Part IV Atmgativigyanopanishta Part 4 — पृष्ठ 201–210
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४ · पृष्ठ 201–210
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि प्रसिद्ध देवता और असुर इस प्रकार अर्द्ध- अर्द्ध सम्पति के भोक्ता बने हुए हैं । निम्नलिखित परिलेखों से पिण्ड - महिमात्मक उक्त भूविवर्त्त का भलीभाँति स्पष्टीकरण हो जाता है-- + १ - वाक् ( अमृतशुक्र स्वायम्भुवं आत्रेयम् ) ( ४८ पृष्ठम् ) → at: २ – प्रापः ( अमृतशुक्र पारमेष्ठ्यं - भार्गवम् ) ( ३३ पृष्ठम् ) अन्तरिक्षम् - + ३ – अग्निः ( अमृतशुकं सौरं - प्राङ्गिरसम् ) ( २१ पृष्ठम् ) - * - ३ - अग्निः ( मर्त्यशुक्रं सौरं - प्राङ्गिरसम् ( दृश्यपृष्ठम् ) -→ पृथिवी ------ I: + २ - श्रापः ( मर्त्यशुक्रं पारमेष्ठयं भार्गवम् ) ( मध्यपृष्ठम् ). + १ - वाक् ( मर्त्यशुक्रं स्वायम्भुव - आत्रेयम् ) ( भूकेन्द्र: ) -भुवः स्वः : भूपिण्ड ) पदम् ( ) पदम् महिमापृथिवी पुनः ( ” भूविवर्त्तम् -षट्शुक्रात्मकं “ वस्तुसीमा ( अवसानभूमि ) अवसानधर्म्म से ' साम ' कहलाई है । बहिर्वेद ( महावेदि ) लक्षणा महिमामण्डलात्मक ' ही ' नाम की महापृथिवी में ' अग्निः प्रापः - वाक् ' स्तरभेद से तीन सीमा हो जाती हैं । ये तीनों पृष्ठसीमाएँ ही क्रमशः " रथन्तर, वैरूप, शाक्वर " ( साम ) नाम से व्यवहृत हुई । २१ पर्य्यन्त आग्नेय रथन्तर साम है, ३३ पर्य्यन्त प्राप्य वैरूप साम एवं ४८ पर्य्यन्त वाङ्मय शाक्वर साम है । दूसरे शब्दों में अग्निशुक्रसीमा रथन्तर है, श्रापः शुक्रसीमा वैरूप है एवं वाक्शुक्रसीमा शाक्वर है । पाठकों को स्मरण होगा, हमने पूर्व में ' प्रतिवाहिक ' निमित्त का विश्लेषण करते हुए एकविंशत्यवच्छिन्न केवल अग्निपृष्ठ - १५ - २१ भेद से रथन्तर - वैरूप- शाक्वर सामों की भुक्ति बतलाई थी ( देखिए पृष्ठ १२६ ) । अब यहाँ २१-३३-४८ को रथन्तरादि से युक्त बतलाया जा रहा है । इसमें विरोधावसर इसलिए नहीं है कि, अनुपद में ही स्पष्ट होने वाले त्रिवृत्त सिद्धान्त के अनुसार २१ - ३३ - ४८ अहर्गणात्मक पृथिवी -अन्तरिक्ष- द्यौ इन तीनों में प्रत्येक में पृ ० अ ० द्यौः इन तीन - तीन लोकों का उपभोग हो रहा है । फलतः तीनों में तीनों साम पृष्ठों का उपभोग सिद्ध हो जाता है इसी आधार पर वहाँ २१ मण्डल में भुक्त ६-१५-२१ स्तोमभेद से रथन्तर - वैरूप- शाक्वर का भोग बतलाया गया है । उक्त विवेचन से यह भलीभाँति सिद्ध हो जाता है कि, स्वः भुवः - भूरात्मक चित्यभूपिण्ड मर्त्य-शुक्रात्मक है एवं पृ ०० द्यौरात्मक चितेनिधेय भूमण्डल अमृतशुक्रात्मक है । भूपिण्ड भूविवर्त्तका परिमित रूप है, भूमण्डल भूविवर्त्त का अपरिमित ( भूमा ) रूप है । परिमिता भूः ' अन्तर्वेदि ' है, अपरिमिता पृथिवी ' बहिर्वेदि ' है । इस अपरिमिता पृथिवी में २१ - ३३ - ४८ भेद पृ ०० द्यौः तीनों लोक प्रतिष्ठित हैं, जो कि तीनों लोक नवलोकात्मक माने गए हैं । भूविवर्त्त के इन्हीं दोनों स्वरूपों को लक्ष्य बनाकर श्रुति ने कहा है--[ १८० ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड → अदितिः दितिर आत्मगतिनिमित्तानि शुक्रषटात्मक भूविवर्त परिलेख: -घु अन्तरिक्षम अदिति र पृथिवी ४८ शुक्रम् -बाकू अमृत + भुवः भूपिण्ड : मदम् ) भूमहिमा ( पुनःपदम् ) महिमामण्डल ( अमृताशुकवी ) में क्रमश: अग्नि ग्रापः- वाक् भेदात्मक श्रमृतस्तर यह हृदय पर्यन्त व्याप्त हैं । ( मर्त्याशुकायी से पदं ( पिण्ड ) तथा तीनों से क्रमशः २१-३३४८ व्याप्त हैं । शुक्री से पुनः पदं ( महिमा ) का स्वरूप वितत होता है । ) यही स्थिति मर्त्याशुत्रयी के सम्बन्ध अमृता- में भी है | अतएव भूपिण्ड को स्वर्गर्भ में रखने वाला महिमा मण्डल दाक् के पट्काररूप सम्बन्ध से ' षष्टकार ' कहलाया है । जिस प्रकार भूपिण्ड मुक्त तीनों प्रदेश भूः भुवः प्रयुग्म सोमों के होते हैं उसी प्रकार भूमहिमाभुक्त ये तीनों ( २१-३३-४८ ) स्तर प्रदेश क्रमशः पृथिवी स्वः , अन्तरिक्ष नाम से व्यवहृत से व्यवहृत हुए हैं । इन तीनों लोकों का सम्बन्ध ज्योतिम्य श्रद्धे यदिति अर्थात् देवत्रैलोक्य तथा, द्यौ तमोमय नाम प्रर्द्धमण्डल दिति अर्थात् सुरत्रैलोक्य से होता है । श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय जयपुर ।
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि १ - " तस्या एतत् परिमितं रूपं यत् - ' अन्तर्वेदिः । अथैषभूमाऽपरिमितो, यो ' बहिर्वेदि । ' ( ऐ ० ब्रा ० ८।५ ) । २ - " पृथिव्यामि मे लोकाः ( प्रतिष्ठिताः ) " ( जै ० उ ० ब्रा ० १।१०।२ ) । परिभाषाविलुप्ति के कारण आज यद्यपि धरा, पृथिवी, सागराम्बरा, काश्यपी, अदिति आदि शब्दों का परस्पर पर्य्याय सम्बन्ध माना जा रहा है । परन्तु वस्तुतः ये सब शब्द भिन्न - भिन्न वस्तुतत्त्व के ही वाचक । ४८ स्तोमावच्छिन्ना पृथिवी ' मही ' है, यही विश्वम्भरा है । ३३ स्तोमावच्छिन्ना पृथिवी ' सागराम्बरा ' है । २१ स्तोमावच्छिन्ना पृथिवी काश्यपी है । भूपिण्ड ' धरा ' है । अस्तु प्रकृत में प्रसङ्गोपात्त उस त्रिवृद्भाव की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है, जिसके सम्बन्ध से महापृथिवी के २१-३३-४८ स्तोमा-त्मक पृ ०० द्यौः ये तीनों लोक ( प्रत्येक लोक ) त्रिवृत्त सम्पत्ति से युक्त होते हुए ६ ( नवाक्षरा ) बृहतीसम्पत् से युक्त हो जाते हैं । ' त्रयो वा इमे त्रिवृतालोका: इस निगम का यही तात्पर्य है कि, मनः - प्रारण वाक् के त्रिवृद्भाव से सम्बन्ध अग्निः - श्रापः - वाक् लक्षण शुक्रत्रयी भी त्रिवृद्भाव में परिणत हो रही हैं । ये तीनों शुक्र पञ्चीकृत, अतएव पञ्चात्मक महाभूतों की तरह त्रिवृद्भाव से त्रिवृत् बन रहे हैं । वाक् आपः - गर्भित श्रग्निः शुक्र अग्नि है, अग्नि - वाक् - गर्भित प्रापः शुक्र आप: है एवं अग्निः - आपः गर्भित वाक्शुक्र वाक् है । शाक्वरपृष्ठात्मक वाक्शुक्र सर्वत्र सत्यात्मिक द्यौः है, वैराजपृष्ठात्मक आपः शुक्र सर्वत्र ऋतात्मक अन्तरिक्ष है एवं रथन्तरपृष्ठात्मक अग्निशुक्र सर्वत्र पिण्डात्मिका पृथिवी है । २१ स्तोमावच्छिन्ना रथन्तरपृष्ठात्मिका अप् - वाक् शुक्रगर्भिता श्रग्निशुक्रप्रधाना पृथिवी की पृथिवी में 8 पर्य्यन्त अग्निशुक्र है, यही पृथिवी में पृथिवी है, यही रथन्तरसामभुक्त है । १५ पर्य्यन्त प्रापः शुक्रः है, यही पृथिवी में अन्तरिक्ष है, यही वैरूपसामभुक्त है । २१ पर्य्यन्त वाक्शुक्र है, यही पृथिवी में द्यौः है, यही शाक्वरसामभुक्त है । यही पृथिवीरूप पहला आग्नेयशुक्र त्रैलोक्य है, यही कश्यपत्रिलोकी है । ३३ सोमावच्छिन्न वैरूपसामपृष्ठात्मक वागाग्निशुक्रगर्भित शुक्रप्रधान पृथिवी के अन्तरिक्ष में पृथिवी है, यही रथन्तरसामभुक्त है । २२ पर्य्यन्त आपः शुक्र है, यही अन्तरिक्ष में अन्तरिक्ष है, यही वैरूपसामभुक्त है । ३३ पर्य्यन्त वाक्शुक्र है, यही अन्तरिक्ष में द्यौ: है, यही शाक्वरसामभुक्त है । यही अन्तरिक्षरूप दूसरा आपोमय शुक्र त्रैलोक्य है, यही वैरूप त्रैलोक्य है, यही सागरा-म्बरात्रिलोकी है । ४८ स्तोमावच्छिन्न शाक्वर पृष्ठात्मक अग्न्यप शुक्रगर्भित वाक्शुक्रप्रधान पृथिवी के द्युलोक में आरम्भ से २४ पर्य्यन्त अग्निः शुक्र है, यही युद्धोक में पृथिवी है, यही रथन्तर सामभुक्त है । ४४ पर्य्यन्त आपः शुक्र है, यही द्युलोक में अन्तरिक्ष है, यही वैरूपसामभुक्त है । ४८ पर्यंन्त वाक्शुक्र है, यही द्युलोक में द्यौ: है, यहीं शाक्वरसामभुक्त है । यही द्यौः रूप तीसरा वाङ्मयशुक्रत्रैलोक्य है, यही शाक्वर त्रैलोक्य है, यही विश्वम्भरात्रिलोकी है । रथन्तरत्रिलोकी के तीनों लोक अग्निप्रधान हैं, वैरूपत्रिलोकी के तीनों लोक अपप्रधान हैं एवं शाक्वरत्रिलोकी के तीनों लोक वाक्प्रधान है । इस पार्थिवत्रैलोक्यत्रिलोकी संस्था में ३ पृथिवी लोक, ३ अन्तरिक्ष लोक एवं ३ द्युलोक हो जाते हैं । संकेत विद्या से पृथिवी माता है, द्यौ पिता है, जैसा कि ' द्यौष्पितः पृथिवीमातरध्रगग्ने ० ' इत्यादि मन्त्र वर्णन से प्रमाणित है । महिमा पृथिवी की त्रिवृता अमृतशुत्री से सम्बन्ध रखने वाली इसी त्रैलोक्यत्रिलोकी का स्पष्टीकरण करते हुए वेद भगवान कहते हैं-[ १५१ ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड श्रात्मगतिनिमित्तानि
तिलोमातृस्त्रीन् पितृन् बिभ्रदेक ऊर्ध्वस्तस्थौ नेमव ग्लापयन्ति ।
मन्त्रयन्ते दिवो अमुष्य पृष्ठे विश्वमिदं वाचमविश्वमिन्वाम् ॥
( ऋक् सं ० १।१६४।१० ) । पूर्व की प्रातिवाहिक निमित्तनिरुक्ति ( पृष्ठ सं ० १३४ ) भी उक्त अनुगम मन्त्रं उद्धृत हुआ है । वहाँ पञ्चपुण्डीस प्राजापत्य बल्शा से सम्बन्ध रखने वाले स्वयम्भूरादि पृथिव्यन्त व्याप्ता संयती - क्रन्दसी-रोदसी इन त्रिलोकियों की समष्टिरूप त्रैलोक्यत्रिलोकी के सप्तलोकात्मक नवलोकों के अभिप्राय से उक्त अनुगममन्त्र का समन्वय हुआ है । उन ६ लोकों में रोदसी की द्यौः क्रन्दसी की भूः है, क्रन्दसी की द्यौः • संयंती की भूः है । इस प्रकार के ७ ही लोक रह जाते हैं । प्रकृत में वही मन्त्र अपने अनुगम भाव से केवल भूविवर्त्त से सम्बन्ध रखने वाले ६ शुक्रलोकों के समर्थन में प्रयुक्त हुआ है । ये 8 शुक्रलोक वास्तव में & ही लोक हैं । यहाँ उनकी तरह द्युलोक का भूलोकत्वेन अन्तर्भाव नहीं है, जैसा कि परिलेखों से स्पष्ट . हो जायगा । वहाँ ऊर्ध्व स्तस्थौने मवग्लापयन्ति ' से सत्यस्वयम्भू का ग्रहण था, यहाँ भूकेन्द्रस्थ प्रजापति का ग्रहण है । केन्द्रस्थान भी सामपरिधि की अपेक्षा ऊर्ध्व कहलाया है, अतएव यहाँ ऊर्ध्व से भूकेन्द्र का ग्रहण हुआ है । निम्नलिखित मन्त्र ब्राह्मण श्रुतियाँ भी इस शुक्रात्मिका त्रैलोक्यत्रिलोकी का समर्थन कर रही है ।
- तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीरुत द्यून् त्रीणि व्रता विदथे प्रन्तरेषाम् ।
ऋतेनादित्या महिवो महित्वं तदर्य्यमन् वरुण मित्र चारु ॥
२ - - तिस्रो द्यावो निहिता अन्तरस्मिन् तिस्रो भूमीरुपराः षड्विधानाः ।
गृत्सो राजा वरुणश्च एतं दिवि प्रेङ्ख हिरण्मयं शुभेकम् ॥
३- - तिस्रो दिवस्तिस्त्रः पृथिवी स्त्रीण्यन्तरिक्षाणि चतुरः समुद्रान् ।
त्रिवृतं स्तोमं त्रिवृत आप हस्त्वारक्षन्तु त्रिवृता त्रिवृद्धि ॥
४ - - त्रीन्नाकांस्त्रीन् समुद्रांस्त्रीन् ब्रध्नांस्त्रीन् विष्टपान् ।
त्रीन् मातरिश्वनस्त्रीन् सूर्य्यान् गोप्तृन् कल्पयामि ॥
-- त्रिस्रो द्यावः सवितुर्द्वा उपस्थां एका यमस्य भुवने विराषाट् ।
आरिंग न रथ्यममृताधि तस्थुरिह ब्रवीतु य उ तच्चिकेत ॥
६ -- " तिस्रो वा इमाः पृथिव्यः - इयम हैका, अस्याः परे । " ( शत ० ५।१।५।२१ ) । षट्शुक्रविधानाः । [ १८२ ]
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- श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड : पार्थिवत्रैलोक्य त्रिलोकी परिलेख: -- * शाक्वरत्रैलोक्य विश्वम्भरः वैरुपत्रैलोक्य सागराम्बरा : रथन्तरत्रैलोक्यः 11 - * शुक्रमको [ १८३ ] आत्मगतिनिमित्तानि ) ( द्यौः वाक् ) ( अन्तरिक्षम् : आप ) ( पृथिवी अग्निः पृथि मा हि + म पूर्व की प्रकाशनिमित्तनिरुक्ति में ( पृ ० १५५ ) में भी ' तित्रोद्यावः सवितुर्द्वा उपस्थां ० ' इत्यादि मन्त्रउद्धृत हुआ है । वहाँ आकाश दृष्टि से तीन द्युलोकों का स्पष्टीकरण हुआ है । बतलाया गया है कि, ब्रह्मपथानुगत द्युलोक, देवपथानुगत द्युलोक, पितृपथानुगत द्युलोक भेद से तीन द्युलोक हैं । वाक्शुक्रत्रिलोकी का द्युलोक ब्रह्मपथ से सम्बद्ध है, आपः शुक्रत्रिलोकी का द्युलोक देवपथ से सम्बद्ध है एवं तीसरा पितृपथा-नुमत द्युलोक अग्निः शुक्रत्रिलोकी से सम्बन्ध रखता है । २१ पर सूर्य्य है । सूर्य्य से इस ओर का ( पृथिव्य -नुगत ) त्रैलोक्य याम्यं अग्नि सम्बन्ध से यम त्रैलोक्य है । २१ विशस्थ सूर्य से ऊपर के ३३-४८ सम्बद्ध श्रापः - वाक्- रूप दो द्युलोक वास्तव में श्रादित्योपस्थ में प्रतिष्ठित हैं । याम्यत्रिलोकी का द्युलोक यमभुवन से सम्बन्ध रखता है । ४८ स्तोमावच्छिन्नं वाङ्मयं वाक्शुक्रम् ( शाक्वरसाम ) द्यौः ( ३ ) ४४ स्तोमावच्छिन्नं वाङ्मयं प्रशुक्रम् ( वैरूपसाम ) + अन्तरिक्षम् ( २ ) २४ स्तोमावच्छिन्नं वाङ्मयं श्रग्निः शुक्रम् ( रथन्तरसाम ) - पृथिवी ( १ ) - * ३३ स्तोमावच्छिन्नं प्रापोमयं वाक्शुक्रम् ( शाक्वरसाम ) द्यौ: ( ३ ) २२ स्तोमावच्छिन्नं प्रापोमयं अपशुक्रम् ( वैरूपसाम ) + अन्तरिक्षम् ( २ ) ११ स्तोमावच्छिन्नं प्रापोमयं श्रग्निः शुक्रम् ( रथन्तरसाम ) - पृथिवी ( १ ), - * २१ स्तोमावच्छिन्नं अग्निमयं वाक्शुक्रम् ( शाक्वरसाम ) द्यौः ( ३ ) १५ स्तोमावच्छिन्नं श्रग्निमयं अपशुक्रम् ( वैरूपसाम ) + अन्तरिक्षम् ( २ ) & स्तोमावच्छिन्नं अग्निमयं श्रग्निः शुक्रम् ( रथन्तरसाम ) पृथिवी ( १ )
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि अग्निः आपः, वाक् - शुक्रत्रयी की दृष्टि से पार्थिवत्रैलोक्यत्रिलोकी का समन्वय किया गया । अब एक भिन्न दृष्टि से इन तीनों शुक्रों का समन्वय किया जाता है । बतलाया गया है कि, भूपिण्ड के केन्द्र में प्रतिष्ठित प्रजापति के ऊर्ध्व श्रर्द्धमण्डल प्राजापत्य देवदेवताओं का साम्राज्य है एवं अधोऽवस्थित अर्द्ध-मण्डल में प्राजापत्य असुरदेवताओं का साम्राज्य है । ( देखिए पृ ० सं ० १८० ) । हृदयस्थ यह प्रजापति. ' अन्तर्यामी ' नाम से प्रसिद्ध है । परात्पराधिष्ठित पञ्चकल श्रव्ययपुरुषानुगृहित पञ्चकल अक्षरपुरुष ही अन्तर्यामी है । भौतिक, भूपिण्ड, प्राणमयभूमण्डल दोनों पक्षरानुगृहीत प्रश्ञ्चलक्षरात्मक । इस क्षरात्मक उभयविध भूविवर्त्त की प्रतिष्ठा हृद्य अक्षर प्रजापति है, जिसके ' ब्रह्म, विष्णु, इन्द्र, सोम, श्रग्नि ' ये पाँच विकास माने गए हैं । इन पाँचों में ' ब्रह्मा - विष्णु- इन्द्र ' इन तीन अक्षरों की समष्टि ' हृदयम् ' लक्षण अन्तर्यामी है, सोमाग्नि की समष्टि ' पृष्ठम् ' लक्षण ' सूत्रात्मा ' है । ब्रह्माक्षर प्रारणक्षर से, विष्ण्वक्षर आप: -क्षर से, इन्द्राक्षर वाक्क्षर से अनुगृहीत है । अग्न्यक्षर अन्नादक्षर से, सोमाक्षर अन्नक्षर से अनुगृहीत है । चित्यभूपिण्ड अन्न अन्नादक्षरानुगृहीत सोमाग्न्यक्षरमय, भूपिण्डावच्छिन्ना स्वः भुवः - भूरात्मिका चित्यत्रिलोकी वाक् - श्रापः - प्राणक्षरानुगृहीत इन्द्र - विष्णु - ब्रह्माक्षरमयी । प्राणमय ब्रह्माक्षर के साथ अमृत वाक्शुक्र का, श्रापोमय विष्ण्वक्षर के साथ अमृत प्रापः शुक्र का, वाङ्मय इन्द्र के साथ अमृत अग्निः शुक्र का सम्बन्ध है । अग्नि- सोमाक्षरानुगत अन्नादान्नलक्षण चित्यमर्त्यभूपिण्ड तीसरे अग्निः शुक्र में ही अन्तर्भूर्त है । अतएव ' इन्द्र - प्रग्नि - सोम ' तीनों की समष्टि त्रिनेत्र शिव नाम से व्यवहृत हुई है, जैसा कि ' श्रात्मविज्ञानोपनिषत् ' ' में विस्तार से बतलाया जा चुका है । प्रकृत में कहना यही है कि, चित्यभूपिण्ड में पञ्चक्षरानुगृहीत पञ्चा क्षरविवर्त्ती का अन्तर्यामी - सूत्रात्मारूप से उपयोग हो रहा है । जैसा कि कहा गया है, अन्नादान्नमय भूपिण्ड का अग्निः शुक्र में अन्तर्भाव है । इस सम्बन्ध में यह स्पष्टीकरण आवश्यक होगा कि, मध्यस्थ इन्द्राक्षर का अन्तय्यामी से भी सम्बन्ध है एवं सूत्रात्मा से भी सम्बन्ध है । फलतः ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र तीनों की समष्टि अन्तर्यामी रूप से, इन्द्र, सोम, अग्नि तीनों की समष्टि सूत्रात्मरूप से समन्वित हो जाती है । प्राणमयब्रह्मा वाक्शुक्रमय है, आपोमय विष्णु प्रापः शुक्रमय है, वाङ्मय इन्द्र अग्निः शुक्रमय है, यही अमृतशुक्रत्रयी का उपभोग है । भूपिण्ड में केन्द्रात्मक स्वःस्थान, मध्यात्मक भुवःस्थान, पृष्ठात्मक भूःस्थान इन तीन ( हृत - मध्य – ऊर्ध्व ) पृष्ठों के साथ क्रमशः वाक् प्रपः - अग्नि नामक तीन मर्त्यशुक्रों का सम्बन्ध बतलाया गया था । तीनों पृष्ठों में हृदयात्मक स्वः-पृष्ठ में त्रिमूर्ति अन्तर्यामी प्रतिष्ठित है । इस त्रिमूर्ति अन्तर्य्यामी के प्राणमयब्रह्मभाग से अमृतवाक्शुक्र का, आपोमय विष्णुभाग से अमृत पशुक्र का एवं वाङ्मय इन्द्रभाग से अमृत अग्निः शुक्र का सम्बन्ध है । इस प्रकार हृदयावच्छेदेन, किंवा हृदयावच्छिन्न अन्तर्याम्यवच्छेदेन स्वः स्थानोपलक्षित हृदय में अमृताशुक्र-यी का भोग सिद्ध हो जाता है । दूसरी निरूपिता मर्त्यशुक्रत्रयी इन्द्र - सोम - अग्निलक्षण सूत्रात्मा से सम्बन्ध है । स्वः स्थानानुगत इन्द्र का मर्त्यवाक्शुक्र से, भुवःस्थानानुगत सोम का मर्त्य प्रापः शुक्र से, एवं भूः स्थानानुगत अग्नि का मर्त्य अग्निः शुक्र से सम्बन्ध है । इस प्रकार पृष्ठावच्छेदेन, किंवा पृष्ठावच्छिन्न जाता है । सूत्रात्मावच्छेदेन स्व: - भुवः - भूः स्थानोपलक्षित पिण्ड में मर्त्याशुत्रत्रयी का उपभोग सिद्ध हो एवंरीत्या अमृताशुत्रयी, मृर्त्याशुक्रत्रयी, सम्भूय शुक्रषट्क अन्तर्य्यामी - सूत्रात्म भेद से केवल चित्यभूपिण्ड । में ही मुक्त हैं । चित्यभूपिण्डानुगता सूत्रात्मभुक्ता मर्त्याशुक्रत्रयी का मर्त्यधर्म से ऊर्ध्वं वितान नहीं होता [ १८४ ]
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श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर । अग्निः O B श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि पार्थिव त्रैलोक्य त्रिलोकी परिलेखः --साम - वैरूपं अपयुक्त अन्तरिक्षम् गर्भित 1. रसाम शाक्क -वाक्शुक्र निगर्भित अब मही ) पृथिवी एतोक ( - त्रैलोक्यत्रिलोकि शाकरसामात्निका रथन्तरवैकप -शुक्रात्निका विवृद्वाक् शुक्र - त्रिवृदम् : शुक्र विवृदाग्नि . महा रपट शुक्रं : अग्निः पृथिवी बागद्गर्भित साम ), साम शाक्वर पृथिवी ' ( सीमा । , शाक्वर स्तोमात्मक हैं रहे , वैरूप वाक्शुक्र हो पर्यन्त - ३३-४८ मुक्त ' रथन्तर ४८ २१ से क्रमशः एवं इसके सम्पत् ही वैरूप है । ) बृहती सीमाएँ सीमा हो रहा पृष्ठ शुक्र नवाक्षरा भांग ( तीनों आपः का ६ । ये हुए है पर्यन्त लोकों होते ३३ जाती है , - तीन भुक्त हो तीन से सीमा रथन्तर इन सम्पत्ति तीन द्यौ: से सीमा भेद त्रिवृत् स्तर अग्निशुक्र - अन्तरिक्ष- लोक ' तीनों वाक् पर्यन्त पृथिवी ये २१ में द्यौः आपः ।, हैं प्रत्येक ' श्रग्निः हुईं में अन्तरिक्ष में व्यवहृत तीनों से । इन महापृथिवी नामहै
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षट्क्रात्मक चित्य भूपिण्ड परिलेख: -स्वम्मेण्डसम् वाउ मय इन्द्र आयोमयः विष्णु: प्राणमय, él but हृदयम ग्रन्तर्य्याम सम्बन्ध से प्राणमय ब्रह्मा, मय वि नाम से तथा सूत्रात्मा सम्बन्ध से इन्द्र - सोम - अग्नि की र वाडमय दरद की समष्टि वाक् ग्रापः- ग्रग्निरूपा प्रमृतशुत्रयी भुवः- भूः रूपा मर्त्याशुत्रयी रूप से प्रतिष्ठित हैं । मध्यस्थ इन्द्र का दोनों से सम्बन्ध होने के कारण षट्शुक्रात्मक चित्यभूपिण्ड में पश्चाक्षर विवर्तों का ही अन्तर्यामी सूत्रात्मासे उपभोग रहा है । श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर ।
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि ww अपितु भूपृष्ठ पर ही इसका अवसान हो जाता है । चित्यभूपिण्डानुगता अन्तर्यामीभुंक्ता अमृताशुक्रत्रयी काही अमृतधर्म से ऊर्ध्व वितान होता है । इसी के ऊर्ध्व वितान से त्रैलोक्य त्रिलोकीलक्षण ' मही ' पृथिवी का स्वरूप निष्पन्न हुआ है, जैसा कि अनुषद में ही स्पष्ट होने वाला है । अमृता शुत्रयी भूपिण्डविवर्त्तानुगतंषट् शुक्रविवर्त्तम् मर्त्याशुक्रत्रयी - * -१ - ब्रह्मा ( प्राणमयः ) यम् - अमृतवाक्शुक्रात्मकः २ - विष्णु: ( आपोमयः ) → हृ - अमृतापः शुक्रात्मकः 3+ ३ – इन्द्र: ( वाङ्मयः ) + द — अमृताग्निः शुक्रात्मकः I fu hy (: 1 ) --+ स्वः → भुवः +: सूत्रात्मा अन्तर्यामी १ - इन्द्र: ( वाङ्मयः ) + मर्त्यवाक् शुक्रात्मक: -२ - सोमः ( अन्नमयः ) + मत्यवः शुक्रात्मक--३ - श्रग्निः ( अन्नादमयः ) मर्त्याग्निः शुक्रात्मकः --- * अन्तर्यामी से ( हृदयावच्छिन्न अमृतशुक्रत्रयी से युक्त अतिरक्त प्रजापति से ) अनुगृहीत इन्द्राग्निषोम-मय मर्त्यशुक्रत्रयी से युक्त जिस षट्शुक्रात्मक भूपिण्ड का पूर्व में दिग्दर्शन कराया गया है, उस चित्यभूपिण्ड में हृदय तथा बाह्यपृष्ठ भेद से मुक्त ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र - अग्नि- सोम इन पाँच अमृताक्षरों पर दृष्टि डालिए । मर्त्य अन्न और अन्नाद की भुक्ति तो चित्यभूपिण्ड पर विश्रान्त है । अक्षरात्मक अग्नि और सोम दोनों का हृद्यप्रक्षरत्रयी के आधार पर ऊर्ध्वं वितान होता है । हृदयस्थ अमृतवाक्शुक्रमय ब्रह्मा, अमृतप्रापः शुक्रमय विष्णु, अमृतश्रग्निः शुक्रमयइन्द्र तीनों क्रमशः वाक्, लोक, वेद नाम की तीन साहस्रियों के जनक बनते हैं । विष्णु से सम्बद्ध प्रापः शुक्र के आधार पर हृद्यवाङ्मयब्रह्मा पर प्रतिष्ठित इन्द्राविष्णु की प्रतिस्पर्द्धा होती. है । इन्द्र की स्पर्द्धा अग्नि से सम्बन्ध रखती है, विष्णु की स्पर्द्धा सोम से सम्बन्ध रखती है । इस स्पर्द्धा से केन्द्र से आरम्भ कर ४८ पर्य्यन्त वाक्साहस्री का वितान होता है, केन्द्र से आरम्भ कर ३३ पर्य्यन्त लोकसाहस्री. का वितान होता है एवं केन्द्र से आरम्भ कर २१ पर्य्यन्त वेदसाहस्री का वितान होता है । अमृतापः शुक्राधारेण प्रक्रान्त इन्द्राविष्णू की प्रतिस्पर्द्धा से उत्पन्न इसी त्रिविधसाहस्री का विश्लेषण करती हुई श्रुति कहती है-उभा जिग्यथुर्नपराजयथे न पराजिज्ञे कतरश्च नैनोः । इन्द्रश्च विष्णू यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्रं वितदैरयेथाम् ॥ किं तत् सहस्रमिति? इमे लोकाः, इमे वेदाः, [ १८५ ] श्रथोवागिति ब्रूयात्1
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि वाक्साहस्री का हृद्य ब्रह्माक्षर से सम्बन्ध है । जहाँ तक ( ४८ पर्य्यन्त ) वाक् है, वहाँ तक वाक्शुक्र-मय हृद्य ब्रह्माक्षर का वितान है । यही वाक्साहस्री ' वषट्कार ' नाम से प्रसिद्ध है । इस वाङ्मयवषट्कार के ' युग्मतिस्तोम ' - ' अयुग्मस्तोम ' भेद से दो विवर्त्त हो जाते हैं । अभिप्लव, पृष्ठ्य, भेद से स्तोमतत्त्व दो भावों में विभक्त माना गया है । केन्द्र से महिमामण्डल की परिधिपर्य्यन्त सौररश्मिप्रसारवत् रश्मिरूप से चारों ओर वितत मनः - प्राणगर्भित वाङ्मय गौसाहस्री श्रभिप्लवस्तोम है । इस गौसाहस्रीरूप प्रभिप्लवस्तोम से ही ३६० अहोरात्रों का उदय होता है एवं अभिप्लवस्तोमात्मक ये ही अहोरात्र आगे जाकर षत्रिँशद-क्षर बृहती छन्द के व्यूहन से बृहतीसहस्र ( ३६००० ) रूप में परिणत होते हुए बृहतीसहस्रप्रायु: ( ३६००० ग्रहोरात्र, १०० वर्ष ) सूत्रों के प्रवर्त्तक बनते हैं । दूसरा पृष्ठ्यस्तोम है । भूकेन्द्र से चारों ओर मण्डलरूप से वितत वर्त्तु पृष्ठ ही पृष्ठस्तोम है एवं इनमें उसी मनःप्रारणगर्भिता वाङ्मयी गौसाहस्री का भोग होता है । गौसाहस्री के सम्बन्ध में इन सामात्मक पृष्ठस्तोमों के भी सहस्रमण्डल हो जाते हैं, यही सहस्रवर्त्मा सामवेद है । एक सहस्र गौतत्त्व की ३० - ३० गीतत्त्वरूप से ३३ राशियाँ हो जाती हैं । ३०-३० गौप्राण की यही राशि ' अहर्गण ' नाम से व्यवहृत हुई है । ६६ गौप्राण के ३० - ३० राशि के हिसाब से ३३ अहर्गण हो जाते हैं । १० गौप्राण शेष बच रहते हैं । १० गौप्रारणात्मक यह स्वतन्त्र राशि ३४ वां स्वतन्त्र अहर्गण कहलाया है, जिसका हृद्य उस प्रजापति ( सर्व प्रजापति ) से सम्बन्ध माना गया है, जो महिमारूप से ऊर्ध्व वितत होकर महिमापरिधि पर प्रतिष्ठित रहता है एवं जिसके गर्भ में सर्व विवर्त्त प्रतिष्ठित है । इसी सर्व प्रजापति को लक्ष्य में रख कर ' चतुस्त्रिशः प्रजापतिः ' कहा गया है । ३३ अहर्गणों में से १-२-३ ' इन तीन अहर्गणों की भुक्ति चित्यभूपिण्ड में हो जाती है । एक अहर्गण हृद्य ब्रह्माक्षर ( अनिरुक्त प्रजापति ) में भुक्त है, एक ग्रहण हृद्यविष्ण्क्षर में भुक्त है एवं एक अहर्गण हृद्य इन्द्राक्षर में भुक्त है । इस भुक्ति से हिमरूप वाक्साहस्रीमण्डल में ३० अहर्गण बच रहतें हैं । यदि हृद्य अहर्गणत्रयी का भी इस शेष ३० अहर्गण समष्टि में अन्तर्भाव मान लिया जाता है, तो वाक्साहस्रीलक्षण वषट्कार के ३३ अहर्गण हो जाते हैं । यही महिमामण्डल है । त्रयस्त्रिशद् अहर्गणात्मक इस महिमामण्डल के प्रारम्भ के १६ अहर्गणों में ( ३ हृद्यअहर्गण, १३ मण्डलानुगत अहर्गण, सम्भूय १६ अहर्गणों में ) हृद्य इन्द्राक्षरानुगत अग्न्यक्षर का प्राधान्य है एवं ऊर्ध्व के १६ अहर्गणों में ( १८ वें प्रहर्गण से प्रारम्भ कर ३३ वें ग्रहणपर्य्यन्त व्याप्त १६ अहर्गणों में ) विष्ण्वक्षरा-नुगत सोमाक्षर का प्राधान्य है । त्रयस्त्रिशदहर्गणात्मक इस महिमालक्षण वाङ्मण्डल में भुक्त १६-१६ अहर्गणात्मक अग्नि- सोममण्डलाद्ध का केन्द्र १७ वाँ अहर्गण बनता है । जिस प्रकार हृद्यतत्त्व अनिरुक्तं प्रजापति कहलाया है, ३४ वाँ अहर्गण सर्व प्रजापति से अनुगृहीत माना गया है, एवमेव ३३ ग्रहणात्मक महिमामण्डल के केन्द्रस्थानीय १७ वें अहर्गण से युक्त वही प्रजापति ' उद्गीथ प्रजापतिः ' नाम से व्यवहृत हुआ है । इसी के लिए ' सप्तदशो वै प्रजापतिः ' कहा गया है । यही सप्तदशउद्गीथ प्रजापति पार्थिव सोमयज्ञ का स्वरूप सम्पादक बनता है, अतएव इसे यज्ञात्मा भी कहा गया है । यज्ञात्मलक्षण इस पार्थिव उद्गीथ प्रजापति के चूंकि १७ अवयव है, अतएव प्राकृतिक यज्ञ के अनुरूप वितत मनुष्यकृत यज्ञ में सप्त-दशानुगत प्राजापत्य सम्पत्ति संग्रह के लिए १७ अक्षरों का समन्वय होता है, जैसा कि निम्नलिखित लोक-प्रचलित सूक्ति से स्पष्ट है-[ १८६ ]