगतियाँ हैं । इनमें सद्योमुक्तिगति का ही नाम परामुक्ति है । इसके भूमोदर्क - क्षीणोदर्क भेद से अनुत्क्रान्तिलक्षण प्रगतिरूपा -गति, उत्क्रान्तिलक्षण रश्मिनुसारिणी गतिरूपागति, ये दो विवर्त्त हो जाते हैं । सम्भूय ७ गतियाँ ही जाती हैं । सात में तीन ब्रह्मगतियाँ हैं, एक देवगति है, एक पितृगति है, एक यमगति हैं, एक श्रगतिलक्षण सुगति है । चतुष्पथानुगता क्रमगति चतुष्टयी काल सापेक्ष है, उभयविद्या सद्योमुक्ति तथा प्रसुर्य्यगति कालापेक्षा है । इन्हीं गतिभेदों के अनुसार विभिन्नार्थ प्रतिपादक श्रौत वचन व्यवस्थित हैं । भगवान व्यास ने उत्क्रान्तिलक्षण सद्योमुक्ति के अभिप्राय से ही निम्नलिखित सिद्धान्त स्थापित किया है— १ - " तदोकोग्रज्वलनं तत्प्रकाशितद्वारो विद्यासामर्थ्यात्तच्छेष गत्यनु-स्मतियोगाच हार्दानुगृहीतः शताधिकया । " २ - " रश्मनुसारी । " ३ – “ निशिनेति चेन्न - सम्बन्धस्य यावद्देह भावित्वात् दर्शयति च । " ४ - " प्रतश्चायनेऽपि दक्षिणे । " ( ब्रह्म सू ० ४।२।१७,१८,२० सू ० ) । उक्त सूत्र चतुष्टयी द्वारा सूत्रकार ने यही सिद्धान्त स्थापित किया है कि, निष्कामपुरुषों का आत्मा सुषुम्णा द्वारा रश्मनुसारी बनता हुआ क्षणमात्र में सूर्य्यभेदी बन जाता है । क्रमगति चतुष्टयी में जिस प्रकार उत्तरायण - दक्षिणायनकाल का सहयोग रहता है, वैसे इस गति में उत्तरायणादिकाल का कोई सम्बन्ध नहीं रहता । [ १५८ ]

पृष्ठ 176

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि चूरू के मान्य विद्वान् ने सूत्रकार के उक्त सिद्धान्त पर ही प्रहार किया है । यदि वे विभक्तगतियों का यथावत् समन्वय करने का अनुग्रह कर लेते, तो सम्भवतः उन्हें इस असभ्य प्रौढिवाद के आश्रय की आवश्यकता न होती । विद्वान् ने ब्रह्मगति से केवल ब्रह्मपथानुगामिनी देवयानमार्गभुक्ता उत्तरायणगति को लक्ष्य बना कर सूत्रावलोकन का प्रयास किया है । जिस क्रमगति का उक्त सूत्र चतुष्टयी से कोई सम्बन्ध नहीं । साथ ही आपने ' यावत् क्षिप्येन्मनः ० ' इत्यादि श्रुति को देवयानमार्गभुक्त इसी ब्रह्मगति के उपोद्-बलक मानने की भी भूल की है । इस श्रुति का ऋजु अर्थ तो यही है कि, क्षणमात्र में आत्मा आदित्यभेदी बन जाता है । इस गति का अचिरहःपक्षादि क्रमगति से सम्बन्ध ही नहीं है । सचमुच श्रुति - समर्थित व्यवस्थित आत्मगति विभक्ति को अज्ञात दशा में छोड़ते हुए भगवान व्यास के श्रीतसिद्धान्त पर प्राक्षेप करते हुए पण्डितजी - बिभेत्यल्पश्रुताद्वेदो मामयं प्रहरिष्यति ' सूक्ति को सर्वात्मना चरितार्थ बना दिया है । अस्तु नाप्राप्त व्यासनिष्ठा के नाते हमें इस अप्रिय प्रसङ्ग का आश्रय लेना पड़ा । अत पुनः प्रकृत II श्रय लिया जाता है । बतलाया गया है कि, मध्यस्थ दृश्य विष्वद्वृत्त से २४ अंश उत्तरप्रदेश, २४ अंश दक्षिण प्रदेश, सम्भूय ४८ अंशात्मक सूर्य - चन्द्र - नक्षत्र ग्रह परिभ्रमण प्रतिष्ठारूप सौरहिरण्मय सम्वत्सरमण्डल ही आत्मगति त्रैलोक्य का ' पृथिवी ' लोक है एवं ब्रह्मपथ - देवपथ - पितृपथ - यमपथ इन चारों से सम्बन्ध रखने वाली क्रमगतियों का अनुगमन करने वाला भूपृष्ठ से उत्क्रान्त आत्मा घनतेजोमय उक्त सम्वत्सररूप पृथिवीमण्डल के आक्रमण को सहने में असमर्थ होता हुआ ४८ अंशात्मक आकाश में गमन नहीं कर सकता । यह जब भी जायगा, इसे इस ४८ अंशात्मक पृथिवी स्थानीय मण्डल से इतस्ततः व्याप्त मार्गों को ही श्राश्रय बनाना पड़ेगा, जो कि मार्गद्वयी देवयान, पितृयाण नाम से प्रसिद्ध है । पृथिवीलोक का विचार समाप्त हुआ, अब अन्तरिक्ष तथा द्युलोक का समन्वय कीजिए । ' नागवीथी ' से उत्तर तथा सप्तर्षिमण्डल से दक्षिण - विष्वद्वृत्त के २४ वें अंश से उत्तर ४२ अंशात्मक परिसर ही आत्मगति त्रैलोक्य का ' अन्तरिक्षलोक ' है, यही देवयानमार्ग है । सप्तर्षि से उत्तर, उत्तरध्र ुव से दक्षिण २४ अंशात्मक परिसर ही श्रात्मगतित्रैलोक्क का द्युलोक है । ध्रुवोत्तर स्थान ब्रह्मपथात्मक ब्रह्मगति समर्थक द्वितीय लोक है, जिसे ' अस्ति वै चतुर्थो देवलोक प्रापः ' के अनुसार अब्लोक ( परमेष्ठ्य विष्णु-धाम - कदम्बपृष्ठ ) भी कहा जाता है । नागवीथी ' शब्द से परिचय प्राप्त करने के लिए दो शब्दों में खगोलीयामार्गत्रयी का स्वरूप बतला देना भी अनावश्यक माना जायगा । h बतलाया गया है कि, ४८ अंशात्मक परिसर में भुक्त सातों अहोरात्रवृत्त स्थितिक्रम से समतुलित होते हुए भी दृष्टिक्रम से छोटे - बड़े हैं । सबसे दक्षिरण का षडक्षर गायत्रीवृत्त ( मकरवृत्त ) सबैसे छोटा है, इससे उत्तर के सप्त - प्रष्ट - नव - दश - एकादश - द्वादशाक्षर उष्णिक - अनुष्टुप् - बृहती ( विष्वद्वृत्त ) पंक्ति -त्रिष्टुप् - जगती ( कर्कवृत्त ) ये ६ वृत्त क्रमशः उत्तरोत्तर बड़े हैं । इन सात बड़े - छोटे वृत्तों में २८ नक्षत्र भुक्त हैं । इन नक्षत्रों के सम्बन्ध से सप्तवृत्तात्मक खगोल में तीन मार्गों की कल्पना हुई है । उत्तरपरम-क्रान्ति स्थानीय जगतीवृत्त, दक्षिणपरमक्रान्ति स्थानीय गायत्रीवृत्त एवं क्रान्तिसम्पातस्थानीय मध्यस्थ बृहती -वृत्त इन तीन वृत्तों में विभक्त खगोलीय मार्ग क्रमश: ऐरावत ( हाथी ), वैश्वानर ( बकरा ), जरद्गव [ १५६ ]

पृष्ठ 177

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि wwwwwww ( बुड्ढा वैल ) इन तीन पशुओं से समतुलित है । ऐरावत हाथी सबसे बड़ा है, इससे छोटा जरद्गव है, इससे छोटा वैश्वानर पशु है । ठीक यही स्थिति जगती - बृहती - गायत्रीवृत्तयुक्त नाक्षत्रिक मार्गों की है । इसी आधार पर बृहती से उत्तर का नाक्षत्रिक राजमार्ग ' ऐरावतमार्ग ' नाम से, स्वयं मध्यस्थ बृहती मार्ग ' जरद्गवमार्ग ' नाम से एवं दक्षिण का मार्ग ' वैश्वानरमार्ग ' नाम से व्यवहृत हुआ है । मार्ग राजपथ है | राजपथ में वीथियाँ ( गलियाँ ) हुआ करती हैं । उक्त तीनों नाक्षत्रिक मार्गों में प्रत्येक में अश्विन्यादि तीन - तीन नक्षत्रों के सम्बन्ध से तीन - तीन वीथियाँ भुक्त हैं । तीनों नाक्षत्रिक मार्गों में भुक्त & वीथिसमष्टि ही आदि - मध्य - अन्त नाड़ीत्रयी की मूल प्रतिष्ठा है । जैसा कि गीताभूमिकान्तर्गत कर्मयोगपरीक्षा खण्ड के ' यज्ञोपवीत संस्कारोपपत्ति ' परिच्छेद में विस्तार से प्रतिपादित है । प्रकृत में इन e वीथियों के सम्बन्ध में केवल यही बतलाना है कि, सबसे उत्तर की ' नागवीथी ' देवयानमार्ग का उपक्रम है एवं सबसे दक्षिण की ' अजवीथी ' पितृयाणमार्ग का उपक्रम है, जैसा कि अनुपद में ही स्पष्ट होने वाला । मार्गत्रयावच्छिन्न नववीथ्यात्मक खगोल ही पृथिवीलोक है । इसे लक्ष्य बनाकर उत्तर - दक्षिण लोकों का समन्वय करना है । निम्नलिखित परिलेख से प्रस्तुत वीथि - स्वरूप गतार्थ हो जाता है । १ * देवयानः पन्थाः-१ २ ३ - अश्विनी भरणी कृत्तिका १ आर्द्रा मृगशिरा--रोहिणी - पुनर्वसु-पुष्य - उ. फल्गुनी - - पू ० फल्गुनी-अश्लेषा +नागवीथी ( १ ) 1. गजवीथी ( २ ) " ऐरावतीवीथी ( ३ ) आर्ष भी वीथी ( १ ) मघा हस्त चित्रा - स्वाती → गोवीथी ( २ ) | २ -ज्येष्ठा--• अनुराधा —— विशाखा जारद्गवीश्री ( ३ ) पूर्वाषाढ - - उत्तराषाढ- वैश्वानरवीथी ( १ ) मूल ३ - शतभिषक् । धनिष्ठा - श्रवण + मृगवीथी ( २ ) | - पू ० भाद्रपद - उ. भाद्रपद रेवती -अजवीथी ( ३ ) ह & ह + पितृयाणः पन्था: -आदिनाड़ी मध्यनाड़ी अन्तनाड़ी २ [ १६० ] - नवाक्षरा बृहती ६-३६ - द्वादशाक्षरा जगती १२-४८ मार्गः दक्षिण वैश्वानर मार्गः जरद्गवमार्गः २ मार्गः मध्य मार्गः में उत्तर ऐरावतमार्गः १ - षडक्षरा गायत्री ६-२४

पृष्ठ 178

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड श्रात्मगतिनिमित्तानि wwwwwwww विष्वद्वृत्त से उत्तरध्रुवपर्य्यन्त ६० अंशात्मक आकाश - प्रदेश बतलाया गया है । इसमें २४ अंशा-त्मक प्रदेश तो पूर्वोक्त पृथिवीलोक में भुक्त है । शेष ६६ अंशात्मक आकाशप्रदेश बच रहता है । इसके '४२ -२४ ' भेद से दो विवर्त्त हो जाते हैं । क्रान्तिवृत्त की उत्तरपरमक्रान्ति ऐरावतमार्गभुक्त अन्त की नाग-वीथी है । इस नागवीथी से, किंवा विष्वदुत्तरीय २४ वें अंश से आगे से २५ वें अंश से आरम्भ कर ६६ वें अंश तक का ४२ अंशात्मक आकाशप्रदेश ही आत्मगतित्रैलोक्य का अन्तरिक्षलोक है । इस लोक की अन्तिम ( उत्तर ) सीमा पर सप्तर्षिमण्डल प्रतिष्ठित है । इस नाक्षत्रिक स्थिति से यह निष्कर्ष निकलता है कि, नागवीथी से उत्तर, सप्तर्षिमण्डल से दक्षिण सूर्य का उत्तरपथात्मक ४२ अंशात्मक प्रदेश ही अन्तरिक्ष है, यही गति परिभाषा में ' देवयानः पन्थाः ' है, जैसा कि निम्नलिखित पुराणवचन से प्रमाणित है—

नागवीथ्युत्तरं यच्च सप्तर्षिभ्यश्चदक्षिणम् ।

उत्तरः सवितुः पन्था देवयान इति स्मृतः ॥

२४ भुक्त हुए विषववृत्तीय पृथिवीलोक में, ४२ अंशभुक्त हुए देवयानात्मक अन्तरिक्ष में, ० से शेष रहे उत्तर के २४ अंश । इन २४ अंशों के व्यासार्द्ध से एक वृत्त बनाइए । ४८ अंशात्मक विष्कम्भ ( व्यास ) का वृत्त बन जायगा । इसी वृत्त के केन्द्र में ध्रुव प्रतिष्ठित है । उत्तरध्रुव के २४ वें अंश के अन्तर पर २४ अंश के व्यासार्द्ध से बने वृत्त पर ही सप्तर्षि परिक्रमा लगा रहे हैं । सप्तर्षिपरिक्रमा मण्डलभुक्त प्रकाश प्रदेश ही आत्मगति त्रैलोक्य का तीसरा द्युलोक है, यही स्वर्गलोक है । इस प्रकार ( २४ - ४२ -२४ ' भेद से उत्तरीय ६० अंशात्मक आकाश ' पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ ' भेद से त्रैलोक्यरूप में परिणत हो रहा है । अब क्रमप्राप्त दक्षिणभागस्य ६० अंशात्मक आकाशप्रदेश का समन्वय कीजिए । दक्षिण के २४ अंश तो पूर्वकथनानुसार पृथिवीलोक में ही भुक्त है । पृथिवीलोक के दक्षिणान्त भाग में वैश्वानरमार्गभुक्ता वीथी प्रतिष्ठित हैं । इस अजवीथी से दक्षिण, दूसरे शब्दों में वैश्वानरमार्ग से बाहर ६६ वें अंशपर्य्यन्त ४२ अंशात्मक आकाश पितृत्रिलोकी का अन्तरिक्षलोक है । इसके अन्त में अगस्त्य नक्षत्र प्रतिष्ठित है । अगस्त्य से उत्तर - अजवीथी से दक्षिण भाग में प्रतिष्ठित यही अन्तरिक्ष ' पितृयाणः पन्थाः ' है । अगस्त्य से आगे का २४ अंशात्मक प्रदेश ही पितृस्वर्गात्मक द्युलोक है । सूर्य्यानुगता चान्द्रज्योतिर्युक्त श्रर्द्धभाग पितृस्वर्ग है, इससे आगे का अर्द्धभाग नरक है । पितृयाण के इसी स्वरूप को लक्ष्य में रख कर भगवान व्यास ने

कहा है-उत्तरं यदगस्त्यस्य अजवीथ्याश्चदक्षिणम् ।

पितृयाणः स वै पन्था वैश्वनरपथाद्बहिः ॥

४२ अंशात्मक देवयानमार्गात्मक उत्तर प्रकाश देवयानान्तर्गत देवपथ है । विद्यासमुच्चितप्रवृत्ति कर्मानुगत उत्क्रान्त आत्मा इसी देवपथाकाश के द्वारा देवस्वर्गगति का भोक्ता बनता है । ४२ अंशात्मक उत्तरमार्ग की उत्तर सीमा, उत्तरध्रुवानुगत २४ अंशात्मक उत्तर ध्रुव परिभ्रमणमार्ग की दक्षिणसीमारूप [ १६१ ]

पृष्ठ 179

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 179 का मूल पृष्ठ
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगति निमित्तानि mana आकाश देवयानान्तर्गत ' ब्रह्मपथ ' है । निवृत्तिकम्र्मानुगत उत्क्रान्त आत्मा इसी ब्रह्मपथ द्वारा ध्रुवानुगत पारमेष्ठ्य विष्णुपद से अभिन्न ब्रह्म से सायुज्यभाव प्राप्त कर लेता है । ४२ अंशात्मकः पितृयाणमार्गात्मक दक्षिणाकाश पितृयाणमार्गान्तर्गत पितृपथ है । विद्यानिरपेक्ष सत्कर्मानुगत उत्क्रान्त आत्मा इसी पितृपथाकाश द्वारा पितृस्वर्गगति ( चान्द्रज्योति ) का भोक्ता बनता है । ४२ अंशात्मक दक्षिणमार्ग की दक्षिण सीमा, दक्षिणध्रुवानुगत २४ अंशात्मक दक्षिणध्रुव परिभ्रमण मार्ग की उत्तरसीमारूप आकाश पितृयारणन्तर्गत यमपथ है । असत्कर्मानुगत उत्क्रान्त प्रात्मा इसी यमपथ द्वारा ध्रुवानुगत याम्य नरकगति का अनुगामी बनता है । इस प्रकार इतरनिमित्तवत् श्राकाशनिमित्त भी 1 ब्रह्मयादिचतुष्टयी से युक्त हो रहा है । श्रात्मगतित्रैलोक्यात्मक, देव - पितृत्रिलोकीगर्भित प्रकाशनिमित्त का यही संक्षिप्त स्वरूप निदर्शन है । अयमंत्रसंग्रहः-( १ ) ( ७ ) जगती - छन्दः ( १२ + ४८ ) ४ ( २ ) ( ६ ) त्रिष्टुप् छन्दः ( ११ + ४४ ) 5 - उत्तरवृत्तानि ( २४ ) ( ३ ) ( ५ ) पंक्तिश्छन्द: ( १० + ४० ) १२ -( १ ) ( ४ ) वृहती छन्द: ( ६ + ३६ ) -8 → मध्यमवृत्तम् - ४८ अंशात्मकं क्रान्तिवृत्तम् ( १ ) ( ३ ) अनुष्टुप् छन्दः ( ८ + ३२ ) +१२ ( २ ) ( २ ) उष्णिक छन्दः ( ७ + २८ ) +८ ( ३ ) ( १ ) गायत्री छन्दः ( ६ + २४ ) ४ - दक्षिणवृत्तानि ( २४ ) [ १६२ ]

पृष्ठ 180

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आकाशपरिलेख – ( आत्मगतित्रैलोक्यम् ) से है । -अंश वें प्रतिष्ठित सप्तर्षि । आकाशप्रदेश । २५ तथा है है प्रान्तरिक्षलोक है: द्युलोक त अंशात्मक होता सप्तर्षिमण्डल पन्था भुक्त पर ६० में आकाशप्रदेश सीमा देवयानः आकाशवृत्त पर्य्यन्त ) यही उत्तरभागस्य यही ध्रुव पृथिवीलोक अंशात्मक ( उत्तर में भुक्त ४२ उत्तर प्रदेश का अन्तिम मण्डल से तक की परिभाषा अंशात्मक अंश लोक गति परिक्रमा 16 २४ वें । विष्वद्वृत्त में ६६इसीहै जगती त्रिष्टुप पंक्ति: बृहती अनुष्टुप् से २४ । ६६ द्वारा । है प्रान्तरिक्ष । अगस्त्य आगे ) है भुक्त का है इससे में । असत्कर्मानुगत । बनता ' है है प्रतिष्ठित पितृयाणान्तर्गत पितृत्रिलोकी पन्थाः ( अनुगामी पृथिवीलोक नक्षत्र द्युलोक भागस्य तो का ग्रमपथ . आकाश अगस्त्य पितृयाणः दक्षिण अंश ' २४ में नरकगति पितृस्वर्गात्मक उल्लेखित ध्रुव अंशात्मक अन्त ही याम्य ४२ अन्तरिक्ष इसके प्रदेश श्रात्मा दक्षिण । यही है में ध्रुवानुगत विष्वद् लोक अंशप्रय्र्यन्त उत्तर अंशात्मक उत्क्रान्त उष्णिक् गायत्री Lia श्री बालचन्द्र यन्त्रालय जयपुर । I आत्मगति निमित्तानि लोक हा वृल ( उत्तरावः ) त्रिलोकी आत्मगति -: देवपथ → अन्तरिक्षम् देवानुगता पृथिवी I I त्रिलोकी आत्मगति पित्र्यनुगता-→ अन्तरिक्षम > द्यौः