पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 621–630

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 621–630

पृष्ठ 621

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 621 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

कैवल्यपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २३ शास्त्रोपदेशरूपी कारणकी अपेक्षासे मोक्षरूप फलको प्राप्त होता है । सब कार्य अपनी सामग्रीको प्राप्त होनेपर ही स्वरूपको लाभ करते हैं । प्रकृतिके प्रतिलोम परिमाणद्वारा उत्पन्न मोक्षरूप कार्यकी ऐसी ही सामग्री शास्त्रादि प्रमाणोंसे निश्चित है । द्वितीय प्रकारसे उपपादन नहीं हो सकता, तो शास्त्रोपदिष्ट यम, नियम, विवेक - ज्ञानादि रूप सामग्रीके बिना मोक्ष कैसे हो सकता है । इससे सिद्ध हुआ कि विषयोंके आकारको ग्रहण करनेवाला और प्रकट हुआ है चैतन्यप्रतिबिम्ब जिसमें ऐसा अन्तःकरण विषयोंका निश्चय करके सब व्यवहारोंको चलाता है । इस प्रकारके कथनसे ऐसे ही चित्तको मानते हुए और जगत् स्वसंवेदन चित्तमात्र है ( स्वेन स्वरूपेण संवेदनं प्रकाशो यस्य तच्चित्तं तदेव ) अर्थात् अपने स्वरूपसे ही प्रकाश है जिसका ऐसा केवल चित्त ही जगत् है, इस प्रकार कहनेवाले लोग समझाये जाते हैं । ( क्योंकि चित्तसे भिन्न ज्ञाता, ज्ञेयादि भी हैं ) । ' विशेष वक्तव्य— ॥ सूत्र २३ || वार्तिककारादिने इस सूत्रपर और इससे पूर्व सूत्रपर जो भाष्य लिखा है, उसका तात्पर्य निम्न प्रकार है-भोक्ता पुरुष परिणामशून्य है, इससे उसमें कहीं आना - जाना नहीं होता, किन्तु बुद्धिवृत्तिमें वह प्रतिबिम्बित - सा होता है, इसलिये बुद्धिवृत्तिको चेतन - तुल्य बना देता है । अन्यथा ' घटमहं जानामि ' ' मैं घटको जानता हूँ ' यह बुद्धिवृत्ति चेतन भावार्थ नहीं हो सकती; क्योंकि अहं पदका अर्थ केवल जड बुद्धि नहीं है । जैसे बुद्धि ( अन्तःकरण ) इन्द्रियादिद्वारा अर्थोंके संनिकर्षसे अर्थों ( घटादिकों ) के आकारमें परिणत होकर अर्थाकार होती है, वैसे ही पुरुषके अत्यन्त संनिकर्ष भोग्य - भोक्तृत्वरूप सम्बन्धसे उसके प्रतिबिम्बको ग्रहण करके आत्माकार बन जाती है । परिणाम बुद्धिमें ही होता है, वह बहिर्मुख होकर विषयाकार होती है ( विषयाकार होनेसे ही, मनकी स्वप्नावस्थामें तत्तदाकारसे वृत्तियाँ होती रहती हैं ) और अर्न्तमुख होकर आत्माकार प्रतिबिम्बको ग्रहण करना ही उसकी आत्माकारता है । वस्तुतः प्रतिबिम्बके न होनेपर भी बुद्धिका आत्माकार हो जाना ही प्रतिबिम्ब है । अपने ( इस प्रकार ) प्रतिबिम्बद्वारा ही चेतन भोक्ता कहलाता है । अर्थात् कर्तृत्व, भोक्तृत्व, ज्ञातृत्व – ये सब बुद्धिवृत्तिमें वास्तविक हैं और पुरुषमें आरोपित हैं । तात्पर्य यह कि बुद्धिवृत्ति तत्तदाकारसे परिणत हुई अपने स्वरूपको पुरुषके लिये समर्पण करती है, इससे पुरुषमें कर्तृत्व, भोक्तृत्व समझा जाता है । और आत्मा भी प्रतिबिम्बद्वारा अपने रूपको बुद्धिके अपर्ण करता है, इससे बुद्धि चेतन समझी जाती है । आत्माकार - सा बुद्धिवृत्तिका हो जाना प्रतिबिम्बके तुल्य होनेसे प्रतिबिम्ब कहलाता है । केवल वृत्तियोंका बोध भी क्रोधादि वृत्तियोंके तुल्य है, वह ‘ जानामि ' ‘ मैं जानता हूँ ' इस वृत्तिका विषय होता है । इस सूत्रमें चित्तको ' सर्वार्थ ' कहा है । इस शब्दका अर्थ यह है कि चित्त ग्राह्य, ग्रहण, गृहीता – इन सबको ग्रहण करता है ' अयं घटः ' ' यह घट है ' इस व्यावसायात्मक ज्ञानके अनन्तर ' घटमहं जानामि ' ' मैं घटको जानता हूँ ' इस प्रकारका जो अनुव्यवसायात्मक ज्ञान होता है वह भी पूर्व - ज्ञानके तुल्य साक्षिभाष्य है, इसलिये सवार्थ कहना ठीक है । इस उत्तर- ज्ञानमें ज्ञेय, ज्ञाता, ज्ञान- तीनों समान होते हैं । ' द्रष्टृदृश्योपरक्तम् ' अर्थात् पुरुष और विषय - दोनोंके आकारवाला चित्त होता है । पुरुष और बुद्धिकी अत्यन्त समीपता है, इससे शब्दाद्याकारादिवत् पुरुषाकार बुद्धिवृत्ति होकर पुरुषमें प्रतिबिम्बित होती है, उस बुद्धिवृत्तिका -प्रकाश होना ही पुरुषमें शब्दादिका ज्ञान और पुरुषका ज्ञान कहलाता है । इससे पुरुष ज्ञानके ( ५८४ )

पृष्ठ 622

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 622 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सूत्र २४ ] * तदसंख्येयवासनाभिश्चित्रमपि परार्थं संहत्यकारित्वात्:* [ कैवल्यपाद लिये पुरुषान्तर अथवा ज्ञानान्तरकी अपेक्षा नहीं और न कर्मकर्तृविरोध है अर्थात् ' अहं जानामि ' ' मैं जानता हूँ ' इत्यादि प्रतीतियोंका आश्रय होनेसे कर्ता और उक्त प्रतीतियोंका विषय होनेसे आत्मा कर्म होता है । पर आत्माके विरुद्ध कर्मकर्तृत्व कैसे रह सकते हैं इस प्रकारका विरोध नहीं है । क्योंकि अन्तःकरणको द्वार माना जाता है । जैसे स्फटिकमणि दोनों तरफ भिन्न - भिन्न प्रकारकी वस्तुओंके और अपने स्वरूपके साथ तीनों रूपवाला - सा प्रतीत होता है वैसे ही चित्तकी दशा है ( यहाँ स्फटिकका दृष्टान्त सर्वांशमें नहीं है, क्योंकि उसमें प्रतिबिम्बमात्र पड़ता है और चित्त तदाकारसे परिणत भी होता है । इससे उस - उस वस्तुके साथ मेल होनेसे वैसा - वैसा प्रतीत होनेमात्रमें दृष्टान्त है ) । सब वस्तुओंको भ्रममात्रसे कल्पित मानना भी ठीक नहीं । सीपमें जो चाँदीका अथवा रज्जुमें जो सर्पका ज्ञान होता है वह सारूप्य दोषसे है, इससे अविद्याकी सर्वत्र कल्पना करना अयुक्त है । भ्रम - स्थलोंमें विषयका आकार चित्तमें रहता है, विषय सत्य ही है । जिन सांख्ययोगी वेदान्तियोंने विवेकद्वारा गृहीता, ग्रहण और ग्राह्य- - इन तीनोंको परस्पर विजातीयरूपसे पृथक् - पृथक् जान लिया है, वही समदर्शी है, उन्होंने ही पुरुषके - स्वरूपको जान लिया है । अन्य जो अविवेकी हैं वे सब भ्रान्तिमें हैं । उनकी उपेक्षा न करनी चाहिये, किंतु कृपा करके उनको बोधन कराना चाहिये । सङ्गति — शङ्का — जब चित्तसे सब व्यवहार चल रहे हैं और उसीमें सब वासनाएँ रहती हैं तो द्रष्टा

प्रमाणशून्य होकर चित्त ही भोक्ता सिद्ध होता है ।

समाधान-तदसंख्येयवासनाभिश्चित्रमपि परार्थं संहत्यकारित्वात् ॥ २४ ॥।

शब्दार्थ – तत् - वह - चित्त; असंख्येय - वासनाभिः - चित्रम् अपि = अनगिनत वासनाओंसे चित्रित हुआ भी; पर - अर्थम् = दूसरेके लिये है; संहत्यकारित्वात् = संहत्यकारी होनेसे । अन्वयार्थ – चित्त अनगिनत वासनाओंसे चित्रित हुआ भी परार्थ है; क्योंकि वह संहत्यकारी है । व्याख्या- -जो वस्तु कई चीजोंसे मिलकर कामकी बनती है वह संहत्यकारी कहलाती है; जैसे मकान, शय्या आदि I । संहत्यकारी वस्तु अपने लिये नहीं होती, बल्कि किसी दूसरेके लिये होती है, जैसे मकान, शय्या आदि अपने लिये नहीं हैं; बल्कि किसी दूसरेके रहने और आरामके लिये हैं । इसी प्रकार चित्त भी सत्त्व, रजस् और तमस् गुणोंके अङ्ग - अङ्गीभावके मेलसे सत्त्वप्रधान बना है । इसलिये वह भी संहत्यकारी है और किसी दूसरेके लिये होना चाहिये सो पुरुषके ही भोग- अपर्वगके लिये इसकी प्रवृत्ति होती है । यद्यपि यह ठीक है कि अनन्त वासनाओंसे चित्रित होनेके कारण चित्तहीको भोक्ता मानना चाहिये, क्योंकि जो वासनाका आश्रय होता है वह भोगका आश्रय होनेसे भोक्ता बन सकता है, अन्य नहीं । तथापि जड संहत्यकारी होनेसे वह चित्त स्वार्थ नहीं किंतु परार्थ ही है अर्थात् पुरुषके ही भोग अपवर्ग सम्पादन अर्थ जानना चाहिये । इसलिये सुखाकार जो चित्त है, वह चित्तके भोगार्थ नहीं है और तत्त्वज्ञानाकार जो चित्त है, वह भी चित्तके अपवर्गार्थ नहीं, किंतु यह दोनों प्रकारका चित्त परार्थ है और वह जो इस भोग

और अपवर्ग अर्थसे अर्थवाला है, वही असंहत केवल पुरुष है ।

भोजवृत्तिका भाषानुवाद ॥ सूत्र २४ ॥

यदि उक्त प्रकारके चित्तसे ही सब व्यवहार चलते हैं, तो प्रमाणरहित द्रष्टा क्यों माना जाता है? ( ५८५ )

पृष्ठ 623

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 623 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

कैवल्यपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप:* [ [ सूत्र २५ इस शङ्काको करके द्रष्टामें प्रमाण देते हैं-वह चित्त ही असंख्यात वासनाओंसे नाना प्रकारका हुआ अपने स्वामीके लिये है अर्थात् भोक्ता जीवके भोग और मोक्षरूपी प्रयोजनको सिद्ध करता है; क्योंकि मिलकर काम करनेवाला है । जो - जो मिलकर काम करते हैं वे अन्यके लिये होते हैं । जैसे शय्या, आसनादि ( मिले हुए किसी पुरुषके लिये होते हैं ) सत्त्व, रज, तम- - - ये तीनों चित्तरूपसे परिणत होनेवाले मिलकर कार्य करते हैं, इससे परके लिये हैं । जो इनसे पर ( भिन्न ) है वह पुरुष है । शङ्का – शय्या, आसनादिके दृष्टान्तसे तो शरीरवाला ही ' पर ' सिद्ध होता है और तुमको तो केवल चिन्मात्र पुरुष इष्ट है, दृष्टान्त उससे विपरीतकी सिद्धि करता है, तो ' संहत्यकारित्वात् ' यह हेतु तुम्हारा इष्टसाधक नहीं । उत्तर - यह ठीक है कि सामान्यरूपसे केवल परविषयिणी व्याप्ति ( जो - जो मिलकर कार्य करता है वह - वह परार्थ है, इस प्रकारकी ) गृहीत होती है । परंतु सत्त्वादि गुण तो मिलकर कार्य करनेवाले ही हैं, इनसे विलक्षण कोई अन्य धर्मी होना चाहिये, ऐसा विचार करनेपर सत्त्वादि गुणोंसे विलक्षण, असंहत चिन्मात्ररूप भोक्ता सिद्ध होता है । जैसे काष्ठोंसे घिरे हुए पर्वतमें विलक्षण धूमसे पर्वतकी लकड़ियोंसे उत्पन्न अन्य वह्नियोंसे विलक्षण प्रकारका ही वह्नि ( अग्नि ) अनुमित होता है । वैसे यहाँ भी भोग्य सत्त्व गुणसे, परार्थताका अनुमान करनेपर उससे विलक्षण ही भोक्ता, स्वामी, चेतनरूप, असंहत ( किसीसे नहीं मिला हुआ ) सिद्ध होता है । यदि उसपर ( पुरुष ) में परत्वधर्म, सर्वोत्कृष्टत्व ( सबसे उत्तमतारूप ) ही माना जाय तो भी तमोगुण - प्रधान विषयोंसे शरीर उत्तम है, क्योंकि यह प्रकाशरूप इन्द्रियोंका आश्रय है । उस शरीरसे भी उत्तम इन्द्रियाँ हैं । उन इन्द्रियोंसे भी उत्तम चित्तसत्त्व है । उस चित्तका भी जो प्रकाशक है, जिसका कोई अन्य प्रकाशक नहीं, वह चेतनरूप ही है, उसमें मेल कहाँसे हो सकता है । सङ्गति — यहाँतक चित्त और पुरुषका भेद युक्तिद्वारा बतलाया गया, पर आत्मा कैसा है, क्या है? यह युक्तिसे नहीं जाना जा सकता; क्योंकि यह अनुभवका विषय है, इसका वास्तविक स्वरूप समाधिद्वारा जाना जा सकता है । इसको अगले सूत्रमें बतलाते हैं-विशेषदर्शिन आत्मभावभावनाविनिवृत्तिः ॥ २५ ॥

शब्दार्थ – विशेष - दर्शिनः = ( विवेकख्यातिद्वारा पुरुष और चित्तमें ) भेदके देखनेवालेकी; । आत्म - भाव - भावना - आत्मभावकी भावना; विनिवृत्तिः - निवृत्त हो जाती है हो अन्वयार्थ – विवेकख्यातिद्वारा पुरुष और चित्तमें भेदके देखनेवालेकी आत्मभावकी भावना निवृत्त जाती है । हूँ, क्या था, आगे क्या व्याख्या — आत्मभावभावना = आत्मभावकी चिन्ता कि मैं कौन हूँ, कैसा होऊँगा इत्यादि । करनेवाला विवेकज्ञानी । विशेषदर्शिनः = पुरुष और चित्तके भेदको विवेकख्यातिद्वारा साक्षात् जाता है तब उसकी आत्मभावना विवेकख्यातिद्वारा जब योगीको पुरुष और चित्तका भेद साक्षात् हो परिणामोंको देखता है और उसके कि मैं कौन हूँ, क्या हूँ इत्यादि निवृत्त हो जाती है । वह चित्तमें ही सारे करने लगता है धर्मोंसे भिन्न अपनेको अपरिणामी ज्ञानस्वरूप अनुभव ( ५८६ )

पृष्ठ 624

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 624 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सूत्र २६-२७ ] तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः [ कैवल्यपाद * * जिस पुरुषके चित्तमें यह भावना होती है, वही आत्मज्ञान - उपदेशका अधिकारी है और वही योगाभ्यासद्वारा विवेक - ज्ञानका सम्पादन करता है । उसी विवेकज्ञानसे यह आत्मभाव - भावना निवृत्त होती है । जिसको यह आत्मभाव - भावना ही नहीं उसको न तो इस आत्मज्ञानके उपदेशका अधिकार ही है, न उसको विवेकज्ञान ही उत्पन्न होता है और न आत्मभाव - भावनाकी निवृत्ति होती है । किसके चित्तमें यह भावना उदय हुई है और किसके चित्तमें नहीं उदय हुई है इसका भाष्यकार इस अनुमानसे जान लेना बतलाते हैं कि जैसे वर्षा ऋतुमें तृणोंके अङ्कुरोंका प्रादुर्भाव देखकर उन तृणोंके बीजोंकी सत्ताका अनुमान किया जाता है वैसे ही जिस पुरुषको मोक्षमार्ग - श्रवणसे रोमाञ्च, हर्ष और अश्रुपात होवे उस पुरुषने विवेक - ज्ञानके बीजभूत तथा अपवर्गके साधन जो यम, नियम आदि कर्म हैं उनका पूर्वजन्ममें अनुष्ठान कर लिया है और उसके चित्तमें आत्मभाव - भावनाका उदय भी है । जिन पुरुषोंकी पूर्वजन्ममें शुभ कर्मोंके अनुष्ठानके अभावसे केवल पूर्व पक्षमें ही रुचि हो और सिद्धान्तमें अरुचि हो उनके चित्तमें अनुमानसे आत्मभाव - भावनाका अनुदय जान लेना । सङ्गति – विशेष - दर्शनके उदय होनेपर विशेष - दर्शीका चित्त कैसा होता है? इसको बतलाते हैं— तदा विवेकनिनं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम् ॥ २६ ॥

शब्दार्थ – तदा = तब ( विशेषदर्शनके उदय होनेपर ); विवेकनिम्नम् = विवेककी ओर निम्न अर्थात् झुका हुआ. – विवेकमार्ग संचारी; कैवल्यप्राग्भारम् = कैवल्यके प्राग्भारवाला अर्थात् कैवल्यके अभिमुख; चित्तम् = विशेषदर्शीका चित्त होता है । अन्वयार्थ – विशेषदर्शनके उदय होनेपर विशेषदर्शीका चित्त विवेक - मार्ग - संचारी होकर कैवल्यके अभिमुख होता है । – निम्न – जलके प्रवाहके संचारयोग्य जो ढलवान् अर्थात् झुका हुआ प्रदेश है वह निम्न व्याख्या-है कहलाता I प्राग्भार- – ऐसी उठी हुई भूमि अर्थात् ऊँचे प्रदेशको जहाँ जलका प्रवाह रुक जाता है प्राग्भार कहते हैं? यहाँ चित्तकी उपमा बहते हुए जलसे दी गयी है, जिस प्रकार पानी नीचेकी ओर प्रकार योगीका चित्त जो पहले अविवेकके मार्गमें बहता हुआ विषयोंकी ओर जा रहा बहता है इसी वह मार्ग बंद हो जाता है और चित्तका प्रवाह आत्मानात्मरूप विवेक - ज्ञानके मार्गकी था विशेषदर्शनसे कैवल्य - प्राग्भारके अभिमुख हो जाता है । अर्थात् चित्त अज्ञानके कारण जो ओर निम्न होकर था, विशेषदर्शनद्वारा विवेक - ज्ञान होनेपर उसकी प्रवृत्ति कैवल्यकी ओर हो जाती संसारी विषयोंमें लगा हुआ है । इसी प्रकारकी उपमा १। १२ में दी गयी है । सङ्गति – विवेक - प्रवाही चित्तमें भी बीच - बीचमें कभी - कभी व्युत्थानकी हैं? इसको बताते हैं- वृत्तियाँ क्यों उत्पन्न होती तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः ॥ २७ ॥

शब्दार्थ – तत् - उस ( विवेक - ज्ञानके ); छिद्रेषु - छिद्रोंमें— बीच अन्तराणि = दूसरी ( व्युत्थानकी ) वृत्तियाँ; संस्कारेभ्यः = ( पूर्वके - बीचमें — अन्तरालमें; प्रत्यय-व्युत्थानके ) संस्कारोंसे होती है । ( ५८७ )

पृष्ठ 625

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 625 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

कैवल्यपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २८-२९ अन्वयार्थ — उस विवेक - ज्ञानके बीच - बीचमें अन्य व्युत्थानकी वृत्तियाँ ( भी ) ( पूर्वके व्युत्थानके ) संस्कारोंसे उदय होती रहती हैं । व्याख्या- छिद्र = विवेकज्ञानके बीचमें कभी - कभी होनेवाला विवेक - अभावरूप अवकाश, अन्तराल अथवा अवसर । जबतक चित्तमें पुरुष और चित्तकी भिन्नताका ज्ञान प्रबलतासे रहता है तबतक उसकी प्रवृत्ति कैवल्यकी ओर रहती है, पर जब - जब इस विवेकज्ञानमें शिथिलता आने लगती है, तब - तब व्युत्थानके संस्कार अर्थात् व्युत्थानकी ममता और अहंताकी वृत्तियाँ ' यह मेरा है ' ' मैं सुखी हूँ‘मैं द: खी हूँ ' इत्यादि उत्पन्न हो जाती है । यह प्रत्यान्तराणि अर्थात् समाधिकी वृत्तियोंसे भिन्न व्युत्थानकी वृत्तियाँ इसलिये बीचमें उत्पन्न होती हैं कि विवेकख्याति ( विशेषदर्शन ) अभी अत्यन्त परिपक्व नहीं हुई है और अनादिकालसे

प्रवृत्त व्युत्थानके संस्कार अभी किंचित् बलवान् हैं ।

सङ्गति — उनके त्यागका उपाय बताते हैं-हानमेषां क्लेशवदुक्तम् ॥ २८ ॥

शब्दार्थ — हानम् = निवृत्ति; एषाम् = उनकी ( व्युत्थानके संस्कारोंकी ), क्लेशवत् = क्लेशोंकी तरह; उक्तम् = कही गयी है । अन्वयार्थ – उन ( व्युत्थानके संस्कारों ) की निवृत्ति क्लेशोंकी निवृत्तिके तुल्य कही गयी जानना चाहिये । व्याख्या — जैसे दूसरे पादके दसवें और ग्यारहवें सूत्रोंमें क्लेशोंका नाश बतलाया है वैसे ही व्युत्थानके संस्कारोंका भी नाश जान लेना चाहिये अर्थात् जिस प्रकार प्रसंख्यानरूप अग्निसे क्लेश दग्ध - बीज - भावको प्राप्त होकर अपने अंकुर - उत्पादनमें असमर्थ हो जाते हैं वैसे ही विवेक - अभ्यासरूप प्रसंख्यान अग्निसे पूर्वके जन्मोंके व्युत्थानके संस्कार भी दग्धबीज होकर व्युत्थानकी वृत्तियोंको नहीं उत्पन्न करते । अपरिपक्व विवेकनिष्ठ चित्तमें ही व्युत्थानके संस्कारोंका प्रादुर्भाव होता है, परिपक्क ज्ञाननिष्ठ चित्तमें नहीं होता । इसलिये पहले विवेकज्ञानके अभ्याससे विवेकज्ञानके संस्कारोंका सम्पादन करके व्युत्थानके संस्कारोंका निरोध करना चाहिये । फिर निरोधसंस्कारोंसे विवेकके संस्कारोंका क्षय करना चाहिये । उसके पश्चात् निरोधके संस्कारोंका भी असम्प्रज्ञात समाधिद्वारा लय कर देना चाहिये । विवेक - ज्ञानमें ही अपनेको कृतकृत्य न समझ लेना चाहिये । सङ्गति – व्युत्थानके निरोधका उपाय विवेक - अभ्यासरूप प्रसंख्यान बतलाकर अब प्रसंख्यानके निरोधका उपाय कहते हुए जीवन्मुक्तिकी परमकाष्ठारूप धर्ममेघ समाधिका स्वरूप कहते हैं-प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेर्धर्ममेघः समाधिः ॥ २ ९ ॥ शब्दार्थ – प्रसंख्याने - अपि - अकुसीदस्य - प्रसंख्यान ज्ञानमें भी विरक्त है जो योगी, होती उसको है ।; सर्वथा विवेकख्यातेः - निरन्तर विवेक- ख्यातिके उदय होनेसे; धर्म - मेघ: -समाधिः- धर्ममेघ समाधि होनेसे अन्वयार्थ — जो योगी प्रसंख्यान ज्ञानसे भी विरक्त है उसको निरन्तर विवेक - ख्यातिके उदय धर्ममेघ समाधि होती है । विचार करना व्याख्या – प्रसंख्यान = जितने तत्त्व परस्पर विलक्षण स्वरूपवाले हैं; उनका यथाक्रम हैं । प्रसंख्यान कहलाता है । ( भोजवृत्ति ) इसीको विवेकज्ञान भी कहते ( ५८८ )

पृष्ठ 626

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 626 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सूत्र ३०-३१ ] * तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयमल्पम् '* [ कैवल्यपाद धर्ममेघः = अति उत्तम पुण्य - पापसे रहित परम पुरुषार्थके साधक धर्मकी जो वर्षा करता है वह धर्ममेघ कहलाता है । ( भोजवृत्ति ) अकुसीद — ऋण देकर मास - मासमें धनकी वृद्धि करना अर्थात् सूद ( व्याज ) लेनेको कुसीद कहते हैं । यहाँ जो योगी प्रसंख्यानकी लिप्सावाला है उसके लिये कुसीद और जो फलकी इच्छासे विरक्त है उसके लिये अकुसीद शब्दका प्रयोग हुआ है । जब ब्रह्मनिष्ठ योगी पर वैराग्यद्वारा प्रसंख्यान अर्थात् विवेक ज्ञानसे भी किसी फल ( सर्वज्ञत्वादि जिनको ३ | ४ ९में बतला आये हैं ) की इच्छा नहीं रखता तो उसके विरक्त हो जानेपर इसपर वैराग्यशील योगीकी सर्वथा विवेक - ख्याति उदय होती है, अर्थात् निरन्तर विवेकज्ञानका प्रवाह बहने लगता है । इससे व्युत्थानके संस्कारोंके बीज नितान्त भस्म हो जाते हैं । इस कारण व्युत्थानकी वृत्तियाँ बीच - बीचमें उत्पन्न नहीं होतीं । ज्ञानकी इस परिपक्व अवस्थाको धर्ममेघ समाधि कहते हैं । सम्प्रज्ञात समाधिकी सबसे ऊँची अवस्था विवेक - ख्याति ( प्रसंख्यान ) है । विवेक ख्यातिकी परिपक्व अर्थात् निरन्तर रहनेवाली अवस्था धर्ममेघ समाधि है । इसकी पराकाष्ठा ज्ञानप्रसाद - नामी पर - वैराग्य है । जिसका फल असम्प्रज्ञात अर्थात् निर्बीज समाधि है । सङ्गति — धर्ममेघ समाधिका फल क्लेशकर्मकी निवृत्ति बताते हैं-ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः ॥ ३० ॥

शब्दार्थ – ततः - उस ( धर्ममेघ समाधि ) से; क्लेश - कर्म - निवृत्तिः क्लेश और कर्मोंकी निवृत्ति होती है अन्वयार्थ — उस धर्ममेघ समाधिसे क्लेश और कर्मोंकी निवृत्ति होती है व्याख्या – उस धर्ममेघ समाधिकी प्राप्तिपर अविद्या आदि पाँचों क्लेश और शुक्ल, कृष्ण तथा मिश्रित तीनों प्रकारके कर्म ( सकाम कर्म ) और उनकी वासनाएँ मूलसहित नाश हो जाती हैं । इस प्रकार क्लेश और कर्मोंके अभावमें योगी जीवन्मुक्तहोकर विचरता है और शरीर त्यागनेके पश्चात् विदेह मुक्त पदको प्राप्त होता है अर्थात् पुनः जन्मधारण नहीं करता जैसा कि भाष्यकार लिखते हैं ' कस्मात् यस्माद्विपर्ययो भवस्य कारणम्, न हि क्षीणक्लेशविपर्ययः कश्चित् केनचित्क्वचिज्जातो दृश्यत इति । ' क्योंकि विपर्यय ज्ञान अर्थात् अविद्या ही संसारका कारण है । इसलिये जिसके अविद्यादि क्लेश नष्ट हो गये हैं ऐसा पुरुष कोई भी किसी कारणसे भी, कहीं भी उत्पन्न हुआ नहीं देखा जाता । महर्षि गौतमने भी न्याय - दर्शनमें ऐसा ही कहा है । ' वीतरागजन्मादर्शनात् ' ( ३ । १ । २५ ) जिसके राग बीत गये हैं ऐसे पुरुषका संसारमें जन्म न देखे जानेसे 1 सङ्गति - क्लेशकर्मकी निवृत्तिपर क्या होता है? तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयमल्पम् ॥ ३१ ॥

शब्दार्थ — तदा - तब क्लेशकर्मकी निवृत्तिपर; सर्व - आवरण - मल - अपेतस्य - सारे आवरण अलग हुए; ज्ञानस्य = ज्ञानके — चित्तके प्रकाशके; आनन्त्यात् = अनन्त होनेसे; ज्ञेयम् - जानने योग्य मलसे वस्तु; अल्पम् = थोड़ी रह जाती है । अन्वयार्थ — तब सब क्लेशकर्मोंके क्षय - कालमें सर्व आवरणरूप मलोंसे प्रकाशके अनन्त होनेसे ज्ञेय पदार्थ अल्प हो जाता है । रहित होकर चित्तरूप ( ५८ ९ )

पृष्ठ 627

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 627 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

कैवल्यपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र ३२ व्याख्या – चित्त सत्त्वप्रधान सूर्यके सदृश प्रकाशशील है । जिस प्रकार शरद् ऋतुमें मेघ सूर्यके प्रकाशको ढक देते हैं, उसी प्रकार रजस् - तमस् - मूलक अविद्या आदि क्लेश और सकाम कर्मकी वासनाएँ चित्तके प्रकाशपर आवरण डाले हुए रहते हैं । बादलोंके हटनेपर जब सूर्यका प्रकाश चारों दिशाओंमें फैलता है तो सारी वस्तुएँ स्पष्ट दीखने लगती हैं, ये सारी वस्तुएँ उसके सर्वत्र फैले हुए प्रकाशकी अपेक्षा अति न्यून परिच्छिन्न हैं, इसी प्रकार धर्ममेघ समाधिद्वारा जब रज - तम - मूलक क्लेश और कर्म वासनाओंके मलका पर्दा चित्तसे हट जाता है तो उसके अपरिमित ज्ञानके सर्वत्र फैले हुए प्रकाशमें कोई वस्तु छिपी नहीं रहती । उसका प्रकाश इतना बढ़ जाता है कि जानने योग्य कोई वस्तु अज्ञात नहीं रह सकती I । विषय बहुत न्यून, परिच्छिन्न और ज्ञानका प्रकाश अनन्त अपरिच्छिन्न हो जाता है । ज्ञेय सांसारिक वस्तुएँ उसकी दृष्टिमें अल्प अर्थात् तुच्छ हो जाती हैं, जैसे प्रकाशमें जुगुनू । श्रीव्यासजी महाराज उसके विषयमें निम्न दृष्टान्त देते हैं— अन्धो मणिमविध्यत्तमनङ्गलिरावयत् । अग्रीवस्तं प्रत्यमुञ्चत्तमजिह्वोऽभ्यपूजयत् ॥ इति ॥ अन्धेने मणियोंको बींधा, बिना अँगुलीवालेने उसमें धागा पिरोया, ग्रीवारहितके गलेमें वह डाली गयी और जिह्वारहितने उसकी प्रशंसा की । अर्थात् जैसे यह वाक्य आश्चर्यरूप जान पड़ता है, ऐसे आश्चर्यरूप दशा योगीकी इस कालमें होती है । सङ्गति — धर्ममेघ समाधिसे क्लेशकर्मोंकी निवृत्ति हो जानेपर भी गुण जो स्वतः ही परिणाम स्वभाववाले हैं, विद्यमान रहते हुए उस पुरुषके लिये शरीर और इन्द्रियोंको क्यों नहीं उत्पन्न करते? इसका उत्तर अगले सूत्रमें देते हैं— ततः कृतार्थानां परिणामक्रमसमाप्तिर्गुणानाम् ॥ ३२ ॥

____ शब्दार्थ — ततः = तब; कृतार्थानाम् = कृतार्थ हुए; गुणानाम् = गुणोंके; परिणामक्रम = परिणामके क्रमकी; समाप्तिः - समाप्ति हो जाती है । अन्वयार्थ — तब कृतार्थ हुए गुणोंके परिणामके क्रमकी समाप्ति हो जाती है । व्याख्या — गुणोंकी प्रवृत्ति पुरुषके भोग अपवर्गके लिये है । जबतक पुरुषके यह दोनों प्रयोजन सिद्ध नहीं हो लेते तबतक वे इसके लिये अपने परिणामके क्रम ( शरीर, इन्द्रिय आदिके आरम्भ ) को जारी रखते हैं । धर्ममेघ समाधिसे क्लेश और कर्मोंकी निवृत्ति होती है । उसके फलस्वरूप रजस् - तमस् गुणोंका आवरण हटनेसे ज्ञान अनन्त ( अपरिमित ) और ज्ञेय अल्प हो जाता है । यह अपरिमित ज्ञान ही प्रकृतिके दोषोंका दिखलानेवाला होनेसे पर - वैराग्यरूप है । उस उत्कृष्ट वैराग्यके बाद गुणोंका जो अनुलोमतया ( सीधे ) सृष्टि - उन्मुख और प्रतिलोमतया ( उलटे ) प्रलय उन्मुख प्रधान- अप्रधान भावसे स्थितिरूप परिणाम हैं, उसके क्रमकी उस पुरुषके प्रति समाप्ति हो जाती है । उस पुरुषके लिये फिर गुण प्रवृत्त नहीं होते । हो जाते भाव यह है कि धर्ममेघ समाधिके पश्चात् जब पुरुषके भोग और अपवर्ग प्रयोजन कृतार्थ सिद्ध अर्थात् हैं, तो इन गुणोंका उस पुरुषके लिये कोई कार्य शेष नहीं रहता । इस कारण उसकी इसी ओरसे प्रयोजनको सिद्ध पूरा करके अपना परिणाम - क्रम समाप्त कर देते हैं और दूसरे पुरुषोंके कर्तव्य करनेमें लगे रहते हैं ( २ । २२ ) । ( ५ ९ ० )

पृष्ठ 628

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 628 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सूत्र ३३ ] क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिग्रह्यः क्रमः * * [ कैवल्यपाद सङ्गति - क्रमका स्वरूप बताते हैं-क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमः ॥ ३३ ॥

शब्दार्थ – क्षण - प्रतियोगी- क्षणोंकी सम्बन्धी – प्रतिक्षण होनेवाली; परिणाम - अपरान्त-निर्ग्राह्यः = परिणामकी समाप्तिपर ग्रहण करने योग्य ( जो गुणोंकी अवस्थाविशेष है वह ); क्रमः - क्रम कही जाती है । अन्वयार्थ – प्रतिक्षण होनेवाली परिणामकी समाप्तिपर जानी जानेवाली ( गुणोंकी अवस्थाविशेषका नाम ) क्रम है । व्याख्या- - क्षणोंकी निरन्तर ( परम्पराके ) धाराके आश्रित जो परिणामोंकी निरन्तर परम्परा है, उसको परिणामक्रम कहते हैं अर्थात् क्षण - क्षणमें जो प्रत्येक वस्तुमें परिणाम होता रहता है; उसको क्रम कहते हैं । परिणाम इतना सूक्ष्म होता है कि ग्रहण नहीं हो सकता । वह होते - होते अन्तमें स्थूलरूप होनेपर दिखलायी देने लगता है । जैसे वस्त्र कितना ही सुरक्षित क्यों न रखा जाय, एक समयपर इतना जीर्ण हो जाता है कि हाथ रखनेसे फटने लगता है । यह परिणामका क्रम उसी समय नहीं हुआ बल्कि प्रत्येक क्षणमें होता रहा है । परन्तु इतने सूक्ष्मरूपमें हो रहा था कि देखा नहीं जा सकता था, अन्तमें बहुत - से परिणामोंका स्थूलरूपमें होनेपर वह दिखलायी देने लगा । यही गुणोंके धर्मपरिणाम और लक्षण - परिणामका क्रम है । अर्थात् परिणामोंकी जो आगे - पीछेकी एक धारा या सिलसिला है वह क्रम है । किसी क्रमका आरम्भ एक विशेष क्षणमें होता है और समाप्ति एक दूसरे क्षणमें । पहले क्षणको, जहाँसे क्रम आरम्भ होता है, पूर्वान्त और अन्तिम क्षणको, जहाँ यह क्रम समाप्त होता है, अपरान्त कहते हैं । यह क्रम धर्म, लक्षण और अवस्था – तीनों परिणामोंमें पाया जाता है । ऊपर वस्त्रके उदाहरणसे बताया है कि अवस्था - परिणामका क्रम सूक्ष्मरूपसे होता हुआ दिखायी नहीं देता है । उसका अन्तिम फल ही प्रत्यक्ष होता है । धर्म और लक्षण - परिणामका क्रम भी जो दिखलायी देता है वह भी कई परिणामोंका स्थूलरूप ही है; जो क्रम प्रत्येक क्षणमें सूक्ष्मरूपसे होता रहता है, वह इनमें भी साक्षात् नहीं दिखायी देता । यह परिणाम - क्रम गुणोंमें बराबर होता रहता है यदि यह शङ्का हो कि गुण तो नित्य हैं, उनमें परिणाम कैसे हो सकता है? उसका समाधान करते हैं । अतीतावस्थासे शून्य होनामात्र ही नित्यका सामान्य लक्षण है न कि अपरिणामी होना । इसलिये नित्यता दो प्रकारकी होती है— एक कूटस्थ नित्यता, दूसरी परिणामी नित्यता । १ कूटस्थ नित्यता – स्वरूपसे सदा एक बना रहना और किसी प्रकारका परिणाम न होना । यह पुरुषकी नित्यता है, जिसमें वह सदैव एक रूपमें बना रहता है और उसमें कोई परिणाम नहीं होता । २ परिणामी नित्यता – अवस्थासे परिणाम होता रहना, स्वरूपसे सदा एक बने रहना । यह परिणामी नित्यता गुणोंकी है । गुण परिवर्तनको प्राप्त होते हुए भी स्वरूपसे नष्ट नहीं होते हैं । उन नित्य परिणामोंकी कोई अन्तिम सीमा नहीं प्रतीत होती 1 । जहाँ सीमा प्रतीत होती है वह अन्य धर्मियोंकी धर्मी गुणोंके अनित्य हैं, जैसे बुद्धि, इन्द्रिय, तन्मात्रा, पाँचों भूत, शरीर आदि । है जो अब यह शङ्का होती है कि स्थिति और गति अर्थात्सृष्टि- -प्रलय प्रवाहरूपसे जो गुणोंमें वर्तमान संसारक्रम है, इस क्रमकी समाप्ति होती है या नहीं? यदि समाप्ति है कि ‘ गुणोंके परिणामकी कोई अन्तिम सीमा नहीं ' इसका खण्डन मानी होता जाय है और तो यदि ऊपर समाप्ति जो कहा गया न मानी ( ५ ९ १ )

पृष्ठ 629

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 629 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

कैवल्यपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ३३ जाय तो पूर्व सूत्रमें गुणोंके क्रमकी समाप्ति क्यों कही? इस शङ्काके निवारणार्थ भाष्यकारोंने यह कहा है कि यह प्रश्न एकान्त वचनीय नहीं है अर्थात् एक बार ही ' हाँ ' अथवा ' ना ' में उत्तर देने योग्य नहीं है किंतु अवचनीय है । प्रश्न तीन प्रकारके होते हैं-१ एकान्त वचनीय — जो नियमसे एक ही समाधानद्वारा उत्तर देने योग्य है । २ विभज्य वचनीय — जो विभागपूर्वक उत्तर देने योग्य है ३ अवचनीय – जिसका उत्तर एकान्तरूपसे एक प्रकारसे कहने योग्य नहीं होता । जैसे ‘ क्या सब जगत् जो उत्पन्न हुआ है मरेगा '? उत्तर — ' हाँ अवश्य मरेगा ' । यह एकान्त बचनीय अर्थात् एक ही उत्तर देनेकी योग्यतावाला है । ' क्या जो - जो मरेगा वह सब उत्पन्न होगा ' । उत्तर — ‘ केवल जिसको विवेकज्ञान उदय हो गया है और जो तृष्णारहित हो गया है वह उत्पन्न न होगा अन्य उत्पन्न होगा ' । मनुष्यजाति उत्तम है या नहीं? ' उत्तर – ' मनुष्य जाति पशुओंसे उत्तम है, देवताओं - से उत्तम नहीं है । ' यह -विभज्य - वचनीय है । ‘ यह संसार अन्तवान् है या अनन्त है? ' यह अवचनीय है । क्योंकि दोनोंमेंसे एक विशेष कहने योग्य नहीं है । परंतु आगमप्रमाण ( शब्दप्रमाण ) से इसका उत्तर यह है कि ज्ञानियोंके संसार - क्रमकी समाप्ति है, अर्थात् ज्ञानियोंका संसार अन्तको प्राप्त होता है, अज्ञानियोंको नहीं होता । ज्ञानी संसारक्रमके समाप्त होनेपर अर्थात् संसारके अन्त होनेपर मुक्त हो कैवल्यपदको प्राप्त होते हैं । टिप्पणी — भोजवृत्तिमें यह सूत्र कुछ पाठान्तरके साथ लिखा गया है, इसलिये इस सूत्रको भोजवृत्तिके

अर्थसहित पाठकोंकी जानकारीके लिये देते हैं ।

क्षणप्रतियोगी परिणामोऽपरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमः ॥ ३३ ॥

उक्त क्रमका लक्षण कहते हैं— भोजवृत्तिका भाषानुवाद ॥ सूत्र ३३ ॥ सबसे छोटे कालका नाम क्षण है, ( क्षण भी क्रियात्मक और शब्दबोधात्मक परिणाम ही है । ) उस क्षणका जो प्रतियोगी ( निरूपक ) क्षणसे भिन्न परिणाम है, वह गुणोंका क्रम है । जाने हुए क्षणोंमें पीछे जोड़ लगानेसे ही वह ग्रहण किया जाता है । बिना जाने हुए क्षणोंके उनमें क्रम नहीं जाना जा सकता, इससे उसे ‘ अपरान्तनिर्ग्राह्य ' कहा है । विशेष वक्तव्य - ॥ सूत्र ३३ ॥ श्रीविज्ञान भिक्षु आदि सूत्रमें ' परिणामापरान्त ' पाठ मानते हैं श्रीरामानन्द यति कुछ विभिन्न व्याख्यान करते हैं । वे क्षणप्रतियोगी शब्दका षष्ठी समास नहीं, किन्तु ' क्षणौ प्रतियोगिनौ निरूपकौ यस्य, असौ बहुव्रीहि करते हैं ( वही ठीक मालूम होता है ) अर्थात् क्षणप्रतियोगी ' । क्षण हैं निरूपक बतलानेवाले जिसके, वह क्षणप्रतियोगी है । क्षण कलांश ( परिमाणविशेष ) को कहते हैं । क्षणोंमें बुद्धिको समाधिस्थ करके ही क्रम ( देते पूर्वापरभाव हैं— ) जानने योग्य है । इससे यह बता दिया कि क्षणिक परिणाम होता है । उस क्रममें प्रमाण ‘ अपरान्तनिर्ग्राह्यः ’ । कहीं क्रम प्रत्यक्ष और कहीं अनुमेय है । मृत्तिकामें पिण्ड, घट, कपाल, चूर्ण पूर्वोत्तर अवधिके कणरूपी प्रत्यक्ष परिणाम होते हैं । उनका पूर्वान्त पिण्ड है और अपरान्त कण है । इनमें है ऐसा क्रम ज्ञानसे क्रम, निश्चितरूपसे गृहीत होता है, अर्थात् मृत् पिण्डके अनन्तर घट होता ( ५ ९ २ )

पृष्ठ 630

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 630 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति * [ कैवल्यपाद सूत्र ३४ ] * प्रत्यक्ष है । अच्छे प्रकार रखा हुआ वस्त्र भी पुराना पड़ जाता है । वस्त्रमें पुरानापन एक बार तो आता नहीं, किंतु क्षण - क्षणमें पूर्वान्त नवीनतासे लेकर पुराणता होती रहती है । अर्थात् नवीन होनेके बाद अत्यन्त सूक्ष्म पुराणता, फिर सूक्ष्म पुराणता इत्यादिरूपसे पुराणता होती रहती है । वहाँपर क्रम अनुमान करने योग्य है । यह क्रम नित्य और अनित्य दोनों प्रकारके पदार्थोंमें होता है । नित्य दो प्रकारके हैं । एक — कूटस्थ नित्य होते हैं जैसे – पुरुष । द्वितीय – परिणामी नित्य होते हैं, जैसे सत्त्वादि गुण । धर्म, लक्षण, अवस्था- - -इन तीनों प्रकारों ( तृतीय पादके १३ वें सूत्रोक्त ) से परिणाम होनेपर भी, धर्मीमें स्वरूपका नाश न होना ' परिणामी नित्यता ' है । एक धर्मको छोड़ धर्मान्तरको ग्रहण करना ' परिणाम ' है 1 अनित्य बुद्धि आदि धर्मियोंमें जो क्रम है, वह अवधिसहित है । बुद्धिमें रागादि परिणाम ' पूर्वान्त ' और पुरुषका प्रत्यक्ष करना ‘ अपरान्त ' क्रम है । परिणामी नित्य गुणोंमें परिणामका क्रम, अवधि ( हद ) से रहित है । क्योंकि मुक्त पुरुषोंके प्रति गुणोंका परिणाम न होनेपर भी बद्ध जीवोंके प्रति होता ही रहता है I प्रश्न – सब जीव मुक्त हो सकते हैं या नहीं? यदि हो सकते हैं, तो प्रकृति ( गुणों ) का परिणाम अवधिसे रहित मानना ठीक नहीं और नहीं हो सकते तो तत्त्वज्ञानमें किसे विश्वास होगा अर्थात् तत्त्वज्ञान होनपर भी यदि नहीं हो सकते तो तत्त्वज्ञानमें विश्वास उठ जायगा, विश्वास उठनेसे कोई मुमुक्षु न रहेगा; इत्यादि दोष होंगे । उत्तर- - तीन प्रकारका प्रश्न हो सकता है— एकान्तवचनीय, विभज्यवचनीय, अवचनीय । यदि पहला प्रश्न किया जाय कि क्या सब उत्पन्न हुए मरेंगे? तो यह एकान्तवचनीय है, अर्थात् कहना चाहिये कि हाँ अवश्य मरेंगे । आपका किया हुआ जो दूसरा प्रश्न है, वह ' विभज्यवचनीय ' है अर्थात् विभाग करके उत्तरणीय है — कि जिसे तत्त्वज्ञान होगा, वह मुक्त हो जायगा और जिसे न होगा, वह नहीं । जीव अनन्त हैं, सृष्टि - प्रलय भी अनन्त है । इससे सबकी मुक्ति नहीं हो सकती । तीसरा प्रश्न यह हो सकता है कि प्रकृतिका परिणामक्रम समाप्त होता है या नहीं? इसके उत्तर दो हो सकते हैं - प्रथम यह है कि निश्चित नहीं कर सकते कि समाप्त होता है या नहीं । द्वितीय यह है कि जो ज्ञानी हैं, उनके लिये समाप्त होता है; अन्योंके लिये नहीं | वास्तविक परिणामक्रम परिणामी नित्य गुणोंमें है और पुरुषमें कल्पित है, वस्तुतः नहीं अर्थात् बुद्धिके परिणामोंका आरोप है इत्यादि भाष्यका तात्पर्य है । सङ्गति — गुणोंके परिणामक्रमकी समाप्तिपर कैवल्य कहा गया है । उसका स्वरूप अगले सूत्रमें बताते हैं-पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति ॥ ३४ ॥

शब्दार्थ – पुरुषार्थशून्यानां गुणानाम् - पुरुष - अर्थसे शून्य हुए गुणोंका; प्रतिप्रसवः = अपने कारणमें लीन हो जाना; कैवल्यम् - कैवल्य है; वा = अथवा; स्वरूप - प्रतिष्ठा = अपने स्वरूपमें चितिशक्तिः = चितिशक्तिका ( कैवल्य है ); इति = और यह पाद तथा योगशास्त्र समाप्त अवस्थित हो जाना; होता है । अन्वयार्थ – पुरुषार्थसे शून्य हुए गुणोंका अपने कारणमें लीन हो जाना कैवल्य है शक्तिका अपने स्वरूपमें अवस्थित हो जाना कैवल्य है । अथवा चिति — गुणोंकी प्रवृत्ति पुरुषके भोग - अपवर्गके लिये है । इसलिये भोग व्याख्या-है । इसी पुरुषार्थके लिये गुण शरीर, इन्द्रिय, बुद्धि आदिमें परिणत और अपवर्ग ही पुरुषार्थ सिद्ध हो गया उसके प्रति इनका कोई कार्य शेष नहीं रहता । तब हो उस रहे पुरुषके हैं । जिस पुरुषका यह प्रयोजन भोग तथा अपवर्गरूप ( ५ ९ ३ )