प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 21–30
प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 21–30
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रयिप्राणनिरूपण तद्ये ह वै तत्प्रजापतिव्रतं चरन्ति ते मिथुनमुत्पादयन्ते ॥ तेषामेवैष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम् ॥१५ ॥
तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्यमनृतं न माया चेति ॥ १६ ॥
॥ इति प्रथमप्रश्नमूलपाठः ॥ १ ॥
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अथ रयिप्राणनिरूपणात्मकः प्रथमः प्रश्नः “ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥ स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा ँ सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥ स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः " ॥ मंगलाचरण रहस्यम् [ विज्ञानभाष्य ] उपनिषत् पुरुष के अनुग्रह से एवं अपने उपनिषत्प्रेमी पाठकों के अनुग्रह से ईश, केन, कठ- इन तीन उपनिषदों का अर्थ समाप्त कर इस चौथे उपनिषत् को प्रारम्भ करने में समर्थहुए हैं । ईशोपनिषत् के प्रारम्भ में हमने बतला दिया है कि उपनिषदों में जीवात्मा का और ईश्वरात्मा का वर्णन है । जीव भी प्रजापति है, ईश्वर भी प्रजापति है । आत्मा, प्राण, पशु - इन तीनों की समष्टि का नाम ही ' प्रजापति ' है जैसा कि पूर्व के उपनिषदों में विशेषरूप से तत्तत्स्थानों में बतला विना प्राण, पशु के दिया गया है । उपनिषत् का प्रधान लक्ष्य यद्यपि शुद्ध आत्मा ही है, तथापि आत्मा अनुपपन्न है, अतएव आत्मा के साथ - साथ गौणरूप से प्राण और पशु का निरूपण भी करना पड़ता है । उपनिषत् जिस दृष्टि से प्रजापति के इन तीन भागों का निरूपण करता है - उस दृष्टि के अनुसार इसके आत्मा, प्राण, प्रजापति - ये तीन विभाग कर सकते हैं । उपनिषत् श्रात्मा का निरूपण करता है । ' यस्मिन् प्राणः पञ्चधा संविवेश ' १ - आदिरूप से आत्मा में रहने वाले पाँच प्राणों का स्वरूप बतलाता है एवं पशुविशिष्ट आत्मा प्राणोपेत प्रजापति का समष्टिरूप से वर्णन करता है । बस, उपनिषत् क्या बतलाता है? - इस प्रश्न का ' आत्मा, प्राण, प्रजापति ' इन तीनों का उपनिषत् स्वरूपनिरूपण करता है-यही उत्तर है । उपनिषदों में इन तीनों तत्त्वों का ज्ञान और विज्ञान दो रूप से निरूपण किया गया है । यही ज्ञानविज्ञान पौराणिक परिभाषा में संचर- प्रतिसंचर नाम से व्यवहृत होते हैं । एक तत्त्व को आधार मानकर अनेक की ओर झुकना ' विज्ञान ' है । अनेक तत्त्वों से एक की ओर जाकर विश्राम करना ' ज्ञान ' है । मूल को आधार मानकर तूलरूप शाखा, प्रशाखा, अनुशाखा, अनुप्रशाखा, पत्र, पुष्प, फल आदि का निरूपण करना विज्ञान है । शाखा प्रशाखादि को लक्ष्य बनाकर तदाधार एक मूलतत्त्व का आश्रय लेना १- मुण्डकोप ० ३।१६ । राजी [ ]
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माष्य रयिप्राणनिरूपण ज्ञान है, ब्रह्म से नानाभावोपेत जगत् की ओर आना विज्ञान है । इसी विज्ञान का स्वरूप बतलाते हुए-' ब्रह्म वेदं सर्वम् ' ' - यह कहा जाता है । यहाँ ब्रह्म उद्देश्य है, विश्व विधेय है । ब्रह्म मूल है- विश्व तूल है । संसार से ब्रह्म की ओर जाना ज्ञान है । ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' - यह श्रुतिवचन इसी ज्ञान के स्वरूप को हमारे सम्मुख उपस्थित करता है । तात्पर्य्यं यही है कि एक से अनेक की ओर थाना विज्ञान है एवं अनेक से एक पर जाना ज्ञान है । ' प्रजापतिस्त्वेवेदं सर्वं यदिदं कि च ३ - यह विज्ञान पक्ष है, ' सर्वमुह्येवेदं प्रजापति: ४ - यह ज्ञानपक्ष है । बस, ब्रह्म के विषय में ये दो ही पक्ष हो सकते हैं । इन दो के अलावा तीसरी स्थिति सर्वथा अनुपपन्न है । जिसने ज्ञानविज्ञानरूप से आत्मा, प्राण, प्रजापति- इन तीनों का स्वरूप जान लिया उसने सब कुछ जान लिया । इसी अभिप्राय से ' ज्ञानविज्ञानाचार्य कहते हैं—
" ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते " - इति ॥
आत्मा को लक्ष्य बनाओ । उससे अक्षर पर आओ, अक्षर से क्षर पर आओ । तद्द्द्वारा संसार में उतरो । इस प्रकार निष्केवल, एकाकी आत्मा से समृद्धिरूप संसार की ओर झुको । यह एक पक्ष है - यही विज्ञान है 1 । संसारस्वरूप जाया, पुत्र, पिता, माता, गृह, वन, कोष, पशु, शरीर आदि का परित्याग करो । अव्यक्त, महान्, विज्ञान, प्रज्ञान आदि को छोडो । छोडते छोडते सर्वपरिग्रहशून्य बनते हुए संसार से बाहर निकलकर पूरे संन्यासी बनते हुए केवल निष्कल - निरञ्जन आत्मरूप रह जाओ - यह दूसरा पक्ष है । यही ज्ञान-मार्ग है । एक मार्ग में संसार का परित्याग है - वही ज्ञानमार्ग है । एक मार्ग में संसार का ग्रहण है - यही विज्ञानमार्ग है । हमारा उपनिषच्छास्त्र विज्ञान को लक्ष्य बनाकर हमें धीरे - धीरे उससे अलग करता हुआ संसार की पुत्र - जाया आदि विभूतियों से अलग करता हुआ उस एकल्ले आत्मतत्त्व की ओर ले जाता है । बस, इसी आधार पर हमने ' उपनिषदों में आत्मा, प्राण, प्रजापति- तीनों का ज्ञानविज्ञानरूप से वर्णन किया है, यह कहा है । प्रवृत्ति उद्देश्य है, निवृत्ति विधेय है । संसार साधन है- विश्वातीत आत्मा साध्य है । अनेक प्रालम्बन हैं । एक प्राप्तव्य वस्तु है । उपनिषत् हमें संसार से, गृहस्थधम्मं से, जाया - पुत्रादि से अलग करता है, अतएव यह गृह्यधर्म नहीं, श्रपि तु, ' वन्यधर्म्म ' है । गृहस्थ के अनन्तर वानप्रस्थ है । तदनन्तर संन्यास है । उपनिषत् संन्यासियों के अनुकूल है । हम गृहस्थियों के लिए प्रतिकूल है । जो गृहस्थी कम्र्मकाण्ड का प्राश्रमधर्मानुकूल पालन करता हुआ क्रमशः वानप्रस्थ का पालन कर संन्यासी बनता हुआ सबको छोड़ - छाड कर जंगल में चला जाता है वही इस वन्य उपनिषसिद्धान्त को प्राप्त करने का अधिकारी है । इसीलिए ऋषियों ने इसे ' आरण्यक ' कहा है । यद्यपि आरण्यक उपनिषत् से पृथक् माना जाता है, परन्तु उपनिषत् के साधक होने से इसका उपनिषत् में ही अन्तर्भाव कर लिया जाता है । ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास - ये चार आश्रम हैं । इन चारों में गृहस्थ और संन्यास उपकारी हैं, ब्रह्मचय्यं उपकारक है । २५ वर्ष का ब्रह्मचर्यं गृहस्थधर्मं का शिक्षण करता है । १- नरसिंहोत्तर ० ७ । ४- शत ० ब्रा ० ५।१।१।४ । २- छान्दोग्योप ० ३।१४।१ । -यीता ७।२ । ३ शत ० ब्रा ० ६।१।२।११ । [. ]
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माध्य रविप्राणनिरूपण २५ वर्ष का वानप्रस्थ संन्यासधम्मं की भोर आत्मा को झुकाता है । इस प्रकार आश्रम दो ही रह जाते हैं । ५० वर्ष गृहस्थाश्रम है । ५० वर्ष संन्यास है । गृहस्थ कम्र्ममय है । संन्यास ज्ञानमय है । ज्ञान - कम्मं दो ही आत्मा के स्वरूप हैं । दोनों के दो ही श्राश्रम हैं । पहले में विज्ञानरूप कम्मं है । दूसरे मे ज्ञान है । दोनों परस्पर अत्यन्तविरुद्ध हैं । एक अभ्युदय है तो दूसरा निःश्रेयस है । सांसारिक उन्नति अभ्युदय है । आत्मोन्नति निःश्रेयस है । कहना यही है कि जैसे गृहस्थधर्म के उपकारक ब्रह्मचर्यं का गृहस्थाश्रम में अन्तर्भाव मान लिया जाता है, इसी प्रकार से संन्यासधर्म के उपकारक वानप्रस्थ का संन्यासाश्रम में ही अन्तर्भाव मान लिया जाता है । सुतरां वानप्रस्थस्वरूपप्रतिपादक आरण्यक ग्रन्थ का उपनिषत् पन्थ में अन्तर्भाव सिद्ध हो जाता है । इसी अभिप्राय से तो भगवान् याज्ञवल्क्य ने उपनिषत् और मारण्यक को एक वस्तु मानते हुए अपने उपनिषत् को ' बृहदारण्यकोपनिषत् ' नाम से व्यवहृत किया है । जब सर्वात्मना उपनिषत् का आरण्यकत्व सिद्ध हो जाता है तो हम कह सकते हैं कि हम गृहस्थियों के लिए उपनिषत् का श्रवणमनन सर्वथा अमङ्गलकर है । जो संसार पहले से ही छोड बैठे हैं - उनके लिए तो यह मंगलकर ही है, परन्तु अभ्युदय चाहने वाले संसारियों के लिए तो यह अवश्यमेव अनिष्टकर है, क्योंकि उपनिषत्ज्ञान हमारे पुर्जे पुर्जे को तोड़ता है । हमारी बुद्धि को स्त्री, पुत्र, जाया, सम्पत्ति आदि से अलग करता है । शरीर से अलग करता है । प्राकृतात्माओं से हमारा विच्छेद करवाता है । इनसे सचमुच हम अलग होने लगते हैं । ' तं यथा - ययोपासते तदेव भवति ' १- इस सिद्धान्त के अनुसार हमारी बुद्धि जैसे जैसे संसार को मिथ्या समझने लगती है, वैसे वैसे ही हम उससे अलग हो जाते हैं । यह महा भ्रमंगल है! क्या उपनिषत् पढना छोड़ दें? ऋषि कहते हैं अवश्य । संन्यासोपयोगी उपनिषत् के श्रवणमनन करने की चेष्टा करना हम गृहस्थियों की श्रवश्यमेव अनधिकार चेष्टा है । परन्तु ऋषि दयालु हैं । जो गृहस्थी संसार में रहते हुए उसके अभ्युदय की रक्षा चाहते हुए उपनिषत् रसपान करना चाहते हैं उनको वे अन्त में जाकर आज्ञा दे देते हैं । उनका वह प्राज्ञापत्र उपनिषदों के प्राद्यन्त में होने वाला यही ' मंगलाचरण ' है । इस मंगलाचरण से उपनिषत् से होने वाला अनिष्ट सर्वांश में दूर हो जाता है । अभ्युदय का नाश नहीं होता- निःश्रेयस की प्राप्ति हो जाती है । श्राप पूछेंगे कैसे? इसका उत्तर हम यही देंगे कि हमारे अध्यात्मप्रपञ्च में स्थूल, सूक्ष्म, कारण भेद से तीन शरीर माने जाते हैं । कारणशरीर श्रायुमय है । सूक्ष्मशरीर इन्द्रियरूप है । स्थूलशरीर रसासृङ्मांसादिधातुरूप है । उपनिषत् से इन तीनों का अनिष्ट होता है । जाया - प्रजादि सबका स्थूलशरीर में अन्तर्भाव समझना चाहिए । इन तीनों शरीरों का निर्माण क्रमशः अग्निमय पृथिवी, वायुमय अन्तरिक्ष, आदित्यमय द्युलोक से होता है । त्रैलोक्य से तीनों शरीर बनते हैं । भग्निमयी पृथिवी ऋक् है, वायुमय अन्तरिक्ष यजु: है एवं श्रादित्यमय द्युलोक साम है । इन तीनों वेदों का मूलाधार चौथा सोममय अथर्ववेद है । यही प्रथवंब्रह्म अग्नि में आहुत होकर उसके अग्नि, वायु, आदित्य - ये तीन विभाग कर डालता है । ऐसी अवस्था में उस अथर्व की तीनों में व्याप्ति सिद्ध हो जाती है । तीनों के ग्रहण से अथर्ववेद गृहीत हो जाता है । तीन १- शत ० ब्रा ० १०।५।२।२० । [ " ]
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्राणनिरूपण से चारों गृहीत हो जाते हैं । ऋक् अग्नि है । अग्नि स्थूलशरीर है । यजुः वायु है - वायु सूक्ष्मशरीर है । साम आदित्य है । आदित्य आयुरूप कारणशरीर है । इसीलिए ' सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च " - कहा जाता है । तीनों की समष्टि - ' अथर्व ' है । चारों वेदशाखाओं के चार प्रकार के ही उपनिषत् हैं । ऋगुपनिषत् से स्थूलशरीर का अधिक अमंगल होता है, अतः ऋग्वेद के उपनिषदों में प्रधानरूप से स्थूलशरीर की मंगलकामना की जाती है । यजुर्वेदीय उपनिषत् से इन्द्रियरूप सूक्ष्मशरीर का प्रधानरूप से अमङ्गल होता है, अतः यजुर्वेदीय उपनिषदों में प्रधानरूप से सूक्ष्मशरीर की मंगलकामना की जाती है । सामवेदीय से उपनिषत् से आयुरूप कारणशरीर का अमंगल होता है, भ्रतः सामवेदीय उपनिषदों में प्रधानरूप कारणशरीर की मंगलकामना की जाती है एवं अथर्ववेदीय उपनिषत् में तीनों शरीरों का अमंगल होता है, क्योंकि प्रथर्व सोम तीनों श्रग्निशरीरों में व्याप्त है । अतः इस उपनिषत् में तीनों की मंगलकामना की जाती है । इस मंगलाचरण से हमारी बुद्धि मंगलकामनामयी बन जाती है, अतएव उपनिषज्जन्य से अमंगल का हमारे ऊपर प्रभाव नहीं होने पाता । बस, उपनिषदों के प्रद्यन्त में विभिन्न विभिन्नरूप मंगलाचरण क्यों किया जाता है? इस प्रश्न का यही संक्षिप्त उत्तर है । पिप्पलाद महर्षि से आविष्कृत अतएव पिप्पलाद नाम से प्रसिद्ध एवं प्रश्नात्मक होने से ' प्रश्न ' में व्याप्त है । नाम से प्रसिद्ध हमारा प्रकृत उपनिषत् अथर्ववेदीय है । अथर्ववेद सोममय होने से तीनों बस, इन्हीं तीनों की मंगलकामना करते हुए भगवान् पिप्पलाद कहते हैं—
“ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः " ॥
। हे " हे ( आग्नेयप्राणरूप ) देवताओ! ( हम अपने ) कानों से ( सदा ) मंगलवचन ही सुनते रहें करें । स्थिर दृढ अंगों यजन करने वाले यज्ञिय देवताओ! हम अपनी आँखों से सदा मंगलभाव ही देखा युक्त अपने शरीरों से सदा युक्त रहें एवं जो देवहित ( देवप्रतिष्ठित ) श्रायु है - उसे सुखपूर्वक भोगने में समर्थ बनें " । श्रुति का एक अक्षर भी निरर्थक नहीं होता । उसके प्रति प्रक्षर में कुछ न ' कुछ कहा रहस्य है । रहता अग्नि है | श्रुति ने- ' कमिः ' के सम्बन्ध में ' देवा ' कहा है | ' अक्षभि: ' के सम्बन्ध में ' यजत्राः , वायु, प्रादित्य हैं । और सोम भेद से देवता दो प्रकार के होते हैं । आग्नेयदेवता वही सुप्रसिद्ध - अग्नि अवस्थाएँ हो जाती हैं । सौम्यदेवता सोम है । इस सोम की सायतन निरायतन भेद से दिक्, भास्वर - दो के भीतर रहता दिक्सोम ब्यापक है, भास्वर सोम परिच्छिल है । परिच्छिन्न भास्वर सोम दिक्सोम की अग्नि, वायु, आदित्य तीन है, अतएव दिक्सोम से उसका भी ग्रहण कर लिया जाता है एवं - अग्नि अग्नि, २- वायु, ३- आदित्य, ४ – दिक् अवस्थाएँ हैं । इस प्रकार अग्नि और सोम - इन दो देवताओं के १ प्राण, चक्षु, सोम, ५- भास्वरसोम - ये पाँच देवता हो जाते हैं । इन्हीं पाँचों देवताओं से क्रमशः - वाक्, १ - ऋग्वेद १।११५ । १ । [ १२ ]
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य रविप्राणनिरूपण श्रोत्र, मन ये पाँच इन्द्रिएँ उत्पन्न होती हैं । प्राकृतिक नित्य सौर - यज्ञ में वाक् - रूप अग्नि ' होता ' है, प्राणरूप वायु अध्वर्यु है । चक्षुरूप आदित्य उद्गाता है । दिक्सोम भास्वरसोममय सोमदेवता ब्रह्मा है । ' होता ' ऋग्निमय है । अध्वर्यु - यजुर्वायुमय है । उद्गाता साम - आदित्यमय है । ब्रह्मा सोममय है । इन चारों में काम करने वाले तीन हैं, चौथा निरीक्षक है । ब्रह्मा काम नहीं करते यजन नहीं करते वे तटस्थ निरीक्षक देवता हैं । परन्तु श्रग्निवाय्वादित्य यज्ञ करने वाले हैं, श्रतएव हम केवल इन्हीं को ' यजत्राः ' कहेंगे । सोमदेवता ' देवा ' हैं, अग्निदेवता ' यजत्राः ' हैं । सोम ही श्रोत्रेन्द्रिय बनता है । दिक्सोम से हमने भास्वरसोम का ग्रहण बतलाया था । उसी दिक्सोम से श्रोत्रेन्द्रिय बनी हैं, अतएव भास्वरसोम-मय मन का इस श्रोत्रेन्द्रिय से अवश्यमेव ग्रहण किया जा सकता है । इस प्रकार ' भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा: ' - इस वाक्य का - " हे सौम्य देवताओ! मैं कान से अच्छा सुनूँ मन से अच्छी भावना करूँ " - यह तात्पय्यं निकल आता है । श्रादित्य से चक्षु बनते हैं । आदित्य ज्ञानप्रधान है, वायु क्रियाप्रधान है । अग्नि प्रधान है - जैसा कि ' केनोपनिषत् ' में विस्तार के साथ बताया जा चुका है । ज्ञान पूर्वज है । क्रिया - प्रथ अपरज ( उत्तरज ) हैं । ज्ञान के ही ज्ञान, क्रिया, अर्थ - तीन विवर्त हैं । सुतरां ज्ञान से तीनों का ग्रहण हो जाता है । आदित्यरूप चक्षु ज्ञानमय है । वाक्- प्राणरूपवायु - अग्नि तन्मय हैं । अतः चक्षु से हम तीनों का ग्रहण करने के लिए तय्यार हैं । ऋषि को तीनों का ग्रहण अभीष्ट था, इसीलिए तो उन्होंने ' अक्षमिः ' कहा । ये तीनों ' यजत्राः ' हैं । बस, आदित्य, वायु, अग्नि से निम्मित चक्षु, प्राण, वाक् - इन तीनों की मंगल-कामना चाहते हुए ऋषि ने ' भद्र ं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ' कहा है । ' मैं आँख से अच्छा देखूं मुंह से अच्छा बोलूं, प्राणरूप घ्राण से अच्छा सूंघू । हे यजत्रदेवताश्रो! इस प्रकार आप तीनों से निम्मित इन तीनों इन्द्रियों की मंगलकामना करता हूँ । इस प्रकार ' कर्णेभि: ', ' अक्षमि: ' - से पाँचों इन्दिएँ गृहीत हो जाती हैं । कदाचित् भाप प्रश्न करें कि जब केनोपनिषदादि में ऋषि लोग पाँचों इन्द्रियों का पृथक् - पृथक् उल्लेख करते हैं एवं इस पृथक्ता में वे गौरव नहीं समझते तो फिर यहाँ गौरव ' न कर लाघव क्यों किया? प्रश्न यथार्थ है । ऋषि सबका नाम ले दें तो भी कोई हानि नहीं थी । हानि ही नहीं लाभ था । सरलता से विषय समझ में आ सकता था । ऐसा न करके ऋषि ने जो यहाँ द्रविड़ प्राणायाम किया है - इसमें भी कुछ रहस्य है । ऋषि का उद्देश्य मंगलकामना है, न कि इन्द्रियस्वरूपनिरूपण । संसार में जो मनुष्य अच्छा देखता है एवं अच्छा सुनता है उसका जीवन मंगलमय है । मंगल और भ्रमंगल दोनों भावप्रधानरूप से देखने - सुनने पर निर्भर है । ' न मैं उसे देखना चाहता - न उसके चरित्र सुनना चाहता - इस प्रकार के लौकिक व्यवहारों में हम श्रवण, दर्शन की ही प्रधानता पाते हैं । ' हे ईश्वर! हमें न किसी का दुःख सुनाना - न दिखाना ' - इस प्रकार श्रवणदर्शनमात्र पर ही अमंगल - मंगल की सीमा समाप्त हो जाती है । बस, इसी साधारणविज्ञान को लक्ष्य में रखकर ऋषि ने केवल दो ही इन्द्रियों का उल्लेख किया है । परन्तु ग्रहण अभीष्ट था पांचों का । वह ' करर्णेभि: ' - ' अक्षभि: ' से सिद्ध हो जाता है । इस प्रकार इस क्रम में दोनों कार्य्यं सिद्ध हो जाते हैं । यह है - इन्द्रियरूप सूक्ष्मशरीर की मंगलकामना । ' स्थिरैरंग ' ० - इत्यादि से स्थूलशरीर की मंगलकामना है । अन्त में कारणशरीर की मंगलकामना है । आयु देवहित है । अग्नि वायु - आदित्यस्वरूप देवसत्य ही - आयु का आधार है । [ १३ ]
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माध्य रयिप्राणनिरूपण प्रकृतिमण्डल को हम ' खगोल ' कह सकते हैं । इसी खगोल का पृथिवी अपने घूरे पर २४ घंटे में अपना एक भोग पूरा कर लेती है । अहोरात्र में पृथिवी का सम्पूर्ण खगोल से सम्बन्ध हो जाता है । इस खगोल के ३६० अंश हैं । ३६० अंश - ६०-६०-६०-६० क्रम से चार विभागों में विभक्त हैं । मध्यरात्रि से प्रातःकाल तक एक खण्ड है । प्रातः से मध्याह्न तक दूसरा खण्ड है । मध्याह्न से सायंकाल - चित्रा, तक तीसरा खण्ड है । सायंकाल से मध्यरात्रि तक चौथा खण्ड है । इन चार खण्डों के विभाजक रेवती, श्रवण, लुब्धक - ये चार स्थान हैं । चित्रा से ६० अंश पर रेवती है । श्रवण से लुब्धकबन्धु १८० भ्रंश पर है । ये ही आकाश के चार ' स्वस्तिक ' कहलाते हैं । जब तक ये चारों अपने स्थान पर प्रतिष्ठित हैं, तब तक खगोलान्तर्गत सारा विश्व स्वस्तियुक्त है - कल्याणमय है । बस, इन चारों से होने वाली ' स्वस्ति ' की २४ घण्टे प्राप्ति की प्रार्थना करते हुए ऋषि कहते हैं—
" स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु " ॥
प्रस्ति है - सत्ता । सुख से रहना सुखास्ति है- यही स्वस्ति है । दुःख से रहना दुःखास्ति है - यही अनस्ति है । हम चौबीसों घंटे स्वस्तियुक्त रहें - यही तात्पय्यं है ॥। इति मंगलाचरणरहस्यं समाप्तम् ॥ [ १४ ]
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य रयिप्राणनिरूपण श्रथ श्रभिधानरहस्यम् वेदग्रन्थों में स्थान - स्थान पर भिन्न - भिन्न ऋषियों के नामों का भिन्न - भिन्न प्रकार से उल्लेख है । कहीं गोत्र नाम से ऋषि के नाम का निर्देश है । कहीं देश नाम से है । कहीं ऋषिप्राण के नाम से उन्हें व्यवहृत किया गया है । उन सारे अभिधानों ( नामों ) को हम निम्नलिखित चार विभागों में विभक्त कर सकते हैं-१- यशोऽभिधान २- यच्छाभिधान → ऋषिप्राण नाम से अभिधान → मातापितृकृत प्रातिविक नाम ३ - गोत्राभिधान + वंश नाम ४- अभिजनाभिधान + देशिक नाम १- यशोभिधान - प्रकृतिमण्डल में कितने ही ऋषिप्राण हैं । यद्यपि ये ऋषिप्राण अनन्त हैं, तथापि हमारे वेदमहर्षियों ने सृष्टि में उपयुक्त १०-१२ ऋषि माने हैं । वे ही ऋषि वसिष्ठ, भरद्वाज, अत्रि, मरीचि, कश्यप, भृगु, अंगिरा आदि नामों से प्रसिद्ध हैं । जिस - जिस मनुष्यऋषि ने अपने विज्ञानबल से जिस - जिस ऋषिप्रारण को पहचाना, पहचान कर उसके विज्ञान का संसार में प्रचार किया- वे वे ऋषि तत्कालीन विद्वानों के द्वारा उन मनुष्यऋषियों की कीर्ति को प्राकल्पान्त स्थिर बनाए रखने के लिए उन - उन प्राणों के नाम से प्रसिद्ध कर दिये गये । बस, ये ही पहले ' यशोनाम ' हुए । उपनिषदों में कहीं - कहीं ब्राह्मणादि ग्रन्थों में भी अधिक रूप से ऋषियों के यशोनाम ही अधिक आते हैं । वसिष्ठ, कश्यप, भरद्वाज आदि नाम यशोनाम हैं । लोक में भी यह व्यवस्था समान है । ' लक्ष्मणमूत्ति ', ' राममूत्ति ', ' नाट्यमूर्ति ', ' विज्ञानराशि ', ' सहृदय ', ' प्रेमी ', ' महारथी ', ' सेवक ' आदि आदि सारे नाम यशोनाम हैं । २- यदृच्छाभिधान | दूसरा विभाग है - प्रातिस्विकनाम । माता - पिता ने जन्मनक्षत्र के सम्बन्ध से ऋषियों के जो नाम रखे थे वे ' यदृच्छामिधान ' कहलाए । ऐसे नाम बहुत कम मिलते हैं । जन्म नाम से पुकारना एक प्रकार की असभ्यता है - अनादर है, अतः उन ऋषियों के वृद्धों ने ही कहीं कहीं इन नामों का उल्लेख किया है । परन्तु सर्वत्र प्रधानता इतर तीन श्रभिधानों की है । श्री मधुसूदन, श्री चन्द्रदत्त, श्री चन्द्रशेखर, श्री गिरिवर आदि लोकिक यदृच्छाभिधान हैं । ३ - गोत्राभिधान - ऋषियों को उनके प्रातिस्विकनाम से नहीं बोला जाता । ऐसा करना उनका निरादर है, अतएव उन्हें उनके वंश के नाम से -पिता, प्रपितामहादि के नामों से पुकारा जाता है । यही वंशाभिधान गोत्राभिधान कहलाता है । शैब्य, गायं, पैल आदि गोत्राभिधान के उदाहरण हैं । [ १५ ]
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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रविप्राणनिरूपण ऋषि का ४- अभिजनाभिधान यह सबसे उत्तम कोटि का अभियान है । गोत्रा भिधान में यद्यपि कहा जा नाम नहीं है, परन्तु ऋषि के बाप - दादों का नाम है । यह भी अधिक आदर का भाव नहीं ऋषियों को जिस देश में वे रहते थे - उस देश के नाम से व्यवहुत किया सकता । ऐसे परम आदरणीय सकते हैं तो कुल चार गया है । यही चौथा अभिजनाभिधान है । क्या वेद, क्या लोक - यदि नाम हो चरितार्थं होता है । ही प्रकार के हो सकते हैं, इसीलिए तो ' चतुष्टयं वा इदं सर्वम्'- यह गए हैं निगमवचन - उनके साथ पहले उसी नाम का बस, इन चारों में से जो ऋषि जिस अभिधान से प्रसिद्ध हो यही है कि ऋषियों के उप-सम्बन्ध होता है - अनन्तर परिचयार्थं दूसरा नाम बोला जाता है । कहना समझना चाहिए । उसे ही निषदों में, प्रायः दो - दो नाम होते हैं । उनमें जो पहला नाम है - वह मुख्य लक्ष्य में रखकर पिप्पलाद प्रसिद्ध एवं द्वितीय को गौण समझना चाहिए इसी अभिधान रहस्य को कहते हैं-गार्ग्यः " ॐ सुकेशा च भारद्वाजः शैब्यश्च सत्यकामः सौर्यायरणी च कौशल्यश्चाऽऽश्वलायनो भार्गवो वैदभिः कबन्धी कात्यायनः । ते हैते ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमारणा एष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीति - ते ह समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः ” ॥१ ॥
भारद्वाज गोत्राभिधान है । सुकेशा यदृच्छाभिधान है । यह इसी नाम से प्रसिद्ध हुए थे, अतएव । सत्यकाम यदृच्छा-इस नाम को मुख में रखते हुए ' सुकेशा च भारद्वाजः ' कहा है । शैब्य गोत्राभिधान है से ठीक उलटा मिधान है । यह गोत्राभिधान नाम से प्रसिद्ध थे, अतएव उसी को मुख में रखते हुए पहले थे, अतः ये ' शैब्यश्च सत्यकामः ' कहा है । गर्ग और सूर्य्य - दो ऋषि इन तीसरे ऋषि के वंश में प्रसिद्ध को मुख दोनों वंश नामों से प्रसिद्ध हुए । इनमें भी ' सौर्यायणी ' नाम से अधिक प्रसिद्ध थे, अतएव प्रधान उसी है । पाँचवें में रखते हुए इनके लिए ' सौर्यायरणी च गार्ग्यश्च ' कहा है । चौथे में अभिजनाभिधान हमें ऋषियों के नामों का में गोत्राभिधान प्रधान है एवं छठे में यदृच्छानाम प्रधान है । इससे ऋषि
परिचय करवाते हैं ।
॥ इति श्रभिधान रहस्यम् ॥
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