Part IV Atmgativigyanopanishta Part 4 — पृष्ठ 81–90
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ४ · पृष्ठ 81–90
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मोत्क्रान्तिपरिचायकाः के बिजली चमकती दिखलाई पड़ती है । मेघाच्छन्न प्रकाश में इतर व्यक्तियों द्वारा दृष्ट बिजली भीइसे दिखलाई नहीं पड़ती । कभी ऐसा प्रतीत होने लगता है कि, मानो श्राकाशमण्डल से उतर कर मेघों ने भूस्तर को प्रवृत कर लिया है । कभी भूप्रदेश जलता हुआ दिखलाई पड़ता है । इसके अतिरिक्त इन्द्रियों की वृत्तियाँ शिथिल हो जाती है । सौन्दर्य्यं कुरूपता में प्रतीत होता है, सुस्वादु भोजन नीरस लगने लगता है, मन्दध्वनि उग्र प्रतीत होने लगता है । किसी भोग में प्रानन्दो लब्धि नहीं होती । सब कुछ फीका - फीकां सा लगने लगता है । ही कुछ एक ऐसे प्रत्यक्ष परिचायक चिह्न हैं, जिनके आधार पर - ' श्रस्यात्मा न चिरमिव जीविष्यति ' सिद्धान्त प्रतिष्ठित है । इन्हीं प्रत्यक्ष निदर्शनों का स्पष्टीकरण करते भगवान ऐतरेय कहते हैं-: हुए “ स यश्चायमशरीरः प्रज्ञात्मा ", यश्चासावादित्यः एकमेतत् इत्यावोचाम । तौ यत्र विहीयेते -यदा - १. चन्द्रमा इवादित्यो दृश्यते, न रश्मयः प्रादुर्भवन्ति । २. लोहिनी द्यौर्भवति, यथा मञ्जिष्ठा । ३. व्यस्तः पायुः । ४. काककुलायगन्धिकमस्य शिरो पायति । ५. छिद्रइवाऽऽदित्यो दृश्यते, रथनाभिरिवाभिख्यायते । ६. छिद्रां वा छायां पश्येत् । ७. आदर्श वा, उदके वा, जिह्यशरसमात्मानं पश्येत् । ८. प्रशिरसं वा श्रात्मानं पश्येत् । ९. विपर्य्यस्ते वा कन्याके दृश्येयाताम् । १०. जिह्येन वा कन्याके दृश्येयाताम् । ११. अपिधायाक्षिणी उपेक्षेत, तद्यथा क्टरकारिणसम्पतन्तीव दृश्यन्ते, तानि यदा न पश्येत् । १२. अपिधायकर्णा उपशृणुयात् स एषोऽग्नेरिवप्रज्वलतो रथस्येवोवपब्दिः, तं यदा न शृणुयात् । १३. नील इवाग्निर्ड श्यते, यथा मयूरग्रीवा । [ ७४ ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड आत्मोत्क्रान्तिपरिचायकाः १४. मेघे वा विद्युतं पश्येत् । १५. मेघे वा विद्युतं न पश्येत् । १६. मेघे वा मरीचिरिव पश्येत् । १७. यत्र भूमि ज्वलन्तीमिव पश्येत् । ( इति प्रत्यक्ष दर्शनानि ). तदा - " सम्परेतोऽस्याऽऽत्मा, न चिरमिव जीविष्यति इति विद्यात् । स , यत्करणीयं मन्येत तत् कुर्वीत । " ( ऐ ० ग्रा ० ३ श्र ० । २ अ ० । ४ खं ० ) । अब कुछ एक अप्रत्यक्ष विह्नों की भी मीमांसा कर लीजिए । शीघ्र ही संसार छोड़ने वाले व्यक्ति को प्रानन्दापीति - लक्षणा सुषुप्ति ( घोरनिद्रा ) नहीं प्राती । ग्रपितु प्रायः सान्ध्यस्वप्नावस्था का ही प्राधान्य रह जाता है । इस स्वप्नावस्था में इसे कृष्णवर्णाकार कृष्णदन्तयुक्त मनुष्य ( यमप्रतिकृति ) दिखलाई पड़ता है, साथ ही ऐसा भान होता है मानो यह कृष्णपुरुष मुझे मार रहा है । एक शूकर ( पार्थिववराह-वायुप्रतिकृति ) मार रहा है, मर्कट ( वानर प्रान्तरिक्ष्यवायुप्रतिकृति ) इस पर चढ रहा है, प्रबलवात ( झंझावातभूवायुप्रतिकृति ) इस स्वप्नदृष्टा को इधर से उधर फेंक रहा है । यह स्वयं सुवर्णं खा कर उसकी वान्ति कर रहा है, शहद खा रहा है, कमलनाल खा रहा है, रक्तकमल मस्तक पर धारण कर रहा है । गर्दभरथ में प्रारूढ होकर चलता है, गले में लाल फूलों की माला पहन कर काले बछड़े से युक्त काली गाय को दाहिनी दिशा की ओर मुख करके भगाता है, इत्यादि सब स्वप्न ही अप्रत्यक्ष परिचायक चिह्न हैं, जैसा कि निम्नलिखित श्रुति से प्रमाणित है— अथ - स्वप्नाः १. पुरुषं कृष्णं कृष्णदन्तं पश्यति, स एनं हन्ति । २. वराह एनं हन्ति । ३. मर्कट एनं प्रस्कन्दयति । ४. प्राशुवायुरेनं प्रवहति । ५. सुवर्णं खादित्वाऽपगिरति । [ ७५ ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड ६. मध्वश्नाति । ७. बिसानिभक्षयति । ८. एक पुण्डरीकं धारयति । ९. खरैर्युक्तैर्याति । १०. वराहैर्युक्तैर्याति । श्रात्मोत्क्रान्तिपरिचायकाः ११. कृष्णां धेनुं कृष्णवत्सां नलदमाली दक्षिणामुखोव्राजयति । [ ७६ ]
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अथ आत्मगतिविज्ञानोपनिषदि आत्मगति निमित्तानि 6 ( क ) “ पन्थानः " ( ख ) “ कर्माणि ” स प्रकार जन्म, मृत्यु, क्रिया, दोष ये चार भाव अधाशीच संक्रमण के निमित्त बनते हैं एवमेव जि प्रत्यगात्मा की परलोकगति के “ १ - पन्थानः २ - कर्माणि ३ - नाड्यः, ४- छन्दांसि ५ - देवताः, ६ - प्रातिवाहिकाः, ७- श्राकाशः ८- लोकाः ये प्राठ भाव निमित्त बनते हैं । इन आठों निमित्तों का सोपपत्तिक विवेचन ही प्रकृत परिच्छेद का मुख्य प्रतिपाद्य विषय है । पहले क्रमप्राप्त सर्वप्रतिष्ठा रूप ' पन्थानः ' निमित्त की ओर आपका ध्यान आकर्षित किया जाता है-5 ) पन्थानः-स्थूलशरीरत्यागान्तर उक्त लक्षण गत्यारूढ प्रत्यगात्मा ' तदन्तर प्रतिपत्तौ रंहति सम्परिष्यतः प्रश्ननिरूपणाभ्याम् ' ( वेदान्त सू ० ३ | १ | १ ) । इस प्रार्य सिद्धान्त के अनुसार पञ्चमहाभूतों की सुसूक्ष्म मात्रात्रों से सम्पन्न सूक्ष्म शरीर से अपूर्व प्रज्ञान - विज्ञान - इन्द्रियमात्रा से, सश्चित कर्म्मसंस्कार से, इत्यादि भोगायत तथा भोग साधनों से युक्त होता हुआ स्वशुभाशुभकर्मानुसार लोकान्तर में गमन करता है । यही गति कालगतिलक्षण आत्मगति, किंवा कर्म्मगति है । इस गति के लिए आधिदैविक ( प्राकृतिक ). विश्व में जो नियत मार्ग हैं, उन्हें ही ' पन्थानः ' कहा गया है । श्रीतसिद्धान्त के अनुसार प्रात्मगतिनिमित्तक यह मार्ग सामान्यतः दो भागों में विभक्त है, जैसा कि निम्नलिखित मन्त्रवर्णन से प्रमाणित है -" द्वै स्रुती अंशृणवं पितृणामहं देवानामुतमर्त्यानाम् । ताभ्यामिदं विश्वमेजत् समेति यदन्तरा पितरं मातरञ्च ॥ " ( ऋक् सं ० २०८८।१५ ) । [ ७७ ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्ड श्रात्मगतिनिमित्तानि “ द्यौष्पितः पृथिवीमातः " ( ऋक् सं ० ) । इत्यादि मन्त्रवर्णन के अनुसार पृथिवी ( भूमि - भूपिण्ड ) माता है तथा लोकोपलक्षित सौरसम्वत्सर पिता है । इन द्यावापृथिव्यश्यैतनौधस रसों से ही तदन्तर्भुक्त प्रजा का स्वरूप निर्माण होता है, अतः अवश्य ही इन्हें माता - पिता कहा जा सकता है । पितरौ - लक्षणा पृथिवी के गर्भ में प्रतिष्ठित पितर ( महानात्मपिण्ड ) - देवता - ( प्राण ) - मर्त्य ( प्रत्यगात्मा ) तीनों प्रतिष्ठित हैं । जब ये कम्पित होते हैं, भौमलोक छोड़ते हैं, तो इनके दो ही गन्तव्य मार्ग होते हैं । अर्थात् उत्क्रान्त आत्मा आधिदैविक विश्व में सर्वथा नियतरूप से प्रतिष्ठित दोनों में से किसी एक ही मार्ग का अनुगमन करता है । वे ही दोनों नियत मार्ग क्रमशः शुक्लमार्ग, कृष्णमार्ग नामों से व्यवहृत हुए हैं । जैसा कि निम्नलिखित स्मृतिवर्णन से प्रमाणित है— शुक्ल - कृष्णे गतिह्यते जगतः शाश्वते मते । एकया यात्यनावृत्तिमन्ययाऽऽवर्त्तते पुनः ॥ ( गी ० ८।२६ ) । शुक्लमार्ग ही ' देवयानः पन्थाः ' है, एवं कृष्णमार्ग ही ' पितृयाणः पन्थाः ' है । देवयानमार्ग यत्रतत्र उत्तरमार्ग, आर्चिमार्ग, देवमार्ग इत्यादि नामों से व्यवहृत हुआ है, एवं पितृयाणमार्ग दक्षिणमार्ग, धूममार्ग, पितृमार्ग इत्यादि नामों से सम्बोधित हुआ है । आगे जाकर इन दोनों मार्गों के दो - दो अवान्तर भेद हो जाते हैं । देवयानमार्ग के वे दोनों विभाग क्रमशः देवपथ, ब्रह्मपथ इन दोनों से तथा पितृयारणमार्ग के दोनों विभाग क्रमशः पितृपथ, यमपथ इन दोनों से प्रसिद्ध हैं । इस प्रकार दो से चार मार्ग हो जाते हैं । इस मार्ग चतुष्टयी के भेद से आत्मगति के भी मुख्य चार ही भेद हो जाते हैं । वे चारों गतियाँ क्रमशः ' परमगति, उमंगति, सद्गति, दुर्गति ' इन नामों से प्रसिद्ध हैं । देवयानमार्ग द्वारा ब्रह्मपथ से ब्रह्मलोक में जाना परमगति है । देवयानमार्ग द्वारा देवपथ से देवलोक ( स्वर्गलोक ) में जाना उत्तम गति है । पितृयाणमार्ग द्वारा पितृपथ से पितृलोक ( पितृस्वर्ग ) में सद्गति है, एवं पितृयाणमार्ग द्वारा यमपथ से यमलोक ( नरक ) में जाना दुर्गति है । परम उत्तम - सत् - दुर्गतिभाव व्यवस्थापक इन ब्रह्मपथ - देवपथ-पितृपथ - यमपथ चारों मार्गों का शेष कर्म्म, नाड़ी, छन्द, देवता, प्रातिवाहिक, श्राकाश, लोक इन सातों गतिनिमित्तों के साथ समन्वय हो रहा है । स्वयं कर्म भी देवयान - पितृयाणात्मक बनता हुआ चतुर्विध है । नाड़ी में भी चारों भाव समाविष्ट हैं । एवमेव छन्द - देवता आदि में भी चारों अवस्था भुक्त हैं, जैसा किं तत्तनिमित्त प्रकरणों में स्पष्ट हो जायगा । ( ख ) कर्माणि - परिगणित गतिनिमित्तों में से कर्म्मनिमित्त इसलिए अपना विशेष महत्व रखता है कि, इसी कर्मजनित संस्कार के तारतम्य से नाडी- लोक - प्रतिवाहिकादि निमित्तों के स्वरूप में तारतम्य उत्पन्न होता है । इसी कर्म की संक्षिप्त मीमांसा इन शब्दों में की जा सकती है कि, ' न हि कश्चित् क्षरणमपि जातु -तिष्ठत्यकर्म कृत् ' न्याय से प्रत्येक मनुष्य यावज्जीवन अवश्य ही कर्म - प्रपञ्च से आक्रान्त रहता है । इन मानवीय कर्मों को महर्षियों ने ' कर्म्म - विकर्म्म- कर्म ' भेद से तीन भागों में विभक्त माना है । आगे जाकर इन तीनों में से प्रत्येक के प्रवान्तर अनेक भेद जाते हैं, जिनका गीता विज्ञानभाष्यभूमिकान्तर्गत ' कर्म्मयोग परीक्षा ' नामक द्वितीय खण्ड के ' ख - ग ' विभागों में विस्तार से निरूपण हुआ है । प्रकृत में विषय समन्वय के लिए केवल मुख्याक मंत्रयी का ही दिग्दर्शन करा दिया जाता है । [ ७८ ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड आत्मगतिनिमित्तानि गुणत्रयवच्छिन्ना, योगमाया नामात्मिका जिस प्रकृति ( हरिमाया ) के गर्भ में अस्मदादि प्रतिष्ठित है, वह प्रकृति निरन्तर कुछ न कुछ कर्म किया करती है । कर्म्मप्रधाना, कर्म्मशीला प्रजावर्ग की प्रेरणा से, किंवा प्रकृति की श्रव्यर्थ प्रेरणा से अस्मदादि प्रजावर्ग इस प्रकृति कर्म में अवश्यमेव प्रवृत्त रहना पड़ता, जैसा कि, “ कायते ह्यवश्यः को कम्मं भी विवश सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः होकर किसी न किसी स्मृति से प्रमाणित है । हमें कर्म्ममार्ग में प्रवृत्त रखने वाली योगमायात्मिका कर्म्ममयी " इत्यादि ' स्वयम्भू परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्रमा पृथिवी ' ये पाँच मुख्य पर्व हैं । पाँचों ही प्राकृतपर्व इस प्रकृति के सम्बन्ध से, तथा अतिसार रस सम्बन्ध से आत्मा - शरीर, भेद से दो - दो भागों नास्तिसारबल अस्तिभाव श्रात्मा है, बलप्रधान नास्तिभाव शरीर है । आत्मा ब्रह्म है, यही में विभक्त हैं । रसप्रधान है, यही कम्मं है । ब्रह्म - कर्मात्मिका इसी प्रकृति के लिए ' ब्रह्म - कर्म च ज्ञान है । शरीर ब्रह्मायतन पञ्चपर्वात्मक यही प्राकृतिक विश्व प्राधिदैविक विश्व है, जिसके समष्टि व्यष्टिरूप मे दिव्यम् से ब्रह्म ' यह कहा गया है । विवर्त्त हैं । प्राकृतिक अधिदैविक विश्व ही ज्ञानप्रधानात्मक दृष्टि से - कर्म्म भेद से दो - दो, ' ब्रह्माश्वत्थ ' कहलाया है, एवं कर्म्म -प्रधाना शारीरदृष्टि से ' कम्मश्वत्थ ' कहलाया है । ब्रह्माश्वत्थ अपरिवर्तनीय ज्ञान सम्बन्ध है, एवं कमश्वत्थ परिवर्तनीय क्षणिक - कर्म्म सम्बन्ध से सम्यक् - संसरणशील है से अपरिवर्तनीय प्राकृतिक कर्म्माश्वत्थ वृक्ष ' संसारवृक्ष ' ( संसारमही रुह ) कहलाया है, जिसकी ब्रह्माश्वत्थ । इसी कर्म्मदृष्टि से यह ही मूल प्रतिष्ठा है । " अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा चापि दाशकितवादित्वमधीयत एके " ( वे ० सू ० जीवलोके जीवभूतः सनातनः ' - ' मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते स चराचरम् ' - ' यदेवेहतदमुत्र २।३।४३ ) ' ममैवांशो पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ' - ' योऽहं सोऽसौ योऽसौ सोऽहम् ' इत्यादि स्मृति -, श्रुति यदसुत्रतदन्विह ' अनुसार जीवसर्ग ब्रह्म - कर्म्माश्वत्थरूप उक्त प्रकृतिपञ्चक का ही अंश है । सुतरां - ' कारणगुणाः प्रमाणों के गुणानारम्भते ' न्याय से जीवसर्ग में भी अंशी के ब्रह्म - कर्म दोनों विवर्त्तो की सत्ता कार्यः अन्तर अंशी तथा ग्रंश में केवल यही है कि, प्राकृतिक प्राधिदैविक पुरुष के ब्रह्म - कर्म्मधातु सिद्ध हो जाती है । बनते हुए शान्त हैं एवं वैकृतिक आधिभौतिक इस पुरुष के ब्रह्म - कर्म्म धातु विषमभावापन्न हैं समभावापन्न धातुवैषम्य जीव की दुःख प्रवृत्ति का आदिकारण है, जिसके मूल में प्रज्ञापराध प्रतिष्ठित हैं, और यही । यद्यपि उक्त कथनानुसार जीवसर्ग में अंशी प्राकृतिक पुरुष के स्वयम्भू - परमेष्ठी आदि पाँचों पर्वों ही ब्रह्म - कर्म युग्मों का अंश भुक्त होता है, तथापि ' रोदसी त्रिलोकी ' नाम से प्रसिद्ध सौर त्रिलोकी- से सम्बन्ध रखने वाली अस्मदादि पार्थिव जीवसर्ग में प्राकृतिक पुरुष के सूर्य्य, चन्द्रमा, के ब्रह्म - कर्म्मयुग्मों की ही प्रधानता रहती है । इन तीनों के सम्बन्ध में भी यह विशेषता पृथिवी इन और तीन लक्ष्य पर्वोंमें रखनी चाहिए कि, सूर्य्यसंस्था में ब्रह्ममात्रा प्रधान रूप से विकसित हैं, तदनुकर्म्ममात्रा भी पूर्ण विकसित है । इस प्रकार सौर ब्रह्मकर्म्मयुग्म समभावापन्न बनता हुआ शान्तिलक्षण समत्वयोग ( बुद्धियोग ) की प्रतिष्ठा बन रहा है । चन्द्रमा में ज्ञानमात्रा का अर्द्धविकास है, कर्म्ममात्रा का पूर्ण विकास है, एवं पृथिव में आकर ब्रह्ममात्रा सर्वथा उन्मुग्ध हो रही है, कर्म्म अतिशयरूप से प्रबल बन रहा है । दूसरे शब्दों में इसी तारतम्य का यों भी स्पष्टीकरण किया जा सकता है कि, कम्र्म में ज्ञानमात्रा का पूर्ण विकास है, सूटच कर्म्ममात्रा गौण है | चन्द्रमा में ज्ञानमात्रा अर्द्ध है, कर्म्ममात्रा पूर्ण है, एवं पृथिवी में ज्ञानमात्रा मुकुलित [ ७६ ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्डे है, कर्ममात्रा विकसित है । कर्म्म तथा क्रिया शब्द प्रभिन्नार्थक हैं । क्षरण आत्मगतिनिमित्तानि का नाम क्रिया है, अनेक क्षण त्रियानों की धाराबलानुगता सन्तानावस्था ( समष्टि ) कर्म है । क्रिया समष्टिगुण है, गुणकूट ही द्रव्य है, यह द्रव्य ही कर्म्मपुद्गल है । इसी आधार पर नास्तितत्वोपासकों ने सत्ता का ' उत्पादव्ययश्रव्यं सत् ' यह लक्षण किया है । यही क्रियारूप, किंवा क्रियासमष्टिरूप कर्म्म लोकभाषा में द्रव्य ( अर्थ ) नाम से. व्यवहृत हुआ है । इसी आधार पर यह कहा जा सकता है कि, द्युलोकाधिष्ठाता सूर्य्य में ज्ञानशक्ति की प्रधानता है, आन्तरिक्ष्य चन्द्रमा में क्रियाशक्ति का प्राधान्य है, एवं पार्थिव संस्था में अर्थशक्ति विकसित है । ज्ञान ब्रह्म है, क्रियाकर्म्म हैं, क्रियासमष्टि अर्थ है । इस प्रकार बलग्रन्थि तारतम्य से तीनों युग्मों के क्रमशः ' ब्रह्म - कर्म - अर्थ ' ये रूप हो जाते हैं । कर्म्म गर्भित ब्रह्म ( ज्ञान ) ब्रह्म है, ब्रह्मगर्भित कर्म्म कर्म है, एवं ब्रह्म - कर्म्म ( क्रिया ) गर्भित द्रव्य अर्थ है । सूर्य्यं ब्रह्म संस्था है, चन्द्रमा कर्म्मसंस्था है, पृथिवी अर्थसंस्था है | ज्ञान - क्रिया - अर्थमूत्ति सूर्य्य में ज्ञान का प्राधान्य है, ज्ञान - क्रिया - अर्थमूर्ति चन्द्रमा में क्रिया का प्राधान्य है, एवं सतत् त्रयमूर्ति पृथिवीलोक में अर्थ का प्राधान्य है । प्रकृत में तीनों विवर्त्तो का कमर्श-मात्र ही निरूपणीय है । १. पार्थिव कर्म इन्द्रप्रमुख त्रयस्त्रिंशद्द वप्राणभुक्ति से ज्ञानप्रधान सूर्य देवलोक है, अग्निष्वात्तादि अष्टविध पितृ-प्राणमुक्ति से क्रियाप्रवान चन्द्रमा पितृलोक है, एवं वैश्वानर प्रमुखमानवप्राणभुक्ति से पार्थिव विवर्त्त मनुष्यलोक है । भूपृष्ठ पर जन्म धारण करने वाले मनुष्य में त्रिलोकी के प्रतिमान ( पारस्परिक भुक्ति ) सम्बन्ध से तीनों लोकों की मात्रा का समावेश है । इन तीनों प्रवर्ग्य भागों के सम्बन्ध से मानव - प्रजा में तीन प्रकार की कर्म्मधाराओं का समावेश रहता है । हाँ, यह विशेषता अवश्य सुरक्षित है कि, मनुष्य चूंकि पार्थिव प्राणी है, अतएव इसमें सूर्य्य - चन्द्रापेक्षया पार्थिव अंश का प्रावान्य है । फलतः पार्थिव अर्थप्रधान कर्म्म का प्राधान्य स्वतः सिद्ध है । इससे कम मात्रा पितृकर्म की रहती है, ततोऽपि स्वल्पमात्रा देवकर्म्म की रहती है । पार्थिवशरीरावच्छिन्न- पार्थिव भूतात्मलक्षण जीवात्मा इस पार्थिव अर्थ प्राधान्य से जन्म से कीर ( जड़परिग्रहसंग्रह की प्रोर ) विशेष रूप से प्राकर्षित रहता है । तमोगुणप्रधाना यही अर्थासक्ति इसके प्रज्ञाभाग को उत्तरोत्तर मलीमस बनाता हुआ अन्ततोगत्वा इसकी असुर्य्य - तामसगति का प्रवर्तक बनता है, जिसके निरोध के लिए शास्त्रोपदेश प्रवृत्त हुआ है । धर्मशिक्षा का निगरण कर जाने वाली वर्तमान युग की अर्थशिक्षा ( वकालत, इञ्जिनीयरिंग इत्यादि ) के अनुग्रह से, तथा मोक्षशिक्षा का निगरण कर जाने वाली काम शिक्षा ( डॉक्टरी ) के अनुग्रह से अर्थ- कामभावों को ही परमपुरुषार्थ मानने वाले महापुरुषों की प्राध्यात्मिक संस्था में धर्मानुगत पितृक का, एवं मोक्षानुगत देवकर्म्म का प्रात्यन्तिकरूप से प्रभाव रहता है । प्रधानता रहती है, एकमात्र अर्थ " कामानुगत पार्थिवकर्म्म की । अर्थसञ्चय एवं तद्द्द्वारा ऐन्द्रियक कामों की तृप्ति, ये दो कर्म्म ही इन अर्थ-प्रेमियों के जीवन के मुख्य लक्ष्य बने रहते हैं । फलतः ऐसे अर्थी, कामी कदापि शान्तिलाभ नहीं उठा [ 05 1
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थ खण्डं आत्मगतिनिमित्तानि सकते । अर्थसञ्चय साधक, कामनापूरक कर्मों में अहोरात्र व्यस्त रहना, सञ्चित अर्थ का प्रासाद निर्माण, विहारादि में उपयोग करना, अपनी इन कामनाओं की लिप्सा में पड़कर तत्साधनभूत अर्थ के संग्रह के लिए आत्माभिमान को जलाञ्जलि समर्पित कर निकृष्टवृत्तियों का अनुगमन करना, एवं ' खाना - पीना मौज उड़ाना ' को ही मुख्य सिद्धान्त मानना, यही इन अर्थप्रेमियों की करुण गाथा है । देवता - पितर जैसी दिव्य विभूतियों का ऋण लेकर उत्पन्न होने वाले मनुष्य ने यदि यावज्जीवन उक्त लक्षण वित्तानुग्राहक ही कर्म किया तो उसने क्या किया? कुछ भी नहीं । स्वोदरपोषण के लिए एक पशु अपने जीवन में जो कुछ करता है, वही पुरुषार्थ इस प्रर्थार्थी ने किया । सचमुच ऐसे अर्थी का उस अर्थी से ही समतुलन किया जायगा, जो शवशरीर का वहन करता है । अर्थ स्वयं जड़ है, मर्त्य है, शवात्म है । इसे प्रधान लक्ष्य बनाता हुआ अर्थी जीवित ही अर्थी में प्रारूढ है । ' नामृतत्वस्यत्वाशास्ति वित्तेन ' न्याय से वित्तानुगामी शवशरीरी इस लोक के मनुष्य के लिए शाश्वतशान्तिद्वार के कपाट सर्वथा अवरुद्ध है । चूंकि अर्थप्रधान इन सब लौकिक पार्थिव कम्मों का ' स्व ' ( अपने आप ) से ही सम्बन्ध है, इसका यह कर्म्म तथा कर्म्मसाध्य अर्थ केवल स्वोपभोग के लिए है, अतएव यह पार्थिव - स्वकम् - ' स्वार्थ ' कहलाया है, एवं तदनुगामी पशु - समतुलित मनुष्य ' स्वार्थी ' कहलाया है । ऐसे स्वार्थी, वित्तलोलुप की दृष्टि में माता, पिता, भ्राता भगिनी, कुटुम्ब, समाज आदि का कोई महत्त्व नहीं है । इसके स्वभाव की व्याप्ति रहती है - केवल जाया, पुत्रादिपर्य्यन्त । कभी - कभी तो जाया - पुत्रादि भी अपवाद बन जाते हैं । स्वस्वार्थसिद्धि के लिए यदि इस नराधम को माता - पिता की वञ्चना करनी पड़े तो इस जघन्य कर्म्म के लिए भी यह सन्नद्ध रहता है । सबका सर्वस्व अपहरण करने में यह अपनी शिक्षा का सदुपयोग मानता है | असेव्य सेवा, लक्ष्मी वाहनों के प्रति आत्मसमर्पण, शारदोपासकों का उपहास आदि इसके अतिथि बने ' रहते हैं । स्वार्थ साधना की प्रश्नोपस्थिति पर यह ' स्पष्टीवादी ' बनने की घोषणा कर देता है । काल-महिमा का बखान करता हुआ, समाज से तिरस्कृत होता हुआ भी यह अङ्गीकृत सिद्धान्तों का परित्याग कर देता है । कहना होगा कि, वर्तमान युग में ऐसे स्वार्थियों से ही ( अधिकांश में ) भारतवसुन्धरा भारपीडिता बन रही है । २. पितृकर्म सौभाग्य से यदि किसी में चान्द्रपितृकर्म का भी विकास रहता है, तो वह अपने स्वार्थ के साथ-साथ अन्य व्यक्तियों के स्वार्थसाधन को भी स्वकर्म से लक्ष्य बनाता है । यह उन्हीं कम्मों का अनुगमन करता है, जिनसे अपने उपकार के साथ - साथ दूसरों की भी भलाई सम्भव है । इसका यह परार्थसाधक कर्म्म आत्मस्थश्रद्धासूत्रान्वित पितृप्राण की प्रेरणा का फल है, अतएव इस परार्थकर्म्म को अवश्य ही पितृकर्म कहा जा सकता है । इस कर्म के -- ' इष्ट - श्रापूर्त - दत्त ' भेद से तीन विवर्त्त माने गये । परार्थ-वर्ग को कुटुम्बस्वार्थ, अन्य व्यक्तिस्वार्थ, अनेक व्यक्तिस्वार्थ भेद से तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है । जीवित पिता, माता, भ्राता भगिनी अन्य सपिण्ड कुटुम्बी आदि के भरण - पोषण के निमित्त स्व-सम्पत्ति का उपयोग करना कुटुम्बस्वार्थलक्षण ' स्वार्थकर्म्म ' है, एवं मृत सपिण्डों के लिए श्राद्ध करना भी यही स्वार्थकर्म्म है । इस स्वार्थलक्षण परार्थ का ही नाम ' इष्ट ' कर्म्म है । इससे स्वकर्म्म को भी साहा [ ८१ ]
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श्राद्ध विज्ञान चतुर्थखण्ड श्रात्मगतिनिमिनानि wwwwww प्राप्त होता है, कुटुम्बियों की रक्षा होती है । चान्द्रलोकगत पितृपिण्ड भी तृप्त होते हैं, आप्यायितपिण्ड श्रद्धासूत्र द्वारा स्वयं इसके महत्पण्ड को भी प्रजातन्तु वितान में समर्थ बनाते हैं । साथ ही श्राद्धकर्मान्त में होने वाले ब्राह्मण भोजन से यही इष्टकर्म्म प्रांशिकरूप से सामाजिक स्वार्थसाधन लक्षरण परार्थ का भी उपोद्बलक बन रहा है । स्वपिण्ड स्वार्थ के अतिरिक्त अन्य अनाथ बालक, अनाथ विधवा, हीनाङ्ग, असमर्थ, दरिद्र आदि व्यक्तियों को लक्ष्य बना कर इनकी भोजनाच्छादनादि से रक्षा करना ' दत्त ' नामक परार्थ पितृकर्म है, एवं वापी - कूप - तड़ाग - देवालय — वाचनालय - पुस्तकालय - धर्मशाला —-पाठशाला आदि निर्माण द्वारा अनेक व्यक्तियों ( समाज ) का एक साथ उपकार करना परमार्थलक्षण ' श्रापूर्त ' कर्म है । इस प्रकार परार्थलक्षण पितृकर्म के उक्तरूप से स्वार्थ- परार्थ - परमार्थ भेद से इष्ट - दत्त - श्रापूर्त नामक तीन अवान्तर कर्म्म हो जाते हैं । इस त्रिविध पितृकर्म से श्रद्धासूत्र द्वारा प्राध्यात्मिक पितृप्राण उत्तरोत्तर विकसित होता रहता है । अतएव इस कर्म्मत्रयी को पितृस्वर्गगति का निमित्त बतलाया गया है, जैसा कि अनुपद में ही स्पष्ट होने वाला है । विद्या, ब्रह्म वेद तीनों तत्त्व उपाधिभेद से भिन्न होते हुए भी निरूपाधिदृष्ट्या अभिन्नार्थ के सूचक हैं | संस्कारावच्छिन्न वही प्रत्यगात्मज्ञान विद्या है, विषयावच्छिन्न वही प्रत्यगात्मज्ञान ब्रह्म है, एवं विषया वच्छिन्न वहीं प्रत्यगात्मज्ञान वेद है । इसी ज्ञानसामान्य दृष्टि से तीनों के लिए - ' त्रयीविद्या, त्र्यंब्रह्म, व्यवहार प्रचलित है । जैसा कि ईशविज्ञानभाष्यादि में विस्तार से निरूपित है । महदुक्थ ( सूर्य्यपिण्ड ) रूप से ऋङ्मय, महाव्रत ( सौरप्रकाश मण्डल ) रूप से साममय, पुरुष ( सूर्य्य, सूर्य्यमण्डलान्त-र्गत स्थितिगर्भितगतिलक्षण सावित्राग्नि ) रूप से यजुमय बनती हुई सूर्य्य संस्था त्रयीवेदधन है, जैसा कि ' सैषात्रय विद्या तपति ' ( शत ० ) इत्यादि वचन से प्रमाणित है । इसी त्रयीविद्या के आधार पर सौरयज्ञ-लक्षण सौरदिव्यकर्म्म प्रतिष्ठित है, जैसा कि - ' सैषा त्रयीविद्या यज्ञः - यज्ञं कृत्वा सत्यं तनवाम है ' इत्यादि वचनों से स्पष्ट है । जिस प्रकार विशुद्ध स्वार्थसाधक लौकिक पार्थिव स्वार्थ कम्मों का इस सौरत्रयी विद्या से कोई सम्बन्ध नहीं है, एवमेव स्वार्थ- परार्थ - परमार्थ भेद से इष्ट - दत्त - श्रापूर्त्तभेदेन त्रिधाविभक्त परार्थलक्षण उक्त मितृकर्म भी त्रयीज्ञान की कोई अपेक्षा नहीं रखता । यद्यपि पितृकर्म के श्राद्धकर्मात्मक इष्टकर्म्म में त्रयीविद्या का ( वेदमन्त्रों का ) उपयोग होता है, परन्तु यह इतिकर्त्तव्यता कुलपुरोहित- याजक ब्राह्मण द्वारा सम्पन्न हो सकती है । स्वयं न जानने पर भी पितृकर्म का यह अंश सम्पन्न हो सकता है । शेष दत्त, आपूर्त नामक पितृकम्र्मों से तो त्रयीविद्या का कुछ भी सम्बन्ध नहीं है । नितान्त मूर्ख, किन्तु धनसम्पन्न एक अज्ञव्यक्ति की दत्त - श्रापूर्त का अनुगमन कर सकता है । अतएव केवल इष्ट को छोड़कर शेष दोनों पितृकम्मों में पृथिवी के सम्पूर्ण मनुष्यों को समानाधिकार प्राप्त है । चूंकि पितृकर्म्मत्रयी में त्रयीविद्या निरपेक्ष है, अतएव इसे - ' विद्या निरपेक्षसत्कर्म्म ' कहना श्रन्वर्थ बनता है । ३. दिव्यकर्म - तीसरा क्रमप्राप्त दिव्यकर्म है, जिसका सवनत्रयावच्छिन्न, छन्दस्त्रयी - श्रनुगत - ब्रह्मक्षत्र - विभाव-प्रवर्तक सम्वत्सरमण्डल से ही सम्बन्ध है । त्रयीविद्यामयसौरभाग ही प्राध्यात्मिकसंस्था में प्रतिष्ठित होकर दिव्य प्रवृत्ति का कारण बनता है । इसके श्रागमन में विशेषधर्म का हस्तक्षेप है । भारतीय महर्षियों [ २ ]
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श्राद्धविज्ञान चतुर्थखण्ड - * - * → 90 आत्मगति निमित्तानि - त्रैलोक्यम् रोदसी [ ३ ] ने इसी विशेषता के आधार पर ब्रह्म - क्षत्र - विड्वीर्य्यानुबन्ध से नित्यसिद्धा वर्णत्रयी की व्यवस्था की है, जैसा कि - ' वर्णव्यवस्थाविज्ञानादि ' निबन्धों में विस्तार से प्रतिपादित है । इसी प्राकृतिक - नित्य - जन्म -मूला - वर्णव्यवस्था के आधार से त्रयीविद्यात्मक दिव्यकर्म्म केवल भारतीय द्विजातिवर्णत्रयी के लिए ही नियमित हैं । इनके सम्बन्ध में समानाधिकार का प्रश्न ही नहीं उठता । यदि पाथिवक की प्रबलता रहती है, तो यह दिव्यभाव सर्वथा अभिभूत हो जाता है, अन्यथा विकसितमात्र से ही तब तक दिव्यकम्म में सफलता नहीं मिल सकती, जब तक कि स्मार्त्तषोडश संस्कारपूर्वक त्रयीविद्याध्ययन द्वारा विद्यात्मक संस्कार अध्यात्म में प्रतिष्ठित नहीं कर लिया जाता । केवल कुलपुरोहित के आधार पर स्वयं ज्ञानप्राप्त किए बिना दिव्य कर्मानुगमन असम्भव है । अतएव इस दिव्यक को - ' विद्यासापेक्षक ' कहना अन्वर्थ बनता है । उक्त लक्षण दिव्यकर्म्म के भी पितृकर्म्मवृत् ' यज्ञ - तप - दान ' भेद से तीन विवर्त्त माने गए हैं ।. अररिणमन्थन द्वारा उत्पन्न दिव्यलोक की प्रतिकृतिरूप ग्राहवनीय कुण्ड में प्रतिष्ठित, सामिधेनी मन्त्रों से समिद्ध, दिव्यभावापन्न वैध ग्नि में मन्त्र द्वारा आहुति देना ही यज्ञकर्म है । इस यज्ञकर्म्म से उत्पन्न दिव्यातिशयरूप देवात्मा ही यज्ञ पुरुष है, जिसका यज्ञकर्त्ता यजमानात्मा के मानुषात्मा ( प्रत्यगात्मलक्षण भूतात्मा ) के साथ अन्तर्य्यामि सम्बन्ध हो जाता है, एवं आयुर्भोगान्तर जो कि देवात्मा स्वाभाविक दिव्या-कर्षण से इस प्रत्यगात्मा की स्वर्गगति का कारण बनता है । यज्ञकर्म द्वारा उत्पन्न यज्ञातिशयलक्षण -देवात्मा की स्वरूप रक्षा के लिए यावज्जीवन अनुष्ठीयमान स्वभागत्यागलक्षण - आध्यात्मिक भृग्वङ्गिरोमय प्राणकर्म ( उपासना आदि ) ही तप है, एवं यज्ञिय - ऋत्विजों को, योग्य - पूर्णाङ्ग ब्राह्मणों को सत्कारपूर्वक दक्षिणादि से सम्मानित करना ही ' दान ' । इन तीनों में यज्ञाधिकार एवं तज्जनित दैवात्म द्वारा स्वर्ग प्राप्ति, एकमात्र वेदविद्यावित् विद्वान् को ही प्राप्त है । तपस्वी भी यदि अविद्वान् है, तो न तो उसे यज्ञा-धिकार ही प्राप्त है, एवं न स्वर्लोकावाप्ति का ही इसको अधिकार । इस विद्यासापेक्ष दिव्यकर्म से स्वार्थ-सिद्धि तो होती है, परन्तु सर्वहुत यज्ञतृप्ति के द्वारा यही दिव्यकर्म विश्वशान्ति का भी कारण बनता है । अतएव इसे परमार्थ कर्म्म कहा जा सकता है । यदि दिव्यकर्म में केवल स्वर्गासक्ति है, तो यह भी प्रत्येक दशा में निन्द्य है । क्योंकि उस दशा में वेदसिद्धयज्ञ त्रिगुणभावाक्रान्त बनता हुआ लौकिक पार्थिवकर्म्मवत् " बन्धन का ही कारण बन जाता है । इस प्रकार सूर्य्य - चन्द्र - पृथिवी के दिव्य पैत्र्य पार्थिवकर्मो की भुक्ति से मानुषकर्म्म दिव्यकर्म्म, पितृकर्म भेद से तीन भागों में विभक्त हो जाते हैं । प्रथम दिव्यकर्म्म ज्ञानशक्ति को, द्वितीय पितृकर्म क्रियाशक्ति को, तृतीय पार्थिवकर्म्म अर्थशक्ति को अपना मुख्य लक्ष्य बना रहा है । दिव्यकर्म्म परमपुरुषार्थ-लक्षण परमार्थकर्म्म कर्म है, पितृकर्म्म पुरुषार्थ लक्षण परार्थकर्म है, एवं पार्थिवकर्म्म इन्द्रियार्थ लक्षण स्वार्थ है । जैसा कि परिलेखों से स्पष्ट हो जाता है— १ – सूर्य्यः → देवलोक: - क्रियार्थगभितो ज्ञानमयः दिव्य कर्माधिष्ठाता २ – चन्द्रमाः पितृलोकः अर्थज्ञानगभितो क्रियामयः पितृकर्माधिष्ठाता ३ – भूलोकः + मनुष्यलोकः ज्ञानक्रियागभितोऽर्थमयः पार्थिवकर्माधिष्ठाता