Part IV Atmgativigyanopanishta Part 4 — पृष्ठ 211–220
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४ · पृष्ठ 211–220
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगति निमित्तानि १ २ ३ ४ १ २ ३ ४. १ २ १ २ ३ ४ ५ " प्रो - श्रा - व - य " - " अ - स्तु - श्रौ - षट् " - " य - ज " - " ये - य - जा - म - हे " " चतुभिश्व चतुभिश्च १ २ " वौ- षट् " हूयते च पुन --द्वाभ्यां तस्मै यज्ञात्मने नमः ॥ " पञ्चभिरेव च । कहा गया है, कि प्रतिष्ठा लक्षण प्राणमय अमृतवाक्शुक्रप्रधान ब्रह्माक्षर के प्राधार पर प्रतिष्ठित गतिलक्षण वाङ्मय अमृताग्निशुक्रप्रधान इन्द्राक्षर तथा प्रागतिलक्षण आपोमय अमृतापः शुक्रप्रधान विष्ण्वक्षर इन दोनों हृद्य प्रक्षरों की पारस्परिक प्रतिस्पर्द्धा से वेदलोकवाक् नाम की तीन साहस्रियों का वितान होता है ( पृष्ठ १८५ ) प्रसङ्गोपात्त इन तीनों साहस्रियों का भी समन्वय कर लीजिए । वेदसाहस्री का इन्द्राक्षर से, लोकसाहस्री का विष्ण्वक्षर से एवं वाक्साहस्री का ब्रह्माक्षर से प्रधान सम्बन्ध माना गया है । इन्द्राक्षरानुगता त्रयीवेदसाहस्री अमृताग्निः शुक्र के आधार पर प्रतिष्ठित है, विष्ण्वक्षरानुगता चतुर्लोकसाहस्री अमृतापः शुक्र के आधार पर प्रतिष्ठित है एवं ब्रह्माक्षरानुगता ' परमे व्योमन् ' लक्षणा वाक्साहस्री अमृतवाक् शुक्र के आधार पर प्रतिष्ठित है । दूसरे शब्दों में इन्द्रप्रधाना वेदसाहस्री अग्निः शुक्रमयी है, विष्णुप्रधाना लोकसाहस्री आपःशुक्रमयी है एवं वाक्साहस्री वाक्शुक्रमयी है । केन्द्र से २१ वें अहर्गणपर्य्यन्त वेदसाहस्री व्याप्त है, केन्द्र से ३३ वें अहर्गण पर्य्यन्त लोकसाहस्री व्याप्त है एवं केन्द्र से ४८ वें ग्रहणपर्य्यन्त वाक्साहस्री व्याप्त है । वाक्साहस्री के गर्भ में लोक - वेदसाहस्रियाँ प्रतिष्ठित हैं, लोकसाहस्री के गर्भ में वेदसाहस्री प्रतिष्ठित है । यही वेदसाहस्री सत्यात्मिका वह प्रतिष्ठा है, जिसके आधार पर श्रग्निषोमात्मक वितान यज्ञ एवं वितान यज्ञ से सम्बन्ध रखने वाले ३३ यज्ञिय देवता प्रतिष्ठित हैं । १ – वाक्साहस्री → वाक्शुक्रानुगता ब्रह्माक्षरानुगृहीता ४८ पर्य्यन्तं व्याप्ता ( द्युलोकात्मिका ) २ — लोकसाहस्री → श्रापःशुक्रानुगता विष्ण्वक्षरानुगृहीता ३३ पर्य्यन्तं व्याप्ता ( अन्तरिक्षात्मिका ) ३ - वेदसाहस्री प्रग्निः शुक्रानुगता इन्द्राक्षरानुगृहीता २१ पर्य्यन्तं व्याप्ता ( पृथिव्यात्मिका ) + तीनों में से पहले उस वेदसाहस्री का विश्लेषण कीजिए, जो कम्र्मात्मा की मूल प्रतिष्ठा मानी गई-है । सोमात्मक प्रथर्वगर्भिता ऋग्यजु - साममयी - अग्न्यात्मिकात्रयी ही वेदसाहस्री है । अग्न्यनुगता यही पार्थिव वेदत्रयी यज्ञवितान सम्बन्ध से ' यज्ञमात्रिकवेद ' नाम से व्यवहृत हुई है । भूपिण्डकेन्द्र में मूलरूप से प्रतिष्ठित रहने वाले सोमाक्षर सहयोगी अग्न्यक्षर का इन्द्राक्षर की प्रतिस्पर्द्धा से ऊर्ध्व वितान होता है । इन्द्राक्षर प्रतिस्पर्द्धा से ऊर्ध्व वितत श्रग्न्यक्षर ही अग्नि का जागरण है एवं यह अग्नि जागरण ही यजुर्गभित ऋक् - साम वितान की मूल प्रतिष्ठा है, जैसा कि निम्नलिखित मन्त्र वर्णन से प्रमाणित है— [ १८७ ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि " अग्निर्जागार तमृचः कामयन्ते-अग्निर्जागर तमु सामानि यन्ति । अग्निर्जागार तमयं सोम आह-तवाहमस्मि सख्ये न्योका ॥ " त्रयस्त्रिंशदहर्गणात्मक ( ३३ ) बहिमंण्डल के प्रारम्भ के १६ वें ग्रहणपर्य्यन्त अग्न्यक्षर का वितान है एवं ३३ पर्य्यन्त सोमाक्षर का वितान है । दूसरे शब्दों में केन्द्र से १६ पर्य्यन्त अग्नितत्त्व का प्राधान्य है, एवं केन्द्र से ३३ पर्य्यन्त व्याप्त सोमतत्त्व ( १८ से ३३ पर्य्यन्त ) प्रधान बन रहा है । इस दृष्टि से १६ पर्य्यन्त अग्निसत्ता तथा ३३ पर्य्यन्त सोमसत्ता सिद्ध हो जाती है । इन दोनों के केन्द्रभूत १७ वें अहर्गण में दोनों का याज्ञिक सम्बन्ध होता है अतएव यह सप्तदशस्थान ' ग्राहवनीय ' कहलाया है । दासोमाहुति से प्रज्वलित दाहक अग्नि २१ पर्य्यन्त विवत हो जाता है । यही अग्नि - षोमात्मक यज्ञ है, यही ' वामन विष्णु ' है, जिसके लिए ' यज्ञो वै विष्णु: ' ' विष्णुर्वैयज्ञः ' इत्यादि निगम विहित हैं । केन्द्र से २१ पर्य्यन्त व्याप्त रहने वाली अग्निविक्रान्ति ही यज्ञात्मक विष्णु की विक्रान्ति है । केन्द्र से 8 पर्य्यन्त यज्ञाग्निलक्षण विष्णु की प्रथम विक्रान्ति है । १० से १५ पर्य्यन्त विष्णु की द्वितीय विक्रान्ति है, यही अन्तरिक्षानुगता विक्रान्ति है । १६ से २१ पर्य्यन्त विष्णु की तृतीय विक्रान्ति है, यही द्युलोकानुगता विक्रान्ति है । इस प्रकार - १५-२१ इन - तीन विक्रान्तियों से यज्ञविष्णु ने अग्निः शुक्रात्मिका स्तौम्यत्रिलोकी पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर रक्खा है, जिसके स्पष्टीकरण के लिए पुराणोक्त सुप्रसिद्ध ' वामनोपाख्यान ' दृष्टव्य है, जिसका कि शतपथ विज्ञान-भाष्य के ' वेदिनिर्माण ब्राह्मण ' में विशद वैज्ञानिक निरूपण हुआ है - ( देखिए शत ० वि ० भा ० १ वर्ष ) । केन्द्र से २१ पर्य्यन्तः व्याप्त अग्नितत्त्व के ε- १५ - २१ भेद से घन - तरल - विरल ये तीन अवस्थाभेद हो जाते हैं । त्रिवृत् ( ६ ) स्तोमावच्छिन्न पार्थिव प्रदेश में प्रतिष्ठित घनाग्नि ' अग्नि ' है, जिसके ध्रुवादि ग्राठ विवर्त्त हैं । यही पार्थिव अग्नि ऋक्साहस्री की विकासभूमि है । पञ्चदश ( १५ ) स्तोमावच्छिन्न श्रान्तरिक्ष्य प्रदेश में प्रतिष्ठित तरलाग्नि ' वायु ' है, जिसके विरूपाक्षादि ११ विवर्त्त हैं । यही आन्तरिक्ष्य वायु यजुः-साहस्री की विकासभूमि है | एकविंश ( २१ ) स्तोमावच्छिन्न दिव्य प्रदेश में प्रतिष्ठित विरलाग्नि ' आदित्य ' है, जिसके इन्द्रादि १२ विवर्त्त हैं । प्राग्नेय ८ वसु, वायव्य ११ रुद्र, ऐन्द्र १२ आदित्य, २ सान्ध्यप्राण ये ३३ यज्ञिय देवता उसी हृद्यमनु के आधार पर वितत हैं । मनुबन्धनावच्छिन्न इन्हीं यज्ञिय देवताओं को. अग्निः शुक्रप्राधान्य से ' सर्वदेवता ' कहा गया है । निम्नलिखित मन्त्र इन्हीं देवताओं का विश्लेषण कर रहा है— " इति स्तुतासो अस्था रिशादसो ये स्थ त्रयश्च त्रिशच्च । मनोदेवा यज्ञियासः । " ( ऋक्सं ० ८ । ३० । २ ) । [ १८८ ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगति निमित्तानि वस्वनुगत पार्थिव अग्नि में रुद्रानुगत आन्तरिक्ष्य वायु, आदित्यानुगत दिव्य इन्द्र दोनों की भुक्ति अग्नि- वायु - प्रदित्यात्मक, अग्निप्रधान जिस योगजतत्त्व का प्रादुर्भाव होता है, वही अर्थशक्तिप्रधानतत्त्व ' विराट् ' कहलाया है । रुद्रानुगत आन्तरिक्ष्य वायु में वस्वनुगत पार्थिव अग्नि, आदित्यानुगत दिव्य इन्द्र, दोनों की भुक्ति से वायु - प्रग्नि- प्रादित्यात्मक, वायुप्रधान जिस योगजतत्त्व का प्रादुर्भाव होता है, वही क्रियाशक्तिप्रधानतत्त्व ' हिरण्यगर्भ ' कहलाया है । आदित्यानुगत दिव्य इन्द्र में वस्वनुगत पार्थिव अग्नि, रुद्रानुगत अन्तरिक्ष्य वायु, दोनों की भुक्ति से इन्द्र - प्रग्नि - वाय्वात्मक, इन्द्र प्रधान जिस योगजतत्त्व का प्रादुर्भाव होता है, वही ज्ञानशक्ति प्रधानतत्त्व ' सर्वज्ञ ' कहलाया है । इस प्रकार अग्नि वायु - आदित्य तीनों के योनि - रेतोभावों से तीनों के यज्ञसम्बन्ध से तीन स्वरूप प्राविर्भूत हो जाते हैं । विराट् - अग्नि, हिरण्यगर्भ -वायु, सर्वज्ञइन्द्र इन तीनों की क्रमशः ६-१५ - २१ अहर्गणों में प्रधानता है । तीनों की समष्टि ही ' ईश्वरीय देवसत्य ' है, जिसका कठोपनिषद्विज्ञानभाष्यादि में विस्तार से उपबृ हरण हुआ है । यही ' साक्षीसुपर्ण ' है । सुप्रसिद्ध भोक्ता सुपर्णं इसी साक्षी का अंश है । विरादंश वैश्वानर, हिरण्यगर्भाश तैजस, सर्वज्ञांश प्राज्ञ, तीनों की समष्टि ही कर्मात्मा है । २१ स्तोमावच्छिन्न ईश्वरीय देवसत्य से सम्बद्ध तद्रूप भोक्तासुपर्ण की अन्तिम यज्ञगति २ ९ सोम ही माना गया है । यज्ञकम्मों से २१ तक ही इसका गमन सम्भव है । चयनयज्ञ ही यज्ञकाण्ड में एक ऐसा यज्ञ है, जो २१ वें अहर्गण में प्रतिष्ठित और अमृतभाग से कर्मात्मा का सम्बन्ध कराता हुआ अपुनारवर्तक बनता है । इसी आधार पर - " नामृतत्त्वस्य त्वाशास्ति ऋ चयनात् " निगम प्रतिष्ठित है, यह स्मरण रखना चाहिए कि, २१ से बाहर तो इस चयनयज्ञ से भी गमन सम्भव नहीं है । क्योंकि अग्नियज्ञ है एवं २१ पर अग्निः शुक्रसीमा समाप्त है । त्रिवृत्स्तोमावच्छिन्न, घनाग्नियुक्त, विराट्प्रतिष्ठालक्षण, पृथिव्यनुगत अग्निः शुक्र ऋक्साहस्री का प्रभव है, तदनुगत पार्थिव अग्नि ही ' पवमान ' नाम से प्रसिद्ध है, जिसका गायत्रछन्दस्क प्रातःसवन से सम्बन्ध माना गया है । पञ्चदश स्तोमावच्छिन्न, तरलाग्नियुक्त, हिरण्यगर्भ प्रतिष्ठालक्षण, अन्तरिक्षानुगत अग्निःशुक्र यजुःसाहस्री का प्रभव है, तदनुगत अन्तरिक्ष्य अग्नि ( वायु ) ही ' पावक ' नाम से प्रसिद्ध है, जिसका त्रैष्टुभ छन्दस्क माध्यन्दिन सवन से सम्बन्ध माना गया है । एकविंश स्तोमावच्छिन्न, विरलाग्नियुक्त, सर्वज्ञप्रतिष्ठालक्षण, द्युलोकानुगत श्रग्निः शुक्र सामसाहस्री का प्रभव है, तदनुगत दिव्य अग्नि ( श्रादित्य ) ही ' शुचि ' नाम से प्रसिद्ध है, जिसका जागतछन्दस्क सायंसवन से सम्बन्ध माना गया है । त्रिवृत् - पञ्चदश-एकविंशस्तोमात्मका, घन - तरल - विरलाग्नियुक्ता, विराट् हिरण्यगर्भ - सर्वज्ञ प्रतिष्ठालक्षण, पृथिवी -अन्तरिक्ष- द्युलोकानुगत अग्निः शुक्रमयी ऋक् यजुः सामसाहस्री ही इन्द्रानुगता पहली वेदसाहस्री है वेद-साहस्री लक्षण, सवनत्रयोपपन्ना - स्तोम्यत्रैलोक्यात्मिका यही महापृथिवी क्रमशः वामनत्रिलोकी, अदिति-त्रिलोकी, वितानत्रिलोकी, यज्ञत्रिलोकी, कुर्म्मत्रिलोकी आदि नामों से व्यवहृत हुई है । ब्राह्मणग्रन्थ प्रति-पादित सुप्रसिद्ध कर्मकाण्ड का इसी स्तौमित्रिलोकी से सम्बन्ध है । ' ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत ' -' दर्शपूर्ण मासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत ' इत्यादि फलश्रुतियाँ इसी यज्ञत्रिलोकी से सम्बद्ध हैं । यही अग्निः शुक्र विकास भूमिका है । जिसका ' अग्निग्रन्थ ' ( चयन विद्या ) में विश्लेषरण हुआ है । [ १८६ ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड -ऐन्द्री वेदसाहस्त्री ) ( द्यौः सामसाहस्री ) ( सायंसवनम् जगतीछन्दः ) ( प्राज्ञः सर्वज्ञः ) + प्रादित्यः ( शुचिः -विरलाग्निः ) ( २१ एकविंशस्तोमः - ३ ) अन्तरिक्षम् ( साहस्री यजुः ) सवनम् माध्यन्दिनं ( छन्दः ) त्रिष्टुप् तैजसः ( हिरण्यगर्भः ) वायुः ( पावकः -तरलाग्निः ) ( १५ : स्तोम पञ्चदश -अग्निः शुक्रमैन्द्रम् [ १६० ] ) ( ६ : त्रिवृत्स्तोम १ – छन्दः ) गायत्री ( वैश्वानरः विराट् ) ( अग्नि पवमानः -घनाग्निः ) पृथिवो ( ऋक्साहस्री + प्रातः ( ) सवनम् आत्मगति निमित्तानि
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड वेद साहस्री - ऐन्द्री परिलेख: -ग्रात्मगतिनिमित्तानि पृथिव्यन्तरिष्यलिका त्रिवृत्पञ्चदशेकविंशस्तोमभेदेन स्तम्मतिलोक अमृताशुकात्मिका- ( पृथिवी ) एकविंशस्तोमः ( द्योः ) राज : साहर त्रिवत्स्तोमः ( पृथिवी ) [ १४ ] [ १४ ] १३१३ * १२ १२ | ११/११ ११ १ भूपिण्डः ) ( ९ ) ऋक् ( अग्निः : घनारित अग्निशुक्रम वाक्शक उक्त परिलेख में केन्द्र से २१ स्तोम पर्यन्त व्याप्त अग्नितत्त्व के ε- १५-२१ भेद से घन, तरल, विरलये तीन अवस्थाएँ हो जाती हैं । इनमें त्रिवृत् ( 8 ) स्तोमावच्छिन्न पार्थिव प्रदेश में घनाग्नि ' अग्नि ' है । यही पार्थिव अग्नि शुक्र ही ' ऋताही ' का प्रभव है । इसका गायत्र छन्दस्क ' प्रातः सवन ' से सम्बन्ध माना गया है | पञ्चदश ( १५ ) स्तोमावच्छिन्न प्रान्तरिक्ष्य प्रदेश में प्रतिष्ठित तरलाग्नि ' वायु ' है । यही वायु ग्रन्तरिक्षा-नुगत अग्निशुक्र यजुसाहली की विकास भूमि है । इसका त्रैष्टुप् छन्दस्क माध्यन्दिन सवन से सम्बन्ध माना गया है । एकविंश ( २१ ) स्तोमावच्छिन्न द्यौः ( दिव्य ) प्रदेश में प्रतिष्ठित विरलाग्नि ' आदित्य ' है । द्युलोका-नुगत अग्निशुक्र सामसाहसी का प्रभव है । जिसका जागतछन्दस्क सायंसवन से सम्बन्ध है । इस प्रकार ऋक्, यजु, साम साहस्री ही इन्द्रानुगत वेदसाहस्री है । श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर ।
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्डे आत्मगतिनिमित्तानि स्तोम्यत्रिलोकी रूपा पृथिवी में अग्नि वायु - आदित्य रूप से अग्निः शुक्र का भोग ही प्रस्तुत दृष्टिकोण का आधार है । पूर्व में ( १८४ पृ ० ) ९ पर्य्यन्त अग्निः शुक्र की, १५ पर्य्यन्त प्रापः शुक्र की एवं २१ पर्य्यन्त वाक्शुक्र की व्याप्ति बतलाते हुए यह स्पष्ट किया गया था कि, एकविंशस्तोमावच्छिन्ना पृथिवी में भुक्त अग्नि- आप: - वाक् तीनों शुनिप्रधान हैं । इसी अग्निः शुक्रप्रधान्य के आधार पर शुक्रत्रयात्मक पृथिवी-लोक को अग्निः शुक्रमय मान लिया गया है एवं प्रदर्शित परिलेख ( १६० पृ ० ) द्वारा इसी दृष्टिकोण का स्पष्टीकरण हुआ है । अब क्रमप्राप्त प्रापःशुक्र से सम्बन्ध रखने वाले सागराम्बरापृथिवीलक्षण त्रैलोक्या-त्मक दूसरे अन्तरिक्ष लोक से सम्बन्ध रखने वाले दृष्टिकोण की घोर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । इस सम्बन्ध में भी प्रारम्भ में ही यह स्पष्टीकरण कर लेना चाहिए कि, भूकेन्द्र से आरम्भ कर ११ वें ग्रहण पर्य्यन्त अग्निः शुक्र का एवं ३३ पर्य्यन्त वाक्शुक्र का साम्राज्य है । इन तीनों में प्रधानता चूंकि आप शुक्र की है, अतएव जैसे स्तोम्यपृथिव्यनुगता शुक्रत्रयी अग्न्यात्मिका मानी गई है, एवमेव यह अन्तरिक्षानुगता शुत्रयी भी ग्रापः शुक्रात्मिका ही मान ली गई है, जैसा कि परिलेख से स्पष्ट हो जायगा । आपः शुक्र का प्रधानतः अन्तरिक्ष से सम्बन्ध है एवं जिस प्रकार पृथिवी के साथ गायत्रीछन्द का सम्बन्ध माना जाता है, तथैव अन्तरिक्ष का त्रिष्टुप् छन्द से सम्बन्ध माना गया है । यह छन्द एकादशाक्षर ( ११ ) है अतएव तदनुगत प्रान्तरिक्ष्य प्रापः शुक्रं की व्याप्ति एकादश स्तोमसंख्या पर विश्राम करती है । बतलाया गया है कि, भूकेन्द्र से ३३ पर्य्यन्त आपः शुक्र व्याप्त है । त्रिवृद्भाव सम्बन्ध से इस मण्डल के भी ११-११-११ रूप से तीन विवर्त हो जाते हैं । एकादशस्तोमावच्छिन्न उपक्रम स्थानीय आपः शुक्र के आधार पर ' मर ' नामक मर्त्य पार्थिव प्रापः प्रतिष्ठित हैं । केन्द्र से २२ वें अहर्गण पर्य्यन्त व्याप्त आपः शुक्र के आधार पर ' मरीचि ' नामक अन्तरिक्ष्य प्राप प्रतिष्ठित हैं एवं केन्द्र से ३३ पर्य्यन्त व्याप्त आपः शुक्र के आधार पर ' अम्भ: ' नामक दिव्य प्रापः प्रतिष्ठित हैं । प्रथम स्थान पृथिवीलोक है, मध्यम स्थान ग्रन्तरिक्ष-लोक है, उत्तमस्थान द्युलोक है । प्रथमस्थानावच्छिन्न श्रापः शुक्र अग्निशुक्रगर्भित है, द्वितीयस्थानावच्छिन्न आपः शुक्र आपः शुक्रगर्भित है, उत्तमस्थानावच्छिन्न आपः शुक्र वाक्शुक्रगर्भित है । इस प्रापः शुक्रत्रयी के गर्भ पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, आपः ये चार लोकभुक्त हैं । यही ' लोकसाहस्री ' है । प्रप्तत्त्व का विष्ण्वक्षर से सम्बन्ध है । केन्द्रस्थ विष्णु सोमात्मक प्रप्तत्त्व के आधार पर ३३ वें अहर्गण पर्य्यन्त व्याप्त होता है । फलतः जिसप्रकार वेदसाहस्री का इन्द्राक्षर स्वाभाविक सम्बन्ध एवमेव लोकसाहस्री का विष्ण्वक्षर से स्वाभाविक सम्बन्ध सिद्ध हो जाता है । आपः शुक्रमयी यही त्रिलोकी ' सागराम्बरा है, यही अन्तरिक्ष है, जैसा कि परिलेख से स्पष्ट है । आप शुक्र के आधार पर वितत पार्थिव मर अप्तत्त्व घनावस्थापन है, यही ' आप ' है । आपशुक्र के आधार पर वितत प्रान्तरिक्ष्य मरीचि प्रप्तत्त्व तरलावस्थापन्न है, यही ' वायु ' है । आपः शुक्र के आधार पर वितत दिव्य अम्भः प्रप्तत्त्व विरलावस्थापन है, यही ' सोम ' है । इस प्रकार जैसे घनादि अवस्थात्रयी से अग्नि की अग्नि वायु - आदित्य ये तीन अवस्था हो जाती हैं एवमेव घनादि अवस्था-त्रयी से प्रप्तत्त्व की भी प्रापः - वायुः सोमः ये तीन अवस्था हो जाती हैं । [ १ ९ १. ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्डे लोकसाहस्री वैष्णवी-( वाक् ) ३ त्रयस्त्रिशस्तोम: ( ३३ ) ( प ) २ - द्वाविंशस्तोमः ( २२ ) ( अग्निः १ - एकादशस्तोमः ( ११ ) सोम: ( अम्भः ) द्यौः वायुः ( मरीचिः ) अन्तरिक्षम् -श्राप: ( मर: ) पृथिवी आत्मगति निमित्तानि wwww ++ अन्तरिक्षम् ( श्रापः शुक्रात्मक ) तीसरी क्रमप्राप्त वाक्साहस्री के सम्बन्ध में वक्तव्यांश केवल यही शेष रह जाता है कि, केन्द्रस्थ ब्रह्माक्षर से सम्बन्ध रखता हुआ अमृतवाक्शुक छन्दोमास्तोम द्वारा तीन संस्थानों में विभक्त होता हुआ केन्द्र से अन्तिम परिधि स्थानीय ४५ वें अहर्गण पर्य्यन्त व्याप्त हो जाता है । केन्द्र से प्रारम्भ २४ वें अहर्गण पर्य्यन्त गायत्र छन्दस्का आग्नेयीवाक् का प्राधान्य है, यहीं वाङ्मय अग्निःशुक्र का उपभोग है । केन्द्र से आरम्भ कर ४४ वें अहर्गण पर्यन्त त्रैष्टुभछन्दस्का ऐन्द्रीवाक् का प्राधान्य है, यहीं वाङ्मय प्रापः शुक्र का उपभोग होता है । केन्द्र से आरम्भ कर ४८ वें अहर्गणपर्य्यन्त जागतछन्दस्का वैश्वदेवीवाक् का प्राधान्य है, जिसके सम्बन्ध से यह तृतीया त्रिलोकी विश्वम्भरा कहलाई है । गायंत्री, त्रिष्टुप् जगती तीनों छन्द क्रमशः २४–४४–४८ अक्षरात्मक हैं एवं तीनों से क्रमश: अग्नि, इन्द्र, विश्वेदेव नामक प्राणदेवता छन्दित हैं । सच्छन्दस्क इस प्राण देवतात्रयी से वाक्शुक्र के तीनों विवर्त्त चूंकि मित ( सीमित ) हैं अतएव वाक्शुक्रमय २४-४४-४८ स्तोमों को ' छन्दोमाः ' नाम से व्यवहृत करना अन्वर्थ बनता है । इनमें अहर्गणों की संख्या समभावान है अतएव इन्हें ' युग्मन्तिस्तोम ' भी कहा जाता है । २४-४४-४८ के संकलन से ११६ ( एक सौ सोलह ) संख्या हो जाती हैं । प्राकृतिक नित्य छन्दोमा स्तोम के अनुरूप वितत पुरुषप्रयत्नसाध्य वैध छन्दोमायज्ञ से ११६ वर्षात्मक प्रायुःसूत्र की अवाप्ति मानी गई है । गायत्रस्तोमावच्छिन्न, चतुर्विंशति - अहर्गणात्मक, आग्नेयीवाक् से अनुगृहीत, अग्निशुक्र गर्भित वाक्-शुक्रात्मक प्रदेश ही पृथिवीलोक है । त्रैष्टुभस्तोमावच्छिन्न, चतुश्चत्वारिंशदहर्गणात्मक ऐन्द्रीवाक् से अनु-गृहीत, आपः शुक्रगर्भित वाक्शुक्रात्मक प्रदेश अन्तरिक्षलोक है । जागतस्तोमावच्छिन्न अष्टाचत्वारिशदह-र्गणात्मक वैश्वदेवीवाक् से अनुगृहीत, वाक्शुक्रगर्भित वाक्शुक्रात्मक प्रदेश ही द्युलोक है । यही विश्वम्भरा नाम की तृतीया त्रिलोकी है । आग्नेयीवाक् गौरिवीतावाक् से, ऐन्द्रीवाक श्राम्भृणीवाक् से एवं विश्वम्भरा वैश्वादेवी-वाक् सत्यावाक् से, अनुगृहीत है, जैसा कि परिलेख से स्पष्ट हो जाता है निम्नलिखित मन्त्र • त्रिलोकी लक्षरणाब्रह्माक्षराविनाभूता इसी वाक्साहस्री स्पष्टीकरण कर रहा है--सहस्रधा पञ्चदशान्युक्था यावद्यावापृथिवी तावदित्तत् । सहस्रधा महिमानः सहस्रं यावद् ब्रह्म विष्ठितं तावतीवाक् ॥ ( ऋक् १०।११४।८ ) । [ १६२ ]
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I श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि लोकसाहस्त्री परिलेख: - प्रयास्त्रिशास्तोमभेदेन पृ ० द्वाविशा- अ ० घुलो कालिका -एकादशा सागराम्बरा -शुक्रात्मिका त्रिलोकी आपः अन्तरिक्षम अमृता ११ ) आपः ( आपः घना ११ ) ( सोमः आपः विरला ११ ) ( वायुः आपः तरला १२१ 20120 | १८ | ११७ । १६ १६ [ x १५ १ ९ ३ 98 299 १० १० १० ए द्वाविंशास्तोमः ( २२ ) अन्तरिक्षम् :: ट P w x एकादशास्तोमः ( ११ ) पृथिवी 1 अप लोक साहस्त्री ( म ३ वायुलोकसाहस्त्री ( मरीचिः ) भूपिण्डः ) ( वायुः शुक्रम् - आपः शुक्रमयं आपः भूकेन्द्र से आरम्भ कर ११ वें अहर्गण पर्यन्त अग्निशुक्र, २२ अहर्गण पर्यन्त प्रापः शुक्र व ३३ अहर्गण साम्राज्य है । यहाँ पर आपः शुक्र के आधार पर ' मर ' नामक मर्त्य पार्थिव आपः प्रतिष्ठित है । आपः पर्यन्त शुक्र वाक्शुक्र का ' मरीचि ' नामक अन्तरिक्ष्य प्रापः एवं ३३ पर्यन्त व्याप्त प्रापः शुक्र ( वाक्शुक्र ) के आर पर आधार पर प्रतिष्ठित है । प्रथम स्थान पृथिवीलोक, मध्यम स्थान अन्तरिक्षलोक एवं उत्तम स्थान द्युलोक ' अम्भ ' नामक दिव्य प्रापः है । इस प्रकार इस प्रापः-शुक्रत्रयी के गर्भ में पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ व आप: ये चार लोक भुक्त हैं । यही लोकसाहस्री है । श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर ।
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श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर । N w X K W c d c m sc ox ) गौरिवीक्षा ( बाक स्थापना घुनाव शुक्रम् अग्निः शुक्रमयं वाक् श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड आत्मग तिनिमित्तानि वाक्साहस्री परिलेख: --वें का अहर्गण । ४४ वें है ४८ होता वैश्वदेवीवाक् परिधि उपभोग पर्यन्त अन्तिम का से शुक्र अहर्गण | वें है , केन्द्र अग्निः ४८ विभक्त प्रकार कहलाई में वाङ्मय पर इसी । विश्वम्भरा संस्थाओं , यहीं है है तीन होता त्रिलोकी द्वारा प्राधान्य का उपभोग तृतीया का से यह छन्दोमास्तोम शुक्र आग्नेयीवाक् आप सम्बन्ध पर्यन्त पर जिसके अमृतवाक्शुक्र , यहीं । ग्रहण है है हुआ २४ रखता से प्राधान्य प्राधान्य । केन्द्र का सम्बन्ध है से जाता ऐन्द्रीवाक् हो ब्रह्माक्षर पर्यन्त व्याप्त केन्द्रस्थ तकअहर्गण
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्डं सर्वसंग्रहः-४८ ( ४ ) वाक् ( सत्या ) शाक्वरसाम + द्यौः + ४४ ( २० ) + प्रापः ( आम्भृणी ) → वैरूपसाम अन्तरिक्षम् श्रात्मगतिनिमित्तानि → वाक् ( द्यौ: - विश्वम्भरात्रिलोकी ) -२४ ( २४ ) + अग्निः ( गौरिवीता )) + रथन्तरसाम + पृथिवी, -३३ ( ११ ) → वाक् ( सोम ). शाक्वरसामद्यौः २२ ( ११ ) आप: ( वायुः ) + वैरूपसाम अन्तरिक्षम् ' + + आपः ( अन्तरिक्षं - सागराम्बरात्रि ० ) → ११ ( ११ ) + अग्निः ( प्रापः ) रथन्तरसाम + पृथिवी - * २१ ( ६ ) वाक् ( आदित्यः )। शाक्वरसाम द्यौः १५ ( ६ ) आप: ( वायुः ) + वैरूपसाम अन्तरिक्षम् ( e ) + अग्नि ( अग्निः ) + रथन्तरसाम→ पृथिवी + अग्निः ( पृथिवी - स्तौमित्रिलोकी ) | भू मर्त्यशुक्रात्मको [ १६३ ] Sob