Part IV Atmgativigyanopanishta Part 4 — पृष्ठ 191–200

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४ · पृष्ठ 191–200

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि इस दूसरी क्रमगति के सद्गति, दुर्गति, योनिगति ये तीन विवर्त्त बतलाए गए हैं । तीनों का क्रमिक निरूपण ही प्रस्तुत प्रकरणार्थ हैं । क - सद्गतिलक्षणा संसृतिगति ( क्रमगतिः ) ' सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ' इत्यादि श्रोत सिद्धान्त के अनुसार प्रत्यगात्मा सोरत्वघन है । कर्म्मा-मभुक्त चिदंश सौरचित् का ही प्रवर्ग्यभाग है * यह एक विज्ञानसम्मत सिद्धान्त है कि, जो वस्तु ( कार्य ) जिस वस्तु ( कारण ) से उत्पन्न होती है, वह उस ( कारण ) वस्तु के अव्यवच्छिन्न सम्बन्ध से ही प्रसन्न ( याथवस्थित ) रहती । कार्य का विकास कारणगुणानुगति पर ही निर्भर है । इसी नियम के आधार पर सजातीयाकर्षण सिद्धान्त प्रतिष्ठित है । सिद्ध है कि सूर्य्यं कारण से उत्पन्न कार्य्यरूप जीवात्मा यदि सौरज्यतिर्भाग का अनुगामी बना रहता है, तो इसमें इसका विकास है, यही आत्मा का अभि - उत् - य-लक्षण ( सूर्य्यसम्मुखगमनलक्षण ) श्रभ्युदय है । सूर्य्यसाम्मुख्यानुगता इस श्रात्मगति में क्रमशः उत्तरोत्तर सौरज का उपचय होता है । इस सौरतत्वोपचय से उत्तरोत्तर विकसित भूमाभावानुगत श्रात्मा श्रधिकाधिक आनन्द का अनुभव करता है । आत्मसत्ता का उत्तरोत्तर विकास करने वाली, आत्मा को सद्भाव से युक्त करने वाली यह सूर्य्यानुगता आत्मगति अवश्यमेव ' सद्गति ' ( सत्ताभावविकासप्रवृत्तिकागति ) नाम से व्यवहृत की जा सकती है । उत्तरायणकालावच्छिन्न देवयानमार्ग में सौरज्योति की प्रधानता है, अतएव एतन्मार्गानुगता श्रात्म-गति ही सद्गति मानी जायगी । दक्षिणायनकालावच्छिन्न पितृयाणमार्ग में पितृपथ मण्डलपर्य्यन्त सौरज्योति का चन्द्रभुक्त प्रकाश रहता है । अतएव प्रांशिकरूप से एतन्मार्गानुगता आत्मगति भी सद्गति ही मानी जायगी, जैसाकि पूर्वनिमित्त निरुक्तियों में स्पष्ट कर दिया गया है । ये ही दोनों गन्तव्य स्थान क्रमशः देवलोक, पितृलोक नामों से प्रसिद्ध हुए हैं । चूंकि देव स्वर्गात्मक देवलोक में सौरप्रकाश का वैशिष्ट्य है, अतएव यह गति ' विशिष्टसद्गति मानी जायगी । उधर पितृस्वर्गात्मक पितृलोक में देवलोकापेक्षया प्रकाश ( चान्द्रज्योति ) स्वल्पमात्रा में प्रतिष्ठित है, अतएव इस गति को ' सामान्य सद्गति ' कहा जायगा । इस प्रकार प्रकाशतारतम्य से सद्गति के दो विवर्त्त हो जाते हैं । देवस्वर्ग सम्बन्ध से ही उत्क्रान्त आत्मा का वास्तविक अभ्युदय होता है । यमपथात्मक सूर्य्यविरुद्ध भाग में जाना आत्मा का प्रत्यवाय है । प्रकाशवश्चित आत्मा इस मार्ग में तथा गन्तव्य नरकलोक में उत्तरोत्तर दुःखी होता जाता है । यही प्रात्मस्वरूप हानि है । श्रभ्युदय शब्द पर दृष्टि डालिए । ' अभि-उत् - प्रय ' ही अभ्युदय हैं । ' अभि ' का अर्थ है – ' सूर्य्यदिक् की ओर ' । ' उत् ' का अर्थ है - ' उत्तरमार्ग की ओर ' | ' अय ' का अर्थ है - ' गमन ' । सूर्य्यभेदी तो केवल मुक्तात्मा बनता है । इसी रहस्य को व्यक्त करने के लिए ऋषि ने उत् ( उत्तर ) का सन्निवेश किया है । सूर्य की ओर उत्तरमार्ग में गमन करना ही अभ्युदय शब्द निष्कर्ष है । ' प्रति - श्रव - श्रय ' का अर्थ है - ' सूर्य्यविरुद्ध दिक् में नीचे की ओर जाना । ' सूर्य्य * " यदा पश्यः पश्यतेरुक्मवर्णम् ” ( मुण्डकोपनिषत् ) [ १७० ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि रोदसी त्रैलोक्य का स्वामी है, अतएव इसे ' इन ' ( स्वामी ) कहा जाता है, जैसा कि - ' इनः सूर्ये प्रभौ राजा मृगाङ्क क्षत्रिये नृपे इत्यादि अमरवचन से प्रमाणित है । ' अ ' कार का अर्थ ' प्रभाव ' है । ' अस् ’ सत्ता का द्योतक है । वह कर्म्म, जो आत्मा को इन ( सूर्य्यं ) की सत्ता के प्रभाव में ( सूर्य्यविरुद्धदिक् में ) ले जाता है, वही प्रत्यवायजनककर्म्म ' एनस् ' कहलाया है । एनस्वी पुरुष ही प्रत्यवायप्रवर्तक असल्लोकानुगामी बनता है । वक्तव्यांश यही हैं कि सौर- चान्द्रज्योतिर्भेद से ज्योतिर्लक्षण सद्गति के दो विवर्त्त हो जाते हैं । १ — देवस्वर्गंगतिः → विशिष्टसद्गतिः २ – पितृस्वर्गगतिः सामान्य सद्गतिः देवस्वर्गनिरुक्तिः-→ सद्गतिलक्षणा संसृतिगति: ( १ ) यद्यपि पूर्व की आकाशनिमित्तनिरुक्ति में स्वर्ग - नरकादि लोकों का दिग्दर्शन कराया जा चुका है, तथापि अभी इस सम्बन्ध में पूरा स्पष्टीकरण नहीं हुआ है । देवस्वर्ग, पितृस्वर्ग नरकादिलोक चर्मचक्षुत्रों से परे की वस्तु है, अतएव उन्हें ' परलोक ' कहा गया है । ऐसे परोक्ष स्थानों की सत्ता पर सामान्य लौकिक अर्थपरायण विषयी मनुष्यों को विश्वास नहीं होता । यही कारण है कि, वे उत्पथमार्ग का अनुसरण करते हुए यामी यातनाओं के पात्र बनते हैं । ऐसे ही स्वार्थाभिमानी मोहजालसमावृत्त नराधम कहा करते हैं कि, इस भूलोक से अतिरिक्त परलोक नाम का कोई ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ दुःखादि का भोग करना पड़ता है । ऐसे नराधम ही बार - बार यमपाश बन्धन के सत्पात्र बना करते हैं । इसी स्थिति का बड़ा सुन्दर चित्रण करते हुए महर्षि कहते हैं--" न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् । ' अयं लोक: ' - ' नास्ति परः ' इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे । " ( कठोपनिषत् १।२।६ ) सामान्य मनुष्यों की भाँति भारतीय शास्त्रशिक्षा से वञ्चित तथा इहलोकप्रधाना पश्चिमीशिक्षा से लालित - पालित वर्त्तमान युग के शिक्षित - शिष्ट पुरुष भी परलोक सिद्धान्त को विशुद्ध काल्पनिक वस्तु समझने की भ्रान्ति कर रहे हैं । स्वविज्ञानदृष्टिमद से मत्त बने हुए, प्रत्यक्षानुगता चार्वाकदृष्टि के उपासक ब हुए आज के ये वैज्ञानिक भी यह कहते हुए परलोक सत्ता का उपहास किया करते हैं कि वैज्ञानिकों ने अणुवीक्षण, दूरवीक्षणादि यन्त्रों द्वारा भूगोल - खगोलादि के अणु अणु का पर्य्यवेक्षण कर डाला है, परन्तु कहीं उन स्वर्गादिलोकों की प्रतिष्ठा नहीं है, जिनका भय दिखा कर हमें लौकिक विषयोपभोगों से रोकने की वृथा चेष्टा की जा रही है । ' पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ' सूक्ति को चरितार्थ करने वाले ऐसे विज्ञानधुरीणों के उद्बोधन के लिए तथा श्रद्धालु आस्तिक भारतीयों के श्रद्धादाद के लिए विज्ञानदृष्टि से देवस्वर्गादि स्थानों का विश्लेषण करना श्रावश्यक हो जाता है । अनेकधाविभक्त परलोकों में से क्रमप्राप्त देवस्वर्गात्मक देवलोक की ओर ही उनका ध्यान आकर्षित किया जाता है । ' सुष्ठु प्रयते ' ही [ १७१ ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि स्वर्ग शब्द का निर्वचन है, जहाँ पहुँच कर आत्मा शुभभाव का सञ्चय करने में समर्थ होता हुआ सुखी रहता है, वही स्थानविशेष ' स्वर्ग ' कहलाया है । देखना यह है कि, वह स्थान कौनसा तथा कहाँ है, जहाँ आत्मा को सुख प्राप्त होता है? ' पञ्चज्योतिरयं पुरुष: ' इस श्रोतसिद्धान्त के अनुसार प्रात्मपुरुष पाँच ज्योतियों की समष्टि माना गया है । ' सूर्थ्य, चन्द्र, नक्षत्र, विद्युत्, श्रग्नि ' भेद से प्राकृतिक भूतज्योति पाँच भागों में विभक्त हैं । पाँचों में प्रधान सूर्य्यज्योति ही मानी गई है । चन्द्रज्योति भी ' अत्रादणोरमन्वत नामाचष्टुरपीत्यम् ' - ' तरणि किरणसङ्गादेषपानीयपिण्डो दिनकरदिशि चञ्चच्चन्द्रिका भिश्चकास्ते ' इत्यादि के अनुसार परम्परया सूर्य्यज्योति ही है । नक्षत्र - विद्युत् - श्रग्निज्योतियाँ भी - रूपं रूपं मघवा बोभवीतु ' -' इन्द्ररूपाणि कनिकृदचरत् ' इत्यादि के अनुसार सौरज्योतिर्मय इन्द्रतत्व से ही सम्बन्ध रखती हैं । इन पाँचों भूतज्योतियों में से विद्युतज्योति का सूर्य्यज्योति में, नक्षत्रज्योति का चन्द्रज्योति में अन्तर्भाव मान लिया जाता है । ऐसी स्थिति में पाँच भूतज्योतियों के स्थान में ' सूर्य्य - चन्द्र- श्रग्नि ' भेद से तीन ही ज्योतियाँ रह जाती हैं, जैसा कि - ' त्रीणि ज्योतींषि सचते स षोडशी ' इत्यादि यजुर्वर्णन से प्रमाणित है । सूर्य्यज्योति ' स्वज्योति ' है, चन्द्रज्योति ' परज्योति ' है, अग्निज्योति ' रूपज्योति ' है । चारों प्रोर रश्मि प्रसार द्वारा स्वयं भी चारों ओर से प्रकाशित रहना एवं स्वरश्मिमण्डलभुक्त पदार्थों को भी प्रकाशित रखते हुए उन्हें लोकदृष्टिपथा-नुगामी बनाए रखना स्वज्योति का प्रातिस्विक धर्म है । अन्य ज्योति के प्रवग्यशि से अपने अर्द्धभाग से प्रकाशित रहना एवं प्रकाशित अर्द्ध मण्डलभुक्त पदार्थों को प्रकाशित करते हुए उन्हें दृष्टिपथ का अनुगामी बनाना परज्योति का प्रातिविक धर्म है । केवल अपने स्वरूप को प्रकट करना, स्वज्योतिर्धनसूर्य्यं तथा परंज्योतिर्मय चन्द्रमा की भाँति अन्य पदार्थों को प्रकाशित न करना रूपज्योति का प्रातिविक धर्म है । सूर्य्यदेवलोक है, यह स्वज्योतिः प्रधान है । चन्द्रमा पितृलोक है, यह परज्योतिः प्रधान है । भूपिण्ड मनुष्य-लोक है, यह रूपज्योतिः प्रधान है । सौर - चान्द्रज्योतिर्भुक्त भूपिण्ड में उत्पन्न पुरुष में इन तीनों सूर्य्य-चन्द्र - श्रग्निज्योतियों का समन्वय रहता है । उक्त तीनों ( पाँचों ) भूतज्योतियों के अतिरिक्त चौथी ' श्रात्मज्योति ' है, जिसका आत्मा से सम्बन्ध है । पाँचों भूतज्योंतियाँ तभी तक अध्यात्म संस्था में प्रतिष्ठित रहती हैं, जब तक कि आत्मज्योति स्वस्थ रहती है । आत्मज्योति ( ज्ञानज्योति ) ही इस पञ्चभूतज्योति की मूलप्रतिष्ठा मानी गई है, जैसा कि निम्नलिखित उपनिषश्छ ति में प्रमाणित है-" न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं, नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्यभासा सर्वमिदं विभाति । " ( कठोपनिषद् २।२।१५ ) श्रात्मज्योति के आगे जाकर उक्थ ( मूलबिम्ब ), अर्क ( बिम्बविनिःसृतरश्मिमण्डल ) भेद से दो विवर्त्त हो जाते हैं । उक्थात्मिका प्रात्मज्योति शरीराकाशगभित हृदयाकाशानुगत दहराकाश में दीपाच वत् स्थिरूप से प्रज्वलित है । इसी को वेदान्त भाषा में ' ज्ञानकन्दल ' कहा गया है, यही अन्तकरणावच्छिन्न [ १७२ ]

पृष्ठ 194

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड श्रात्मगतिनिमित्तानि चैतन्य है । सुप्रसिद्ध * शिक्षासिद्धान्त के अनुसार यही ग्रात्मज्योति मन की प्रेरणा से बुद्धि सहयोग द्वारा रश्मिभाव में परिणत होता हुआ कायाग्नि तथा शरीरखायु के सहयोग से ऊर्ध्व व्युत्क्रम करता हुआ वाग्रूप में परिणत होता है । यही अर्करूपा पाँचवीं ' वाग्ज्योति ' है । उक्थज्योति श्रात्मज्योति है, अर्क-ज्योति है । चूंकि वाग्ज्योति में कायाग्नि का सम्बन्ध है, इसलिए तो — ' अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशत् ' कहा जाता है, शारीरवायु का सम्बन्ध है, इसलिए ' वायुःस्यात् शब्दस्तत् ' यह कहा जाता है एवं परम्परया वाक्तत्त्व आत्मज्योति का ही रूपान्तर है, इस दृष्टि से इसे ' आत्मा ' कहा जाता है । आत्मा, मन, बुद्धि, कायाग्नि, शारीरवायु इन सब के समन्वय से वाग्ज्योति का स्वरूप निष्पन्न हुआ है । इसी आधार पर वाक् ' के सम्बन्ध में निम्नलिखित निगम व्यवहृत हुए हैं--१ - - " एतन्मयो वा श्रात्मा - वाङमयः " ( शत ० १४ । ४ । ३ । १० ) । २ – “ वाग्वैधिषणा " ( बुद्धिः ) ( शत ०६ । ५ । ४ । ५ ) । ३ – “ वाग्वैमतिः । वाचा हीदं सर्वं मनुते " ( मनः ) ( शत ० ८ ।१ २२७ ) । ४ - " साया सा वाक् - अग्निः सः " ( जै ० उ ० ब्रा ० २।२।१ ) । -- " वाग्वै वायुः " ( तै ० जा ० १२८ | ८ | ८ | १ ) | ग्रात्मोत्क्रान्तिप्रधान परिचायक वाग्ज्योति का विश्राम माना गया है । वाग्ज्योतिम्यरश्मिमण्डल जब आत्मोक्थ में पीत जाता है तो वागुव्यापार बन्द हो जाता है । इस दृष्टि से भी हम वाग्ज्योति को आत्मज्योति का विवर्त्त मान सकते हैं । इस प्रकार तीन भूतज्योतियाँ, दो ग्रात्मज्योतियाँ, सम्भूय पुरुष में पाँच ज्योतियों का समन्वय सिद्ध हो जाता है, जैसा कि परिलेख से स्पष्ट हैं-* श्रात्मा बुद्धया समेत्यार्थान् मनोयुक्ते विवक्षया । मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम् ॥१ ॥

मारुतस्तरसिचरन् मन्द्रं जनयति स्वरम् ॥ प्रातः सवन योगं तं छन्दो गायत्रमाश्रितम् ॥२ ॥

कण्ठे माध्यन्दिनयुगं मध्यमं त्रैष्टुभानुगम् ॥ तारं तार्त्तीयसवनं शीर्षण्यं जगतानुगम् ॥३ ॥

सोदीयभिहतो वक्त्रमापद्य मारुतः ॥ वर्णाञ्जनयते तेषां विभागः पञ्चधा स्मृतः ॥४ ॥

[ १७३ ] ( पाणिनीय शिक्षा )

पृष्ठ 195

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्डं भूतज्योतिषि ५ श्रात्मगतिनिमित्तानि १ - सूर्य्यज्योति: ( विज्ञानज्योतिः ) २ – विद्युज्योतिः ( गतिज्योति ः ) ३ – चन्द्रज्योतिः ( प्रज्ञानज्योतिः ) ४ – नक्षत्रज्योतिः ( विकासज्योतिः ) ५ – प्रग्निज्योतिः ( तापज्योतिः ) } gfx: - बुद्धि: ( सूर्य्यज्योतिः - स्वर्लक्षणा ) + ( १ ) + सूर्य्यः - मनः ( चन्द्रज्योतिः - परलक्षणा ) + ( २ ) -→ चन्द्रः ] शरीरम् ( भूज्योति: - रूपलक्षणा ) + ( ३ ) + अग्निः आत्मज्योती २ -६ - आत्मज्योतिः ( ज्ञानज्योतिः ) ७ – वाग्ज्योतिः ( शब्दज्योतिः ) - * + ( ४ ) आत्मा + ( ५ ) वाक् + • श्रात्मा ( आत्मज्योतिः - प्रतिष्ठा लक्षणा ) " पुरुषः पञ्चज्योतिरयं " पञ्चभूतज्योतिः समष्टिरूप तीन भूतज्योति, दो आत्मज्योति इन पाँचों प्राध्यात्मिक ज्योतियों में ज्ञानकन्दललक्षण उक्थात्मिका श्रात्मज्योति प्रधानप्रतिष्ठा है । जब तक आत्मदेवता अध्यात्म में प्रतिष्ठित रहता है, तभी तक शब्दात्मिका वाग्ज्योति प्रतिष्ठित है । तभी तक तापात्मिका अग्निज्योति, विकासात्मका नक्षत्रज्योति, प्रज्ञानात्मिका चन्द्रज्योति, गत्यात्मिका विद्युज्योति एवं विज्ञानात्मिका सूर्य्यज्योति प्रतिष्ठित है । आत्मज्योति के उत्क्रान्त होते ही वाणी ( वाग्ज्योति ) उपरत हो जाती है, शरीर शीताक्रान्त हो जाता है, नाक्षत्रिक लोमगर्तों का विकास संकुचित हो जाता है, मन उत्क्रान्त हो जाता है, अङ्गप्रत्यङ्गस्फुरणलक्षण विद्युत् सञ्चार अवशान्त हो जाता है एवं विज्ञान पलायित हो जाता है । जिस प्रकार उक्त आध्यात्मिक पाँचों ज्योतियों में आत्मज्योति शेष चारों ज्योतियों की प्रतिष्ठा है, एवमेव आधिदैविक सूर्य्यज्योति इस आध्यात्मिक आत्मज्योति की प्रतिष्ठा है । जब तक सौरज्योति महापथ द्वारा सुषुम्णामार्ग से हृदय में प्रारूप से श्राता रहता है, तभी तक आत्मज्योति अध्यात्म में प्रतिष्ठित रहती है । कहा गया है कि, पाँचों भूतज्योतियों में सूर्य्यज्योति ही प्रधान है । फलतः आध्यात्मिक पाँचों भूतज्योतियों की भी परम प्रतिष्ठा सूर्य्यज्योति ही मानी जायगी । साथ ही सौरतेजोगभित चिदंश ही चूंकि प्रात्मज्योति की प्रतिष्ठा है, अतः आत्मज्योति - वाग्ज्योति इन दोनों की भी प्रतिष्ठा ( चिदशा-पेक्षया ) सूर्य्यज्योति ही मानी जायगी । निष्कर्षतः सूर्य्य ही हमारी अध्यात्मसंस्था का सर्वस्व माना जायगा । रात्रि की अपेक्षा अहः कालोपलक्षित सूर्य्यसत्ताकाल में श्रात्मा विकसित इसीलिए रहता है कि, इस समय इसे स्वप्रभव सूर्य्यज्योति साक्षात् रूप से मिलती रहती है । दिन में आप इसी सौरज्योतिर्बलाधान से [ १७४ ]

पृष्ठ 196

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड आत्मगति निमित्तानि आत्मनिर्भर बने हुए दुस्तर - भयावह - प्ररण्य प्रान्तों में भी जाने का साहस कर लेते हैं । सौरप्रकाशापेक्षया चान्द्रप्रकाश अल्पशक्ति है, अतएव रात्रि में उक्त स्थानगमन का पूरा साहस तो नहीं होता, परन्तु चन्द्रिका यथाकथंचित् गमनप्रवृत्ति का कारण बन जाती है । यदि कृष्णपक्ष की रात्रि है, तो दीपादि कृत्रिम प्रकाशों का साहाय्य गमनसाहस का निमित्त बनता है, यही अग्निज्योति है । दीपाभाव में घोर अन्धकार में किसी ऐसे अन्य सहयोगी का सहगमन अपेक्षित है, जो बात चीत करता चले । यही वाग्ज्योति है । मान लीजिए आप तमोबहुलारात्रि में एकाकी जा रहे हैं, सूर्य्य - चन्द्र - अग्नि - वाक् चारों ज्योतियों के सहयोग से आप वश्चित हैं । अवश्यमेव प्रकाशचतुष्टयी वश्वित आत्मा में भय का सञ्चार हो पड़ता है । सहसा किसी अज्ञात मनुष्य की शब्दध्वनि कर्णशष्कुली में प्रविष्ट होती है, इस शब्दश्रवरण मात्र से धैर्य्यं का उद्गम हो जाता है, यही वाग्ज्योति का निदर्शन है । यदि वाग्ज्योति का प्रत्यन्ताभाव रहता है, तो उस दशा में सूर्य्य चन्द्रादि से प्रगत संस्कारात्मिका श्रात्मज्योति ही जीवनसत्ता का कारण बनती है । इसी आत्मज्योति के प्रभाव से यह अरण्यपथिक " मुझे क्या डर है, मेरा कौन क्या बिगाड़ सकता है, यदि कोई आततायी आ भी जायगा, तो यह करूँगा, वह करूँगा, वहाँ छिप जाऊँगा " इस प्रकार अपनी आत्ममहिमा के बल से भय निवारण करता है । यही आत्मज्योति का निदर्शन है । दुर्भाग्य से यदि किसी की आत्मज्योति प्रत्य न्तिकरूप से निर्बल रहती है, तो ज्योंतिर्भाग सर्वथा अवरुद्ध हो जाता है एवं ऐसी दशा में भय की चरम-सीमा पर पहुँचा हुआ आत्मा तत्क्षण उत्क्रान्त हो जाता है । निश्चित है कि, आत्मसत्तात्मिका जीवनसत्ता के लिए अवश्यमेव पाँचों ज्योतियों में से एक न एक ज्योतिर्द्वार का खुला रहना आवश्यक है । तभी तो ' पञ्च ज्योतिरयं पुरुषः ' कहना अन्वर्थ बनता है । उपर्युक्त पञ्च ज्योतिनिरुक्ति के आधार पर यह मान लेने में कोई आपत्ति न होगी कि, हमारा. श्रात्मा प्रत्येक दशा में प्रकाश का अनुगामी है । प्रकाश में ही यह आनन्दानुभव करता है, सुखी होता है, क्योंकि इसका मूलप्रभव चित्भूतज्योतिर्घन सूर्य्य ही है । चित्भूतज्योतिर्युक्त उत्क्रान्त आत्मा ज्यों - ज्यों चित्भूतज्योतिर्धन सूर्य की ओर अग्रसर होता है, त्यों - त्यों इसकी चित्ज्योति अधिकाधिक विकसित होती है । एकमात्र इसी आधार पर सूर्य्य संस्था ( आत्मसुखसाधक होने से ) ' स्वर्गलोक ' ( देवस्वर्ग ) माना गया है । इस सम्बन्ध में यह प्रश्न उपस्थित होता है कि, सूर्य्यपिण्ड का नाम स्वर्ग है? अथवा सौरप्रकाश मण्डल का नाम स्वर्ग है? उत्तर में दूसरे मण्डलात्मक प्रश्न को ही लक्ष्य बनाना पड़ेगा । लोकालोकपर्य्यन्त व्याप्त सौरप्रकाशमण्डल का यह नियतप्रदेश जो पार्थिव सम्वत्सरमण्डल में भुक्त है, ' देवस्वर्ग ' कहलाया है, जिसके अवान्तर ७ विवर्त्त हो जाते हैं । कम्मरमा पार्थिव आत्मा है । अतएव यह कभी पार्थिव सीमा से बाहर नहीं जा सकता । इसका जन्म ( आविर्भाव ) मृत्यु ( तिरोभाव ) गमनागमन इस पार्थिव मण्डल के भीतर - भीर ही व्यवस्थित है । जिस दिन यह इस पार्थिवमण्डल सीमा को छोड़ देगा, उस दिन अपना स्वरूप ही खो बैठेगा, दूसरे शब्दों में अपने सोपाधिक कर्म्मरूप से उन्मुक्त होता हुआ परज्योति में विलीन हो जायगा । जनसाधारण में यह किंवदन्ती प्रचलित है कि - " पृथिवी पर ही स्वर्ग है, पृथिवी पर ही नरक है । " इन सामान्य मनुष्यों की दृष्टि में भूपिण्ड ही पृथिवी है । यदि इस दृष्टि का वैज्ञानिकी महिमा पृथिवी से सम्बन्ध मान लिया जाता [ १७५ ]

पृष्ठ 197

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगति निमित्तानि है, तो उनका कथन यथार्थ बन जाता है । श्रात्मविज्ञानोपनिषदन्तर्गत ' प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् ' में भूपिण्ड, पृथिवी दोनों का विस्तार से विश्लेषण किया जा चुका है । वहाँ स्पष्ट किया गया है कि, भूपिण्ड . के सूर्य्यानुगत ज्योतिर्मय पृष्ठ से संलग्न २१ विंशति - प्रहर्गण से ( जहाँ सूर्य्य प्रतिष्ठित है ) ऊपर तक २२ वें अहर्गण से पूर्व तक आग्नेयी राथन्तरीपृथिवी है, ३३ पर्यन्त प्रापोमयी सागराम्बरा पृथिवी है, ४८ पर्य्यन्त वाङ्मयी जगती पृथिवी है । इसी जगती सम्बन्ध से पार्थिवलोक ' जगत् ' कहलाया है । जगती पृथिवीरूप महापार्थिवमण्डल में ही जगत् प्रतिष्ठित है - ' यत् किञ्च जगत्यां जगत् । " इस महिमापृथिवी में ही स्वर्ग नरकादि लोक प्रतिष्ठित हैं, जिनके नियतभावों का विश्लेषण अनुपद में ही होने वाला है । '२१ - ३३-४८ ' इन तीन स्तोमों के सम्बन्ध से महिमापृथिवी के आग्नेय, आप्य, वाङ्मय भेद से तीन विवर्त हो जाते हैं, ' वाक् आपः - अग्नि ' तीनों की समष्ठि ' शुक्रम् ' है । इसी शुक्रत्रयी के सम्बन्ध से यह महापृथिवी ' शुक्रमा ' कहलाई है । ईशोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रथम खण्डान्तर्गत ' शुक्रनिरुक्ति ' प्रकरण में प्रतिपादित शुत्री का प्रकरण सङ्गति की दृष्टि से यहाँ भी दो शब्दों में दिग्दर्शन कर दिया जाता है । क्योंकि शुक्र के आधार पर ही शुक्रगतिलक्षण श्रात्मगति व्यवस्थित है । विकृतिभाव से सम्बन्ध रखने वाली शुक्रत्रयी ब्रह्माश्वत्थवृक्ष का अन्तिम वह पर्व है, जो कर्म्माश्वत्थ की प्रतिष्ठा बन रहा है । ऊर्ध्वमूल ( हृन्मूल ), अवाक्शाख ( परिधिशाख ) इस ब्रह्माश्वत्थ को विज्ञानभाषा में ' षोडशीपुरुष ' कहा गया है । पश्चकल अव्ययपुरुषलक्षण आत्मयोनिरूप श्रमृतं पञ्चकलअक्षरपुरुषलक्षण प्रकृतियोनिरूप ब्रह्म, पञ्चकल प्रात्मक्षर-लक्षण विकृतियोनिरूप ' शुक्रं ' एवं निष्कल अखण्ड श्रमात्रतुरीय परात्पर, इन १६ कलाओं तथा चार पर्वो की समष्टि ही ' ब्रह्माश्वत्थ ' है, जो सर्वथा नित्य एवं स्थिर है । सम्पूर्ण भौतिक विश्व ( सप्तलोक ) विकारक्षराक्षरात्मक हैं । विकारक्षरकूटरूपा लोकसमष्टि का उपादान कारण ' शुक्र ' रूप प्रात्मक्षर है, निमित्तकारण ' ब्रह्म ' रूप ' अक्षर ' है, आलम्बनकारण ( अधिष्ठान ) ' अमृत ' रूप अव्यय है । इसी ब्रह्माश्वत्थ का दिग्दर्शन कराते हुए भगवान कठ ने कहा है-" ऊर्ध्वमूलो s वाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः । तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म, तदेवामृतमुच्यते ॥ तस्माल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन ॥ एतद्वैतत् " ( कठोपनिषत् २।३।१ ) जब तक कम्मरमा कमश्वत्थानुगत भौतिक विश्व का अनुगामी बना रहता है, तब तक विश्व-मूलभूत शुक्र ( संसारबीज ) से निष्क्रमण सम्भव नहीं हैं । निष्कामकर्मभोगात्मिका बुद्धियोगोपासना ही ही संस्कारात्यन्तिकोच्छेद शुक्रातिवर्त्तन का कारण बनती है । हृदयग्रन्थि का इसी शुक्र से सम्बन्ध है एवं मुक्ति का हृदयगन्थिविमोक से सम्बन्ध है । हृदयग्रन्थिविमोक से व्यान बन्धन उच्छिन्न होता है, व्यान बन्धनोच्छिति से शुक्रनिवृत्तिपूर्वक परावर नामक मुक्ति प्रवर्त्तक ' ब्रह्म ' नामक अक्षरप्राप्ति होती है । इस प्रकार शुक्रनिवर्त्तनरूपा परामुक्ति का एकमात्र उपाय निष्कामोपासना ही बनता है, जैसा निम्नलिखित उपनिषच्छ्रति से प्रमाणित है -[ १७६ ]

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आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 198 का मूल पृष्ठ
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि स वेदैतत् परमं ब्रह्म धाम यत्र विश्वं निहितं भाति शुभ्रम् ॥ उपासते पुरुषं ये कामास्ते शुक्रमेतदतिवर्त्तन्ति धीराः ॥१ ॥

कामान् यः कामते मन्यमानः स कामभिर्जायते यत्र तत्र ॥ पर्याप्त कामस्य कृत्यात्मनस्तु इहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः ॥ २ ॥

( मुण्डकोपनिषत् ३२१,२ ) निष्कर्ष यह निकला कि, श्रपासनिक ब्रह्माश्वत्थवृक्ष का अन्तिम वह पर्व, जो कि स्वक्षरधर्म्म से वैकारिक विश्व का उपादान बन रहा है, ' शुक्र ' नाम से प्रसिद्ध है । विश्वबीजात्मक इस शुक्र का अव्यक्त-गर्भित महत्परमेष्ठी से प्रधान सम्बन्ध माना गया है । पारमेष्ठ्यमनोता ' भृगु - श्रङ्गिरा - श्रत्रि ' नामों से प्रसिद्ध हैं । इनमें स्नेहप्रधान शीतगुणक भृगुतत्त्व ' पशुक ' का प्रवर्त्तक है । तेजःप्रधान उष्णगुणक अङ्गिरा ' अग्निशु ' का प्रवर्त्तक है एवं अनुष्णाशीत - एकविध, अतएव अत्रि नामक मनोता ' वाक् शुक्र का प्रवर्त्तक है । इस प्रकार पारमेष्ठ्य मनोतात्रयी के सम्बन्ध से समानधर्म्मा एक ही शुक्रतत्त्व के ' वाक् - आप- श्रग्नि ' ये तीन विवर्त्त हो जाते हैं । ' अर्द्ध ह वै प्रजापतेरात्मनो मर्त्यमासीदर्द्धममृतम् ' इस सामान्य अनुगम के अनुसार अमृतमृत्यू भयधर्मावच्छिन्न ब्रह्माश्वत्थप्रजापति के अन्तिम पर्वरूप इस शुक्र में भी अमृत - मृत्यु दोनों भावों का समावेश हो रहा है । अमृताशुत्रत्रयी प्राणात्मिका देवसृष्टि का उपादान बनती है एवं मर्त्याशुक्र-त्रयी वागात्मिका भूत सृष्टि का उपादान बनती है । इस प्रकार तीन के ६ शुक्र हो जाते हैं । इसी सम्बन्ध में यह भी स्पष्टीकरण कर लेना चाहिए कि, मर्त्याशुक्रत्रयी से ' पदं ' ( पिण्ड ) का स्वरूप निष्पन्न होता है, एवं अमृताशुत्री से ' पुनः पदं ' ( महिमा ) का स्वरूप वितत होता हैं । पिण्डस्वरूप निर्माण करने वाली मर्त्याशुक्रत्रयी हृदय से प्रारम्भ कर परिणाह पर्य्यन्त ' वाक्-श्रापः - श्रग्निः ' इस क्रम से प्रतिष्ठित है । पिण्डकेन्द्र में वाक्स्तर है, तदुपरि आपःस्तर है, पिण्ड परिणाह अग्निस्तर है एवं महिमावितान करने वाली अमृताशुत्रत्रयी हृदय से आरम्भ कर महिमा परिधिपर्यन्त ' श्रग्निः - श्रापः - वाक् ' इस क्रम से प्रतिष्ठित हैं । पिण्डकेन्द्र से प्रारम्भ कर महिमालक्षण वषट्कारमण्डल के २१ वें अहरणपर्य्यन्त अग्निस्तर है, पिण्डकेन्द्र से प्रारम्भ कर ३३ वें ग्रहणपर्य्यन्त आपस्तर है, पिण्डकेन्द्र से प्रारम्भ कर ४८ वें ग्रहणपर्य्यन्त वाक्स्तर है । प्रत्येक वस्तु में ' पिण्ड - महिमा ' भेद से दो - दो संस्थाएँ उपभुक्त हैं । पिण्डसंस्था सर्वत्र ' भू: ' कहलाई है, महिमासंस्था सर्वत्र ' मही ' कहलाई है एवं भूः, तथा महिमा -रूप पद - पुनः पद भेद से प्रत्येक वस्तुरिण्ड षट्शुक्रात्मक है । भू, मही दोनों संस्था संस्थाओं का प्रवार-पारीण स्तर वाङ्मय है, मध्यस्तर अग्निमय है, सान्ध्यस्तर प्रापोमय है । चूंकि उपक्रमोपसंहारलक्षण भूकेन्द्र तथा महीपरिधि में वाक्स्तर का साम्राज्य है, इसके अतिरिक्त भूकेन्द्र से ४८ वें तक अमृतावाक् का वितान हैं, शेष शुक्रस्तर इसी वाग्धरातल पर प्रतिष्ठित हैं, इसी आधार पर - ' वाचीमा विश्वा भुवनान्यापिता'-' यो वागेवेदं सर्वम् ' इत्यादि निगम प्रतिष्ठित हैं । [ १७७ ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड आत्मगतिनिमित्तानि त्रिम वाक्शुक्र की मूलप्रतिष्ठा प्राणमय स्वयम्भू ब्रह्मा है । अतएव इस वाक्शुक्र को स्वायम्भुवः शुक्र कहा जायगा । यह प्रकाशात्मक माना गया है । अमृत - मृत्यु भेद से यह शुक्र दो भागों में विभक्त है । वह शुक्लभाव ( श्वेतवर्ण ) जिसे आप देख सकते हैं, छू सकते हैं, मर्त्यवाक्शुक्र है । जिसे छूना तो दूर रहा, जिसका चर्मचक्षुत्रों से प्रत्यक्ष भी नहीं किया जा सकता, वह अमृतवाक्शुक्र है । भार्गव आपः शुक्र की मूलप्रतिष्ठा आपोमय परमेष्ठी विष्णु है । अतएव इस आपः शुक्र को पारमेष्ठ्यशुक्र माना जायगा । पोमय परमेष्ठी में भूतज्योति का प्रभाव है, अतएव आपः शुक्र का प्रातिस्विकरूप ' कृष्ण ' है । इसके भी अमृत - मृत्यु भेद से दो विवर्त्त हैं । वह कृष्णभाव ( कृष्णवर्ण, काला रंग ), जिसे आप छूते तथा देखते हैं, निरुक्त कृष्णतत्त्व है, जिसके गर्भ में मूच्छितावस्थापन सातों वर्ण भुक्त हैं । यह निरुक्त कृष्णतत्त्व मर्त्य आपः शुक्र है । जिस कृष्णतत्त्व को आप छू नहीं सकते, ग्रहण नहीं कर सकते, देख भर सकते हैं, वह निरुक्त कृष्ण है । रात्रिगत कृष्णतत्त्व, नेत्रपटलावरोध पर दिखलाई देने वाली कालिमा आदि अनिरुक्त कृष्ण के निदर्शन हैं । यह अनिरुक्त कृष्ण अमृत प्रापः शुक्रात्मक है । श्रङ्गिरस अग्निः शुक्र की मूलप्रतिष्ठा वाङ्मय सूर्य इन्द्र है । अतएव इस अग्निः शुक्र को सौरशुक्र कहा जा सकता है । यह भी नाप्राप्त अमृत - मर्त्य भावों ने विभक्त है, सुप्रसिद्ध सात वर्ण, जिन्हें श्राप छू सकते हैं, देख सकते हैं, मर्त्याग्नेयशुक्रात्मक हैं । सौरमण्डलस्थ रश्मिभुक्त सप्तवर्णसमष्टिरूप श्वेतवर्ण केवल दीखने की वस्तु है एवं इसका प्रमृताग्नेयशुक्र से सम्बन्ध है । इस प्रकार अमृत - मृत्यु भेद से तीनों शुक्र भावद्वय में परिणत होकर प्रत्येक पदार्थ पिण्ड - महिमारूप से भुक्त हैं । प्रकृत में हमें सुप्रसिद्ध उस भूविवर्त्त से सम्बन्ध रखने वाले शुक्रषट् की मीमांसा करनी है, जो आत्मगति का उपक्रम स्थान माना गया है । अन्नादमय भू विवर्त्त अग्निप्रधान है । इस भूविवर्त्त के पिण्ड, महिमा दो विवर्त्त हैं । पिण्डपृथिवी ' भू: ' है, जिस पर प्रस्मदादि भूतप्रजा प्रतिष्ठित है । महिमापृथिवी ' पृथिवी ' है, जिसमें लोक- वेद - वाक्-साहस्री के आधार पर श्राग्नेय - सौम्य - छन्दोमा देवता प्रतिष्ठित हैं । भूपिण्ड के केन्द्र में मर्त्यवाक्शुक्र प्रतिष्ठित है, यही पहला स्वर्लोक है । दूसरा स्तर मर्त्य प्रापः शुक्र का है, यही दूसरा भुवर्लोक है । भूपृष्ठा-त्मक स्तर मर्त्य अग्निशुक्रात्मक है, यही तीसरा भूलोक है । इस प्रकार चित्याग्निप्रधान केवल इसी भूपिण्ड में केन्द्रावच्छिन्ना वाक्, मध्यस्थ प्रापः, पृष्ठात्मक अग्निः शुक्र भेद से स्वः- भुवः - भूः तोनों लोक भुक्त हो रहे हैं । जिसे हम भूलोक कहते हैं, वह स्वः - भुवः - भूलोकात्मक है । तीनों में भूलोकात्मक अग्निपृष्ठ ही का विषय बनता है । इसी आधार पर ' यच्च किञ्चित् - दाष्टिविषयकमग्निकम्मैवतत् ' ( या ० ति ० ) यह सिद्धान्त प्रतिष्ठित है । वाक्स्तर स्वायम्भुवमर्त्यवाङ्मय है, आपः स्तर पारमेष्ठ्य मर्त्यप्रापोमय है, अग्निस्तर सौर मर्त्यश्राग्नेय है । यह मर्त्य अग्निस्तर यद्यपि सप्तवर्णात्मक ( निरुक्तसप्तवर्णात्मक ) माना गया है, तथापि वर्णंग्राहक मृद्भाग के जातिवैशिष्ट्य से यत्र तत्र भूभागों में नियतवर्ण रह जाता है, शेष ६ वर्ण स्वप्रभव सूर्य्य में विलीन हो जाते हैं । प्रयोग के लिए किसी भी पार्थिव पिण्ड को सामने रख लीजिए । अवश्य ही इसके दृश्यपृष्ठ पर सातों वर्णों में से कोई न कोई एक वर्ण प्रतिष्ठित मिलेगा । यही अग्निस्तर माना जायगा । यह सौर [ १७८ ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्डं श्रात्मगतिनिमित्तानि अग्निस्तर पार्थिव मर्त्य भूतभाग से मूच्छित है । अन्य उबुद्ध ( प्रज्वलित ) अग्नि सम्बन्ध से आप इस सुप्त अग्नि को भी उद्बुद्ध कर दीजिए जिस उद्बोधन को सहज भाषा में ' वस्तु को अग्नि से जला देना ' कहा जाता है । उद्बुद्ध अग्नि तन्द्रा छोड़ कर तत्काल स्वप्रभव सौर अग्निशुक्र में विलीन हो जायगा । इसी अग्निस्तत्क्रान्ति को लक्ष्य में रख कर ऋषि ने कहा है-" शेषे वनेषु मात्रोः सन्त्वा मर्त्तास इन्धते । तन्द्रो हव्यं वहसि हविष्कृदादिद्देवेषुराजसि । ” ( यजु ० ) । अग्निः शुक्र के उत्क्रान्त होते ही न्यायसिद्ध क्रमसिद्ध तदन्तर्गभित प्रापः शुक्र प्रकट हो जायगा । यह स्तर सर्वथा निरुक्त कृष्णवर्णात्मक होगा । वस्तुमात्र दग्धानन्तर इसी स्तर से प्रकट होती है । कृष्णत्त्व ही आपः शुक्र है । और अग्नि प्रयोग कीजिए, कृष्णवर्णात्मक प्रापःस्तर भी उत्क्रान्त होकर यह स्वप्रभव पारमेष्ठ्य मर्त्य कृष्ण आपः शुक्र में विलीन हो जायगा, तीसरा निरुक्त स्वायम्भुववागुरूप शुक्ल-स्तर निकल आएगा । यही स्तर ' भूति ' - ' भस्म ' आदि नामों से व्यवहृत हुआ है, जिसका — ' भस्मान्तं शरीरम् ' ( ई ० उ ० १७ ) रूप से अभिनय हुआ है । इस प्रकार प्रत्येक पार्थिव चित्यपिण्ड में अग्निसम्बन्ध द्वारा आप तीनों मर्त्यशुक्रों का साक्षात्कार कर सकते हैं । यही भूपिण्डावच्छिन्ना मर्त्यशुक्रत्रयी का संक्षिप्त निदर्शन है । मर्त्यशुक्रत्रयीलक्षणचित्य भूपिण्ड के केन्द्र से वितायमान अष्टाचत्वारिंश अहर्गणात्मक महिमामण्डल में क्रमशः अग्नि - प्रापः- वाक् नाम के तीन अमृतस्तर व्याप्त हैं । तीनों ही यद्यपि हृदय से २ ९ - ३३-४८ पर्य्यन्त व्याप्त हैं, तथापि गौणप्रधानन्याय से २१ पर्य्यन्त अग्निस्तर माना जाता है, २२ से ३३ पर्य्यन्तप्रापःस्तर एवं ३४ से ४८ पर्य्यन्त वाक्स्तर माना जाता है । यही स्थिति उक्त मर्त्याशुत्रयी के सम्बन्ध में समझनी चाहिए । यद्यपि भूपृष्ठ से हृदयपर्य्यन्त स्वर्लोकात्मक मर्त्यवाक्स्तर व्याप्त है, भूमध्यस्थानपर्य्यन्त आपःस्तर व्याप्त है, भूपृष्ठ स्वयं अग्निस्तरात्मक है, तथापि गौणप्रधान न्याय ने भूपृष्ठ अग्निप्रधान, मर्त्य. पृष्ठ अप्प्रधान एवं केन्द्रपृष्ठ वाक्प्रधान मान लिया जाता है । दोनों ही संस्थानों में वाक्स्तर श्रवारपारीण मध्य-है, अतएव भूपिण्ड को स्वगर्भ में रखने वाला महिमामण्डल वाक् के षट्काररूप ६ प्रयुग्मस्तोमों से वषट्कार कहलाया है । जिस प्रकार भूपिण्डभुक्त तीनों प्रदेशः भूः भुवः स्वः नाम से व्यवहृत के सम्बन्ध हुए एवमेव भूमहिमाभुक्त ये तीनों ( २१ - ३३ - ४८ ) स्तरप्रदेश कमशः पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौः हैं, हुए हैं । अग्नितत्त्व की पिण्ड में, प्रप्तत्त्व की ऋतस्थान में, वाक्तत्त्व की सत्यस्थान में नामों से व्यवहृत परिभाषा के अनुसार पिण्ड पृथिवीलोक है, ऋत अन्तरिक्षलोक है, सत्य द्युलोक है प्रधानता रहती है । पर अग्नि- अप् - वाङ्मय २१ - ३३ - ४८ अहर्गणात्मक प्रदेश पृथिवी - अन्तरिक्ष - द्यौः कहलाए । एकमात्र इसी आधार शुक्रभेद से महिमालक्षण महीपृथिवी में तीन लोकों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । इस सम्बन्ध हैं । इस प्रकार भूलना चाहिए कि इन तीनों लोकों का सम्बन्ध पार्थिवमहिमामण्डल सूर्यानुगत अर्द्ध अदितिमण्डल में यह नहीं है । सूर्य्यानुगत ज्योतिर्मय पार्थिव अर्द्धमण्डल अदिति है, यही देवत्रैलोक्य है । सूर्य्यविरुद्ध से ही पार्थिव अर्द्धमण्डल दिति है, यही असुरत्रैलोक्य है । केन्द्रस्थ प्रजापति के पुत्र, अतएव दिगनुगत तमोमय ' प्राजापत्य ' नाम से [ १७ ९ ]