Part IV Atmgativigyanopanishta Part 4 — पृष्ठ 231–240
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४ · पृष्ठ 231–240
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड www आत्मगति निमित्तानि wwwwwwm सन्तरण इसी गौप्रारण से होता है, जैसा कि आगे स्पष्ट होने वाला है । निम्नलिखित मन्त्र त्रिधाविभक्त
इसी पितृस्वर्ग का स्पष्टीकरण कर रहा है-" उदन्वती द्योखमा पीलुमतीति मध्यमा ।
तृतीया ह प्रद्यौरिति यस्यां पितर आसते ॥
ख- दुर्गतिलक्षणा संसृतिगतिः ( क्रमगतिः ) । संसृतिगतिलक्षणा क्रमगति के सद्गति, दुर्गति, योनिगति भेद से तीन विवर्त्त बतलाये गए हैं ( पृ ० सं ० १६८ ) इनमें से देवस्वर्ग, पितृस्वर्ग भेदभिन्ना संसृतिगतिलक्षण सद्गतिद्वयी का स्वरूप का बतलाया ध्यान गया । अब क्रमप्राप्त संसृतिगतिलक्षण क्रमगति के दूसरे ' दुर्गति ' विवर्त्त की ओर पाठकों आकर्षित किया जाता है, जिसके प्रवान्तर ८४ भेद माने गए हैं । दुःखपूर्वक गमनयोग्या एवं दुःखस्थान प्राप्ति निमित्तभूता यह दुर्गति ही ' नरकगति ' नाम से व्यवहृत हुई है । ' अपि च सप्त माने ' इस गए व्यास हैं । सिद्धान्त संसृति-के अनुसार देवस्वर्गवत् इस दुर्गतिलक्षण नरकस्थान के भी अवान्तरं ७ ही विवर्त्त नरकगति का भी लक्षण सद्गति के सामान्यसद्गतिलक्षणा पितृस्वर्गगति की भाँति इस सप्तावयव में चान्द्रप्रातपपथ गमन-पितृयाणमार्ग से ही सम्बन्ध है । दोनों में अन्तर केवल यही है कि, पितृस्वर्गगति में विस्तार से मार्ग बनता है एवं नरकगति में चान्द्रछायापथ गमनमार्ग बनता है, जैसा कि पूर्व परिच्छेदों स्पष्ट किया जा चुका है । देवस्वर्गनिरुक्ति में हमने ज्योति को आत्मानन्द का कारण बतलाया था । सिद्ध है कि, तमोभाग अवश्यमेव आत्मक्लेश का कारण है पितृस्वर्गनिरुक्ति में प्रतिपादित शनिमण्डल का सूर्य्यविरुद्ध दिगनुगत में तमोमय भाग ही नरकस्थान अवश्यमेव ज्योतिर्मय आत्मा का चन्द्रछायापथ द्वारा इस तमोलोक है । पितृ-जाना अत्यधिक क्लेश का कारण है । इसी दुःखभाव के कारण यह नरकगति दुर्गति के कहलाई सम्बन्ध से आगे याणमार्ग से सम्बन्ध रखने वाली इस नरकगति के ( नरक स्थान के ) चान्द्रसम्वत्सर पितृयाण-जाकर ८४ अवान्तर भेद हो जाते हैं । जिस प्रकार देवयानमार्ग का अधिष्ठाता सूर्य्य है, एवमेव साथ भोग हो रहा है एवं मार्ग का मूलाधार चन्द्रमा माना गया है । चन्द्रमा का प्रष्टविंशति नक्षत्रों के में गायत्र्यादि - जगत्यन्त ७ नक्षत्रावच्छिन्न चन्द्रमा का सौरमण्डल के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है । सौरमण्डल सात भागों में पूर्वापरवृत्तों ( अहोरात्रवृत्तों ) का समावेश है । इन सात वृत्तों के सम्बन्ध से सौरनाड़ीवृत्त ब्राह्मण श्रुति विभक्त हो रहा है । सप्तधा विभक्त इन्हीं सप्त सूर्य्यनाड़ियों का स्वरूप बतलाती हुई मन्त्र -कहती है-" यः सप्तरश्मिवृषभस्तुविस्मानवासृजत् सर्तवे सप्त सिन्धून् । यो रौहिणमस्फुरद्वज्रबाहुर्धामारोहन्तं स जनास इन्द्रः । ” ( ऋक् सं ० २।१।२।१ ) " " स एष ( आदित्य ) सप्तरश्मिवृषभस्तुविस्मान् । ” ( जै ० उ ० १।२८।२ ) । [ २०० ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड आत्मगति निमित्तानि उक्त सौर - नाड़ीसप्तक का चन्द्रमा से सम्बन्ध होता है । सप्तक द्वारा चान्द्रछायापथ के प्रारम्भ में ७ विवर्त्त हो जाते हैं । आगे जाकर २८ नक्षत्रों के सम्बन्ध से यह चान्द्रसप्तक चतुर्गुणित होता हुआ २८ विवर्त्त भावों में परिणत हो जाता है । त्रिवृत्भाव सम्बन्ध से २८ विवर्त अन्ततोगत्वा ८४ विवर्त्तभावों में परिणत हो जाते हैं । पुराणशास्त्र ने इन ८४ नरकों के दो व्यवस्था - क्रम स्वीकार किए हैं । ७–२१–८४ यह एक क्रम है । ७, २८, ८४ यह एक क्रम है, सप्तक का त्रिगुणित रूप २१ है २१ का चतुर्गुणित रूप ८४ है । सप्तक का चतुर्गुणित रूप २८ है, २८ का त्रिगुरितरूप ८४ है । दोनों मत यथास्थान निर्विरोध प्रतिष्ठित हैं, केवल निरूपणीया शैली में भेद है जैसा कि प्रस्तुत सन्दर्भ से स्पष्ट हो जाता है । पितृस्वर्गनिरुक्ति में कहा गया है कि बुधादि ग्रह बृहतीमध्यारूढ सूर्य्यं के चारों ओर परिक्रमा लगा रहे हैं । इन ग्रहों के परिभ्रमण मार्ग ही पुराण में ' अष्टौ दिव्य नांगा: ' नाम से प्रसिद्ध हैं । प्रकृत में केवल चन्द्रपरिभ्रमण मार्गात्मक दिव्य नाग की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करना है । मङ्गल तथा चन्द्रमा इन दोनों ग्रहों की गति बड़ी विलक्षण है । दोनों ग्रह एक रेखा पर सममार्ग न बना कर विषमरूप से परिभ्रममारण हैं । चन्द्रमा एक मास में ( सावनमानानुसार २८ अहोरात्रात्मक एक चान्द्रमास में ) भूपिण्ड के चारों ओर एक परिक्रमा लगा लेता है । इस अनुपात से चान्द्र सम्वत्सर के ३३३ ( तीन सौ तैतीस ) अहोरात्र हो जाते हैं । आज खगोलीय जिस नियत बिन्दु से चन्द्रमा अपनी गति आरम्भ करता है, मास-वर्ष की क्या कथा, २८ वें सम्वत्सर में चन्द्रमा पुनः उसी नियत बिन्दु पर आता है । उपक्रम बिन्दु इस २८ वर्ष परिभ्रमण मार्गात्मक दिव्यनाग का पुच्छभाग है, उपसंहार बिन्दु मुखभाग है । २८ सम्वत्सरपर्यन्त अपनी व्याप्ति रखने वाला यही चान्द्र दिव्यनाग है । इस दिव्यनाग में उच्चावचभाव से चन्द्रमा की अनन्तगतियाँ प्रतिष्ठित हैं । इन सब गतियों का स्थूलमान के आधार पर ' अवर - मध्यम - उत्तम ' भेद से तीन गतियों में अन्तर्भाव मान लिया गया है । चन्द्रमा कभी तो भूपिण्ड के अत्यन्त सन्निकट रहता है, यही इसकी अवरति है कभी भूपिण्ड से सर्वथा विदूर चला जाता है, यही उत्तम गति है एवं कभी मध्यगति का आश्रय लेता है । जब चन्द्रमा भूपिण्ड के समीप रहता है, तब चन्द्रमा का विष्कम्भ ( व्यास ) तो ७ सप्तांगुलमित रहता है एवं सूर्य्यं विष्कम्भ षडंगुल ( ६ ) मित रहता है । इस गतिकाल में चान्द्रच्छायालक्षण स्वर्भानु के सम्बन्ध से जो सूर्य्यग्रहण होता है, वह ' खास ' कहलाया है । सूर्य्यावरण के साथ - साथ एकांगुल परिमाण से सौर ' ख ' ( ग्राकाश ) प्रदेश का भी ग्रास हो जाता है । जब चन्द्रमा मध्यमगति का श्राश्रय लेता है, तो सूर्य - चन्द्रमा, दोनों का व्यास षडंगुल - षडंगुल रूप से समतुलित हो जाता है । यही ' सर्वग्रास ' नामक सूर्य्यग्रहण है । जब चन्द्रमा भूपिण्ड से विदूर जाता हुआ उत्तम गति का ग्राश्रय ले लेता है, उस समय चन्द्रव्यास षडंगुल हो जाता है, सूर्य्यव्यास सप्तांगुल रहता है । इस समय का ग्रहण सप्तांगुल सूर्य्य. के मध्यस्थ षडंगुल प्रदेश को कटकाकार से आवृत कर लेता है अतएव यह ग्रहण ' कटकग्रास ' कहलाया है । इस प्रकार नागगतित्रय सम्बन्ध से, दूसरे शब्दों में चान्द्रगतित्रयी के तारतम्य से चन्द्रच्छाययोपपन्न सूर्य्यग्रहण तीन प्रकार का हो जाता है, जैसा कि परिलेख से स्पष्ट है— [ २०१ ↓
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि ( सूर्य: सूर्य: भूपिण्डः चन्द्रमा: ग्रहणत्रयी - विवर्त्त से प्रकृत में यही वक्तव्य है कि, चन्द्रमा की गति तीन भागों में विभक्त है । इन तीन गतियों के कारण नक्षत्रसंस्था का स्वरूप भी भावत्रयरूप में परिणत हो जाताहै । जब चन्द्रमा अवरमार्ग का अनुगमन करता है, तब २८ सौ नक्षत्रों की स्थिति, प्राणसंचार क्रम, प्राणादानक्रम, प्राण-[ २०२ ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड चान्द्रगतित्रयी- परिलेख: 4 , कटकग्रास -: सूर्य : सप्ताङ्गुल उत्तमागतिः सय्य सर्वग्रासः सूर्य्यः वडङ्गुलः S मध्यमागतिः रवग्रासा → : सूर्य्य षड्डुलः • अवरागति Sabile आत्मगति निमित्तानि षडङ्गलकचन्द्रम : -कटकग्रास चन्द्रमाः षडङ्गु · लञ्चन्द्रमाः → सर्वग्रासः सत्यामुसहचन्द :-संग्रास , चन्द्रमा चन्द्र श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय जयपुर । दिव्यनाग ( ग्रहों का परिभ्रमण मार्ग ) से चन्द्रमा की अनन्तगतियाँ प्रतिष्ठित हैं इन सब गतियों का स्थूलमान के आधार पर प्रवरा - मध्यमा - उत्तमा भेद से तीन गतियों में ग्रन्तर्भाव माना जाता है । पृथिवी से चन्द्रमा कभी पास, कभी दूर, कभी सर्वथा दूर चला जाता है । इन्हीं गतियों को क्रमशः अवरागति-मध्यमागति- उत्तमागति कहा जाता है ।
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड श्रात्मगतिनिमित्तानि विसर्गक्रम, सब कुछ विशेष भाव में परिणत रहता है । मध्यममार्गाश्रय से नक्षत्रसंस्था में अन्य ही विशेष भावों का समावेश रहता है एवं उत्तममार्गानुगमन से भिन्न ही स्थिति रहती है । इस प्रकार चन्द्रगति-वैविध्य से प्रष्टाविंशतिनक्षत्रात्मक भचक्र के तीन विशेष स्वरूप हो जाते हैं । चन्द्रमा के साथ सूर्य सप्त-नाड़ियों का सम्बन्ध रहता है । चन्द्रचक्र भेद से यह सूर्य्यनाड़ी सप्तक भी तीन भागों में विभक्त हो जाता है । इस प्रकार सात नाड़ियों के त्रिगुणभाव से समष्ट्यात्मक चन्द्रचक्र में २१ नाडीविर्त्त हो जाते हैं । नक्षत्र २८ हैं । सूर्य्यनाड़ीसप्तक के योग से ७-७ नक्षत्रों का एक - एक खण्ड हो जाता है, सम्भूय ४ खण्ड हो जाते हैं । प्रत्येक सप्तक के साथ एकविंशतिधा विभक्त सौर नाड़ियों का सम्बन्ध हो जाता है । इस प्रकार २१ नाड़ियाँ चतुर्गुणित होती हुई ८४ संख्या में परिणत हो जाती है । इन ८४ विवर्त्तो के सम्बन्ध से शनैश्वरमण्डल भुक्त नरकस्थान भी ८४ भागों में ही विभक्त हो जाता है । यही पुराण का एक दृष्टिकोण है । इस क्रम में सूर्य्यनाड़ीसप्तक का पहले चान्द्रमार्गत्रयी से सम्बन्ध हुआ है । अनन्तर २८ नक्षत्रों से सम्बन्ध हुआ है । विभिन्न पौराणिक दृष्टिकोणों के अनुसार पहले सूर्य्यनाडीसप्तक का २८ नक्षत्रों से सम्बन्ध हुआ है । सात - सात नक्षत्रों के सम्बन्ध में सूर्य्यनाड़ीसप्तक चतुर्गुण बनता हुआ २८ संख्या में परिणत हो जाता है । आगे जाकर इन २८ नाड़ियों के चान्द्रमार्गत्रयी सम्बन्ध से त्रिगुणभाव द्वारा ८४ विवर्त्त हो जाते हैं । जिस प्रकार गतित्रैविध्य से चान्द्रस्थिति तीन संस्थानों में विभक्त होती है, एवमेव " अमावस्या, अष्टका, पूर्णिमा " इन तीन मासपर्वो के सम्बन्ध से भी चान्द्रमण्डल की तथा चान्द्रमण्डलसम्बन्ध नक्षत्र-मण्डल की तीन अवस्थाएँ हो जाती हैं । भूपिण्ड, सूर्य्य, दोनों के मध्य में जब चन्द्रमा आता है, तो ' दर्श: -सूर्येन्दुसङ्गमः ' के अनुसार उस समय दर्शतिथि ( अमावास्या ) का साम्राज्य रहता है । इस समय नक्षत्र-संस्था का स्वरूप भिन्न ही प्रकार में परिणत रहता है । चन्द्रमा तथा सूर्य्य दोनों के मध्य में जब भूपिण्ड आ जाता है, तो पूर्णिमा का उदय होता है । इस समय नक्षत्र संस्था अपना विशेष ही स्वरूप रखती है । जब चन्द्रमा भूपिण्डकेन्द्र के समसम्मुख आ जाता है, दूसरे शब्दों में जब चन्द्रमा याम्योत्तर ( दक्षिणोत्तर ) रूप से भूपिण्ड केन्द्र से समतुलित हो जाता है, तो अष्टकातिथि ( अष्टमी ) का उदय होता है । इस समय नक्षत्रसंस्था का स्वरूप भिन्न ही प्रकार का रहता है । इस प्रकार २८ वर्षात्मक महामण्डल की भाँति इस मासिक मण्डल में भी अमा, पूर्णिमा, अष्टमी भेद से तीन मण्डल हो जाते हैं । इन तीनों के सम्बन्ध रो नरकप्रदेश के भी ७–२१-८४ अथवा ७ - २८-८४ ये भेद हो जाते हैं, जिनका सुपर्णपुराण ( गरुड़पुराण ) में विस्तार से विश्लेषण हुआ है । तत्तदसदसत्कर्म्म संस्कार विशेष ही इन नरकगतियों के निमित्त बनते हैं । पुत्र द्वारा प्रेतात्मा के निमित्त होने वाले नीलवृषोत्सर्ग, गौदान यादि कम्र्मों से नरकगत्यारूढ प्रेतात्मा में बाधान होता है एवं पुत्रगत श्रद्धासूत्र द्वारा प्राप्त इस बल से प्रेतात्मा उस यामीयातना के सहने में समर्थ हो जाता है । गौदानादिकर्म से प्रेतात्मा में बलाधान होता है, इस सम्बन्ध में श्रौतप्रमाण की जिज्ञासा रखने वालों का ध्यान निम्नलिखित श्रौत वचन की ओर आकर्षित किया जाता है । यज्ञकर्म में दक्षिणादान आवश्यक माना गया है । बिना दक्षिणादान के यज्ञ निष्फल हो जाता है, जैसा कि - ' हतयज्ञम दक्षिणम् ' से स्पष्ट है । वह दक्षिणाद्रव्य सुवर्ण, गौ, वस्त्र, अश्व आदि भेद से अनेक-[ २०३ ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिनिमित्तानि विध है । इस दक्षिणादान कर्म्म से यज्ञकर्त्ता यजमान के मानुषात्मा ( कम्र्मात्मा ) का द्युलोक से सम्बन्ध हो जाता है । यज्ञकर्म से उत्पन्न दिव्यप्राणातिशयात्मक दैवात्मा मानुषात्मा से बद्ध होता हुआ ' त्रिणाचि-केत ' नामक सप्तदश ऋतधामा नामक आग्नेय स्वर्ग में प्रतिष्ठित हो जाता है । द्युलोकपर्य्यन्त वितत मानुषात्मानुगत दिव्यात्मा में बलाधान करने के लिए ही यज्ञकर्त्ता यजमान श्रद्धापूर्वक कुलीन - पूर्णाङ्ग-विद्वान ऋत्विक् ब्राह्मणों को दक्षिणा प्रदान करता है । दक्षिणाद्रव्यगत दक्षिणा प्राण श्रद्धासूत्र द्वारा देवलोकस्थ यजमान के देवात्मा में अवश्य ही प्रतिष्ठित होता है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रखते हुए भगवान याज्ञवल्क्य ने कहा है-" अथ प्रतिपरेत्य गार्हपत्यं दक्षिरणानि जुहोति । स दशाहोमीये वाससि हिरण्यं प्रबध्य ( घृते ) अवधाय जुहोति । ' देवलोके मे ऽप्यसत् ' इति वै यजते, यो यजते । सो ऽस्यैष यज्ञो । [ यज्ञातिशयरूपो दैवात्मा ] देवलोकमेवाभिप्रैति । तदनूची दक्षिणा, यां ददाति, सैति । दक्षिरणामन्वारभ्य यजमानः । ” " गौपशु सौरपशु है । फलतः गौदान से श्रवश्यमेव आत्मा में आत्मानुरूप सौरप्राणबल का प्राधान होता है " इस रहस्य का विस्पष्ट निरूपण करती हुई श्रुती कहती है— " सौरीभ्यां ऋग्भ्यां जुहोति । तमसा वा प्रसौलोकोऽन्तर्हितः । स एतेन ज्योतिषा तमोपहत्य स्वर्गं लोकमुपसंक्रामति । " " गौदान आत्मप्राण में बलाधान करता हुआ ग्रात्मप्राण का त्राण करता है ", निम्नलिखित वचन भी इसी सिद्धान्त का समर्थन कर रहा है -—-" अथ गौः । प्राणमेव एतया श्रात्मनस्त्रायते प्राणो हि गौः, अन्नं हि गौः, अनं हि प्रारणः । " ( शत ० ४।३।४।२५ ) । देवकर्मात्मक यज्ञ में यदि गौदानादि से स्वर्गलोकस्थ यज्ञात्मा में बलाधान सर्वसम्मत है, यदि यज्ञिय दक्षिणा प्राण का श्रद्धासूत्र द्वारा द्युलोकस्थ दैवात्मा में गमन श्रुति समर्थित है, तो पितृयज्ञ में विधीयमान दक्षिणा का नरकलोकस्थ प्रेतात्मा में बलाधान करना कथमपि शङ्कास्पद नहीं माना जा सकता ।. - योनिग तिलक्षणासंसृतिगति [ क्रमगतिः ] ग-संसृतिगतिलक्षण क्रमगति नाम के दूसरे गतिविवर्त्त में तीसरी योनिगतिलक्षणसंसृतिगति है । दो शब्दों में इसका भी उल्लेख दिया जाता है । इस योनिगति के चतुरशीतिलक्ष ( ८४००००० चौरासी लाख ) [ २०४ ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड wwwww श्रात्मगतिनिमित्तानि विवर्त्त माने गये हैं । इस योनिगति की मूलप्रतिष्ठा महानात्मा है, जैसा कि आत्मविज्ञानोपनिषदन्तर्गत ' महदात्मविज्ञानोपनिषत् ' में विस्तार से बतलाया जा चुका है । पितृसहःपिण्डमूर्ति, प्रजातन्तु वितान प्रवर्त्तक, सौम्यगुणक, शुक्रस्थित यह महानात्मादि - " मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् " के अनुसार ' योनि ' नाम से व्यहृत हुआ है । इसी महद्योनि में बीजरूप से स्वार्जित धनात्मक अष्टाविंशति ( २८ ) पितृप्राण, ऋणात्मक षट्पञ्चाशत् ( ५६ ) पितृप्राण, सम्भूय चतुरशीति ( ८४ ) पितृप्राण प्रतिष्ठित हैं, जैसा कि सापिण्ड्य विज्ञानोपनिषदन्तर्गत ' प्रजातन्तुवितानविज्ञानोपनिषत् ' में विस्तार से बतलाया जा चुका है । शुक्रात्मक महानात्मा के शुक्र पदार्थ का क्या स्वरूप है? इस प्रश्न के सम्बन्ध में पूर्व की देवस्वर्ग-निरुक्ति में ' वाक् - आपः - अग्निः ' रूप से तीन तत्त्वों का विश्लेषण करते हुए यह बतलाया गया है कि, इन तीन शुक्रों के, किंवा अवस्थात्रयात्मक शुक्र के सम्बन्ध से ' वेद - लोक - वाक् ' नाम की तीन साहस्रियों का उद्भव होता है । इन तीनों का क्रमशः देवता, असुर, पितर इन तीन प्राग्नेय - प्राप्य - सौम्य प्रारणों से घनिष्ठ सम्बन्ध है | अग्निः शुक्र वेदसाहस्री का आधार है, यही आग्नेय देवताओं की विकासभूमि है । आपः शुक्र लोकसाहस्री का आधार है, यही प्राप्य असुरों की विकासभूमि है एवं वाक्शुक्र वाक्साहस्री का आधार है, यही सौम्य पितरों की विकासभूमि है । इसी वाक्शुक्र के सम्बन्ध से सौम्यपितरों के लिए ' पितरोवाक्यमिच्छन्ति ' वचन प्रसिद्ध है । तीसरे वाक्शुक्र से सम्बन्ध रखने वाली वाक्साहस्री का ' सहस्रधा महिमानः सहस्रम् ' ( ऋक् सं ० १०।११४।८ ) रूप से सहस्रात्मक सहस्रमहिमारूप से वितान होता है । एक सहस्र का शतसंख्यात्मक पूर्ण वितान ही सहस्र का सहस्रवितान है । इस शतवितानात्मक सहस्रवितान एक सहस्र वाग्धाराम्रों के एक-लक्ष विवर्त्त हो जाते हैं । शुक्रात्मक चतुरशीति ( ८४ ) पितृप्राणसहः पिण्डों का लक्षात्मक वागुभाव से सम्बन्ध होता है । समष्टिभोग के अतिरिक्त व्यष्टिरूप से प्रत्येक पितृप्रारण के साथ स्वतन्त्ररूप से भी भोग हो रहा है । फलतः ८४ पितृप्रारणों के चतुरशीतिलक्ष विवर्त्त हो जाते हैं । इस प्रकार वाक्साहस्री के सम्बन्ध से' शुक्रात्मक महल्लक्षण योनिभाव ८४ लक्षात्मक बन रहे हैं । अण्डज, पिण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज भेद से ये ८४ लाख योनियाँ निम्नलिखित रूप से विभक्त हैं --१. - अण्डजयोनयः २१००००० २- पिण्डजयोनयः -२१००००० १३ - स्वेदजयोनयः - २१००००० ४ – उद्भिज्जयोनयः → २१००००० योनिगतय:: + ८४००००० [ २०५ ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्डे अष्टौ सत्त्वविशालास्तमोविशालस्तु पञ्चाधः । २ संसृतिगतिलक्षणा क्रमगतिः ख- दुर्गतिः क- सद्गतिः चतुरशीति भेदभिन्ना १ - देवस्वर्गगति: ( १० ) २ - पितृस्वर्गगति: ( ३ ) ८४ १३ ८४०००६७ संसृतिगतयः [ २०६ ] आत्मगतिनिमित्तानि 1 ग - योनि गतिः चतुरशीतिलक्ष-८४००००० सूर्य्य द्वारा ही चिदात्मा ( जीव ) महद्योनि में गर्भ धारण करता है । दूसरे शब्दों में सौरचिदंश जीवात्मा है, चान्द्रमहान् इसकी योनि है । चान्द्रगतित्रय सम्बन्ध से सौरनाड़ी विवर्त्त ८४ भागों में विभक्त है, जैसा कि पूर्व में बतलाया गया है । चतुर्द्धा विभक्त एकविंशति भेद से नाक्षत्रिक ८४ भेद हो जाते हैं । प्रत्येक एकविंशति ( एकविंशति का प्रत्येक पर्व ) उसी लक्षात्मकवाग्भाव से अनुगृहीत हैं । इस दृष्टि से भी चतुरशीतिलक्षयोनिभावों का समन्वय हो रहा है । इन सब योनिभावों का ' स्तम्ब ' सर्ग से आरम्भ कर ' ब्रह्म ' सर्ग पर्य्यन्स वितत चतुर्दशविध ( १४ ) भूतसर्ग में अन्तर्भाव मान लिया गया है । इसी प्राधार पर यत्र - तत्र पुराणों में चतुर्द्दश योनिभावों का भी उपबृ हरण उपलब्ध होता है । स्वस्वकर्मानुसार कम्र्मात्मा तत्तन्महयोनिगतियों का अनुगमन करता रहता है । निम्नलिखित वचन इसी योनिगति का स्पष्टीकरण कर रहे हैं-मध्ये रजो विशालो मानुष एकः प्रवर्त्तते सर्गः ॥१ ॥
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्ता याचतुर्द्दशयोनयः ॥ ते चतुर्द्दशलोकास्तानन्वात्मा विचरत्ययम् ॥२ ॥
ते जीवलोकाः संसारलोकाः कर्मनिबन्धनाः ॥ उच्चावचाः सुखं दुःखं तेषु चात्मा भुनक्ति हि ॥ ३ ॥ ( दे ० नि ० ) ।
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्डं श्रात्मगतिनिमित्तानि संसृतिगतिलक्षणा क्रमगति के ' सद्गति, दुर्गति, योनिगति ' ये तीन मुख्य विवर्त्त हैं । इनमें सद्गति नामक संसृतिगति के विशिष्ट सद्गतिलक्षणा देवस्वर्गगति, सामान्यसद्गतिलक्षणा पितृस्वर्गगति, ये दो अवान्तर भेंद हैं । देवस्वर्गगति के ३ विष्टप् स्वर्गगति, ७ देवस्वर्गगति भेद से १० भागों में विभक्त है, पितृस्वर्गगति ' उदन्वती - पीलुमती - प्रद्यौ ' भेद से तीन भागों में विभक्त है । इस प्रकार सम्भूय सद्गतिलक्षणा संसृतिगति के १३ भेद हो जाते हैं । दूसरी दुर्गतिलक्षणा संसृतिगति के ८४ भेद हैं । तीसरी योनिगति-लक्षणा संसृतिगति के चतुरशीतिलक्ष भेद, प्रकारान्तर से १४ भेद हैं । सम्भूय संसृतिगतिलक्षणा भागत्रय-विभक्ता क्रमगति के ८४००६७ विवर्त्त हो जाते हैं । जैसा कि पूर्व परिलेख से स्पष्ट है— ३- मुक्तिगतिलक्षणाक्रमगतिः ' क'कारात्मिका नित्यगति, ' ख ' कारात्मिका क्रमगति, ' ग ' कारात्मिका अगतिगति तीनों में से अहरहर्गति, सम्वत्सरगतिलक्षणा द्विविधा ककारात्मिका नित्यगति का सर्वप्रथम विश्लेषण किया गया । अनन्तर क्रमप्राप्त खकारात्मिका क्रमगति के १ - पञ्चत्वगति, २ - संसृतिगति, ३ - मुक्तिगति इन तीन विवर्त्तो का दिग्दर्शन कराते हुए सर्वप्रथम आत्मपञ्चत्वगति, देवपञ्चत्वगति, भूतपञ्चत्वगति इन तीन पञ्चत्वगतिरूपा खकारात्मिका क्रमगतियों का विश्लेषण किया गया । आगे जाकर क्रमप्राप्त संसृतिगतिलक्षणा क्रमगति के सद्गति, दुर्गति, योनिगति ( क - ख - ग रूप से ) भावों का क्रमशः विश्लेषण किया गया । अब क्रमप्राप्त खकारात्मिका क्रमगति के तीसरे मुक्तिगति विवर्त की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । कर्मात्मा शुभाशुभकर्म संस्कारानुसार स्वर्ग - नरकादि तत्तच्छुभाशुभ लोक विशेषों में यावत्संस्कार-भुक्ति पर्य्यन्त प्रतिष्ठित रहता हुआ कर्म्मसंस्कारक्षयानन्तर पुनः भूपिण्ड योनिविशेषों में जन्म धारण कर लेता है । कर्मानुगत यह जन्म - मृत्यु प्रवाह - " जातस्य हि ध्र ुवं मृत्युर्ध वं जन्म मृतस्य च " के अनुसार अनवरत प्रकान्त है । यही गति ' संसृतिगति ' ( संसरणशीला संसारगति ) कहलाई है । इस गति में जन्म-मृत्यु चक्र से छुटकारा पाना असम्भव है । यही गति ' कम्मश्वत्थगति ' कहलाई है । दूसरी एक क्रमगति ऐसी भी मानी गई है, जिसका ' ब्रह्माश्वत्थ ' से सम्बन्ध है । ब्रह्माश्वत्थ से सम्बन्ध रखने वाली क्रमगति ' ब्रह्मगति ' है एवं कमश्वत्य से सम्बन्ध रखने वाली संसृतिगतिलक्षण क्रमगति ' कर्म्मगति ' है । कर्म्मगति में पुनः पुनरावर्तन है, ब्रह्मगति में अपुनरावर्तन है । अपुनरावर्त्तनलक्षणा ब्रह्माश्वत्थानुगता ब्रह्मगतिलक्षणा यह क्रमगति ही ' मुक्तिगति ' कहलाई है । मुक्तिगतिसाधक लोक ही मुक्तिलोक, ब्रह्मलोक, ब्रह्मधाम, परम धाम, अशोकमहिम, कामप्र, अपुनर्मार इत्यादि नामों से व्यवहृत हुए हैं । " स वेदैतत् परमं ब्रह्मधाम " ( मुण्डक ० उ ० ३।२।१ ) के अनुसार २१ विशस्थ सूर्य्य से ऊपर का अमृतात्मक ब्रह्माश्वत्थ भाग ही ' ब्रह्मधाम ' नाम से प्रसिद्ध है । जब तक कर्मात्मा २१ विंशत्यहर्गणात्मक पार्थिवमण्डलाकर्षण से आकर्षित रहता है, तब तक यह मृत्युपाश से विमुक्त नहीं हो सकता है । सूर्य्य से अध: प्रदेश में अवस्थित कम्र्मात्मा अवश्यमेव कर्म्मगतिलक्षरणा संसृतिगति का अनुगामी बना रहता है । सूर्योर्ध्वस्थानात्मक ब्रह्मवामं में षोडशीब्रह्म अपने अमृतभाग से विकसित रहता है । यही चिह्न सूर्य्यं द्वारा सूर्य्य से नीचे अवस्थित चान्द्रगर्भित पार्थिव महद्योनि में गर्भ धारण का जीवसंज्ञा में परिणत होता है । " यत् किञ्चार्वाचीनमादि-[ २०७ ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्डं आत्मगतिनिमित्तानि त्यात् सर्वं तन्मृत्युनाप्तम् " इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार सूर्य्य से नीचे व्याप्त मृत्युभाव के प्राबल्य से अमृतधर्म्मा व चिदंश ( कम्र्मात्मा - जीवात्मा ) मृत्युंध से आक्रान्त हो जाता है । फलतः जब तक कर्मात्मा कर्म्मप्रधान इस मर्त्य पार्थिवलोक कर्षण से विमुक्त होकर सूर्य्यभेदी नहीं बन जाता, तब तक मृत्युपाश विमोचन खपुष्प बना रहता है । इस मृत्युपाश से विमुक्त होने का एकमात्र उपाय है, कर्म्मसंस्कारासक्ति से त्राण पाना । इसका एकमात्र उपाय है, निवृत्तिदृष्टि से निष्काम कर्मानुगमन । तभी उस मुक्तिसाधक परमधाम की अवाप्ति सम्भव है, जो कि मुक्तिधाम वाल्लभमत में गोलोकधाम कहलाया है, सामवेद में जो ' गोसव ' नाम से प्रसिद्ध है, जिसे याज्ञिय लोक ' पञ्चदशाह यज्ञ ' कहा करते हैं, जो २२ वें अहर्गण से ३६ वें ग्रहणपर्यन्त १५ अहर्गणों में व्याप्त है, जहाँ पारमेष्ठ्य गौतत्त्व के साथ यज्ञमूर्ति गोविन्द नित्यसंश्लिष्ट हैं । अवश्य ही क्रमशः ऊर्ध्वगमन करता हुआ कर्मात्मा सूर्य्यं द्वारा इस लोक में पहुँच कर रजोमय पार्थिव लोकाकर्षण से विमुक्त होकर विरज बनता हुआ - ' न स पुनरावर्त्तते, न स पुनरावर्त्तते " । इसी मुक्तिगति-लक्षणा क्रमगति का स्पष्टीकरण करते हुए वेदभगवान कहते हैं-" एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य न वर्द्धते कर्म्मणा नो कनीयान् । तस्यैवस्यात् पदवित्तं विदित्वा न लिप्यते कर्म्मणा पापकेन ॥ " तस्मादेवंविच्छान्तो दान्त, उपरत, स्तितिक्षुः, समाहितो भूत्वा ऽऽत्मन्ये-वात्मानं पश्यति । सर्वमात्मानं पश्यति, नैनं पाप्मा तरति सर्वं पाप्मानं तरति, नैनं पाप्मा तपति सर्वं पाप्मानं तपति । विपापो, विरजों, विचिकित्सो ब्राह्मणोभवति । एष ब्रह्मलोकः सम्राट् । ” ( वृं ० प्रा ० उ ० ४।४।२३ ) । " तपः श्रद्धे ये ह्य् पवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वांसो भैक्षचर्यां चरन्तः । सूर्य्य द्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा * || " अपरामुक्तिः ( मुण्डक ( 1२1११ ) । मुक्तिगतिलक्षणा इस क्रमगति ( क्रममुक्ति ) के ' परामुक्ति, श्रपरामुक्ति ' भेद से दो विवर्त्त माने गए हैं । पहले ' अपरामुक्ति ' की ही मीमांसा कर लीजिए । जिस मुक्तिमार्ग में जीवात्मा ईश्वरबलाधान से मृत्युपाशच्छेद करता हुआ पाप - पुण्य दोनों का विधूनन कर निर्धूत किल्विष ( विपाप ) बनता हुआ अपने विशुद्धात्मरूप ( चिल्लक्षण जीवरूप ) से ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित रहता है, वही इसकी प्रपरामुक्ति है । इसमें जीव का जीवत्व सुरक्षित रहता है । इस अपरामुक्ति के ' सालोक्य, सामिप्य, सारूप्य, सायुज्य ' भेद द्गत्वा न निवर्त्तन्ते तद्धाम परमं मम ( श्रव्ययधाम ) । [ २०८ ]