पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 631–640
पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 631–640
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कैवल्यपाद ] * पातञ्जलयोग - प्रदीप* [ सूत्र ३४ पुरुषार्थके सम्पादनसे कृतार्थ हुए पुरुषार्थ - शून्य कार्य - कारण - स्वरूप गुण प्रतिप्रसवको प्राप्त होते हैं अर्थात् प्रतिलोम परिणामसे अपने कारणमें लीन हो जाते हैं । अर्थात् व्युत्थान समाधि और निरोधके लीन हो जाते हैं — मन अहंकारमें, अहंकार बुद्धि ( चित्त ) में और बुद्धि प्रधान प्रकृतिमें लय हो जाती संस्कार है मनमें प्रकार पुरुषका अन्तिम लक्ष्य अपवर्ग सम्पादन करनेके पश्चात् गुणोंके अपने कारणमें लीन हो जानेका नाम कैवल्य । इस अर्थात् गुणोंका उस पुरुषसे अलग होना है । अथवा यों कहना चाहिये कि धर्म चित्तके परिणाम क्रम बनानेवाले गुणोंका अपने कारणमें लीन हो जानेपर चितिशक्ति पुरुषका चित्तसे किसी प्रकारका रहनेपर अपने स्वरूपमें अवस्थित हो जानेका नाम कैवल्य है । इसकी सविस्तर व्याख्या तृतीय पादके सम्बन्ध ५५ वें न सूत्रमें कर दी गयी है । यहाँ यह और जान लेना चाहिये कि जैसे वेदान्तमें अज्ञानकी निवृत्ति और परमानन्दस्वरूप ब्रह्म - प्राप्तिको समकाल होनेपर भी कहीं अज्ञानकी निवृत्तिको जैसे ' भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्ति ' और फिर अन्तमें सारी माया निवृत्त हो जाती है और कहीं ब्रह्मकी प्राप्तिको जैसे ‘ स यो वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति ' ' जो निश्चय उस ब्रह्मको जानता है ब्रह्म ही हो जाता है ' मुक्ति कहा है 1 वैसे ही यहाँपर भी गुणोंका प्रतिप्रसव और चितिशक्तिकी स्वरूपप्रतिष्ठा इन दोनोंके समकाल होनेपर भी तात्पर्यकी एकता होनेसे कैवल्यके दो लक्षण कहे हैं । लक्षणभेदसे कैवल्यका भेद नहीं किया है ।
सम्यग् ज्ञानाधिगमाद् धर्मादीनामकारणप्राप्तौ ।
तिष्ठति संस्कारवशाच्चक्रभ्रमिवद् धृतशरीरः ॥
प्राप्ते शरीरं भेदे चरितार्थत्वात् प्रधानविनिवृत्तौ । ऐकान्तिकमात्यन्तिकमुभयं कैवल्यमाप्नोति ॥ ( सां ० का ० ६७, ६८ ) यथार्थ ज्ञानकी प्राप्तिसे जब कि धर्म आदि अकारण बन जाते हैं, तब पुरुष ( पिछले ) संस्कारके वशसे चक्रके सदृश शरीरको धारण किये हुए ठहरा रहता है । शरीरके छूट जानेपर और चरितार्थ होनेसे प्रधानकी निवृत्ति होनेपर ऐकान्तिक ( अवश्य होनेवाले ) और आत्यन्तिक ( बने रहनेवाले ) दोनों प्रकारके कैवल्यको प्राप्त होता है ।
' इति ' शब्द इस पाद तथा योगशास्त्रकी समाप्तिके लिये लाया गया है ।
भोजवृत्तिका भाषानुवाद । सूत्र ३४ ॥
अब फलरूप मोक्षके सामान्यस्वरूपको कहते हैं— जो सत्त्वादि गुण भोग और मोक्षरूप पुरुषार्थको समाप्त कर चुके उनका जो उलटे उलटे परिणामकी समाप्ति होनेपर क्षणोंमें विकारका पैदा न होना अथवा वृत्तियोंके तुल्यरूपकी निवृत्ति होनेपर चेतनशक्तिका अपने स्वरूपमात्रमें स्थिति करना मोक्ष कहा जाता है, केवल हमारे ही दर्शन ( मत ) में मोक्षावस्थामें पुरुष इस प्रकारका चेतनरूप नहीं होता, किंतु अन्य दर्शनोंमें भी विचार करनेपर स्वरूपावस्थित होता है । जैसे— आत्मा क्षणिक विज्ञान नहीं है— संसारावस्थामें कर्ता, भोक्ता और विचार करनेवाला आत्मा प्रतीत होता है । अन्यथा यदि एक कोई चेतन उस प्रकारका न हो और ज्ञानक्षणोंको ही, जो कि पूर्वापरविचारसे शून्य हैं आत्मा माना जाय तो कर्म और फलका सम्बन्ध नियमपूर्वक नहीं हो सकता और किये हुएकी हानि, नहीं किये हुएकी प्राप्तिरूप दोष भी हो । जिसने शास्त्रोंमें ही कहे हुए कर्मको किया है, वही यदि भोक्ता रहे तो सबकी प्रवृत्ति कल्याणप्राप्तिके लिये दुःखकी निवृत्तिके लिये हो सकती है । ग्रहण करना या छोड़ना विचारसे ही होता है । इससे और ज्ञानक्षणोंको परस्पर भिन्न होनेसे ( पूर्वापर ) विचारशून्यता ( ५ ९ ४ )
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पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति * [ कैवल्यपाद सूत्र ३४ ] * है । यदि कोई उनका अनुसंधान करनेवाला न रहे तो किसीका भी व्यवहार नहीं चल सकता । इससे जो कर्ता, भोक्ता, अनुसंधाता ( विचार करनेवाला अथवा जाननेवाला ) है वह आत्मा है यह व्यवस्था की जाती है । मोक्षावस्थामें केवल चैतन्यरूप ही आत्मा रहता है; क्योंकि मोक्षदशामें तो ग्राह्य - ग्राहकरूप अर्थात् ग्रहण करना आदि सब व्यवहारोंके न रहनेसे केवल चैतन्य ही शेष रहता है । वह चैतन्य, अपने स्वरूपको जाननेसे नहीं है, किंतु स्वरूपसे है; क्योकि विषयोंको ग्रहण करनेकी सामर्थ्य ही चेतनका स्वरूप है । अपने स्वरूपको ग्रहण करना नहीं ( ऐसा ही श्रुति बतलाती है ) । यथा - ' विज्ञातारमरे केन विजानीयात् ' सबके जाननेवाले विज्ञाताको किससे जाना जा सकता है । तथा ' येनेदं सर्वं विजानाति तं केन विजानीयात् ' जिससे ये सब कुछ जाना जाता है उसको किससे जानें? जैसे चेतनसे गृहीत हुई वस्तु ' यह है ' इस प्रकार ग्रहण की जाती है और चेतनका स्वरूप ' अहं ' अर्थात् ' मैं हूँ ' इस प्रकार ग्रहण किया जाता है । आपस में विरुद्ध, बहिर्मुखता और अन्तर्मुखतारूप दो व्यापार एक कालमें नहीं हो सकते तो चेतनस्वरूपसे ही शेष रहता है । इससे मोक्षावस्थामें गुणोंके कार्योंकी समाप्ति होनेपर केवल चैतन्यरूप ही आत्मा रहता है यही ठीक है, और संसारदशामें तो ऐसे ही आत्माको कर्ता, भोक्ता और अनुसंधाता होना सब ठीक है । आत्माका संसारदशा और मुक्ति - अवस्थामें एक ही रूप है । देखिये जो ये प्रकृतिके साथ अज्ञानमूलक भोग्यका भोग करनारूप अनादि स्वाभाविक सम्बन्ध है उसके होनेपर और जो पुरुषार्थ - कर्तव्यतारूप शक्तियोंके होनेसे ( चौथे पादके २३ वें सूत्रोक्त ) प्रकृतिका महान् आदिरूपसे परिणाम है, उसमें संयोग होनेपर जो आत्माका अधिष्ठाता ( स्वामी ) बनना अर्थात् अपने प्रतिबिम्बको समर्पण करनेकी शक्ति अन्तःकरणकी पड़े हुए चेतन प्रतिबिम्बको ग्रहण करनेकी शक्ति रखना, तथा चेतनके सम्बन्धसे बुद्धिमें कर्तृत्व, भोक्तृत्वका निश्चय है, उसीसे स्मृतिपूर्वक व्यवहारोंकी सिद्धि हो जायगी; फिर अन्य तुच्छ कल्पनाओंसे क्या प्रयोजन? ( अर्थात् कोई प्रयोजन नहीं ) यदि इस प्रकारके मार्गको छोड़कर आत्मामें पारमार्थिक कर्तृत्वादि धर्मोंको स्वीकार किया जाय, तो आत्माको परिणामी मानना पड़ेगा । परिणामी और अनित्य माननेपर आत्माका आत्मभाव अर्थात् एकरससे रहना न बनेगा । क्योंकि एक ही समयमें, एक रूपसे, परस्पर विरुद्ध अवस्थाओंका ज्ञाता नहीं हो सकता । जैसे जिस अवस्थामें आत्मामें समवाय, सम्बन्धसे सुख उत्पन्न हुआ, उसी अवस्थामें आत्मामें दुःखका अनुभव करना नहीं हो सकता तो अवस्थाओंके भेद होनेसे अवस्थाओंसे अभिन्न अवस्थावालेका भेद मानना चाहिये । भेद माननेसे परिणामी मानना पड़ेगा और परिणामी माननेपर न आत्मामें आत्मभाव रह सकता है, न नित्यभाव । इसलिये योगाचार्य तथा सांख्याचार्य आत्माका संसार - दशामें और मुक्ति - अवस्थामें एक ही रूप स्वीकार करते हैं आत्मा वृत्ति - ज्ञानसे विलक्षण स्वयंप्रकाश ज्ञान - स्वरूप है । जो वेदान्ती लोग ( उपनिषदों तथा व्यास भगवान्के तात्पर्यको भली प्रकार न समझकर ) चिदानन्दमय होना, आत्माकी मुक्ति मानते हैं उनका मत ठीक नहीं है । क्योंकि आनन्द सुखरूप ही है और सुख सर्वदा ज्ञेय ( जानने योग्य ) रूपसे ही भान होता है और ज्ञेयता बिना ज्ञानके नहीं हो सकती, तो ज्ञान ज्ञेय दो पदार्थोंको माननेसे ( उसके माने हुए ) अद्वैतवादकी हानि होगी । मुक्ति - प्राप्त आत्माको सुखरूप मानना भी ठीक नहीं, क्योंकि ज्ञान, ज्ञेय एक नहीं हो सकते । अद्वैतवादी लोग कर्मात्मा और परमात्माके भेदसे दो प्रकारका आत्मा मानते हैं, तो जिस प्रकारसे कर्मात्माको सुख - दुःखका भोग होता है उसी रूपसे यदि कर्मात्माके तुल्य परमात्माको सुख - दुःखका भोक्ता माना जाय तो परमात्मा परिणामी और अज्ञानी हो जाय । ' ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' आदि ( ५ ९ ५ )
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कैवल्यपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ३४ श्रुतियोंसे परमात्मा ज्ञानस्वरूप ही सिद्ध होता है और जहाँ कहीं आनन्द शब्द ब्रह्मके साथ आया उसको ज्ञान - अर्थमें लेना चाहिये और यदि सुखके अर्थमें लिया जाय तो वह है वहाँ ब्रह्म = सगुण ब्रह्म अर्थात् ईश्वरका बोधक होगा न कि पर - ब्रह्म - शुद्धब्रह्म - निर्गुण ब्रह्म अर्थात् अपर - परमात्माका ब्रह्म = शबल क्योंकि सुख प्रकृतिके सत्त्व गुणमें है और शुद्ध ब्रह्म परमात्मा प्रकृतिसे परे है । और यदि आत्माको साक्षात् , भोग नहीं होता; किन्तु बुद्धिद्वारा आरोपित भोग होता है अर्थात् परमात्मासे प्राप्त भोक्तृत्वको उदासीनरूपसे अधिष्ठाता हुआ स्वीकार करता है । यह माना जाय तो हमारे मतमें ( योगोक्त मतमें ) प्रवेश होगा । आत्मा आनन्द ( सुख ) रूप है, यह पहले ही खण्डन कर दिया । और यदि आत्माको अविद्या स्वभाव माना जाय तो स्वयं स्वभावशून्य होनेसे अर्थात् अपनेमें किसी धर्मके न रहनेसे शास्त्रका अधिकारी कौन रहेगा? क्योंकि सर्वदा मुक्त होनेसे परमात्मा ( शास्त्रका अधिकारी ) नहीं हो सकता, और न अविद्या स्वभाव होनेसे कर्मात्मा ( शास्त्रका ) अधिकारी हो सकता है । तो अधिकारी न होनेसे सब शास्त्र व्यर्थ हो जायँगे । यदि जगत्को अविद्यामय माना जाय तो वह अविद्या किसको है? यह विचार किया जाता है- परमात्माको अविद्या है, यह नहीं कह सकते; क्योंकि वह नित्यमुक्त है और विद्यारूप है अर्थात् चैतन्यरूप है । और न कर्मात्माको अविद्या है क्योंकि बह ( अविद्याके ) स्वयं स्वभावशून्य होनेसे- शशविषाण ( खरगोशके सींग ) के तुल्य होनेसे अर्थात् कल्पनामात्र होनेसे अविद्याके साथ कैसे सम्बद्ध हो सकता है? यदि यह कहा जाय कि विचारमें न आना ही अविद्याका अविद्यापन है अर्थात् जो सूर्यकिरणोंके स्पर्शसे ही नीहार ( बर्फका कुहर ) के तुल्य नष्ट हो जाय वह ' अविद्या ' है, तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि जो वस्तु कुछ काम करती है उसे अवश्य किसीसे भिन्न अथवा अभिन्न कहनी चाहिये । और अविद्याका संसाररूपी कार्यका करना अवश्य ही स्वीकार करना पड़ेगा । उस कार्यके करनेपर भी अनिर्वचनीय अविद्याको माननेसे कोई भी पदार्थ निर्वचनीय न रहेगा तो ब्रह्म भी निर्वचनीय न ठहरेगा अर्थात् सत्य, ज्ञानादिरूपसे उसका निरूपण न हो सकेगा । इससे चैतन्यरूप अधिष्ठातृताके सिवा पुरुषका अन्यरूप सिद्ध नहीं हो सकता अर्थात् वृत्तिज्ञानसे विलक्षण स्वयंप्रकाश ज्ञानस्वरूप आत्मा है । आत्मत्वादि जातियोंसे भिन्न मुक्तात्मा अधिष्ठान चैतन्यरूप है— जो नैयायिक आदि ( गौतम मुनि और कणाद मुनिके अभिप्रायको न जानकर ) बुद्धिके योगसे आत्माको चेतन मानते हैं और बुद्धिको भी मनके संयोगसे उत्पन्न मानते हैं; जैसे कि इच्छा, ज्ञान - प्रयत्नादि जीवात्माके गुण व्यवहारदशामें अर्थात् संसारावस्थामें आत्मा और मनके संयोगसे उत्पन्न होते हैं । उन्हीं गुणोंसे आत्मा स्वयं ज्ञाता, कर्ता, भोक्ता कहा जाता है और मोक्षदशामें तो मिथ्याज्ञानकी निवृत्ति होनेसे मिथ्याज्ञानमूलक राग - द्वेषादि सब गुणोंकी भी निवृत्ति हो जाती है तो आत्माके विशेष गुण अर्थात् ज्ञान, इच्छा, प्रयत्न, सुख, दुःख, द्वेष- - इन सबका अत्यन्त नाश हो जाता है; फिर आत्मा अपने स्वरूपमात्रमें स्थित होता है । यह उनका पक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि मोक्षदशामें नित्यत्व, व्यापकत्व आदि गुण तो आकाशादिकोंके भी रहते हैं, इससे उनसे विलक्षण आत्माका चैतन्यरूप अवश्य अङ्गीकार करना चाहिये । आत्मत्व जातिका सम्बन्ध ही आकाशादिकोंसे विलक्षणता है, यह नहीं कह सकते । क्योंकि आत्मत्व - जातिका योग तो संसारी जीवोंमें भी है ( मुक्तात्माको संसारियोंसे विलक्षण होना चाहिये ) इससे आत्मत्वादि जातियोंसे भिन्नता मुक्तात्माकी अवश्य माननी चाहिये; और वह भिन्नता अधिष्ठानचैतन्यरूप माननेसे ही घट सकती है अन्यथा नहीं । आत्मा ‘ अहम् ’ प्रतीतिका विषय नहीं, किंतु केवल चिद्रूप अधिष्ठाता है— जो मीमांसक लोग ( ५ ९ ६ )
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पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति * [ कैवल्यपाद सूत्र ३४ ] * ( जैमिनि मुनिके सिद्धान्तको ठीक - ठीक न समझते हुए ) आत्माको कर्म - कर्तारूप मानते हैं, उनका पक्ष भी ठीक नहीं है । उनकी प्रतिज्ञा है कि ' अहम् ' ( मैं ) प्रतीति ( ज्ञान ) से ग्रहणके योग्य आत्मा है, ‘ अहम् ’ प्रतीतिमें आत्माको ( आश्रयता - सम्बन्धसे ) कर्तृत्व और ( विषयता - सम्बन्धसे ) कर्मत्व है । पर यह उनका मन्तव्य अयुक्त है I । क्योंकि प्रमातृत्वरूप कर्तृत्व और प्रमेयत्वरूप कर्मत्वका विरोध है ( प्रमाता जाननेवाला, प्रमेय जाननेयोग्य ) अर्थात् जाननेवाला और जाननेयोग्य होना ऐसे विरुद्ध धर्मोंका एक कालमें, एक पदार्थमें समावेश नहीं हो सकता । जो विरुद्ध धर्मोके अधिष्ठान हैं, वे एक नहीं; जैसे — भाव और अभाव । कर्तृत्व, कर्मत्व भी परस्पर विरुद्ध धर्म हैं । यह कहना कि कर्तृत्व और कर्मत्वका विरोध नहीं, किंतु कर्तृत्व और करणत्वका है, ठीक नहीं, क्योंकि विरोधी धर्मोंका अध्यारोप दोनों स्थानोंमें तुल्य होनेसे केवल कर्तृत्व और करणत्वका ही विरोध है, कर्तृत्व - कर्मत्वका नहीं, यह कौन कह सकता है? ( अर्थात् कोई नहीं कह सकता ) । इससे आत्माको अहं प्रतीतिका विषय न मानकर, केवल चिद्रूप अधिष्ठाता ही मानना चाहिये । आत्मा अव्यापक शरीर - तुल्य परिमाणवाला और परिणामी नहीं है— जो द्रव्यबोध पर्यायभेदसे अर्थात् नामान्तर रखकर आत्माको अव्यापक शरीर - तुल्य परिमाणवाला और परिणामी मानते हैं, उनका पक्ष तो उठकर ही मरा हुआ है अर्थात् बिलकुल ही निकम्मा है; क्योंकि परिणामी मानने से चेतन कहाँ रहा वह तो जडरूप हो गया । ( जो परिणामी है, वह अचेतन है यह व्याप्ति है ) जड माननेपर आत्मामें क्या आत्मभाव रहा इससे अधिष्ठातृतारूप चैतन्य ही आत्मा है । आत्मामें साक्षात् कर्तृत्व धर्म नहीं है— कोई कर्तारूप ही आत्माको मानते हैं । जैसे — घटादि विषयोंके समीप होनेपर, जो ज्ञानरूप क्रिया उत्पन्न होती है, उस क्रियाका विषय संवेदन अर्थात् विषयोंका प्रकाशरूपी फल है । उस फलमें फलका स्वरूप प्रकाश - रूपसे भासित होता है और विषय ग्राह्यरूपसे तथा आत्मा ग्राहकरूपसे; क्योंकि ' घटमहं जानामि ' ( घटको मैं जानता हूँ ) इस आकारसे वह फल उत्पन्न होता है । क्रियाका कारण कर्ता ही है, इससे कर्तृत्व और भोक्तृत्व आत्माका ही रूप है । यह पक्ष भी युक्ति - युक्त नहीं । ( क्योंकि इन विकल्पोंका उत्तर नहीं बन सकता ) यह बताओ कि संवित्तिरूप फलोंका कर्ता आत्मा एक कालमें ही होता है अथवा क्रममें? एक किसी कालमें सबोंका कर्ता मानो तो अन्य क्षणोंमें कर्ता नहीं रहेगा ( तो आत्माको कर्ता मानना ठीक नहीं ) और क्रमसे कर्ता होना भी एकरूप आत्माका नहीं घट सकता; क्योंकि यदि उसे एक रूपसे ही कर्ता माना जाय तो वह सर्वदा ( व्यापक होनेसे ) पास तो है ही, सब फल भी एकरूप होने चाहिये । और यदि अनेकरूपसे कर्ता माना जाय तो परिणामी होनेसे चिद्रूप नहीं हो सकता । इससे सिद्ध हुआ कि आत्माको चैतन्यरूप माननेवालोंको आत्मामें साक्षात् कर्तृत्व धर्म नहीं मानना चाहिये, किंतु कूटस्थ, नित्य, चिद्रूप आत्माका कर्ता होना जैसा हमने प्रतिपादन किया है, वह ही ठीक है । जो ऐसा मानते हैं कि विषयोंके ज्ञान अथवा प्रकाश द्वारा आत्मामें ग्राहकता - शक्ति प्रकट हो जाती है, उनका पक्ष भी उक्त विकल्पोंसे खण्डित जानना चाहिये । आत्मा विमर्शरूपसे चेतन नहीं है । कोई विमर्शरूपसे आत्माको चेतन मानते हैं, वे कहते हैं कि बिना विमर्श ( विचार ) के आत्माको चेतनरूप नहीं बतला सकते । चैतन्यरूप जगत्से भिन्न है; पर, विचारके सिवा अन्यथा उसकी स्थिति नहीं हो सकती ( अर्थात् विचाररूप ही है ) । यह पक्ष भी अयुक्त है; क्योंकि विचारका नाम ‘ विमर्श ' है । वह बिना अस्मिता ( द्वितीय पादके ६ सूत्रोक्त ) के नहीं हो सकता । ( ५ ९ ७ )
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कैवल्यपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ३४ क्योंकि आत्मा ( अन्तःकरण ) में पैदा होनेवाला विमर्श ' अहमेवंभूतः ' ‘ मैं ऐसा हूँ ' इस आकारसे और इस प्रतीतिमें अहं शब्दसे भिन्न आत्म - रूपी अर्थका प्रकाश होनेसे विकल्पस्वरूपता अर्थात् जाना जाता है । भिन्नता है । स्वभावसिद्ध निश्चयात्मक ज्ञान बुद्धिका धर्म है, चेतनका नहीं; क्योंकि कूटस्थ नित्य होनेसे यथार्थज्ञानसे एकरूप रहता है । चितिको नित्य होनेसे ही अहंकारमें अन्तर्भाव नहीं कर सकते । इससे आत्माको विचाररूप चैतन्य सिद्ध सदा करनेवालेने बुद्धिको ही आत्मा भ्रान्तिसे समझ लिया है । प्रकाशरूप आत्माके स्वरूपको नहीं समझा । सब दर्शनोंमें आत्माका अधिष्ठातृतारूप ही और वृत्तियोंके सदृश रूपोंको छोड़कर स्वरूपमें स्थित होना ही चिति - शक्तिका कैवल्य सिद्ध हो सकता है । इस प्रकार सब दर्शनोंमें ही अधिष्ठातृताकोछोड़कर आत्माका अन्य रूप नहीं बन सकता । जडसे भिन्न चैतन्यरूपता ही ' अधिष्ठातृता ' है । जो चित्तरूपसे अधिष्ठान करता है, वह ही ( बुद्धिको ) भोग्य बनाता है । और जो चेतनसे अधिष्ठित है वह सब कामोंके योग्य होता है । इस प्रकार आत्माको नित्य माननेसे प्रकृतिके व्यापारकी निवृत्ति होनेपर जो आत्माका मोक्ष हमने वर्णन किया है उसे छोड़कर अन्य मतोंकी कोई गति नहीं । इससे यह युक्ति - युक्त कहा है कि वृत्तियोंके सदृश रूपोंको ( जो कि प्रतिबिम्बित होते रहते हैं ) छोड़कर अपने स्वरूपमें स्थित होना चितिशक्तिका कैवल्य ( मुक्ति ) है । नोट — यहाँ यह न समझना चाहिये कि वृत्तिकारने अन्य दर्शनोंका खण्डन किया है, किंतु ' अन्य शास्त्रोंमें ऐसी ही मुक्ति बन सकती है ' यह सिद्धकर कैवल्य ( मुक्ति ) के स्वरूपका निरूपण किया है 1 । विशेष जानकारीके लिये भूमिकारूप ' षड्दर्शन - समन्वय ' में देखें । उपसंहार उक्त प्रकारसे ( इस पादमें ) अन्य सिद्धियोंसे भिन्न सब सिद्धियोंकी मूल समाधि - सिद्धिको कहकर अन्य जातिमें परिणामरूप सिद्धिकी प्रकृतिकी पूर्णता कारण है, यह सिद्ध कर; धर्माधर्मकी प्रतिबन्धकको हटाने मात्रमें शक्ति है; यह दिखाकर सिद्धिजन्य पाँचो चित्तोंका अस्मितामात्रसे होना बतलाकर, ( सूत्र ४ के विशेष वक्तव्यमें ) एक समयमें भोगनिवृत्तिके लिये बहुत - से चित्तों और शरीरोंकी अस्मितामात्रसे उत्पत्ति बतलानेवाले शब्दोंके प्रामाणिक होनेमें जो संदेह उत्पन्न होते हैं उनको दिखलाकर सूत्र ४ की प्रसङ्गानुसार व्याख्या कर, पाँच प्रकारकी सिद्धियोंसे उत्पन्न हुए निर्माण चित्तोंमेंसे समाधिजन्य चित्तको अपवर्गका भागी बतलाकर, योगीके कर्मोंकी, लौकिक कर्मोंसे विचित्रताको सिद्धकर, कर्मलफलानुकूल वासनाओं ( संस्कारों ) के प्रकट होनेको समर्थनकर, कार्य - कारणकी एकता सिद्ध करनेसे व्यवधान ( बीच ) युक्त वासनाओंकी समीपताको सिद्धकर, वासनाओंके अनन्त होनेपर भी, हेतु - फलादिद्वारा उनका नाश बताकर, भूतादि कालोंमें घटादि धर्मोकी स्थितिको उपपादन कर, विज्ञानवादियोंकी शङ्काओंको निवृत्तकर, चित्तद्वारा पुरुषको ज्ञाता माननेसे सब व्यवहारोंकी सिद्धिको निरूपणकर, पुरुषके होनेमें प्रमाण दिखाकर, मुक्तिके निर्णयके लिये दस सूत्रोंसे, क्रमसे उपयोगी अर्थोंको कहकर, अन्य शास्त्रोंमें भी ‘ ऐसी ही मुक्ति बन सकती है ' यह सिद्धकर, मुक्तिके स्वरूपका निर्णय किया । इस प्रकार पातञ्जलयोगप्रदीपमें कैवल्य नामवाले चौथे पादकी व्याख्या समाप्त हुई । इति पातञ्जलयोगप्रदीपे कैवल्यपादः चतुर्थः ( ५ ९ ८ )
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परिशिष्ट १ ] * मूल सूत्र * [ पातञ्जलयोगप्रदीप मूल सूत्र पृष्ठ पृष्ठ ११ - अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः तत्त्वसमास सांख्यसूत्र १६५ ७७ | १२ - अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः १६७ १- अथातस्तत्त्वसमासः १३ - तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः २ - अष्टौ प्रकृतयः १६८ ७८ ७८ १४ - स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारा-३ - षोडश विकाराः सेवितो दृढभूमिः १६ ९ ८० ४ - पुरुषः ८५ | १५ - दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकार-५ - त्रैगुण्यम् संज्ञा वैराग्यम् ६ - संचरः प्रतिसंचरः १७० ८ ९ १६ - तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् १७२ ७ - अध्यात्ममधिभूतमधिदैवं च ९ ० ९ १ | १७ - वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात् ८ - पञ्चाभिबुद्धयः ९ - पञ्च दृग्योनयः सम्प्रज्ञातः १७३ ९ १ १८ - विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः १८० ९ २ .... १०- पञ्च वायवः ९ २ | १ ९ - भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् १८७ ११ - पञ्च कर्मात्मानः ९ २ | २० - श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक १२- पञ्चपर्वा अविद्या इतरेषाम् १३ - अष्टाविंशतिधाऽशक्तिः १ ९ ५ ९ ३ ९ ३ २१ - तीव्रसंवेगानामासन्नः १४ - नवधा तुष्टिः १ ९ ७ ९ ५ | २२ - मृदुमध्याधिमात्रत्वात्ततोऽपि विशेषः १५ - अष्टधा सिद्धिः १ ९ ७ ९ ६ २३ - ईश्वरप्रणिधानाद्वा १६ - दश मौलिकार्थाः १ ९ ८ २४ - क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः १७ - अनुग्रहः सर्गः ९ ७ पुरुषविशेष ईश्वरः १८ - चतुर्दशविधो भूतसर्गः १ ९ ८ ९ ७ २५ - तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम् १ ९- त्रिविधो बन्धः २०२ १०० २६ - पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् २० - त्रिविधो मोक्षः .... २०४ १०० २१ - त्रिविधं प्रमाणम् २०६ १०७ २७ - तस्य वाचकः प्रणवः .... २८ - तज्जपस्तदर्थभावनम् २२ - एतत् सम्यग्ज्ञात्वा कृतकृत्यः स्यात् । २० ९ न पुनस्त्रिविधेन दुःखेनाभिभूयते १०७ | २ ९ - ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च २१६ पातञ्जलयोगसूत्र ३० - व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्ति-अथ समाधिपादः – १ दर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि १ - अथ योगानुशासनम् चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः .... १३ ९ २१७ २ - योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः १४६ | ३१ - दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा ३ - तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् विक्षेपसहभुवः १५३ २१८ ४- -वृत्तिसारूप्यमितरत्र १५४ ३२- तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः २१ ९ ५ - वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः १५५ | ३३ - मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्या-६ - प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः पुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम् १५६ २२२ ७ - प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि १५६ ३४ - प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य २२५ ८ - विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् १६० | ३५ - विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः ९ - शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः १६२ स्थितिनिबन्धिनी २४ ९ १० - अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा १६३ | ३६ - विशोका वा ज्योतिष्मती २५१ ( ५ ९९ )
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पातञ्जलयोगप्रदीप ] * मूल सूत्र * [ परिशिष्ट १ पृष्ठ ३७ - वीतरागविषयं वा चित्तम् १० - ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः ... २५३ ३८- स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा .... २५३ ११ - ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः ३ ९ - यथाभिमतध्यानाद्वा १२ - क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्म-२५४ ४० - परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः २५४ वेदनीयः ४१ - क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु १३ - सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः तत्स्थतदञ्जनता समापत्तिः .... २५५ | १४ ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्य-४२ - तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा हेतुत्वात् सवितर्का समापत्तिः २५५ | १५ - परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्ति-४३ - स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थ-विरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः मात्रनिर्भासा निर्वितर्का २५७ | १६ - हेयं दुःखमनागतम् ४४- एतयैव सविचारा निर्विचारा च १७ - द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः सूक्ष्मविषया व्याख्याता २५ ९ | १८ - प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं ४५ - सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम् भोगापवर्गार्थं दृश्यम् २६० ४६ - ता एव सबीजः समाधिः १ ९ - विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि २६३ ४७ - निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः २६४ गुणपर्वाणि ४८ ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा २० - द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः २६५ ४ ९- श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया २१ - तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा विशेषार्थत्वात् २६६ | २२ - कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्य-५० - तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी २६६ साधारणत्वात् ५१ - तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः २३ - स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धि-समाधिः हेतुः संयोगः २६७ .... इति श्रीपातञ्जले योगशास्त्रे समाधिनिर्देशो नाम २४- तस्य हेतुरविद्या २५ - तदभावात्संयोगाभावो हानं तद् प्रथमः पादः ॥ १ ॥
दृशेः कैवल्यम् -२६ - विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः अथ साधनपादः--२ -१- तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः .... २७५ | २७ - तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञाः २ - समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च २८१ | २८ - योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञान-२८२ दीप्तिराविवेकख्यातेः ३ - अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः २ ९ - यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणा-४ - अविद्याक्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनु-ध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि विच्छिन्नोदाराणाम् २८३ ३० - अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः ५ - अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचि-३१ - जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सुखात्मख्यातिरविद्या .... २८६ सार्वभौमा महाव्रतम् ६ - दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता २८७ ३२ - शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वर-२८८ ७- सुखानुशयी रागः प्रणिधानानि नियमाः ८ - दुःखानुशयी द्वेषः २८ ९ ३३ - वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् ९ - स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढो-२८ ९ | ३४ - वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता ऽभिनिवेशः ( ६०० ) पृष्ठ २ ९ ० २ ९ १ २ ९ २ २ ९ ३ २ ९ ७ २ ९ ८ ३०० ३०१ .... ३०६ ३१५ ३२ ९ ३३६ ३३७ ३३८ ३४५ ३४८ ३४ ९ ३५२ ३५४ ३५५ ३६८ .... ३७३ ३८५ ४१४
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परिशिष्ट १ ] * मूल सूत्र * [ पातञ्जलयोगप्रदीप पृष्ठ पृष्ठ ६- तस्य भूमिषु विनियोगः लोभक्रोधमोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा ४८१ ४१५ | ७ - त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् .... ४८४ .... .... ४१६ | ८ - तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य ३५ - अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्संनिधौ वैरत्यागः ४८५ .... ४१७ | ९ - व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ ३६- सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् ४१७ निरोधक्षणचित्तान्वयो निरोधपरिणामः ४८६ ३७ - अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् १० - तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् ३८ - ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ४८८ .... ४१८ ११ - सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य ३ ९ - अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासम्बोधः .... ४१८ समाधिपरिणामः ४८८ ० - शौचात्स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः ४१८ १२ - ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ ४१ - सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रिय-चित्तस्यैकाग्रतापरिणामः ४८ ९ जयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च ४१ ९ १३ - एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा ४२ - संतोषादनुत्तमसुखलाभः ४१ ९ ४८ ९ ४१ ९ ४३ - कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः व्याख्याताः ४२० | १४ - शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी.... ५०१ ४४ - स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः १५ - क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुः ४५ - समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ४२० ५०७ १६ - परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम् ४६ - स्थिरसुखमासनम् ४२० ५० ९ .... ४३ ९ | १७ - शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात् संकरस्तत्प्र-४७ - प्रयत्नशैथिल्यानन्त्यसमापत्तिभ्याम् .... विभागसंयमात्सर्वभूतरुतज्ञानम् ४८ - ततो द्वन्द्वानभिघातः ४४० ५० ९ .... .... ४ ९ - तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः १८ - संस्कारसाक्षात्करणात्पूर्वजातिज्ञानम् ५१८ .... १ ९ - प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम् .... ४४० ५१ ९ प्राणायामः २० - न च तत्सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात् ५१ ९ ५० - बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः .... परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः ४४१ | २१ - कायरूपसंयमात्तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे .... ५१ - बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः चक्षुःप्रकाशासम्प्रयोगेऽन्तर्धानम् ४५२ .... ५२० .... ५२ - ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ४५४ २२ - सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म तत्संयमादपरान्त ... ५३ - धारणासु च योग्यता मनसः ४५४ ज्ञानमरिष्टेभ्यो वा ५२० ५४ - स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्य स्वरूपानुकार २३ - मैत्र्यादिषु बलानि ५२१ इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः ४५५ २४ - बलेषु हस्तिबलादीनि ५२२ ५५ - ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ४५५ | २५ - प्रवृत्त्यालोकन्यासात्सूक्ष्मव्यवहित-इति श्रीपातञ्जले योगशास्त्रे साधननिर्देशो विप्रकृष्टज्ञानम् ५२२ नाम द्वितीयः पादः ॥ २ ॥
२६ - भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात् .... ५२२ २७ - चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम् ५२८ अथ विभूतिपादः -२ २८ - ध्रुवे तद्गतिज्ञानम् ५२ ९ १- देशबन्धश्चित्तस्य धारणा २ ९ - नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम् ५२ ९ ४७८ २ - तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ४७८ ३० - कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः ५२ ९ ३ - तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्य-३१ - कूर्मनाड्यां स्थैर्यम् ५२ ९ मिव समाधिः ४७८ ३२ - मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम् ५३० ४- त्रयमेकत्र संयमः ४८० ३३ - प्रातिभाद्वा सर्वम् .... ५३० .... ४८० | ३४ - हृदये चित्तसंवित् ५ - तज्जयात्प्रज्ञालोकः .... ५३० ( ६०१ )
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पातञ्जलयोगप्रदीप ] * मूल सूत्र * [ परिशिष्ट १ पृष्ठ पृष्ठ ३५ - सत्त्वपुरुषयोरत्यन्तासंकीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो भोगः ५५ - सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यमिति ५५३ परार्थान्यस्वार्थसंयमात्पुरुषज्ञानम् इति श्रीपातञ्जले योगशास्त्रे विभूतिनिर्देशो .... ५३१ ३६ - ततः प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वादवार्ता नाम तृतीयः पादः ॥ ३ ॥
जायन्ते ५३२ ३७ - ते. समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः अथ कैवल्यपादः -४ ५३३ ३८ - बन्धकारणशैथिल्यात्प्रचारसंवेदनाच्च १ - जन्मौषधिमन्त्रतपः समाधिजाः सिद्धयः .... ५५५ चित्तस्य परशरीरावेशः ५३३ | २ - जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात् .... ५५६ ३ ९ - उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग ३ - निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु उत्क्रान्तिश्च ... ५३४ ततः क्षेत्रिकवत् ५५७ ४० - समानजयाज्ज्वलनम् ४ - निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात् ५४० ५५८ ४१ - श्रोत्राकाशयोः सम्बन्धसंयमाद् दिव्यं ५ - प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम् ५६० .... श्रोत्रम् ५४० ६ - तत्र ध्यानजमनाशयम् .... ५६० .... ४२ - कायाकाशयोः सम्बन्धसंयमाल्लघु-७ - कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम् ५६१ .... तूलसमापत्तेश्चाकाशगमनम् ५४० | ८ - ततस्तद्विपाकानुगुणानामे-.... ४३ - बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः वाभिव्यक्तिर्वासनानाम् ५६२ प्रकाशावरणक्षयः ९ - जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं ५४१ ४४ - स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद् स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात् ५६२ १०- तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात् भूतजयः ५४१ ५६३ ४५ - ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः काय-११ - हेतुफलाश्रयालम्बनैः संगृहीतत्वा-सम्पत्तद्धर्मानभिघातश्च देषामभावे तदभावः ५४४ ५६७ १२- अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्व-४६ - रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि भेदाद्धर्माणाम् कायसम्पत् ५४५ ५६८ ४७ - ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्व-१३ - ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः ५७० ५४६ | १४ - परिणामैकत्वाद्वस्तुतत्त्वम् संयमादिन्द्रियजयः ५७१ .... १५ - वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्तः पन्थाः ४८ - ततो मनोजवित्वं विकरणभावः ५७२ १६ - न चैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं ५४७ प्रधानजयश्च .... तदा किं स्यात् ४ ९ - सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं ५७४ ५४७ | १७ - तदुपरागापेक्षित्वाच्चित्तस्य वस्तु सर्वज्ञातृत्वं च .... ५० - तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम् ५७४ ५४ ९ ज्ञाताज्ञातम् .... १८ - सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तत्प्रभोः ५१ - स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुरुषस्यापरिणामित्वात् .... ५७५ पुनरनिष्टप्रसङ्गात् ५५० .... .... ५७६ १ ९ - न तत्स्वाभासं दृश्यत्वात् ५२ - क्षणतत्क्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम् ५५१ .... २० - एकसमये चोभयानवधारणम् ५७७ ५३ - जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात् .... ५५२ | २१ - चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्गः तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः स्मृतिसंकरश्च .... ५७८ ५४ - तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयमक्रमं .... ५५३ | २२ - चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ चेति विवेकजं ज्ञानम् ( ६०२ )
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परिशिष्ट १ ] ** मूल सूत्र * [ पातञ्जलयोगप्रदीप पृष्ठ पृष्ठ विवेकख्यातेर्धर्ममेघः समाधिः स्वबुद्धिसंवेदनम् ५७ ९ ५८८ ३० - ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः २३ - द्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम् ... ५८ ९ ५८० ३१ - तदा सर्वावरणमलापेतस्य २४ - तदसंख्येयवासनाभिश्चित्रमपि ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयमल्पम् परार्थं संहत्यकारित्वात् ५८ ९ ५८५ ३२ - ततः कृतार्थानां परिणामक्रम-२५- विशेषदर्शिन आत्मभावभावना-समाप्तिर्गुणानाम् विनिवृत्तिः ५८६ ५ ९ ० ५८७ | ३३ - क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्त-२६ - तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम् .... निर्ग्राह्यः क्रमः २७ - तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः ५ ९ १ ५८७ .... ३४ - पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं २८ - हानमेषां क्लेशवदुक्तम् ५८८ स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति २ ९ - प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा ५ ९ ३ इति श्रीपातञ्जले योगशास्त्रे कैवल्यनिरूपणं नाम चतुर्थः पादः ॥४ ॥
॥ समाप्तं योगदर्शनम् ॥ ( ६०३ )