पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 511–520
पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 511–520
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साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र ५५ यही उपाय । १ हल्दी, २ आँवला, ३ आकाशबेल, ४ छाछ ( मट्ठा ), ५ चिरचिरा, ६ चूल्हे आदिके ऊपरकी छतमें जमा हुआ धुँआ । सब सम - भाग लेकर चूर्णकर मट्ठेमें मिलाकर नीम गर्म करके लेप करें । गजचर्मके लिये अनुभूत दवा । गठियाका नुसखा-( १ ) सोंठ एक तोला, पीपल छोटी एक तोला, मदारके पेड़का गूदा एक तोला, कुचला शुद्ध दो तोले इन सबको सेंजनेके पत्तोंके रसमें खरल करके मटर बराबर गोली बनायें, प्रातः - सायंकाल एक - एक गोली गौके दूधके साथ खाय । ( २ ) धतूरेका फल तीन तोला, अजवायन, सोंठ, छोटी पीपल, कायफल, कड़वी तम्बाकू, वचनाक, अफीम, जायफल, सब एक - एक तोला, केसर खालिस छः माशे सबको कूटकर दो सेर पानीमें पकावें । जब आध सेर रह जाय, तब मल - छानकर एक सेर सरसोंके तेलमें मिलाकर फिर पकावें, जब सिर्फ तेल रह जाय, तब छानकर बोतलमें रखकर एक तोला मुश्ककाफूर मिलावें, दिनमें दो बार मालिश करें । ( ३ ) शिंगरफ रूमी एक तोला, भंगकी लुग्दीमें रखकर ऊपरसे धागा बाँधकर कढ़ाईमें अलसीके तेलमें पकावें, जब भंग जलकर राख हो जावे तब निकालकर भंगको पृथक् कर दें । इस प्रकार चालीस बार करें । फिर शिंगरफकी डलीको पीसकर रख लें । आधी रत्ती मलाईके साथ खिलावें । ( ४ ) ईसबगोल एक तोला, खशखशके डोड़े एक तोला, दोनोंको पीसकर एक तोला रोगनगुल खालिस और कुछ पानी डालकर पकावें । दर्दवाले स्थानपर बाँध बाँ दें । ( अनुभूत ) आँखके रोग-( १ ) कलमी शोरा दो तोला, नमक शीशा दो तोले, पहिले शोरेको बारीककर कटोरेमें बिछायें । उसके ऊपर नमक शीशा बारीक किया हुआ बिछायें । हलकी आँचपर कटोरेको रख दें । जब नमक काला हो जाय, तब उतारकर खरल करके शीशीमें रख लें, सलाईसे लगायें । आँखकी धुन्ध, खुजली, रतौंध, पानी आना, सुर्खी, दुखने आदिके लिये लाभदायक है । ( २ ) भलावा भुना हुआ दो तोले, फिटकरी भुनी हुई एक तोला, खरल करके रख लें । आँखके जाले एवं फूलके लिये लगावें । ( ३ ) काले गधेकी दाड़ गुलाबके अर्कमें घिसकर फूले और जाले हटानेके लिये लगावें । ( अनुभूत ) ( ४ ) आँखके फूलेके लिये - आकके दूधके साथ जलाई हुई नीलेथोथेकी भस्म शहदके साथ सलाईसे लगावें । ( ५ ) आँखकी ज्योति बढ़ानेके लिये – सीसा, राँगाका बुरादा और पारा समभाग एक खोखले बेलमें बंद करके खूब अच्छी प्रकार डाट लगाकर बंद कर दें उसको खूब हिलाते रहें । चालीस दिनके पश्चात् इसको निकालकर खूब खरल करके सोने या चाँदीकी सलाईसे आँखोंमें लगावें । ( ६ ) रतौंध — पीपल गोमूत्रमें घिसकर आँखोंमें लगावें । ( ७ ) मोतियाबिन्द — तम्बाकू और नीलके बीज समभाग पीसकर लगावें । -( ८ ) आँखके पलकके अंदरका बाल - पुराना गुड़ और सिन्दूर समभाग मिलायें । बाल उखाड़कर तीन - चार बार लगावें । ( अनुभूत ) ( ४७४ )
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* परिशिष्ट * सूत्र ५५ ] [ साधनपाद ****** ( ९ ) नीमकी कोंपलको गायके घीमें भूनकर मरहम बनाकर लगावें । ( १० ) आँख दुखने और लालीके लिये – अफीम, फिटकरी, रसौत और गोंदका पलास्टर दुखती आँखकी कनपटीपर लगावें । खट्टे अनारका रस एक तोला, मिश्री तीन माशे मिलाकर दो - दो बूँद दोनों समय आँखमें डालें । सरसके बीज एक तोला, मिश्री एक तोला पीसकर तीन माशे शहद मिलाकर चाटें रसौत और छोटी हड़ घिसकर लगावें । ( ११ ) आँखोंके रोहे— चाकस्को उबालकर अंदरका बीज निकालकर बारीक पीसकर आँखमें लगावे । ( १२ ) आँख और दिमागकी कमजोरी दूर करनेके लिये त्रिफलापाक और आँवलापाक । त्रिफलापाक — त्रिफला आधा सेर, शुद्ध शिलाजीत छः माशे, केशर छः माशे, सौंठ, काली मिर्च, पीपल, गोखरू, छोटी इलायची, मोथा, तज, पत्रज, पोखरमूल, चित्रक- - एक - एक तोला, धनिया छिला हुआ ढाई तोला विधि — त्रिफलेको कूट कपड़छान करके आधा सेर पानीमें भिगो देना चाहिये । जब त्रिफला पानीमें भीगकर भली प्रकार फूल जाय तब पावभर गायके घीमें मन्दी - मन्दी आँचपर कढ़ाईमें भून लिया जाय । कढ़ाईको नीचे उतारकर रख लिया जाय, एक सेर मिसरीकी चाशनी बनाकर शुद्ध शिलाजीतसे लेकर धनियातककी चीजें जो पहिले कूट कपड़छान करके रखी थीं, चाशनीमें त्रिफला मिलानेके पश्चात् डालकर भली प्रकार मिला ली जायँ । जब अच्छी तरह मिल जायँ, तब पावभर शहद मिला दिया जाय, बस त्रिफला पाक तैयार हो जायगा । एक - एक तोला सुबह और शाम या अपनी - अपनी शक्ति अनुसार केवल एक ही समय एक तोला गर्म किये हुए दूधके साथ सेवन करें । यह त्रिफला - पाक नेत्रकी ज्योति और दिमागकी कमजोरी और प्रमेहके लिये लाभप्रद है आँवलापाक — आँवलाचूर्ण चालीस तोला, मिश्री ४ सेर, सौंठ ४ तोला, पीपल ४ तोला, सफेद जीरा ४ तोला, धनिया २ तोला, छोटी इलायची २ तोला, तेजपात २ तोला, काली मिर्च २ तोला, दालचीनी २ तोला, चाँदीके वर्क २५ नग । विधि — आधा सेर आँवलेका चूर्ण कपड़छान करके पाँच सेर गायके शुद्ध दूधमें भिगो दो । फिर भली प्रकार फूल जानेपर उस आँवले मिले हुए दूधका कलईदार बर्तन या कढ़ाईमें मावा बना लिया जाय । फिर कढ़ाई नीचे उतारकर उसमें ४ सेर मिश्रीकी कुछ ढीली बनी हुई चाशनी मिला दो । इसके पश्चात् सौंठसे दालचीनीतककी चीजें कूट - छानकर कढ़ाईमें मिला दो । फिर चाँदीके वर्क मिला दो । ज्यादा गर्म चाशनीमें नहीं मिलाना चाहिये । बस आँवलापाक तैयार हो गया । एक तोला सुबह और एक तोला शामको सेवन करें । ( १३ ) आँखोंकी ज्योति बढ़ानेके लिये तामेश्वरी सुरमा - शुद्ध ताँबा २ तोला लेकर पत्ती करके बहुत छोटे - छोटे टुकड़े ( जैसे सुनार टाँकेके करते हैं ) करके, एक छटाँक फिटकरीको उसकी बारीक कागजी नीबूका रस एक पाव, सबको एक बोतलमें डाल पीसकर, दिनतक होशियारीसे ऊँची ताख आदिपर रखें । प्रतिदिन प्रातः दें । बोतलको आधा खाली रखें और ४० करके बोतलको सावधानीसे रख दें । चालीस दिनके बाद इन सब काल केवल एक बार उलटी फिर सिधी घुटाई करें । जब सुरमे बारीक हो जायँ तो उस लुगदीको लोहेकी कढ़ाईमें चीजोंको बोतलसे निकालकर खरलमें बहुत हलकी आँचपर रखकर ( ४७५ )
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साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ५५ घुटाई करें । जब बिलकुल सुरमेकी तरह हो जाय तो बारीक कपड़ेमें छान लें । जो कुछ छाननेसे बचे उसे फेंक दें । रातको सोते समय चाँदी या जस्तेकी सलाईमें थोड़ा - सा लेकर आँखमें लगाकर सो जायँ । ( अनुभूत ) ( १४ ) आँखकी ज्योति बढ़ाने तथा सब प्रकारके विकारोंको दूर करनेके लिये साधुओंका एक ( गुप्त ) अति उत्तम अनुभूत सुरमा— भीमसेनी कपूर २ तोला, रसकपूर २ तोला, बीकानेरी मिश्री आठ तोला । छोटे अंदरसे कलई भगोने अथवा ऐसे ही कोई अन्य किये हुए दो बर्तन कलईके लें । उनमेंसे एकमें मिश्रीको दरदरी कर उसके अंदर रसकपूर और भीमसेनी सुरमा दरदरा पीसकर रख दें । उसके अंदर दूसरा भगोना रखकर दोनोंके जोड़ोंको खूब अच्छी तरहसे कपड़े और मुल्तानी मिट्टीसे सम्पुट कर दें । एक छोटा - सा चूल्हा बनाकर उसके अंदर एक बड़े मिट्टीके दीपकमें सरसोंका तेल डालकर खूब मोटी बत्ती जलावें । चूल्हेके ऊपर सम्पुट किये हु भगोको इस प्रकार रखें कि नीचेके भगोनेके तलेमें उस दीपककी आँच अच्छी तरह लगती रहे । हर पंद्रह मिनटके बाद बत्तीका गुल काटते रहें और भगोनेके तलेमें जमते हुए कालिखको हटाते रहें, जिससे दीपककी आँच भली प्रकार अपना कार्य कर सके । इस प्रकार सत्रह घंटे आँच देते रहें । उसके पश्चात् उतारकर ठंढे होनेपर ऊपरके भगोनेमें जो रसकपूर और भीमसेनी कपूर उड़कर जम गया हो उसको खुरचकर एक साफ शीशीमें रख लें । उसमेंसे बहुत थोड़ा सलाईकी नोकमें लेकर आँखमें लगावें । सूजाक और दमेके रोगमें भी इसके दो चावल मलाई या मक्खनके साथ खाना बहुत लाभदायक है । ( अनुभूत ) कानका दर्द-लहसनका रस ढाई तोला, अफीम दो रत्ती, दस तोले सरसों या तिलके तेलमें पकाकर छानकर कानमें डाले । गेंदेके फूलका रस कानमें डाले अथवा गोमूत्र कानमें डाले । मुँहके छाले-तरबूजके छिलके जलाकर लगावें । दिलकी धड़कनके लिये-भस्म मूँगा सेवतीके गुलकन्द या मुरब्बा सेबके साथ । पागलपन या उन्मादकी अनुभूत दवा -धवलबरुआ जिसको श्वेत बरुआ तथा सर्पगन्धा भी कहते हैं, जो बड़ी आयुर्वेदिक फारमेसीसे मिल सकती है, उसका चूर्ण चार माशे; खालिस गुलाबके अर्क एक छटाँकमें १२ घंटे भिगोकर सात काली मिर्चके साथ पीसकर प्रातः एवं सायंकाल दोनों समय बिना छाने पिलावे । खटाई, लाल मिर्च, गुड़, तेल और गर्म खुश्क चीजोंका सख्त परहेज । घी, दूध, मक्खन- मलाई अधिक - से - अधिक मात्रामें । ( अनुभूत ) कई बड़ी फार्मेसियोंमें इसकी गोलियाँ सर्पना पिल्स ( Serpna pills ) नामसे बनायी जाने लगी हैं । नींदका न आना ( १ ) धवलबरुआ एक माशे बादामके शीरे या दूधके साथ सोते समय । अथवा सर्पना पिल्स लें | ( २ ) पीपलामूल एक माशा पुराना गुड़ एक माशेमें मिलाकर सोते समय दूध या शीरा बादामके साथ । ( ४७६ )
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सूत्र ५५ ] * परिशिष्ट * [ साधनपाद बुद्धिवर्धक एवं उन्माद दूर करनेके लिये – सरस्वती चूर्ण, वच, ब्राह्मी, गिलोय, सोंठ, सतावर, शंखपुष्पी, वायविडंग, अपामार्गकी जड़ समभागका कपड़छान किया हुआ चूर्ण दो - तीन माशे शहद या घीके साथ । नहरुवा-प्रतिदिन दो आनाभर कपूर आध पाव दहीमें घोलकर तीन दिनतक लें । कायाकल्प तथा पारा आदि रसायनका यौगिक रूपसे प्रयोग करानेवाले अनुभवी इस समय दुर्लभ हैं । इसलिये क्रियात्मिकरूपसे अनुपयोगी और अनावश्यक समझकर उनका यहाँ उल्लेख नहीं किया गया । यहाँ साधकों तथा पाठकोंके हितार्थ केवल पारा बाँधनेकी एक अनुभूत सरल और गोपनीय विधि लिखी जाती है— बाँधना- -पारा एक तोला, नीलाथोथा अर्थात् तूतिया एक तोला; नीलाथोथाको पीसकर आधा पारा -कढ़ाईमें रख दें, उसके ऊपर पारा रखकर बाकी आधा तूतिया रख दें । दो छटाँक पानी उसमें डालकर कढ़ाईको तेज आँचपर रख दें, नीमकी लकड़ीसे उसको इस प्रकार घोटें जिस प्रकार हलुआको कड़छीसे घोटते हैं । पानी जल जानेपर कढ़ाईको तुरंत नीचे उतार लें और दूसरे शुद्ध पानीसे धो डालें । तत्पश्चात् अङ्गुलियोंसे पारेको इकट्ठा करके गोलियाँ बना लें । चार - पाँच घंटे पश्चात् पारा धातु - जैसा सख्त हो जायगा । शीशेके गिलास और कटोरोंके अंदर इस मुलायम पारेको लपेटनेसे पारेके गिलास और कटोरे भी बन सकते हैं । जिनको दूध आदि पीनेके कार्यमें प्रयोग किया जा सकता है । किंतु ये बर्तन बहुत भारी होंगे । पारेको पहिले नीबूके रस या सेंधा नमकमें खरल करके तह किये हुए कपड़े में छान लेना चाहिये । इसीसे वह शुद्ध हो जायेगा । ( यह प्रकरण हमने आवश्यकतानुसार काम निकालने और जानकारीके उद्देश्यसे दिया है । साधकोंकी केवल ओषधि आदि शारीरिक बातोंमें ही अधिक प्रवृत्ति न होनी चाहिये । ) इति पातञ्जलयोगप्रदीपे द्वितीयः साधनपादः समाप्तः ॥ ( ४७७ )
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विभूतिपाद पहले पादमें योगका स्वरूप उत्तमाधिकारीके लिये, दूसरेमें उसके साधन मध्यमाधिकारीके लिये वर्णन करके अब तीसरेमें उसका फल विभूतियाँ, अश्रद्धालुको श्रद्धापूर्वक उसमें प्रवृत्त करनेके लिये दिखाते हैं । साधनपादमें योगके पाँच बहिरङ्ग साधन यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार बतलाये थे । इस पादमें उसके अन्तरङ्ग धारणा, ध्यान, समाधिका निरूपण करते हैं । इन तीनोंको मिलाकर ' संयम ' कहा जाता है । इनका विनियोग इस पादमें बतायी हुई विभूतियोंके साथ है, इसी कारण इसको इस पादमें वर्णन किया है । I देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ॥ १ ॥
शब्दार्थ – देश - देशविशेषमें; बन्धः = बाँधना; चित्तस्य = चित्तका ( वृत्तिमात्रसे ); धारणा = धारणा कहलाता है । अन्वयार्थ — चित्तका वृत्तिमात्रसे किसी स्थानविशेषमें बाँधना ' धारणा ' कहलाता है । व्याख्या- - चित्त बाहरके विषयोंको इन्द्रियोंद्वारा वृत्तिमात्रसे ग्रहण करता है । ध्यानावस्थामें जब प्रत्याहारद्वारा इन्द्रियाँ अन्तर्मुख हो जाती हैं, तब भी वह अपने ध्येय - विषयको वृत्तिमात्रसे ही ग्रहण करता है । वह वृत्ति ध्येयके विषयके तदाकार होकर स्थिररूपसे भासने लगती है । अर्थात् स्थिररूपसे उसके स्वरूपको प्रकाशित करने लगती है । देश – जिस स्थानपर वृत्तिको ठहराया जाय, वह नाभि, हृदय - कमल, नासिकाका अग्रभाग, भ्रुकुटी, ब्रह्मरन्ध्र आदि आध्यात्मिक देशरूप विषय हो अथवा चन्द्र, ध्रुव आदि कोई बाह्य देशरूप विषय हो, इसीको ध्येय कहते हैं अर्थात् जिसमें ध्यान लगाया जाय । बन्ध — अन्य विषयोंसे हटाकर चित्तको एक ही ध्येय विषयपर वृत्तिमात्रसे ठहराना । इस प्रकार आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार आदिद्वारा जब चित्त स्थिर हो जाय, तब उसको अन्य विषयोंसे हटाते हुए एक ध्येय विषयमें वृत्तिमात्रसे बाँधना अर्थात् ठहराना धारणा कहलाता है । तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ॥ २ ॥
प्रत्यय = = वृत्तिका; एकतानता = एक - सा बना रहना; ध्यानम् = ध्यान है । शब्दार्थ –तत्र = उसमें; अन्वयार्थ — उसमें वृत्तिका एक - सा ( घटोऽयं घटोऽयम् आदि ) बना रहना ध्यान है । व्याख्या — तत्र = उस प्रदेश अर्थात् ध्येय विषयमें जिसमें चित्तको वृत्तिमात्रसे ठहराया है I प्रत्यय - ध्येयकी आलोचना करनेवाली वृत्ति अर्थात् वह वृत्ति जो धारणामें ध्येयके तदाकार होकर उसके स्वरूपसे भासती है 1 । एकतानता = एक - सा बना रहना अर्थात् उस ध्येय आलम्बनवाली वृत्तिका समान प्रवाहसे लगातार उदय होते रहना और किसी अन्य वृत्तिका बीचमें न आना । धारणामें चित्त जिस वृत्तिमात्रसे ध्येयमें लगता है, जब वह वृत्ति इस प्रकार समान प्रवाहसे लगातार
उदय होती रहे कि दूसरी कोई और वृत्ति बीचमें न आये, तब उसको ध्यान कहते हैं ।
तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ॥ ३ ॥
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* तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः * सूत्र ३ ] [ विभूतिपाद ****** अर्थमात्रनिर्भासम् = अर्थमात्रसे भासनेवाला; शब्दार्थ - तदेव = वही ध्यान; स्वरूपशून्यम् इव = स्वरूपसे शून्य - जैसा; समाधिः = समाधि कहलाता है । अन्वयार्थ — वह ध्यान ही समाधि कहलाता है, जब उसमें केवल ध्येय अर्थमात्रसे भासता है और उसका ( ध्यानका ) स्वरूप शून्य- जैसा हो जाता है । व्याख्या- -पूर्वोक्त ध्येयविषयक ध्यान ही अभ्यासके बलसे जब अपने ध्यानाकार रूपसे रहित - जैसा होकर केवल ध्येय स्वरूप - मात्रसे अवस्थित होकर प्रकाशित होने लगे तब वह समाधि कहलाता है ।I ध्यानावस्थामें जो ध्येय आलम्बनवाली वृत्ति समान प्रवाहसे उदय होती रहती है, वह ध्यातृ, ध्यान और ध्येय तीनोंसे मिश्रित रहती है अर्थात् वह तीनोंमें तदाकार होती हुई ध्येयके स्वरूपसे भासनेवाली होती है । इसी कारण उसमें ध्यातृ और ध्यान दोनों बने रहते हैं । इन दोनोंके बने रहनेसे ध्येयाकार वृत्ति अपने ध्येय विषयको सम्पूर्णतासे नहीं प्रकाशित करती । जितना ध्यान बढ़ता जाता है उतनी ही उस वृत्तिमें ध्येय - स्वरूपाकारता बढ़ती जाती है और ध्यातृ तथा ध्यान उसके प्रकाशन करनेमें अपने स्वरूपसे शून्य - जैसे होते जाते हैं । जब ध्यान इतना प्रबल हो जाय कि ध्यातृ और ध्यान अपने स्वरूपसे सर्वथा -जैसे होकर ध्येय - स्वरूपमात्रसे भासने शून्य - ज् लगें और ध्येयका स्वरूप ध्यातृ और ध्यानसे अभिन्न होकर ध्येयाकारवृत्तिमें सम्पूर्णतासे भासने लगे तो ध्यानकी इस अवस्थाको समाधि कहते हैं 1 ' अर्थमात्रनिर्भासम् ' में ' मात्र ' पदसे यह बात बतलायी है कि ध्यानमें ध्येयका भान होता है, ध्येय - मात्रका नहीं । किंतु समाधिमें ध्यान ध्येयमात्रसे भासता है और इस शङ्काके मिटानेके लिये कि ध्यानके अधीन ही ध्येयका भान होता है, समाधिमें यदि ध्यान स्वरूपसे शून्य हो जाता है तो ध्येयका भान किस प्रकार हो सकता है, ( स्वरूपशून्यम् इव ) ' इव ' पद दिया है अर्थात् समाधिकी अवस्थामें ध्यानका सर्वथा अभाव नहीं होता, किंतु ध्येयसे अभिन्नरूप होकर भासनेके कारण स्वरूपसे शून्य - -जैसा उ हो जाता है, न कि वास्तवमें स्वरूपशून्य हो जाता है । श्रीभोज महाराज समाधिका अर्थ इस प्रकार करते हैं-' सम्यगाधीयत एकाग्री क्रियते विक्षेपान्परिहृत्य मनो यत्र स समाधिः ' ‘ जिसमें मन विक्षेपोंको हटाकर यथार्थतासे धारण किया जाता है अर्थात् एकाग्र किया जाता है, विशेष वक्तव्य || सूत्र ३ ॥ — -योगके अन्तिम तीन अङ्गों - धारणा, ध्यान और समाधिमें वह समाधि है । ' है और धारणा, ध्यान उसके अङ्ग हैं । जब किसी विषयमें चित्तको ठहराया समाधि अङ्गी विषयाकारवृत्ति त्रिपुटीसहित होती है । तीन आकारोंके समाहार अर्थात् इकट्ठे होनेका जाता है, तब चित्तकी वह त्रिपुटी ध्यातृ, ध्यान और ध्येयरूप है । ध्यातृ - ध्यान करनेवाला आत्मासे नाम त्रिपुटी है । वह वृत्ति जिसके द्वारा विषयका ध्यान होता है, ध्यान है और ध्यानका विषय प्रकाशित चित्त है । चित्तकी वह ठहराते समय उस विषयाकार वृत्तिमें त्रिपुटीका इस प्रकार ध्येय है । किसी विषयमें चित्तको अलग - अलग भान होता है रहा हूँ । यह ध्यान है, इस विषयका ध्यान हो रहा है । कि मैं ध्यान कर धारणा — जबतक त्रिपुटीसे भान होनेवाली इस विषयाकारवृत्तिका हो; किंतु व्यवधानसहित विच्छिन्न हो अर्थात् इस वृत्तिके समान प्रवाहसे बहना आरम्भ न बीच - बीच अन्य वृत्तियाँ भी आती वह धारणा कहलायेंगी । रहें तबतक ( ४७ ९ )
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विभूतिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप ' * * [ सूत्र ४-५ ध्यान — जब यह त्रिपुटीसे भान होनेवाली विषयाकारवृत्ति व्यवधानरहित हो जाय अर्थात् अन्य विजातीय वृत्तियाँ बीच - बीचमें न आवें, किंतु सदृश वृत्तियोंका प्रवाह बना रहे तबतक वह ध्यान कहलाता है । समाधि — जब इस ध्यान अर्थात् व्यवधानरहित त्रिपुटीसे भासनेवाली विषयाकारवृत्तिमें त्रिपुटीका भान जाता रहे और ध्यातृ तथा ध्यान भी विषयाकार होकर अपने स्वरूपसे शून्य - जैसे भासने लगें अर्थात् जब यह भान न रहे कि मैं ध्यान कर रहा हूँ, यह ध्यानकी अवस्था है, किंतु केवल ध्येय विषयके स्वरूपका ही भान होता रहे तब यह समाधि कहलाती है । पहले पादसे इसी त्रिपुटीको सवितर्क और निर्वितर्क समापत्तिमें ध्येयविषयक शब्द, अर्थ और ज्ञानसे बतलाया गया है । शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः । ( १। ४२ ) शब्द, अर्थ और ज्ञानके विकल्पोंसे संयुक्त सवितर्क समापत्ति कहलाती है । स्मृतिपरिशुद्ध स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का । ( १।४३ ) स्मृतिसे परिशुद्ध होनेपर स्वरूपसे शून्य - जैसे केवल अर्थमात्र ( ध्येयमात्र ) से भासनेवाली निर्वितर्क समापत्ति कहलाती है । इसलिये सवितर्क समापत्तिको ध्यानकी ही एक अवस्था और निर्वितर्क समापत्तिको समाधिकी अवस्था समझनी चाहिये । यह सम्प्रज्ञात योग अथवा सबीज समाधि है, क्योंकि यद्यपि इसमें त्रिपुटीका अभाव हो जाता है तथापि संसारका बीज विषयके ध्येयाकार वृत्तिरूपसे विद्यमान रहता है । जब इस ध्येयाकार वृत्तिका भी अभाव हो जाय, तब सब वृत्तियोंके निरोध हो जानेपर असमाज्ञात योग अथवा निर्बीज समाधि होती है 1 सङ्गति — पूर्वोक्त धारणादि तीनों योगाङ्गोंका एक शब्दसे व्यवहार करनेके लिये अपने शास्त्रमें पारिभाषिकी संज्ञा करनेको यह सूत्र है-त्रयमेकत्र संयमः ॥ ४ ॥
= तीनों ( धारणा, ध्यान, समाधि ) का; एकत्र - एक विषयमें होना; संयमः = संयम शब्दार्थ– त्रयम् - तीनों कहलाता है । अन्वयार्थ – तीनों ( धारणा, ध्यान और समाधि ) का एक विषयमें होना संयम कहलाता है । व्याख्या — समाधि अङ्गी है और धारणा, ध्यान उसके अङ्ग हैं । धारणा और ध्यान समाधिकी ही प्रथम अवस्था है । विभूति आदिमें इन तीनोंकी ही आवश्यकता होती है । इसीलिये योग - शास्त्रकी परिभाषामें इन तीनोंके समुदायको संयम कहा जाता है । जब धारणा, ध्यान और समाधि एक ही विषयमें करनी हों तब उसकी संयम संज्ञा होती है अर्थात् उसको संयम शब्दसे कहते हैं ।
सङ्गति — संयमके अभ्यासका फल बतलाते हैं ।
तज्जयात्प्रज्ञालोकः ॥ ५ ॥
शब्दार्थ — तज्जयात् - उस संयमके सिद्ध होनेसे; प्रज्ञा = समाधि - प्रज्ञाका; आलोकः - प्रकाश होता है । ( ४८० )
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सूत्र ६ ] * तस्य भूमिषु विनियोगः * [ विभूतिपाद अन्वयार्थ — उस ( संयम ) के जयसे समाधि - प्रज्ञाका प्रकाश होता है व्याख्या — तज्जय = संयमजय — अभ्यासके बलसे संयमका दृढ़ - परिपक्व हो जाना संयम - जय है । प्रज्ञालोक = अन्य विजातीय प्रत्ययोंके अभावपूर्वक केवल ध्येय - विषयक शुद्ध, सात्त्विक प्रवाहरूपसे बुद्धिका स्थिर होना प्रज्ञालोक है । जब संयम अर्थात् धारणा, ध्यान समाधिको एक विषयपर ऊपर बतलाये हुए प्रकारसे लगानेका अभ्यास परिपक्व हो जाय, तब समाधि - प्रज्ञा उत्पन्न होती है, जिससे ध्येयका ज्ञान यथार्थरूपसे होने लगता है और नाना प्रकारकी विभूतियाँ सिद्ध होने लगती हैं । अन्तमें विवेकख्यातिका साक्षात् होने लगता है । सङ्गति — संयमका उपयोग— तस्य भूमिषु विनियोगः ॥ ६ ॥
शब्दार्थ – तस्य = उस संयमका; भूमिषु = भूमियोंमें; विनियोगः - विनियोग करना चाहिये । अन्वयार्थ — उस संयमका भूमियोंमें विनियोग करना चाहिये । व्याख्या- -भूमिसे अभिप्राय चित्तभूमिसे है और विनियोगके अर्थ लगानेके हैं अर्थात् उस संयमका स्थूल - सूक्ष्म आलम्बन भेदसे रहती हुई चित्तकी वृत्तियोंमें विनियोग करना चाहिये । चित्तकी स्थूल वृत्तिवाली भूमि जो नीची भूमि है प्रथम उसको विजय करना चाहिये, फिर उससे ऊँची सूक्ष्म वृत्तिवाली भूमिमें संयम करना चाहिये । नीची भूमियोंके जीते बिना ऊपरकी भूमियोंमें संयम करनेवाला विवेक-ज्ञानरूपी फलको नहीं प्राप्त होता । जैसे धनुर्धारी लोग पहले स्थूल लक्ष्यका वेधन करके फिर सूक्ष्मका वेधन करते हैं, वैसे ही योगीको चाहिये कि क्रमसे पहले वितर्क अनुगत, फिर विचार अनुगत, फिर आनन्द अनुगत और फिर अस्मिता अनुगत अथवा पहले ग्राह्य फिर ग्रहण फिर ग्रहीतृ इत्यादि प्रकारसे पहली - पहली भूमिको जीतकर ऊँची भूमियोंमें संयम करे, इस प्रकार विवेकज्ञानरूपी फल प्राप्त होता है । यदि ईश्वरके अनुग्रहसे योगीका चित्त पूर्व ही उत्तर भूमियोंमें लगने योग्य हो गया हो तो पूर्व भूमियोंमें लगानेकी आवश्यकता नहीं । ' चित्त किस योग्यताका है ' इसका ज्ञान योगीको स्वयं योगद्वारा हो जाता है । जैसा कि कहा है— योगेन योगो ज्ञातव्यो योगो योगात्प्रवर्तते योऽप्रमत्तस्तु योगेन स योगे रमते चिरम् ॥ - योगसे उत्तर- र - योग जाननेमें आता है और पहिले - योगसे उत्तर - योग प्रवृत्त होता पहिले प्रमादसे रहित जो यत्नशील अभ्यासी है, वह पहिले - योगसे उत्तर - योगमें चिरपर्यन्त रमण है । इसलिये करता है । विशेष वक्तव्य— ॥ सूत्र ६ ॥ - वास्तवमें धारणा, ध्यान और समाधि तीनों क्रियाके भाग हैं अर्थात् किसी विषयमें चित्तको ठहरानेका नाम ' धारणा ' है एक ही संयमरूप इसमें ठहरा रहे, तब वही ‘ ध्यान ' कहलायेगा; और जब वही । जब देरतक लगातार चित्त हो जाय कि ध्यान करनेवालेको ध्येय विषयके अतिरिक्त और कुछ ध्यान इतना सूक्ष्म और तल्लीनताके साथ अवस्था ‘ समाधि ' कहलायेगी । यह संयमकी क्रिया चित्तके भी सुध - बुध न रहे, तब वही ध्यानकी आध्यात्मिक भूमियोंके विजयपर्यन्त विवेकख्यातिद्वारा असम्प्रज्ञात वशीकरण और आत्मोन्नति अर्थात् सारी लाभार्थ है । किंतु इसके दुरुपयोगद्वारा अधोगति तथा आत्म - - समाधि अर्थात् स्वरूपावस्थितिके अवनतिकी सम्भावना भी हो सकती है; ( ४८१ )
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विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ६ क्योंकि सारी बातें प्रयोगपर ही निर्भर होती हैं । एक उत्तम - से - उत्तम वस्तु भी हानिकारक यदि उसका प्रयोग उचितरूपसे न किया जाय । साधारण मनुष्योंद्वारा बहुत - सी आश्चर्यजनक हो सकती है; समझनेमें बुद्धि चकरा जाती है, इसी संयमकी सहायतासे की जाती हैं । यद्यपि करनेवाले बातें, जिनके दोनों इस बातसे अनभिज्ञ होते हैं । प्रत्येक वस्तु अपने सूक्ष्म रूपमें अधिक शक्तिकी और देखनेवाले जितनी सूक्ष्मता बढ़ती जाती है उतनी ही उसकी शक्तिमें भी वृद्धि होती जाती है । उदाहरणार्थ उत्पादक ओषधियोंके होती है । स्थूल रूपकी अपेक्षा उनके सत्त्वोंमें कई गुना बल बढ़ जाता है । धातुएँ अग्निद्वारा सूक्ष्म परमाणुरूपमें कितनी प्रभावशाली बन जाती हैं । स्थूल भूतोंके सूक्ष्म भस्म होकर अपने शक्तिका प्राचीन भारतीय दर्शनकारोंने वर्णन किया है उसका ज्ञान अब पाश्चात्त्य परमाणुओंमें देशवालोंको जिस अद्भुत जा रहा है । इनके सदुपयोगसे संसारकी अधिक - से - अधिक उन्नति और प्राणिमात्रका कल्याण हो भी होता है, किंतु इनके दुरुपयोगका रोमाञ्चक उदाहरण भी हमारे समक्ष है । केवल गंधक, पारा, फौलाद सकता तथा रेडियम ( Radium ) आदिके सूक्ष्म परमाणुओंसे बने हुए परमाणुबमद्वारा सारे अन्ताराष्ट्रिय उल्लङ्घन करते हुए हेरोशमा और नागासाकी नामक जापानके नगरोंपर अमरीकाने जो उत्पात उत्पन्न नियमोंको किया है और युद्धसे सर्वथा असम्बन्धित लाखों स्त्री, पुरुष, बालक, वृद्ध, निरपराधी नागरिकों तथा प्राणधारियोंका जो प्राणहरण किया है और जो अकथनीय पीड़ा पहुँचायी है, उसका उदाहरण करोड़ों सारे भूमण्डलके इतिहासमें ढूँढ़े न मिल सकेगा । इन अमानुष राक्षसीय कार्योंद्वारा देशभक्त स्वतन्त्रताप्रेमी मृत्युसे सर्वथा निर्भय वीर जापानियोंको अपनी अद्वितीय निर्भयता, वीरता और युद्ध - कला - कौशलको दिखलाये बिना शस्त्र डाल देनेपर विवश कर देनेसे अमरीका अपनेको सफल और कृतकृत्य भले ही समझ ले, किंतु भविष्यमें भूमण्डलके निष्पक्ष और तटस्थ इतिहास - लेखकोंके लिये यह चरित्र अमरीकाके सम्बन्धमें एक लाञ्छनका विषय बना रहेगा । संयमको भी इसी प्रकार एक परमाणुबम समझ लेना चाहिये, जिसमें सब प्रकारकी अद्भुत शक्तियाँ हैं । कई स्थानोंमें इस बातको बतला आये हैं कि स्थूल भूतोंकी अपेक्षा सूक्ष्म भूत सूक्ष्मतर हैं । उनकी अपेक्षा तन्मात्राएँ और इन्द्रियाँ हैं और उनकी अपेक्षा अहंकार सूक्ष्मतर है और अहंकारकी अपेक्षा चित्त । चित्त — जो गुणोंका प्रथम विषम परिणाम है, संसारके सारे पदार्थोंकी प्रकृति होनेके कारण सबके तदाकार हो सकता है तथा सबसे सूक्ष्म होनेके कारण सबमें प्रविष्ट होकर उनमें यथोचित परिणाम कर सकता है । संयममें चित्तका ही सारा खेल होता है । इसलिये विभूतिपादमें बतलायी हुई सारी सिद्धियाँ तथा अन्य सब प्रकारके अद्भुत चमत्कार संयमद्वारा किये जा सकते हैं । हिपनोटिज्म, मैसमेरिज्म आदिमें एक प्रकारसे संयमहीका प्रयोग होता है । कई साधुओंके सम्बन्धमें कहा जाता है कि वे बिना टिकट रेलमें सफर करते हैं । माँगनेपर बहुत - से टिकट दिखा देते हैं और कोई - कोई ट्रेनको भी रोक देता है तथा कई, अघोरी मनुष्योंका मांस खाते हुए दृष्टिगोचर होनेपर मांसको कलाकन्दके रूपमें दिखला देते हैं । इनमें भी दृष्टिबन्ध ( Sightism ) सम्बन्धी तथा इंजिनकी गतिमें एक प्रकारसे संयम ही काम करता है, यद्यपि वे इस बातसे सर्वथा अनभिज्ञ होते हैं । संयममें सबसे पहला और सबसे कठिन काम धारणा है साधारण परिमित - ज्ञान और अल्प - बुद्धिवाले मनुष्योंको बेसिर - पैर और बेतुके मन्त्रों — यथा ‘ कांगरू देश कमक्षादेवी जहाँ बसे अजयपाल जोगी । अजयपाल जोगीने कुत्ते पाले चार, हरा, पीला, काला, लाल । पा ० यो ० प्र०१७- ( ४८२ )
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सूत्र ६ ] * तस्य भूमिषु विनियोगः * [ विभूतिपाद इन कुत्तोंका डसा न मरे । जोगी अजयपालकी आन । ' तथा अपरिचित भयानक शब्द यथा— ' ह्रीं क्लीं ', इत्यादि अधिक प्रभावित कर देते हैं । इस अन्धविश्वासद्वारा वे उस विशेष विषय - सम्बन्धी धारणा योग्यता प्राप्त कर लेते हैं । इस प्रकार असभ्य जंगली जातियोंके कई परिवारोंमें विशेष मन्त्रोंके द्वारा विशेष धारणाएँ परम्परासे गुप्त चली आती हैं और वे उस कार्यको उस मन्त्रका ही परिणाम समझते चले आते हैं । उदाहरणार्थ एक बाजीगर तमाशा करनेवाला कहता है ' आकाशमें राक्षसों और देवताओंमें युद्ध हो रहा है । मैं देवताओंकी सहायताके लिये जाता हूँ । इस बीचमें आप मेरे परिवार और सामानकी रक्षा करनेकी कृपा करें । ' वह एक रस्सी ऊपर आकाशमें फेंककर उसके द्वारा ऊपर चढ़ता हुआ दृष्टिसे ओझल हो जाता है । थोड़ी देरमें क्रमसे उसके हाथ, पैर, धड़, और सिर ऊपरसे पृथिवीपर गिरते हैं । उसकी स्त्री उनको लेकर सती हो जाती है । उसके कुछ ही समय पश्चात् वह बाजीगर नीचे उतरता है । राक्षसोंपर विजयके शुभ समाचार सुनाकर स्त्रीको तलाश करता है और दर्शकोंमेंसे मुख्य व्यक्तिकी कुर्सीके नीचेसे निकाल लाता है । इस सारे खेलकी जब फोटू ली गयी, तब वह बाजीगर आसन लगाये हुए अपने परम्परासे प्राप्त किये हुए एक विशेष मन्त्रका जप करता हुआ पाया गया, जिसमें इस सारे दृष्टिबन्ध - सम्बन्धी विषयके संयमकी धारणा थी । एक समय एक जगह मुझे योगसम्बन्धी सात - आठ व्याख्यान ( लैक्चर ) देने ध । एक संन्यासी महात्मा उनसे प्रभावित होकर यह समझने लगे कि मैंने कभी पिशाच - सिद्धि की होगी अथवा मुझे पिशाच - सिद्धिकी किसी विशेष क्रियाका ज्ञान है । वे बड़ी श्रद्धा और नम्रतापूर्वक उसकी दीक्षाके लिये एकान्तमें मुझसे प्रार्थना करने लगे । बार - बार मना करनेपर भी मेरी इस प्रकारकी बातोंसे उपेक्षावृत्तिका उन्हें विश्वास नहीं होता था । उन्हींके हितार्थ उस दिन यह संयमकी विवेचना की गयी थी । पिशाच - सिद्धि और भूत - सिद्धिके अभिलाषी कई प्रकारकी हिंसा करते हैं । मरघटादि भयभीत तामसी स्थानोंमें तामसी भावनावाले बेतुके मन्त्रोंसे भूत - पिशाचकी भावनामें धारणा करते हैं । ये सारी बातें अपने तामसी प्रभावसे चित्तको शीघ्रतम भूत - पिशाचाकारमें परिणत करनेके उद्देश्यसे की जाती हैं । इस तामसी भूत - पिशाचादिके आकार में दृढ़ स्थिति होनेके पश्चात् इस प्रकारके संयमकी धारणाद्वारा कभी - कभी उनसे भूत - पिशाच - जैसे कार्य भी प्रकट होने लगते हैं । उपर्युक्त सारी बातोंको परमाणुबमके सदृश संयमका दुरुपयोग समझना चाहिये । इस प्रकारकी बातोंको योग, सिद्धि अथवा चमत्कार और उनके करनेवालोंको योगी, सिद्ध और चमत्कारी पुरुष समझना भी अत्यन्त भूल है, प्रत्युत इन प्रयोगोंको घृणा और तिरस्कारकी दृष्टिसे और उनके प्रयोगकर्ताओंको उपेक्षा - वृत्तिसे देखना चाहिये, क्योंकि रेलमें बिना टिकट जाना एक ( चोरी ) है और मांसभक्षण स्वयं हिंसारूपी पाप है । चोरीकी पुष्टि करनेवाली और हिंसाको प्रकारका छिपानेवाली स्तेय कोई भी क्रिया, योग, सिद्धि अथवा चमत्कार नहीं हो सकती और न उनका करनेवाला अथवा चमत्कारी पुरुष । इसी प्रकार चित्तको भूत अथवा पिशाचाकार और योगी, सिद्ध परिणत करना मनुष्यत्वसे नीचे गिरकर अधोगतिको प्राप्त होना है । श्रीमद्भगवद्गीतामें सूक्ष्म शरीरको पिशाच - वृत्तिमें कितने सुन्दर शब्दोंमें वर्णन किया गया है— इस विषयको यजन्ते सात्त्विका देवान् यक्षरक्षांसि प्रेतान् भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा राजसाः
जनाः ।
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