Part IV Atmgativigyanopanishta Part 4 — पृष्ठ 51–60

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४ · पृष्ठ 51–60

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मगतिमूलकात्मस्वरूपपरिचय ७ ५ १ – श्रव्यक्तात्मा — स्वायम्भुवः ( ब्रह्मा ) ६ ४२- - यज्ञात्मा -पारमेष्ठयः ( यज्ञः ) }• + आनन्दमय कोशे प्रतिष्ठितौ ५ ३ ३ – विज्ञानात्मा -सौरः ( बुद्धिः ) ] विज्ञानमयकोशे प्रतिष्ठितः ४ २ ४ - प्रज्ञानात्मा — चान्द्रः ( मनः ) + मनोमयकोशे प्रतिष्ठितौ ३ १५ - महानात्मा - चान्द्रः ( महत् ) प्राज्ञः २ १--.. ६- तैजसः प्राणात्मा , पार्थिव: ( जीवः ) ] + प्राणमयकोशे प्रतिष्ठितः वैश्वानरः १ १ ७ - शरीरात्मा + भौम: ( शरीरम् ) ] अन्नमयकोशे प्रतिष्ठितः त्मा-: प्रखण्ड -• The शरीरस्थानीय उक्त पाँचों कोश सजातीयसमवाय दृष्टि से, स्वभुक्त सत्यात्मभुक्ति दृष्टि से, अवार-पारण सत्यात्मविभूति दृष्टि से शरीर श्रात्मा, सत्य तीनों शब्दों से व्यवहृत किए जा सकते हैं । प्रत्येक कोश विजातीयभाव विरहित सजातीय भावों की समष्टि बनता हुआ अन्य कोशस्वरूप से भिन्न है । अन्नमय-प्राणमय - मनोमय - विज्ञानमय - आनन्दमयकोश, पाँचों कोश ग्रन्न -प्राण - मन- विज्ञान - आनन्द लक्षण सजातीयभावों की समष्टि बनते हुए परस्पर एक दूसरे से विभिन्नधर्म्मा हैं । इस विभिन्न दृष्टि से ही एक के ग्रहण से अन्य का ग्रहण नहीं होता । बलचितिकृत इसी विभेद के कारण एक में अन्य का अन्तर्भाव सम्भव नहीं है । इसी बलचिति दृष्टि से पाँचों कोशों को भिन्न - भिन्न पाँच शरीर माना जा सकता है । समष्टिरूप से व्याप्त अवारपारीण सत्यात्मा इन उपाधियों के भेद से ' अविभक्तं विभक्तेषु विभक्तामेव च स्थितम् ' न्याय से इन शरीर स्थानीय पाँचों में विभक्तमर्यादा से युक्त होता हुआ पाँचों का स्वतन्त्र श्रात्मा बन रहा है । सत्यात्मभुक्ति से पाँचों को आत्म शब्द से भी व्यवहृत किया जा सकता है, जो कि आत्मव्यवहार यावदुपाधि पर्य्यन्त सर्वथा सत्य है, एवं जो कि आत्मव्यवहार ' आत्मगति ' की मूल प्रतिष्ठा बन रहा है । कोशभुक्त, कोशावच्छिन्न, खण्डात्मा ही गतिधर्म्म से आक्रान्त माना गया है । इसी सोपाधिक आत्मा का जन्म - मृत्यु - परलोकगमन आदि द्वन्द्वभावों से सम्बन्ध है । प्रातिस्विक व्यष्टिभुक्ति के अतिरिक्त समष्टिरूप से विभूति सम्बन्ध से भी इन पाँचों खण्डात्मक लक्षण खण्डकोशों पर सूर्य्यातपवत् अनुग्रह हो रहा है । इस विभूतिदृष्टि से इन्हें ' सत्य ' शब्द से भी व्यवहृत किया जा सकता है । जहाँ तक शरीर दृष्टि का सम्बन्ध है, वहाँ तक क्षणिक परिवर्तन का साम्राज्य है । जहाँ तक खण्डात्मदृष्टि का सम्बन्ध है, वहाँ [ ४४

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्डं प्रश्नपरम्परासमाधि ' तक ' वासांसि जीर्णानि विहाय ' लक्षण नव - नव शरीरानुगत जन्ममृत्यु - भावों का एवं गमनागमनद्वन्द्व का साम्राज्य है । जहाँ तक अखण्डात्मक लक्षण सत्य दृष्टि का सम्बन्ध है, वहाँ तक ' न जायते म्रियते ' लक्षण शाश्वतभाव का साम्राज्य है, एवं इसी आत्मस्वरूप विश्लेषण के आधार पर पूर्व प्रतिपादिता प्रश्नपरम्परा का एकान्ततः मूलोच्छेद हो रहा है । श्रुतिशास्त्र में वर्णित जो व्यवस्थाएँ परस्पर विप्रतिपन्न प्रतीत हो रही हैं, वह वस्तुतः आत्मस्वरूपपरिचयभावमूलिका हैं । आत्मविवर्त्त के सर्वथा विभक्त तथा सुव्यवस्थित, उपाधिभेदभिन्न तत्तद्विशेष भावों से सम्बद्ध तत्तद् विशेष व्यवस्था समर्थक वचन तत्तद्विशेषात्मभेददृष्टया सर्वथा निर्विरोध है, जैसा कि अगले परिच्छेद से स्पष्ट हो रहा है— प्रश्नपरम्परासमाधिः जिन १२ प्रश्नों का पूर्व में उल्लेख हुआ है, उन्हें क्रमशः लक्ष्य बनाते हुए ही प्रस्तुत समाधि • परिच्छेद का समन्वय करना चाहिए । ( १ ) प्रथम विप्रतिपत्ति का स्वरूप यह था कि - " श्रुति ने पार्थिव अध्यात्म संस्था का संगठन-विघटनानन्तर पाँचों पार्थिव भूतों में अप्यय बतलाते हुए पञ्चत्वगति का समर्थन किया है । जो कि पञ्चत्व-' गति ' भस्मान्तं शरीरं ' रूप से हमारी दृष्टि के सामने ही भुक्त हो जाती है । अतएव कहना पड़ेगा कि, परलोकगति लक्षण प्रात्मगति सर्वथा विप्रतिपन्न है । इस विप्रतिपत्ति की समाधि है - ' अन्न र समयपुरुष ', किंवा पाञ्चभौतिक अन्नमयकोश । इस दृष्टि से वस्तुतः पञ्चत्वगति प्रधान है । केवल पञ्चत्वगति - समर्थन से ही यह किस आधार पर मान लिया गया कि, स्थूल शरीरत्यागान्तर श्रात्मगति ( परलोकगति ) नहीं होती? यही प्रश्नोच्छेदात्मक एक नवीन प्रश्न है, जो केवल शरीरात्मवादियों के लिए असमाधेय प्रश्न बन रहा है । ( २ ) दूसरी विप्रतिपत्ति का स्वरूप यह था कि - " चेतनालक्षण आत्मा को शरीर से पृथक्तत्त्व मान लेने पर भी इसलिए आत्मगति का समर्थन नहीं किया जा सकता कि पञ्चभूतों की भाँति चेतनालक्षण आत्मा भी तत्काल सर्वव्यापक चैतन्यघन में - ' यथोदकं शुद्धेशुद्धं ' न्याय से विलीन होता है । " विप्रतिपन्न ने यह विचार न किया कि, किन मुक्तात्माओं का चिदात्मा क्रमगति का आश्रय न लेकर सद्यः मुक्त हो जाता है । निष्कामकर्म्म योगी जीवन्मुक्त - विदेहपुरुष ही इस सद्योमुक्ति लक्षण समवलय - गति के अनुयायी बनते हैं, परन्तु जो विषयासक्त- कर्म्मबन्धनानुगत - बद्धजीव हैं, उनका चिदात्मा. ( प्रत्यगात्मा ) सघः - मुक्त नहीं हो सकता । ( ३ ) तीसरी विप्रतिपत्ति का स्वरूप यह था कि - " कहीं आत्मा को प्राणमय बतलाया जा रहा है, तो कहीं प्राण को प्रात्मा के साथ उत्क्रमण करने वाला मान कर प्राण को आत्मा से पृथक् माना जा [ ४५ 1

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड प्रश्न परम्परासमाधि mmmm रहा है । " प्राणस्वरूप विज्ञान इस विप्रतिपत्ति का भी मूलोच्छेद कर देता है । आग्नेय वैश्वानरप्राण, वायव्य तैजस प्राण, ऐन्द्र प्राज्ञप्रारण, इन तीनों पार्थिव स्तौम्यप्राणों की समष्टि आत्मा है एवं आत्मा के ( प्राणात्मा के साथ उत्क्रान्त होने वाला सूक्ष्मशरीरावच्छिन्न - प्रतिवाहिकप्राण इस प्राणात्मा के प्राण-तत्त्व से सर्वथा दूसरा वस्तुतत्त्व है । केवल नाम साम्य से उत्पन्न विप्रतिपत्ति का इस प्रकार तत्वभेदाधारेण भलीभाँति निराकरण हो जाता है । ( ४ ) चौथी विप्रतिपत्ति यह थी कि - " श्रुति ने - ' श्रात्मैवाधस्तात् ० ' इत्यादि रूप से जब आत्मा को व्यापक बतलाया है, तो उस आत्मा की परलोक गति कैसे सम्भव है । " निराकरण का आधार वही अखण्ड सत्यात्मा है । अखण्डात्मा वास्तव में व्यापक है, एवं अवश्यमेव वह गति मर्यादा से ही क्या, समस्त द्वन्द्वभावों से अतीत है । गति का लक्ष्य तो वह खण्डात्मा है, जो उपाधि रूप से जन्ममृत्यु - प्रवाह से युक्त रहता हुआ सदद्वन्द्वों का अनुगामी बना रहता है । अन्य ( अखण्ड ) आत्मक्षेत्र से सम्बन्ध रखने वाले प्रगतिभाव के आधार पर अन्य ( खण्ड ) श्रात्मक्षेत्रानुगत गतिभाव को विप्रतिपन्न मान बैठना क्या ' किसी भी दशा में मान्य है? ( ५ ) पाँचवीं विप्रतिपत्ति यह थी कि - " एक ओर कर्म्मसंस्कार को गति का निमित्त बतलाया जाता हैं, साथ ही कर्म्म तारतम्य से आत्मा की हास- वृद्धि का समर्थन किया जा रहा है । दूसरी ओर उसी प्राज्ञ आत्मा को अमृतलक्षण बताते हुए उसे कर्म्मसंस्कारलेप से पृथक् बतलाते हुए ' न कर्म्मरणा वर्द्धते, ना कनीयान् ' रूप से ह्रास वृद्धि धर्मों में बहिर्भूत माना जा रहा है । " प्राणमूर्ति प्राज्ञ आत्मा के स्वरूप का जब हम विश्लेषण करते हैं, तो उक्त दोनों विरुद्ध कथनों का समन्वय हो जाता है । प्राज्ञ आत्मा में प्राण, प्रज्ञा, भूत ये तीन पर्व हैं । क्रियातत्त्व प्राण है, चिदंश प्रज्ञा भाग है, एवं चिदशग्राहक बीघ्र सोम भूभाग है । प्रारण तथा चिदंश, दोनों भाग सर्वथा प्रसङ्ग हैं । इनका न स्वस्वरूप से ह्रास होता, न वृद्धि होती । तीसरा सोमात्मक भूत भाग स्वस्नेहगुणातिशय से विषयसंसर्ग से उत्पन्न संस्कारों को ग्रहण करता हुआ तारतम्य से अवश्य ही कनीयान् भी बनता हैं, भूयान् भी बनता है । ( ६ ) छठी विप्रतिपत्ति का स्वरूप यह था कि - " श्रुति ने जन्मकाल में जहाँ आत्मा को पाप्म-दोषों से युक्त बतलाया है, वहाँ मरणानन्तर आत्मा को विशुद्ध बतलाया है । विशुद्धि ही जब प्रात्ममुक्ति है, मरणोत्तर यह विशुद्धि जब नित्य प्राप्त है, तो परलोकगति का प्रश्न ही कहाँ रह जाता है । " पाप्म स्वरूप विश्लेषण ही इस विप्रतिपत्ति का निराकरण कर रहा है । स्थूल सूक्ष्म - कारणादि भेद से दोष अनेक श्रेणियों में विभक्त हैं । महाभूतादिविकारभूत स्थूलशरीर स्थूलपाप्मा है, काम - क्रोधादिवृत्तियाँ सूक्ष्मशरीरानुगत सूक्ष्म पाप्मा है, एवं कर्म्मसंस्कार - अविद्या - काम - संकल्पादि - कारण शरीरानुगत सुसूक्ष्म पाप्मा हैं । मरणानन्तर स्थूल पाप्माओं से अवश्य ही प्राज्ञात्मा विमुक्त हो जाता है, परन्तु गतिनिमित्तक सूक्ष्म - सुसूक्ष्म पाप्मा तब तक इसमें प्रतिष्ठित रहते हैं, जब तक कि यह उस प्रखण्ड -- सत्यात्मा के साथ ऐक्य प्राप्त नहीं कर लेता । दूसरे शब्दों में जब तक इसके सूक्ष्मादिदोष प्रात्यन्तिक रूप से हट जाते हैं, तभी यह प्रात्यन्तिक रूप से विशुद्ध होकर उस शुद्ध में लीन होता हुआ गतिचक्र से त्राण पाता है । ' उत्क्रामन् म्रियमाणः पाप्मनो विजहाति ' से केवल स्थूल पाप्माओं का ही त्याग बतलाया गया है । [ ४६ ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड प्रश्नपरम्परासमाधि ( ७ ) सातवीं विप्रतिपत्ति यह थी कि - " एक श्रुति वचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि, मरणोत्तर आत्मा के लिए भोगसाधन लक्षण इन्द्रियवर्ग नहीं बच रहता । अपितु इन भोगसाधनों को तो वह मुमूर्षु अवस्था में ही छोड़ देता है । परलोकगति फलभोग को लक्ष्य बनाती है । जब साधनों का ही प्रभाव है, तो गति का क्या प्रयोजन रह जाता है । " भिन्न - भिन्न भोगसाधनों ( इन्द्रियों ) के द्वारा यह विप्रतिपत्ति भी तिरस्कृत है । अवश्य ही सुषुप्ति अवस्था की भाँति मरणोत्तर स्थूलशरीरानुबन्धी कोई भोगसाधन ( इन्द्रिय ) शेष नहीं रह जाता, परन्तु जिस प्रकार श्रात्मगतिनिमित्तक सूक्ष्म शरीर से मुक्त होकर यह आत्मा परलोकगमन में समर्थ बनता है, एवमेव सूक्ष्मशरीर निबन्धन सूक्ष्म भोगसाधन भी अवश्य ही ( पूर्व ) उत्पन्न हो जाते हैं । ( 5 ) आठवीं विप्रतिपत्ति यह थी कि - " स्वयं श्रौत वचनों के आधार पर ही कहना पड़ता है । कि ' आत्मा ही शरीर है? अथवा आत्मा शरीर से भिन्न है? ' यह प्रश्न संदिग्ध बन रहा है । जब आत्म-स्वरूप ही संदिग्ध है, तो आत्मगति के सम्बन्ध में विचार करना भी सर्वथा निरर्थक ही माना जायगा । " श्रुति - तात्पर्य समन्वय ही इस विप्रतिपत्ति का भी निराकरण कर रहा है । शरीर से पृथक् श्रात्मतत्त्व है, एवं वह अवश्यमेव प्रतिवादिक शरीर धारण कर लोकान्तर में गमन करता है ' यही मुख्य सिद्धान्त है । जो इस प्रस्तिलक्षण आत्मा का स्वरूप पहिचान लेते हैं, वे कभी प्रेतभाव में विचिकित्सा नहीं करते, जैसा कि- ' अस्तीत्येके ' समर्थक - ' एतमितः प्रेत्याभिसम्भवितास्मि इति यस्य स्यादद्धा, न विचित्सा s स्ति, इति ह माह शांडिल्यः ' इत्यादि वचन से प्रमाणित है । ' यथा सैन्धवाखिल्य ० ' इत्यादि जिस श्रुति द्वारा विचिकित्सक शरीरात्मवाद सिद्ध करता हुआ ' नायमस्ति ' पक्ष का समर्थन करने चला है, वह श्रुति तो उस आत्मतत्त्व का दृष्टान्त द्वारा विश्लेषण कर रही है, जिसके सम्बन्ध में उसने आरम्भ में ही — ' इदं सर्वं यदयमात्मा ' ( बृ ० २ | ४ | ६ ) यह प्रतिज्ञा की है । उस सलिलवत् - एकदृष्टा अखण्ड सत्यात्मतत्त्व के साथ अद्वैत सम्बन्ध प्राप्त कर लेने पर भूत- भौतिक निबन्धन सारे विशेषभाव सर्वथा नष्ट हो जाते हैं— ' तान्येवानुविनश्यति ' से यही अभिप्रेत है । ' वायुर्वेगौतमतत्सूत्रम् ० ' ज्ञत्यादि श्रुति से भी भिन्नात्मवाद सिद्धान्त पर कोई आक्रमण नहीं हो रहा है । वायुसूत्र ( प्राणसूत्र ) के उत्क्रान्त हो जाने पर शरीर संगठन टूट जाता है, इस प्राकृतिक स्थिति का विश्लेषण करने वाली उक्त श्रुति श्रात्मसत्तोच्छेद में कैसे प्रमाण बन गई? यह उन्हीं विप्रतिपन्नमतियों से पूछना चाहिए । हमारी दृष्टि में तो यही श्रुति परम्परया आत्मसत्ता का समर्थन ही कर रही है । प्रारणसूत्र अकस्मात् बिना किसी निमित्त के निकल क्यों गया? इस प्रश्न का समाधान वही श्रात्मोत्क्रान्ति है । ' तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति ' इस श्रुत्यन्तरप्रामाण्य से आत्मनिष्क्रमण ही प्रारणसूत्र निर्गमन का निमित्त बन रहा है । ( 2 ) नवीं विप्रतिपत्ति यह थी कि - " एक जगह श्रुति कहती है- प्राणात्मा का उत्क्रमण नहीं होता, अपितु वह यहीं सद्यः विलीन हो जाती है । अन्यत्र श्रुति कहती है- प्राणात्मा का उत्क्रमण होता. है, वह लोकान्तर गमन करता है । इस प्रकार जब उत्क्रमण ही संदिग्ध है, तो आत्मगति के विप्रतिपन्न होने में क्या सन्देह है? " अवस्थाभेद द्वारा इस विप्रतिपत्ति का भी निराकरण हो रहा है । ' प्राणात्मा का उत्क्रमण नहीं होता, अपितु वह यहीं विलीन हो जाता है ' यह सिद्धान्त उन मुक्तात्माओं से सम्बन्ध [ ४७ ]

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श्रद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड परम्परासमाधि रखता है, जिनका प्राज्ञात्मा निष्काम भाव से प्रकामयमान बनता हुआ विशुद्ध भाव में परिणत होकर सर्वव्यापकशुद्ध ब्रह्म में सद्यः विलीन हो जाता है । यही इसकी समवलय - लक्षण सद्योमुक्ति ( प्रगति ) है । ' इति नु - प्रकामयमानस्य ' यह कहते हुए श्रुति ने स्पष्ट मुक्तावस्थानुगता इस अनुक्रान्ति का उत्क्रान्ति पक्ष से भेद सिद्ध कर दिया है । ' श्रथ कामयमानस्य ० ' के अनुसार कामासक्त कामकामी प्राज्ञात्मा की सद्योमुक्ति नहीं होती । श्रपितु उसे उत्क्रान्त होकर अवश्यमेव क्रमगति का श्राश्रय लेना पड़ता है । ( १० ) दसवीं विप्रतिपत्ति यह थी कि - " कहीं यह कहा जा रहा है कि, शरीरावयवों से निष्क्रान्त आत्मा क्षणमात्र में प्रादित्यलोक में चला जाता है, तो कहीं यह सुनाई पड़ता है कि उत्क्रान्त आत्मा को पहले चन्द्रलोक में जाना पड़ता है । इस प्रकार गन्तव्यलोक संदिग्ध बन रहे हैं । " आत्मावस्था तथा आत्मभेद द्वारा यह विप्रतिपत्ति भी उच्छिन्नप्राय है । मुक्त ( क्रममुक्त ) पुरुषों का आत्मा तत्क्षण आदित्य भेदी बन जाता है । ब्रह्माण्डस्फोट द्वारा जिनका आत्मा निष्क्रान्त होता है, उनका यह आत्मा अवश्यमेव क्षणमात्र में ही सूर्य्यभेदी बन जाता है । इन्हें महानात्मा के साथ चन्द्रगति का अनुगमन नहीं करना पड़ता । अतएव ऐसे मुक्तात्मा योगियों के लिए गया श्राद्ध भी अनपेक्षित है । जो मुक्त नहीं हैं, उनके प्रज्ञात्मा को अवश्यमेव महानात्मा के साथ एक बार चन्द्रलोक में जाना पड़ता है । साथ ही जो मुक्तात्मा हैं, उनके महानात्मा को भी प्रत्येक दशा में चन्द्रलोक जाना पड़ता है । ( ११ ) ग्यारहवीं विप्रतिपत्ति के सम्बन्ध में प्रश्नकर्त्ता ने गतिविषयक वचनों का जो पारस्परिक विरोध उद्धृत किया है, उसका अगले परिच्छेदों में विस्तार से समन्वय होने वाला है । अतः प्रकृत में इसे स्वस्थ दशा में ही छोड़ दिया जाता है । ( १२ ) बारहवीं विप्रतिपत्ति यह थी कि - " अन्य शरीर को लक्ष्य बना कर ही जीवात्मा पूर्व शरीर का परित्याग करता है । ऐसी दशा में परलोकगमन, तत्रगत्वा भोग भुक्ति, सब कुछ अनर्गल प्रलाप बन जाता है । " कौन कहता है - पूर्व शरीर त्याग के अव्यवहितोत्तर काल में ही जीवात्मा ( तृणजलौ -कावत् ) अन्य शरीर धारण नहीं कर लेता । अवश्य ही प्रत्येक अवस्था में आत्मा को सशरीर ही रहना पड़ता है, जैसा कि पूर्व परिच्छेदों में हमने स्वयं आटोप के साथ बतलाया है । अवश्य ही स्थूलशरीर त्यागान्तर सूक्ष्म प्रतिवाहिक शरीर धारण कर आत्मा लोकान्तर में गमन करता है । इस प्रकार इस विप्रतिपत्ति से भी आत्मगति सम्बन्ध में कोई अव्यवस्था प्रवेश नहीं पा सकती । - * -[ ४८ ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड त्यारूढः प्रत्यगात्मा M गत्यारूढः प्रत्यगात्मा पञ्चकोश के आधार पर प्रतिष्ठित जिन खण्डात्माओं का ' आत्मस्वरूपपरिचय ' परिच्छेद के उपसंहार में दिग्दर्शन कराया गया है, उनमें से कौनसा खण्डात्मा प्रकृत आत्मगतिविज्ञान प्रकरण में प्रधान लक्ष्य है? संक्षेप से इस प्रश्न का समाधान कर निरूपणीय गतिभावों की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । अव्यक्त, यज्ञ, विज्ञान, प्रज्ञान, महान्, प्राण, शरीर, ये छनों आत्मखण्ड नित्यगति, कालगति, भेद से दो - दो गतिभावों से प्राक्रान्त है । शरीर का प्रत्येक परमाणु क्षणिक क्रिया के स्वाभाविक क्षणिक परिवर्तन के कारण बदल रहा है । इसी क्षणिक गति से उन स्थूल बाल - युवा - वृद्धादि अवस्थाओं का उदय होता है, जिनमें प्रत्येक में असंख्य क्षणिक परिवर्तनों का समावेश है । यह स्वाभाविक क्षणिक परिवर्तन ही शरीर की नित्यगति है । आत्माधिष्ठाता सूर्य्यगत ' विश्वामित्र ' नामक वायुप्राण जब तक इस स्थूल शरीर में प्रतिष्ठित रहता है, तब तक शरीर कालगति का अतिथि नहीं बनता । उस आयुः सूत्र उत्क्रान्त होते ही प्राप्तकाला शरीरयष्टि गिर जाती है । यही इस शरीर की कालगति है, जिसे ' मृत्यु ' भी कहा जाता है । क्षरणगतिरूपा नित्यगति नित्यमृत्यु है, कालानुगता कालगति काल मृत्यु है । इस प्रकार शरीरगति के दो विभाग हो जाते हैं । प्रज्ञानात्म नामक मन तथा महानात्मा इन दोनों चान्द्र आत्माओं का प्रतिक्षण चन्द्रलोक में श्रद्धासूत्र द्वारा गमनागमन होता रहता है, यही इन दोनों की नित्यगति है । शरीराधिष्ठाता जीवात्मा के उत्क्रान्त हो जाने पर प्रज्ञानगर्भित महानात्मा उसी श्रद्धासूत्र द्वारा एक चान्द्र सम्वत्सर में चन्द्रलोक में चला जाता हैं, यही इस युग्म की कालगति है । सौरविज्ञानात्मा हृदय में प्रतिष्ठित रहता हुआ, हृदय से आरम्भ कर ब्रह्मरन्ध्र द्वारा सुषुम्णापथ से सूर्य्यकेन्द्र तक वितत रश्मिप्राणात्मक महापथ से एक निमिषमात्र में अध्यात्ममण्डल से अधिदैवतमण्डल ( सूर्य्य मण्डल ) पर्य्यन्त तीन बार प्राता - जाता रहता है । यही इस सौर विज्ञानात्मा की नित्यगति है । जीवात्मा के उत्त्रान्त हो जाने पर यही विद्य ुन्मूर्ति विज्ञानात्मा उसी पथ से निमिषमात्र में स्वप्रभव सौरप्राण में विलीन हो जाता है, यही इसकी कालगति है । पारमेष्ठ्य यज्ञात्मा ऋतसूत्र के द्वारा, स्वायम्भुव अव्यक्तात्मा सत्यसूत्र के द्वारा स्वयम्भू - परमेष्ठी लोकों में सतत् आते जाते रहते हैं, यही इन दोनों की नित्यगति है एवं जीवोत्क्रान्त्यनन्तर उन्हीं ऋत सूत्रों के द्वारा तत्क्षण दोनों स्वप्रभव परमेष्ठी तथा स्वयम्भू लोक में विलीन हो जाते हैं, यही इन दोनों की कालगति है । उभयगति से सम्बन्ध रखने वाले अव्यक्त, यज्ञ, विज्ञान, प्रज्ञान, महान्, शरीर ये छत्रों प्राध्यात्मिक-खण्ड उस ' आत्मगति ' से कोई सम्बन्ध नहीं रखते, जिसका प्रकृत प्रकरण में विश्लेषण होने वाला है । कर्मानुसार शुभाशुभ गतियों का भोक्ता एकमात्र वह प्राणात्मा ही है, जिसके वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ नामक तीन पर्व बतलाये गए हैं । अव्यक्तादि छनों खण्ड जहाँ धर्माधर्म्म- पुण्यपापादि शुभाशुभ संस्कारों के लेप से ग्रन्थिबन्धन सम्बन्ध न करते हुए संस्कारानुगता आत्मगति ( कर्म्मगति ) से पृथक् रहते हुए जहाँ केवल नियमित नित्यगति, तथा नियमित कालगति, इन दो गतियों से युक्त हैं, वहाँ वैश्वानर - तेजस - प्राज्ञ-मूर्ति देहाभिमानी, अतएव ' देही ' नाम से प्रसिद्ध प्राणात्मा ( कर्मात्मा - भोक्तात्मा - जीवात्मा ) ही क्षणिक [ ४ ९ ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड गत्यारूढः प्रत्यगात्मा परिवर्तनरूपा नियमित नित्यगति के अतिरिक्त इस शरीर को छोड़ने के अनन्तर सूक्ष्मशरीर धारण कर कर्मानुसारिणी, अतएव सर्वथा अनियमिता कालगति ( कर्म्मगति ) का अनुगामी बनता है । अनियमित कालगति लक्षणा, कर्म्मगतिरूपा, इस श्रात्मगति का एकमात्र देही - कम्र्मात्मा से ही सम्बन्ध है, जिसे कि प्रत्यगात्मा भी कहा जाता है । अतएव इसे इस गति प्रकरण में हम ' गत्या रूढप्रत्यगात्मा ' नाम से व्यवहृत कर सकते हैं । गत्यारूढ प्रत्यगात्मा की नित्यगति, अनियमित कालगति, इन दोनों गतियों में से नित्यगति के ' भावगति, अवस्थागति ' भेद से दो विवर्त्त हो जाते हैं । क्षणिक परिवर्तन के कारण प्रत्यगात्मा के वैश्वानर- तैजस - प्राज्ञ नामक तीनों आत्मपर्व स्वप्रभव भूतपार्थिव त्रिवृत्तस्तोमावच्छिन्न विराडग्नि, प्रान्त-रिक्ष्य पञ्चदशस्तोमावच्छिन्न हिरण्यगर्भवायु, दिव्य एकविंशस्तोमावच्छिन्न सर्वज्ञ, इन तीनों प्राधिदैविकपर्वो के साथ ' प्रहितां - संयोग: ' प्रयुतां संयोगः रूप से प्रवारपारीण, एति - प्रेति भावात्मिका गायत्री द्वारा ( गायत्री सूत्र द्वारा ) गमनागमन होता रहता है । यही इस प्रत्यगात्मा की नियमित नित्यगति है । उक्त नित्यगति के अतिरिक्त ' भावगतिषट्क ' का भी प्रत्यगात्मा के साथ समन्वय हो रहा है । क्षणिक क्रियाओं की समष्टि से, दूसरे शब्दों में क्षणिक क्रियानुगत सन्तानात्मक धराषण के आधार से जन्म १ से ( शरीरोदय क्षण से ) आरम्भ कर मृत्युपर्य्यन्त ( शरीरावसान पर्य्यन्त ) प्रत्यगात्म संस्था में - " जायते-२ ३ ४ ५ ६. अस्ति- विपरिणमते - वर्द्धते - अपक्षीयते - विनश्यति " इन ६ भावविकारों का भी सम्बन्ध रहता है । यही पहला भावगतिषट्क है । क्षणिकक्रियावत् यह भावगतिषट्क भी सर्वथा नियमित है । इसके अतिरिक्त १ २ ३ १ २ ३ ' जाग्रत - स्वप्न - सुषुप्ति - मोह - मूर्छा - मृत्यु ' इन ६ अवस्थाओं का भी प्रत्यगात्मा के साथ सम्बन्ध रहता है । इसे अवस्थागति शब्द से ही व्यवहृत करेंगे । अवस्था भेद भिन्न यह भावगतिषट्क कालगति की भाँति नियमित है । बाल - युवा - वृद्ध - तरुणादि अवस्थारूप भावगतियों का पूर्व के नियमित - षड्भावविकारात्मक नियमित भावगतिषट्क में ही अन्तर्भाव है । निष्कर्ष यही निकला कि नियमित क्षणिकगति, नियमित षड्भावविकारगति, इन दोनों की समष्टि तो नियमित भावगति लक्षण नित्यगति है, एवं अनियमित षड्वस्थात्मिकागति अवस्थागति लक्षण नित्यगति है । इस प्रकार नित्यगति के गर्भ में क्षरणगति, भाव-विकारगति, अवस्थागति इन गतियों का अन्तर्भाव हो जाता है । विविध भागभिन्ना नित्यगति के अतिरिक्त लक्षीभूता ' कालगति ' हमारे सामने आती है । कालगति से यहाँ मृत्यु अभिप्रेत नहीं है, क्योंकि मृत्युकालात्मिका कालगति का तो अवस्थागति में ही अन्तर्भाव हो जाता है । यहाँ कालगति शब्द से यह परलोकगति अभिप्रेत है, जो स्थूल शरीर विनाश के आलम्बन प्रत्यगात्मा के स्वर्ग - नरकादि लोकानुगमनों का आश्रय बनती है । फलतः प्रकृत प्रकरण में इत्थंभूता कालगति काही आत्मगति शब्द से ग्रहरण करना न्याय सिद्ध बनता है । इस कालगति के आगे जाकर अवान्तर अनेक [ ५० ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड गत्या रूढः प्रत्यगात्मा भेद हो जाते हैं, जिनका अगले परिच्छेदों में संक्षेप से दिग्दर्शन कराया जाने वाला है । ' किस कर्म्मसंस्कार से कौनसी कालगति प्राप्त होती है? इस प्रश्न का समाधान ही प्रकृत प्रकरण का मुख्य उद्देश्य है । इसी सम्बन्ध में एक स्पष्टीकरण और कर लीजिए । नित्यंगति के प्रधानतः क्षणिकगति, जायते-अस्तीत्यादिरूपा षड्भाव विकारगति, जाग्रत - स्वप्नादिरूपा षडवस्थागति, भेद से तीन विवर्त्त हो जाते हैं । चौथी अनेक भेदभिन्ना कालगति है । इस प्रकार सम्भूय दो गतियों के ( पहली. गति के तीन, दूसरी गति " का एक ) चार विवर्त हो जाते हैं । इन चारों गति विवर्त्तो को हमने यद्यपि सामान्यतः प्रत्यगात्मा से सम्बन्ध बतलाया है । तथापि सूक्ष्म दृष्टि से विचार करने पर हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि इन चारों गतियों के प्रधान श्रालम्बन प्रत्यगात्मा के चार पर्व ही बनते हैं । अन्नमयकोशाधिष्ठित प्राण-मयकोशानुगत वैश्वानर - तेजस - प्राज्ञलक्षरण कर्मात्मा ही प्रत्यगात्मा है । इसी को गत्यारूढ माना जा रहा पार्थिव शरीर इसका प्रथम पर्व है, पार्थिवशरीरावच्छिन्न श्राग्नेय वैश्वानर इसका दूसरा पर्व है, पार्थिव-शरीर - प्राग्नेयवैश्वानरावच्छिन्न वायव्य तैजस इसका तीसरा पर्व है, एवं शरीर - वैश्वानर - तैजसावच्छिन्न ऐन्द्र प्राज्ञ इसका चौथा पर्व है । नित्यगति से सम्बन्ध रखने वाली क्षरणगति का प्रधानतः पार्थिव शरीर से सम्बन्ध है नित्यगति से सम्बन्ध रखने वाली जायते - अस्तीत्यादि लक्षण भावगति का प्रधानतः शरीरावच्छिन्न वैश्वानरपर्व से सम्बन्ध है । नित्यगति से सम्बन्ध रखने वाली जाग्रदादिलक्षण अवस्थागति का प्रधानतः शरीर - वैश्वानरावच्छिन्न तैजसपर्व से सम्बन्ध है, एवं कालगति लक्षण विविध भेदभिन्ना आत्मगति का प्रधानतः शरीर- वैश्वानर- तैजसावच्छिन्न प्राज्ञपर्व से सम्बन्ध है । इस विश्लेषण से धातु-लक्षण असंज्ञ जीवों से, तथा मूललक्षण अन्तः संज्ञ जीवों से सम्बन्ध रखने वाले गतिभावों का भी भलीभाँति समन्वय हो जाता है । पाषाण - लोष्ठादि में पार्थिवशरीरावच्छिन्न केवल वैश्वानर का विकास है । अतएव इनमें पार्थिव शरीरानुगता क्षरणगति, शरीरावच्छिन्न वैश्वानरानुगता भावगति इन दो गतियों का ही साम्राज्य है । तैजसपर्वानुगता - जाग्रदादि लक्षण अवस्थागति का इन असंज्ञ धातु जीवों में प्रभाव है । लता - गुल्म-वृक्षादि मूल जीव हैं । इनमें पार्थिव शरीर - वैश्वानरावच्छिन्न - तेजस का विकास है, प्राज्ञ का अभाव है, अतएव इन्हें ' अन्तः संज्ञ ' कहा जाता है । प्राज्ञाभाव से किंवा प्राज्ञ की उन्मुग्धता से इनमें पार्थिवशरीरा-नुगता क्षणगति, पार्थिवशरीरावच्छिन्न वैश्वानरानुगता भावगति, पार्थिवशरीर - वैश्वानरावच्छिन्न- तैजसा-नुगता अवस्थागति, इन तीन - तीन गतियों का ही साम्राज्य है । प्राज्ञपर्वानुगता - कालगतिलक्षण - परलोकगति का इन अन्तः संज्ञ मूलजीवों में प्रभाव है । अस्मदादिससंज्ञ जीवों में प्राज्ञ का भी विकास है । इसमें भी मानव सृष्टि में प्राज्ञकला का पूर्ण विकास है । अतएव तीनों नित्यगतियों के साथ - साथ इस कर्मगतिलक्षण आत्मगति का मानवसर्ग के साथ ही प्रधान सम्बन्ध है । प्रत्यगात्मा के इन गतिभावों को लक्ष्य में रखिए, साथ ही प्राज्ञपर्वानुगता परलोकगतिलक्षण आत्मगति को प्रधान प्रतिपाद्य मानिए, अनन्तर क्रम-प्राप्त गतिनिमित्तों का समन्वय कीजिए -[ ५१ ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड -श्रयमत्रसंग्रहः -* १ - * २ विज्ञानगतिद्वयी ३ " म ० प्र ४ ० गतिद्वयी 11 22 - * शरीरगतिद्वयीं ५ . " 21 गत्या रूढः प्रत्यगात्मा प्राप्तकाले गमनम् अव्यक्तस्य नियमिताकालगतिः प्राप्तकाले गमनम् + यज्ञस्य नित्य कालगति: विज्ञानस्य नित्यगतिः प्राप्तकाले गमनम् - विज्ञानस्य नित्यकामगतिः प्राप्तकाले गमनम् - → म ० प्रज्ञानयोर्नित्यकालगतिः " [ + शरीरस्य निन्यकालगतिः प्राप्तकाले निधनम् → " [ ५२ ] अव्यक्तगतिद्वयी - नित्यगतिः शारीरस्याव्यक्तात्मनः - सत्यसूत्र द्वारा स्वायम्भुवे प्राणलोकेऽहरहर्गमनम् अव्यक्तस्य नित्यगतिः यज्ञगतिद्वयी शारीरस्य यज्ञात्मनः — ऋतसूत्र द्वारा - - पारमेष्ठ्येऽब्लोकेऽहरहर्गमनम् - यज्ञस्य शारीरस्य विज्ञानात्मनः - महापथा - सौरे वाग्लोकेऽहरहर्गमनम् -नित्यगतिः शारीरयोर्महत्प्रज्ञानात्मनोः - श्रद्धासूत्र द्वारा चान्द्र अन्नलोकेऽहरहर्गमनम् → म. प्रज्ञानयो नित्यगतिः पाञ्चभौतिकस्य शरीरस्य — सूत्रवायुद्वारा भौमेऽन्नादलोकेऽहरहर्गमनम् - शरीरस्य

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड प्रत्यगात्मनो नित्यागतिः-ॐ -१ -∞ गत्यारूढः प्रत्यगात्मा १३ प्राज्ञपर्वस्य गायत्रीसूत्र द्वारा स्वप्रभवे दिव्ये - एकविशस्तोमावच्छिन्ने सर्वज्ञे ऽहरहर्गतिः - * २ तैजसपर्वस्य गायत्रीसूत्र द्वारा स्वप्रभवे प्रान्तरीक्षे पञ्चदश स्तोमावच्छिन्ने हिरण्यगर्भेऽहरहर्गतिः - * १ वैश्वानरस्य गायत्रीसूत्र द्वारा स्वप्रभवे पार्थिवेत्रिवृत्स्तोमावच्छिन्ने विराडग्नावहरहर्गतिः * १ - जायते + प्रथमो भावविकारः २- प्रस्ति द्वितीयो भावविकारः -३ - विपरिणमते + तृतीयो भावविकारः ४- वर्द्धते +* चतुर्थी भावविकारः ५- अपक्षीयते पञ्चमो भावविकारः ६ - विनश्यति + षष्ठो भावविकारः क्रमशः षड्भावविकाराणां नियमितरूपेणानु-गमनमेव- वैश्वानर- तैजस - प्राज्ञमूर्तेः प्रत्य-गात्मनो नियमिता - भावगतिर्नाम्नी द्वितीया नित्यगतिः १ - जाग्रदवस्था - महत् विज्ञान - प्रज्ञान - जाग्रदवस्थालक्षरणा ' २ - स्वप्नावस्था —महत्- विज्ञान जाग्रदवस्थालक्षणा ३ - सुषुप्त्यवस्था - महज्जाग्रदवस्थालक्षरणा ४ - मोहावस्था — जाग्रत् - सुषुप्त्योरन्तः पतितावस्था ५- मूच्र्छावस्था - प्रत्याहत मनोऽनुगतावस्था . * ६ - मृत्यु - अवस्था — महन्निर्गमनलक्षणावस्था अवस्थाग्ति-षड्वस्थानुगमनमेव नित्यगतिः र्नाम्नीतृतीया अनियमितरूपेण प्रत्यगात्मनोऽनियमिता ) प्रथमा ( क्षरणगतिः नियमितानित्यागतिः * शरीरनिधनान्तर - परलोकगतिलक्षणा प्रत्यगात्मनः कर्मानुसारिणी सम्परायगतिरेव प्रनियमिता कालगतिरत्रप्रकरणे - आत्मगतिः, सैवात्र मीमांस्या । [ ५३ ]