Part IV Atmgativigyanopanishta Part 4 — पृष्ठ 61–70

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४ · पृष्ठ 61–70

पृष्ठ 61

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 61 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड़ गत्या रूढः प्रत्यगात्मा तदित्थंप्रत्यगात्मनि - शरीरदशायां ( स्थूलशरीरदशायां ) क्षणिक नियमित-नित्यगतेः, नियमितनित्यभावगतेः, अनियमित नित्यानित्यावस्थागतेः - समन्वयः । शरीरनिधनानन्तरं तु - सूक्ष्मशरीरदशायां - कम्र्मानुगताया आत्मगतेः कालगतेः सम्बन्धः । इत्थं च गतिद्वयावच्छिन्नः प्रत्यगात्मा प्रवान्तरभैदेर्गतिचतुष्ट्या-युक्तो भवति -* १ - क्षरणगति: ( नियमिता - नित्या ) नित्यगतिः कालगतिः १ २ – भावगति: ( नियमिता -- नित्या ) +→ जीवितदशायांभुक्तागतित्रयी ३ - अवस्थागति: ( अनियमिता - नित्यानित्या ) ४ - कालगतिः ( निधनोत्तरा ) + प्रेतादशायां भुक्तागतिः ( १ ) पञ्चभूत विकारात्मकमन्नमयं शरीरम् → क्षरणगते रालम्बनम् ( २ ) पार्थिव शरीरावच्छिन्नो वैश्वानरः भावगते रालम्बनम् → नित्यागतिः जीवितस्य ( ३ ) पा ० शरीर - वैश्वानरावच्छिन्नः तैजसः + अवस्थागतेरालम्बनम् ( ४ ) पा ० श ० - वैश्वा ० तै ० प्रवच्छिन्नः - प्राज्ञः + कालगतेरालम्बनम् ] कालगति ः — प्रेतस्य * १ | १ - पञ्चभूतविकारमयं पार्थिवं शरीरम् | २ - शरीरावच्छिन्नोऽर्थप्रधानो वैश्वानरः * २ १ – शरीर वैश्वानरावच्छिन्नस्तैजसः - * + धातुजीवा: - प्रसंज्ञा: ( वैश्वानरप्रधानाः ) ] + मूल जीवाः - अन्तसंज्ञा: ( तैजसप्रधानाः ) | → जीव जीवाः - समंज्ञा: ( प्राज्ञप्रधानाः ) ३ २ - शरीर वै ० तेजसावच्छिन्नः प्राज्ञः [ ५४ ]

पृष्ठ 62

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 62 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड १. धातुजीवानां - शरीरावच्छेदेन - क्षण गति: ( १ ) २ वैश्वानरावच्छेदेन - भावगति: ( २ ) मूलजीवानां - शरीरावच्छेदेन - क्षणगृतिः ( १ ) आत्मोत्क्रान्तिनिमित्तानि } + नात्र अवस्थागतिः, नापि वा कालगतिः वैश्वानरावच्छेदेन - भावगति: ( २ ) → नात्र - कालगतिः ३ तैजसावच्छेदेन- प्रवस्था गति: ( ३ ) जीवजीवानां - शरीरावच्छेदेन - क्षण गति: ( १ ) वैश्वानरावच्छेदेन - भावगति: ( २ ) + अत्र च सर्वगतिसमन्वयः तैजसावच्छेदेन - अवस्थागति: ( ३ ) प्राज्ञावच्छेदेन - कालगति: ( ४ ) • श्रात्मगत्यारूढ प्रत्यगात्मा कौन ( जिसकी कर्म्मगति मीमांस्य हैं? ) इस प्रश्न का निष्कर्षतः यही उत्तर है कि, सूक्ष्मशरीर ( प्रतिवाहिक सूक्ष्मशरीर ) से युक्त, वैश्वानर - तैजसगर्भित प्राज्ञ आत्मा ही स्थूल शरीरावस्था में कृत शुभाशुभ कर्म्मसंस्कारों से युक्त रहता हुआ कामयमान वह प्रज्ञात्मा है, जिसे नियतपन्था का अनुगमन करते हुए कर्म्मगति का आश्रय लेना है । आत्मोत्क्रान्तिनिमित्तानि - ( उत्क्रान्तिपरिचायकाश्च ) -निरूपणीया श्रात्मगति के ' उत्क्रान्तिगति, लोकगति ' भेद से दो विवर्त्त किए जा सकते हैं । इन दोनों ग्रात्मगतियों में उत्क्रान्ति का स्थूलशरीर से सम्बन्ध है, एवं लोकगति का सूक्ष्मशरीर से सम्बन्ध है पूर्व के परिच्छेद में आत्मगतियों के प्रधानतः ' नित्यगति, कालगति ' भेद से दो विवर्त्त बतलाए थे । साथ ही । जीवितदशा से सम्बन्ध रखने वाली प्रात्मगति के क्षरणगति, भावगति, अवस्थागति ये तीन विवर्त्त बतलाए गए थे एवं अनेक भेदभिन्ना दूसरी कालगति का स्पष्टीकरण हुआ था । तीनों नित्यगतियों में से तीसरी ' अवस्थागति ' नाम की नित्यगति में जाग्रदादि सात अवान्तर गतियों का स्पष्टीकरण हुआ था । इन सातों में सातवीं मृत्यु अवस्थालक्षण ग्रात्मगति ( नित्यागति ) ' उत्क्रान्तिगति ' है एवं प्रेतभावापन्ना कालगति ही लोकगति है । उत्क्रान्तिगतिलक्षण अवस्थागति का, दूसरे शब्दों में मृत्यु अवस्था प्राप्ति का क्या निमित्त? साथ ही कालगति लक्षण आत्मगति ( परलोकगति ) का क्या निमित्त? किन कारणों से तो [ ५५ ] 1 1

पृष्ठ 63

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 63 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मोत्कान्तिनिमित्तानि स्थूलशरीर में प्रतिष्ठित प्रत्यगात्मा मृत्यु - अवस्था में ( उत्क्रान्ति गति में ) परिणत होता है? एवं किन कारणों से इसे सूक्ष्मशरीर धारण कर तत्तल्लोकगतियों का श्राश्रय लेना पड़ता है? यह प्रश्न है । इनमें लोकगति लक्षण आत्मगति ( कालगति ) के नियमित निमित्तों का तो अगले ' श्रात्मगति निमित्तानि ' नामक अगले परिच्छेद में विस्तार से निरूपण किया जायगा एवं प्रकृत परिच्छेद में उत्क्रान्तिलक्षण आत्मगति ( नित्यागति - मृत्यु व स्थागति ) के निमित्तों का दो शब्दों में स्पष्टीकरण अभिप्रेत है । यद्यपि मृत्युलक्षण उत्क्रान्ति का तत्त्वतः कालगतिलक्षण परलोकगति में ही अन्तर्भाव है । क्योंकि " अथ यावदस्माच्छरीरादनुत्क्रान्तो भवति तावज्जानाति " ( छा ० ८।६।४ ) इत्यादि छान्दोग्य श्रुति के के अनुसार ' उत्क्रान्ति ' शब्द स्थूल शरीर के अनन्तर ही चरितार्थ होता है, तथापि इसी छान्दोग्य श्रुति अनुसार उत्क्रान्ति का सम्बन्ध जीवित दशा मेंभी सिद्ध हो जाता है । तभी तो मृत्युगति का जीवित - गति ( अवस्थागत ) में अन्तर्भाव माना गया है । मरणासन्न व्यक्ति के निकटतम बन्धुबान्धव व्यक्ति इसकी शय्या के आस - पास बैठ जाते हैं, और सम्बोधन करते हुए -, " हमें जानते हो, हम कौन हैं? ' इत्यादि प्रश्न किया करते हैं । जब तक इस मुमूर्षु का श्रात्मा शरीर से उत्क्रान्त नहीं हो जाता, तब तक यह इनके प्रश्न को भी समझता हैं, एवं शक्य मन्दवारणी से, अथवा तो हस्तादि के संकेत से, अथवा तो नेत्रादि द्वारा उत्पन्न भावविशेषों से अपनी जीवितं दशा का परिचय भी दिया करता है । मुमूर्षु की इसी जीवित दशा का छान्दोग्य श्रुति ने निम्नलिखित शब्दों में स्पष्टीकरण किया है— " अथ यत्रैतदबलिमानं नीतो भवति, तमभित श्रासीना ग्राहुः जानासि मां, जानासि मां - इति । स यावदस्माच्छरीरादनुत्क्रान्तो भवति, तावज्जानाति । " ( छां ० उ ० ८।६।४ ) । उक्त छान्दोग्य श्रुति का निष्कर्ष यही है कि, जब तक मुमूर्षु व्यक्ति की इन्द्रियाँ थोड़ा बहुत भी कार्य करती रहें, तब तक तो इसे अनुत्क्रान्त समझना चाहिए, एवं जब सारी चेष्टाएँ एकान्ततः उपरतः भेद से " हो जायें, तब इसे उत्क्रान्त समझ लेना चाहिए । इस उत्क्रान्ति की ही शरीर दशा, शरीराभाव दो अवस्था हो जाती है । ' यावदनुत्क्रान्तो भवति, तावज्जानाति ' ( छा ० उ ० ८ | ६ | ४ ) इस अनुत्क्रान्ति अवस्था के, अवस्था के, तथा — ' अथ यत्रैतस्माच्छरीरादुत्क्रामति ' ( छा ० उ ० ८६५ ) इस उत्क्रान्ति दोनों के मध्य में अनुत्क्रान्ति - उत्क्रान्ति, दोनों श्रवारपारीण धम्र्मों से युक्त एक मध्यस्था तीसरी अवस्था उसी प्रकार प्रतिष्ठित है, जैसे जाग्रत् - सुषुप्ति के मध्य में दोनों धम्र्मों से युक्त एक तीसरी मुग्धावस्था । ( मोहावस्था ) और प्रतिष्ठित रहती है । मोहावस्थापन्न व्यक्ति में जाग्रत् - सुषुप्ति, दोनों के धर्म जाग्रदवस्था रहते हैं यह एक प्रकार की ऐसी स्तब्धावस्था है, जिसे न सोना ही कहा जा सकता, न जागना ही । में कर्म्मप्रवणतालक्षण इन्द्रियों के जो नियमित - सुव्यवस्थित व्यापार होने चाहिए, उनका भी यहाँ अभाव एवं सुषुप्ति में जो व्यवस्थित इन्द्रिय व्यापारोपरति देखी जाती है, उसका भी यहाँ अभाव है । अतएव इस मोहावस्था के सम्बन्ध में " मुग्धेऽर्द्धसम्पत्ति: " ( ब्रह्मसूत्र ) यह व्यवस्था हुई । सर्वाङ्गशरीर चेष्टानों [ ५६ ]

पृष्ठ 64

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 64 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड श्रात्मोत्कान्तिनिमित्तानि का एकान्ततः लुप्त हो जाना श्रात्मोत्क्रान्ति की सूचना है, चेष्टानुगति आत्मानुत्क्रान्ति की परिचायिका है । एक अवस्था ऐसी भी है, जिसमें चेष्टानुगति का भी प्रात्यन्तिक अभाव नहीं होता, साथ ही चेष्टात्रों का विकास भी नहीं रह जाता है । उभयधर्माविछिन्ना, अतएव मुग्धावस्था - समतुलिता यही मध्यावस्था प्रकृत में ' जीवितदशानुगताउत्क्रान्ति ' से ग्राह्य है । सम्पूर्ण शारीरप्राण ( कर्मेन्द्रियाँ ) व्याननाड़ियों के द्वारा ( जिनका नाडी- निमित्त प्रकरण में विश्लेषण होने वाला है ) हृदय स्थान में आ जाते हैं । चक्षु - घ्राण - रसना - श्रोत्र - त्वक् पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ हृदयस्थ मुख्यप्राण में अपीत हो जाते हैं । इस अवस्था में आकर मुमूर्षु की सारी बाह्य इन्द्रिय चेष्टाएँ विलुप्त हो जाती हैं । इस अवस्था में आकर न देखता, न सूंघता, न स्वाद ग्रहण करता, न सुनता, न स्पर्श का अनुभव करता, न हाथ - पैर हिलाता । इस समय केवल हृदय स्थान में थोड़ी धड़कन रहती है! यह धड़कन जहाँ इसका एकमात्र अनुत्क्रान्तिभाव का लक्षण है, वहाँ इतर सम्पूर्ण चेष्टाएँ उत्क्रान्ति के · लक्षण हैं । यही वह मध्यमावस्था है, जिसे हम जीवितदशानुगताउत्क्रान्ति ( मृत्यु ) कहा करते हैं । इस दशा में परिणत व्यक्ति के सम्बन्ध में तत्स्वजनों के मुख से - " अब सब समाप्त हो गया " शब्द निकलता ' है । इसी मध्यमावस्था का स्पष्टीकरण करती हुई बृहदारण्यक श्रुति कहती है-" स यत्रायमात्मा बल्यं न्येत्य संमोहमिव न्येति, प्रथैनमेते प्राणा अभिसमा-यन्ति । स एतास्ते जोमात्राः समभ्याददानो हृदयमेवान्ववक्रामति । स यत्रैष चाक्षुषः पुरुषः पराङ पर्यावर्तते, प्रथारूपज्ञो भवति । एकीभवति । न पश्य-तीत्याहुः, न जिघ्रतीत्याहुः, न रसयत इत्याहुः, न वदतीत्याहुः, न स्पृशतीत्याहुः, न विजानातीत्याहुः । तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते । तेन प्रद्योतेनैष श्रात्मा निष्क्रामति - चक्षुष्टो वा मूनौ वा अन्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यः । तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति । प्राणमनुत्क्रामन्तं सर्वेप्रारणा अनूत्क्रामन्ति । स विज्ञानो भवति, सविज्ञानमेवान्ववक्रामति । तं विद्या कर्म्मणी समन्वारभेते, पूर्वप्रज्ञा च । ” ( बृ ० ड ०४ | ४ | १, २ ) इसी मध्यमावस्था के सम्बन्ध से उक्त श्रुति से आगे की बृहदारण्यक श्रुति चरितार्थ होती है । अभी जीवात्मा अपने वर्तमान स्थूलशरीर में प्रासक्त है । जब तक इस वर्तमान शरीर के साथ इसका ममत्व है, तब तक सम्पूर्ण इन्द्रियाँ काम करती रहती हैं एवं इसी अवस्था के लिए - ' यावदस्माच्छरीरा-दनुत्क्रान्तो भवति तावज्जानाति ' कहा जाता है । इस दशा में मुमूर्षु जीवात्मा की मोहमात्रा अतिशय रूप से जाग्रत हो जाती है । स्वपुत्र - कलत्रों की भावी चिन्ता से, स्वार्जित सम्पत्ति की व्यवस्था से नितान्त [ ५७ ]

पृष्ठ 65

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 65 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मोत्क्रान्तिनिमित्तानि दुःखी हो जाता है, रोने लगता है, बन्धुवर्ग भी क्षुब्ध हो जाता है । इसी प्रात्यन्तिक मोहाक्रमण से, अब मैं न बचूंगा, इस विभीषिका से परलोकगति सहायक भगवन्नामस्मरण की ओर भी प्रवृत्ति नहीं होती । जिस प्रकार बुझता दीन प्रात्यन्तिकरूप से प्रज्ज्वलित होकर अन्ततः शान्त हो जाता है, एवमेव प्रात्यन्तिक विभिषिका से क्षुण प्रारण ( इन्द्रियप्राण ) स्व - स्व प्रतिष्ठा स्थानों को छोड़कर व्यान नाड़ियों द्वारा हृदय सचित होते हुए क्षणमात्र के लिए प्रत्यगात्मचैतन्य विकास के कारण बन जाते हैं, अनन्तर ही आत्मा प्राणपरिग्रह उत्क्रान्त हो जाता है । जब तक प्राणवर्ग स्व - स्व स्थान में प्रतिष्ठित हैं, संज्ञा जाग्रत है । इस संज्ञा का उस योगमाया-बन्धन से सम्बन्ध है, जो इस प्राणी के भूमिष्ठ होने पर इसके शिशुशरीर में संक्रान्त हुई थी । जब तक • प्राणी गर्भ में रहता है, तब तक योगमाया का वेष्टन नहीं होता । फलतः गर्भाशयगत अवस्था में प्राणी की अन्तःप्रज्ञा विकसित रहती है । इसी पूर्वप्रज्ञा विकास से गर्भदशा में प्राणी के सामने सम्पूर्ण लोक-स्थितियाँ प्रत्यवत् उपस्थित रहती हैं । इसी प्रज्ञा के अनुग्रह से इस दशा में संसार बंन्धन का वास्तविक स्वरूप चित्रण इसके सामने विद्यमान हो जाता है । इसी आत्मबोध से यह इस अवस्था में संकल्प करता है कि, अब इस जन्म में मैं कभी भूल कर भी ऐसा कर्म नहीं करूंगा, जो पुनः जम्मचक्र प्रवृत्ति का कारण बन जाय । गर्भाशयगत, योगमाया विरहित, अतएव लब्धप्रज्ञ गर्भी की इसी सद्भावना का श्रुति ने निम्नलिखित शब्दों में अभिनय किया है— अथ नवमे मासि सर्वलक्षणज्ञानकरण सम्पूर्णो भवति, पूर्वजाति स्मरति,

शुभाशुभं च कर्म विन्दति - ( कथयति च ) -पूर्वयोनिसहस्राणि दृष्ट्वा चैव ततो मया ।

श्राहारा विविधा भुक्ताः पीता नानाविधाः स्तनाः ॥१ ॥

जातस्यैव मृतस्यैव जन्म चैव पुनः पुनः ।

. अहो दुःखोदधौ मग्नो न पश्यामि प्रतिक्रियाम् ॥ २ ॥

एकाकी तेन दह्यामि गतास्ते फलभोगिनः ।

यन्मया परिजनस्यार्थे कृतं कर्म शुभाशुभम् ॥३ ॥

* कृष्णस्त्वदीयपदपङ्कजपञ्जरान्ते- प्रद्यैव मे विशतु मानसराजहंसः ।

प्राणप्रयाणसमये कफ - वात - पित्तैः कण्ठावरोधनविधौस्मरणं कुतस्ते ॥

[ ५८ ]

पृष्ठ 66

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 66 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड

यदि योन्याः प्रमुच्येऽहं तत् प्रपद्ये महेश्वरम् ।

शुभक्षयकर्त्तारं फलमुक्तिप्रदायकम् ॥४ ॥

' दियोन्याः प्रमुच्येऽहं तत् सांख्यं योगमभ्यसे ।

प्रशुभक्षय कर्त्तारं फलमुक्ति प्रदायकम् ॥५ ॥

आत्मोत्क्रान्तिनिमित्तानि यदि योन्याः प्रमुच्येऽहं ध्याये ब्रह्म सनातनम् । ” ( गर्भोपनिषत् ३–५ ) " नवम मास में सर्वावयव लक्षण बनता हुआ ज्ञान - इन्द्रियादि साधनों से युक्त होता हुआ प्राणी पूर्णात्मक बन जाता है । इसी अवस्था में आकर विकसित प्रज्ञा के प्रभाव से इसे अपनी पूर्वजातियों ( जन्मों ) का स्मरण होता है, अतीत जन्मों में इसने जो कुछ भले - बुरे कर्म किए थे, उन सबके परिणाम इसके सम्मुख उपस्थित हो जाते हैं । इन सांस्कारिक शुभाशुभ कर्म्मकषायों से क्षुब्ध - गर्भी कहने लगता है कि मैंने हजारों योनियाँ प्राप्त की, विविध प्रकार के आहार -विवार किए, सहस्रों माताओं का स्तनपान किया, उत्पन्न हुआ, फिर मर गया, पुनः उत्पन्न हुआ, पुनः मर गया, इस प्रकार जन्म - मृत्यु - चक्र में पिसता रहा । मैंने मोहवश स्वपरिवार को सुखी बनाने के लिए जो भले बुरे काम किए, उन सब के भले - बुरे संस्कारों का . कुफल तो मुझे भोगना पड़ रहा है एवं तात्कालिक लाभ उठाने वाले श्राज मेरे इस कुंफल भोग में कोई थोड़ा भी सहयोग नहीं दे रहे । इन परिस्थितियों से क्लान्त प्राणी भविष्य के लिए प्रतिज्ञा करता है किं-" यदि इस बार योनि संकट से मैं छूट जाऊँगा तो निश्चयेन ज्ञानप्रद शिव में आत्मसमर्पण कर दूंगा, जोकि शिवतत्त्व भुक्ति - मुक्ति के प्रदाता हैं । निष्काम कर्म्मयोग तथा ज्ञानयोग का अनुगमन करूँगा, सनातन ब्रह्म का ध्यान करूंगा । अहो! सचमुत्र संसार दुःख का समुद्र है । सिवाय भगवच्छरणगति के इससे त्राण पाने के लिए दूसरा द्वार नहीं है । " होता क्या है? सुनिए! जिस प्रकार एक स्वस्थ - पूर्णप्रज्ञ मनुष्य पाषाणादि के प्रबल प्राघात से तत्क्षण संज्ञाशून्य हो जाता है, सारी सुध - बुध खो बैठता है, ठीक इसी प्रकार एवयामरुत् के प्रत्याघात से योनिद्वार पर उपस्थित प्राणी यो नियन्त्र से यन्त्रित होकर इस असह्य पीड़ा से पीड्यमान बनता हुआ श्रात्यन्तिक दुःख से प्राक्रान्त हो जाता है । यही दुःखाक्रमण इसकी पूर्व प्रज्ञाविलुप्ति का एक कारण है । जब नियन्त्र से छुटकारा पाकर यह भूमिष्ट होता है, तो उत्पत्ति के श्रव्यवहितोत्तरक्षण में ही यह त्रैलोक्य-व्यापक किंवा विश्वव्यापक प्रशनायाधर्मानुगत- वैष्णववायुतत्वात्मक योगमायानुबन्ध से युक्त हो जाता है । ' हवा लगी संसार की हो गया बारा बाट ' इस लोकसूक्ति के अनुसार विश्ववायु ( वैष्णववायु - योगमाया ) से वेष्टित होते ही इसकी रही सही पूर्वप्रज्ञा भी अभिभूत हो जाती है । फलस्वरूप पूर्वजाति, शुभाशुभ-संस्कारस्मृति, कृतप्रतिज्ञाएँ, सब कुछ योगमायानुग्रह से स्मृतिगर्भ में विलीन हो जाते हैं । प्रकट हो जाती * नाहंप्रकाशः सर्वस्य योगमाया समावृतः । ( गीता ) योगमाया हरेश्चैतत् तया संमोह्यते जगत् ॥ ( सप्तशती ) [ ५६ ]

पृष्ठ 67

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 67 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मोत्कान्तिनिमित्तानि है - वैष्णवी - योगमायानुगत- अन्नदानलक्षरण वह प्रशनाया, जिसके प्राकट्य से उत्पन्न शिशु रोदन द्वारा अन्नादान की कामना प्रकट करने में समर्थ होता है । इसी योगमायोदय स्थिति का स्पष्टीकरण करती हुई उपनिषच्छ्रति प्रागे जाकर कहती है-" अथ योनिद्वारं सम्प्राप्तयन्त्रेणापीड्यमानो महता दुःखेन जातमात्रस्तु वैष्णवेनवायुना संस्पृष्टः । तदा न स्मरति जन्ममरणानि, न व कर्म्म शुभाशुभं -विन्दति । " ( गर्भोपनिषत् ४ ) । उक्त विवेचन से हमें यह मान लेना पड़ा कि प्राणी की जन्म - मृत्यु, नाम की दोनों अवस्थाएँ एतच्छ-• रीरानुगत मायाबन्धनाभाव एतच्छरीरानुगतयोगमायाबन्धनप्रवृत्तिक्षण, एतच्छरीरानुगतयोगमायाबन्धन-निवृत्तिक्षण एवं एतच्छरीरानुगत योगमायाबन्धनाभाव, इन चार अनुबन्धों से चार प्रकार की हो जाती हैं । प्रथम जन्मावस्था गर्भशरीर से सम्बन्ध रखती है । शुक्र शोणित के मिथुनभाव में प्रोपपातिक आत्मा का कम्र्मानुसार हीन श्रेष्ठ - मिथुनभाव में प्रविष्ट होना इसकी प्रथम जन्मावस्था है । इस जन्मावस्था में ( गर्भा -। वस्थापर्य्यन्त - नवमासपर्य्यन्त ) स्थूलशरीरानुगता योगमाया के बन्धन का अभाव है । भूमिष्ठ होना द्वितीय 1 जन्मावस्था में ( भूमिष्ठ होने से मरणशय्यानुगति पर्यन्त ) स्थूलशरीरानुगता योगमाया के बन्धन के साम्राज्य है । जब तक शारीरप्राण सिमट कर हृदय में नहीं आ जाते, तब तक ( पहले - पहले ) इस योग-माया का प्रभुत्व है । शारीरप्राणों के संकुचित होने का अर्थ है, स्थूलशरीरानुगता योगमाया के बन्धन का निवृत्तिक्षण । यही निवृत्तिक्षरण इसकी प्रथम मरणावस्था है । यहाँ से प्राणोत्क्रान्ति पर्य्यन्त स्थूलशरीरानुगता योगमायाबन्धन की गर्भावस्थावत् निवृत्ति है, यही द्वितीय मरणावस्था है, जिसका देहत्याग पर अवसान है । जिस प्रकार द्वितीय जन्मावस्था से पहले गर्भ नाम की प्रथम जन्मावस्था में प्रज्ञा का विकास रहता है, एवमेव इस द्वितीय मरणावस्था में भी योगमायाबन्धन निवृत्ति से प्रज्ञा का विकास हो जाता है । सारी स्थिति सामने आ जाती है, वही दुःखावस्था जाग्रत हो जाती है । हृदयस्पन्द ही इस अवस्था का भोग काल है । चूंकि . इस अवस्था में स्थूलशरीरममत्व छूट जाता है, सूक्ष्म प्रतिवाहिकशरीरममत्त्व उत्पन्न हो जाता है, भावी शरीर प्रज्ञान क्षेत्र में संस्काररूप से प्रतिष्टित हो जाता है । अतएव यह कहना अन्वर्थ बनता है कि-" जैसे तृणजलीका अन्य तृण को श्रालम्बन बना कर पूर्व तृणान्त को छोड़ता है, वैसे ही जीवात्मा जब अन्य ( सूक्ष्म ) शरीर को भावना संस्कार ( रूप से ) लक्ष्य बना लेता है, तभी पूर्वशरीर को छोड़ता है । " पूर्व शरीरान्तदशा में अन्य सूक्ष्मशरीर की स्वरूप, भावना संस्कारात्मक है, इस सम्बन्ध में श्रुति ने एक बड़ा सुन्दर दृष्टान्त उपस्थित किया है । एक शिल्पी ( चित्रकार ) चित्र निर्माण से पहले अपने प्रज्ञानपटल पर भावी चित्र का मानसिक चित्र स्थापित करता है । अनन्तर इसे पुरो उपस्थित पट्ट - पटल ' पर पहले रेखारूप ( आउट लाइन ) से चित्रित करता है, अनन्तर तूलिका से रङ्ग - पूर्ति द्वारा प्रायतनपूर्ति

8 व्रजंस्तिष्ठनपदैकेन यथैवैकेन गच्छति । यथातृगजलौकेयं देही कर्म्मगति गतः ॥

[ ६० ]

पृष्ठ 68

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 68 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खंण्डं श्रात्मोत्कान्तिनिमित्तानि कर उस आध्यात्मिक भावनासंस्कारात्मक - बीजात्मक चित्र को भावनाचित्र के अनुरूप दे डालता है । ठीक यही घटना यहाँ घटित होती है । कर्म्मसंस्कार लक्षीभूत सूक्ष्मशरीर की भावना संस्काररूप से स्थूल शरीर-दशा में ही प्रतिष्ठित हो जाती है । अनन्तर ( स्थूलशरीरत्यागान्तर ) बाह्य सूक्ष्मभूतमात्राओं के समावेश से यह भावनात्मक शरीर सूक्ष्मभूतात्मक बन जाता है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रख कर श्रुति ने कहा है-" तद्यथा तृरणजलायुका तृरणस्यान्तं गत्वाऽन्यमा क्रममाक्रम्यश्रात्मानमुप-संहरति, एवमेवायमात्मा - इदं शरीरंनिहत्य प्रविद्यां गमयित्वाऽऽन्यमाक्रममाम्या-त्मानमुपसंहरति । " ( वृ ० आ ० ४।४।२ ) । " स्थूलशरीरासक्ति छोड़ता हुआ उसे अपने ज्ञानक्षेत्र से पृथक् करता हुआ इसे तो भुला देता है, एवं भावनात्मक अन्य शरीर को ग्रहण कर इस स्थूल शरीर से अपने आपको समेट कर हृदय में आ जाता है । " यही तात्पर्य्यं है । यह भी निश्चित है कि, जब तक इसकी स्थूलशरीर में आसक्ति रहती है, तब तक न तो इन्द्रिय प्राण ही स्व - स्थानों को छोड़ते, न चेतना ही विलुप्त होती, न पूर्वप्रज्ञा का ही उदय होता । हृदयावस्था में आ जाना ही इसकी स्थूलशरीर से निवृत्ति, तथा सांस्कारिक स्थूलशरीर की प्रवृत्ति है, एवं इस दृष्टि से दोनों शरीर समानकालिक हैं । अनन्तर— " तद्यथा पेशकारी पेश सोमात्रामपादायान्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं तनुते ( वर्णै: ), एवमेवायमात्मेदं शरीरं निहत्य प्रविद्यां गमयित्वाऽन्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं कुरुते ( भूतसूक्ष्मैः ) - पित्र्यं वा, गान्धर्वं वा, दैवं वा, प्राजापतं वा अन्येषां वा भूतानाम् । " ( बृ ० आ ० ४।४।४ ) । यद्यपि शुभाशुभकर्मानुसार इसे निकृष्ट - उत्तम दोनों में से कोई एकसा शरीर मिलता है । तथापि भोगायतनत्वेन सभी शरीर आत्मप्रिय बनते हुए कल्याणतर हैं । प्रत्येक प्राणी अपने - अपने शरीर को प्रिय समझता है । जिन कृमि - कीट - जलजन्तु प्रादि का शरीर हमारी दृष्टि में महावीभत्स, ग्लानिप्रद है, उन उन प्राणियों के लिए वे वे ही शरीर अत्यन्त प्रिय हैं । इसी स्वाभाविक प्रिय भाव को लक्ष्य में रख कर " अन्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं कुरुते " कहा गया है । १ - नवमासात्मिका - प्रवस्था - प्रथमा जन्मावस्था ( योगमायाभावः ) + प्रज्ञोदयः २ - प्रसवावस्था — द्वितीया जन्मावस्था ३- मरणसन्नावस्था - प्रथमा मरणावस्था ४- -हृद्यागमनावस्था-→ योगमायाप्रवृत्ति + + प्रज्ञानिभूतिः + द्वितीया मरणावस्था ] योगमायानिवृत्तिः प्रज्ञोदय; ततः - शरीरादुतक्रान्तिः [ ६१ ]

पृष्ठ 69

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 69 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्डे श्रात्मोत्कान्तिनिमित्तानि प्रथम जन्मावस्था में ' इदं च परं च जानाति ' है । द्वितीय जन्मावस्था से प्रथम मरणावस्था भोग-पर्यन्त ' इदमेवजानाति, न परम् ' है । द्वितीय मरणावस्था में - ' इदं च परं च जानाति, परन्तु न विचेष्टते ' है | शरीरोत्क्रान्ति में भी उभयं विजानाति है – “ सविज्ञानमेवान्ववक्रामति । " प्रथम - मरणावस्था, अनुत्क्रान्ति है, शरीरादुत्क्रान्ति उत्क्रान्ति है, इस उत्क्रान्ति का कालगति लक्षण आत्मगति ( परलोकगति ) ही अन्तर्भाव है । इन अनुत्क्रान्ति उत्क्रान्ति भावों के मध्य में प्रतिष्ठित द्वितीय मरणावस्थारूपा अवस्था भी शरीर बहिविनिर्गमाभाव से अनुत्क्रान्ति है, एवं शरीरासक्तिविरहभाव की अपेक्षा से उत्क्रान्ति है । दोनों उत्क्रान्ति पक्ष ही मुख्य है । क्योंकि इस अवस्था में रहता हुआ भी शरीर सम्बन्ध बहिर्य्यामात्मक . बनता हुआ ऐन्द्रियकभोग से वश्चित होता हुआ स्वभोगायतन लक्षण से बहिष्कृत है । अतएव सप्तावस्था-न्तर्गत इस उभयात्मिका - उत्क्रान्ति अवस्था को हमने उत्क्रान्ति ही मान लिया है । अतएव इसे शरीरा-दुत्क्रान्तिलक्षण - श्रात्मगति ( कालगति ) से पृथक् मान लिया है । इसी उत्क्रान्ति के सम्बन्ध में प्रश्न उपस्थित है कि, किन कारणों से आत्मा इस उत्क्रान्ति अवस्था में परिणित हो जाता है? एतत् प्रश्न समाधि ही प्रकृत प्रकरण का मुख्य लक्ष्य है— जिस प्रत्यगात्मा ने यावज्जीवन इस पाश्चभौतिक स्थूलशरीर को अपना भोगायतन बनाया, क्या कारण है कि, वह ऐसे प्रिय शरीरबन्धन को सहसा छोड़ बैठता है? क्या अपनी इच्छा से वह शरीर छोड़ता है? क्या मलिन वस्त्र की भाँति जीर्ण शरीर से इसे घृरणा हो जाती है? क्या शरीरपरित्याग घृणामूलक है? ' नेति होवाच ' । शरीर चाहे घृणित से घृणित अवस्था में परिणत हो जाय, अन्य व्यक्ति भले ही ऐसे शरीर का स्पर्श भी न करना चाहे, परन्तु उक्त - " कल्याणतरं रूपं कुरुते " सिद्धान्तानुसार जो इस घृणित भी शरीर में प्रतिष्ठित है, वह किसी भी दशा में इसे नहीं छोड़ना चाहता । ऐसी परि-स्थिति में मानना पड़ेगा कि, यह आत्मा स्वशरीर परित्याग में स्वतन्त्र नहीं है, अपितु किसी प्राकृतिक निमित्तान्तर के उपस्थित होने से ही विवश बन कर इसे शरीर छोड़ना पड़ता है । वही प्राकृतिक निमित्त प्रकृत में मीमांस्य है । जीवनधर्म का प्रतिद्वन्द्वी धर्म्म मृत्युध है । इसमें तो कोई सन्देह नहीं कि - ' जात्यायुर्भोगाः ' ( न्या ० भा ० ) इस दार्शनिक सिद्धान्त के अनुसार जाति ( योनि ), श्रायु ( जीवनसूत्र ), भोग ( भागधेय ) तीनों जन्मान्तरीय कृत कम्मों से उत्पन्न तथा उक्थरूप से प्रत्यज्ञात्मा के प्राज्ञभाग पर प्रतिष्ठित सञ्चित सांस्कारिक कर्मों के ही उदर्क ( परिणाम - फल ) हैं । चूंकि सांस्कारिककम्मों का निमित्त एकमात्र प्रत्यगात्मानुगता उत्थाप्याकांक्षामूला जीवेच्छा ही थी, अतएव जीवन को भी हम जीवात्मनिबन्धन ही कहेंगे । कर्मानुसार जितना लम्बा जीवनसूत्र इसमें प्रतिष्ठित रहता है, इस जन्म में उस जीव को उतने नियमित समय पर्यन्त ही जीवित रहना पड़ता है । जीवसूत्रोपयिक कर्म्मसंस्कार के क्षीण हो जाने पर इसे यह शरीर छोड़ देना पड़ता है । इस प्रकार परम्परया स्वयं जीवेच्छा सहकृत जीवकर्म्म संस्कार ही जीवन तथा तदवसान लक्षण मृत्यु, दोनों का निमित्त बन रहा है । कर्म्म संस्कारदृष्टि से जीवनसूत्र भोग-काल भी नियत है, यही इसकी कालिक जीवनगति है, एवं जीवनसूत्रावसानकाल भी नियत है, यही इसकी कालिक मृत्यु है । इसी नियत कालिक जीवन - मृत्युभावद्वयी को लक्ष्य में रख कर कहा जाता है— [ ६२ ]

पृष्ठ 70

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४, पृष्ठ 70 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्डं

नाका स्त्रियते जन्तुविद्धः शरशतैरपि ।

कुशा naapaats पि प्राप्तकालो न जीवति ॥

आत्मोत्कान्तिनिमित्तानि देखते हैं- कितने ही प्राणी शैशवावस्था में कितने ही युवावस्था में, कितने ही प्रौढ़ावस्था में, कितने ही वृद्धावस्था में, एवं कितने एक दशमी अवस्था में मृत्यु के ग्रास बन जाते हैं । यह तारतम्य भी कर्म्मसिद्धान्त का ही पोषक बन रहा है । यदि जीवन - मृत्युद्वन्द्व का कर्म्मसंस्कार से कोई सम्बन्ध न होकर " केवल प्रकृतितन्त्रायी ईश्वरेच्छा से ही सम्बन्ध होता, तो सूर्य - चन्द्र - ग्रह - पृथिवी प्रादि की भाँति इन सब प्राणियों का जीवन तथा मृत्युकाल सर्वथा नियत तथा समानकालिक होता । फलतः सिद्ध हो जाता है कि, जिस प्रकार जीवात्मा का कर्म्मसंस्कार ही प्रायुर्लक्षण जीवनसूत्र का निमित्त है, एवमेव कर्म्मसंस्कार ही जीवन सूत्रावसान लक्षण उत्क्रान्ति ( मृत्यु ) का निमित्त है, स्वं स्व स्वरूपानुसार नियतकाल मर्य्यादा से सम्बद्ध नियत संस्कारानुगत जीवन तथा मृत्युकाल, दोनों नियत हैं । कर्म्मनिमित्त पक्ष में ' अकालमृत्यु ' सम्बन्धी प्रश्न उपस्थित होता है । लोग कहा करते हैं, अमुक प्राणी की असमय में ही मृत्यु हो गई । ' अकालमृत्यु हरणं सर्वपापप्रणाशनम् ' इत्यादि धर्मभावनाएँ भी इस अकालमृत्यु का समर्थन कर रही हैं । ऐसी स्थिति में प्रश्न होता है कि, यदि अन्य प्राप्याघात - रोगादि के कारण प्राप्त काल से पहले ही मृत्यु हो जाती है, तो - ' नाकाले म्रियते जन्तुविद्धः शरशतैरपि ' सिद्धान्त का क्या अर्थ? यदि निमित्तान्तर के आवागमन से समय से पहले मृत्यु हो सकती है, तो निमित्तान्तर से नियत समय से अधिक जीवित भी रहा जा सकता है, और उस दशा में केवल पूर्वजन्मसश्चित कर्म्मसंस्कार को ही जीवन - मृत्युभावों का निमित्त मान लेना कथमपि व्यवस्थित सिद्धान्त नहीं माना जा सकता । इस अकाल जीवन, अकाल मृत्यु अवस्था की दृष्टि से अवश्यमेव कर्म्मसंस्कार के अतिरिक्त भी किसी अन्य को इनका निमित्त मानना पड़ेगा । वही निमित्त प्रकृत में मीमांस्य है । ' नाकाले म्रियते जन्तुः ' सिद्धान्त की मूलप्रतिष्ठा जहाँ जीवात्मानुगत कर्म्मसंस्कार है, वहाँ अकाल-मृत्युप्रवृति की प्रतिष्ठा ईश्वरात्मानुगत कालिकचक्र है, एवं अध्यात्म संस्था में दोनों निमित्त प्रतिष्ठित है । ईश्वरात्मा के कर्म्म से सम्बन्ध रखने वाला जीवनसूत्र सब प्राणियों के लिए समान हैं । दूसरे शब्दों में ईश्वरीयकोश से सब प्राणियों को नियत जीवनसूत्र मिलते हैं । जीवात्मा अपने कम्र्मानुसार ईश्वरीयकोश से प्राप्त इन जीवनसूत्रों के उपयोग में स्वकर्म्म संस्कार को निमित्त बना लेता है । यदि उसके कर्म्मसंस्कार में उस ईश्वरीयधन को नियतकालचक्रपर्यन्त सुरक्षित रखने की योग्यता है, तब तो यह कालिक आयु का पात्र बन जाता है, यदि संस्कार में वह योग्यता नहीं है, तो नियत कालचक्र से पहले भी इसके प्रायसूत्र समाप्त हो जाते हैं । संस्कार निबन्धनकाल की दृष्टि से प्रत्येक प्राणी प्राप्तकाल में ही मरता है । यदि संस्कार निबन्धन प्राप्तकाल उस ईश्वरीयधनानुगत प्राकृतिक प्राप्तकाल से समतुलित है, तब तो वह कालिक ( ईश्वरीय ) प्राप्तकाल भी नियमितकाल ही माना जायगा । यदि संस्कार निबन्धन प्राप्त-काल ईश्वरीयकालमर्यादा से पहले ही भुक्त है, तो उस दशा में वह ईश्वरीयकाल अप्राप्तकाल ( अकाल ) कहलायेगा, एवं उसी अकालदृष्टि से कर्म्मसंस्कारानुगत प्राप्तकालमृत्यु ( कालमृत्यु ). अप्राप्तकाल मृत्यु [ ६३