Part IV Atmgativigyanopanishta Part 4 — पृष्ठ 41–50
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४ · पृष्ठ 41–50
पृष्ठ 41
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिमूलकात्मस्वरूपपरिचय वक्तव्य यही है कि अन्नमय के भीतर सूक्ष्म प्राणमयकोश प्रतिष्ठित है । यही शरीर का विधर्त्ता है । यही अन्तरात्मा है । ' प्राणमय कोश - अन्नमय कोश के भीतर है ' इस वाक्य का भली - भाँति समन्वय कर लेना चाहिए । ' अन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः ' से श्रुति का क्या अभिप्राय है । जिस प्रकार एक बड़े वसु-धानकोश ( डब्बे ) के भीतर छोटा वसुधानकोश प्रतिष्ठित रहता है, क्या उसी प्रकार अन्नमयकोश ( शरीर ) के भीतर प्राणमयकोश प्रतिष्ठित है? ' नेति होवाच । अपितु जिस प्रकार जल मिश्रीखण्ड में मधुर रस प्रतिष्ठित हैं, किंवा जल में लवण प्रतिष्ठित है, एवमेव अन्नमय कोश के भीतर प्राणमयकोश प्रतिष्ठित है । अर्थात् मिश्री के बाहर - भीतर सब ओर जैसे मधुर रस व्याप्त है, एवमेव शरीर के बाहर भीतर, सब र प्राणतत्त्व व्याप्त है । अन्नमयकोश के अणु अणु में अन्नमयकोश व्याप्त है । ' अन्तरं मृत्योरमृतं मृत्यावृमृतम-हितम् ' के अनुसार ' प्रोत प्रोतभाव ' सम्बन्ध कहलाया है । शरीर प्राण प्रोत है, प्राण शरीर में प्रोत है । यदि ऐसा सम्बन्ध है, तो ' अन्तरात्मा ' का क्या अर्थ? उत्तर स्पष्ट है । यहाँ ' अन्तर: ' से केवल सूक्ष्म-भाव अभिप्रेत है । पाँचों कोश उत्तर - उत्तरकोशापेक्षया सूक्ष्म हैं । सूक्ष्मत्वेनैव ' बहिरन्तः ' व्यवहार व्यव-स्थित है । यदि ऐसा न माना जायगा, तो ' तेनैषपूर्ण ' का कोई अर्थ न होगा । श्रुति कहती है- इस प्राण-मयकोश से यह अन्नमयकोंश, किंवा अन्नमयकोश से प्राणमय कोशपूर्ण है । अर्थात् यदवच्छेदेन अन्नमय कोश व्याप्त है, तदवच्छेदेनैव प्राणमयकोश व्याप्त है । पुरुषविधता - समर्थन भी इसी श्रोत - प्रोत भाव का समर्थन कर रहा है । अन्नमयकोश सप्तपुरुषपुरुषात्मक बतलाया गया है । चूंकि प्राणमयकोश इस अन्नमय-कोश से समतुलित है, अतएव कहा जा सकता है कि, जैसा संस्थाक्रम अन्नमयपुरुष का है, ठीक वैसा ही संस्थाक्रम इस प्राणमयपुरुष का है । प्राणमय कोश का आकार भी पुरुषविध ( सप्तपुरुषात्मक अन्नरसमय पुरुषविध शरीरविध ) ही है । इसी अभिप्राय से कहा गया है— ' तस्य पुरुषविधतामनु- श्रयं पुरुषविधः । ' बतलाया गया है कि ग्रानन्दमयकोश से आरम्भ कर अन्नमयकोश पर्य्यन्त अवारपारीण वहीं एक सत्यात्मां अखण्डात्मा ) आधाररूप से व्याप्त है । उसी के सम्बन्ध से ग्रन्नमयकोश पुरुष कहलाया है । एवं जो अन्नमयकोश का आत्मा है, वही इस प्राणमयकोश का श्रात्मा है । कोश भिन्न - भिन्न हैं, कोशाधार-1. भूत प्रखण्डसत्यात्मा सब में अभिन्न है । उसी आत्मसत्य सम्बन्ध से प्राणमयादिकोश भी ' अन्तरात्मा प्राणमयः ' इत्यादि रूप से ' आत्मा ' नाम से व्यवहृत हो रहे हैं । प्रारणमयकोश में ' आत्म - शरीर ' दो विभाग हैं । यही विभाग द्वयी पाँचों कोशों में व्यवस्थित है, जैसा कि अनुपद में ही स्पष्ट होने वाला है । इन दोनों . विभागों में अन्न ( शरीर ) प्राण - मन- विज्ञान - प्रानन्द, ये पाँचों बलचितियाँ शरीरपर्व हैं, साथ ही बल-ग्रन्थिभेद से पाँचों परस्पर भिन्न हैं । एवं पाँचों में श्राधाररूप से प्रतिष्ठित रसैकघन प्रखण्ड सत्यतत्त्व ही आत्मा है । इन पाँच शरीरों के सम्बन्ध से ही यह ' शरीर आत्मा ' कहलाया है । जहाँ पाँचों शरीर ( नादि पाँचों कोश ) परस्पर भिन्न हैं, वहाँ यह शरीर आत्मा ( अखण्ड सत्यात्मा ) पाँचो में अभिन्न है । उसी सत्यात्मतत्त्व को लक्ष्य में रख कर श्रुति ने कहा है- ' तस्य - प्रारणमय कोशस्य - एष एवं सत्यात्मव- शरीर श्रात्मा यः पूर्वस्य- मनोमयकोशस्य । ' अन्नमयकोश के सम्बन्ध में ' तस्यैष एव शरीरात्मा यः पूर्वस्य ' यह नहीं कहा गया है । कारण यही है कि पाञ्चभौतिक अन्नमयकोश ( शरीर ) में तमोगुणप्रधान प्रधानभूतावरण से श्रात्मज्योति सर्वथा अभिभूत है । अतएव शरीर मर्त्य कहलाया है । अन्नरसमय शरीरातिरिक्त शेष चारों में चूंकि आत्मा का उत्तरोत्तर विकास है, अतएव इन चार कोशों के सम्बन्ध में ही आत्म व्यवहार हुआ है । [ ३४ ]
पृष्ठ 42
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्डं आत्मगतिमूलकात्मस्वरूपपरिचय प्राणमय कोश की पुरुषविधता अन्नमयकोश की पुरुषविधता से समतुलित बतलाई गई है । वस्तु-तस्तु प्रन्नमयकोश की पुरुषविधता प्राणमयकोश की पुरुषविधता से समतुलित है । केवल समझाने के लिए श्रुति ने स्थूलारुन्धती न्याय से विपरीत क्रम का आश्रय लिया है । प्राणतत्त्व ही ' असत् ' नाम से व्यवहृत हुआ है । यही ऋषि - पदार्थ है । यह ऋषिपदार्थ एकषि, द्वयषि, त्र्यषि, सप्तर्षि भेद से अनेक जातियों में विभक्त हैं । इनमें पुरुष सृष्टि की प्रतिष्ठा सप्तर्षिप्रारण ही माना गया है । यही सप्तर्षिप्राण ' साकञ्जप्राण ' नाम से भी प्रसिद्ध है । इस साकञ्जप्रारण की परस्पर चिति से यह साकञ्जप्रारण " चत्वार श्रात्मा, द्वौ पक्षौ, पुच्छं प्रतिष्ठा " इस रूप से सप्तसंस्थास्वरूप में परिणत हो जाता है । यह एक प्रकार का सांचों है । इस सांचे का जैसा स्वरूप संस्थान है, सांचे में ढले हुए भूतमात्राप्रधान शरीर का, किंवा अन्नरसमय-. पुरुष का, किंवा अन्नमयकोश का भी वैसा ही स्वरूप होता है और इसी दृष्टि से यह कहा जा सकता कि • प्राणमयपुरुष की पुरुषविधता से अन्नमयकोश की पुरुषविधता समतुलित है । सांचे का ( प्रारंणमयकोश का ) जितना प्राकार, जैसा अतएव संस्थान पहले से नियत रहता है, उसमें ढले हुए अन्नमयकोश ( शरीर ) का उतना ही प्रकार, वैसा ही अवयव संस्थान व्यवस्थित रहता है । ये प्राणात्मक सांचे समान नहीं हैं, अपितु विषय हैं । अतएव शरीराकार भी सब के परस्पर विषम हैं । इस विषमता की मूल प्रतिष्ठा शुक्रस्थ. महानात्मपिण्ड है, जिसे हमने प्रशौचविज्ञान प्रकरण में ' बीजपिण्ड ' नाम से व्यवहृत किया है । पितृप्रारण-मय महानात्मा ही बीजपिण्ड है, जो शुक्राहुति द्वारा साप्तपौरुष सापिण्ड्य वितान का कारण बनता है । इसीलिए इसे योनि कहा जाता है । योनिलक्षण इस शुक्रावच्छिन्न महात्मा के सत्व, रज, तम, आकृति, प्रकृति, प्रकृति ये ६ भाव हैं, जिनका आत्मविज्ञानोपनिषदन्तर्गत महानात्मविज्ञानोपनिषत् नामक प्रवान्तरं प्रकरण में विस्तार से निरूपण किया जा चुका है । चतुरशीतिकल पितृपिण्ड भेद से प्राकृत्यधिष्ठाता महान् आरम्भ में चतुरशीति - विध ( ६४ प्रकार का ) बनता हुआ आगे जाकर अपने व्यूहनधर्म से चतुर-शीति लक्ष संख्या में परिणत हो रहा है । ये ही प्रजासर्ग के नियत सांचे हैं । पितृप्राणात्मक प्रकृतिलक्षण इन महद्योनियों के भेद से ही शरीराकृतियों में भेद व्यवस्था हुई है । महान शुक्रावच्छिन्न है, शुक्र अन्नरस-मय है, यही अन्नमयकोश ( शरीर ) है । इसी दृष्टि से ( शुक्रावच्छिन्न महत् दृष्टि से ) प्राणमयकोश की पुरुषविधता अन्नमयकोश की पुरुषविधता से समतुलित मान ली गई है । प्राणात्मक सांचा महदवच्छिन्न है, महान् शुक्रमय है, शुक्र ही रूपान्तरित होकर अन्नमयकोश है । विशुद्धप्रारण दृष्ट्या ( साकञ्जप्राणदृष्ट्यां ' तस्य ० ' इत्यादि का - ' प्रारणमयकोशस्य पुरुषविधतामनु - श्रन्नमय कोश: पुरुष: ' जहाँ यह समन्वय मान्य है, वहाँ शुक्रात्मक पितृप्राणमूर्ति महत्- बीज की दृष्टिसे - ' अन्नमयस्य पुरुषविधतामनु प्राणमयः पुरुषविध: ' यह समन्वय भी यथार्थ है । सर्वाङ्गशरीर में शरीर प्रतिष्ठारूप प्रतिष्ठित, शरीराकृति से समतुलित इस प्राणमयकोश के आगे जाकर त्रैलोक्यरसात्मक आधिदैविक प्रारण समावेश से तीन किंवा पाँच विवर्त हो जाते हैं । आगत पार्थिव प्राण बस्तिगुहा में प्रतिष्ठित होता है, प्रागत अन्तरिक्ष्यप्राण उदरगुहा में प्रतिष्ठित होता है एवं आगत दिव्यप्राण उरोगुहा में प्रतिष्ठित होता है । प्रवर्ग - बिल, ऊर्ध्वबुध्न शिरोगुहा में प्रथम प्रथम विकसित होने वाला पूर्वोक्त सप्तर्षिप्रारण लक्षण साकञ्जप्राण ( प्राणमयकोश ) आगे जाकर उर - उदर - बस्तिगुहात्रयी [ ३५ ]
पृष्ठ 43
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तद्वंद गां श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड आत्मगतिमूलकात्मस्वरूपपरिचयं में प्रतिष्ठित दिव्य - प्रान्तरिक्ष्य - पार्थिव - प्राणत्रयी में युक्त होकर स्वयमपि चार संस्थानों में विभक्त हो जाता है, जैसा कि - ' गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ' इत्यादि वचन से स्पष्ट है । पार्थिवप्राण आगच्छत्-दशा में समान है, निर्गच्छदशा में यही अपान कहलाने लगता है । दिव्यसौर प्रारण आगच्छत् दशा में प्राण है, निर्गच्छदशा में यही उदान कहलाने लगता है । इस प्रकार आगमन निर्गमन भेद से प्राद्यन्त के प्राणों की दो - दो अवस्था हो जाती है । मध्यस्थ अन्तरिक्ष्य प्राण वायव्य है, पार्थिव प्राणद्वयी आग्नेयी है, सौरप्राणद्वयी ऐन्द्री है । मध्यस्थ वायव्य प्रारण ही दोनों युग्मों का स्वरूपरक्षक है । यही ' व्यान ' नाम का मध्यस्थ वामन प्राण है - ' मध्येवामनमासीनं सर्वे देवा उपासते । ' प्राणोदान ' प्राण ' है, यही दिव्य-प्राण ' द्यौ मूर्द्धा ' न्याय से इस प्राणमय पुरुष का ' शिर ' है । अपने आधार पर प्राणपान के संघर्ष द्वारा वैश्वानराग्नि लक्षण जाठराग्नि की स्वरूप रक्षा करने वाला मध्यस्थ व्यान ही दक्षिणस्थ वैश्वानराग्नि सम्बन्ध से इस प्राणमय पुरुष का दक्षिणपक्ष ( श्राग्नेय पक्ष ) है । अपान - समान- ' अपान ' है, यही पार्थिव प्रारण अपने आधारभूत जलतत्त्व के सम्बन्ध से उत्तरपक्ष ( सौम्यपक्ष ) है | शरीराकाश श्रात्मा एवं शरीर पुच्छ प्रतिष्ठा है । प्राणमय कोश के आधार पर इस पाञ्चभौतिक अन्नमयकोश में ( शरीर में ) अवान्तर कितने प्रारण प्रतिष्ठित हैं? इस सम्बन्ध में स्वयं महर्षियों के भी ' को हि तद्वोद यावन्त इमेऽन्तरात्मन् प्राणा: ' ( श. ७।२।२।२० ) ये उद्गार हैं । केवल व्यानप्रारण के ही कृकल - धनञ्जय - हंस - नार्गदि अनेक विवर्त्त हैं । द्वासप्ततिसहस्र नाड़ी - भेद से इतने ही प्राणविवर्त्त हो जाते हैं । इन सब प्राणविवर्त्ती को " प्रतिष्ठाप्रारण, जीवनीयप्रारण, इन्द्रियप्रारण, देवप्रारण. ब्रह्मप्राण " इन पाँच भागों में विभक्त माना जा सकता है । अमृत, मृत्युभेद भिन्न-प्राजापत्यप्राणयुग्म को प्रतिष्ठाप्राण कहा जा सकता है । प्राणो - दान - व्यान - प्रपान - समान - समष्टि जीवनीयप्रारण है । पार्थिवप्राण ( प्राङ्गिरस गायत्रप्रारण ) ही मर्त्यप्रतिष्ठा है एवं सौरदिव्यप्राण ( सावित्र प्राण ) ही अमृत प्रतिष्ठा है । पार्थिवस्तौम्य अग्नि- वायु - प्रादित्य- दिक्सोम - भास्वरसोम इन पाँच देवताओं के प्रवर्ग्यभूत क्रमशः वाक्, प्राण, चक्षु, श्रौत्र, मन इन पाँच इन्द्रियप्राणों की समष्टि इन्द्रियप्रारण हैं । त्रिवृत्स्तोमावच्छिन्न प्रतिष्ठावा पार्थिव वैश्वानर अग्नि का प्रवर्ग्यभूत अर्थशक्तिमय पार्थिव वैश्वानर प्राण, . पञ्चदशस्तोमावच्छिन्न प्रतिष्ठावा अन्तरिक्ष्य हिरण्यगर्भ वायु का प्रवर्ग्यभूत क्रिया शक्तिमय आन्तरिक्ष्य तैजसप्राण, एवं एकविशस्तोमावच्छिन्न प्रतिष्ठावा दिव्य सर्वज्ञ इन्द्र का प्रवर्यभूत ज्ञानशक्तिमय दिव्य प्राज्ञप्राण, तीनो प्राणों की समष्टि देवप्रारण है एवं ' इदं शिरः ' - ' चत्वार आत्मा ' - ' द्वौ पक्षी ' - पुच्छं प्रतिष्ठा ' भेद से चतुष्पाद बना हुआ सप्तपुरुष पुरुषात्मक कोशप्राण ही पाँचवा ब्रह्मप्रारण हैं । इन सब प्राणों की समष्टिरूप अन्नशरीरनेता ( अन्नमयकोश की प्रतिष्ठा ) यही दूसरा क्रम प्राप्त प्राणमयकोश है । जिसका निम्नलिखित शब्दों में स्पष्टीकरण हुआ है— १ - " तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयादन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामनु - अयं पुरुष-विधः । तस्य प्रारण एव शिरः, व्यानो दक्षिणः पक्षः, अपान उत्तरः: पक्षः, आकाश आत्मा, पृथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा । ” [ ३६ ]
पृष्ठ 44
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिमूलकात्मस्वरूपपरिचय २ - " प्राणोब्रह्म ेति व्यजानात् । प्राणाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते, प्राणेन जातानि जीवन्ति, प्राणं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । "
- " प्राणं देवा अनुप्राणन्ति मनुष्याः पशवश्च ये ।
प्राणो हि भूतानामायुस्तस्मात् सर्वायुषमुच्यते ॥
सर्वमेव ते आयुर्यन्ति ये प्राणं ब्रह्मोपासते । प्राणो हि भूतानामायुः ।
तस्मात् सर्वायुषमुच्यते । तस्यैष एव शारीर श्रात्मा यः पूर्वस्य ॥
( तै ० उ ० २।२-३ ) । ३. मनोमयकोशः ( मनः ) -- ** -अन्नमयकोश अर्थप्रधान है, तदन्तर्गभित प्रारणमयकोश क्रिया प्रधान है । अर्थात्मक शरीर में प्रति-ष्ठित अन्न शरीरनेता प्राण आध्यात्मिक कर्म्म - कलाप का सञ्चालन करने में तभी समर्थ बनता है, जबकि यह किसी अन्य ज्ञानभूमिका को अपना आधार बना लेता है । बिना कामना के प्राणात्मिका जड़ क्रिया का सञ्चालन सर्वथा असम्भव है । क्रियात्मक, क्रियाप्रवर्त्तक, प्राणमय कोश के भीतर प्रतप्रोत सम्बन्ध से प्रतिष्ठित रहने वाला काममय वही तीसरा ज्ञानकोश ' मनोमयकोश ' कहलाया हैं । प्रतिष्ठा - जीवनीय-इन्द्रिय - देव - ब्रह्म भेद भिन्न पञ्चप्राणमूर्ति क्रियामपप्रारण कोश इस मनोमय कोश का शरीर है । अतएव इसे ' प्राणशरीरनेता ' कहा गया है । इस मनोमय् आत्मा से यह प्राणमय आत्मा परिपूर्ण है । यदवच्छेदेन प्राणमय कोश व्याप्त है, तदवच्छेदेनैव मनोमयकोश व्याप्त है । यह मनोमय कोश भी प्राणमय कोश की भाँति सप्तपुरुष पुरुत्रात्मक बनता हुआ पुरुषविध है । सूक्ष्मदृष्टि से मनोमय कोश की पुरुष विधता ही प्राणमयकोश की पुरुष विधता है, एवं स्थूल दृष्टि से प्राणमयकोश की पुरुषविधता मनोमयकोश की पुरुषविधता की प्रतिष्ठा है । ऋक्, यजुः, साम, अथर्व भेद से अपौरुषेय - ब्रह्मनिःश्वसित वेदतत्त्व चार विवर्त्तभावों में परिणत रहता है । इन चारों में ऋक्, साम - यजुः की समष्टि ' ब्रह्म ' वेद है, यही स्वायम्भुव सत्याग्निवेद है । अथर्व ब्रह्म वेद है, वही परमेष्ठ्य ऋतसोमवेद है । सत्य ऋतात्मिक यह वेद चतुष्टयी मनोमय आत्मा को कामना द्वारा प्राणसम्बन्ध से वागुपादनत्वेन सृष्टिकर्म में प्रवृत्त करती है । त्रयीवेद में यजुर्भाग वय ( विषय ) रूप है, वस्तुतत्वात्मक है एवं ऋक् सोम वयोनाध ( प्रायतन - छन्द - सीमा ) लक्षण हैं । जिस प्रकार दक्षिणोत्तर पार्श्वरूप कपाटद्वय से वस्तुतत्त्वलक्षण बीज सीमित रहता हुआ सुरक्षित है, एवमेव ऋक् साम कपाटों से वयरूप यजुः सीमित रहता हुआ सुरक्षित है । ऋक् अग्नि प्रधान है, अग्नि की [ ३७ ]
पृष्ठ 45
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्ध विज्ञान चतुर्थ खण्ड श्रात्मगतिमूलकात्मस्वरूपपरिचय अपनी दक्षिणा दिक् है, अतएव ऋगाग्नि को इस यजुः का दक्षिणपार्श्व माना जा सकता है । साम श्रादित्य प्रधान है, अदित्य की प्रतिष्ठा उत्तरादिकू मानी गई है । अतएव सामादित्य को इस यजुः का उत्तरपार्श्व माना जा सकता है । मध्यस्थ यजुः उसी प्रकार त्रयीवेद में प्रधान है, जैसे कि शरीर में शिर प्रधान है । इसी दृष्टि से यजु को ' शिर ' कहा जा सकता है । पारमेष्ठ्य प्रथर्वतत्त्व अथर्वाङ्गिरोमय है । भृगुभाग प्रथर्वा है, ङ्गिरा भाग श्रङ्गिरा है । स्नेहगुणक भृगु, तेजोगुरांक अङ्गिरा, दोनों की समष्टि ही ' आपो भृग्वङ्गिरोमयम् ' के अनुसार ' प्रापः ' है, यही सोमात्मक प्रथर्ववेद है । सोमान्न मनं ही प्रतिष्ठा है । अतएव इस सोमा लक्षण अथर्वाङ्गिरारूप अथर्ववेद ( सोमवेद ) को पुच्छप्रतिष्ठा कहा जा सकता | ' इदं कुरु इदं मा कुरु ', इदं कुर्वीय, इदं मे स्यात् इत्याद्याकारक मानस संकल्प ही मन के स्वरूप परिचायक हैं । दूसरे शब्दों में ये आध्यात्मिक आदेश ही मन के मुख्य स्वरूप हैं । अतएव इन्हें आत्म-स्थानीय माना जा सकता है । सोममय मन श्रग्निमय त्रयीवेद, सोममय अथर्ववेद, इस प्रकार अग्नि- सोम • द्वयी के सहयोग से ही कोशरूप में परिणत होता हुआ अध्यात्म संस्था में प्रतिष्ठित है । चतुर्वेद प्राण सम्बन्ध से शिर - पक्ष - पुच्छ प्रतिष्ठात्मक बनता हुआ तथा स्वसंकल्प द्वारा श्रात्मलक्षण बनता हुआ यही कोश काम, संकल्प, विचिकित्सा, श्रद्धा, अश्रद्धा, धृति, अधृति, धी, ही, भी इत्यादि आध्यात्मिक वृत्तियों की प्रतिष्ठा बन रहा है । इन्हीं विरुद्धाविरुद्ध भावों से यह काममय- प्रकाममय, क्रोधमय - क्रोधमय, धर्म मय - अधर्ममय बनता हुआ उच्चावच भावों का अनुगामी बन रहा है । शेष भाग पूर्व के प्राणमयकोश निरूपण से गतार्थ है । प्राणशरीरनेता मनोमय कोश के इसी स्वरूप को लक्ष में रख कर श्रुति ने कहा है-१ - " तस्माद्वा एतस्मात् प्राणमयादन्योऽन्तर श्रात्मा मनोमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामनु - प्रयं पुरुषविधः । तस्य यजुरेव शिरः, ऋग्दक्षिणः पक्षः, सामोत्तरः पक्षः, प्रदेश श्रात्मा, अथर्वाङ्गिरसः पुच्छं प्रतिष्ठा । " २ - " मनो ब्रह्म ेति व्यजानात् मनसो ह्यव खल्विमानि भूतानि जायन्ते, मनसा जातानि जीवन्ति, मनः प्रयन्त्यभि संविशन्ति । "
३ – “ यतो वाचो निवर्त्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।
नन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कदाचन ॥
तस्यैष एव शारीरात्मा यः पूर्वस्य ॥ ” ( तै ० उ ० २।३–४ ) । * " उदिति, सोऽससावादित्यः । " ( जै ० उ ० २।६।८ ) । " द्यौर्वा उत्तरं सधस्थम् । " ( शत ० ८ । ६ । ३ । २३ ) । " स वा एष ( श्रादित्यः ) उत्तरः । " ( ऐ ० ब्रा ० ४।१८ ) । [ ३८ ]
पृष्ठ 46
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्ध विज्ञान चतुर्थ खण्ड ४. विज्ञानमयकोश ( विज्ञानम् ) -श्रात्मगतिमूलकात्मस्वरूपपरिचय www काम - क्रोध - लोभादि भावों के प्रवर्तक आहार - निद्रा - भय - मैथुनादि के सञ्चालक, सर्वप्राणि शरीर में समानरूप से प्रतिष्ठित, प्रज्ञान नामक चान्द्रमन की प्रतिष्ठारूप, प्राणशरीरनेता मनोमय श्रात्मा के गर्भ में चौथा वह विज्ञानमय कोश प्रतिष्ठित है, जो विद्या - प्रविद्यात्मिका सौरी बुद्धि की प्रतिष्ठा माना गया है । जो कि बुद्धि तत्त्व इसी विज्ञानमय कोश के सम्बन्ध से ' विज्ञानात्मा ' नाम से व्यवहुत हुई है, जो कि विज्ञानात्मा ( बुद्धि ) प्रज्ञानमन की भाँति प्राणियों में समानरूप से प्रतिष्ठित न होकर विद्वान्, मूर्ख, पशु पक्षी, कृमि, कीट आदि सर्ग भेद से तारतम्य से प्रतिष्ठित है । जो कि विज्ञान तारतम्य उच्च - नीच श्रादि श्रेणी - विभागों की मूल प्रतिष्ठा बनता है । जो कि विज्ञान प्रज्ञानवत् विषयागमन की प्रतीक्षा न कर स्वयं विषयों के प्रति अनुधावन करता रहता है । जो कि विज्ञान प्रज्ञानवत् परज्योतिर्मय न बनता हुआ स्वज्योति बन रहा है । इसी विज्ञान का आधार मनोमय कोश का आलम्बन, आत्मानन्द का सम-सम्बन्धी चौथा विज्ञानमय कोश है । मनोमय कोश की प्रतिष्ठा होने से ही इसे ' मनः शरीरनेता ' कहा गया है । इस विज्ञानमय आत्मा से वह मनोमय आत्मा परिपूर्ण है । यदवच्छेदेन मनोमयकोश व्याप्त है, तदवच्छेदेनैव यह विज्ञानमय कोश व्याप्त है । यह भी मनोमय कोश की भाँति सप्तपुरुषपुरुषात्मक बनता हुआ पुरुषविध है । सूक्ष्मदृष्टि से विज्ञानमय कोश की पुरुषविधता मनोमयकोश की पुरुषविधता की प्रतिष्ठा है, एवं स्थूल दृष्टि से मनोमयकोश की पुरुषविधता विज्ञानमय कोश की पुरुषविधता की प्रतिष्ठा है । श्रद्धा, सत्य, ऋत, योग, महः ये पाँच मानस भाव ही इस विज्ञानमय कोश के स्वरूप रक्षक माने गए हैं । सोममयी श्रद्धा, जिसका प्रस्तुत निबन्ध के पूर्व प्रकरणों में अनेकधा विश्लेषण किया जा चुका है— मनोमयी है । चान्द्ररस ही श्रद्धा है, यही मनोमयकोश की मूल प्रतिष्ठा है । मनोमयी यही श्रद्धा श्रध्या-त्मिक विज्ञानमय कोश की मुख्य प्रतिष्ठा है, अतएव इसे विज्ञानमय कोश की ' शिरः ' स्थानीया माना जा सकता है । मनोगत स्नेहगुणक भृगुरूप सोम भाग ही ऋत है, यह उत्तर से चल कर दक्षिण में प्रतिष्ठित रहता है । अतएव इस सोमात्मक मनोमय ऋत को विज्ञानमयकोश का दक्षिणपक्ष माना जा सकता है । मनोगत तेजोगुणक अङ्गिरात्मक अग्नि भाग ही सत्य है, यह दक्षिण से चलकर उत्तर में प्रतिष्ठितः रहता है । अतएव इस ग्रग्न्यात्मक मनोमय सत्यभाग को विज्ञानमयकोश का उत्तरपक्ष माना जा सकता है । बुद्धियोगलक्षण आत्मयोग ही विज्ञानमयकोश का मूलाधार है, अतएव ऐसे इस निष्काम कर्म्म लक्षण योग ( समत्वयोग, बुद्धियोग ) को इस विज्ञानमयकोश का आत्मा कहा जा सकता है । चान्द्रप्राण ही महः है, तत् सम्बन्ध से ही चन्द्रमा ' महान ' कहलाया है । जब तक महच्चन्द्रलक्षण मनोमयकोश अध्यात्म में प्रतिष्ठित रहता है, तभी तक विज्ञानमयकोश स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित रहता है । अतएव मानस महर्भाव को अवश्य ही इस विज्ञानमयकोश की पुच्छ - प्रतिष्ठा माना जा सकता है । विज्ञानमयकोश के इसी स्वरूप को लक्ष्य में रख कर श्रुति ने कहा है— * " तद्यदस्य तन्नामाकरोत् चन्द्रमाः - तद्रूपमभवत् प्रजापति वै चन्द्रमाः, प्रजापतिर्वै महान् " ( शत ० ६।१।३।१६ ) । [ ३ ९ ]
पृष्ठ 47
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिमूलकात्मस्वरूपपरिचय १ – “ तस्माद्वा एतस्मान्मनोमयादन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामनु - प्रयं पुरुष-विधः । तस्य श्रद्धैव शिरः, ऋतं दक्षिणः पक्षः, सत्यमुत्तरः पक्षः, योग आत्मा, महः पुच्छं प्रतिष्ठा । " - " विज्ञानं ब्रह्म ेति व्यजानात् । विज्ञानाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते विज्ञानेन जातानि जीवन्ति, विज्ञानं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । ”
- " विज्ञानं यज्ञं तनुते कर्माणि तनुतेऽपि च ।
विज्ञानं देवाः सर्वे ब्रह्मज्येष्ठमुपासते ॥
शरीरे पाप्मनो हित्वा सर्वान् कामान् समश्नुते । तस्यैष एव शारीर श्रात्मा यः पूर्वस्य ॥ " ( तै ० उ ० २।४–५ ) । आनन्दमयकोशः ( श्रानन्दः ) ज्यों - ज्यों विज्ञान विकसित होता जाता है, त्यों - त्यों आत्मा में प्रसादगुणलक्षण शान्तानन्द . विकसित होता जाता है । विज्ञान विकास ही आनन्द विकास की मूल प्रतिष्ठा है । यही आनन्दभाव शेष होती । चारों कोशों का मूलाधार है । बिना श्रानन्द के किसी भी कर्म में, किसी भी भोग में प्रवृत्ति नहीं आनन्द - इस आनन्द के अन्तः, बहिः भेद से दो विवर्त्त हो जाते हैं । विषयसम्पर्क से उत्पन्न तात्कालिक, बहिरानन्द है, यही विषयानन्द है, इसे ही समृद्धानन्द कहा जाता है । विषय से आनन्द उत्पन्न नहीं होता अपितु विषयागमन से आत्मानन्द में उसी प्रकार क्षणमात्र के लिए एक लहर उत्पन्न हो जाती है, जैसे शान्त सरोवर के शान्त पानी में लोष्ठाघात से क्षरणमात्र के लिए लहर उत्पन्न हो जाती है । क्षणोत्तर ही यह लहर शान्त भी हो जाती है । यही क्षणिकानन्द, किंवा मात्रानन्द है । इसी आनन्द का हमें अनुभव हुआ करता है । दूसरा श्रात्मानन्द स्वस्वरूप से सर्वथा शान्त है । उच्चावचभावशून्य, एकरस, प्रसादगुणा-त्मक, अनुभवातीत यही आत्मानन्द है, किंवा शाश्वत आनन्द है । ऐन्द्रियविषयानुगत मनोमयकोशाधिष्ठित - बुद्धि शाश्वतानन्द - प्रज्ञानमन क्षणिकानन्द प्रवृत्ति का कारण है, एवं विज्ञानमय कोशाधिष्ठिता विज्ञान है । • विकास की प्रतिष्ठा है । विज्ञानमय कोशाधारभूत यही आत्मानन्दमय ' विज्ञानशरीरनेता ' कहलाया व्याप्त है, इस आनन्दमय आत्मा से वह विज्ञानमय आत्मा परिपूर्ण है । यदवच्छेदेन विज्ञानमयकोश श्रानन्दमयकोश तदवच्छेदेनैव यह श्रानन्दमयकोश व्याप्त है । सूक्ष्मदृष्टि से विज्ञानमयकोश की पुरुषविधता की की पुरुषविधता पर प्रतिष्ठित है, एवं स्थूलदृष्ट्या ग्रानन्दमयकोश की पुरुषविधता विज्ञानमयकोश पुरुषविधता पर प्रतिष्ठित है । [ ४० ]
पृष्ठ 48
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिमूलकात्मस्वरूपपरिचय प्रिय, मोद, प्रमाद, श्रानन्द, ब्रह्म ये पाँच विज्ञानभाव ही इस आनन्दमयकोश के स्वरूपरक्षक माने गए हैं । इन पाँचों में आदि के चार भाव व्यक्त हैं, पाँचवां ब्रह्मभाव अव्यक्त है । विज्ञानमयकोशानुगत विज्ञानात्मा ( बुद्धि ) के तारतम्य से एक ही प्रानन्द के चार विवर्त्त हो जाते हैं । इन चारों को ही हम ' समृद्धानन्द ' कह सकते हैं, जिसका विषयानन्दरूप से पूर्व में स्पष्टीकरण हुआ है । पाँचवां ब्रह्मभाव भी आनन्द ही है । परन्तु यह शान्ति प्रतिष्ठाभावात्मक बनता हुआ विषयानन्द मर्यादा से बहिर्भूत है । समृद्धिभाव विरहित होने से समृद्धि सूचक ( टुनदिसमृद्धौ ) आनन्द शब्द से इस शान्तानन्द का अभिनय न होकर केवल शान्तिप्रतिष्ठा - सूचक ' ब्रह्म ' शब्द से इसका उल्लेख हुआ | विज्ञान सम्बन्ध से आत्मा उसी प्रकार शरीर - पानी - पुत्र - अनुचर - द्रव्य आदि में व्याप्त हो जाता है, जैसे सौरहिरण्यमय विज्ञानमय पुरुष स्वविभूति सम्बन्ध से सूर्य्य - रोदसी त्रिलोकी - तद्गत अन्य पृथिव्यादि पदार्थों में व्याप्त रहता इस आधार पर ' यावद्वित्तं तावदात्मा ' यह सिद्धान्त प्रतिष्ठित है । इस विज्ञानात्मवित्त के अन्तर्वित्त, बहिर्वित्त, भेद से दो विवर्त्त हैं । आगे जाकर प्रत्येक के गौण, मुख्य भेद से दो - दो विवर्त हो जाते हैं । इन्द्रियवर्ग, पञ्चप्राण, पञ्चभूतात्मक शरीर आदि भोगायतन तथा भोगसाधन पर्व ( अन्नमयकोश ) मुख्य अन्तर्वित्त है, पुत्र - कन्या – स्त्री - स्वबन्धुबान्धव, ये गौण प्रन्तवित्त हैं । पशु, अनुचर, आवासभूमि, कोशस्थद्रव्य, भोग्य. अन्नसम्पत्ति, और और वे परिग्रह जिनका दैनिक रूप से उपयोग होता है, मुख्य बहिर्वित्त है एवं उद्यान, सरोवर, मार्ग, परिचित सहयोगी इत्यादि वे परिग्रह, जो यदा - कदा उपयोग में आते रहते हैं, गौण. बहिर्वित्त है । विज्ञानात्मविभूति से सम्बन्ध रखने वाले ये चार अन्तर्बहिवित्त ही प्रियादि चारों विज्ञान भावों के प्रवर्त्तक बनते हैं । इनमें मुख्य अन्तर्वित्त का ' प्रिय ' भाव से सम्बन्ध है, अतएव इसे ' शिरः ' कहा जा सकता है । गौरण अन्तर्वित्त का ' आनन्द ' भाव से सम्बन्ध है, अतएव इसे ' आत्मा ' कहा जा सकता है । मुख्य बहिवित्त का ' प्रमोद ' से सम्बन्ध है, यही उत्तरपक्ष है । गौरा बहिर्वित्त का मोद से सम्बन्ध है, यही दक्षिणपक्ष है । इन्द्रियवर्गादिसमष्टिरूप अन्नमय कोशात्मक मुख्य अन्तवित्त ही आत्मपूर्णता की प्रतिष्ठा है, अतएव ' प्रिय ' कहना श्रन्वर्थ बनता है । पुत्र - कन्यादि गौण प्रन्तवित्त ही अध्यात्म संस्था की लौकिक समृद्धि है, अतएव इसे आनन्द कहना अन्वर्थ बनता है । पश्वनुचरादि मुख्य बहिर्वित्त ही विशेष साधक बनता हुआ प्रकृष्ट- हर्षलक्षण प्रमोदभाव का समर्थक बन रहा है एवं उद्यान - सरोवरादि गौण बहिर्वित्त सामान्यतः हर्षं ( आत्मप्रसाद ) के कारण बनते हुए मोदात्मक बन रहे हैं । चारों में मुख्यवित्त मुख्यलक्षण ' ( अन्नमयकोश लक्षण ) अन्तर्वित्त है, अतएव इसे आनन्दमय पुरुष का शिर कहा जा सकता है । गौणबहिर्वित्त ही आत्मानन्द की ऐहलौकिक विभूति का परिचायक है, यही इसका प्रजापतित्व है । इस प्राजापत्य भावा-पेक्षया गौर - अन्तवित्तानुगत आनन्द को आनन्दमय कोश का आत्मा कही जा सकता है । मुख्य वित्त विशेष रूप से भोग्य है, भोग्य ही अन्न है, यही सोम है, यह उत्तरदिक्स्थ है । इसी सम्बन्ध से प्रमोद को आनन्दमयकोश का उत्तरपक्ष माना जा सकता है । गौण बहिर्वित्त सामान्य भोग्य है, इसके साथ अन्य अन्नादों का भी सम्बन्ध रहता है । इसी प्रन्नादाग्नि सम्बन्ध से तदनुगता दक्षिणादिक् की अपेक्षा से गौण बहिर्वित्तजनित मोद को प्रानन्दमय पुरुष का दक्षिणपक्ष माना जा सकता है । पाँचवां शान्ति प्रतिष्ठा लक्षण नित्य विज्ञानानन्द रसैकमूत्ति ब्रह्मभाव ही इस आनन्दमय की पुच्छप्रतिष्ठा है । ग्रानन्दमयकोश के इसी स्वरूप का निम्नलिखित शब्दों में स्पष्टीकरण हुआ है-[ ४१ ]
पृष्ठ 49
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिमूलकात्म स्वरूपपरिचय - " तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयादन्योऽन्तरात्माऽऽनन्दमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः । तस्य प्रियमेव शिरः, मोदो दक्षिणः पक्षः, प्रमोद उत्तरः पक्षः, श्रानन्द आत्मा, ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा । " - " श्रानन्दो ब्रह्म ेति व्यजानात् । श्रानन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते, आनन्देन जातानि जीवन्ति, आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । • सैषा भार्गवी वारुणी विद्या । परमे व्योमन् प्रतिष्ठिता । य एवं वेद, प्रतितिष्ठति, अन्नवानन्नादो भवति, महान् भवति प्रजया, पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या । " ३ – प्रसन्नेव स भवति असद् ब्रह्म ेति वेद चेत् । 1 अस्ति ब्रह्म ेति चेद्वेद, तस्यैष एव शारीरात्मा सन्तमेन ततो विदुः ॥ यः पूर्वस्य । " ---- सत्यात्मा - शारीरात्मा-तेज- अप् - अन्न, इन तीनों के त्रिवृत्करण से उत्पन्न, पृथिव्यप्तेजवाय्वाकाशात्मक, रसासृङ्मांस-मेदो s स्थिमज्जशु सप्तधातुमय दृश्यकोश ही ' अन्नमयकोश ' है, भौम ' शरीरात्मा ' इसी अन्नमयकोश में प्रतिष्ठित है । प्रतिष्ठा जीवनीय - इन्द्रिय - देव - ब्रह्म - भेदेन पञ्चप्राणात्मक कोश ही प्राणमयकोश है, पार्थिव प्राणात्मा ( वै ०० प्रा ० समष्टिरूप कर्मात्मा ) इसी प्राणमयकोश में प्रतिष्ठित है । काम संकल्पादियुक्त स्नेह तेजोमूर्ति कोश ही मनोमयकोश है । इन्द्रियाधिष्ठाता चान्द्रप्रज्ञानमन इसी मनोमयकोश में प्रतिष्ठित है । चान्द्रमहानात्मा का भी इसी में अन्तर्भाव है । चौथा विज्ञानमयकोश ही सौरीविज्ञानबुद्धि की प्रतिष्ठा है । पाँचवा आनन्दमय कोश ही स्वायम्भुव श्रव्यक्तात्मा की प्रतिष्ठा है, पारमेष्ठ्य यज्ञात्मा का भी इसी में अन्तर्भाव है इस प्रकार ये पाँचों कोश ६ खण्डात्मानों की प्रतिष्ठा बन रहे हैं, जिन छत्रों खण्डात्मानों का आत्मविज्ञानोपनिषत् में विस्तार से विश्लेषण किया जा चुका है । ये पाँचों कोश बलचिति - लक्षण हैं, इन पाँचों कोशों का विशद वैज्ञानिक विवेचन ' तैत्तिरीयोपनिषत् - हिन्दी - विज्ञानभाष्य ' में देखना चाहिए । [ ४२ ]
पृष्ठ 50
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिमूलकात्मस्वरूपपरिचय यह आरम्भ में ही स्पष्ट किया जा चुका है । इसी बलसम्बन्ध से इन पाँचों कोश- लक्षण श्रात्मानों को वस्तुतः ' शरीर ' ही कहा जायगा । शारीरमात्मा वही कहलायगा, जो पाँच खण्डों का ग्रखण्ड आधार बनता हुआ पाँचों में से आनन्दादि चार इन्द्रियातीत कोशों के ' यः पूर्वस्य ' रूप से प्रात्माभाव का समर्थक बन रहा है । यही वारपारीण छठा ' सत्यात्मा है, जिसका पाप - पुण्य, स्वर्ग - नरक, सदसद् इत्यादि पाप्म-द्वन्द्वों से कोई सम्बन्ध नहीं है एवं जिसका निम्नलिखित शब्दों में यशोगान हो रहा है-" सोऽपहतपाप्मा, विजरः, विमृत्युः, विशोकः, अविजिधित्सः, श्रपिपासः, सत्यकामः, सत्यसंकल्पः । सोऽन्वेष्टव्यः, स विजिज्ञासितव्यः । स सेतुविधृतिरेषां लोकानां ( कोशानां ) सम्मेदाय । नैनं सेतुमहोरात्रे तरतः, न जरा न मृत्युः, न शोकः, न सुकृतं दुष्कृतम् । सर्वे पाप्मानस्ततो निवर्त्तन्ते । यतोवा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्तिः स श्रात्मा ( सत्यात्मा - प्रखण्ड: ) । " अयमत्र संग्रह: -( ६ ) - * - प्रवारपारीणः सत्यात्मा ( १ सत्यम् ) + प्रखण्डः शारीर श्रात्मा -आनन्दमयकोश: ( ५ स्तर ) ( ५ ) – १- -आनन्दमय आत्मा--२ ( आनन्दः ) ( ४ ) – २ – विज्ञानमय आत्मा --( ३ ) - ३ - मनोमय आत्मा-( २ ) - ४ - प्राणमय आत्मा--( १ ) – ५ – अन्नमय श्रात्मा--३ ( विज्ञानम् ) -४ ( मनः ) -५ ( प्राण: ). -६ ( अन्नम् ) → विज्ञानमय कोश: ( ४ स्तर ) * मनोमयकोश: ( ३ स्तर ) प्राणमयकोशः ( २ स्तर ) + अन्नमय कोश: ( १ स्तर ) अवारपारीणः - सत्यात्मा [ ४३ ] – शरीरम् पञ्चकोशाः – कोशाधिष्ठाता शारीरः