Part IV Atmgativigyanopanishta Part 4 — पृष्ठ 221–230

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४ · पृष्ठ 221–230

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड आत्मगतिनिमित्तानि शुत्री से सम्बन्ध रखने वाले त्रैलोक्य - त्रिलोकीरूप पार्थिवलोकविवर्त्त का स्पष्टीकरण किए बिना देवस्वर्गस्वरूप विश्लेषण असम्भव था, अतएव प्रसङ्गोपात्त उसका दिग्दर्शन कराना आवश्यक समझा गया । भूपिण्ड से सम्बद्ध भूमहिमा में ' २१ - ३३ - ४८ ' सोमभेद से तीन त्रिवृत् - लोकों का भोग बतलाया गया है । इन तीनों त्रिवृत्पार्थिवलोकों में से वह पार्थिवलोक माना जायगा, जिसमें सौरसम्वत्सर ज्योति का उपभोग हो रहा होगा । प्रकरणारम्भ में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि, सौरज्योतिर्मय नियत प्रदेश ही स्वर्ग-लोक है एवं भूपिण्ड से उत्क्रान्त कम्र्मात्मा का इस लोक में गमन करना ही देवस्वर्गगति है । महिमापृथिवी का जो भाग सौरसम्वत्सरमण्डल में भुक्त रहता है, वही पार्थिवप्रदेश ( जिसे सौरज्योतिर्भुक्ति से सौरप्रदेश भी कहा जा सकता है ) स्वर्गलोक है । यही नियतप्रदेश अथर्व परिभाषानुसार ' स्कम्भ ' नाम से व्यवहृत हुआ है, जिसका दो शब्दों में विश्लेषण कर देना अनावश्यक न माना जायगा । " यथाग्निगर्भा पृथिवी तथा द्यौरिन्द्रेणर्गाभरणी " इस श्रोतसिद्धान्त के अनुसार भूपिण्ड अग्निगर्भित है ( देखिए शत ० ब्रा ० १४६४ / २१ ) भूकेन्द्र से २४ अंश उत्तर २४ अंश दक्षिण, इस ४८ अंश के परिसर में अग्निष्टोम ( अग्निस्तम्भ ) प्रज्ज्वलित है । यहाँ से ऊर्ध्व वितत यह अग्निस्तम्भ सौरसम्वत्सर-मण्डलपर्य्यन्त व्याप्त हो रहा है । सौरसम्वत्सरमण्डल के जिस नियत ज्योतिर्मय प्रदेश से यह पार्थिव अग्निस्तम्भ समतुलित है, वह सौर सम्वत्सरमण्डल ' नवाहयज्ञ ' नाम से प्रसिद्ध हैं । पार्थिव १७ वें ग्रहर्गण पर हमने अग्नी - सोम का यजन सम्बन्ध बतलाया है । इस १७ वें अहर्गण से आरम्भ कर २५ वें अहर्गण -पर्यन्त अहर्गण में सौर इन्द्र तथा पार्थिव अग्निज्योति दोनों का समन्वय हो रहा है । इन & अहर्गणों १७ १८ १६ २० के सम्बन्ध से ही यह ऐन्द्राग्नयज्ञ ' नवाहयज्ञ ' कहलाया है । इस नवाहयज्ञ में १ २ ३ ४ २१ २२ २३ २४ २५इन अहर्गणों का भोग हो रहा है । इस नवाहयज्ञ के केन्द्र में पृथिवी का ५ ६ ७ द ह ११ वाँ अहर्गण है ) सूर्य्य प्रतिष्ठित है । इसी आधार पर - ' एकविंशो वा इस श्रादित्यः ' कहा गया है । इस नवाह यज्ञमण्डल में सौरज्योति का पूर्ण साम्राज्य रहता है प्रतएव पुराणपरिभाषा में यह यज्ञमूर्ति विष्णु ' शुक्लाम्बरधर, श्वेत पनिवासी, अपत्नीक, सत्यनारायण भगवान ' नाम से उपवरित है, जैसा कि गीता -भूमिकान्तर्गत ' भक्तियोगपरीक्षा ' पूर्वखण्ड में विस्तार से प्रतिपादित है । यही नवाहयज्ञ ' स्कम्भ ' है । स्तम्भ . ही स्कम्भ नाम से व्यवहृत हुआ है । यही सम्वत्सरात्मक ज्योतिर्म्मय ऐन्द्राग्नस्कम्भ देवस्वर्ग है, जिसमें ३ विष्टप्स्वर्ग एवं ७ देवस्वर्गभुक्त हैं । नवाह यज्ञ के अहर्गणों में से १७ वाँ अहर्गण ' आहवनीयस्वर्ग ' है, इसी को महर्षि कठ ने ' नाचि-केतस्वर्ग ' नाम से व्यवहृत किया है, जैसा कि कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य के स्वर्ग्याग्नि प्रकरण में विस्तार से प्रतिपादित है । ज्योतिष्टोमा परंपर्य्यायकं सोमयाग से यही स्वर्ग प्राप्त होता है । २१ वें अहर्गण पर सूर्य्य प्रतिष्ठित है । केन्द्रावच्छेदेन यही प्रदेश ( हृत्प्रदेश ) ' नाकस्वर्ग ' कहलाया है । उक्त स्कम्भ की प्रतिष्ठा ( केन्द्र ) यही नाकस्वर्ग है, जो कि ज्योतिर्नय में ' कदम्ब ' नाम से भी व्यवहृत हुआ है । यही विज्ञानभाषा में ' ब्रध्नस्य विष्ट ' कहलाया है । २५ वाँ अहर्गण सौम्यविद्युत् ( ग्रात्मलक्षण चिद्विद्युत् ) से युक्त । यही [ १६४ ]

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श्राद्ध विज्ञान चतुर्थ खण्ड नवाहयज्ञमण्डल परिलेख: -आत्मगतिनिमित्तानि प्रत्न स्वर्गः विष्टप इन्द्र २४ रोचन काश्म स्वर्ग. २३ → प्रद्यौः मुच्य स्वर्ग: २२ वाकण स्वर्ग: नाक स्वर्ग: -२१ ऐन्द्र: ऐन्डाउन स्वर्गः नाचिकेत स्वर्ग : ब्रह्मविष्ण = २०. अपराजित: ऐन्द्र स्वर्ग: रए → अपरोदक: वायव्यस्वर्ग: अग्नेयस्वर्ग:: सौर सम्वत्सरमण्डल के जिस नियत ज्योतिर्मय प्रदेश से पार्थिव अग्निस्तम्भ समतुलित है ' नवाहयज्ञ ' नाम से प्रसिद्ध है । इस नवाहयज्ञ में " १७ १८ १ ९ २० २१-२२-२३-२४-२५ ” इन, वह 8 अहर्गणों सौर सम्वत्सरमण्डल रहा है । इस नवाह्यज्ञ के केन्द्र ( पृथिवी का २१ वाँ अहर्गण ) में सूर्य प्रतिष्ठित है । इस सम्वत्सरात्मक का भोग हो ऐन्द्राग्नस्कम्भ देवस्वर्ग में ३ ( १७- २१ - २५ ) त्रिविष्टप् स्वर्ग व ७ ( १८-१६- २०-२१-२२-२३-२४ ज्योतिर्म्मय ) देवस्वर्ग हैं । श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर ।

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि ' प्रत्नस्वर्ग ' नाम से प्रसिद्ध है । याज्ञिक परिपाषा में यही ' अविवाक्यमहः ' ' महाव्रतम् ' इत्यादि नामों से व्यवहृत हुआ है । इस प्रकार स्कम्भात्मक 8 अहर्गणों में से उपक्रमस्थानीय सप्तदश ( १७ ) मध्यमस्थानीय एकविंश ( २१ ), उपसंहारस्थानीय पञ्चविंश ( २५ ) ये तीनों क्रमश: ' नाचिकेतस्वर्ग, नाकस्वर्ग, प्रत्नस्वर्ग ' नामों से व्यवहृत हुए हैं । नाचिकेतस्वर्ग ' ब्रह्मविष्टप् ' है, नाकस्वर्ग ' विष्णु विष्टप् ' है, प्रत्नस्वर्ग ' इन्द्रविष्टप् ' है । तीनों की समष्टि के लिए ही ' त्रिविष्टप्रस्वर्ग ' नाम से व्यवहृत हुआ है । ( १ ) २५ – प्रत्नस्वर्ग: ( वैद्युत: - इन्द्रविष्टप् ) → अपिवाक्यमहः, ( २ ) २१ नाकस्वर्गः ( ऐन्द्र: - विष्णुविष्टप् ) — ब्रध्नस्य विष्टप् + त्रिविष्टपस्वर्ग ( ३ ) १७ - नाचिकेतस्वर्ग: ( आग्नेयः - ब्रह्मविष्टप् ) + आहवनीयः ' उक्त तीन विष्टपुस्वर्गों के अतिरिक्त सात देवस्वर्ग हैं । ' देवस्वर्ग ' शब्द से सामान्यतः इस सप्तक काही २३. २४ ग्रहण किया जाता है । १८ १६ २० २१ २२ नवाहयज्ञ में भुक्त ये सात १ २ ३ ४ ५ ६ ७ अहर्गणात्मक ज्योतिः स्थान ही ' सप्त वै देवस्वर्गा: ' हैं । इस सम्बन्ध में यह स्मरण रखना चाहिए कि २१ स्थान का त्रिविष्टपस्वर्ग में भी अन्तर्भाव है एवं सप्तदेवस्वर्ग में भी अन्तर्भाव है । विष्टस्वर्गात्मक २१ प्रदेश से सूर्य्यं केन्द्र अभिप्रेत है एवं सप्तस्वर्गभुक्त २१ प्रदेश से सौरपार्थिवज्योतिर्भुक्त प्रदेश मात्र अभिप्रेत है । इस प्रकार १७ से २५ पर्य्यन्त वितत ज्योतिर्मय नवाह्यज्ञात्म स्कम्भ में ३ विष्टप्स्वर्गभुक्तहैं एवं ७ देवस्वर्गभुक्त हैं । ६ अहर्गणों में १८. १६ २० ये तीन अहर्गणात्मक साममण्डल ( स्वरतत्त्वात्मक-१ २ ३ मध्यस्थ सूर्य्य सम्बन्ध से ) ' प्राक्स्वरसाम ' कहलाए हैं एवं २२ २३ २४ १ २ ३ये तीन मण्डल ' उत्तरस्वर-साम ' कहलाए हैं । ये ही स्वरसाम सूर्य्यग्रहण के प्रवर्तक बनते हैं, जैसा कि ' वेदस्य सर्वविद्यानिधानत्वम् ' निबन्ध में विस्तार से प्रतिपादित है । निष्कर्ष यही हुआ कि, स्कम्भ ही स्वर्गलोकहै । यह यही पुण्यस्कम्भ ( धर्मस्तम्भ ) है, जिसके आधार पर निराधार छायापृथिवी प्रतिष्ठित हैं । निम्नलिखित परिलेख से नवाहयज्ञमण्डलात्मक स्वर्गस्वरूप गतार्थ बन रहा है -[ १६५ ]

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श्राद्ध विज्ञान चतुर्थं खण्ड wwwww २५ – इन्द्रविष्टप् २४ रोचनः ( ब्रह्मस्वर्गः ) ७ ( १ ) २३ प्रद्यौः ( मुच्युस्वर्गः ) ६ ( २ ) २२ अधिद्यौः ( वारुणस्वर्गः ) ( ३ ) २१ - विष्णु विष्ट २१ ऐन्द्र: ( ऐन्द्राग्नस्वर्ग ) ( ४ ) २० - अपराजितः ( ऐन्द्रस्वर्गः ) ३ ( १ ) १ → अपरोदकः ( वायव्यस्वर्गः ) २ ( २ ) १८ ऋतधामाः ( आग्नेयस्वर्गः ) १ ( ३ ) १७ – ब्रह्मविष्टप् सामानः त्रयः ) स्वरसामानः प्राक् ( स्वरसामानः त्रयः ) स्वरसामानः उत्तर ( श्रात्मगतिनिमित्तानि " सप्तस्वर्गो वै देवलोकः " * ' देवस्वर्ग ' कहाँ है? सौर सम्वत्सर का कौनसा नियत प्रदेश स्वर्ग कहलाया है? इत्यादि प्रश्नों ' के समाधान के साथ देवस्वर्गनिरुक्ति विश्राम ले रही है । ' नवाहयज्ञ ' सम्बन्ध से देवस्वर्ग भी माने जा सकते हैं, यदि त्रिविष्टपस्वर्ग दृष्टि से संख्या का संकलन किया जाता है, तो देवस्वर्ग १० भी माने जा सकते हैं । २४–२३–२२ एवं २०- १६-१८ इन ६ प्रागुत्तरस्वरसामों को भी स्वर्ग कहा जा सकता है । मध्यस्थ सूर्य्य भी स्वर्ग माना जा सकता है । सूर्य्यप्रतिष्ठारूप स्वरतत्त्व को भी स्वर्ग कहा जा सकता है । महापृथिवी के १७ वें अहर्गण से आरम्भ कर २५ वें अहर्गण पर्य्यन्त व्याप्त ज्योतितत्त्व भी स्वर्ग माना जा सकता एवं इस महिमापृथिवी की दृष्टि से यह भी कहा जा सकता कि, " पृथिवी पर देवस्वर्ग प्रतिष्ठित हैं । ' निम्नलिखित श्रौतवचन दृष्टिकोण भेदभिन्ना स्वर्ग की इन्हीं परिभाषाओं का स्पष्टीकरण कर रहे हैं-" स यदाह स्वरोऽसीति - सोमं वा एतदाह । एष ह वै सूर्यो ( ज्योतिः ) भूत्वाऽमुस्मिल्लोके स्वरति । तद्यत् स्वरति तस्मात् स्वरः । तत् स्वरस्य स्वरत्वम् । ” ( गो ० ब्रा ० पू ० ५।१४ ) । " य श्रादित्यः, स्वर एव सः । " ( जै ०० ३।३३।१ ) । [ १६६ ] +

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड श्रात्मगति निमित्तानि " इमान् वै लोकान् स्वरसामभिरस्पृण्वन् । तत् स्वरसाम्नां स्वरसामत्वम् ” ( ऐ ० ब्रा ० ४।१६ ) । " एतैर्ह वा त्रय आदित्यं तमसो ऽ स्पृण्वन् । तद्यत् - अस्पृण्वन् तस्मात् स्वरसामानः । ” ( को ० ब्रा ० २४।३ ) । " स्वर्भानुर्वा श्रासुर आदित्यं तमसाऽविध्यत् । तं देवाः स्वरैरस्पृण्वन् । यत् स्वरसामानो भवन्ति, श्रादितस्य स्पृत्यै । " ( तां ० ब्रा ० ४।५।२ ) । " त्रयः स्वरसामानः - विश्वजित्, महाव्रतः प्रतिरात्रश्च । " ( ब ० ब्रा ० ३।१२ ) । " स्वर्गो वै लोकः स्वरसाम । " ( कौ ० ब्रा ० १२।५ ) । " उपरीव सुवर्गो ( स्वर्गो ) लोक: । " ( तै ० ना ० ३।१।१।५ ) । " परो वा अस्माल्लोकात् स्वर्गोलोकः । ” ( ऐ ० ब्रा ० ६।२० ) । " प्रतिकूलमिव हीतः स्वर्गोलोकः । " ( तां ० ग्रा ० ६ । ७।१० ) । " एकविंशो वा इतः स्वर्गोलोकः । " ( तै ० ब्रा ० ३।१२।५।७ ) । “ यावद्वै सहस्राङ्गाव उत्तराधरा इत्याहुः, तावदस्मात् लोकात् स्वर्गो लोक इति । तस्मादाहुः - सहस्रयाजी वा इमान् लोकान् प्राप्नोति । " ( तां ० ब्रा ० १६ | ८ | ६ ) । " स्वर्गो वै लोकः सूर्य्यो ज्योतिरुत्तमम् । ” ( शत ० ब्रा ० १२।६।२।८ ) । " स्वर्गो व लोको ब्रध्नस्यविष्टप् । ” ( ऐ ० ब्रा ० ४।४ ) । " स्वर्गो वै लोको नाकः । " ( शत ० ६ । ३ । ३ । १४ ) । " अथ यत् परं भाः ( सूर्य्यस्य ), प्रजापतिर्वा स स्वर्गो लोकः । " ( शत ० १ || ३ | १० ) " स्वरिति सामभ्योऽक्षरत् । स स्वर्गोलोकोऽभवत् । " ( ब ० ब्रा ० १।५ ) । [ १६७ ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि " स्वर्गो वै लोक ग्राहवनीयः । " ( तै ० ब्रा ० १ । ६ । ३।६ ) । " बृहती ( विष्वत् ) वै स्वर्गोलोकः । " ( शत ० १० । ५ । ४।६ ) । " मध्येह सम्वत्सरस्यं स्वर्गोलोकः । " ( शत ० ६ । ७ । ४।११ ) । " स्व वा एते स्तोमाः, यत् ज्योतिर्भवति । " ( तां ० ब्रा ० १६।३।७ ) । " एतेन वा इन्द्रः सप्त स्वर्गांल्लोकानरोहत् । " ( ऐ ० ब्रा ० ५।१० ) । " नव स्वर्गा लोकाः । " ( ऐ ० ब्रा ० ४।१६ ) । “ दश स्वर्गा लोकाः । " ( गो ० ब्रा ० उ ० ६।२ ) । " सप्त वै देवलोकाः । ” ( ऐ ० ब्रा २।१७ ) । " उत्तरो वै देवलोकः " ( शत ० १२।७।३।७ ) । " स्वर्गो लोकः पृष्ठांनि । " ( तां ० ब्रा ० १६ । १५ । ६ ) । " स्वर्गो वै लोकों यज्ञः । " ( कौ ० ब्रा ० १४ । १ ) " नवाहो वै सम्वत्सरस्य प्रतिमा । " ( ब ० ब्रा ० ३।१२ ) । विद्यासमुच्चित- यज्ञतपोदानलक्षण पुण्यकर्म्म ही ततद्ददेवस्वर्गावाप्ति का कारण बनता है । इस विद्यात्मकक से कर्मात्मा देवस्वर्गसाधक प्राध्यात्मिक स्वर्गपथ से उत्क्रान्त होता हुआ देवस्वर्गगति का अनुगामी बनता है । जैसा कि - " दश पुरुष स्वर्गनरकारिण, तान्येनं स्वर्गं गतानि स्वर्गं गमयन्ति, नरकं गतानि नरके गमयन्ति " ( जै ० उ ० ब्रा ० ४।२५।६ ) -- " ये हि जनाः पुण्यकृतः स्वर्ग लोकं यान्ति तेषामेतानि नक्षत्राणि ज्योतींषि " ( शत ० ६।५ / ४१८ ) - " विद्यया देवलोको ( जय्यः ) " ( शत ० १४ | ४ | ३ | ६ ) इत्यादि श्रौत निगमों से प्रमाणित है । महिमापृथिवी से सम्बन्ध रखने वाले नवाह्यज्ञात्मक ज्योतिर्लक्षण इस देव-स्वर्ग को मनुष्य अपने चर्मचक्षु से देखने में सर्वथा असमर्थ है । योगजदृष्टि ही तत्प्रत्यक्ष का कारण है, अथवा तो फिर वह पार्थिव अश्व ही इस स्वर्गलोक का प्रत्यक्ष कर रहा है, जो भूपिण्ड से संलग्न होकर ज्योति रूप से द्युलोक पर्य्यन्त व्याप्त है । इसी भाव को लक्ष्य में रखते हुए ऋषि ने कहा है-[ १६८ ]

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I ) - 68 hd ( ज-) BEEEE ( ठ I I हिरण्यगर्भ , वैश्वानर सार्वज श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम', जयपुर । ३३ श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड त्रिविष्टप मण्डल परिलेख: -उद 36 SE EX 38 ३३ ४० 88 VE आत्मगतिनिमित्तानि । यज्ञ हैं पर भुक्त ऐन्द्राग्न वें अहर्गण । हैं । यही ७ देवस्वर्ग । २५ है व है कहलाते रहा ' हो विष्टस्वर्ग ' नरकस्वर्ग इन्द्रविष्टप् समन्वय ) ३ पर का में प्रत्नस्वर्ग यज्ञ अहर्गण व , दोनों वें ' ( नवाह २१ । इसमें है विष्णुवष्टप् अग्निज्योति । ' है जाता पार्थिव कहा तथा प्रतिष्ठित ' ', नरकस्वर्ग इन्द्र सूर्य सौर पर ब्रह्मविष्टप् में नाचिकेतस्वर्ग ' ' अहर्गण ही स्वर्ग वें इसे अहर्गणों २१, ६ में ' है नाचिकेत । पर्यन्त केन्द्र स्वर्ग है इसके अहर्गण । वें है आवहनीय ' प्रतिष्ठित २५ ' से कहलाता अहर्गण ' वाँ प्रत्नस्वर्ग ' अहर्गण १७ वें १७ नवाहयज्ञ ' इनमें सप्तदेव अन्य अन्य स्वगा

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( ४८ ) वाक्साहस्रीमण्डल परिलेख: -वर्ग २५ I याचिकेत १७ 94 वैश्वानरः श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर । ४२ अहर्गणात्मक वाक्साहस्री मण्डल में २१-३३-४८ स्तोमत्रयी पृथिवी अन्तरिक्ष-द्यौ भेद से तीन लोक में प्रतिष्ठित है । २१ तक के स्तोमों में पृथिवीलोक पार्थिव प्रग्नि-रूप में 8-१५-२१ भेद से तीन लोक ( अग्नि ) में प्रतिष्ठित है । ३३ स्तोमावच्छिन्न अन्त रिक्षलोक में ११-२२-३३ भेद से तीन लोक ( आप ) प्रतिष्ठित हैं एवं ४८ स्तोमावच्छिन्न धुलोक में २४-४४-४८ भेद से तीन लोक ( वाक् ) प्रतिष्ठित हैं । इसमें १७ से २५ तक के ग्रहणों का प्रदेश देवस्वर्ग प्रदेश है । इसी के केन्द्र में ( २१ स्तोम पर ) सूर्य प्रतिष्ठित रहता है । 28/48/82 ( ) ' ) ( 99122132 उन्दविंद विष्णुविष्यात ) 194/29 (( आग्न

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड पितृस्वर्गत्रयी - परिलेख: -। सोमः भूमिः प्रतिष्ठा भ फिर - यस्यां पधी तृतीयाह : मध्यमा प्रदेश वायुमयः पीलुमतीति : प्रदेश आपोमयः घौरवमा-उदन्वती श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय जयपुर । सूर्य: itel : २ वायुः 8 आपः यमः, आत्मगति निमित्तानि शनिमण्डल का अर्द्धमण्डल जो कि सौरज्योति-र्भाग से भुक्त रहता हुआ सूर्य्य विरुद्ध दिक् में प्रतिष्ठित रहता है । यही शनिमण्डल यम कहलाता है । इस प्रकाशमण्डल में एक नियत सीमापर्य्यन्त प्रप्तत्त्व ( आपः ) का साम्राज्य है, यही उदन्वती नाम की द्य है कुछ स्थान में वायुतत्त्व का साम्राज्य है, यही पीलुमती नाम की द्य है । सर्वान्त में सोमतत्त्व का साम्राज्य है, यह सौम्य पितरों की प्रतिष्ठा भूमि है । यही प्रद्यौ नामकी द्य है उत्क्रान्त कर्मात्मा पहले उदवन्ती में जाता है, अनन्तर पीलुमती तथा सर्वान्त में प्रद्यौ में जाकर यावत् कर्म्मसंस्कार भुक्ति पर्य्यन्त प्रतिष्ठित हो जाता है ।

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगति निमित्तानि " न वै मनुष्यः स्वर्ग लोकमञ्जसा वेद । अश्वो वै स्वर्ग लोकमञ्जसा वेदः । - ( शत ० १३।२।३।१ ) ४८ ग्रहर्गणात्मक वाक्साहस्री - मण्डल में २१ - ३३ - ४८ भेद से पृथिवी - अन्तरिक्ष- द्यौ ये तीन लोक प्रतिष्ठित हैं । २१ स्तोमावच्छिन्न पृथिवीलोक में ६-१५-२१ भेद से तीन लोक प्रतिष्ठित हैं । ३३ स्तोमा-वच्छिन्न अन्तरिक्षलोक में ११ - २२ - ३३ भेद से तीन लोक प्रतिष्ठित हैं एवं ४८ स्तोमावच्छिन्न द्युलोक में २४-४४-४८ भेद से तीन लोक प्रतिष्ठित हैं । जैसा कि पूर्व में विस्तार से स्पष्ट किया जा चुका है । इन ४८ अहर्गणों से ३ अहर्गण तो हृद्यदेवत्रयी के सम्बन्ध से भूपिण्ड में भुक्त हैं । शेष ४५ अहर्गण महिमामण्डल में भुक्त हैं । इन ४५ तक के ६ अहर्गणों का प्रदेश ही ' देवस्वर्ग ' प्रदेश है जिसके केन्द्र में सूर्य्य प्रतिष्ठित है एवं यही देवस्वर्गनिरुक्ति की संक्षिप्त वैज्ञानिक मीमांसा हैं । पितृस्वर्गनिरुक्तिः-विद्यासमुच्चितप्रवृत्तिकर्म्मनिमित्तसाध्या विशिष्ट सद्गतिलक्षरणा देवस्वर्गगति से सम्बन्ध रखने वाले ' सप्तदेवस्वर्ग ' के स्वरूप निरुपणानन्तर विद्यानिरपेक्षप्रवृत्तिसत्कर्म्मनिमित्तसाध्या सामान्यसद्गतिलक्षणा पितृस्वर्गगति से सम्बन्ध रखने वाले पितृस्वर्ग - स्वरूप की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । तौम्य त्रिलोकी रूपा महापृथिवी के द्युलोक स्थानीय एकविंश अहर्गण पर प्रतिष्ठित स्वज्योतिर्धन सूर्य के चारों ओर तदुपग्रहभूत बुध, शुक्र, भूपिण्ड, मङ्गल, देवसेना, बृहस्पति, शनि नामक ग्रह परिक्रमा लगा रहे हैं । इन उपग्रहों में शनि सर्वान्त में प्रतिष्ठित है । शनिग्रह के चारों श्रोर कटकाकार एक वृत्त प्रतिष्ठित है । यही कटकवृत्त पुराणपरिभाषा में ' वैतरणी नदी ' कहलाया है । इस शनिमण्डल का वह अर्द्धमण्डल, जो सौरज्योतिर्भाग से युक्त रहता हैं - ' धर्म्मराज ' कहलाया है एवं शनिमण्डल का वह अर्द्धमण्डल जो सूर्य्यविरुद्ध दिक् में प्रतिष्ठित रहता हुआ तमोमय है- ' यमराज ' कहलाया है । ज्योतिर्युक्त अर्द्धशनिमण्डल धर्मराज है, तमोयुक्त अर्द्धशनिमण्डल यमराज है । वही शनिमण्डलयम है । इसी आधार पर पुराण ने एक ही व्यक्ति के ये दो अाधिकारिक नाम माने हैं । दक्षिणदिक्स्थ शनिमण्डल का ज्योतिर्मय स्थान ही ' पितृस्वर्ग ' है । इस प्रकाशमण्डल में नियत सीमापर्य्यन्त प्रप्तत्त्व का साम्राज्य है, यही ' उदन्वती ' नाम की द्यु है । कुछ स्थान में वायुतत्त्व एक का साम्राज्य है, यही ' पीलुमती ' नाम की द्यु है एवं सर्वान्त में सोमतत्त्व का साम्राज्य है, यही सौम्यपितरों की प्रतिष्ठाभूमि है ' प्रद्यो ' नाम की द्यु है । उत्क्रान्त कम्र्मात्मा पहले उदन्वती में जाता है, अनन्तर पीलु -मती में जाता है, सर्वान्त में प्रद्यौ जाकर यावत्कर्म्मसंस्कार भुक्तिपर्य्यन्त प्रतिष्ठित हो जाता है । कर्म्म-भोग समाप्त होने पर पूर्वप्रदर्शित अवरोह - पथं से पुनः मर्त्यलोक का अनुगामी बन जाता है । विद्यानिरपेक्षप्रवृत्तिसत्कर्मानुयायी प्रेतात्मा दक्षिणस्थ ४२ अंशात्मक पितृयाण मार्ग चान्द्रज्योति का आश्रय लेता हुआ पितृस्वर्गगति का अधिकारी बनता है । सौरज्योति के द्वारा बलाधान करने के लिए तत्प्राणयुक्तप्रक्त गौपशु का प्रेतनिमित्तकदान आवश्यक माना गया है । प्रप्तत्त्वात्मिका वैतरणी का [ १६६ ]