पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 501–510

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 501–510

पृष्ठ 501

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साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ५५ ( ५ ) वातके रोगकी अत्यन्त पीड़ामें चरस ( सुल्फा ) आधी रत्ती खिलाकर गायका दूध गायके घीके साथ पिलावें । ( अनुभूत ) आधे सिरका दर्द, नथनोंका बंद रहना, सिरका भारी रहना-( १ ) बनफशेके फूल, उस्तखदूस, बर्ग सिब्बत, बराबर वजनमें लेकर कपड़छन चूर्ण बनावें, अँगुलीसे नथनोंके अंदर लगावें । ( अनुभूत ) ( २ ) नौसादर एक तोला, काफूर तीन माशे पीसकर माथेपर लेप करें और सुँघायें । ( ३ ) जमालगोटा शुद्ध, यदि शुद्ध न मिल सके तो अशुद्ध पानीमें पीस लिया जाय, एक सींकसे भवोंके ऊपर मस्तिष्कपर बिंदी लगावें । फौरन दर्द दूर हो जायगा । उसी वक्त कपड़ेसे पोंछकर घी या मक्खन लगावें । ( ४ ) नारंगीके छिलकेका रस दर्दसे दूसरी ओरवाले नथनेमें डालना । ( ५ ) रीठेका छिलका पानीमें भिगोकर जिस कनपटीमें दर्द हो उसके दूसरी ओरवाले नथुनेमें डालना । कपड़छन रीठेका चूर्ण भी नाकमें लगानेसे सिरका दर्द दूर होता है । ( ६ ) नौसादर उड़ाया हुआ या शुद्ध किया हुआ, फिटकरीकी भस्म गर्म दूध या पानीके साथ सेवन । ये सब ओषधियाँ अनुभूत हैं । प्रमेह, पेशाबमें शक्कर आना, स्वप्नदोषादि वीर्यके हर प्रकारके विकारके लिये-( १ ) चन्द्रप्रभा । चन्द्रप्रभाका नुस्खा - वच, नागरमोथा, चिरायता, गिलोय, देवदारु, दारूहल्दी, अतीस, चव्य, गजपीपल, सोनामक्खी भस्म, सज्जीखार, काला नमक, कचूर, पीपलामूल, चीताकी छाल, धनियाँ, हड़, बहेड़ा, आँवला, बायविडङ्ग, त्रिकुटा, जवारखार, सेंधा नमक, बिड़ नमक, प्रत्येक चार - चार माशे, निसौत, तेजपात, छोटी इलायचीके दाने, गौदन्ती, दारचीनी, वंशलोचन, प्रत्येक एक तोला चार माशे; लोह - भस्म दो तोला आठ माशे, मिश्री पाँच तोला चार माशे, शिलाजीत शुद्ध दस तोला आठ माशे, गूगल शुद्ध दस तोला आठ माशे; सबका चूर्ण कपड़छन करके चनेके बराबर गोली बनावें । वैद्योंके पास बनी हुई मिलती है । सोते समय रातको अथवा प्रातःकाल दूधके साथ एक गोली । ( २ ) सूर्यप्रभावटी । सूर्यप्रभावटीका नुस्खा - चित्रक, हड़, बहेड़ा, आँवला, नीमके अंदरकी छाल, पटोलपत्र, मुलहठी, दालचीनी, नागकेशर, अजवायन, अमलवेत, चिरायता, दारुहल्दी, इलायचीके दाने, नागरमोथा, पित्तपापड़ा, नीला थोथाकी भस्म, कुटकी, भारंगी, चव्य, पद्माक, खुरासानी अजवायन, पीपल, काली मिर्च, निसोत, जमालगोटा शुद्ध, कचूर, सोंठ, पोकरमूल, जीरा सफेद, देवदारु, तमालपत्र, कूड़ाकी छाल, रासना, दमासा, गिलोय, निसौत - तालीसपत्र, तीनों नमक ( सेंधा, काला और कचिया ), धनिया, अजमोद, सौंफ, सुवर्णमाक्षिक ( सोनामक्खी ) भस्म, जायफल, वंशलोचन, असगन्ध, अनारकी छाल, कनकोल, नेत्रबाला, दोनों क्षार यानी सज्जी और जवाखार, प्रत्येक चार - चार तोला, शुद्ध शिलाजीत बत्तीस तोला, गूगल शुद्ध बत्तीस तोला, लोहभस्म बत्तीस तोला, रूपामाक्षिक ( चाँदीमक्खी ) भस्म आठ तोला, सबका चूर्ण बनाकर मिश्री चौंसठ तोला, गायका घी सोलह तोला, शहद बत्तीस तोला मिलाकर चीनीके बर्त्तनमें रखें अथवा गोलियाँ बनावें; खुराक एक माशासे चार माशेतक, प्रातः अथवा सायं दूधके साथ । सूर्यप्रभावटी Diabetes पेशाबमें शक्कर आना इस रोगके ( ४६४ )

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* परिशिष्ट * [ साधनपाद सूत्र ५५ ] **** लिये अति लाभदायक सिद्ध हुई है । ( अनुभूत ) चन्द्रप्रभा और सूर्यप्रभा सब मौसम और सब अवस्थामें, सब प्रकारके रोगोंमें अनुभूत ओषधि हैं इनसे सब प्रकारके प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र, पेशाबमें शक्कर आना इत्यादि, सब प्रकारकी वातव्याधि, उदर रोग, गोला, पाण्डु, संग्रहणी, हृदयरोग, शूल, खाँसी, भगन्दर, पथरी, रक्तपित्त, विषम ज्वर तथा वातजन्य, पित्तजन्य रोग दूर होकर शरीर स्वस्थ और जठराग्नि प्रदीप्त होती है । अभ्यासियोंके लिये अनुकूल है । ( ३ ) बंगभस्म चार रत्ती पान अथवा शहदके साथ प्रमेहके लिये । ( अनुभूत ) ( ४ ) हरी गिलोयका रस चार तोला, शहद छः माशेके साथ सुबहको प्रमेहके लिये पियें । ( अनुभूत ) ( ५ ) सत बड़ चार रत्ती गायके दूधके साथ सिर्फ एक सप्ताहतक लें । ( अनुभूत ) बड़का सत बनानेकी विधि - बड़की कोपलें दस सेर बारीक काटकर चालीस सेर पानीमें पकावें । जब पत्ते गल जायँ, तब मल - छानकर लोहेकी कढ़ाईमें पकाकर खोआ बना लें । फिर दस तोला बहू फलीका चूर्ण मिलाकर चार - चार रत्तीकी गोली बनावें । एक गोलीको पानीमें घोलकर उस पानीको दूधमें मिलाकर दूधको जोश दें । केवल सात दिनतक ईसबगोलकी भूसी छः माशे और चीनी डालकर दूधको पीवें । बड़ सत तैयार न हो तो बड़की कोपल दो तोलाको छोटे - छोटे टुकड़ेकर एक पाव पानीमें पकावें । जब पानी एक छटाँक रह जाय तो उसको छानकर आध सेर गायके दूधमें मिलाकर पकावें । फिर ईसबगोलकी भूसी और बूरा मिलाकर सिर्फ सात दिनतक पियें । बिना ईसबगोलकी भूसीके भी ले सकते हैं । यह वीर्यको गाढ़ा करके स्वप्नदोष इत्यादि सब प्रकारके वीर्यपातको रोकता है । अनुभूत, साधुओंकी गुप्त ओषधि है । यह ओषधि पौष्टिक है इसलिये कब्ज न होने दें । ( ६ ) ब्राह्मी घृत — ब्राह्मीके पञ्चाङ्गका रस दो सेर निकालें । ब्राह्मीके पञ्चाङ्गका रस निकालनेकी विधि – यदि ब्राह्मी हरी हो तो दो सेर रस कूटकर निकालें, सूखी हो तो दो सेरको आठ सेर पानीमें पकावें । जब दो सेर रह जाय तो छान लें । आँवलेका छिलका, हल्दी, कठमटी ( कुश्त शीरी ), निसौत ( तिर्वी ), बड़ी हड़का छिक्कल, पीपल छोटी, मिश्री, प्रत्येक दो - दो तोला, बच, सेंधा नमक छः - छः माशे, सबको दो सेर पानीमें पकावें, जब आध सेर रह जाय, तब मल - छानकर ब्राह्मीका रस मिलाकर लोहेकी कढ़ाई या कलईके बर्त्तनमें रखकर आगपर चढ़ावें और आध सेर शुद्ध गौका घृत उसमें डालकर हलकी पकावें । जब घृत बाकी रह जाय, तब उतारकर छान लें और साफ बर्त्तनमें रख लें । खुराक आँचसे तीन तोलेतक गौके दूधमें प्रातः एवं सोते समय । छः माशेसे लाभ — वीर्यके सब प्रकारके रोगोंकी निवृत्ति, वीर्यशुद्धि, स्मृति एवं मस्तिष्ककी लिये, बुद्धिको तीक्ष्ण करने, कण्ठको साफ करने, बवासीर, प्रमेह, खाँसी शक्तिको बढ़ानेके लाभदायक है । वीर्यदोषसे जिन पुरुषों अथवा स्त्रियोंके संतान उत्पन्न न हो आदि उन दोनोंके रोगोंके लिये अति लाभदायक है लिये अति ब्राह्मीघृतकी दूसरी विधि — हरी ब्राह्मी हो तो पाँच सेर, सूखी आँवला एक पाव, त्रिफला एक पाव, घुडबच्च एक हो तो दो सेर, शंखपुष्पी एक पाव, लौंग, छोटी इलायची, तज, सम्भालूके बीज और हल्दी छटाँक एक, बायबिडङ्ग - एक, पीपल, धनियाँ, निसौतकी जड़, तोला, गिलोय दो तोला सबको मोटा ( ४६५ )

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साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र ५५ कूटकर दस सेर पानीमें भिगोकर अग्निमें खूब पकावें । जब छः सेर रसके लायक पानी रह जाय तो मलकर छान लेवें । इस रसको लोहेकी कड़ाही या कलईके बरतनमें चढ़ाकर ढाई सेर शुद्ध गौका घृत डालकर पकावें, अग्नि धीमी - धीमी आठ - दस घंटेतक देते रहें । जब पानीका भाग जल जाय और रसका सब भाग इकट्ठा हो जाय तब उतारकर कपड़ेमें छान लें । खुराक – डेढ़ तोलेसे ढाई तोलेतक, आवश्यकतानुसार गायके दूधके साथ प्रातः - सायंकाल । ( ७ ) प्रमेहके लिये — बबूलकी कोपलें सुखाकर उसका चूर्ण कर लें । सात दिनतक बड़के दूधमें भिगोकर फिर सुखाकर चूर्ण कर लें । यह चूर्ण २ तोला, मूसली सफेद १ तोला, बड़ी इलायचीके दाने २ तोले, अम्बा हल्दी २ तोला, वंग भस्म २ तोला, शतावर ४ तोले, असगन्ध ४ तोले, कच्ची खाँड़ ५ तोले, इन सबको मिलाकर रखें । सवा माशा दवाई गायके दूधके साथ देवें । ( अनुभूत ) ( ८ ) मूसली काली ५ तोला, खेरका गोंद ( कत्था ) ५ तोले, छोटी इलायचीके दाने ६ माशे, छुआरे ७, बादाम गिरी ७, मिश्री २ तोले, गूलरका दूध २ तोले, सबको मिलाकर खूब कूटकर रखें । खुराक १ तोला गायके दूधके साथ २१ दिनतक । सोते समय पेशाब निकल जाना-आँवलेका गूदा, काला जीरा सम - भाग शहद मिलाकर । पेशाबके साथ शक्कर आना--( १ ) गुड़मार दो तोले, जामुनकी गुठली दो तोले, वंशलोचन छः माशे, इलायची छः माशे, गिलोयका सत एक तोला, पीपलकी छाल तीन माशे, मण्डूर भस्म एक माशा, चाँदी भस्म चार रत्ती, शिलाजीत शुद्ध तीन माशे - सबका चूर्ण करके चार माशे प्रातः एवं सायंकाल गाय अथवा बकरीके दूधके साथ । ( अनुभूत ) ( २ ) गुड़मार, बबूल या गूलरकी जड़की अंतरछाल, जामुनकी गुठली, सोंठ सम - भाग कूट - छानकर छः माशेसे नौ माशेतक गरम पानीके साथ । ( ३ ) गिलोय सब्जका रस निकालकर उसमें पाशानभेद और शहद मिलाकर पिलावें । ( ४ ) सूर्यप्रभावटी इस रोगमें आश्चर्यजनक लाभदायक सिद्ध हुई है । ( अनुभूत ) बहुमूत्र ( - १ ) चत्रककी लकड़ी एक तोले कूटकर पावभर पानीमें मिट्टीके बर्त्तनमें रातको भिगो । दें, सुबहको पकावें, जब दो तोले रह जाय, तब मल - छानकर पीवें । पन्द्रह दिनतक पीना चाहिये ( २ ) फ़रीद बूटी सायेमें सुखायी हुई एक तोला, मूसली सफेद एक तोला घोटकर सात दिनतक पिलावे । एक ( ३ ) अजवायन देशी छः माशे, नागरमोथा छः माशे, कन्दर छः माशे, काले तिल तोला – सबको बारीक पीसकर दो तोले गुड़में मिलावें । खुराक छः माशे प्रातः एवं सायंकाल प्रातः । एवं ( ४ ) पीली हरड़का छिलका और अनारका छिलका सम - भाग कूट - छानकर चार माशे सायंकाल पानीके साथ । ( ५ ) बढ़िया किस्मके बड़े अच्छे गूदेदार छुहारे दिनमें खानेके पश्चात्, रातको दूधसे पहिले । ( अनुभूत ) हर प्रकारके बुखारके लिये-, तुख्मकासनी दो तोला, गुल नीलोफर छः माशे, बर्गगावज़बाँ छः माशे, तुख्म खरबूजा छः माशे ( ४६६ )

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सूत्र ५५ ] * परिशिष्ट * [ साधनपाद तुख्म खीरा छः मारो, गुलबनफसा छः मारो, नागरमोथा छः माशे, सब्ज गिलोय छः माशे ( सब्ज न मिल सके तो सूखा हुआ काममें लावें ), छोटी इलायची छः अदद, मुनक्का पाँच अदद्, गुलकन्द पाँच तोला — सब दवाओंको एक सेर पानीमें जोश दें । फिर गुलकन्द मिलावें । ठंडा होनेपर कई बार पियें । बलगमी बुखारके लिये-गुलबनफ़सा छः माशे, नीलोफ़र छः माशे, गावजवाँ छः माशे, कासनी छः माशे, पाँच मुनक्का अदद, छोटी इलायची पाँच अदद, नागरमोथा छः माशे, अञ्जीर पाँच अदद, गिलोय एक तोला – इन सबको पानीमें भिगो दें, सुबहको जोश देकर मिश्रीके साथ मिलाकर रख लें । ठंडा होनेपर थोड़ा - थोड़ा पिलावें । बुखारके लिये, हर प्रकारके अम्लपित्त, गुरदज आदि रोगमें-गिलोय, धनियाँ, लाल चन्दन, पद्माक, नीमकी छाल- -इन सबको बराबर वजनमें लेकर चूर्ण बनावें । शामको आध सेर पानीमें ढाई तोला भिगो दें, सुबहको जोश दें । जब छटाँक - भर रह जाय तब पिलावें । पित्तज्वरपर ' सफाई ' खूनके लिये-मुनक्का, अमलतास, कुटकी, पित्तपापड़ा, बड़ी हरड़का बक्कल, नागरमोथा - सब बराबर वजनमें लेकर ऊपरवाले नुस्खेकी तरह ढाई तोला लेकर तैयार करके पियें । बुखारके लिये कुछ और अनुभूत नुस्खे-( १ ) मगज करञ्जवा ( करंजुएकी गिरी ) दो तोला, सेंधा नमक दो तोला – इनका चूर्ण बना ले । चार रत्ती सुबह और शाम ताजे पानीके साथ । चढ़े बुखारमें भी दिया जा सकता है । ( २ ) करंजुएके पत्ते तवेपर किञ्चित् आँच देकर चूर्ण बनाया जाय । चार रत्ती दिनमें तीन दफा पानीके साथ खिलावें । ( अनुभूत ) ( ३ ) फिटकरी लाल एक पाव पीसकर आकके दूधमें भिगोवें, जब आकका दूध सूख मिट्टीके बर्त्तनमें रखकर सम्पुट कर पाँचसे दस उपलोंकी आँचमें जलावें, ठंडा हो जानेपर इस जाय दवाको , तब निकालकर पीस लें । खुराक - एक रत्ती गायके दूधके साथ । खाँसी, दमा, बुखार, तपेदिक आदिके लिये लाभदायक है । ( ४ ) गेरू दो तोला, फिटकरी भुनी हुई दो तोला, शक्कर सुर्ख पाँच तोला मिलाकर दिनमें बार छः - छः माशे ताजे पानीके साथ । दो - तीन ( ५ ) मृत्युंजय रस - - शिगरफ दो तोला, गन्धक, आँवलेसार, मीठा सोंठ, पीपल, काली मिर्च एक - एक तोला, कागजी नीबूके रसमें खरल तेलिया शुद्ध, खील सुहागा, बनावे । एक गोली ताजा पानीके साथ । ( अनुभूत ) करके काली मिर्चके बराबर गोली ( ६ ) तीसरे दिनका बुखार - प्रातः काल और बुखार आनेसे चार रत्तीसे एक माशातक अर्क गुलाबके साथ । ( अनुभूत ) एक घंटा पहले लाल फिटकरीकी भस्म ( ७ ) चौथिया बुखारके लिये -संखिया और शंगर्फ बराबर गोली बनावें । पारीवाले दिन बुखारसे एक घंटा बराबर करेलेके रसमें घोटकर काली मिर्चके खुराक — दूध, चावल, घी बुखारके समय बीतनेके पश्चात् पहिले । तीसरे या प्रातःकाल एक गोली पानके साथ देवें । एवं चौथे दिनके दोनों बुखारोंके अनुभूत बतलायी गयी है । लिये ( ४६७ )

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साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ५५ तपेदिकके लिये-( १ ) गिलोयका सत, वंशलोचन, छोटी इलायचीके दाने, काली मिर्च, भलावा शुद्ध, सम - भाग पीसकर काली मिर्चके बराबर गोली बनावें । पहिले दिन एक गोली एक पाव गायके दूधके साथ लें, प्रत्येक दिन दूध दो तोला बढ़ाते जायँ, एक सेरतक । भलावेकी शोधनविधि सञ्जीवनी वटीके नुस्खेमें देखें | ( २ ) बर्ग करेला ( करेलेके पत्ते ) चार तोला, मुश्ककाफूर एक तोला – इनको बारीक घोटकर एक माशेकी गोली बनावें, बुखार आनेके चार घंटे पहिले पानीके साथ खिलावें । ( अनुभूत ) ( ३ ) एक पोईका लहसन यदि न मिले तो साधारण लहसनको ही कूटकर दुगने पानीमें उबालें । फिर मल - छानकर उस पानीको पकावें । जब गाढ़ा हो जावे तो चनेके बराबर गोली बनावें । प्रातः व सायंकाल एक या दो गोली ठंडे पानीके साथ खिलावें । पायोरियाके लिये दाँतोंका मंजन -( १ ) लाहौरी नमक, तेजबल, फिटकरी भुनी हुई, तंबाकूके पत्ते भुने हुए, गेरू, काली मिर्च, सोंठ, सब एक - एक तोला लेकर चूर्ण बनावें, दाँतोंमें मलकर पानी निकलने दें । ( अनुभूत ) ( २ ) नमक एवं सरसोंका तेल मिलाकर दाँतोंपर मलें । दातौनसे दाँत साफ करें । लाहौरी नमक और सरसोंका तेल पकाकर रख लें, दातोंपर लगाकर सोवें । ( ३ ) मिट्टीके तेलके गरारे करनेसे भी पायोरिया दूर होता है । दाढ़का दर्द-( १ ) छः - सात माशे कुचला दरदरा करके पानीमें औंटाकर गरारे करना । ( २ ) मदार ( आकका पेड़ ) की लकड़ी जलाकर, दुखती दाढ़से दबाकर राल निकालते रहना । ( अनुंभूत ) ( ३ ) पेटकी सफाई तथा उपर्युक्त किसी रेचक वातनाशक ओषधिका सेवन लाभदायक है । दाँतोंके सब रोग - नाशक-( ४ ) कुचला एक तोला, देशी नीलाथोथा तीन तोला – इनको सम्पुट करके जलावें । जब राख हो जाय, तब माजूफलका चूर्ण एक तोला, फिटकरी सफेद छः माशे, सबको बारीक पीसकर बड़की डाढ़ीकी दातौनसे लगावें । फल — मसूड़ोंका साफ होना, दाँतोंका जमना, पायोरिया तथा मुँहकी बदबूका दूर होना । दाँत अथवा दाढ़के दर्दके लिये-( ( ५ ) तुख्म रवासन चार माशे, नरकचूर चार माशे, फिटकरी चार माशे, अफीम चार रत्ती —इनकी दो पोटली बनाना, एक पोटली दुखते दाँत अथवा दाढ़में दबाये रखना, दो घण्टेमें आराम हो जायगा । ( अनुभूत ) ( ६ ) गोस्तखुरदा और पीब आनेवाले दाँतोंकी दवा – मुश्ककाफूर तीन भाग, बोरिक एसिड ( Boric Acid ) एक भाग मिलाकर शीशीमें रख लो । रूईकी फुरेरीसे लगावें । ( अनुभूत ) दाँतोंको साफ और चमकीला बनानेके लिये-( ७ ) समन्दरझाग एक तोला, फिटकरी भुनी हुई छः माशे, माजूफल छः माशे, चूना बुझा हुआ छः माशे, बारीक कपड़छान करके दाँतोंपर मलें । ( अनुभूत ) ( ८ ) मौलसिरीकी छालका चूर्ण दाँतोंपर मलना और लकड़ीसे दातौन करना अति लाभदायक है । ( ४६८ )

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सूत्र ५५ ] * परिशिष्ट * [ साधनपाद ( ९ ) दाँतों एवं मसूड़ोंके सब प्रकारके रोग दूर करनेके लिये सेंधे नमकको पानीमें खूब औटाकर रख लें । उसके कई बार एवं सोते समय गरारे करें । फोड़े - फुंसी आदि रक्तकी शुद्धिके लिये-( १ ) शुद्ध गन्धक त्रिफलाके साथ । ( २ ) सफेदा कासगरी छः माशे, मुरदारसंग आधा माशा, सिन्दूर तीन रत्ती, हल्दी चार रत्ती, फिटकरी भुनी हुई एक माशा, तूतिया भुना हुआ तीन रत्ती, सरसोंका तेल नौ माशे, मोम एक माशा, मोमको तेलमें पिघलाकर, सब दवाइयोंको छानकर, मिलाकर मरहम तैयार करें । यह मरहम फोड़े - फुंसी एवं घाव आदिके लिये अति लाभदायक है I ( ३ ) खुजलीके लिये हल्दीकी लुगदी और आकके पत्तोंका पानी सरसोंके तेलमें पकावें, जब लुगदी रह जाय, तब लगावें । ( ४ ) फिटकरी दो मात्रा, बोरिक एसिड ( Boric Acid ) तीन मात्रा, गन्धक चार मात्रा इनका चूर्ण सात माशे आध छटाँक मक्खन मिलाकर खुजली तथा दादवाले स्थानपर मलें । सफाई खूनके लिये – ( १ ) सत्यानाशी अर्थात् कटैयाकी जड़ नौ माशे, काली मिर्च नौ दाने पीस - घोटकर पिलावें, खानेके लिये मूँगकी दाल अथवा खिचड़ी दें, सब प्रकारके रक्तविकार, कोढ़, खुजली आदिके लिये सत्यानाशीका खिंचा हुआ अर्क पीना और इसके बीजोंका तेल लगाना अति लाभदायक है । घृत अधिक खावें । ( अनुभूत ) ( २ ) चिरायता, गिलोय, पित्तपापड़ा, नीमके अंदरकी छाल, ब्रह्मदण्डी, मुण्डी, इन्द्रायणकी जड़ सम - भाग, इनका कपड़छन चूर्ण प्रातः एवं सायंकाल पानी अथवा गौके दूधके साथ आवश्यकतानुसार लें । सफेद कोढ़की दवा-( १ ) चीतेकी छाल दो भाग, सफेद घुँघची एक भाग, वावची तीन भाग, अञ्जीर जंगली एक भाग सब मिलाकर गोमूत्रमें खरल करके कोढ़पर लगावें, छाला फूटकर जब मवाद निकल जाय, तब नीमके तेलका मरहम लगावें । छाजन, लाहौरी फोड़े, बगदादी फोड़े तथा अन्य घाववाले दादोंके लिये अनुभूत ओषधि-( १ ) एलोबेसलीन ( Yellowvaslin ) जिंकओकसाइड ( Zincoxide ) को दाद अथवा जखमको नीमके पानीसे धोकर मरहमका फोया लगाकर पट्टी मिलाकर रख लें । निकलता रहेगा और जखम भरता रहेगा । आँखों तथा पलकोंके जखमोंके लिये बाँध ले, उससे जखमका मवाद भी प्रयोग करे । ( अनुभूत ) सूखे दादके लिये-( २ ) बादामके छिलकों, शीशमकी लकड़ी, नारियलके जटाके गेहूँका तेल दादपर लगावें । यह भी अति उत्तम अनुभूत ओषधि है अन्दरके सख्त भागके टुकड़े अथवा गेहूँके तेल निकालनेकी विधि - एक मिट्टीकी हाँडीमें एक हुई एक दूसरी हाँडी रखें । सूराखमें कुछ सीकें इस प्रकार कटोरा रखें, उस हाँडीपर तलीमें सूराख की भरकर उसपर ढक्कन रख दें । कपड़ेको चिकनी मिट्टीमें रखें कि कटोरेमें गिरे । उस हाँडीको मोटे गेहूँसे खोदकर दोनों हाँडियोंको इस प्रकार रखें कि नीचेवाली सानकर दोनों हाँडियोंपर लपेट दें । फिर एक गढ़ा हाँडी मिट्टीमें दबी रहे । ऊपरवाली हाँडीके चारों ( ४६ ९ )

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साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ५५ तरफ वन्य उपले रखकर आँच दें, इस तरह उसका तेल कटोरेमें आवेगा । ठंडा होनेपर निकाल लें । बादामके छिलकोंका तेल निकालनेकी सबसे आसान तरकीब यह है कि एक चौड़े मुँहवाली हाँडीमें बादामके छिलके भरकर उसमें एक कटोरा रख दें । हाँडीके मुँहपर एक तसला रखकर आँटे और मिट्टीसे मुँह बंद करके उसको चूल्हेपर रख दें । तसलेमें पानी भर दें । पानी बदलते रहें, अधिक गर्म न होने पावे I । कटोरेमें टिंचरकी शक्लका पानी भर जायगा । यह न केवल दाद एवं इग्जमाके लिये अकसीर है अपितु जहरीले जानवरोंके काटेपर भी लाभदायक है । इसके अतिरिक्त सारी बातोंमें टिंचरका काम देता है । ( अनुभूत ) ( ३ ) जंगली गोभीके पत्तोंको सरसोंके तेलमें जलावें और इसको पीसकर रख लें । दादपर इसे लगावें । इस मरहमके अभावमें जंगली गोभीके पत्तोंको दादपर खुजलानेसे भी बड़ा लाभ होता है । ( ४ ) कलमी शोरा एक भाग, नौसादर दो भाग, सुहागा चार भाग, सबको मिलाकर खरल करके फुरैरीसे लगावें । ( ५ ) ऐसिटिक ऐसिड ( Acetic acid ) टैरिन ऐसिड ( Tarin acid ) को मिलाकर शीशीमें रख लें । फुरैरीसे लगावें । यदि पानी निकले तो वैसलीन लगावें । भैंसिया दाद अर्थात् काले दादके लिये-मूँग अथवा मूँगकी दाल छिलकेसहित बारीक पीसकर लगावें । छाजनका नुस्खा-( १ ) सीसा एक छटाँक लोहेके चम्मचमें पिघलाकर उसमें तीन तोला पारा डालकर किसी बर्तनमें डाल दे, जब ठंडा हो जाय, तब एक छटाँक गन्धकके साथ बारीक पीस ले । इसके चूर्णको सरसोंके तेलमें मिलाकर लगावें । ( २ ) जहरीला पानी देनेवाले छाजन आदिपर गूलरको दहीके पानीमें बारीक पीसकर उसका लेप करें, जब सूखकर छुट जाय, तब फिर लेप करें, कष्टको सहन कर लें घबरायें नहीं । चम्बलकी दवा-पुनर्नवा अर्थात् सांठे ( Itsit ) की जड़ आध पाव सरसोंके तेलमें मिलाकर, पीसकर एक छटाँक सिन्दूर - मिलाकर मरहम तैयार करें । नासूर, भगंदर आदिके लिये--( १ ) पारा और रसकपूर दोनोंको खरल करें, फिर मूर्दासंख, प्रबालकी जड़, सुपारीका फूल, कत्था, राल, सिन्दूर, सब एक - एक तोला, वंशलोचन, छोटी इलायची डेढ़ माशा खरल करें । फिर १०१ बार धुले हुए पंद्रह तोला मक्खनमें मिलावे । पतले कपड़ेकी बत्ती बनाकर मरहममें भिगोकर घावमें लगावें । ( २ ) नौजवान आदमीकी खोपड़ीकी भस्म नासूर और भगंदरमें लगावें । कमरके अंदरका फोड़ा-अरण्डकी गिरीको पीसकर मोटा प्लास्टर लगावें, कपड़ेके किनारोंको सेंजनेके गोंदसे बंद कर दें, जब यह पीबसे भर जाय तो इसी तरह दूसरा प्लास्टर लगावें । गाँठवाले फोड़ेकी दवा-नीमके पत्तोंको इतना पीसा जाय कि लेस आ जाय, फिर उसे किसी कपड़ेमें लपेटकर गारा या मिट्टी ( ४७० )

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सूत्र ५५ ] * परिशिष्ट * [ साधनपाद लपेटकर भूबलमें पकावें, मिट्टी सूख जानेपर निकालें । लगभग एक अंगुल मोटी टिकिया बनाकर लगावें । भगंदर तथा गुदाके सब प्रकारके रोगोंके लिये अनुभूत ओषधि-( १ ) बोरिक एसिड ( Boric Acid ) एक ड्राम अथवा चार माशा, जिंक आक्साइड ( Zinc Oxide ) दो माशा, आइडो फोर्म ( Ido Form ) पाँच रत्ती, एसिड कार्बोलिक ( Acid Carbolic ) एक माशा या पंद्रह बूँद, सरसों अथवा तिलका तेल ढाई तोला, पानी ढाई तोला इन सबको मिलाकर रूई या कपड़ेका फोया गुदामें लगाया जाय । ( अनुभूत ) ( २ ) एक सेर गायके दूधमें एक छटाँक भंग डालकर उसकी भाप गुदामें पहुँचाना, फिर ऊपरवाले मरहमकी बत्ती गुदामें रखकर इस भंगको गुदामें लंगोट - जैसे पट्टीसे बाँध देना अधिक लाभदायक होगा । ( अनुभूत ) ( ३ ) भगंदर, नासूर और पुराने फोड़ेके लिये अनुभूत - फिटकरी पाँच तोला, संगजराहत पाँच तोला, सिन्दूर एक तोला । पीसी हुई फिटकरी तवेपर जलावें । पिसा हुआ संगजराहत एक - एक चुटकी उसमें डालते जायँ और हिलाते जायँ । फिर सिन्दूरको तवेपर भस्म करके उसमें मिला दें । ठंडे किये हुए गायके दूधमें थोड़ी - थोड़ी डालते जायँ और पिलाते जायँ । एक - एक सप्ताहके पश्चात् एक - एक दिन नागा करते जायँ । २१ दिनतक । अर्श ( बवासीर ) ( १ ) एक तोला संखियाको दस रीठेके तीन पाव पानीमें खरल करे । जब सब पानी उसीमें खप जाय, तब एक चावल बराबर इस संखियाको पानीमें घोलकर मस्सेमें लगावें, सात - आठ दिनमें मस्सा गिर जायेगा । फिर सफेदा काश्तकारी घिसकर लगायें । ( एक अनुभवी संन्यासीसे प्राप्त किया हुआ नुसखा, किंतु अपना अनुभूत नहीं है । ) बवासीरके मस्सोंका जड़से उखाड़ना-( २ ) इर्कशा, सिन्दूर, नीलाथोथा सम - भाग मिलाकर चूर्ण करें, मस्सेको फिटकरीसे खुजलाकर तुरंत उसपर इस चूर्णको पानीमें घोलकर सींकसे लेप करें, ऊपरसे पके हुए चावल - दही मिलाकर बाँध दें मस्से जड़से निकल जायेंगे । फिर रालका मरहम लगावें । ( यह ओषधि एक अनुभवी फकीरसे प्राप्त, है, परंतु अपनी अनुभूत नहीं है । ) हुई ( ३ ) रीठेकी गिरी निकालकर उसके छिलकेका चूर्ण आध पाव, रसौत एक खरल करें । फिर दो छटाक पुराने - से - पुराना गुड़ उसमें डालकर खरल करें । मटरके बराबर छटाकके साथ खूब प्रातः एवं सायंकाल एक - एक गोली दूधके साथ निगल लें । खटाई, लाल मिर्च गोली बनावें । करनेवाली चीजोंसे परहेज |, तेल और कब्ज ( ४ ) कुचला मिट्टीके तेलमें घिसकर मस्सोंपर लेप करें सोते समय । मस्से सूखजायेंगे । ( ५ ) छः माशे बोतलपर लगानेका काग, दो तोले सरसोंके तेलमें जलावें छत्तेको मिलाकर खरल करें, मरहमको मस्सेपर लगावें । फिर उसमें पीली भिड़के ( ६ ) सौंफ, किशमिश, भंग, दक्षिणी मिर्च, इलायची सफेद मिलाकर चार रत्तीसे अपनी आवश्यकतानुसार सेवन करें सम - भाग - इन सबके बराबर मिश्री । ( ७ ) रूमी मस्तगी एक तोला, सफेद इलायचीके दाने छः माशे बवासीर बंद होती है । मिलाकर दहीके साथ खानेसे खूनी ( ४७१ )

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साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र ५५ ( ८ ) झड़बेरीके पत्ते एक तोला, तीन काली मिर्चके साथ घोंटकर पियें । ( ९ ) रीठेका छिलका आठ तोला, तूत अथवा अरण्डके पत्ते एक तोला – दोनोंको मिलाकर इतना कूटें कि मोम - जैसे हो जायँ, यदि चिमिटने लगें तो घी लगा लें, आठ टिकिया बना लें । एक गढ़ा खोदकर उसमें कोयले जलाकर चिलम रख दें, उसके सूराखद्वारा गुदाको धुआँ दें । आठ दिनतक इसी प्रकार करें । ( १० ) करेल अर्थात् करेट जो एक प्रसिद्ध झाड़दार वृक्ष है, उसकी ताजी जड़का पातालयन्त्रसे तेल निकाले, दिनमें दो - तीन बार रूईकी फुरैरी भिगोकर मस्सोंपर लगावें, खूनी एवं बादी दोनों प्रकारकी बवासीर बंद हो जायगी । ( ११ ) चिरचिटेकी छार एक रत्ती लें, इसके ऊपर छः माशे चिरचिटेके बीज, ग्यारह काली मिर्च एक सप्ताहतक घोटकर पियें । गेहूँकी रोटी या दलिया घीके साथ खायँ । ( १२ ) जंगली गोभीके तीन पत्ते और तीन काली मिर्च घोटकर पियें । ( १३ ) भंगको पीसकर घीमें पकाकर टिक्की बाँधे । ( १४ ) खूनी बवासीरके लिये मूसाकरनी बूटी २ रत्ती प्रातःकाल, २ छटाँक दहीके साथ । लाल मिर्च, वादी और गर्म चीजोंसे परहेज । ( अनुभूत ) ( १५ ) खूनी बवासीरके लिये रसौत, एलुआ, नीमकी निबौली, मग्ज बकायन बराबर- - सबको पीसकर चनेके बराबर गोली बनावे । प्रातः एवं सायंकाल एक गोली पानीके साथ । ( १६ ) खूनी बवासीरके लिये पुराने टाटकी राख ६ माशे पानीके साथ । ( १७ ) लंगूरकी सूखी हुई बीटको जलाकर उसके ऊपर सुराख की हुई हाँड़ी रखकर गुदाको धुआँ दें । ( १८ ) जंगली कबूतर और मोरकी बीट बराबर लेकर गोली बनावें । गोलीको घिसकर मस्सोंपर लगावें । तिल्ली -( १ ) अजवाइन देशीको आकके दूधमें भिगोकर छायामें सुखावें, फिर कागजी नीबूके रसमें खरल : - सायंकाल बासी पानीके साथ खायँ । करके आधी रत्तीकी गोली बनायें, एक - एक गोली प्रातः -( २ ) नौसादर, कलमी शोरा, सुहागा सफेद, लौंग, रेवन्द चीनी सब एक - एक तोला, जवाखार, सज्जीखार, सूचल नमक नौ - नौ माशा, घीग्वारके रसमें खरल करके गोली बनायें, प्रातः - सायंकाल एक - एक गोली खायें, बादी और खट्टी चीजोंसे परहेज । दर्द गुर्दा --( १ ) संगह्यूद ( पत्थरका बेर ) को दूधमें उबालकर साफकर कूटकर सात दिन मूलीके रसमें खरलकर टिक्की बनाकर मिट्टीके बर्तनमें रखकर उसको सम्पुट करके आगमें रखकर भस्म बनायें । चार रत्ती शरबत नीलोफरके साथ खिलावें । ( २ ) खरबूजेके बीज नौ माशे, हिजरुलयहूद ( पत्थरका बेर ) साढ़े तीन माशे, खार खुश्क सात माशे, तुख्म खयारैन नौ माशे, राई छः माशे, पानीमें घोट - छानकर पिलावें । ( ३ ) पोदीना सूखा हुआ धतूरेके पत्ते सूखे हुए दस - दस माशे, पीपलके पेड़का दूध १६ बूँदमें मिलाकर तम्बाकूकी तरह चिलममें रखकर पिलावें । उसी वक्त आराम होगा । ( ४७२ )

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परिशिष्ट * सूत्र ५५ ] [ साधनपाद * ******* जोड़ोंका दर्द-बड़ी हरड़का गूदा, काली हरड़, वादियान, पीपल, दार - फिलफिल, काला जीरा, करंजुआका गूदा, एक - एक तोला बारीक करके पाँच तोला मुनक्केमें पीसकर चने बराबर गोली बनावें । एक माशासे तीन माशेतक पानीके साथ । बंद पेशाबका खोलना-( १ ) गोखुरू, इन्द्रजौ, सोयेके बीज एक - एक तोला, पाषानभेद दो तोला सबको कूटकर एक सेर पानीमें औटा लो । दिनमें दो - तीन बार दो रत्ती पत्थर बेरकी भस्म दो रत्ती जवाखारके साथ पीवें । ( अनुभूत ) ( २ ) कलमी शोरा एक तोला, तुख्म खियारैन चार माशे, छोटी इलायचीके दाने दो माशे, दक्षिणी मिर्च दो माशे, सीतल चीनी चार माशे, सबको पीसकर एक सेर पानीमें छानकर दो छटाँक सफेद खाँड़ डालकर कई बार पिलावे, पेशाब जोरके साथ आयेगा टेसूके फूल उबालकर पेडूपर लेप करे । ( ३ ) राई, कलमी शोरा, मिसरी, सम भाग पीसकर पानीके साथ दिनमें दो बार दें । पेड़पर कलमी शोरेका लेप करें । रुक - रुककर पेशाब आना-बड़ी हड़का गूदा, गोखुरू, अमलतासका गूदा, पाषानभेद, दमासा - धनिया, इनका काढ़ा पिलावे । वायुगोला-एलुआ, खीलसुहागा, काली मिर्च, हींग, काला नमक, सबको घीगुवारके गूदेमें खरल करके चना बराबर गोली बनावें । एक गोली पानीके साथ । ( अनुभूत ) पेटके कीड़े-( १ ) अरंड ककड़ीके बीज पाँच या सात ताजा पानीके साथ खिलानेसे सब कीड़े मर जाते हैं । पाँच दिनमें आराम हो जाता है । ( २ ) आडू, अनार और नीमके पत्तोंको पीसकर अथवा अकेले आडूके पत्तोंको पीसकर खिलानेसे पेटके कीड़े मर जाते हैं । ( अनुभूत ) ( ३ ) विडंगचूर्ण आधा तोला शहदके साथ । दिमागके कीड़े-इस रोगका कष्ट देखनेवालेको भी असह्य हो जाता है । उसका एक अनुभूत नुसखा-खरगोशेकी मैंगनीको गुड़में लपेटकर निगलावे, ऊपरसे चादर स्वयं थोड़ी देरमें निकलना आरम्भ हो जायँगे, जब इनका मुँहतक ओढ़कर धूपमें बैठावे । कीड़े दिन छोड़कर फिर तीसरे दिन इसी तरह खिलावे, जब कीड़े निकलना बंद हो जाय तब उठ जाय । एक निकलना बंद हो जायँ, तब इसे बंद कर दें । खिलाना फीलपा, गजपा, Elephantiasis पुरी आदि स्थानोंमें अधिक होता है । १ सदासुहागन, २ रामगट्टो, ३ अमरवेल, ४ दहीको मट्ठो, ५ ( जमीको ढाकन, ६ घरको राख गजचर्मको ( ४७३ )