पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 31–40

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 31–40

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दूसरा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ उत्तरमीमांसा द्वैत - अद्वैत सिद्धान्तके भेद आत्मतत्त्वके सम्बन्धमें द्वैत - अद्वैत आदि मतावलम्बियोंने शब्दोंके अर्थ निकालनेमें खासी खींचातानी की है । अद्वैतवादी ' हान ' अर्थात् स्वरूपस्थिति, मोक्षकी अवस्थामें आत्मतत्त्व और परमात्मतत्त्वकी भिन्नता नहीं मानते । उनके मतानुसार व्यवहार - दशामें आत्मतत्त्वके रूपमें परमात्मतत्त्वका ही व्यवहार होता है । मुक्तिकी अवस्थामें आत्मतत्त्व - परमात्मतत्त्वमें, जो इसका ही अपना वास्तविक स्वरूप है, अवस्थित रहता है । द्वैतवादी आत्मतत्त्व और परमात्मतत्त्वमें जडतत्त्वसे विजातीय भेद मानते हैं; और आत्मतत्त्व - परमात्मतत्त्वमें परस्पर सजातीय भेद मानते हैं - अर्थात् आत्मा तथा परमात्मा परस्पर जडतत्त्वके सदृश भिन्न नहीं हैं; किंतु एकजातीय होते हुए भी अपनी - अपनी अलग सत्ता रखते हैं । मुक्तिकी अवस्थामें आत्मा परमात्माको प्राप्त होकर उसके सदृश, दुःखोंको त्यागकर, ज्ञान और आनन्दको प्राप्त होता है । इसी प्रकार जडतत्त्वके सम्बन्धमें भी उनका मतभेद है । अद्वैतवादी जडतत्त्वकी सत्ता परमात्मतत्त्वसे भिन्न नहीं मानते, उसीमें आरोपित मानते हैं, जैसे रस्सीमें साँप और सीपमें चाँदीकी सत्ता आरोपित है, वास्तविक नहीं । इस प्रकार अद्वैतवादी जडतत्त्वको ' अनिर्वचनीय माया ' अथवा ' अविद्या ' मानते हैं, जो न सत् है न असत् । सत् इस कारण नहीं कि मुक्ति अर्थात् स्वरूपस्थितिकी अवस्थामें उसका नितान्त अभाव हो जाता है और असत् इसलिये नहीं कि सारा व्यवहार इसीमें चल रहा है, किंतु जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान - कारण ब्रह्म या चेतनतत्त्व ही है; क्योंकि माया ब्रह्मसे अलग कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं रखती, वह ब्रह्महीकी विशेष शक्ति अथवा सत्ता है । ब्रह्ममें कोई परिणाम नहीं होता, वह सदा एकरस है । जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय मायाका परिणाम है; यह केवल चेतन सत्तामें भ्रमसे भासता है । यह सिद्धान्त विवर्त्तवाद कहलाता है, जिसमें ब्रह्मको जगत्का विवर्ती उपादान कारण माना गया है, अर्थात् ब्रह्म अपने स्वरूपको किंचिन्मात्र भी नहीं बदलता है; परंतु भ्रमसे बदला - सा प्रतीत होता है ।

नासद्रूपा न सद्रूपा माया नैवोभयात्मिकां ।

सदसद्भ्यामनिर्वाच्या मिथ्याभूता सनातनी ॥

' माया न असद्रूप है न सद्रूप और न उभयात्मिका ही । वह सत् - असत् दोनोंसे अनिर्वचनीय मिथ्यारूपा और सनातन ( नित्य ) है । ' यहाँ केवल शब्दोंका उलट - फेर है । वास्तवमें तो इससे जगत्का उपादान कारण माया ही सिद्ध होती है । मायाको चाहे सत् कहो, चाहे असत्, चाहे सत् और असत् दोनोंसे विलक्षण! यथा— मायामेघो जगन्नीरं वर्षत्येष यतस्ततः । चिदाकाशस्य नो हानिर्न च लाभ इति स्थितिः ‘ मायारूपी मेघसे जगत्रूपी नीर बरस रहा है और आकाशके समान निर्लेप चेतनकी कुछ हानि नहीं, न वह आकाशरूपी ब्रह्म भीगता या गीला ही होता है । '

छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो व्रतानि भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति ।

अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत् तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्धः ॥

( ११ )

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दूसरा प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप '* * [ उत्तरमीमांसा

मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ।

तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ॥

( श्वेता ॰ ४।९ -१० ) ' छन्द, यज्ञ ( हविर्यज्ञ ), क्रतु ( ज्योतिष्टोमादि ), व्रत, भूत, भविष्यत् और जो कुछ वेद बतलाते हैं, इस सबको मायाका स्वामी ( मायी ) इससे रचता है और उसमें दूसरा ( पुरुष ) मायासे रुका ( बँधा ) है । प्रकृतिको माया जानो और महेश्वरको मायी, सारा विश्व उस ( मायी – मायाशबल ) के अङ्गोंसे व्याप्त है । '

नामरूपविनिर्मुक्तं यस्मिन् संतिष्ठते जगत् ।

तमाहुः प्रकृति केचिन्मायामन्ये परे त्वणून् ॥

( बृहद्वासिष्ठ ) ‘ नाम और रूपसे रहित यह जगत् जिसमें ठहरता है, उसको कोई ( जगत्का उपादान होनेसे ) प्रकृति कहते हैं, दूसरे ( जगत्की मोहक होनेसे ) माया बोलते हैं और कुछ लोग परमाणु नाम लेते हैं । ' द्वैतवादमें इस जड़ प्रकृतिको एक स्वतन्त्र तत्त्व ' प्रकृति ' नामसे मानते हैं । मुक्तिकी अवस्थामें इसका नाश केवल मुक्तिवालोंके लिये होता है । इसका अपने स्वरूपसे अभाव नहीं होता; क्योंकि जो मुक्ति अवस्थाको प्राप्त नहीं हुए हैं, उनके लिये यह बनी रहती है । यथा-' कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात् ' । ( योगदर्शन २ । २२ ) ' जिसका प्रयोजन सिद्ध हो गया है, उसके लिये नष्ट हुआ भी ( वह अपने स्वरूपसे ) नष्ट नहीं होता; क्योंकि वह दूसरोंके साझेकी वस्तु है । ' यही प्रकृति जगत्का उपादान कारण है, जगत् इसका कार्य है । जिस प्रकार घट ( घड़ा ) कार्य है, मिट्टी उसका उपादान कारण है, कुम्हार निमित्त कारण है और इसका प्रयोजन पाकादि कार्योंमें लाना है, इसी प्रकार प्रकृति जगत्का उपादान कारण, ब्रह्म निमित्त कारण और पुरुषोंका भोग अपवर्ग इसका प्रयोजन है । द्वैत - अद्वैत सिद्धान्तके भेदमें अविरोध जड तथा चेतनतत्त्वके सम्बन्धमें द्वैत - अद्वैतवादियोंके सिद्धान्तमें जो भेद दिखलाया गया है वास्तवमें वह कोई भेद नहीं है । किसी साधारण दृश्यका यदि कई लेखक वर्णन करें तो वे सब एक जैसे नहीं हो सकते । लेखकोंके विचार, उनकी रुचि, दृष्टिकोण और लेखनशैलीके अनुसार भिन्नताका होना आवश्यक है । ये तीनों तत्त्व केवल अनुभवगम्य हैं, बुद्धिसे अधिक सूक्ष्म होनेके कारण वर्णनमें ठीक - ठीक नहीं आ सकते । इस कारण तत्त्ववेत्ताओंकी वर्णनशैलीमें भिन्नताका होना स्वाभाविक है । बाह्य दृष्टिवालोंको भले ही यह भिन्नता वास्तविक प्रतीत हो, किंतु सूक्ष्मदृष्टिसे देखनेवालोंके लिये इसमें कोई भिन्नता नहीं । इस प्रकार -' हान ' – दुःखकी अत्यन्त निवृत्ति अर्थात् स्वरूपस्थिति वेदान्तके द्वैत - अद्वैत दोनों ही सिद्धान्तोंका अन्तिम लक्ष्य है । वह स्वरूपस्थिति ' ब्रह्मसदृश ' होना हो अथवा ' ब्रह्मस्वरूप ' होना हो, यह केवल ( १२ )

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दूसरा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय: * * [ उत्तरमीमांसा शब्दोंका उलट - फेर ही है । इसी प्रकार ' हेयहेतु ' दुःखका कारण जडतत्त्व है, इसका आत्मतत्त्वसे संयोग हटाना दोनों सिद्धान्तवालोंका ध्येय है । अद्वैतवादियोंने इसको रज्जुमें सर्पके सदृश, परमात्मतत्त्वमें आरोपित एक कल्पित वस्तु बतलाकर आत्मतत्त्वसे इसका संयोग छुड़ाया है । द्वैतवादियोंने इसको आत्मतत्त्वसे सर्वथा भिन्न एक अलग तत्त्व दिखलाकर उसमेंसे आत्मतत्त्वका अध्यास हटाया है । ' हानोपाय ’ – दुःखकी निवृत्तिका साधन परमात्मतत्त्वका ज्ञान दोनों सिद्धान्तवालोंके लिये समानरूपसे माननीय है । यही वेदान्तका मुख्य विषय है । हमने केवल द्वैत और अद्वैत सिद्धान्तोंका वर्णन किया है अन्य सम्प्रदायोंके ' विशिष्टाद्वैत ', ‘ शुद्धाद्वैत ’, ‘ द्वैताद्वैत ' इत्यादि सब सिद्धान्त जिनका इसी प्रकरणके अन्तमें वर्णन किया जायगा, इन्हीं दो मुख्य सिद्धान्तोंके अन्तर्गत हैं । यहाँ इतना बतला देना आवश्यक है कि परिणामवाद सांख्य और योगका सिद्धान्त, जिसका वर्णन चौथे प्रकरणमें किया जायगा, एक अंशमें अद्वैतवादसे मिलता है अर्थात् ' स्वरूपावस्थिति ' ' परममुक्ति ' की अवस्थामें आत्मतत्त्व और परमात्मतत्त्वकी अभिन्नता होती है । व्यवहार दशामें आत्मतत्त्वके रूपमें परमात्मतत्त्वका ही व्यवहार होता है और दूसरे अंशमें द्वैतवादियोंसे मिलता है । अर्थात् जडतत्त्व एक स्वतन्त्रतत्त्व त्रिगुणात्मक प्रकृतिनामसे है । परम मुक्तिकी अवस्थामें इसका नाश केवल मुक्तिवालोंके लिये हो जाता है । दूसरोंके लिये स्वरूपसे इसका अभाव नहीं होता । वेदान्तदर्शनका प्रथम सूत्र है— ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' ' अब ब्रह्मके विषयमें विचार आरम्भ होता है । ' दूसरा सूत्र है-' जन्माद्यस्य यतः ' ‘ इस जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय जिससे होती है अर्थात् जो जगत्‌की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका निमित्त कारण है, वह ब्रह्म है । ' जैसा कि श्रुति बतलाती है यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । तद् विजिज्ञासस्व । तद्ब्रह्म ॥ ( तै ० ३।१ ) ‘ जिससे ये भूत उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जीते हैं और मरते हुए जिसमें लीन होते हैं, उसकी जिज्ञासा कर, वह सत्य ब्रह्म है । ' वेदान्तदर्शनका तीसरा सूत्र है-' शास्त्रयोनित्वात् ' ( १ । १ । ३ ) ब्रह्म ‘ शास्त्रप्रमाणक है । ' ब्रह्म इन्द्रियोंकी पहुँचसे परे है, इसलिये वह प्रत्यक्षका विषय नहीं, अनुमान भी उसकी झलकमात्र देता है । पर शास्त्र उसका दि दिव्य स्वरूप दर्शाता है, जिससे अनुमान इधर ही रह जाता है । अतएव कहा है-' येन सूर्यस्तपति तेजसेद्धः । नावेदविन्मनुते तं बृहन्तम् ' ( तै ० ब्रा ० ३ । १२ ) ' जिस तेजसे प्रदीप्त होकर सूर्य तपता है, उस महान् ( प्रभु ) को वह नहीं जानता जो वेदको नहीं ( १३ )

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दूसरा प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ उत्तरमीमांसा जानता है । ' है— वेदान्तदर्शनका चौथासूत्र ' तत्तु समन्वयात् ' ( १ । १ । ४ ) ‘ वह ब्रह्मका शास्त्रप्रमाणक होना एक तात्पर्यसे है । ' सारे शास्त्रका एक तात्पर्य ब्रह्मके प्रतिपादनमें है, अतएव कहा है— ' सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ' ( कठ ० १।२ । १५ ) ‘ सारे वेद जिस पदका अभ्यास करते हैं । ' इसलिये श्रुतिका तात्पर्य एक ब्रह्मके प्रतिपादनमें है, कहीं शुद्धस्वरूपसे, कहीं शबलस्वरूप अथवा उपलक्षणसे । वेदान्तदर्शनके आदिके ये चारों सूत्र वेदान्तकी चतुःसूत्री कहलाते हैं । इनमें सामान्यरूपसे वेदान्तका विचार कर दिया है, विशेषरूपसे आगे किया है I वेदान्तमें परमात्मतत्त्व ( ब्रह्म ) का दो प्रकारसे वर्णन है— एक उसके शुद्ध स्वरूपका, जो प्रकृतिसे पृथक् अपना निजी निर्गुण केवल शुद्ध स्वरूप है । यह ' सर्वतत्त्वैर्विशुद्धम् ' सारे तत्त्वोंसे निखरा आ ( श्वे ॰ २ । १५ ) है । स्वरूपमात्र होनेसे उसे शुद्ध कहते हैं । दूसरा, प्रकृतिके सम्बन्धसे जो उसका शबल अपर अथवा सगुणरूप है, वह है । इस शबल स्वरूपका भी समष्टि - व्यष्टि भेदसे दो प्रकारका वर्णन किया गया है अर्थात् सारे विश्वमें उसकी महिमाका एक साथ देखना उसके समष्टिरूपका दर्शन है और उसके साथ उसका वर्णन समष्टि-रूपका वर्णन है । इसके तीनों भेद-१. विराट् ( चेतन - तत्त्व + स्थूल जगत् ), २. हिरण्यगर्भ ( चेतन - तत्त्व + सूक्ष्म जगत् ) और ३. ईश्वर ( चेतन तत्त्व + कारण जगत् ) योगदर्शन समाधिपाद सूत्र २८ पर ' विशेष विचार ' में विस्तारपूर्वक दिखलाये गये हैं । शबल स्वरूपको भिन्न - भिन्न शक्तियोंमें देखना उसके व्यष्टिरूपका दर्शन है और उनके द्वारा वर्णन उसके व्यष्टि-रूपका वर्णन है । वेदान्त ( उपनिषदों ) में शबल ब्रह्मकी उपासना समष्टि और व्यष्टि दोनों प्रकारसे बतलायी गयी है । वेदान्तदर्शनमें इसी बातको स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि वेदों और उपनिषदोंमें जहाँ - जहाँ इन्द्र, सविता, वैश्वानर, अग्नि, आकाश तथा प्राणादिकी उपासना बतलायी गयी है, वह उन दिव्य शक्तियोंकी नहीं है; किंतु व्यष्टिरूपसे ब्रह्मकी ही उपासना है । पूर्वमीमांसामें व्यष्टिरूपसे सगुण ब्रह्मकी यज्ञोंद्वारा उपासना बतायी गयी है, इसलिये कई एक तार्किकोंको इसके बहु ईश्वर तथा अनीश्वरवादी होनेकी शङ्का हुई है । इसके अनुसार उपासक मुक्तिमें अपने सगुण स्वरूप अर्थात् जीवरूपसे अपने सगुणोपास्य ईश्वर अर्थात् अपर ब्रह्मके साथ उसके ऐश्वर्य और आनन्दको भोगता है । अन्य चार दर्शनकारों ( न्याय, वैशेषिक, सांख्य और योग ) को परब्रह्म अर्थात् शुद्धरूपेण परमात्माकी उपासना अभिमत है, इसलिये कई एक तार्किकोंको उनके अनीश्वरवादी होनेकी ( १४ )

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दूसरा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ उत्तरमीमांसा शङ्का हुई है । इनके अनुसार उपासक कैवल्यमें अपने शुद्ध आत्मस्वरूपसे परब्रह्म निर्गुण ब्रह्म, अर्थात् शुद्ध परमात्मतत्त्वमें एकीभावसे लीन हो जाता है । वेदान्तमें ब्रह्मका वर्णन कहीं - कहीं अन्य आदेशसे जैसे ' तत्त्वमसि ', कहीं ' अहङ्कारादेश ' से जैसे ' अहं ब्रह्मास्मि ' और कहीं ' आत्मादेश ' से जैसे ' अयमात्मा ब्रह्म ' से किया गया है । अद्वैतवादी इन वाक्योंको अद्वैतपरक समझकर महावाक्य कहते हैं । प्राचीन वेदान्त सांख्य और योगके अनुसार इन महावाक्योंका अभिप्राय शरीरमें भासनेवाले आत्माके शुद्ध स्वरूपकी परब्रह्म परमात्माके शुद्ध स्वरूपके साथ अभिन्नताकी प्रतीति कराना है । इनमें ' त्वम् ', ‘ अहम् ', ‘ अयमात्मा ' आत्माके शुद्ध स्वरूपके सूचक हैं और ' तत् ', ' ब्रह्म ', ' परब्रह्म ' परमात्माके शुद्ध स्वरूपका निर्देश करते हैं । उपलक्षणसे ब्रह्मका वर्णन जहाँ बाह्य पदार्थके द्वारा उसके अन्तरात्मापर दृष्टि ले जाना अभिप्रेत होता है, वहाँ वह बाह्य पदार्थ उसके अंदर स्थित परमात्माके जाननेका उपलक्षण होता है, जैसे— यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः । ( बृह ० ३।७ । ३ ) ' जो पृथिवीमें रहता हुआ पृथिवीसे अलग है; जिसको पृथिवी नहीं जानती, जिसका पृथिवी शरीर है, जो पृथिवीके अंदर रहकर नियममें रखता है, यह तेरा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है, ( वेदान्तदर्शन १ । २ । १८ से २० तक अन्तर्याम्यधिकरण ) । शबल रूपमें और उपलक्षणमें यह भेद है कि शबल रूपमें बाह्यशक्तिसे विशिष्ट रूप कहा हुआ होता है और उपलक्षणमें उसके द्वारा उसमें शक्ति देता हुआ केवल स्वरूप होता है । चेतनतत्त्वका शुद्ध स्वरूप तदव्यक्तमाह हि । ( वेदान्त ३ । २ । २३ ) ' मूर्त - अमूर्तसे परे ब्रह्मका अव्यक्त शुद्धस्वरूप है । ' जैसा कि श्रुति कहती हैं— शुद्धमपापविद्धम् । ( ईश ० ८ ) ' वह शुद्ध और पापसे न बींधा हुआ है । ' शुद्ध चेतन - तत्त्व ज्ञानवाला नहीं है, किन्तु ज्ञान -स्वरूप है-सत्यं ज्ञानमन्तं ब्रह्म । ( तैः २ । १ । १ ) ' ( शुद्ध ) ब्रह्म, सत्य, ज्ञान और अनन्त है । ' तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिः । ( मुण्डंकं ० ) ' वह शुभ्र ज्योतियोंका ज्योति है । ' 4 ब्रह्मका शुद्ध स्वरूप प्रायः नेति नेति निषेधमुख शब्दोंसे वर्णन किया गया है; क्योंकि उसका स्वरूप क्या है, यह बात तो आत्मानुभवसे ही जानी जा सकती है, उपदेश केवल यही हो सकता है कि ज्ञात वस्तुओंसे उसका परे होना जँचा दिया जाय, जैसा कि महर्षि याज्ञवल्क्यने देवी गार्गीको उपदेश किया है— ( १५ )

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दूसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ उत्तरमीमांसा एतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्त्यस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घमलोहितमस्नेहमच्छाय-मतमोऽवाय्वनाकाशमसंगमरसमगन्धमचक्षुष्कमश्रोत्रमवागमनोऽतेजस्कमप्राणममुखम-मात्रमनन्तरमबाह्यं न तदश्नाति किञ्चन न तदश्नाति कश्चन । ( बृह ० ३ । ८ । ८ ) ‘ हे गार्गि! इसको ब्राह्मण अक्षर कहते हैं, वह न मोटा है, न पतला है, न छोटा है, न लम्बा है, न लाल है ( उसमें कोई रंग नहीं है ), बिना स्नेहके है, बिना छायाके है, बिना अँधेरेके है, वह वायु नहीं है, आकाश नहीं है, वह असङ्ग है, रससे रहित है, गन्धसे रहित है, उसके नेत्र नहीं, श्रोत्र नहीं, वाणी नहीं, मन नहीं, उसके तेज ( जीवनकी गर्मी ) नहीं, प्राण नहीं, मुख नहीं, परिमाण नहीं, उसके कुछ अंदर नहीं, उसके कुछ बाहर नहीं, न वह कुछ भोगता है, न कोई उसको उपभोग करता है । ' यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुः श्रोत्रं तदपाणिपादम् । नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं " तदव्ययं तद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥ ( मुण्डक ० १ । १ । ६ ) ' जो आँखोंसे दिखलायी देनेवाला नहीं है, जो हाथोंसे ग्रहण नहीं किया जा सकता, जिसका कोई गोत्र नहीं है, जिसका कोई वर्ण ( रंग अथवा आकृति ) नहीं है; जिसका न ( भौतिक ) ह, न श्रोत्र है, जिसके न हाथ हैं, न पैर हैं, जो नित्य है, विभु है, सर्वव्यापक है, सूक्ष्म से सूक्ष्म है, जो नाशरहित है, जो सब भूतोंका योनि है, उसको धीर लोग देखते हैं । ' न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनो न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात्, अन्यदेव तद् विदितादथो अविदितादधि, इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्व्याचचक्षिरे । ( केन ० १।३ ) ' न वहाँ नेत्र पहुँचता है, न वाणी पहुँचती है, न ही मन ( पहुँचता है ), न समझते हैं, न जानते हैं, जैसे उसका उपदेश करें, वह जाने हुएसे निराला है ( और ) न जाने हुएसे अलग, यह सुना है पूर्वजोंसे, जिन्होंने हमारे लिये उसकी व्याख्या की है । ' यदातमस्तन्न दिवा न रात्रिर्न सन्नं चासञ्छिव एव केवलः । ( श्वे ० ४ । १८ ) ' जब ब्रह्मज्ञानका प्रकाश उदय होता है, तब वहाँ न दिन है न रात है, न सत् है न असत् ( न व्यक्त है न अव्यक्त है ), वहाँ केवल शिव है । ' हमारा सारा व्यवहार जडतत्त्व अथवा शबल चेतनतत्त्वमें चल रहा है । शुद्ध चेतनतत्त्व जडतत्त्वसे विलक्षण है । वह वैशेषिकदर्शनमें बतलाये द्रव्योंके किसी गुण, कर्म अथवा समवायकी हु सदृश अपेक्षा नहीं रखता । उपनिषदोंमें महत्त्वसे उसकी विचित्र व्यापकता और अणुत्वसे विचित्र सूक्ष्मताका, न कि परिच्छिन्नताका निर्देश किया है । जैसे-अणोरणीयान् महतो महीयान् । ( श्वे ॰ ३ । २०, कठ ॰ २ । २०, ० ० १० । १२ । १ ) ' अणु - से - अणु ( सूक्ष्म - से - सूक्ष्मतर ) और महान् - से - महत्तर । ' महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ ( कठ ० १ । २ । २२ ) ' उस महान् विभु आत्माको जानकर धीर पुरुष शोकसे परे हो जाता है । ' शुद्ध चेतनतत्त्व अपरिणामी, निर्विकार, निष्क्रिय ( केवल ज्ञान - स्वरूप ) कूटस्थ नित्य है; जडतत्त्व विकारी, सक्रिय और परिणामी नित्य ( १६ )

पृष्ठ 37

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दूसरा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ उत्तरमीमांसा है; जडतत्त्वमें ज्ञान, नियम और व्यवस्थापूर्वक क्रिया चेतनतत्त्वकी संनिधिमात्रसे है । यह सिद्धान्त सांख्य और योगके समान वेदान्तको भी अभिमत है । जैसे— निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् । ( श्वे ० ६ | १ ९ ) ' वह निरवयव है, निश्चल है, शान्त, निर्दोष और निर्लेप है । ' अनेजदेकं मनसो जवीयः । ( ईश ० ४ ) ' अडोल, एक मनसे बढ़कर वेगवाला ( सर्वत्र व्यापक होनेके कारण ) है । ' गीतामें इसका विस्तारके साथ वर्णन है । जैसे—

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।

नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥

( २ । २४ ) ' यह आत्मा अच्छेद्य है, यह आत्मा अदाह्य, अक्लेद्य और अशोष्य है तथा यह आत्मा निःसंदेह नित्य सर्वव्यापक, अचल, स्थिर रहनेवाला और सनातन है । '

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।

कर्ताहमिति मन्यते ॥

अहंकारविमूढात्मा ( ३ । २७ ) ' ( वास्तवमें ) सम्पूर्ण कर्म प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये हुए हैं, तो भी अहङ्कारसे मोहित हुए अन्तःकरणवाला पुरुष ‘ मैं कर्ता हूँ ' ऐसा मान लेता है । '

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।

गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥

( ३ । २८ ) ' परंतु हे महाबाहो! गुण - विभाग और कर्म - विभागके तत्त्वोंको जाननेवाला ज्ञानी पुरुष ' सम्पूर्ण गुण गुणोंमें बरत रहे हैं ' ऐसा मानकर आसक्त नहीं होता । ' मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् । कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥ हेतुनानेन ( ९ ।१० ) ' हे कौन्तेय! मेरी [ परमात्मतत्त्वकी ] अध्यक्षतासे प्रकृति चराचर जगत्को रचती है । इस हेतुसे जगत् सदा परिवर्तित होता रहता है । '

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।

यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥

( १३ । २ ९ ) ' और जो पुरुष समस्त कर्मोंको सब प्रकारसे प्रकृतिसे ही किये हुए देखता है तथा आत्माको अकर्ता देखता है, वही देखता है अर्थात् वही तत्त्वज्ञानी है । ' पा ० यो ० प्र ० २- ( १७ )

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पातञ्जलयोगप्रदीप * दूसरा प्रकरण ] [ उत्तरमीमांसा ****

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।

निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥

( १४।५ ) ' हे महाबाहो! सत्, रज और तम- -यह प्रकृतिसे उत्पन्न हुए तीनों गुण अविनाशी आत्माको [ अविवेकसे ] शरीरमें बाँधते हैं । '

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।

गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥

( १४ । १ ९ ) ' जब पुरुष गुणों [ त्रिगुणात्मक प्रकृति ] के सिवा किसी दूसरेको कर्ता नहीं देखता है और तीनों गुणोंसे अतीत परम [ शुद्ध आत्मतत्त्व ] को तत्त्वसे जान लेता है, वही मेरे स्वरूप [ परमात्मतत्त्व ] को प्राप्त होता है । ' गुणानेतानतीत्य त्रीन् देही देहसमुद्भवान् । जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्रुते ( १४ | २० ) ‘ देहका स्वामी [ पुरुष ] इन स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीरकी उत्पत्तिके कारण तीनों गुणोंको उल्लङ्घन करके जन्म, मृत्यु और बुढ़ापेके दुःखोंसे मुक्त होकर अमृतको प्राप्त होता है । ' उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते । गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते । ( १४ । २३ ) ‘ जो उदासीनके समान [ साक्षीभावसे ] स्थित हुआ [ जीवन - यात्रा करता हुआ ] गुणोंसे विचलित नहीं किया जा सकता है और जो गुण ही गुणोंमें बर्तते हैं ऐसा समझकर स्थिर [ शान्त ] रहता है, [ उस स्थितिसे ] चलायमान नहीं होता है [ वह गुणातीत कहलाता है ] । ' ब्रह्मसूत्रमें योग - साधनकी शिक्षा आसीनः सम्भवात् ॥ ( ब्रह्मसूत्र ४। १ । ७ ) शङ्का – उपासनाके मानसिक होनेसे शरीर स्थितिका अनियम है । इसपर बतलाते हैं— समाधान — उपासना किसी आसनसे बैठकर करनी चाहिये, क्योंकि एक प्रत्ययका प्रवाह करना उपासना और उसका चलते या दौड़ते हुए पुरुषमें सम्भव नहीं है; क्योंकि गति आदि चित्तमें विक्षेप करनेवाले हैं । खड़े रहनेवालेका भी मन देहके धारण करनेमें व्यग्र रहता है, इसलिये वह सूक्ष्म वस्तुके निरीक्षण करनेमें समर्थ नहीं होता । लेटे हुएका मन भी सम्भव है कि अकस्मात् ही निद्रासे विवश हो जाय, किंतु बैठा हुआ पुरुष इस प्रकारके बहुत - से दोषोंका परिहार भलीभाँति कर सकता है । इसलिये उस उपासनाका होना सम्भव है । ( शाङ्करभाष्यार्थ ) ध्यानाच्च ॥ ( ब्रह्मसूत्र ४। १ । ८ ) ( १८ )

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दूसरा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * [ उत्तरमीमांसा और एक प्रत्ययका प्रवाह करना ही ' ध्यायति ' ( ध्यै धातु ) का अर्थ है और ' ध्यायति ' शब्द, जिनकी अङ्ग - चेष्टाएँ शिथिल हों, दृष्टि शिथिल हो और चित्त एक ही विषयमें आसक्त हो, उनमें उपचारसे योजित होना दिखायी देता है । जैसे कि बगुला ध्यान करता है, जिसका प्रिय विदेशमें गया है, वह स्त्री ध्यान करती है । बैठा हुआ पुरुष आयासरहित होता है, इससे भी उपासना बैठे हुएका कर्म है। ( शाङ्करभाष्यार्थ ) अचलत्वं चापेक्ष्य ॥ ( ब्रह्मसूत्र ४। १ । ९ ) और ‘ ध्यायतीव पृथिवी ' ( पृथिवी मानो ध्यान करती है ) इस श्रुतिमें पृथिवी आदिमें अचलत्वकी अपेक्षासे ही ‘ ध्यायति ’ शब्दका प्रयोग होता है और वह उपासना बैठे हुएका काम है, इसमें लिङ्ग है । ( शाङ्करभाष्यार्थ ) स्मरन्ति च ॥ ( ब्रह्मसूत्र ४ । १ । १० ) ' शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ' ( पवित्र देशमें अपना स्थिर आसन स्थापित करके ) इत्यादि स्मृति - वचनसे शिष्टलोग उपासनांके अङ्गरूपसे आसनका विधान करते हैं । इसीसे योगशास्त्रमें पद्मक आदि आसनोंका उपदेश है । ( शाङ्करभाष्यार्थ ) यत्रैकाग्रता तत्राविशेषात् ॥ ( ब्रह्मसूत्र ४। १ । ११ ) विशेषता न पाये जानेसे जहाँ चित्त एकाग्र हो सके, उसी देशमें बैठकर समाधि लगावे अथवा उपासना करे अर्थात् समाधि अथवा उपासनाका सम्बन्ध चित्तवृत्ति - निरोधसे है । किसी दिशा, काल और देश - विशेषसे नहीं । जिस दिशा, देश या कालमें उपासकका मन सहजमें ही एकाग्र हो, उसी दिशा आदिमें उपासना ( ध्यान ) करनी चाहिये; क्योंकि पूर्व दिशा, पूर्वाङ्ग, पूर्व देशकी ओर निम्न स्थान आदिके समान यहाँ विशेषका श्रवण नहीं है, क्योंकि अभीष्ट एकाग्रता सर्वत्र तुल्य है । परंतु कितने ही विशेष भी कहते हैं ।

यथा-समे शुचौ शर्करावह्निवालुकाविवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः ।

मनोऽनुकूले न तु चक्षुपीडने गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत् ॥

( श्वे ० २।१० ) 1 ' सम और पवित्र, सूक्ष्म पाषाण, वह्नि और रेतीसे वर्जित, शब्द और जलाशय आदिसे वर्जित, मनके अनुकूल और नेत्रोंको पीड़ा न देनेवाले निर्वात या एकान्त प्रदेशमें बैठकर योग साधन करे । ' इसपर कहते हैं — ठीक है, इस प्रकारका नियम है, परंतु ऐसे नियमके रहनेपर भी विशेषमें नियम नहीं है, ऐसा सुहृद् होकर आचार्य कहते हैं । ' मनोऽनुकूले ' मनके अनुकूल यह श्रुति जहाँ एकाग्रता है, वहीं, ऐसा इतना ही दिखलाती है । ( शाङ्करभाष्यार्थ ) अपि च संराधने प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ॥ ( ब्र ० सू ० ३ । २ । २४ ) उक्त परमात्माको कोई धीर पुरुष समाधि - दशामें जान सकता है । यह — ' कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् । ' ( कठ ० २ । १ । १ ) ' ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः । ' ( मु ० ३ । १ । ८ ) ( १ ९ )

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पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 40 का मूल पृष्ठ
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दूसरा प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ उत्तरमीमांसा

यं विनिद्रा जितश्वासाः संतुष्टाः संयतेन्द्रियाः ।

ज्योतिः पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नमः ॥

इत्यादि श्रुति और स्मृतिसे जाना जाता है । अर्थात् समस्त प्रपञ्चसे शून्य और अव्यक्त इस आत्माको योगीलोग संराधन - समयमें देखते हैं I संराधन - समयमें योगीलोग परमात्माको देखते हैं, यह कैसे समझा जाता है? प्रत्यक्ष और अनुमानसे, श्रुति और स्मृतिसे जाना जाता है, क्योंकि ' कश्चिद्धीर: ० ' ( जिसकी नेत्रादि इन्द्रियाँ विषयोंसे व्यावृत हो गयी हैं ऐसा अमृतको चाहनेवाला कोई विवेकी पुरुष प्रत्यगात्माको देखता है ) ' ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वः ' ( ज्ञानकी निर्मलतासे जिसका अन्तःकरण विशुद्ध हुआ है, वह ध्यान करता हुआ सब अवयवभेदसे वर्जित आत्माको देखता है । ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं । उसी प्रकार-' यं विनिद्रा जितश्वासाः ' ( निद्रारहित श्वासको जीते हुए मनुष्य, जिसकी इन्द्रियाँ संयममें हैं ध्यान कर हुए जिस ज्योतिको देखते हैं, उस योगलभ्य आत्माको नमस्कार है, उस सनातन भगवान्‌को योगी सम्यगुरूपसे देखते हैं । ) इस प्रकारकी स्मृतियाँ भी हैं । ( शाङ्करभाष्यार्थ ) दोनों मीमांसाओंके ग्रन्थकार आचार्योंका समय और उनसे पूर्व आचार्योंके नाम उत्तरमीमांसा अर्थात् ब्रह्मसूत्रोंके कर्ता महर्षि बादरायण हैं । इनके सम्बन्धमें ऐसा निश्चय प्रसिद्ध और प्रचलित है कि यही पराशर ऋषिके पुत्र कृष्णद्वैपायन वेदव्यास हैं, जो महाभारतके समयमें हुए हैं । जिन्होंने कुरुक्षेत्रमें होनेवाले युद्धकी सारी घटनाओंसे धृतराष्ट्रको जानकारी कराते रहनेके लिये संजयको दिव्यदृष्टि दी थी और जो स्वयं महाभारत और गीताके रचयिता बतलाये जाते हैं । कपिलमुनि, आसुरि, पञ्चशिख, जैगीषव्य, वार्षगण्य, जनक और पराशर - इन सब प्राचीन आचार्योंने क्रमशः सांख्यज्ञानमें निष्ठा प्राप्त करके जगत्में उसका प्रचार किया था । वास्तवमें सांख्य ही अपने व्यापकरूपमें उपनिषदोंकी प्राचीन वेदान्त फिलासफी है और जिसको पिछले कालके साम्प्रदायिक आचार्योंने, जिनका हम आगे वर्णन करेंगे, अपने सम्प्रदायकी संकीर्णतामें संकुचित करके दर्शाया है, वह सब नवीन वेदान्तविचार हैं । बादरायणका अर्थ बादरिके पुत्र हैं । इससे सिद्ध होता है कि पराशर ऋषिका दूसरा नाम बादरि था । बादरि आचार्यका नाम ब्रह्मसूत्रोंमें चार बार ( १ । २ । ३०, ३ । १ ।११, ४।३।७, ४।४ । १० ) आया है और जैमिनिके मीमांसा सूत्रोंमें भी चार स्थानों ( ३ । १ । ३, ६ । १ । २७, ८ । ३ । ६, ९ । २ । ३० ) में आया है । इससे सिद्ध होता है कि बादरि ऋषिने कर्म - मीमांसा और ज्ञान - मीमांसा दोनोंपर सूत्रग्रन्थ बनाये थे । इनके मतमें वैदिक कर्ममें सबका अधिकार है । उसमें जन्मसे जातिभेदको कोई स्थान नहीं दिया गया है । बादरायणके ब्रह्मसूत्रमें जैमिनिका नाम ( १ । २ । २८, १ । २ । ३१, १ । ३ । ३१, १।४।१८, ३।२।४०, ३।४ । २७, ' ३ । ४ । १८, ३ । ४ । ४०, ४ । ३ । १३, ४ । ४ । ५, ४ । ४ बार आया है । औडुलोमि आचार्यका नाम ( ब्र ० सू ० १ । ४ । २१, ३ । ४ । ४५, ४ । ४ । ६ । में ११ ) ग्यारह ) तीन बार आया है और काशकृत्स्त्र आचार्यका नाम ( ब्रह्म ० सू ० १ । ४ । २२ में ) एक बार आया है । आत्रेय ( २० )