प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 141–150
प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 141–150
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तृतीय प्रश्न ( ३ ) तीसरा प्रश्न है-१ - यजुर्वेद ३१।१६ । प्रज्ञाप्राणनिरूपण प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य ॥ २ ॥
-ऋ-२- शत ० ब्रा ० ७।५।२।६ । [ १२७ ] यह है - इस प्रश्न का प्रधान उत्तर । अब गौणपक्ष से यदि विचार किया जाता है तो यह समाधान पाँचों प्राणों के साथ लागू हो जाता है - जैसा कि प्रारम्भ में बतलाया जा चुका है । वाक्प्राण, रयिप्राण, धिषणाप्राण, प्रज्ञाप्राण, भूत प्राण - इन पाँचों प्राणों का प्रभव श्रव्यक्त, महान्, विज्ञान, प्रज्ञान, शरीर ही हैं । परन्तु श्रागमन इनका मन के द्वारा ही होता है । ' मनोविनाशे सकलं विनष्टम् ' के अनुसार मन ही सारे प्राणों का आलम्बन है । मन पर ही विज्ञान चमकता है । विज्ञान पर महान् है । महान् पर अव्यक्त है 1 । यदि मन है तो विज्ञान, महान्, अव्यक्त सब कुछ है । मन नहीं तो कुछ नहीं । मन हृदय में है । हृदय - मन प्रजापति | ' तस्मिन् ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा ' १-के अनुसार मन ही सर्वालम्बन है । इसीलिए तो ' मनसि हि सर्वे प्रारणाः प्रतिष्ठिताः ३ - यह कहा है । मन धन्नमय है । अन्न खाना बन्द कर दो - मन नष्ट हो जाएगा । मन के नष्ट होते ही सारे प्राण भाग जायेंगे । बस, इसी सारे रहस्य को लक्ष्य में रखकर पिप्पलाद ने ' मनोऽधिकृतेनायात्यस्मिञ्छरीरे ' यह कहा है । इस प्रकार से ' कथमायात्यस्मिञ्छरीरे इस दूसरे प्रश्न का समाधान हो चुका ॥३ ॥
" श्रात्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रातिष्ठते ' प्रतितिष्ठते " ॥ यपि गौणरूप से इस प्रश्न के ' प्राण से ' सभी प्राणों का ग्रहण किया जा सकता है, परन्तु प्रधानरूप से यहाँ का प्राण मध्यस्थव्यान ही समझना चाहिए । यह व्यानप्राण मन के द्वारा शरीर में आ गया । अब प्रश्न होता है कि शरीर में आकर यह किस - किस रूप से प्रतिष्ठित होता है? बस, इस प्रकरण में इसी का उत्तर दिया जाता है । पुरुष, अश्व, गौ, श्रवि, अज- पशु इन पाँच भागों में विभक्त हैं । इन पाँच पशुओं में ही इतर सारे पशुओं का अन्तर्भाव है । इन पशुओं में प्रत्येक में श्रादि मध्य, अन्त विभाग से तीन मुख हैं । इनमें मध्य के मुख्य में तीन मुख हैं । इस प्रकार पाङ्क्त पशुओं में पाँच मुखों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । इन पाँचों में आद्यन्त के मुख- ' मुख, मूलद्वार ' नाम से प्रसिद्ध हैं । मुख मुख है । यह अन्नागमन द्वार है । मूलद्वार पश्चिममुख है । यह अन्ननिर्गमनद्वार है । मध्य में कण्ठद्वार पहला है । हृदयद्वार दूसरा है । नाभिद्वार तीसरा है । इस प्रकार मुख, कण्ठ, हृदय, नाम, मूलभेद से प्रत्येक में पाँच द्वार हो जाते हैं । हृदय मध्य में है । ऊपर भी दो द्वार ( कण्ठ, मुख ) हैं | हृदय से नीचे भी दो द्वार ( नाभि, मूलद्वार ) हैं । हृदय से ऊपर के दोनों द्वारों में सौर प्राणाग्नि की सत्ता है । नीचे पार्थिव प्रपानाग्नि की सत्ता है । मध्य में आन्तरिक्ष्य व्यानाग्नि की सत्ता है । जैसा कि निम्नलिखित तालिका से स्पष्ट है-
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माध्य प्रज्ञाप्राण निरूपण १- मुख- पूर्वमुख- अन्नागमन द्वार + सौर प्राणाग्नि = ( at: ) -? २- कण्ठ ३- हृदय -- मध्यममुख आन्तरिक्ष्य व्यानाग्नि = अन्तरिक्ष- २ ४- नाभि + पार्थिव अपानाग्नि = ( पृथिवी ) – ३ ५- मूलद्वार = पश्चिममुख अन्ननिर्गमनद्वार J इस प्रकार मूलद्वार से प्रारम्भ तक - ब्रह्मरन्ध्रपय्र्यन्त- अपान पार्थिव अग्नि, व्यान आन्तरिक्ष्य अग्नि, दिव्य प्राणाग्नि की सत्ता सिद्ध हो जाती है । इन तीनों अग्नियों के मध्य में जो व्यानाग्नि है - वह स्तोम्य त्रिलोकी की वस्तु है । स्तौम्य त्रिलोकी के अतिरिक्त एक रोदसी त्रिलोकी और है । उसमें भी ये ही तीन लोक हैं । रोदसी त्रिलोकी के पृथिवीभाग से शरीर बनता है । सूर्य्यं से विज्ञान बनता है । मध्य के आन्तरिक्ष्य वायु से वायव्य प्राण बनता है । यह उस स्तोम्य त्रिलोकी के आन्तरिक्ष्य व्यान से पृथक् समझना चाहिए । स्तौम्य त्रिलोकी का आन्तरिक्ष्य व्यान तो एक प्रकार से धग्निरूप ही है । पार्थिव अग्निरस ही तीन रूप में परिणत हो रहा है एवं यह रोदसी का प्राण वायुरूप है । यद्यपि पूर्व में हमने यहाँ के प्राण से स्तौम्य व्यान का ग्रहण कर लिया है, परन्तु सूक्ष्मदृष्टि से देखने पर मानना पड़ता है कि यहाँ का प्राण असल में देवसत्य की वस्तु नहीं अपितु, ब्रह्मसत्य की वस्तु है सूय्यं पृथिवी, चान्द्रसोम और वायुमय अन्तरिक्ष- तीनों ब्रह्मसत्य की वस्तु हैं । इनमें मध्य का प्राण ही मन के द्वारा अध्यात्म में प्रविष्ट होता है । यह प्रान्तरिक्ष्य प्राण ' प्राण ' है । यह हृदय में उक्तरूप से प्रतिष्ठित होकर ' व्यान ' नाम से प्रसिद्ध हुआ- ' व्यानः सर्वशरीरगः- के अनुसार सर्वाङ्ग शरीर में व्याप्त रहता है । पार्थिव प्रपानाग्नि - मध्य के व्यानाग्नि के धक्के से प्रागति - गतिशील बनकर - अपान, समान रूप से परिणत हो जाता है एवं इसी प्रकार इसी व्यान के प्रतिरोध से प्राणाग्नि प्राणोदानरूप में परिणत जाता । इस प्रकार स्तोम्य त्रिलोकी के त्रैलाक्याग्नि की - १ - अपानाग्नि, २ - समानाग्नि, ३ - व्यानाग्नि, ४ - प्राणाग्नि, ५ - उदानाग्नि - ये पाँच भेद हो जाते हैं । ये पाँचों स्तोम्य त्रिलोकी की वस्तु हैं । स्तोम्य त्रिलोकी अमृता पृथिवी है । ' यथाग्निगर्भा पृथिवी ' के अनुसार पृथिवी अग्निमय है, अतएव अपानादि पांचों पार्थिव प्राणों को हम ' आग्नेय ' कहने के लिए तय्यार हैं । इन पांचों आग्नेय प्राणों का आधार शरीर है । शरीर चित्यपिण्ड पृथिवीरूप होने से ब्रह्मसत्य की वस्तु है एवं दृतिद्वार से प्रविष्ट होने वाला सूर्य्यप्राण विज्ञान है । बाकी बचता है - रोबसी का अन्तरिक्ष । इस अन्तरिक्ष का प्राण ' उक्थ, अर्क ' भेद से दो भागों में विभक्त है । अन्तरिक्ष श्रात्मा उक्थ है । वायु ( प्राणवायु ) अर्क है । यही तीसरे प्रश्न का प्राण है । यह हृत्स्थ सौम्य मन पर प्रतिष्ठित होता है । प्रज्ञाप्राणवाला प्राण ही यहाँ प्राण है । प्रज्ञाप्राण चन्द्रमा की वस्तु है, अतएव इस प्राण को भी हम ब्रह्मसत्य की ही वस्तु मानने के लिए तय्यार हैं । मन के द्वारा अध्यात्म में प्रविष्ट होने वाला प्राण वायुरूप है एवं स्तौम्य त्रिलोकी के अपानादि पाचों प्राण आग्नेय हैं । अपानात्मा, समानात्मा, व्यानात्मा, प्राणात्मा, [ १२८ ]
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण उदानात्मा - ये पाँच आत्मा, वस्तुतः तीन आत्मा देवसत्यरूप हैं । चौथा ब्रह्मसत्यरूप वायव्य प्राणात्मा इन पांच भागों में विभक्त होकर इन पाँचों में प्रतिष्ठित होता है । प्रपानाग्नि पर प्रतिष्ठित होकर बही प्राणवायु प्रपान नाम से व्यवहृत होने लगता है । समानाग्नि पर आके वही समान कहलाने लगता है । एवमेव व्यान, प्राण, उदान पर प्राके वही प्राण व्यान, प्राण, उदान कहलाने लगता है । इस प्रकार अध्यात्म में प्रविष्ट प्राण पांच अग्नि आत्माओं में विभक्त होकर स्वयं भी उन्हीं नामों से व्यवहृत होने लगता है । सच पूछो तो एक ही पार्थिव अग्नि आत्मा को पञ्चधा विभक्त करने वाला भी यही प्राणवायु है । प्राणवायु प्रान्तरिक्ष्य है । अन्तरिक्ष ने ही पृथिवी द्यो का विभाग कर रखा है- यदि मध्य में विभाजक अन्तरिक्ष न हो तो पार्थिव दिव्याग्नि एक हो जाय । एवमेव अपानप्राण आदान-विसर्ग के कारण अपान, समान, प्राण उदान - इन चार स्वरूपों में परिणत हो जाता । व्यापार क्रिया-धीन है । यदि वा न हो तो अपानप्राण का आदानविसर्ग ही न हो । इन्हीं सब कारणों को लक्ष्य में रखकर हम कह सकते हैं कि मध्यस्थ आन्तरिक्ष्य प्राणवायु ही एक अग्नि को प्राणोदानव्यानसमानरूप से पांच भागों में विभक्त कर आप स्वयं पाँच भागों में विभक्त हो जाता है । पाँचों स्थानों पर आप वायव्य प्राण का प्रत्यक्ष कर सकते हैं । पहले अपान को ही लीजिए । मल, मूत्र, रेतादि का परित्याग अपानाग्नि से होता है । विना गतिशील वायु के परित्याग-क्रिया असंभव है । वायुगभित प्रपान ही गतिशील बनकर इन मलों को बाहर फेंकने में समर्थं होता है । मुख में हुत अन्न को प्रज्वलित कर ऊपर फेंकना समान का काम है । फेंकना क्रिया है । क्रिया वायु का धर्म है । सुतरां समानाग्नि के साथ भी वायव्य प्राण की सत्ता सिद्ध हो जाती है । व्यानाग्नि का काम दोनों को ( ग्रपानसमानरूप अपान को एवं प्राणोदानरूप प्राण को ) विष्टन्ध रखना है । यह व्यापार भी वायव्यप्राणसापेक्ष ही है, अतः मध्यस्थ व्यानाग्नि के साथ भी वायव्यप्राण का निवास मानना पड़ता है । प्राण का काम है - प्रश्वास । उदान का काम है- निःश्वास । दोनों का वायुपना तो सिद्ध ही है । इन्हीं सब कारणों को देखते हुए हमें मानना पड़ता है कि वह एक ही प्राणवायु अध्यात्म में प्रविष्ट होकर अग्नि को पञ्चधा विभक्त कर हृदय में उक्थरूप से प्रतिष्ठित होता हुआ पाँचों स्थानों में अर्करूप से व्याप्त होता हुआ सर्वाङ्ग शरीर में व्याप्त हो जाता है । विज्ञानात्मा-उदानात्मा - उदानाग्नि → द्योः = आदित्यः प्राणात्मा - प्राणाग्नि ) व्यानात्मा-→ व्यानाग्नि ] अन्तरिक्षं वायुः समानात्मा - समानाग्नि द्यौः सूय्र्यः ( ब्रह्मसत्य भाग ) → पृथिवी - अग्निः अपा HT - प्रपानाग्नि शरीर ( चित्यपिण्ड ) पृथिवी - अमृता त्रिलोकी स्तौम्य उदानवायु: - १ प्राणवायुः -२ अन्तरिक्षंवायुः -५+ ( ब्रह्मसत्य भाग ) व्यानवायुः - ३ अपानवायु: -४ पिण्डपृथिवी समानवायुः -५ ( ब्रह्मसत्य भाग ) [ १२ ९ ]
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य पञ्च श्राग्नेय प्राण पञ्च वायव्यप्रारण १ - उदानाग्निः १- उदानवायुः २- प्राणाग्निः २- प्राणवायुः ३- व्यानाग्निः ३- व्यानवायुः ४- समानाग्निः ४- समानवायुः ५- अपानाग्निः प्रज्ञाप्राणनिरूपण ५- अपानवायुः इस तालिका से पूर्व का विभाग स्पष्ट हो जाता है । पाँच वायव्य प्राणों से युक्त पाँचों आग्नेय प्राण तापरहित हैं । इनमें जरा भी ताप नहीं है । इन पाँचों प्राणाग्नियों में अपान - समान एक वस्तु हैं, प्राणोदान एक वस्तु हैं, अतः पाँच के स्थान में हम अपान, प्राण - ये दो और मध्य में व्यानाग्नि बोलेंगे । स्तोम्य त्रिलोकी के इन तीनों अग्नियों में परस्पर घर्षण होता है । इस घर्षण से तापधर्म्मा नया वैश्वानर अग्नि उत्पन्न होता है । इस घर्षण की स्थानत्रय से तीन अवस्थाएँ हो जाती हैं । प्रपानस्थान में रहने वाला घर्षणजन्य अग्नि- प्रपानरूप पार्थिव अग्निप्रधान होने से ' वैश्वानर ' कहलाता है । दूसरा ' तेजस ' कहलाता है । तीसरा ' प्राज्ञ ' कहलाता है । इस प्रकार तीनों के तारतम्य से वैश्वानर, तेजस, प्राज्ञ - तीन वैकारिक अग्नि और उत्पन्न हो जाते हैं । ये तीनों वैश्वानर हैं । मूलाधार पृथिवी है | कण्ठप्रदेश द्यो है । शिरःस्थान विज्ञानमय सूर्य्य है । इस सारी संस्था में त्रिकल वैश्वानर व्याप्त है, अतएव इसके लिए- ' आ यो द्यां मात्या पृथिवीम् ' - ' वैश्वानरो यतते सूर्येण ' यह कहा जाता है । इन सारे अग्नियों का संस्थान कहाँ कहाँ है यह और जान लेना चाहिए । मूलद्वार में अपानाग्नि रहता है । यहीं अपानवायु रहता है । मल, मूत्र, रेतादि का परित्याग इसी के द्वारा होता है । नाभिद्वार में समानाग्नि और समानवायु रहता है । चारों ओर से रसापहरण कर शरीररक्षा करना इसका काम है । इसीलिए तो पालक विष्णु का नाभि में निवास बतलाया जाता है । एवं गर्भगत शिशु नाभिद्वारा ही अन्नरसादि को चारों ओर से लेकर खाने में समर्थ होता है, अतः ' समन्तान्नयति रसादिकम् ' - इस व्युत्पत्ति से यह अग्नि - वायु समान नाम से व्यवहृत है । एवं व्यान हृदय में प्रतिष्ठित होता हुआ सर्वाङ्ग शरीर में व्याप्त रहता है । व्यान ही पाँचरूप धारण करता है, अतएव इसकी सर्वाङ्गशरीर में व्याप्ति बतलाना न्यायसंगत है । इसी हृदयस्थान से संस्पृष्ट होकर नाभि से नीचे नीचे प्राणाग्नि और वायु प्रतिष्ठित रहता है । कण्ठ में उदानाग्नि और उदानवायु रहता 1 बाकी बचते हैं- वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ- ये तीन वैकारिक आत्मा । इनमें वैश्वानराग्नि नाभिस्थान से दक्षिण में रहता है । यद्यपि यह रहता नाभि में है, परन्तु नाभिस्थान समान से घिर जाता है । अतएव उसके पास ही इसे सजातीयता के कारण दक्षिण में अपना स्थान बनाना पड़ता है । इसी का नाम जाठराग्नि है । चतुविध अन्न का परिपाक करना इसी का काम है एवं व्यानस्थानीय हृदय में प्राज्ञ प्रतिष्ठित है । कण्ठनलिका में तेजसात्मा प्रतिष्ठित है । तैजसात्मा उदानाग्नि - उदानवायु से संश्लिष्ट है । यही तैजस आयु का अधिष्ठाता है । प्राज्ञ श्रात्मा व्यानाग्नि- व्यानवायु से संश्लिष्ट है । वैश्वान-हाग्नि समानाग्नि - समानवायु से संश्लिष्ट है । [ १३० ]
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण हृदय से नीचे पृथिवी है- ऊपर द्यौ है । इनमें हृदय से एक बात और हमने बतलाया है कि । मस्तकस्थ सौरप्राण - दो नीचे पायु - उपस्थ- दोनों प्रपानप्रधान हैं । ऊपर का भाग सौरप्राणप्रधान है दिव्यप्राण हैं - जैसा श्रोत्र, दो चक्षु, दो नासा, एक मुख भेद से सात भागों में विभक्त हो जाता है । ये सातों प्रारणाः- कहा कि आगे आने वाले चौथे प्रश्न में स्पष्ट हो जाएगा । इन्हीं सातों के लिए- ' सप्तशीर्षण्यः कण्ठ मध्य जाता है । नीचे के लिए ' द्वाववाञ्ची ' कहा जाता है । मध्य में नाभि है । जैसे हृदय मध्य है । द्विधा है । एवमेव नाभि भी मध्य ही है । यही अन्तरिक्ष है । नीचे पार्थिव अपान है । यह पायूपस्थभेद से सप्तघा विभक्त है, मध्य व्यान है । इस प्रकार प्रकारान्तर से विभक्त है । ऊपर धुप्राण है । वह त्रिलोकी के प्राण दशधा विभक्त हो जाते हैं । इन्हीं के लिए-' सप्तशीर्षण्यः प्राणाः, द्वाववाञ्चौ नामिवंशमी ' यह कहा जाता है । चक्षुश्रोत्रमुखनासिकारूप शासन प्राणाग्नि पर शासन करने वाला वही अध्यात्मप्रविष्ट प्राण है एवं पायूपस्थरूप अपान - भिन्न पर ग्रामों में करने वाला वही - प्रपान ही - मध्यगत वही ब्यान है । एक सम्राट् - अपने राज्य के भिन्न भिन्न - भिन्न अधिकारियों को नियुक्त करता है और कहता है कि तुम इन ग्रामों का अपानादि शासन भिन्न करो, भिन्न तुम इनका शासन करो, एवमेव यह वायव्यप्राण भिन्न - भिन्न संस्थाओं में प्रतिनिधिरूप । राजा के प्राणों को प्रतिष्ठित करता है । दृष्टान्त यथार्थ है । राजा अपनी राजधानी में रहता है अर्कंरूप-नियुक्त पुरुष शासन करते हैं । एवमेव व्यान उक्थरूप में - हृदय में प्रतिष्ठित रहता है । इसके स्पष्ट हो प्राणापानविभाग भिन्न - भिन्न संस्थाओं का संचालन करते हैं - जैसा कि पूर्व प्रकरण से जाता है । इसी अभिप्राय से ऋषि कहते हैं-" यथा सम्राडेवाधिकृतानियुङ्क्ते एतान्ग्रामानेतान्ग्रामानधितिष्ठ-स्वेत्येवमेवैष प्रारण इतरान्प्राणान्पृथक्पृथगेव संनिधत्ते " ॥ ४ ॥
है - यहाँ यह उल्बण पायूपस्थस्थान में वही अपान है । चक्षु श्रोत्र नासिका मुख में वही प्रारण है एवं वही मध्य के रूप से प्रतिष्ठित रहता है, अतएव यहाँ के लिए ' प्राणः स्वयं प्रतिष्ठते ' कहा वैश्वानर अग्नि नाभिदेश में प्रतिष्ठित होकर समान कहलाने लगता है । इसी समानस्थान पर हमने प्रान्तरिक्ष्य व्यान- तीनों मौलिक की सत्ता बतलाई है । पार्थिव अपानसमान, सौर - प्राणोदान, मध्य का वैकारिक अग्नि मध्य के व्या-प्राणाग्नि हैं । इनमें ताप नहीं है । ताप वैकारिक अग्नि का धम्मं है ॥ उत्पन्न होने वाले नाग्नि के आधार पर उन्हीं दोनों अग्नियों के उपांशु अन्तर्य्याम से उत्पन्न होता हैं । अपानप्रधान है वही वैश्वा-इसी वैश्वानर अग्नि के अपान, व्यान, प्राण भेद से तीन स्वरूप हो जाते प्राज्ञइन्द्रप्रधान नर वैश्वानर कहलाता है । वायुप्रधान वही वैश्वानर तैजस कहलाता तीन वैकारिक है एवं सौरप्राणरूप अग्नि स्तोम्य त्रिलोकी की वही वैश्वानर प्राज्ञ कहलाता है । वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ- ये एवं प्रपान, व्यान, प्राण वस्तु हैं । कठोपनिषत् में इन्हीं तीनों की समष्टि को हमने ' देवसत्य ' कहा है प्राणात्मक पार्थिव अग्नि की - तीनों रोदसी त्रिलोकी की वस्तु हैं । नाभिस्थान तक रोदसी के अपानरूप पार्थिवाग्निप्रधान वैकारिक सत्ता है । इसी को हमने समान कहा है । उचित था कि वैकारिक [ १३१ ]
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण वैश्वानराग्नि इसी स्थान पर प्रतिष्ठित होता । परन्तु चूंकि यह स्थान समान से घिरा रहता है, अतः समान से दक्षिणभाग में इसे रहना पड़ता है । दक्षिणादिक आग्नेयी है, अतः सजातीय सम्बन्ध से यह वैश्वानर समान के उत्तर में न जाकर दक्षिण में ही प्रतिष्ठित होता है । दक्षिण में प्रतिष्ठित इस उक्थरूप वैश्वानर से निकलने वाले अकं सर्वाङ्गशरीर में व्याप्त रहते हैं, अतएव इसके लिए ' प्रायो द्यां नात्या पृथिवीम्'- ' वैश्वानरो यतते सूर्येण इत्यादि कहा जाता है । ब्रह्मरन्ध्र सूय्यं है ।
मूलद्वार पृथिवी है । सर्वाङ्गशरीर में ताप है ॥
दूसरा तैजस - कण्ठनलिका में उदान से मिलकर रहता है । मध्य की व्याननाड़ी से १०१ नाड़िएँ निकलती हैं । इनमें सीधी जाने वाली एक नाड़ी में उदान रहता है वहीं तेजस रहता है । एवं तीसरा प्राज्ञभाग हृदय में व्यानस्थान में प्रतिष्ठित रहता है । इस विषय का हम आगे स्पष्टीकरण करने वाले हैं । अभी केवल यही समझ लेना पर्याप्त होगा कि समान के दक्षिणभाग में वैश्वानर अग्नि प्रज्वलित रहता है । भुक्तान्न की आहुति इसी पर होती है । जैसे घृताहुति से अग्नि में ज्वालाएँ निकल पड़ती हैं-एवमेव अन्नाहुति से इस वैश्वानर में ज्वालाएँ निकल पड़ती हैं । इन ज्वालाओं को वैज्ञानिकों ने सात विभागों में विभक्त माना है । वे ही सातों ज्वालाएँ - काली, कराली, मनोजवा, सुधूम्रवर्णा, सुलोहिता, स्फुलिङ्गिनी, विश्वरूपी - इन नामों से प्रसिद्ध हैं । इन सातों का विशद विवेचन आगे आने वाले ' मुण्डकोपनिषत् ' के द्वितीयमुण्डक में करने वाले हैं । अभी उनके नाममात्र ही जान लेना ही पर्याप्त होगा । नाभिस्थित समानवायु ही वैश्वानराग्नि में हुत अन्न को ऊंचा उठाता है । इसीलिए तो ' समुन्नयति वैश्वानराग्नौ हुतमन्नम् ' - इस व्युत्पत्ति से इसे समान कहा जाता है । समानवायु वायु है । गतिधर्मा है । ज्वाला उठना गतिधम्मं है । गति के अध्यक्ष वायु हैं, अतएव पार्थिव वैश्वानर अग्नि को यदि कोई ज्वालारूप में परिणत कर सकता है तो वह यही हमारा पार्थिव समानवायु कर सकता है । निष्कर्ष यही हुआ कि व्यानात्मा से उत्पन्न व्यानप्राण ही पायूपस्थ में प्रतिष्ठित होकर प्रपान कहलाने लगता है । यही चक्षु, श्रोत्र, मुख, नासिका में प्रतिष्ठित होकर प्राण कहलाने लगता है एवं यही नामिप्रदेश में प्रतिष्ठित होकर समीपस्थ वैश्वानर अग्नि में हुत अन्न को समुन्नयन द्वारा सात ज्वालाओं में परिणत करता हुआ समान कहलाने लगता है । बस, व्यानप्राण के इन्हीं अपान, प्राण, समान-तीनों रूपों का निरूपण करते हुए ऋषि कहते हैं— " पायूपस्थेऽपानम् । चक्षुः श्रोत्रे मुखनासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रातिष्ठते । मध्ये तु समानः । एष हि एतद्धतमन्नं समुन्नयति तस्मादेताः सप्ताचिषो भवन्ति " || यहाँ का मध्य नाभि ही है, क्योंकि हृदय और मूलद्वार की अपेक्षा नाभि ही मध्य में पड़ता है ॥५ ॥
बाकी बचते हैं - व्यान और उदान । एवं वैकारिक तेजस और प्राज्ञ । अब आगे के प्रकरण में इन्हीं का निरूपण किया जाता है । [ १३२ ]
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माध्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण ' प्राण कहाँ से पैदा होता है? ' इसका उत्तर देते हुए ऋषि ने कहा था कि प्राण श्रात्मा से पैदा होता है । इसका स्पष्टीकरण करते हुए हमने कहा था कि यहाँ आत्मा से व्यानात्मा अभिप्रेत में है परिणत । यह ब्यानात्मा ही हृदय में प्रतिष्ठित रहता है । और और स्थानों का प्राणापानसमानादिरूप प्राण व्यानात्मा आत्मा नहीं प्राण है । अर्थात् इतर स्थानों में व्यान स्वयं प्रतिष्ठित नहीं होता - इसके प्रतिष्ठित होते हैं । परन्तु हृदय में स्वयं व्यानात्मा उक्थरूप से प्रतिष्ठित रहता है, पतएव ऋषि कहते हैं कि - ' हृदि ह्येष श्रात्मा ' । इसी व्यानस्थान पर वैकारिक प्राज्ञात्मा रहता है । यह प्राज्ञ भी प्राण ( व्यान ) से युक्त है । यही असली आत्मा है । प्रायु भाग आत्मा बनता है, अतएव इसके लिए- ' तं मामायुर मृतमित्युपास्स्व " - इत्यादि कहा जाता है । सर्वाङ्गशरीर का मध्यस्थान यही हृदय है । यहीं आत्मा प्रतिष्ठित है । ' शतं चैका च हृदयस्य नाड्यः २ – के अनुसार इस व्यान से १०१ नाड़िएँ निकलती बतलाया हैं । इनमें एक नाड़ी बिलकुल सीधी जा रही है । जैसा कि कठोपनिषत् में विस्तार के इस साथ प्रकार १०१ जा चुका है । इन सौ में से प्रत्येक में से फिर अवान्तर १०० शाखाएँ निकलती हैं । में से फिर ७२-को कुल दस हजार एक सौ ( १०१०० ) नाड़िए हो जाती हैं । इनमें से प्रति नाड़ियों ७२ हजार शाखाएँ निकलती हैं । इन सबका यदि संकलन किया जाता है तो- ( ७२७२१०२०१ , ७२ लाख ) - ब्यान , १० नाड़ी संख्या अर्थात् मूलनाड़ी, शाखानाड़ी, प्रतिशाखानाड़ियों को मिलाकर कुल ७२ करोड़ हजार दो सौ एक नाड़िएँ हो जाती हैं । सम्भव है - कल्पनारसिक महानुभाव इस संख्या को काल्पनिक का समझें एवं व्यानशून्य शव की परीक्षा करने वाले आधुनिक पाश्चात्य वैज्ञानिक इस नाडीसंख्या भारतीय मखौल करें । परन्तु उन्हें ' स्थालीपुला कन्याय ' - को सामने रखते हुए मानना चाहिए नहीं कि देख सकते-ऋषि प्राप्त थे - साक्षात्कृतधर्म्मा थे । जो सूक्ष्मतत्त्वयन्त्रसहस्र की सहायता से भी हम अपनी योगज दृष्टि के प्रभाव से वे उनको भी देखने में समर्थ थे । अतएव —
" आविर्भूतप्रकाशानामनुपद्रुतचेतसाम् ।
श्रतीतानागतज्ञानं प्रत्यक्षान्न विशिष्यते " ॥
-केअनुसार वे सब कुछ देखने में समर्थ थे, अतएव ' हम नहीं देखते, अतः नहीं मान सकते'-कहकर उनके आविष्कारों का तिरस्कार करना केवल हमारी धृष्टता है - अपराध है । अपराध ही सर्वत्र नहीं अक्षम्य अपराध है । अस्तु, कहना यही है कि इन्हीं नाड़ियों में हमारा व्यानात्मा प्राणरूप ' सर्वव्यापक से व्याप्त रहता है । इसी सर्वव्याप्ति के कारण यह ' व्यान ' कहलाता है एवं इसीलिए ' ध्यान है, कभी कहलाता है । कभी मनुष्य हँसता है, कभी रोता है, कभी अट्टहास करता है, कभी उदास चढाता रहता है, कभी तेज गुनगुनाता है, कभी चिल्लाता है, कभी आँखें मटकाता है, कभी ललाट पर त्रिबली ऐसी ७२ करोड़, दौड़ता है, कभी बैठता है, कभी सोता है, कहाँ तक गिनावें? समझ लीजिए उसमें ऐसी - पृथक्-७२ लाख, १० हजार, २ सौ एक विभिन्न वृत्तिएँ होती हैं । यह सब इसी ग्यान की महिमा है । हमसे पृथक् नाड़ीस्रोतों से निकलने वाला, अतएव भिन्न - भिन्नस्वरूप धारण करता हुआ वह व्यान ही व्याप्त भिन्न - भिन्न चेष्टाएँ करवाता है । जैसे सूर्य्य उक्थ से निकलने वाली हजार रश्मिएँ संसार में १- कौषी ० उप ० ३।२ । २- कठोप ० २।३।१६ । ३ - वाक्यपदीय १।३७ । [ १३३ ]
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प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण होकर विश्व के असंख्य सर्वथा विभिन्न पदार्थों का संचालन कर रही हैं - ठीक इसी प्रकार का हृदयस्थ संचालन प्राज्ञात्मक व्यानबिम्ब से निकलने वाली पूर्वसंख्यायुक्त व्यानरश्मिएँ ही अनन्त चेष्टाओं कर रही हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ऋषि कहते हैं-" हृदि ह्येष श्रात्मा । श्रत्रैतदेकशतं नाडीनाम् । तासां शतं शतमेकैक-स्याम् । द्वासप्ततिर्द्वासप्ततिः प्रतिशाखानाडीसहस्राणि भवन्ति । श्रासु व्यानश्च-रति " ॥६ ॥
उदान बनता है - यह व्यान का स्वरूप बतला दिया । अब केवल उदान बचता है । व्यान ही हैं । इनमें एक नाड़ी सीधी कण्ठनलिका कहा जा चुका है । व्यान की मूलनाड़िएँ १०१ बतलाई गई नासानाडीद्वय इडापिङ्गला नाम से प्रसिद्ध द्वारा ब्रह्मरन्ध्र तक गई है । इसी को सुषुम्णा नाड़ी कहते हैं । है । यही प्रधान सूर्य्यरश्मि है । हैं । दोनों के मध्य में होकर एक नाड़ी सीधी जाती है - यही सुषुम्णा है । ब्रह्मरन्ध्रस्थित इसी नाड़ीद्वार इसका उपसंहारस्थान ब्रह्मरन्ध्र है । उपक्रमस्थान हृदयस्थ व्यान के निरन्तर सूर्य में जाया से हमारे में निरन्तर सौर प्राण आया करता है एवं हृदय पर धक्का मार है । ' आयुर्यज्ञेन कल्पताम्'-करता है । इसी प्रादानविसर्गात्मक आयुर्यज्ञ को- ' अहरहर्यज्ञः ' कहा जाता शरीरमूर्ति का निर्माण किया से ही - ' अहरहर्यज्ञः ' अभिप्रेत है । उस सौर प्रजापति ने अपने पृथिवीभाग से कुछ बनाकर उसने एवं चितेनिधेय त्रिलोकी से प्रपान, समान, व्यान, उदान, प्राण उत्पन्न किया प्रजातन्त्र । सब मेरे शासन के विना विचारा कि जैसे राजा विना प्रजा उच्छृंखल हो जाती है एवमेव यह मेरा विचार कर उसने ब्रह्मकपाल उच्छृंखल हो जायगा । श्रतः मुझे स्वस्वरूप से इसमें प्रविष्ट होना चाहिए । यह घुसा था । यह विज्ञानब्रह्म का भेदन कर छिद्र बनाकर शरीरयष्टि में प्रवेश किया । प्रज्ञानब्रह्म प्रपद से जमाया, श्रतएव ब्रह्मरन्ध्र से घुसा । वहाँ घुसकर उसने अपनी प्रजा को देखा -सम्भाला- उन पर अपना । परोक्षप्रिय प्रभुत्व देवता ' इदन्द्र ’ ऋषियों ने उसका नाम ' इदमदर्शम् ' - इस व्युत्पत्ति से ' इदन्द्र ' रख दिया पार्थिव इन्द्र था - मरुत्वानिन्द्र को ही ' इन्द्र ' कहते हैं । यह वही हमारा सौर मघवा इन्द्र है । प्रज्ञानेन्द्र है, तब तक आयु था । यह दिव्य इन्द्र है । इस आगत इन्द्रप्राण का नाम ही ' आयु ' है । जब तक यह जाता है ' - श्रपि च- ' स है । इसी अभिप्राय से- ' यावद्धयस्मिञ्छरीरे प्राणो वसति तावदायुः - यह कहा प्रातिस्विक पथ यदोत्क्रामति - अथ हैतत् पुरुषो म्रियते । ब्रह्मरन्ध्र से सूर्य्य तक प्रत्येक प्राणी के लिए में आया नियत है । इसी को ' महापथ ' कहा जाता है । इसी के द्वारा सौर आयुप्राण निरन्तर अध्यात्म सूय्यं में तीन बार करता है, एवं इसी के द्वारा जाया करता है । हमारा विज्ञानात्मा निमेषमात्र अहरहर्यज्ञ में का निरूपण करते आता जाता है । यही आत्मगतियों में नित्यगति है । इस नित्यगतिरूप हुए महर्षि याज्ञवल्क्य कहते हैं-स्वरूप-- इस छठे मन्त्र के नाड़ी - विषयक प्रसंग के सन्दर्भ में स्व ० शास्त्रीजी परिशिष्टात्मक नाड़ी परिचय भी लिखा है - जिसे तृतीय प्रश्नोपरान्त दिया जा रहा है । देखें पृष्ठ संख्या १४५ । १ - कौषी ० उप ० ३।२ । २- शत ० ब्रा ० १०।५।२।१३ । [ [ १३४ ]
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रज्ञाप्राण निरूपण " अहरहर्वाऽएष यज्ञस्तायतेऽहरहः संतिष्ठतेऽहरहरेनं स्वर्गस्य लोकस्य गत्यै युङ्क्तेऽहरहरेनेन स्वर्गं लोकं गच्छति " - इत्यादि । ' ही आयु का प्रकृत में इस प्रपञ्च से कहना हमें यही है कि सूय्यं से आने वाला यह सौरप्राण । बस, व्याननाड़ी में व्याप्त कारण है । यह स्वयं आयुरूप है । यह उसी व्यान नाड़ी द्वारा आता है अपने ऊपर प्रतिष्ठित रखता वह व्यानप्राण ही उस आगत प्राण को उठाए रखता है । दूसरे शब्दों में को ' उदान ' कहने है, अतएव - ' ऊर्ध्वं नयति सौरप्राणम् ' - इस व्युत्पत्ति से हम ऊर्ध्वनाड़ीगत प्राण व्यानप्राण इसी उदानमय ऊर्ध्वनाड़ी से के लिए तय्यार हैं । अपि च - यही आत्मोत्क्रमणस्थान है । सौर को ' उदान ' कहने निकलता है, अतः ' उत्क्रमय्यते श्रनेन मार्गेण'- इस व्युत्पत्ति से भी हम इस उदानवायु करने वाले हैं, अतः के लिए तय्यार हैं । अस्तु, इस विषय का निरूपण स्वयं ऋषि ही आगे जाकर सुषुम्णा नाड़ी है । उसके द्वारा प्रकृत में हम केवल यही बतलाना चाहते हैं कि ऊपर जाने वाली तो ऊर्ध्वभाग में प्रतिष्ठित होता हुआ वही व्यानप्राण ' उदान ' कहलाने लगता है । देवलोक है । मनुष्यलोक, देवलोक, असुरलोक भेद से लोक तीन प्रकार के हैं । ऊर्ध्वलोक प्रासुरलोक है । देव-सौरमण्डल के सम्मुख का पार्थिवभाग मनुष्यलोक है, एवं तमोमय विरुद्धभाग से उभयधम्र्म्मा है । ऐसी लोक सत्त्वप्रधान है । ग्रसुरलोक तमः प्रधान है । मनुष्यलोक सान्ध्य होने पुण्यलोक ( देवलोक ) में जाते अवस्था में जो मनुष्य सत्त्वप्रधान पुण्यकम्मं करते हैं - वे शरीरत्यागानन्तर में जाते हैं एवं सत्त्वतमोमय रजोधम्मं हैं एवं तमः प्रधान पाप करने वाले असुर्य तमोलोकरूप पापलोक स्थानों की प्राप्ति का मुख्य वाले पुरुष पुनः - पुनः इसी भूमण्डल पर जन्म लिया करते हैं । को इन ऊपर तीनों के लोक में ले जाता है । पाप-कारण यही उदान है । पुण्यकम्मं से वही उदान इस आत्मा उदान मनुष्य-कर्म्म की प्रबलता से वही उदान इसे पापलोक में ढकेल देता है एवं सान्ध्यकम्मों से वही उदान से युक्त रहता लोकप्राप्ति का कारण बन जाता है । तात्पर्य्यं यही है कि प्रायुरूप सौर प्राणात्मा से तीन भावों में परिणत हो जाता है । उदान ही आत्मा का आधार है । इधर उदान कर्म्मतारतम्य है । बस, इसी उदानस्वरूप को लक्ष्य में रखकर ऋषि कहते हैं-" अथ एकया ऊर्ध्व उदानः । पुण्येन पुण्यं लोकं नयति ( उदानः ) पापेन पापम् - उभाभ्यामेव मनुष्यलोकम् " ॥७ ॥
किस रूप से आश्वलायन का तीसरा प्रश्न था कि यह आत्मप्राण अध्यात्म में प्रविष्ट होकर करता है? ऋषि ने प्रतिष्ठित होता है? किन भागों में विभक्त होकर यह इस शरीरतन्त्र का संचालन द्वारा यह शरीर छोडता बड़े विस्तार के साथ इस प्रश्न का समाधान कर दिया, साथ ही में किसके दे दिया । उन्होंने बतला दिया है — यह चौथा प्रश्न था । ऋषि ने इस तीसरे, चौथे प्रश्न का भी उत्तर १- शत ० ब्रा ० ६ | ४ | ४ | १५ | [ १३५ ]
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषज्ञिानभाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण कि वह अग्न्यात्मा को अपान, समान, व्यान, उदान, प्राण - इन पांचों भागों में विभक्त कर - पांचों तत्रों में तन्त्रायीरूप से प्रतिष्ठित होकर अपान, समान, व्यान, प्राण, उदान नाम से प्रसिद्ध हो गया । इस पञ्चविध प्राण का जो उदानभाग है वही उत्क्रमण में मुख्यनिमित्त है । उदान के द्वारा ही यह प्राण
शरीर से बाहर निकलता है । बस, ३-४ प्रश्न का यही संक्षिप्त उत्तर है ॥। ३-४ ॥
( ५ ) - आश्वलायन का पांचवां प्रश्न था— एवं-" कथं बाह्यमभिधत्ते " ॥ ( ६ ) छठा प्रश्न था— “ कथमध्यात्मम् ” ॥ इन दोनों प्रश्नों का क्रमशः यही तात्पर्य्यं प्रतीत होता है कि इस व्यानरूप आत्मप्राण ने किस रूप से अधिदैवतमण्डल ( ईश्वरीयजगत् ) पर अपना अधिकार जमा रखा है एवं अध्यात्म पर किस ? ' - यह रूप से अपना शासन कर रहा है? तीसरे प्रश्न का ' शरीर में किस रूप से प्रतिष्ठित होता है है? -अर्थ था एवं इस ' ५-६ठे प्रश्न का ' किस रूप से ईश्वरशरीर और जीवशरीर को प्रतिष्ठित रखता यह अर्थ है । दोनों में बडा अन्तर है । स्वयं प्रतिष्ठित होना एवं प्रतिष्ठित होकर दूसरे को प्रतिष्ठित रखना- दोनों विभिन्न बातें हैं । दोनों में से पहले अधिदैवतजगत् को ही लीजिए । अधिदैवतजगत् हमने में-श्रादित्यप्राण ने ही बाह्यजगत् को प्रतिष्ठित कर रखा है । पाठकों को स्मरण होगा कि प्रकृति में में वह सौर प्राण को प्रधान बतलाया था, अध्यात्म में व्यान की प्रधानता बतलाई गई थी । प्रकृति । आदित्यप्राण आत्मप्राण प्रादित्यरूप में परिणत होकर ही त्रैलोक्यरूप ईश्वर को विद्युत कर रहा है ही सबकी प्रतिष्ठा है । दूसरे शब्दों में बहिर्जगत् का मूलाधार सौरप्राण ही है । यह बाह्यप्राण ही प्रातःकाल सूर्य्यरूप से उदित होता है । अब चलिए अध्यात्म की घोर अध्यात्म में चक्षुप्राण ने सबको प्रतिष्ठित कर रखा है । चक्षु रूप में परिणत उसी व्यान ने शरीर को विधृत कर रखा है । आँखों में जब तक प्राण है तब तक अध्यात्म जगत् की सत्ता है । आँखें बिगड़ते ही आत्मोत्क्रमण हो जाता है । इस चाक्षुषप्राण के ऊपर अनुग्रह करने वाला वही बाह्यप्राण है । रात्रि को बाह्यप्राण अभिभूत हो जाता है, अतएव उस बाह्य प्रारण के आधार पर प्रतिष्ठित यह चक्षुप्रारण भी अभिभूत हो जाता है । रात पड़ते श्राँखें मिच जाती हैं, परन्तु प्रातःकाल होते ही चाक्षुषप्राण उदित बाह्यप्रारणरूप सूर्य के अनुग्रह से उल्बण हो जाता है । सूर्योदय होते ही आंख खुल जाती हैं । इस चाक्षुष आन्तरप्राण को अनुगृहीत करता हुआ ही [ १६ ] ] [ १३६