श्रीगणेशाय नमः।

Part IV Atmgativigyanopanishta Part 4 — पृष्ठ 181–190

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४ · पृष्ठ 181–190

पृष्ठ 181

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड भूपिण्डानुगत आकाश परिलेखः परामुक्तिस्थानम् ( श्रात्मगति त्रैलोक्य ) उ.ध्रुव उत्तराकाशः उत्तराकाश: ४० अंशात्मकः , प्रदेश में भुक्त गति । इस । है ' पृथिवी है । यही अंशात्मक रहा प्रकाश है २४ आकाश हो पृथिवीलोक कहलाता अंशात्मक प्रदेश अन्तिम अंशात्मक में परिणत अन्तरिक्षलोक । ६० ' है देवस्वर्गलोक ६० अंशात्मक प्रदेश । यही पर्यन्त २४ पन्थाः है उत्तरीय त्रैलोक्यरूप ग्राकाश मुक्त भेद से भेद से । इसमें ' देवयानः " उत्तरध्रुव है लोक से द्यौ, द्यौ गया अंशात्मक में ४२ २४-४२-२४ । अन्तरिक्ष विष्वद्वृत्त बतलाया परिभाषानुसार प्रकार है आकाश -देवयान-आत्मगतिनिमित्तानि दक्षिणाकाश [ अंशात्मकः " अन्तरिक्षम पृथिवी अन्तरिक्षम द्यो. शुक्ल मार्ग : च ० चन्द्रमा चमेति | अमृत्व सुषुमा मार्ग. भूपिण्ड: दक्षिणमेरुः कृष्णमार्ग श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर । दःधुव ( दक्षिणाकाशः यही यारणः अंशात्मक बतलाया विष्ववृत्त अन्तरिक्ष पन्थाः अंशात्मक आकाश गया ' से लोक है । है । दक्षिण अन्तरिक्ष इसमें प्रदेश ' पितृयाणः इसी ही के २४ ध्रुव पितृस्वर्गात्मक अन्त लोक अंश पर्यन्त पन्थाः में अगस्त्य है । तो पृथिवीलोक ६० ' है यही अंशात्मक द्युलोक । नक्षत्र अन्तरिक्ष इसके में है प्रतिष्ठित भुक्त आकाश । आगे लोक हैं ' पितृ- । प्रदेश २४ है ४२ ।

पृष्ठ 182

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देवयान श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर । पियाजः उत्तराविक • श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड आत्मगति त्रैलोक्य परिलेख: --आत्मगतिनिमित्तानि ४२ पन्थाः: पितृयाण • दक्षिणादिक देवयानः पन्था ४२ घाः अन्तरसम् । ' हैं के ४२ । इसी में पन्था है दक्षिण ' पृथिवी विभाग से उत्तर । पितृयाण प्रतिष्ठित ये मुख्य विष्वद् त्रैलोक्य है सूर्य्य से लेता अंशात्मक में ) ६६-२४ श्रात्मगति लगा अनुपात ४२ मध्य के में । इसी परिक्रमा हैं ठीक प्रदेश हिरण्मयाण्ड के, ठीक पूरी दक्षिण यही हैं । कहते खगोलीय वृत्त भुक्त भूपिण्ड ( विष्वद्वृत्त उत्तर ही तीन नक्षत्र कहते पितृस्वर्ग हमारा दृश्य । ये, में जिसे है, ग्रह देवस्वर्ग है अंशात्मक मध्यस्थ ६० रहता, चन्द्र सम्वत्सर है जिसे । सूर्य्य द्योलोक है एक प्रतिष्ठित में विभक्त भुक्त पर द्योलोक अंशात्मक पर सम्बन्ध में जिस २४ अंश विवर्त्तो परिसर है, अंशात्मक ६० प्रधान तीन के है एवं भी का से २४ से अंश क्रान्तिवृत्त एवं गोल ध्रुव त्रैलोक्य क्रम ४८ ही है उत्तर ८ -४ अन्तरिक्षलोक - प्रकार परिधि , दक्षिण आत्मगति १२ । इस की पर हैं अन्तरिक्षलोक अंश के साथ प्रदेश पन्था ६० पृथिवीलोक से खगोल अंशात्मक में प्रतिष्ठित इस देवयान ध्रुव अर्द्ध २४ । अंशों है उत्तर दृश्य इसमें लोक अंशात्मक २४

पृष्ठ 183

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड य 1 | दक्षिण गोल का लः उ श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय जयपुर । आत्मगतिनिमित्तानि 2 का म : गोल उत्तर पण य वृत्तम् → पन्थाः देवयानः रा त्त ४२ अंशात्मक देवयान मार्गात्मक उत्तराकाश ' देवपथ ' है । विद्यासमुच्चित प्रवृत्ति कर्मानुगत उत्क्रान्त आत्मा इसी मार्ग के द्वारा देवस्वर्गगति को भोग करता है । इसी प्रकार ४२ अंशात्मक पितृयाणमार्गात्मक दक्षिणाकाश ' पितृपथ ' है जिसका अनुगमन सत्कर्म्मा-नुगत उत्क्रान्त आत्मा करता है । इन्हीं मार्गों का स्वरूप प्रस्तुत परिलेख में उल्लिखित है । उत्तरायण - दक्षिणायनानुगतः आकाशपरिलेख: -

पृष्ठ 184

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड - * आत्मगतिनिमित्तानि ( ७ ) १ - व्यानग्रन्थिविमोकलक्षणा समवलयरूपा श्रनुतक्रान्तिगतिः ( परामुक्तिः ) १ + सद्योमुक्ति ६ ) २ - सूक्ष्मशरीरविमोकलक्षणा रश्म्यनुसारिणी उत्क्रान्तिगतिः ( परामुक्तिः ) ( - * ( ५ ) १ - सूक्ष्मशरीरविमोकलक्षणा ब्रह्मपथानुगता क्रमगतिः ( परामुक्तिः ) २ ३ ( ४ ) २ - देवस्वर्गावाप्तिमूला देवपंथानुगता क्रमगतिः * ( ३ ) ३ - पितृस्वर्गावाप्तिमूला पितृपथानुगता क्रमगतिः ( २ ) ४ - नरकावाप्तिमूला यमपथानुगता क्रमगतिः -383 ( पितृस्वर्गभुक्तिः ) ( यमपाशानुगतिः ) १ | ( १ ) १ - सूर्यलोकावाप्तिमूला पथवञ्चिता अनुत्क्रान्तिगतिः ( जड़त्वानुगतिः ) ] श्रनुत्क्रान्तिः ( प्रगतिः ) ( देव स्वर्गभुक्तिः ) ) ( आकाशनिमित्तभूता क्रमगतिः १ * ( ७ ) १ - अनुत्क्रान्तिगतिः ( प्रगतिः ) -- → भूमोदर्कभावानुगत बुद्धियोग निमित्तभूता + ब्रह्मगतिः ( ६ ) २ - उत्क्रान्तिगतिः ( क्षरणगति ) - + क्षीणोदर्कभावानुगत बुद्धियोगंनिमित्तभूता ( ५ ) १ - ब्रह्मपथानुगतागतिः----( ४ ) २ - देवपथानुगतागतिः-निवृत्तिकर्मानुगता ( ज्ञानयोगनिमित्तभूता ) * विद्यासापेक्ष प्रवृत्तिकर्मनिमित्तभूता २ - * -देवगतिः ( ३ ) ३ - पितृपथानुगतागतिः-→ विद्या निरपेक्ष प्रवृत्तिकर्म्मनिमित्तभूता ( २ ) ४ - यमपथानुगतिः-→ विरुद्धकर्मनिमित्तभूता - * ३ | ( १ ) १ - सुर्य्यगति: ( प्रगतिः ) प्रात्मविकास प्रतिबन्धक कर्म्मनिमित्तभूता --8 [ १६३ ] ] प्रसुरगतिः

पृष्ठ 185

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। पन्थाः देवयानः ' –: आकाश – ' ज्योतिर्म्मयः – विद्यासमुच्चितकर्मानुगतः १ – । पन्थाः रणः पितृया + : ' आकाश '-तमोमयः -विद्यानिरपेक्षकर्मानुगतः – २ श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड । ) नरकगतिनिमित्तभूतः ( १ -उत्तराकाशः — अंशात्मकः ४२ – सौरज्योतिर्मयः -विद्यासमुच्चितप्रवृत्तिकर्मानुगतः १ ' ) १ ' देवपथः २ देवयानान्तर्गतो देवस्वर्गगतिनिमित्तभूतः ( → २ —‘पितृपथः’-पितृयाणान्तर्गतः काशः दक्षिणा – अंशात्मकः ४२ – चान्द्रज्योतिर्मयः -विद्यानिरपेक्षप्रवृत्तिसत्कर्मानुगताः १ → । ) गतिनिमित्तभूतः पितृस्वर्ग ( विद्यासापेक्षनिवृत्तिसत्कर्मानुगतः १-३ ३ ' - ब्रह्मपथः ' + देवयानान्तर्गतो - उत्तराकाशः ध्रुवमण्डलावच्छिन्न - उत्तर ज्ञानज्योतिर्लक्षणः विद्यानिरपेक्षनिवृत्तिसत्कर्म्मानुगतः लौकिकनिवृत्तिसत्कर्म्मानुगतः - ३-२ ) क्रममुक्तिगतिनिमित्तभूतः ( लौकिकनिरर्थककर्मानुगतः १-४ ४ लौकिकविरुद्धकर्म्मानुगतः २ -' यमपथः - ' पितृयाणान्तर्गतो दक्षिणाकाशः ध्रुवमण्डलोपलक्षित-- दक्षिण असुर्य्यलक्षणः → [ १६४ ] लौकिकस्वार्थकर्म्मानुगतः ३ -आत्मग तिनिमित्तानि

पृष्ठ 186

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड ( ज ) लोकाः ( आत्मगतिस्थानानि ) आत्मगतिनिमित्तानि श्रात्मगतिनिमित्तभूत ' लोक ' के सम्बन्ध में प्राज अनेक प्रवाद प्रचलित हैं । कितने एक शास्त्रभक्तों. के मुख से भी इस सम्बन्ध में यह कहते सुना गया है कि, स्वर्ग - नरकादि जो लोक सुने जाते हैं, वे सब इसी लोक ( भूलोक ) से सम्बन्ध रखते हैं | पुण्यात्माओं का जीवन सुखपूर्वक व्यतीत होता है, उनके लिए यही लोक स्वर्ग है एवं पापात्मा दुःखी रहते हैं तथा उनके लिए यही लोक नरक है । इसमें तो कोई सन्देह नहीं कि, पुण्यात्मा पापात्मा यहाँ क्रमशः सुखी दुःखी रहते हैं । परन्तु एतावता ही इसी लोक में स्वर्ग - नरकादि • लोकों का अन्तर्भाव मानकर भूलोकातिरिक्त नित्य सिद्ध प्राकृतिक स्वर्गादि लोकों की सत्ता में अविश्वास करना सर्वथा विरुद्ध है । ' श्रयं च लोकः परश्वलोकः ' इत्यादि रूप से जब शास्त्र लोक परलोक का पार्थक्य बनता रहा है, मानना पड़ेगा कि स्थूलशरीर से उत्क्रान्त श्रात्मा कर्मानुसार उक्त श्रात्मगति निमित्तों को अपनाता हुआ अवश्यमेव शुभाशुभ लोकों में पहुँचता है । प्रकृत प्रकरण में उत्क्रान्त आत्मा के उन गन्तव्य स्थानों का ही दिग्दर्शन कराना है । भूलोक से उत्क्रान्त प्रतिवाहिक सूक्ष्म शरीरधारी आत्मा किन - किन • लोकों में गमन करता है? इस प्रश्न का समाधान ही प्रस्तुत प्रकरण निष्कर्ष है । कर्म्मभेद व्यवस्थित है, मार्गभेद से लोकगतिभेद व्यवस्थित है । कर्म्मभेदानुगता आत्मगति के भेद से लोकगतियों के अनेक विवर्त्त हो जाते हैं । सामान्यदृष्टि से उन सब लोकगतियों का निम्नलिखित रूप से तीन तरह से वर्गीकरण किया जा सकता --क - नित्यगतिः ख- क्रमगतिः ग- प्रगतिगतिः क - नित्यगतिः तीनों में से क्रमप्राप्त पहले नित्यगति की ओर ही गतिप्रेमियों का ध्यान आकर्षित किया जाता है ।. पूर्व में ' नाड़ी ' निमित्त का विश्लेषण करते हुए यह स्पष्ट किया जा चुका है कि, हृदयस्थान कर ब्रह्मरन्ध्र द्वारा ( सौररश्म्यवच्छेदेन ) सूर्य्य केन्द्रपर्य्यन्त सुषुम्णा नाड़ीमार्ग प्रतिष्ठित है । इस से ग्रारम्भ नाड़ीरूप उभयनिष्ठ ( सूर्य्य तथा प्राणीनिष्ठ ) महापथ के द्वारा सौरविज्ञानतत्व का गमनागमन बना सुषुम्णा-है । इस सौरतत्त्व की दो तरह से अध्यात्मसंस्था में प्रतिष्ठा रहती है । सौर प्रवर्ग्याश विज्ञानात्म रूप रहता से कर्म्मात्म विशिष्ट उस चान्द्र प्रज्ञानात्मा पर अन्तर्य्यामि सम्बन्ध से अध्यात्म में प्रतिष्ठित होजाता है, जो कि प्रज्ञानात्मा ' हृत् प्रतिष्ठं यदजिरंजविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ' इत्यादि यजुर्म्मन्त्रानुसार प्रतिष्ठित है । ' स वा एष विज्ञानात्मा सम्परिष्वक्तः ' ( बृ.प्र. ४।४।२२ ) इत्यादि उपनिषच्छति हृदय में हृदय में प्रतिष्ठित प्रज्ञानमन से सम्परिष्वक्त यह विज्ञानात्मा हृदय से चल कर कण्ठस्थ के तेजोनाड़ी ' अनुसार [ १६५ ]

पृष्ठ 187

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड श्रात्मगतिनिमित्तानि ( उदानप्राणात्मिका नाड़ी ) द्वारा दक्षिणचक्षुपर्य्यन्त प्रनुधावन करता हुआ । ' दक्षिणाक्षिपुरुष ' नाम से प्रसिद्ध है । इसी चाक्षुषपुरुष को लक्ष्य में रख कर कहा गया है - ' यो ऽ सावादित्ये पुरुष, सोऽहम् ' । - ' इस ' चाक्षुष पुरुष के अतिरिक्त सौर विज्ञानतेज पूर्वोक्त सुषुम्णामार्ग द्वारा ही बहिर्य्यामि सम्बन्ध से भी आकर पुरुष के साथ सम्बन्ध बनाए रहता है । यह आगन्तुक सौर विज्ञानतत्त्व ही प्रत्यगात्मा के जीवन ( प्रा ) की प्रतिष्ठा है । पुरुष के स्वस्वास्तिक से ऊर्ध्व वितत सप्तवर्णात्मिका सौर नाड़ीयुक्त महापथ द्वारा आयुः प्रवर्तक, प्रायुः प्रदात्मा यह श्रागन्तुक विज्ञानतत्व निमेषमात्र में अध्यात्म से सूर्य्यकेन्द्र में चला जाता है, वहाँ निमिषमात्र ठहरता है, एवं वहाँ से मनः प्राणवाङ्मय ( ज्ञान क्रियार्थमय ) प्रायुर्लक्षण जीवनीयरस से संयुक्त होकर निमिषमात्र में वापस अध्यात्मसंस्था में लौट आता है । इस प्रकार जब तक आयुः सूत्र विच्छेदक याम्यप्रारण का पुरुष के महापथ पर आक्रमण नहीं हो जाता, तब तक यह प्रागन्तुक विज्ञानात्मा अहरहः ' प्रतिक्षण प्राता - जाता रहता है । यही नित्य स्वर्गगति है । यहीं नित्यस्वर्गगति जीवन सत्ता का कारण ' है । जिस क्षण गमनागमनरूपा इस विज्ञानगति का विच्छेद हो जाता है, उसी क्षण विज्ञानात्मा प्राण-e ' देवतानों के साथ उसी महापथ द्वारा स्वज्योति में विलीन हो जाता है । प्रत्यगात्मा कर्म्मगति भोगार्थ देवयानादि मार्गो का आश्रय ले लेता है । अहरहर्लक्षरण विज्ञानात्मानुगता इसी नित्यगति को लक्ष्य में रखते हुए ऋषि ने कहा है-" अहरहर्वा एष यज्ञस्तायते, अहरहः सन्तिष्ठते, अहरहरेनं स्वर्गस्य लोकस्य गत्यै युक्त, हरहरेनेन स्वर्गं लोकंगच्छति । ” ( शत ० ब्रा ० ६।४।१।१५ ) । उक्त अहरहर्लक्षण नित्यगति के अतिरिक्त एक वार्षिक स्वर्गगति और होती है । चूंकि यह प्रति-सम्वत्सर में नियमित रूप से होती रहती है, अतएव इसे भी नित्यगति ही माना जा सकता है । भूपिण्ड क्रान्तिवृत्त के चारों ओर एक सम्वत्सर में पूरी परिक्रमा लगाता रहता है । वर्ष में दो बार ( शरत्सम्पात् एवं वसन्त सम्पात्काल में ) भूपिण्ड मध्यस्थविष्ववृत्त से युक्त होता है, यही क्रान्तिसम्पातकाल माना गया है । विष्ववृत्त ही सूर्य सम्बन्ध से स्वर्गलोक । इसमें उत्तरायणषण्मासों में ही सौरप्राण का विकास रहता है । उत्तरायणषण्मासात्मक परिभ्रमण सम्बन्धी वसन्त ही सौरतत्त्व सम्बन्ध से स्वर्गलोक माना गया है । भूपृष्ठ पर अस्मदादि प्रजावर्ग प्रतिष्ठित है । फलतः वसन्त सम्पातानुगत विष्ववृत्तीय स्वर्गपृष्ठ के साथ भूपिण्ड द्वारा प्रति सम्वत्सर में एक बार हमारा भी सम्बन्ध हुआ करता है । इसी साम्वत्सरिक नित्यस्वर्गगति का दिग्दर्शन कराते हुए भगवान याज्ञवल्क्य ने कहा है— " ऐतं वा 5 एते गच्छन्ति षड्भिर्मास -र्य एष तपति, ये सम्वत्सरमासते । ” ( शत ० ४।६।२ ) । ' विज्ञानात्मानुगता प्रहरहर्लक्षण नित्यस्वर्गगतिं प्रयुः स्वरूपरक्षिका है, शरीरानुगता सम्वत्सरलक्षणा मासिक नित्यस्वर्गगति प्रतिष्ठारक्षिका है । चूंकि इन दोनों ही स्वर्गगतियों का प्रत्यगात्मा के साथ हिम सम्बन्ध है । अतएव इन स्वर्गगतियों से न तो जीवनदशा में ही प्रत्यगात्मा को स्वर्गसुखावाप्ति [ १६६ ]

पृष्ठ 188

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि होती एवं न उत्क्रान्त प्रत्यगात्मा स्वर्गलोक का ही अधिकारी बन सकता । पापात्मा - पुण्यात्मा, सबके लिए दोनों नित्यगतियाँ समान हैं । यदि प्रत्यगात्मा बुद्धियोगानुष्ठान द्वारा उस सौषुम्णा विज्ञान के साथ अन्तर्य्याम सम्बन्ध से युक्त हो जाता है, तो आयुर्भोगानन्तर - ' स यावत् क्षिप्येन्मनस्तावदा दित्यं गच्छति ' के अनुसार वह रश्म्युनुसारी बनता हुआ उसी सुषुम्णापथ से सूर्य्यभेदी ही बन जाता है । एवमेव ' गवामयनसत्र ' नामक कम्र्मानुष्ठान से उक्त सम्वत्सरतत्त्व का भी प्रत्यगात्मा के साथ अन्य्यम सम्बन्ध हो जाता है एवं उस दशा में प्रत्यगात्मा उत्क्रान्ति के अनन्तर सम्वत्सर स्वर्ग का अधिकारी बन जाता है । बिना इन उपायों के प्रत्यगात्मा उन क्रमगतियों का ही अनुगमन करता है, जिनका क्रमशः स्पष्टीकरण होने वाला है । ' आत्मगति ' शब्द से मुख्यतः प्रत्यगात्मगति ही अभिप्रेत है एवं प्रहरहर्गति का प्रधानतः विज्ञानात्मगति से सम्बन्ध हैं, तथा सम्वत्सरगति का प्रधानतः ( परम्परया ) शरीरगति से सम्बन्ध से है । अतः इन दोनों नित्यगतियों को हम ' आत्मगति ' मर्यादा से बहिर्भूत मानेंगे । ये दोनों प्राकृतिक गतियाँ हैं । प्रत्यगात्मा के शुभकर्म से इनमें कोई वैशिष्ट्य उत्पन्न नहीं होता एवं अशुभकर्म से इन गतियों का अवरोध नहीं होता । वैश्वानर - तेजस - प्राज्ञसमंष्टिलक्षण विज्ञानात्म प्रधान मानवर्ग के साथ अहरहर्गगति का तथा सम्वत्सरगति का, दोनों का सम्बन्ध है एवं इतर विज्ञानशून्य चेतनप्राणियों के साथ केवल सम्वत्सरगति का सम्बन्ध है । बुद्धियोगात्मक उपाय का मनुष्यमात्र से सम्बन्ध है एवं गवामयनसत्रात्मक उपाय का ब्रह्मक्षत्रविड्वीर्य्यात्मिका केवल भारतीय मानवप्रजा ( द्विजाति ) से सम्बन्ध है । यही नित्यगति का संक्षिप्त इतिवृत्त है । १ - प्रहरहर्गतिः विज्ञानात्मानुगता २ - सम्वत्सरगति + → शरीरानुगता ख - क्रमगतिः > नित्यगति: ( १ ) ( इति नित्यगतिनिरुक्ति ) दूसरी क्रमप्राप्त क्रमगति है । इस क्रमगति के १ – पञ्चत्वगति, ३ - संसृतिगति, ३ मुक्तिगति भेद से तीन प्रधान विवर्त हैं । पहली ' पञ्चत्वगति ' नाम की क्रमगति के “ १ - श्रात्मपञ्चत्वगतिः, “ २ - देवपञ्चत्वगति, ३ – भूतपञ्चत्वगति " ये तीन प्रधान विवर्त्त हैं, दूसरी संसृतिगति नाम की क्रमगति के “ १ - सद्गति, २ - दुर्गति, ३ - योनिगति " भेद से तीन प्रधान विवर्त्त हैं । तीसरी क्रमप्राप्त मुक्तिगति नाम की क्रमगति के “ १ - परामुक्तिगति, २ - श्रपरामुक्तिगति " ये दो प्रधान विवर्त हैं । आगे जाकर इनके अवान्तर असंख्यभेद हो जाते हैं, जैसा कि पाठक तत्तद्गति निरुक्ति प्रकरणों में देखेंगे । सुविधा के लिए यहाँ क्रमगति से सम्बन्ध रखने वाले प्रधान प्रधान विवर्त्त तालिका रूप से उद्धत कर दिए जाते हैं-[ [ १६७ ]

पृष्ठ 189

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श्राद्ध विज्ञान चतुर्थ खण्ड १ पञ्चत्वगतिः ( ख ) क्रम गति: ( २ ) २ मुक्तिगतिः श्रात्मगति निमित्तानि १ - आत्मपञ्चत्वगतिः २ - देवपश्वत्वगतिः १ - सद्गतिः २ - दुर्गतिः १- परामुक्तिगतिः ३- भूतपञ्चत्वगतिः ३ - योनिगतिः २- अपरा मुक्तिगतिः ३ ३ २ • पञ्चत्वगतिलक्षरणाक्रमगतिः अध्यात्मसंस्था ' प्राजापत्यसंस्था ' है । ' श्रात्मा, प्राणाः पशवः ' की समष्टि ही प्रजापति है | हृदयस्थ चिद्घनत्व आत्मा ' ' हैं, यही उक्थ है । उक्थ आत्मबिम्ब से विनिःसृत अर्क ( रश्मि ) भाव प्राणाः ' ' हैं । अर्कप्राणमण्डल में भुक्त मर्त्य - पव प्रशिति - लक्षण पशव: हैं । श्रात्मा ' जीव ' है, प्राणाः ' इन्द्रियाणि ' है, पशवः ' शरीरम् ' है । जीव ' ब्रह्म ' है, इन्द्रियाणि ' देवता ' है, शरीरं ' भूतानि ' हैं । श्रात्मा स्वमहिमा में प्रतिष्ठित हैं, देवता: आत्ममहिमा में प्रतिष्ठित हैं एवं भूतानि देवमहिमा में प्रतिष्ठित हैं । आत्मा ( प्रत्यगात्मा ) का प्रभव ईश्वरीय देवसत्य है, देवताः का प्रभव स्तौम्य अग्नीषोम है, भूतानि का प्रभव पार्थिवपञ्चमहाभूत वर्ग है । एतत्रितय समष्टि ही ' अध्यात्मम् ' है, यही जीवप्रजापति है, जैसा कि परिलेख से स्पष्ट है --( १ ) १ – आत्मा २- प्राणाः ३- पशवः ( १ ) ( २ ) १ - उक्थम्. २- अर्काः ३ - अशितयः ( २ ) ( ( ३ ) १ – जीवः २ - इन्द्रियारिण ३ - शरीरम् ( ३ ) ( ४ ) १ – ब्रह्म २– देवताः ३ – भूतानि ( ४ ) ईश्वरीय देवसत्यः प्रभवः स्तोम्यांग्निषोमो प्रभवौ पार्थिवपञ्चमहाभूतानि प्रभवभूतानि इति नु - अध्यात्मम् – जीव प्रजापतिः [ १६८ ]

पृष्ठ 190

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड m श्रात्मगतिनिमित्तानि जीव प्रजापतिविवर्त्त से सम्बद्ध श्रात्मा, इन्द्रियवर्ग, भौतिकशरीर तीनों की क्रमशः श्रात्मगति, इन्द्रियगति, शरीरगति ये तीन क्रमगतियाँ होती हैं । सञ्चित कर्म्मसंस्कारों का आत्मा के साथ सम्बन्ध रहता है । इन संस्कार प्रतिबन्धकों से जीवात्मा उत्क्रान्त होने पर स्वप्रभव में विलीन नहीं हो सकता, श्रपितु इसे स्वकर्मानुसार शुभाशुभ लोक विशेषों का अनुगमन करना पड़ता है । ' प्रत्यगात्मा ' नामक जीवात्मा के अतिरिक्त अध्यात्म संस्था में श्रात्मपञ्चक और प्रतिष्ठित रहता है । स्वायम्भुव आत्मा ' अव्यक्तात्मा ' है, पारमेष्ठ्य आत्मा ' यज्ञात्मा ' है, इसका अव्यक्तात्मा में अन्तर्भाव है । सौर आत्मा ' विज्ञानात्मा ' है । चान्द्र श्रद्धारसमय आत्मा ' महानात्मा ' है । चान्द्र अन्नरसमय आत्मा ' प्रज्ञानात्मा ' है, पार्थिव वैश्वानर अग्निरसमय ( इरारसमय ) आत्मा ' भूतात्मा ' है । इस प्रकार अव्यक्तयज्ञात्मा, विज्ञानात्मा, महानात्मा, प्रज्ञानात्मा, भूतात्मा भेद से खण्डात्मसंस्था में पाँच प्रात्मविवर्त्त भुक्त हैं यही आत्मपञ्चक 1 जब वैश्वानर - तेजस - प्राज्ञलक्षण कर्मात्मा ( जीव ) शरीर से उत्क्रान्त हो जाता है, तो अव्यक्तयज्ञात्मा स्वप्रभव परमेष्ठीयुक्त स्वयम्भू में अपीत हो जाता है । विज्ञानात्मा सूर्य्य में, महान्प्रज्ञान चन्द्रमा में एवं भूतात्मा स्तौम्यपार्थिव त्रिलोकी में अपीत हो जाता है । यही पहली ' आत्मपञ्चत्वगति ' है । स्तौम्य श्रग्नि, वायु, श्रादित्य, विक्सोम, भास्वरसोम इन पाँच अग्निषोमीय देवताओं से क्रमशः वाक्, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, इन्द्रियमन इन पाँच इन्द्रिय देवताओं का आविर्भाव हुआ है । जीवात्मोत्क्रान्त्य-नन्तर पाँचों इन्द्रिय देवता स्वप्रभवभूत प्राकृतिक पाँचों अग्निषोमीय देवताओं में अपीत हो जाते हैं । यही दूसरी ' देवपञ्चत्वगति ' है । पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश ये पाँचों भूत शरीर पाँचों भूतों के प्रभव हैं । उत्क्रान्त्यनन्तर होने वाले शवदाह कर्म से पाँचों शारीरभूत स्वप्रभवभूत पाँचों पार्थिव भूतों में विलीन हो जाते हैं यही तीसरी ' भूतपञ्चत्वगति ' है । इस प्रकार जीवात्माधिकार में भुक्त श्रात्म - देव-भूतपञ्चकों का स्वप्रभवपञ्चकों में विलीन हो जाना ही पञ्चगतिर्लक्षणा पहली क्रमगति है । मूर्ख - विद्वान, पापी - पुण्यात्मा, सब के लिए तीनों गतियाँ समान हैं । कर्मानुगता शुभाशुभभावोपेता प्रत्यगात्मानुबन्धिनी आत्मगति जहाँ विशेष गति है, वहाँ ये तीनों पञ्चत्वगतियाँ प्रविशेष बनती हुई प्रकरण प्राप्त प्रात्मगति-मर्यादा से पूर्वोक्त नित्यगतिवत् बहिर्भूत है । १ - प्रात्मपञ्चत्वगतिः ( खण्डात्मपञ्चकगति ) २ - देवपञ्चत्वगतिः ( इन्द्रियगतिः ) → पञ्चत्वगतिलक्षरणा क्रमगति: ( सर्वसामान्या ) ३ – भूतपञ्चत्वगतिः ( शरीर गतिः ) २- संसृतिगतिलक्षरणा - क्रमगतिः खण्डात्मपञ्चक, देवपञ्चक, भूतपञ्चक तीनों की पूर्वकथनानुसार जब पञ्चत्वगति हो जाती है, तो उत्क्रान्त प्रत्यगात्मा ( प्रेतात्मा ) की क्या स्थिति होती है? इसे कहाँ गमन करना पड़ता है? इत्यादि प्रश्नों का समाधान इसी संसृतिगति ( संसारगति ) नामक क्रमगति पर अवलम्बित है । संसृतिगतिलक्षणा [ १६ ९ ]