Part IV Atmgativigyanopanishta Part 4 — पृष्ठ 31–40

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४ · पृष्ठ 31–40

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड आत्मगतिविषये - प्रश्नपरम्परा श्रादित्याच्चन्द्रमसं, चन्द्रमसो तान् मासेभ्यः सम्वत्सरं, सम्वत्सरादादित्यं विद्युतम् तत् पुरुषोऽमानवः स एतान् ब्रह्मगमयति । एष देवपथो ब्रह्मपथः । एतेन प्रतिपद्यमाना इमं मानवावर्त्तं नाऽऽवर्त्तन्ते, नाऽऽवर्त्तन्ते । " ( छा ० उ ० ४।१५।५ ) । उक्त छान्दोक्त श्रुति जहाँ देवयानमार्ग द्वारा प्रेतात्मा की नियतोपक्रमगति का विश्लेषण कर रही है, वहाँ अन्य श्रुति नियतगति भाव का समर्थन करती हुई हमें व्यामोह में डाल रही है । शरीरनिधना- में, श्रोत्र-नन्तर पुरुष का वाग्भाग अग्नि में, प्राणभाग वायु में, चक्षुर्भाग आदित्य में, मनोभाग चन्दमा भाग दिशाओं ( दिक्सोम ) में, शरीर पृथिवी में, आत्मा आकाश में, लोम औषधियों में, केश वनस्पतियों में लीन हो जाते हैं । रक्तभाग, तथा रेतोभाग पानी में लीन हो जाता है । इस प्रकार जब अध्यात्म संस्था के सारे अवयव स्व - स्व प्रभवों में लीन हो जाते हैं, तो प्रश्न होता है - पुरुष ( आत्मा ) की इस अवस्था में कहाँ स्थिति रहती है । विभु प्रकाश तो सब का आयतन है । फलतः ' आकाशमात्म ' से प्रश्न का समा-के धान करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि, इन्द्रियवर्ग, भूतवर्गादि के स्व - स्व प्रभवों में विलीन हो जाने अनन्तर आकाशायतन में प्रतिष्ठित प्रात्मा स्वसञ्चित सांस्कारिक कर्मों में ही प्रतिष्ठित रहता है । पुण्य-कर्मानुसार इसे पुण्यलोकों में पुण्यफल भोगने के लिए जाना पड़ता है, एवं पापकर्मानुसार पापलोकों का अनुगमन करना पड़ता हैं । में सुरापान, ब्रह्महत्या, गोवध, आत्महत्या आदि महापाप कर्मातिशयों से इसे असुर्यपापलोकों का जाना पड़ता है । तामिस्र, अन्ध तामिस्रादि ही पापलोक हैं । निम्नलिखित श्रुति द्वारा इसी पापलोक स्पष्टीकरण हुआ है— " असूर्य्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः । तां प्रत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥ " ( ई ०३ ) यज्ञ, अध्ययन, दान यह त्रिपर्वा प्रथम धर्म्मस्कन्ध है । तप दूसरा धर्म्मस्कन्ध है, एवं यावज्जीवन है, इन तीनों से नैष्ठिक ब्रह्मचारी बनकर प्राचार्य कुल में आत्मसमर्पण कर देना तीसरा धर्म्मस्कन्ध माने गए हैं । पुण्यातिशय उत्पन्न होता है । इसके अतिरिक्त गोदान, प्रजातन्तु वितान आदि भी पुण्यकर्म्म इनसे प्राप्त लोक ही पुण्यलोक हैं । जैसा कि अभियुक्त कहते हैं— पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः । नन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत् || १ || ( कठ ० १३ )

पुत्रेणलोकाञ्जयति पौत्रेणानन्यमश्नुते ।

अत्र पुत्रस्य पौत्रेण ब्रध्नस्याप्नोति विष्टपम् ॥ २ ॥

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिविषये - प्रश्नपरम्परा w • इस प्रकार शुभाशुभ कर्मातिशयों के अनुसार अनियतगति का विश्लेषण करने वाले उक्तार्थगभित निम्नलिखित वचन पर भी दृष्टि डालिए । आपको स्वीकार करना पडेगा कि, परस्पर विरुद्ध सिद्धान्तों का उद्घाटन करने वाले ये सिद्धान्त निश्चयेन आत्मगतिविषयक प्रश्न को विचिकित्स्य बना रहे हैं । " यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्नि वागप्येति, वातं प्राणः, चक्षुरादित्यं मनश्वन्द्र, दिशः श्रोत्रं पृथिवीं शरीरं, आकाशात्मा, श्रौषधिर्लोमानि वनस्पतीन, केशाः । अप्सु लोहितञ्चरेतश्च निधीयते । क्वायं तदा पुरुषो भवति इति । कम्मं हैब तदूचतुः । पुण्यो वै पुण्येन कर्म्मरणा भवति पापः पापेन, इति । " ( बृ ० आ ० ३।२।१३ ) । ( १२ ) केवल एक विप्रतिपत्ति और । श्रात्मा शरीर से भिन्न पदार्थ है, वह शरीरनिधनान्तर शरीर छोड़ देता है, इन दो सिद्धान्तों के अतिरिक्त श्रात्मगति से सम्बन्ध रखने वाला जो तीसरा सिद्धान्त है, वह तो एक नवीन दृष्टिकोण के अनुसार सर्वथा ही विप्रतिपन्न बन जाता है । सिद्धान्त यह है कि जीवात्मा सूक्ष्मभाव से लोकान्तर में गमन करता है । इस तृतीय सिद्धान्त का विरोध इसलिए सम्भव है कि, उसी सनातन शास्त्र ने एक स्थान पर यह भी व्यवस्था की है कि, जीवात्मा जिस समय अपने पूर्व शरीर को छोड़ता है, तदव्यवहितोत्तर काल में ही ' तृगजलौका ' की भाँति नवीन शरीर धारण कर लेता है । " जिस प्रकार ( वर्षाऋतु में विशेषतः उत्पन्न होने वाला ) तृरणजलौका एक तृणगति को समाप्त कर उसके अन्तिम छोर को पकड़े हुए ही अन्य तृरंग को गति का आलम्बन बनाने के पश्चात् पूर्वतृण का परित्याग करता है, ' एवमेव यह आत्मा भी भोगायतन लक्षण पूर्व शरीर की अन्तिम सीमा ( मृत्युक्षण ) पर पहुँच कर इसे पकड़े हुए ही अन्य शरीर को ग्रहण कर तदन्तर ही पूर्व शरीर का परित्याग करता है । " इस अर्थ का प्रतिपादन करने वाली श्रुति अवश्यमेव आत्मगति विषयक सिद्धान्त पर प्रत्यक्षरूप से आघात कर रही है— ' " तद्यथा तृणजलायुका तृणस्यान्तं गत्वाऽन्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपसंहरति, एवमेवायमात्मेदं शरीरं निहत्याऽविद्यां गमयित्वाऽन्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुप-संहरति । तद्यथा पेशस्कारी पेशसो मात्रामपादायान्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं तनुते, एवमेवायमात्मेदं शरीरं निहत्याऽविद्यां गमयित्वाऽन्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं कुरुते - पित्र्यं वा गान्धवं वा, दैवं वा, प्राजापत्यवां, ब्राह्म वा अन्येषां वा भूतानाम् । " ( वृ ० ग्रा ० ४ । ४ । ४ ) । उक्त श्रुति के समन्वय के लिए क्या प्रयास किया जाय । क्या यह माना जाय कि, जिस प्रकार योग निर्धूतकिल्विषयोगी क्षणमात्र में कायाकल्प द्वारा कर्म्मभोग समाप्त कर डालता है, एवमेव मनोवेग से क्षणमात्र में नवीन शरीर धारण तथा पूर्व शरीरत्याग के मध्यक्षण में आदित्यादि लोकगतियों का अनुगमन [. २५ ] 4

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड श्रात्मगतिमूलकात्मस्वरूपपरिचय कर डालता है? अथवा क्या यह मान लिया जाय कि उक्त श्रुति का तात्पर्य यही है कि, आदित्यादि लोकगतियों के अनुसार ही अन्य शरीर का अनुगमन होता है? अथवा तो ऋजुभावात्मक इसी अर्थ पर क्या विश्राम मान लिया जाय कि तत्काल ही प्रात्मा नवीन शरीर धारण कर लेता है? यदि ऐसा है, तो आत्मगति ही क्या वह श्राद्धकर्म भी सर्वथा अनुपपन्न हो जायगा, जिसके लिए हमें महानिबन्ध प्रस्तुत करना पड़ा है । इसी प्रात्मगतिविषयिणी प्रश्नपरम्परा से हमें अन्ततोगत्वा अपनी ये जिज्ञासाएं प्रकट करने के लिए विवश होना पड़ता है कि, प्राध्यात्मिक संस्था में किसे आत्मा कहना चाहिए? किस आत्मा की गति होती है? एवं उस आत्मगति का ' इत्थंभूत ' क्या स्वरूप है? ----- ** -आत्मगतिमूलकात्मस्वरूप परिचय आत्मा के यथार्थ स्वरूप को न जानने के कारण ही हमारे सामने उक्त आत्मगति विषयिणी प्रश्न परम्परा उपस्थित होती है । श्रात्मस्वरूप की दार्शनिक मीमांसा करने मात्र से इस प्रश्न परम्परा का समाधान जहाँ सर्वथा असम्भव वहाँ आत्मस्वरूप की वैज्ञानिक व्याख्या से सम्बन्ध रखने वाले स्व - स्व तन्त्र में सर्वथा विभक्त अव्यक्तात्मा, यज्ञात्मा, महानात्मा, प्रज्ञानात्मा, प्राणात्मा, शरीरात्मा आदि तन्त्रयी निश्वयेन प्रश्न परम्परा समाधि के लिए पर्याप्त हैं । आत्मस्वरूप के इस वैज्ञानिक - विभक्ततन्त्रानुगत-स्वरूप के लुप्तप्राय हो जाने से ही उक्त प्रश्न परम्परा ने एक भयावह काण्ड उपस्थित कर रक्खा है । इन सभी आत्मतन्त्रों का निबन्ध के ' आत्मविज्ञानोपनिषत् ' नामक प्रथम खण्ड में विस्तार से वैज्ञानिक विवेचन किया जा चुका है । उस विवेचन के सम्यगवलोकन - समन्वय के अनन्तर उक्त १२ ही प्रश्न सुसमाहित हो जाते हैं । प्रकृतपरिच्छेद में हमें केवल उस आत्मा के स्वरूप में कुछ मीमांसा करनी है, जिसका ' साम्परायिक ' गति नामक आत्मगति, किंवा परलोकगति से सम्बन्ध है । यद्यपि आत्मविज्ञान-पनिषदन्तर्गत ' प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् ' नामक प्रवान्तर प्रकरण में आत्मगतिमूलभूत प्राणात्मा का स्वरूप बतलाया जा चुका है । तथापि एक सर्वथा अपूर्वदृष्टिकोण से सम्बन्ध रखने वाला, प्रकृतपरिच्छेद में मीमांस्य श्रात्मस्वरूप - परिचय अपना एक विशेष महत्त्व रखता है । सापिण्ड्य विज्ञानोपनिषदन्तर्गत ' प्राशौचविज्ञानोपनिषत् ' नामक प्रवान्तर प्रकरण में वीजी - कूटस्थ पुरुष में भुक्त क्रमशः " २१-१५-१०-६-३-१ " इन कलाओं से युक्त सात कोश ( पितृपिण्डकोश ) बतलाते हुए यह स्पष्ट किया था कि इनमें आरम्भ के ६ कोशों की क्रमशः २१-१५-१०-६-३- १ ' इन ५६ कलाओं को ऋण लेकर कूटस्थ पुरुष के शरीर का निर्माण होता है एवं इस षट्पञ्चाशत्कल पितृपिण्ड-कोश के ऋण से उत्पन्न पुत्रशरीर पिता के षट्कोश के प्रवर्ग्यभाग से निष्पन्न होता हुआ षाट्कौशिक है । प्रत्येक व्यक्ति का शरीर इस प्रपत्यदृष्टि से षाट्कौशिक है— ( देखिए आ ० वि ० उ ० पृ ० सं ० २८४ ) । प्रत्येक व्यक्ति की व्यक्तित्वलक्षण अभिव्यक्ति ' श्रात्मा - शरीर ' भेद से दो - दो भागों में विभक्त हैं । साथ ही [ २६ · ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड आत्मगतिमूलकात्म स्वरूपपरिचय दोनों भाग परस्पर नित्य सापेक्ष है । ' यत्रात्मा, तत्र शरीरम्, यत्र वा शरीरं तत्रात्मा ' न्याय से दोनों अविनाभूत हैं । श्रात्मोत्क्रान्ति के अनन्तर शेष बचा हुआ शवशरीर ' श्रियमात्मानमश्रयत ' इस निर्वाचन से युक्तः शरीरमर्यादा से वश्चित है, अतएव उक्त व्याप्ति में कोई दोष नहीं आता । ' श्रियमश्रयत ' लक्षण शरीर आत्म सम्बन्ध से ही शरीर कहलाया है । एवमेव उत्क्रान्त आत्मा भी सूक्ष्म - कारण, शरीरों से ही युक्त रहना है । आत्म सम्बन्ध विच्छेद से जैसे बलसंघातरूप शरीर अव्यक्तबलगम में विलीना होता हुआ ' शरीर ' अभिधा को छोड़ कर केवल अव्यक्त बलसंज्ञा में परिणत हो जाता है, एवमेव शरीरत्रयी के आत्यन्तिक उच्छेद से आत्मा भी विशुद्धरसरूप में परिणत होता हुआ नित्यशुद्धबुद्ध मुक्त परात्पर पुरुष में लींग होता हुआ ' आत्मा ' अभिधा को छोड़ कर केवल अव्यक्त ' रस ' संज्ञा में परिणत हो जाता है । कस्तु-तस्तु और भी सूक्ष्मदृष्टि से विचार करने पर तो हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि, ' आत्मा-शरीर " दोनों की स्वरूप सत्ता, एवं तदनुगत, सापेक्षभाव सत्कार्यवादसिद्धान्त के अनुसार एकान्ततः शाश्वत है । सावस्था में परिणत आत्मा का शरीर बलावस्था में परिणत शरीर हैं । स्स ' बलसापेक्ष है, तो बाल रसापेक्ष है । ऐसा अक्सर कभी नहीं श्राता, जब कि रस, बल का सर्वथा पार्थक्य हो जाय । स्वान शरीर सापेक्ष अमृत - अनिरुक्त - अमूर्त आत्मा, तथा बलप्रधान श्रात्मसापेक्ष - मर्त्य - निरुक्त- मूर्त शरीर, दोनों की समष्टि ही ' शरीरी ' - ' देही ' ' प्रजापति ' ' श्रात्मन्वी ' इत्यादि नामों से व्यवहृत हुई है । जिस प्रकार पूर्व कथनानुसार इस शरीरी का शरीर पितृपिण्डप्रवर्ग्यभोग सम्बन्ध से बाट्कौशिक है, एवमेव आत्म-शरीरसमष्टिलक्षण स्वयं यह ' शरीरी ' भी ' षाट्कौशिक ' ही माना गया हैं । दूसरे पदों में परमात्म-समष्टि लक्षण अध्यात्मसंस्था भी शरीरवत् षाट्कौशिकी बन रही है । अध्यात्म के ( शरीरी के ) इन ६ कोशों का संक्षेप से दिग्दर्शन करना ही आत्मस्वरूप का परिचय कराना है, एवं यही प्रकृत परिच्छेद का मुख्य प्रतिपाद्य विषय हैं । शरीरी में, जिसे हमने ' पुरुष ' भी कहा है, सामान्यतः यद्यपि आत्मा, शरीर में दो भाव ही प्रतीत होते हैं । परन्तु सूक्ष्म द्रष्टा वैज्ञानिकों ने इस पुरुष संस्था में " १ - प्रश्न, २ - प्राण, ३- मन, ४ – विज्ञान, ५ - श्रानन्द, ६- सत्य " इन ६ भावों के दर्शन किए हैं एवं इन्हीं ६ भावों के आधार पर उन्होंने पुरुष-संस्थानों को भी शरीरवत् षाट्कौशिक घोषित किया है । उक्त छत्रों आध्यात्मिक कोशों के हम ' ५-१ ' इस क्रम से अदृश्य - दृश्य की अपेक्षा से दो विभाग करेंगे । सत्य, आनन्द, विज्ञान, मन, प्राण ये पाँच कोश अहश्य हैं, चर्म्मचक्षुओं से इनका प्रत्यक्ष सम्भव नहीं है । अतएव इस पञ्चको समष्टि को ' अन्तः संस्था ' कहा जायगा । अन्न नामक प्रथम कोश, दृश्यं है । अतएव इसे ' बहिः संस्था ' कहा जायगा । इन दोनों संस्थानों में युक्त ६ कोशों के एक दूसरे दृष्टिकोण से १ - ४ - १ ' इस क्रम से तीन विभाग किए जायेंगे । ६ ठा सत्यकोश मुख्य विभाग है, यही ' आत्मा ' है । ५-४-३-२ संख्या वाले आनन्द - विज्ञान- मन - प्राण, इन चार कोशो की समष्टि ' अतः शरीर ' है । एवं १ अन्नकोश ' बहिः शरीर ' । इसी दृष्टि से सत्यकोश आत्मा है, शेष पञ्चकोशसमष्टि ' शरीर ' है,, दोनों की समष्टि ' शरीरी ' है, यही अध्यात्म संस्था है, जिसका प्राधिदैवत पुरुष के साथ समतुलन हो रहा है [ २७ ]

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" श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड श्रात्मगतिमूलकात्म स्वरूपपरिचय ( ५ ) १ - आनन्दः ( ६ ) १- सत्यम् ( ६ ) १ - सत्यम् आत्मा १ ( ५ ) २ - श्रानन्दः ( ४ ) ३ – विज्ञानम् ( ३ ) ४ - मनः - प्रन्तःसंस्था इन्द्रियातीता अन्तःशरीरम् ४ ( २ ) ५ - प्राणः I; ( ४ ) २ - विज्ञानम् ( ३ ) ३- मनः ( २ ) ४ - प्राणः ( १ ) १ - अन्नम् बहिः संस्था ( १ ) १ - अन्नम् ( ६ ) १ - सत्यम्-( ५ ) १ - आनन्दः ( ४ ) २ - विज्ञानम् ( ३ ) ३ - मनः ( २ ) ४ - प्राणः बहिः शरीरम् ( १ ) ५ अन्नम् १ १ आत्मा १ शरीरम् ५. शरीरी -श्रात्मन्वी • १. अन्नमयकोश: ( अन्नम् ) -सत्य - ज्ञान- अनन्तलक्षण, गुहानिहित, परमाकाशप्रतिष्ठित, सच्चिदानन्दघन, सर्वधर्मोपपन्न आधि-दैविक सत्यब्रह्म जहाँ अपने मनः प्रारण वागूगर्भित प्रानन्दविज्ञानमनोमय मुक्तिसाक्षी विद्या भाग से मुमुक्षा द्वारा सृष्टि- ग्रन्थि विमोक का कारण बनता है, वहाँ यही सत्यब्रह्म श्रानन्द- विज्ञान- मनोगभित मनः प्राण वाङ्मय सृष्टिसाक्षी भाग से सिसृक्षाका द्वारा सृष्टि - ग्रन्थि - बन्धन का कारण बनता है । सृष्टिसाक्षी श्श्रानन्द- विज्ञानघन मनोमय प्राणगर्भित वाक् तत्त्व ही सृष्टि ( भूतसृष्टि ) का मूलप्रभव बनता है । आनन्दविज्ञानघन मन से कामना ( सिसृक्षा ) का उदय होता है, जिसका - ' एकोऽहं बहुस्याम् ' ' प्रजायेय ' इन शब्दों में अभिनय किया जाता है । प्राणभाग से तपोलक्षण अन्तर्व्यापार का उदय होता है एवं वाक्भाग से श्रमलक्षण बहिर्व्यापार का उदय होता है । काम तपः श्रम, सृष्टिकर्म्म सहयोगी इन सामान्य सृष्टयनुबन्धनों से सर्वप्रथम ' आकाश ' नामक महाभूत का व्यक्तीभाव होता है | व्यक्तीभाव इसलिए कहना उचित है कि ‘ मनः - प्राण - वाक् ’ समष्टिरूप सृष्टिसाक्षी सत्य ब्रह्म की मनःकला पर प्रतिष्ठित प्राणकला यत् - लक्षण गति है, वाक्कूला जुलक्षण स्थिति है । जूरूपा स्थिति श्राकाश है, यद्रूपा गति वायु ( सुसूक्ष्मसूत्र वायु ) है । दोनों की समष्टि ' यज्जू ' लक्षण ' यजुर्वेद ' है । मनोमयी सत्यब्रह्म कला पर प्रतिष्ठित यजुर्वेद प्राण - वाक् की समष्टिमात्र है । इनमें अविकुर्वारण प्रारण तो नित्य मनः कला में ही अन्तर्भूत है एवं विकुर्वाणा वाक्कला ( आकाश ) भूतमर्थ्यादा में समाविष्ट है । वही व्यक्तरूप में आकर अपने वाग्भाग से ‘ आकाश ' रूप में परिणत हो जाता है । इस प्रकार ' तस्माद्वा एतस्मादात्मनः ' के ' श्रात्मन: ' से ' मनोगभितप्राणेन ' यह तात्पर्य्यं निकलता है एवं ' आकाशः सम्भूतः ' वाक्य से ' वाचो व्यक्तिभावः ' यह तात्पर्य्यं निकलता है । इसी से यह भी सिद्ध हो जाता है कि ' मनः प्राणवाङ्मय ' सत्यब्रह्म का मनःप्राण भाग श्रात्मसृष्टि की प्रतिष्ठा [ २८ ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड • श्रात्मगतिमूलकात्मस्वरूपपरिचयं । है एवं विकुर्वाण वाग्भाग शरीरसृष्टि की प्रतिष्ठा है । वाङ्मय, किंवा वागुरूप आकाश नामक प्रथमभूतं । ही बलग्रन्थि तारतम्य से विकृत - परिणामवाद दृष्टया उत्तरोत्तर चार भूतों का जनक बनता हुआ पाच-भौतिक विश्वस्वरूप में परिणत हो रहा है, जैसा कि ' वाचीमा विश्वा भुवनान्यपिता ' ' प्रथ्रो वागेवेदं सर्व-' वाग्विवृताश्च वेदा: ' इत्यादि श्रुतियों से प्रमाणित है । इसी सम्बन्ध में एक बात का स्पष्टीकरण और कर लेना चाहिए । सत्यब्रह्म का वास्तविक स्वरूप अशेषबलगभितरसात्मक ही माना गया है, जिसे कि विज्ञान भाषा में ' परात्पर ' नाम से व्यवहृत किया गया है । यही परात्परब्रह्म श्रागे जाकर मायाबलोदय से प्रानन्द - विज्ञान- मन - प्राण - वाक्रूप में परिणत हो जाता है । प्रानन्दादि पाँचों चितियाँ उस रसमूर्ति ब्रह्म पर बलचितियाँ हैं । इन पाँच बल चितियों से, ही पाँच विवर्तभावों में परिणत हो रहा है । जिस प्रकार अवारपारीण एक सूत्र के आधार पर पाँच प्रतिष्ठित रहते हैं, पाँचों भिन्नों में वह सूत्र भिन्नवत् प्रतिष्ठित रहता हुआ अभिन्न है, एवमेव अवार पारीण एक अखण्ड परात्पर के आधार पर प्रतिष्ठित आनन्दादि पाँचों चितियों में भिन्नवत् प्रतिष्ठित रहता हुआ वह अभिन्न है, एकात्मा है । इसी आधार पर ' एतेदात्म्यमिदं सर्वम् ' - ' सर्वखल्विदं ब्रह्म ' इत्यादि सिद्धान्त प्रतिष्ठित हैं । उस एक का नाम आत्मसत्य है । यही आनन्दादि बलसत्यों का आधारभूत ' सत्यस्य सत्यम् ' है । इस सत्यस्य सत्यं प्रवारपारीण अभिन्न आत्मा पर सर्वप्रथम श्रानन्दचिति है । अनन्तर क्रमशः विज्ञान- मन - प्राण - वाक् ये चार चितियाँ प्रतिष्ठित हैं । ' तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्रविशत् ' न्याय से सत्य आनन्द में, सत्य - आनन्द विज्ञान में, सत्यानन्दविज्ञान मन में, सत्यानन्दविज्ञानमन प्रारूप में, सत्यानन्द-विज्ञानमनःप्राण वाक् में अन्तर्भूत हैं । यही क्रम वाक् ( आकाश ) भूत से उत्पन्न वाय्वादि शेष भूतसर्गों में समझना चाहिए । इसी सृष्ट - प्रविष्ट मर्यादा से सर्वत्र सब अवस्थाओं में उसकी उपलब्धि सम्भव है, जैसा कि- ' भूतेषु भूतेषु विचित्यधीराः प्रेत्यास्मालोकादमृता भवन्ति ' से स्पष्ट है । इस स्थिति को लक्ष्य में रख कर ही क्रमप्राप्त ' अन्नमय कोश का विचार कीजिए । आत्मा ( मनोगभितप्राण ) से आकाश ( वाक् ) उत्पन्न ( व्यक्त ) हुआ । आकाश से बलग्रन्थि द्वारा वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथिवी ( मिट्टी ) उत्पन्न हुई । आकाश - वायु - अग्नि - जल सहयोग से पार्थिव भाग से गोधूम - यव- तन्दुलादि औषधियाँ उत्पन्न हुई । प्रौषधियों के वितुषीकरण - पेषण-परिपाकादि से भोग्य योग्य अन्न का स्वरूप निष्पन्न हुआ । इस अन्न में उसी सृष्टप्रविष्ट न्याय से पूर्व के सब पर्व गर्भीभूत हैं । तभी तो अन्न को ' ब्रह्म ' कहना अन्वर्थ बनता है । इस अन्न की पुरुषाग्नि में आहुति हुई । पुरुषाग्नि में हुत अन्न षड्धात्वनन्तर रेतोरूप में परिणत हुआ । इस रेत की योषिदग्नि में आहुति हुई । योषिदग्नि पुरुष रेत, दोनों के समन्वय से गर्भाधान हुआ । चान्द्रसम्वत्सर में गर्भपुष्टि हुई । दश-मासान्तर वही सिक्तरेत पुरुष ( अपत्य ) रूप में परिणत होकर भूमिष्ठ हुआ, जिसे हम प्रत्यक्ष दृष्टि से ' अन्नरसमय ' कह सकते हैं । पञ्चकोशगर्भित यही पुरुष ( शरीर ) पहला अन्नरसमयकोश है । इसी सम्बन्ध में यह भी स्पष्ट कर लेना चाहिए कि, यद्यपि सभी पार्थिव जड़ - चेतन पदार्थ बाह्यस्तरापेक्षा अन्नरसमय ' बनते हुए ' पुरुष ' कहे जा सकते हैं, परन्तु किसी विशेष कारण से ' पुरुष ' शब्द केवल मानवर्ग में ही आगे जाकर रूढ हो गया है । यह विशेष कारण है— पूर्ण आधिदैविक ब्रह्म की पूर्ण मात्रात्रों का मानवसर्ग-[ २६ ]

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विज्ञान चतुर्थखण्डे आत्मगतिमूलकात्मस्वरूपपरिचय में समन्वय इतर सर्गों में जहाँ मात्रात्पता के साथ - साथ मात्रा ह्रास है, वहाँ मानव सर्ग में केवल मात्रा-पता ही है । इस अल्पता के अतिरिक्त प्राधिदैविक पूर्णेश्वर विराट् प्रजापति की सम्पूर्ण मात्रा का वर्ग में समावेश है । इसी आधार पर इसे इतर सर्गापेक्षया प्रजापति से नेदिष्ठ ( सम सम्बन्धी, समतुलित ) माना गया है, जैसा कि – ' पुरुषो वै प्रजापतेर्ने दिष्ठम् ' । शत ० ४ | ३ | ४ | ३ ) इत्यादि ब्राह्मण श्रुति से प्रमाणित है । इसी पूर्णता के आधार पर ' पुरुष ' शब्द मानवर्ग में ही रूढ हो गया है । रेतः सेक द्वारा उत्पन्न पूर्णमूर्ति अन्नरसमय यही पुरुष शारीरचिति - वैशिष्ट्य से आगे जाकर ' सप्तपुरुष पुरुषात्मकपुरुष ' कहलाया है । शिर, प्रात्मा, पक्ष, पुच्छ इन चार संस्थानों के भेद से यह चित्य-पुरुष सप्तचिति रूप में परिणत हो रहा है, जिसका शतपथभाष्य के चयन विज्ञान - प्रकरण में विस्तार से प्रतिपादन हुआ है । सर्वाङ्ग शरीर में से मस्तक को छोड़कर शेष भाग का विचार कीजिए । इस शेष भाग को समान रूप से समतुलित सात भागों में विभक्त कर दीजिए । वाम हस्तपादलक्षण उत्तरपक्ष में सप्तभा-गात्मक अन्नरस का एक भाग मुक्त है । एवमेव दक्षिणहस्तपादलक्षण दक्षिरणपक्ष में एक भाग भुक्त है । मूलग्रन्थि से आरम्भ कर कण्ठप्रदेश पर्यन्त व्याप्त मध्याङ्ग ( धड - कबन्ध ) में चार भाग भुक्त हैं । मेरुदण्ड ( रीढ की हड्डी ) की श्रान्तिम पश्चिम सीमा में प्रतिष्ठित, शरीरयष्टि को वितत रखने वाली त्रिकास्थ ही पुच्छ प्रतिष्ठा है, इसी में एक भाग भुक्त है । वाम - दक्षिण हस्तपाद से गति तथा कर्म का उसी प्रकार सवामन होता है, जैसे पक्षी अपने दोनों पक्षों से स्वकर्म्म तथा गति में समर्थ होता है । इसी सादृश्य से, एक - एक भागात्मक बाम - दक्षिण हस्त पादों को उत्तर - दक्षिण पक्ष मान लिया गया है । जिस प्रकार चेतनाधातुलक्षण प्रा. मसत्ता से शरीरयष्टि विधृत रहती है, एवमेव चतुर्भागात्मक मध्याङ्ग के आधार पर ही शिर - पाद- हस्त आदि इतर अवयव प्रतिष्ठित रहते हैं, मध्याङ्गोपलक्षित उदरभुक्त रस से ही सर्वाङ्ग-शरीर का पोषणरक्षण होता है अतएव भाग चतुष्टयात्मक इस मध्यतनू को ' आत्मा ' कह दिया गया है । यह श्वात्म शब्द मध्याङ्गलक्षण तनू का ही वाचक है, जिसके लिए - " श्रात्मा वै तनूः " ( श ० ६ | ७ | २ | ६ ) निगम प्रसिद्ध है । जिस प्रकार पक्षी का सर्वाङ्गशरीर उसके पुच्छभाग पर प्रतिष्ठित होकर उर्ध्वं वितत रहता है, एवमेव पुरुष का शरीर इसके त्रिकास्थि पर प्रतिष्ठित होकर ऊर्ध्वं वितत तना ) रहता है । इसी सादृश्य से इसे ' पुच्छं प्रतिष्ठा ' कह दिया गया है । इन सात पुरुषों का जो सार भाग ( श्री भाग, रस भाग ) है, वही आठवाँ शिरोभाग है, जिसका परिमाण तो एक भागात्मक है, किन्तु एक ही भाग में सातों पुरुषों की समान श्री प्रतिष्ठित है । इसी सप्त श्री सम्बन्ध से इसे ' शिर ' कहा गया है - ( देखिए शत ६।१।१ ) । इस प्रकार ठीक सुपर्णपक्षी ( गरुड ) की भाँति इस अन्नरसमय पुरुष का वितान हुआ है । इसी आधार पर यह पुरुष ' सुपर्ण ' नाम से व्यवहृत हुआ है । इस सुपर्ण की परलोकगति का विश्लेषण करने वाला पुराण भी सुपर्णपुराण ( गरुडपुराण ) नाम से व्यवहृत हुआ है । सर्वमात्रगर्भित इसी अन्नब्रह्म से उक्त क्रमानुसार उस सम्पूर्ण प्रजा की उत्पत्ति होती है, जो पृथिवी पर ( पार्थिव शरीर से ) प्रतिष्ठित है । अन्न से उत्पन्न होकर प्रन्नादान लक्षण भैषज्य यज्ञ से ही यह प्रजा यावदायुर्भोग पर्य्यन्त जीवित है एवं अन्ततः इस अन्नब्रह्म ( पञ्चभूत ) में इसका लय हो जाता है । यद्यपि पांचों भूतों में पूर्व - पूर्वभूत, उत्तर- उत्तरभूत की अपेक्षा ज्येष्ठ तथा श्रेष्ठ माना गया है तथापि पार्थिव [ ३० ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिमूलकात्मस्वरूपपरिचय अन्न को इसलिए इन पाँचों भूतों की भी अपेक्षा हम ज्येष्ठ कह सकते हैं कि इसमें पाँचों की मात्रा समाविष्ट है । तभी तो इसे ' सर्वौषध ' कहना अन्वर्थ बनता है । इसी सर्वोषधरूप अन्न भूत ( भूतभौतिक सत्व प्रजा ) उत्पन्न होते हैं । इसी से इनकी प्रायतन वृद्धि होती है । चूंकि प्रजावर्ग द्वारा यह खाया जाता है, अतः ' प्रद्यते ' इस निर्वचन से भी इसे ' अन्न ' कहा जा सकता है । साथ ही यही अन्न चूंकि स्वस्वरूप निर्माण के लिए भूतों को भी खाया करता है, साथ ही अन्त समय में भूतरूप से यह प्रजा को भी अपने में लीन कर लेता है, अतएव ' अति ' इस निर्वचन से भी इसे. ' अन्न ' कहना अन्वर्थ बनता है । यही पाञ्चभौतिक शरीरात्मक, प्रत्यक्षदृष्ट इस पहले अन्नमयकोश का संक्षिप्त रूप प्रदर्शन है । जिसका निम्नलिखित शब्दों में स्पष्टीकरण हुआ है-- " सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म, यो वेद निहितं गुहायाम् । सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणाविपश्चिता " इति । २ - " तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः, आकाशाद्वायुः, वायोरग्निः, अग्नेरापः, अद्द्भ्यः पृथिवी, पृथिव्या श्रोषधयः, श्रोषधीभ्योऽनं, अन्नाद्रेतः, रेतसः पुरुषः । स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः । तस्येदमेव-शिरः, अयं दक्षिणः पक्षः, श्रयमुत्तरः पक्षः, अयमात्मा, इदं पुच्छं-प्रतिष्ठा । " ३ – “ अन्नं ब्रह्म ेति व्यजानात् अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते, या काश्र्व पृथिवीं श्रिताः । अथोन्नेनैव जीवन्ति, प्रथैनदपि यन्त्यन्ततः ॥ "

- " अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठं तस्मात् सर्वौषधमुच्यते ।

सर्वं वै ते ऽन्नमाप्तुवन्ति येऽन्नं ब्रह्मोपासते ॥

अन्नाद् भूतानि जायन्ते जातान्यनेन वर्द्धन्ते । प्रद्यतेऽत्ति च भूतानि तस्मादन्नं तदुच्यते ॥ ” ( तै ० उ ० २।१-२ ) । [ ३१ ]

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आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 39 का मूल पृष्ठ
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्डे १ दक्षिणहस्तः पक्षः दक्षिणः H अयं दक्षिणपादः २. प्राणमयकोशः ( प्राणः ) आत्मगतिमूलकात्मस्वरूपपरिचय इदं शर मध्याङ्गम् आ अयमुत्तरः पक्षः उत्तरहस्तः -उत्तरपादः त्मा इदं प्रच्छं प्रतिष्ठा ** ** [ ३२ ] सप्तपुरुषात्मक पुरुषावच्छिन्नस्यान्नमयकोशस्य प्रतिकृतिः ( सप्तपुरुषपुरुषात्मकं - सप्तचितिमयं - मर्त्य शरीरम् ) पार्थिव औषधियों से सम्पन्न अन्न पञ्चभूतात्मक है एवं इसके गर्भ में क्रमश: प्राण - मन - विज्ञान-आनन्दमयकोश प्रतिष्ठित हैं । अन्नमयकोश वाङ्मय है । यह वाक्तत्त्व ( वाङ्मय शरीर ) विकुर्वाणध * से क्षण - क्षण परिवर्तित होता हुआ क्षरकुटात्मक है । मानना पड़ेगा कि अवश्य ही इन वाङ्मय क्षरकूटों की समष्टिरूप शरीर को एकसूत्र में बद्ध रखने वाला कोई न कोई सूत्र है । वही सूत्र ' सूत्रवायु ' नाम से प्रसिद्ध है, जिसे प्राणवायु माना गया है ( देखिए शत ० ८ | ४ | १८ ) । क्षरकूट विधरण - सम्बन्ध से ही प्राणतत्त्व ' विधर्त्ता ' कहलाया है । वाङ्मय अन्नमयकोश यदि ' उपहित ' तो तदाधारभूत प्रारण ' हित ' है, जैसा कि निम्नलिखित वचन से प्रमाणित है—

पृष्ठ 40

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 40 का मूल पृष्ठ
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्डं श्रात्मगतमूलकात्मस्वरूपपरिचय " तमब्रवीत् कस्मिस्त्वोपधास्यामि? इति । हिते - एवेत्यब्रवीत् । प्राणो वा हितम् । प्राणो हि सर्वेभ्यो भूतेभ्यो हितः । तदाहुः किं हितं किमुपहितं? इति । प्रारण एवं हितं वागुपहितम् । प्राणे हीयं वागुपेवहिता, प्राणस्त्वेव हितम् अङ्गान्युपहितं प्राणे ही मान्यङ्गान्युपेव हितानि । ” ( शत ० ६ १ | २ | १४ | १५ ) । भूतमयीवाक् का आधार यही देवलक्षण प्रारण है । ' देवतानि च भूतानि ' के अनुसार दोनों अभिन्न हैं । यदवच्छेदेन पाञ्चभौतिक वाङ्मय अन्नमयकोश व्याप्त है, तदवच्छेदेनैव ( लोम - केश, नखाग्रभागों को छोड़ कर ) यह सूक्ष्म प्राणतत्त्व व्याप्त है । चूंकि यह इस भूत शरीर की प्रतिष्ठा है, अतएव इसे शरीर पेक्षया ' आत्मा ' कहा जा सकता है । चूंकि प्रत्यक्षदृष्ट शरीर की अपेक्षा यह स्व - प्रसङ्गधर्म से इन्द्रियातीतः है, अतएव इसे ' अन्तरात्मा ' कहा जा सकता है । इस अन्तरात्मलक्षण प्राणतत्त्व से यह अन्नमय कोश परिपूर्ण है । शरीर के जिस अवयव में यह प्राण मूच्छित हो जाता है, वही भाग शवशरीरावयवत् शून्य बन जाता है । प्राणनिर्गमन ही प्रर्द्धाङ्ग ( फालिज ) रोग का मूल कारण है । साथ ही यह भी स्मरण रखना चाहिए कि यह शरीरप्राण इन्द्रिय - मन - बुद्धि आदि के व्यापारों से तथा रोमकूपों से निरन्तर विस्रस्त ( खर्च ) भी होता रहता है । इस विस्रस्तं की क्षतिपूर्ति के लिए प्राणाधान अपेक्षित है । प्राणतत्त्व साक्षात्कर्त्ता महर्षि जहाँ साक्षात् रूप से प्राणाकर्षण द्वारा इस विशिष्ट प्राण का सन्धान करने में समर्थ हो जाते हैं, वहाँ प्राणस्वरूप अपरिचित अस्मदादि सामान्य मनुष्यों को इस प्राणक्षतिपूर्ति के लिए प्राण से नित्ययुक्त अन्न द्वारा ( भोजन द्वारा ) अहरहर्यज्ञ ( अन्नयज्ञ ) का आश्रय लेना पड़ता है । " सर्वाणि हवा इमानि भूतानि - अन्नमेव प्रतिहरमाणानि जीवन्ति " ( छा ० उ ० १1११1 ९ ) इत्यादि अनुसार अन्नाहुति ही विस्रस्त प्राण के पुनः सन्धान की मूल प्रतिष्ठा है । अन्नप्राण के इसी घनिष्ठ सम्बन्ध का विश्लेषण करते हुए ऋषि ने मीमांसा की है कि - " कितने एक अन्न को ही ब्रह्म ( शरीरप्रतिष्ठा ) कहते हैं | परन्तु यह कथन इसलिए अमान्य है कि, विना प्राण सम्बन्ध के अन्न नीरस हो जाता है । यदि हुत अन्न का प्राण अपनी सीमा में ग्रहण नहीं करता है, तो तत्काल अन्न बाहर निकल जाता है, वान्ति ' हो जाती है । फलतः केवल अन्न को ही प्रतिष्ठा नहीं माना जा सकता । कितने एक विद्वानों का कथन है कि प्राण ही प्रतिष्ठा है । परन्तु यह कथन भी इसलिए समीचीन नहीं माना जा सकता कि बिना अन्ना-दान के प्राण उसी प्रकार ( अपने स्वाभाविक विस्र सन से ) मूच्छित हो जाता है, सूख जाता है, जैसे कि बिना जलसेंचन के औषधि वनस्पतियाँ । अन्न भी ब्रह्म नहीं, प्रारण भी ब्रह्म नहीं, फिर किसे प्रतिष्ठा माना जाय? ऋषि उत्तर देते हैं - अन्तर्याम्सम्बन्धावच्छिन्न प्राण का अन्न से सम्बन्ध होने पर दोनों के समन्वय से अन्न - प्राणात्मक जो एक अपूर्व भाव निष्पन्न होता है, वही प्रतिष्ठा है— " अन्नं ब्रह्म ेत्येक आहुः । तन्न तथा । पूयति वा अन्नमृते प्राणात् । प्राणो ब्रह्म ेत्येक आहुः । तन्न तथा । शुष्यति वै प्राणः, ऋतेऽन्नात् । एते ह त्वेव देवते एकधाभूयं भूत्वा परमतां गच्छतः । " ( बृ ० ग्रा ० ५।१२।१ ) । [ ३३ ]