Part IV Atmgativigyanopanishta Part 4 — पृष्ठ 71–80

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४ · पृष्ठ 71–80

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड ' श्रात्मोत्कान्तिनिमित्तानि www कहलायगी । अपने सांस्कारिक काल की अपेक्षा केवल ' कालमृत्यु ' ही व्यवस्थित है, एवं ईश्वरीयकोश की की अपेक्षा काल - अकाल - भाव व्यवस्थित हैं । यदि किसी प्रबल निमित्तान्तर से सांस्कारिक - मृत्युकाल पर विजय प्राप्त करली जाती है, तो ईश्वरीयकालापेक्षया अकालमृत्यु बनी हुई यह सांस्कारिक कालमृत्यु टल जाया करती है । शिवभक्त मार्कण्डेयादि इसके निदर्शन हैं । इसके अतिरिक्त यज्ञ - योगादि साधन विशेषों से ईश्वरीयकोश की वृद्धि करते हुए सामान्यनियत आयुवृद्धि भी सम्भव है । वेदभक्त भारद्वाजादि इसके निदर्शन हैं । प्रकृतितन्त्र विजेताओं के आशीर्वादात्मक प्राणदान से भी प्रायुर्वृद्धि दृष्ट है । अस्तु प्रायुःसम्बन्धी ये सारे विवाद पुराणरहस्यादि अन्य निबन्धों में विस्तार से निर्णीत हैं । प्रकृत में हमें उस सामान्य प्रायुःसूत्र का विचार करना है, जिसके सततागमन, सततभोग से प्राणी जीवित रहता है, एवं जिसके निरोध से प्रारणी इस स्थूल शरीर से उत्क्रान्त हो जाता है । प्राकृतिक सूत्र का सततगमनागमन जहाँ जीवन का प्रधान निमित्त है, वहाँ प्राकृतिक प्रायुःसूत्र का विच्छेद ही उत्क्रान्ति का प्रधान निमित्त है । इस प्रयुः सूत्र विच्छेद का निमित्त कौन है? इस प्रश्नान्तर को यहीं उपरत कर जीवननिमित्त भूत आयुःसूत्र का स्वरूप ही प्रकृत में संग्राह्य है । " ज्योति - गौं - श्रायुः " नामक तीन प्रतिष्ठा लक्षण मनोताओं से युक्त ज्ञान - क्रिया - अर्थ - शक्तिधन-सूर्य्य क्रमशः देवप्राणात्मक ज्योतिष्टोम यज्ञ से शारीर आत्मा की प्रारणसंस्था का, भूतात्मक गोष्टोमयज्ञ से शारीर आत्मा की वाक्संस्था का एवं चिदात्मक आयुष्टोम यज्ञ से शारीर आत्मा की मनःसंस्था का प्रभव - प्रतिष्ठा - परायण बन रहा है । अध्यात्मसर्वस्वभूत सूर्य खगोलीय जिस मध्यवृत्त के केन्द्र में प्रति-ष्ठित होकर स्वसम्वत्सरमण्डल का अधिदैवतलक्षण आत्मा बन रहा है, ' सूर्य्योबृहतीमध्यूढस्तपति ' सिद्धान्त के अनुसार वह मध्यवृत्त ' बृहती छन्द ' नाम से प्रसिद्ध है । सप्ताहोरात्रवृत्त लक्षरण गायत्र्यादि सात छन्दों में ( पूर्वापरवृत्तों में ) मध्यस्थवृत्त इतर छत्रों दक्षिणोंत्तरस्थ वृत्तों की अपेक्षा बृहत् ( बड़ा ) है, अतएव इसे ' बृहती छन्द ' कहना प्रन्वर्थ बनता है । इस बृहतीछन्द के सम्बन्ध से - बृहद्धतस्थौभुवनेष्यन्तः पवमानो हरित श्राविवेश ' ' बिभ्राड् बृहत् पिबतु सौम्यम् ' इत्यादि मन्त्रवर्णनानुसार सूर्य्य भी ' बृहत ' कहलाया है, एवं सौरसाममण्डल ( ज्योतिर्म्मण्डल ), बृहत्साम ' कहलाया है, कि ' उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका ' द्वितीय खण्ड के तत्त्ववेदनिरुक्ति प्रकरण के ' सामातिमानपरिच्छेद ' में विस्तार से प्रतिपादित है । बृहत्साम स्वरूपसम्पादक यही बृहतीछन्द ' विष्वद्वृत्त ' नाम से अर्वाचीन ज्योतिःशास्त्र में प्रसिद्ध है, एवं स्वयं ब्राह्मणग्रन्थों में इसी के लिए - ' विषुव ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । ( शत ० १२।१।३।१४ ) | सूर्य्यप्रतिष्ठा लक्षण इस बृहतीछन्द के ६ अक्षर माने गए हैं । चतुष्पादबृहती छन्द नवाक्षरे कैक-पादभेद से षट्त्रिंशदक्षरसंख्यामित ( ३६ अक्षर ) बन रहा है । मनः - प्राण - वाङ्मय सौरतत्त्व स्वरश्मि-वितान से सहस्त्र भावों में विभक्त है । सहस्ररश्मि सम्बन्ध से ही सूर्य्य सहस्रदीधिति कहलाया है । प्रत्येक रश्मिप्राण मनःप्राणवाङ्मय तत्त्व से युक्त हैं । फलतः रश्मिभेद से इस सौरतत्त्व के सहस्र विवर्त्त हो जाते हैं । षडत्रिंशदक्षरा बृहती के प्रत्येक अक्षर के साथ इस तत्त्वानुगता रश्मिसाहस्री का व्यूहन सम्बन्ध होता । ३६ अक्षरों से सूर्य्यतत्त्वसाहस्री षट्त्रिंशत् साहस्री ( ३६००० ) रूप में परिणत हो जाती है । इस [ ६४ ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड श्रात्मोत्क्रान्तिनिमित्तानि प्रकार अन्ततोगत्वा अध्यात्मप्रतिष्ठा लक्षण ज्ञानक्रियार्थमूर्ति सौरतत्त्व के बृहती सहस्र ( बृहती ३६, सहस्र १०००, सम्भूय ३६००० छत्तीस हजार ) विवर्त हो जाते हैं । यही वह ईश्वरीय मूलधन है, जिसकी पार्थिव दैनन्दिन भ्रमण में प्रतिदिन हमें एक -एक मात्रा मिलती रहती है । इस प्रकार पूरे ३६००० दिन तक उस महापंथ द्वारा सुषुम्णामार्ग से आयुस्वरूप रक्षक से सूर्य्यमात्राएँ अध्यात्म में भुक्त होती रहती हैं, जिस महापथ का अगले परिच्छेद में स्पष्टीकरण होने वाला है । अभिप्लवस्तोमात्मक अहर्गणों से सम्बद्ध ये ३६००० आयुः सूत्र, किंवा आयुःप्राण ही ' विश्वामित्र ' प्राण नाम से प्रसिद्ध है । त्रिकालसन्ध्या द्वारा गायत्रीमन्त्र के माध्यम से इसी प्रायुर्लक्षरण विश्वामित्रप्राण का प्रदान होता है । इसी आधार पर सन्ध्या-कर्म का - " ऋषयो दीर्घ सन्ध्यात्वाद्दीर्घमायुरवाप्नुयुः " यह फल बतलाया जाता है । ऐतरेयारण्यक में इस आयुःप्रारण का तथा इसकी ३६००० संख्याओं का विशद वैज्ञानिक विवेचन हुआ है । विशेष जिज्ञासुओं के लिए तदारण्यक ही द्रष्टव्य है । ३६००० सूत्रों के १-१ सूत्रभोग से पूरे ३६ हजार दिन में यह भोग समाप्त हो जाता है । इतने दिनों की समष्टि पूरे १०० वर्ष हैं । यही पुरुष का प्राकृतिक पूर्णायुर्भोगकाल है, जैसा कि - " शतायुर्वे पुरुष: " इत्यादि निगम से प्रमाणित है । स्वसंस्कारपूर्णता से पुरुष इस प्राकृतिक पूर्णायु को भोग कर शरीर छोड़ने वाला जहाँ ' कालमृत्यु ' व्यवहार का पात्र बनता है, वहाँ स्वयंसंस्कार तारतम्य से १०० वर्ष से पहिले तारतम्य से शरीर छोड़ने वाले के लिए ' अकालमृत्यु ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । श्रग्निज्वलन, गृहपात, भूकम्प, शत्रुकृतमारणोच्चाटन आदि निमित्तों से भी संस्कार स्तब्ध हो जाता है, मूच्छित हो जाता है । प्राकृतिक आयुः सूत्र के ग्राहक सांस्कारिकसूत्र के इस प्रकार प्रबल अग्निज्वलनादि निमित्तों के उपस्थित हो जाने पर संस्कार भोग से पहिले जो मृत्यु हो जाती है, वह भी अकाल मृत्यु ही कहलाई है । वस्तुतस्तु पूर्ण संस्कारानुगता पूर्णायुर्भोगावसानकाल प्राप्त कालमृत्यु तथा अपूर्ण संस्कारानुगता अपूर्ण भोगावसानकाल प्राप्त अकालमृत्यु, दोनों कालमृत्यु हैं एवं निमित्तान्तराघात से मूच्छित संस्कारावसान से होने वाली प्राकस्मिक मृत्यु ही ' अकालमृत्यु ' है । ईश्वरोपासन, आस्तिक्य, दया, धर्म, सत्य, अहिंसा, प्रदिप इसी अकालमृत्यु से त्राण करते हैं । अतीतानागतज्ञ ( त्रिकालज्ञ ) योगियों की प्राणदान प्रक्रिया, स्वयं योगमार्ग का अनुगमन, छन्दोमास्तोमादि श्रायुः संस्कारवर्द्धक यज्ञविशेष, प्रायुर्वेदोक्ता कायाकल्पप्रक्रिया, इत्यादि परिगणित साधनों को छोड़ कर उक्त लक्षण स्वाभाविक दोनों कालमृत्युएँ अनिवार्य हैं । तीसरी कालमृत्यु का निरोध ईश्वरोपास्ति ( इष्टसंस्मरण ) आदि से सम्भव है । इसी सम्बन्ध में - ' अकालमृत्यु हणम् ' प्रसिद्ध है, एवं उक्त दोनों के सम्बन्ध में “ नाकाले म्रियते जन्तुः " - " प्राप्तकालो न जीवति " कहा गया है । विषय स्पष्टीकरण का यों समन्वय कीजिए कि, तैलपूर्ण पात्र में प्रतिष्ठित तूलवत्तिका प्रज्वलित है । जब तक तैल समाप्त नहीं हो जाता, तब तक दीप प्रज्वलित रहेगा । कोश में दस दिन की तैल मात्रा सुरक्षित है । प्रतिदिन तैल डाल दिया जाता है, पूरे दस दिन तक दीपक जलता रहता है । यही इसका पूर्णायुर्भोगकाल है । दस दिन के अनन्तर कोशधन समाप्त हो जाता है, इधर तैलपात्र भी रिक्त हो जाता है, दीपक बुझ जाता है । यही इसका स्वाभाविक - पूर्णायुर्भोग कालावसानलक्षण मृत्युकाल है । कोश में [ ६५ ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड श्रात्मोत्कान्तिनिमित्तानि तो दस दिन का तैल सुरक्षित है, परन्तु दस दिन से पहिले किसी भी दिन तैलपात्र फूट जाता है, तत्काल दीप निर्वाण हो जाता है । यही इसका स्वाभाविक अल्पायुर्भोग कालावसान लक्षण मृत्युकाल है । पहिले का निमित्त कोशधन समाप्ति था, इसका निमित्त कोशधनग्राहक के स्वरूप का विनाश है । तैलपात्र भी सुरक्षित है, १० दिन के लिए कोशधन भी सुरक्षित है, बत्ती भी ठीक है, प्रकाश भी यथावत् प्रक्रान्त है । अकस्मात् भञ्झावात आता है । इन वायु झकोरों से यह निर्बल छोटी - सी दीपशिखा इतरदीप स्वरूप सब रक्षकों के रहते भी बुझ जाती है । यही इसका असमयावसानलक्षण कालात्मक मृत्युकाल ( अकालमृत्यु ) है । प्राकस्मिक आगन्तुक - प्रतिबन्धक ही इस कालमृत्यु का निमित्त है । यदि झञ्झावात के अवसर पर दीपक को उस आक्रमण से किसी पत्रादिवेष्टन द्वारा, किंवा निर्वातस्थानान्तर में ले जाते हुए सुरक्षित . कर दिया जाता है, तो इस अकालमृत्यु का अवरोध हो जाता है । ठीक यही अवस्थात्रयी दीपाच से समतुलित हृदयावच्छिन्न प्रत्यगात्मा में घटित होती है । पूर्वजन्मकृत आयुर्भोगात्मक संस्काररूप तैल से परिपूर्ण पाञ्चभौतिक शरीररूप पात्र के केन्द्र में ( हृदयस्थान में ) प्रतिष्ठित वैश्वानर - तैजसरूपा तुलवत्तिका के अग्रभाग में संस्कारस्रोतरूप तैलस्रोत से सम्बन्ध प्राज्ञरूप वर्त्तिकाग्रभाग प्रज्ज्वलित है । प्राकृतिक अंशीभूत सौरबृहन्मण्डलरूपकोश में पूरे १०० वर्षों के लिए षट्त्रिंशत् - सहस्र - बृहत् प्रारण ( आयुः प्राण ) रूप तैल सुरक्षित है, इस कोशगत तैलमात्रा अहोरात्र सम्बन्ध से इस शरीरपात्रगत सांस्कारिक तेल के साथ सम्बन्ध बन रहा है । प्रतिदिन एक - एक मात्रा के रूप से प्रायुः प्राणात्मक तैलयुक्त होता रहता है । यह स्वाभाविक क्रम पूरे १०० वर्ष तक चलता रहता है ।. फलस्वरूप सौं वर्ष पर्य्यन्त आत्मदीप प्रज्ज्वलित रहता है । यही इसका पूर्णायुर्भोगकाल है । १०० वर्ष के अनन्तर कोशधन समाप्त हो जाता है, तैलपात्र रिक्त हो जाता है, श्रात्मदीप का निर्वाण हो जाता है । इस दीपपात्र शरीर से श्रात्मदीप उत्क्रान्त होकर उस अन्य पात्र के साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है, जहाँ स्वतन्त्ररूप से स्वतन्त्र कोशधन की भुक्तिं प्रारम्भ हो जाती है । यही इस आत्मदीप का स्वाभाविक पूर्णायुर्भोगकालावसानलक्षरण मृत्युकाल है । प्राकृतिककोश में तो पूर्ण ही तेल मात्रा सुरक्षित है, परन्तु प्राकृतिक नियत अवधि ( १०० वर्षों ) से पहले ही इस आयुर्मात्रा के ग्राहक जन्मान्तरीय संस्कार का भोग समाप्त हो गया । जब तक उस अपूर्ण संस्कार की सत्ता का भोग समाप्त नहीं हो जाता, तब तक श्रागतकोशधन की भुक्ति से आत्मदीप प्रज्ज्वलित रहता है । यही इसका अल्पायुर्भोग काल है । अपूर्णकर्म संस्कार की भुक्ति जब भी अपूर्णकाल में समाप्त हो जाती है, स्वाभाविक स्रोत सम्बन्ध अवरुद्ध हो जाता है । तत्काल प्रात्मदीप उत्क्रान्त हो जाता है, यही इसका अल्पायुर्भोगकालावसान लक्षण मृत्युकाल है । पहले का निमित्त कोशधन की समाप्ति थी, इस दूसरे का निमित्त प्रात्मधन की समाप्ति ( भुक्ति ) है । & श्रनन्तरश्मयस्तस्य दीपवद्यः स्थितो हृदि । सितासिताः कद्रुनीलाः कपिला मृदुलोहिता ॥ ( तै ० उ ० ) मण्डलं तस्य मध्यस्थ ग्रात्मा दीप इवाचलः ( या ० स्मृव्य ० प्र ० प्रा ० ४ । १०६ ) । ६६

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थं खण्ड आत्मोत्क्रान्तिनिमित्तानि प्राकृतिक कोश में भुक्तातिरिक्त आयुर्मात्रा शेषांश से सुरक्षित है, तद्ग्राहक प्रात्मकोशगत संस्कारात्मक श्रात्मधन भी अभी शेषांश से सुरक्षित है । स्वस्थदशा में वह आत्मदीपं निरापदरूप से प्रज्ज्वलित हैं । शरीरायनरूप मकान की छत गिर पड़ी, विद्य ुत् - पात हो गया, अग्निकाण्ड घटित हो गया, भूकम्प से नगर के नगर भूगर्भ में विलीन हो गए, इत्यादि आकस्मिक आक्रमणों से संस्कारात्मक प्रायुःसूत्र शरीरलक्षणपात्र के विनष्ट हो जाने से उस प्राकृतिक कोशधन - सूत्र से विच्छिन्न हो जाता है, ग्रात्मदीप तत्क्षण उत्क्रान्त हो जाता है । यही इसकी प्राकस्मिकाघात - जनित संस्कार विलुप्तिलक्षण अकालमृत्यु है । यदि स्वस्थ दशा में इस आत्मदीप को क्षेत्रज्ञ विज्ञात्मा ने ईष्टसंस्मरणरूप अभेद्य चट्टान से वेष्टित कर दिया है, इसके अतिरिक्त जिनका संस्कारसूत्र जन्मान्तरीय सुकृतसंस्कार से युक्त होता हुआ दृढ है, तो उनका यह आत्मदीप इन आकस्मिक आक्रमणों से भी त्राण पा जाता है । इन आकस्मिक निमित्तों के चार विवर्त माने गए हैं । स्वयं संस्कार ही तज्जातीय है कि, प्रासाद-पतन, सर्पदंश, अग्नि विस्फुलिंग आदि निमित्तों से ही जिसका उदर्क भुक्त होता हो, यह एक प्रकार का आकस्मिक निमित्त है । इस जन्मान्तरीय आकस्मिक निमित्त का अल्पायुगत संस्कार भुक्तिर्लक्षरण कालमृत्यु में ही अन्तर्भाव है । पहले से ही ऐसा निश्चित रहता है कि, प्रमुक प्राणी की अमुक आकस्मिक निमित्त से प्राणोत्क्रान्ति होगी । इन आकस्मिक आक्रमणों से त्राण पाना प्रत्येक दशा में असम्भव है । यही कारण है कि, साँप काटा व्यक्ति यदि शाबर चिकित्सा से पुनः उबुद्ध नहीं होता तो तत् चिकित्सक कह दिया करते हैं - ' सर्प फर्माया हुआ है । ' इस कथन का यही तात्पर्य है कि नियत कालमृत्यु का यह नियत ( सांस्कारिक निमित्त ) है । जन्मान्तरीय कोई नियतं निमित्त नहीं है । परन्तु भूल से साँप पर पैर रख दिया, कूप में गिर गया, कपड़ों में आग लग गई, विषाक्त भोजन कर लिया, इन प्रज्ञापराधजनित आक-स्मिक निमित्तों से भी प्राणोत्क्रान्ति सम्भव है । यही दूसरा विवर्त्त है । इष्टबल, पूर्वजन्म सञ्चित संस्कार-बल, सफल चिकित्सा आदि उपाय यहाँ सफल होते देखे गए हैं । इस उत्क्रान्ति को अकालमृत्यु ही कंहा जायगा । प्राणी ने कोई भूल न की, श्राराम से सो रहा है, आततायी आते हैं, धोके से शस्त्रप्रहार कर डालते हैं, जहरीला जन्तु दंश कर लेता है, प्राणोत्क्रान्ति हो जाती है । केवल एक प्राणी से सम्बन्ध रखने वाले ये श्राकस्मिक निमित्त तीसरा विवर्त्त है । यह भी अकालमृत्यु ही है, एवं इष्टसाधना द्वारा इससे भी त्राण पाते देखा गया है । चौथा वह श्राकस्मिक निमित्त है, जिसका प्रधानतः प्रकृतिमण्डल से सम्बन्ध है, एवं जिसका प्रधान लक्ष्य व्यष्टि ( एक प्राणी ) न होकर समष्टि ( अनेक व्यक्ति ) बनती है । जनपदविध्वंसिनी, भूकम्प, युद्ध आदि आकस्मिक निमित्त इसी कोटि में अन्तर्भूत है, एवं यही चौथी अकाल-मृत्यु है, जिससे इष्टादि द्वारा त्राण पाया जा सकता है । प्रथम अकालमृत्यु का निमित्त सचित दुष्कृत संस्कार है, द्वितीय अकालमृत्यु का निमित्त प्रज्ञापराध ( नासमझी ) है, तृतीय अकालमृत्यु का निमित्त घातक निमित्तों का आसुरीभाव है, एवं चौथी अकालमृत्यु का निमित्त कौटुम्बिक - सामाजिक- राष्ट्रीय पाप है । राष्ट्र के प्रसत्पथानुगमन से प्रकृति क्षुब्ध हो जाती है, क्षुब्ध प्रकृति अनावृष्टि- अतिवृष्टि - प्रवृष्टि - भूकम्पादि से समष्टि के प्राकस्मिक नाश का कारण बनती है । इस प्रकार पूर्णमृत्युकाल, अपूर्ण मृत्युकाल, कालात्मक मृत्युकाल इन तीन उत्क्रान्तियों में तीसरी [ ६७ ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मोत्कान्तिनिमित्तानि उत्क्रान्ति के निमित्त भेद से चार विवर्त्त हो जाते हैं । पूर्णमृत्युकाल का निमित्त कोशधनक्षय है, अपूर्ण मृत्युकाल का निमित्त संस्कारभुक्ति है । कोशधनक्षय का निमित्त प्राकृतिक स्वाभाविक नियम है, एवं स्वल्पकालानुगता संस्कार भुक्ति का निमित्त पापाचार है । पूर्व में हमने इस स्वल्पसमयोत्कान्ति का निमित्त केवल संस्कार भुक्ति ही बतलाया था । अवश्य ही यह भी एक निमित्त है, एवं अवश्य ही इस निमित्तका निमित्त जन्मान्तरीय पापाचार ( दुष्कृत ) है, एवं इसी इसी दृष्टि से इस उत्क्रान्ति में अकाल-मृत्यु चतुष्टयी में से ( तज्जातीय संस्कारानुगता दूसरी अकालमृत्यु ) का अन्तर्भाव भी मान लिया है, किन्तु इस निमित्त के अतिरिक्त प्राकृतिक नियमोल्लंघन, स्वास्थ्यकर आहारादि का प्रभाव, असंयम आदि भी इसके निमित्त हैं, एवं संस्कार भुक्तिलक्षणनिमित्त का निमित्त जैसे जन्मान्तरीय दुष्कृत था, एवमेव इन असंयमादि लक्षण निमित्तों का निमित्त एकमात्र है - हमारी परतन्त्रता, दासता, जिसके अनुग्रह से पूर्णायु-र्भोग के सब साधनों के रहते भी हम उनका उपयोग नहीं कर सकते । कम से कम आज का भारत तो इसी निमित्त का पात्र बन रहा है । यही भारतीय सन्तति के स्वल्पायु में ही उत्क्रान्त हो जाने का मुख्य बीज है । न केवल इसी उत्क्रान्ति का, अपितु शेष चारों अकालमृत्युत्रों का भी आज तो यही निमित्त बन रहा है । इस कथन से जो निष्कर्ष निकलता है, वह परिलेख से स्पष्ट है— १ - पूर्णायुर्भोगानुगता - + परमोत्क्रान्तिः → + पूर्णमृत्युकालः २ स्वल्पायुर्भोगानुगता- - स्वल्पावस्थोत्क्रान्ति-३ - स्वल्पायुर्भोगानुगता - समयोत्क्रान्तिः ४ - स्वल्पायुर्भोगानुगता- → असमयोत्क्रान्तिः ५ - स्वल्पायुर्भोगानुगता - समयोत्क्रान्तिः ६ - स्वल्पायुर्भोगानुगता- + असमयोत्क्रान्तिः --+ अपूर्णमृत्युकालः → अकालमृत्युः --१ – कोषधनभुक्त्यनुगता -- → अवसानम्- + पूर्ण मृत्युकालः २ - आत्मधन भुक्त्यनुगता- - + मृत्यु- + अपूर्ण मृत्युकालः ३ – स्वसंस्कारनिमित्तानुगता-उत्क्रान्तिः ४ – प्रज्ञापराधानिमित्तानुगता - निधनम् ५ – प्रासुरभावाक्रमणनिमित्तानुगता विनष्टिः ६ - प्राकृताक्रमणनिमित्तानुगता महतोविनष्टिः - * -[ ६८ ] → अकालमृत्युः

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड १ – कोषधनक्षयस्य- - + प्राकृतिकनियमो निमित्त: - + पूर्ण मृत्युकालः आत्मोत्कान्तिनिमित्तानि २ - प्रात्मधनभुक्तेः-: - → जन्मान्तरीय दुष्कृतं निमित्तम् पूर्णमृत्युकालः ३ – स्वसंस्कारनिमित्तस्य राष्ट्र परतन्त्रतैवनिमित्तभूता _४-- प्रज्ञापराधनिमित्तस्य ज्ञानमेव निमित्तम् → अकालमृत्युः २५ – प्रासुरभावाक्रमरण नि ० अज्ञानमेव निमित्तम् ६ - प्राकृताक्रमणनिमित्तस्य राष्ट्रस्यासदाचरणमेव नि ० ) - * -इस प्रकार मृत्युलक्षरण उत्क्रान्ति के ६ विवर्त माने जा सकते हैं, साथ ही छत्रों के उक्त रूप से भिन्न - भिन्न निमित्त माने जा सकते हैं । ये ६ उत्क्रान्तियाँ तथा निमित्तषट्क एक प्रकार से स्थूल हैं । यदि इनके अवान्तर सूक्ष्म विवर्त्ती का एवं तदनुगत सूक्ष्म निमित्तों का विश्लेषण किया जाता विभाग है, तो यह संख्या अनन्तभाव पर विश्राम करती हैं । क्षणिककर्म्म, भावकर्म, अवस्थाकर्म्म, कालिककर्म्म भेद से स्थूलदृष्टया चार भागों में विभक्त कम्मों के अवान्तर असंख्य कर्म्म ही इस उत्क्रान्ति तथा तन्निमित्तों के आनन्त्यभाव का मूल कारण है, जो तत्तत् विशेष कर्म्मसंस्कारानुसार स्वयं ऊह्य है । मृत्यु होती क्यों है? सामान्य रूप से प्रवाहित जीवनसूत्र क्यों उच्छिन्न हो जाता है? इत्यादि लक्षण उत्क्रान्ति निमित्तक प्रश्नों की यही संक्षिप्त मीमांसा है, एवं इस मीमांसा का निष्कर्ष यही है कि, प्राध्यात्मिक सांस्कारिक कम्म की भुक्ति के अवसान से होने वाला आधिदैविक स्द्रवाय्वात्मक याम्यप्राण का आक्रमण ही इस उत्तक्रानि का प्रधान निमित्त है । अतएव याम्यप्राण को अवसान का निमित्त माना गया है, जैसा कि निम्नलिखित मन्त्रवर्णन से प्रमाणित है-- अपेत वीत वि च सर्पतातो येऽत्र स्थ पुराणा ये च नूतनाः । १- श्रदाघमोऽवसानं पृथिव्या कन्निमं पितरो लोकमस्मै ॥ ( यजुः सं ० १२।४५ ) २ - यमो ह वास्या अवसानस्येष्टे । स एवास्मात्प्रस्यामवसानं ददाति । ( शत ० ७।१।१।४ ) । " यमराज ही इस प्राणी को पृथिवीलोक भोग से पृथक् कर इसे लोकान्तरगमन के लिए विवश बनाते हैं " उक्त मन्त्रब्राह्मणश्रुतियों का यही तात्पर्य है । क्या सभी प्राणी यमराज के अतिथि बनते हैं? उत्तर दिया जाता है कि, जो पुण्यात्मा है, जिनके प्राज्ञभाग पर विद्यासमुचित प्रवृत्तिकर्म का दिव्याति-[ ६६ ]

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श्राद्ध विज्ञान चतुर्थ खण्ड श्रात्मोत्कान्तिनिमित्तानि शय प्रतिष्ठित हैं, वे पुण्यात्मा तो धर्म्मराज के अतिथि बनते हैं, एवं जिनका आत्मा विद्यानिरपेक्ष कर्म-संस्कार से युक्त है, वे यमराज के अतिथि बनते हैं । इन दोनों मृत्यु देवताओं का अगले परिच्छेद में स्पष्टीकरण होने वाला है । प्रकृत में प्रकरणसङ्गति के लिए इस सम्बन्ध में यही जान लेना पर्याप्त होगा कि, ग्रहों में सर्वान्त कक्षा में भुक्त शनैश्चर ग्रह ही यमराज है, यही धर्मराज़ है । सूर्य्यदिगनुगत ज्योतिर्मय अर्द्ध शनि -भाग धर्म्मराज है, सूर्य्यविरुद्ध दिगनुगत तमोमय अर्द्ध शनिभाग यमराज है । इस यमराज का वाहन महिष ( भैंसा ) पशु है । प्राकृतिक प्राणतत्त्व जिस भूत को आलम्बन बना कर भौतिक सृष्टि में भुक्त होता है, वही भूतालम्बन उस प्रारण का वाहन कहलाया है । महिष पशु उस याम्यप्राण का आलम्बन है, एकमात्र इसी दृष्टि से नैदानिकों ने इसे यमवाहनं मान लिया है । प्रत्येक प्राणदेवता के साथ तद्रूप एक - एक ' अभिमानी देवता ' का सम्बन्ध रहता है, जैसा कि - " अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगति-थ्याम् ' - ' यावदधिकारमवस्थितिराधिकारिकाणाम् " इत्यादि प्रार्षवचनों से प्रमाणित है । प्रभिमानी देवता यथेच्छ स्थूल सूक्ष्म आकारों में परिणित हो सकता है । निधनकाल में यही अभिमानी यमदेवता उत्क्रान्त होने वाले आत्मा की विभीषिका का कारण बनता है । सौरप्राणात्मक आयुः सूत्र का अवसान ही इस याम्यप्राण साम्राज्य का कारण बनता है, इस दृष्टि से सौरप्राण को भी ' यम ' कहा जा सकता है । शरीर श्राग्नेय प्राणावसान भी इस याम्यप्राण प्रतिष्ठा का पोलक बनता है, अतः आग्नेय प्राण को भी यम कहा जा सकता है । शनैश्वर नामक सत्ययाम्यप्राण प्रवर्ग्यरूप से दक्षिणदिगूत ऋतवायु में में प्रतिष्ठित रहता है । इसी ऋतलक्षण वायुप्राण के सम्बन्ध से दक्षिण दिशा याम्या कहलाई है । दक्षिण से उत्तर की ओर सतत् इसका आक्रमण ( गमन ) होता रहता है । अतएव भारतीय वास्तुविद्याचार्यों ने दक्षिण द्वार को गृहस्थी के लिए अशुभ माना है । इस ऋत-वायव्य याम्याप्राणदृष्टि से वायु ( दक्षिण वायु ) को भी यम कहा जा सकता है । इसका पहले पृथिवी में भोग होता है, पृथिवी द्वारा प्रायुःसूत्र विच्छेदक इसका शरीर में प्रवेश होता है । इस दृष्टि से पृथिवी का को भी यम ( यमी ) कहा जा सकता है । इस प्रकार मृत्यु ( उत्क्रान्ति ) प्रवर्तक ( निमित्त ) यमतत्त्व अनेक दृष्टियों से समन्वय किया जा सकता है, जैसा कि निम्नलिखित निगम वचनों से प्रमाणित है— १ – “ एष वै यमः, य एष ( सूर्य्यः ) तपति । एष हीदं सर्वंयमयति । एतेनेदं सर्वं यतम् । " ( शत ० १४।१।३।४ ) । २ - " अग्निर्वाव यमः । " ( गो ० ब्रा ० उ ० ४।८ ) । -- " अग्निर्वै यमः, इयं ( पृथिवी ) यमी । श्राभ्यां हीदं सर्वं यतम् । ” ( शत ० ७।२।१।१० ) । ४ - " अयं वै यमः, योऽयं ( वायुः ) पवते । ” ( शत ० १४।२।२।११ ) । [ ७० 1

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श्राद्ध विज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मोत्कान्तिनिमित्तानि ५ - " किं देवतो s स्यांदक्षिणायां दिश्यसि? इति । यमदेवत, इति । " ( शत ० १४ । १।३।४ ) । यम और मृत्यु को आज दिन प्रभिन्न तत्त्व माना जा रहा है । तत्त्व दृष्ट्या वस्तुतः दोनों पृथक्-पृथक् तत्त्व हैं । आत्मोत्क्रान्ति मृत्यु है, इस उत्क्रान्ति का पारम्परिक निमित्त यम मृत्यु है । इसी आधार पर ऐतिह्य ग्रन्थों में दोनों का पृथक् रूप से निर्देश हुआ है 13 यमतत्त्व का जहाँ विश्लेषधर्म्मा अङ्गिरा-तत्त्व से सम्बन्ध है, वहाँ मृत्युतत्त्व का संकोचधर्म्मा भृगु से सम्बन्ध है । सहस्वान् नामक पारमेष्ठ्य समुद्र का वारुणप्रवर्ग्य भाग - ' इति तु पञ्चम्या मातांवापः पुरुषवचसो भवन्ति इत्यादि छान्दोग्यश्रुतिसिद्ध प्रापोमय पुरुष शरीर में जन्मतः ही प्रतिष्ठित हो जाता है । यही प्राप्य प्रवर्ग्यभाग ( भार्गव भाग ) मुच्यु है, मुच्यु ही परोक्ष प्रिय देवताओं की परोक्ष भाषा में ' मृत्यु ' नाम से व्यवहृत हुआ है, जैसा कि निम्नलिखित वचन से प्रमाणित है— “ स समुद्रादमुच्यत, स मुच्युरभवत् । तं वा एतं मुच्यं सन्तं मृत्युरित्याचक्षते परोक्षेण । परोक्ष प्रिय । इव हि देवाः, प्रत्यक्षद्विषः । " ( गो ० ब्रा ० पू ० १।७ ) । मृत्युतत्त्व जन्मतः ही शरीर में प्रविष्ट है । इसी मृत्युप्राण से सूर्य्यं द्वारा आगत आयुः सूत्र प्रतिदिन क्षीण हो जाता है । जब यमतत्त्व अवसानकाल में शरीर में प्रविष्ट होता है, तो मृत्यु का स्वायत्त शासन हो जाता है, तत्काल वह अपने स्वाभाविक उत्क्रान्ति - धर्म से विकसित होता हुआ आत्मोत्क्रान्तिका कारण बन जाता है । प्रशनायालक्षण इस मृत्युपाश का आत्मानन्दलक्षण अमृत से अभिभव करते हुए प्रकृत उत्क्रान्ति निमित्तप्रकरण उपरत किया जाता है । यदा दासश्च व्यासश्च यमेन सह मृत्युना । भवितव्यगृहं यान्ति तदां दासो मरिष्यसि । ( महाभारत ) [ ७१ ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड ग्रात्मोत्कान्तिपरिचायकाः आत्मोत्कान्तिपरिचायकाः इसी परिच्छेद विषय से घनिष्ठ सम्बन्ध रखने वाला एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न हमारे सम्मुख और उपस्थित होता है । यद्यपि मृत्युलक्षण आत्मोत्क्रान्ति प्रियशरीरात्मक किसी भी पुरुष को किसी भी शारीरदशा में अभीष्ट नहीं है । कोई यह नहीं चाहता कि मेरे शरीर का निधन हो जाय । तथापि से इन आसक्त पुरुषों को यह विश्वास है कि - ' जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु ' - ' संयोगा विप्रयोगान्ताः ' न्याय एक न एक दिन उत्क्रान्तिलक्षण मृत्यु निश्चित है । सांसारिक विषयासक्त, भौतिक सम्पत्ति परायण ऐसे पुरुषों को अपनी सम्पत्ति - पुत्र - कलत्रादि की व्यवस्था के नाते मृत्युकाल जानने की जिज्ञासा रहती है । जिन निर्मित्तों से मृत्युकाल निश्चित किया जाता है, वे निमित्त ही ' उत्क्रान्तिपरिचायक ' नाम से व्यवहृत हुए हैं । इन निमित्तों का दो दृष्टिकोणों से समन्वय किया जा सकता है । मरणशय्यारूढ व्यक्ति विशेष की अन्तिम अवस्था में जो मृत्यु चिह्न प्रकट होते हैं, उनका परिचय अन्य व्यक्तियों के प्रज्ञा धरातल से सम्बन्ध रखता है । यद्यपि इस अवस्था में स्वयं मरणासन्न व्यक्ति भी इन मृत्यु चिह्नों का साक्षात्कार कर लेता है, फलस्वरूप यथाशक्य अपनी सम्पत्ति के सम्बन्ध में अस्तव्यस्त व्यवस्था भी करता है, तथापि इन चिह्नों का विशेष परिचय द्रष्टा - बन्धुवर्ग को ही होता है । यही उत्क्रान्ति परिचायकों का एक कोण है । दूसरा दृष्टिकोण मृत्युकाल से कुछ मास पहले ही सम्बद्ध हो जाता है । वर्ष छः मास पहले से ही अध्यात्म संस्था में कुछ एक ऐसे चिह्न उत्पन्न हो जाते हैं, जिनके आधार पर व्यक्ति अपने मृत्युकाल का निश्चय कर लेता है । इन्हीं को प्रकृत में हमने ' उत्क्रान्तिपरिचायक ' कहा है । शास्त्र का इस सम्बन्ध अब में आदेश है कि, जब पुरुष को इन चिह्नों का आभास हो जाय, तो इसे विश्वास कर लेना चाहिए कि, रक्षा मेरा मृत्युकाल सन्निकट है, अधिक समय शरीर न ठहरेगा । अतः गार्हस्थ्य - सामाजिकादि व्यवस्था के नाते इन परिचायक चिह्नों के प्रकट होते ही इसे जो कुछ व्यवस्था करनी हो, कर श्रेणियों डालनी चाहिए- में विभक्त " स यत् करणीयं मन्येत, स कुर्यात् । " परोक्ष, प्रत्यक्षरूप से ये परिचायक चिह्न दो है । इनमें से पहले प्रत्यक्ष निदर्शनों की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । वैश्वानर - तेजस - गर्भित प्राज्ञ आत्मा ही प्रत्यगात्मा हैं, यही जीवात्मा है । इसी का संस्कारानुसार ) को एतद्योनि में जन्म ( आगमन ) हुआ था, यही कम्र्मानुसार समय आने पर मृत्यु व्यवस्था ( निर्गमन साक्षी सुपर्ण प्राप्त होगा । यह प्राध्यात्मिक देवसत्य नामक भोक्तासुप उस प्राधिदैविक देवसत्य नामक तक हृदयस्थान ( सूर्य्य पुरुष - श्रादित्यपुरुष ) से समतुलित है । उसी का अंश बनता हुआ तदभिन्न है । जब अन्तर्य्याम - सम्बन्ध से प्रारम्भ कर सूर्य्यकेन्द्रान्त वितत ' सुषुम्णा ' नामक व्यान नाड़ी का हृदय के साथ विश्वामित्र प्राण ) सुरक्षित रहता है, तब तक इसी नाड़ी के द्वारा वह श्रादित्यप्राण ( श्रायु: स्वरूप प्रकार रक्षक नियतकाल पर संक्रान्त अध्यात्म में प्रविष्ट होता हुआ जीवनसत्ता का कारण बना रहता है । जिस ) अपना अधिकार होने वाली ग्रहदशां नियतकाल से कुछ समय पूर्व ही दृष्टि सम्बन्ध से ( विभूति द्वारा [ ७२ ]

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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मोत्कान्तिपरिचायकाः जमा लेती है, किंवा ग्रहणकाल से पहले ही जिस प्रकार भूच्छाया तथा चन्द्रच्छाया अपना स्वत्त्व प्रतिष्ठित कर लेती है, ठीक इसी भाँति मृत्युकाल से कुछ मास पहले ही मृत्युच्छाया का अध्यात्म संस्था से प्रति-. च्छायात्मक सम्बन्ध हो जाता है । इस मृत्यु प्रतिच्छाया प्रवेश से व्यान नाड़ी का हृद्ग्रन्थिबन्धन श्लथ हो जाता है । इसके ढीले पड़ जाने से प्रायुःस्वरूप रक्षक आदित्य प्राण के प्रागन में मन्दगति का समावेश जाता है । इसके मान्द्य से प्रत्यगात्मा निर्बल सा होता है । फलस्वरूप स्वस्थसबल प्रत्यगात्मा इन्द्रियों के द्वारा जिन प्राकृतिक स्थितियों का जिस व्यवस्थित रूप से प्रत्यक्ष करता था, वह व्यवस्थिति कुछ समय पूर्व ही उत्क्रान्त हो जाती है । प्राकृतिक पदार्थों के दर्शन - स्पर्श - भोगादि में विकृति उपलब्ध होने लगती है । इस प्रकार जब भी किसी पुरुष को प्राकृतिक पदार्थों में वैकल्प्य उपलब्ध होने लगे, विश्वास कर लेना चाहिए कि प्रकृति मुझे छोड़ रही है । अब शीघ्र ही मुझे प्रयाण करना पड़ेगा । जो सूर्य्य जीवनदशा में ज्योतिर्म्मय, रश्मियुक्त दिखलाई देता है, वही इस व्यवस्थिति उत्क्रान्ति-दशा में चन्द्रमा की भाँति निस्तेज दिखलाई देने लगता है । विदित होता है, जिस प्रकार चन्द्रमा में रश्मि -प्रसार नहीं है, वैसे यहाँ भी रश्मि प्रसार का अभाव है । प्राकृतिक रश्मिप्रसार का उक्तलक्षण मान्द्यदी ऐसी स्थिति का जनक है । जो प्राकाशमण्डल निर्मल स्वच्छ था, यह रक्तवर्ण का प्रतिभासित होने लगता है । गुदमार्ग अतिशय रूप से चौड़ा हो जाता है । हृद्ग्रन्थि के श्लथ हो जाने से मूलग्रन्थि भी श्लथ हो जाती है, मलभाण्ड निर्बल हो जाता है, बद्धकोष्ठता का उच्छेद हो जाता है । शोचकर्म का संयम एकान्ततः विलुप्त हो जाता है । काक पक्षी के घोंसले में जिस प्रकार एक दुर्गन्ध प्राया करता है, इसके मस्तक में वैसा ही दुर्गन्ध आने लगता है । काक पक्षी का प्रेतप्रारण से ( जो कि शवशरीर में प्रतिष्ठित रहता है, जिससे शवशरीर सड़ने लगता है ) घनिष्ठ सम्बन्ध है, जिसकी तृप्ति के लिए श्राद्धक में काक के लिए भी बलि का विधान हुआ है । हृद्ग्रन्थि विमोक से जैसे मूलग्रन्थि शिथिल हो जाती है, एवमेव तत्सम्बद्धा ब्रह्मग्रन्थि भी शिथिल हो जाती है । जब तक ब्रह्मग्रन्थि दृढमूल बनी रहती है, तब तक ब्रह्म-रन्ध्र द्वारा प्रविष्ट ब्रह्मणस्पति नामक पावक सोममात्रा का अविच्छिन्न आगमन होता रहता है । ग्रन्थि शैथिल्य से इसका आगमन अवरुद्धप्राय जाता है । फलस्वरूप शवशरीरानुबन्धी प्रेतप्रारण का प्रवेश हो जाता है । यही उक्त काककुलायगन्ध का मूल कारण है । सूर्य्यगोल ऐसा प्रतीत होने लगता हैं, मानों इसमें अनेक छिद्र हों । कभी - कभी अपने शरीर की छाया भी ऐसी ही दिखलाई देती है । दर्पण में अथवा पानी में कभी टेढा मस्तक दिखलाई देता है, कभी आँखों का शुक्लमण्डल कृष्णमण्डल के भीतर दिखलाई देता है, कभी कृष्ण के भीतर शुक्ल मण्डल की प्रतीति होने लगती । आँख बन्द कर लेने पर ग्राँखों के आगे छोटे - छोटे ताराकाराकारित वर्तुलाकार सुसूक्ष्म - शुक्लवर्ण के ' केशोण्ड्रक ' नामक बरक दिखाई देते हैं । उक्त अवस्था मा जाने पर इनका दिखना भी बन्द हो जाता है । स्वस्थ जीवितदशा में जब कोई व्यक्ति कान - नाक बन्द कर लेता है, तो उसे धक् धक् - रूप से शब्द सुनाई पड़ता है । ऐसा प्रतीत होता है, मानों अग्नि प्रज्ज्वलित हो रहा है । सचमुच यह कायाग्निस्वरूप रक्षक वैश्वानराग्नि का ही घोष है । उक्त अवस्था में आकर यह घोष भी सुनाई नहीं पड़ता । श्वेतज्वालायुक्त अग्नि नील दिखलाई पड़ता है— जैसे कि मयूरग्रीवा । निर्मलाकाश में बिना मेघ [ ७३ ]