प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 151–160
प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 151–160
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण यह आदित्यात्मक बाह्यप्राण उदित होता है । सचमुच बात यथार्थ है । सूर्य्यसत्ता ने ही विश्वसत्ता को स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित कर रखा है । जिस दिन सूर्य्यं न होगा - संसार में प्रलय हो जायगा । यह सूय्यं प्राणधन है । प्राण उसी व्यान का एकरूप है, अतएव हम कह सकते हैं कि आदित्यात्मक व्यानप्राण ने ही सम्पूर्ण विश्व को स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित कर रखा है । इधर उसी सौरप्राण से निम्मित चक्षुप्राण सर्वेसर्वा है । आँख मिचते ही अँधेरा है - प्रलय है । चक्षु से यहाँ ऋषि का दक्षिण चाक्षुषपुरुष की घोर इशारा है । यही चाक्षुषपुरुष शरीरजगत् का सम्राट् है । बस, इन्हीं दोनों समाधानों को लक्ष्य में रखते हुए ऋषि कहते हैं— “ ग्रादित्यो ह वै बाह्यः प्रारण उदयति - एष ह्येनं चाक्षुषं प्राणमनुगृह्णानः ” । दो तरह से अनुग्रह है । चक्षुरिन्द्रिय का उपादान मी आदित्यप्राण ही है एवं सूय्यंसत्ता में ही चक्षु अपना व्यापार करने में समर्थ हो पाता है । प्रकाशाभाव में रहती हुई आँख भी बेकार है ॥। ५-६ ॥ -88-आश्वलायन ने जो ६ प्रश्न किए थे उनका उत्तर हो चुका । अब " सिंहावलोकनन्याय ' द्वारा एक बार ६ ओं प्रश्नों के समाधान की ओर साधारणदृष्टि डालते हुए पिप्पलाद निम्नलिखित प्रकरण का प्रारम्भ करते हैं-यद्यपि हमने अपने अक्षरों से अग्निवायुभेद से प्रपानादि दो - दो भेद बतलाए हैं, परन्तु अभी तक ऋषि ने अपने मुख से इस द्वैतभाव का स्पष्टीकरण नहीं किया है । अब ऋषि अपने मुख से दोनों प्राणों की विभिन्नता बतलाते हैं-हम कह आए हैं कि पार्थिव अग्निदेवता ( आग्नेयप्राण ) शरीरस्थ पायूपस्थ में प्रतिष्ठित होकर श्रपान कहलाने लगता है । पृथिवी के ऊपर अन्तरिक्षरूप जो आकाश है वही यहाँ समान बनता है । अर्थात् - वही पार्थिव देवता ऊपर जाकर अध्यात्म में समान कहलाने लगता है । नाभिस्थान में हमने समान की सत्ता बतलाई है । नाभि अन्तरिक्ष है, खाली जगह है, अतएव हम इसके लिए अवश्य ही ' आकाश ' शब्द का प्रयोग करते हैं । इसी नाभि श्राकाश में समान रहता है, अतएव ' तात्स्थ्यात्ताच्छन्द्यम्'-इस न्याय से ऋषि ने समान को ' आकाश ' शब्द से ही व्यवहृत किया है । समान को आकाशरूप बतलाने में बडा चमत्कार है । वस्तुतः अपानवत् समान कोई पृथक् वस्तु तो है नहीं । अपि तु, पायूपस्थरूप घरातल में रहने वाला वही अपान ऊपर के नाभिगत शून्यप्रदेश में जाकर समान कहलाने लगता है । अपान पार्थिव-देवता है - नाभिगत अपान समानरूप में परिणत अपान पार्थिवप्रतिष्ठा के अभाव में पार्थिव बतलाया नहीं जा सकता एवं अन्तरिक्ष में वायु ( व्यान ) प्रतिष्ठित है, अतः समान- ' आन्तरिक्ष्य ' भी नहीं कहा जा सकता । यदि इसे कोई नाम मिल सकता है तो ' सान्ध्य ' नाम ही मिल सकता है । सन्धि में प्राकाश [ १३७ ]
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण प्रयोग करना पड़ा है । असल में यह है, अतएव ऋषि को अगत्या समान के लिए ' आकाश ' है शब्द । आकाश का में वायु है । वही वायव्याग्नि अध्यात्म आकाश पार्थिवदेवता ( अपान ) के ही अन्तर्भूत प्रसिद्ध होता है । इस प्रकार प्रकृतिमण्डल के में आकर हृदय में प्रतिष्ठित होकर ' व्यानाग्नि ' नाम से तीनों अध्यात्म में क्रमशः पायूपस्थ, नाभि, पार्थिव अग्नि, आकाशरूप अग्नि, श्रान्तरिक्ष्य वायव्य अग्नि- , समान, व्यान नाम से प्रसिद्ध हो जाते हैं— हृदय - इन तीनों स्थानों में प्रतिष्ठित होकर क्रमश: अपान ( ग्रपानरूपे " पृथिव्यां या देवता ( श्रग्निः ) सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्य वायुर्व्यानः ” ॥८ ॥
परिणता सती - वर्त्तते ) । अन्तरा यदाकाशः स समानः । में सप्ताचियुक्त वैकारिक बाकी बचते हैं — उदान और प्राण । हमने नाभि के दक्षिणभाग कण्ठ में तैजसात्मा की की सत्ता बतलाई थी एवं वैश्वानराग्नि की सत्ता बतलाई थी । हृदय में प्राश ' क्यों कहलाता है? इसका उत्तर ब्रह्मरन्ध्र सत्ता बतलाई थी । यह कण्ठगत क्रियामय तैजसात्मा ' तेजस ' पर- देवता ' कहलाता है एवं अध्यात्मगत वही से आने वाला वहीं सौर तेज है । सौर आयुमय इन्द्रतेज कण्ठ में तो वैकारिक वायुरूप आन्तरिक्ष्य परतेज ‘ अवरतेज ' कहलाने लगता है । उसी सुषुम्णायुक्त से वह वायव्य आत्मा सौरतेज आता है । इस तेज के सम्बन्ध आत्मा है और वहीं ब्रह्मरन्ध्रद्वारा से आयुरूप बन रहा है । जब आत्मा ' तैजसात्मा ' कहलाने लगता है । यह तेजसात्मा ही तेजोसम्बन्ध सिद्धान्त के अनुसार यह तेजोभाग उसी महापथ उत्क्रान्त हो जाता है तो- ' तेजः परस्यां देवतायाम् ' - इस यही है कि कण्ठगत प्रायुरूप तेजोमय तैजसात्मा का द्वारा परतेज में जा मिलता है । बतलाना इससे हमें की उत्क्रान्ति का में स्थित व्यानवायु है । तेजोभाग आधार हृदय से सीधी ऊपर आने वाली एक नाड़ी तेजस्त्व. इसी नाड़ीगत व्यानवायु पर निर्भर है, अतः मुख्यकारण एतन्नाडीगत यही व्यानवायु है । तेज हैं का । इस तेज को ही हम उदान कहने के लिए तय्यार उदान- तीनों एक स्थान तात्पर्य्यं यही है कि सौर तेज, वायव्य तैजसात्मा, व्यानवायुरूप है । दूसरे है । यह तैजसात्मा वायुरूप पर हैं । हृदय से ऊपर उदान है । वही तेजसात्मा है वहीं तेज है । दोनों दो वस्तु होते हुए भी शब्दों में व्यानवायु का विकार है । जहाँ उदान रहने पर भी एकमात्र अविनाभाव के कारण अभिन्न हैं, अतएव प्रज्ञा, प्राण दोनों को भिन्न सा प्रज्ञा । सह ह्येतावस्मिन् शरीरे वसतः जैसे प्रज्ञाप्राण के लिए- ' या वा प्रज्ञा स प्राणः । यो वै प्रारणः सुषुम्णागत तेज एवं तत्रगत उदान - दोनों सहोत्क्रामतः ' ' - यह कहा जाता है । एवमेव तैजसात्मरूप को ही उदान बतला दिया है । वस्तुतः - तेजोमय के अविनाभाव को लक्ष्य में रखकर ऋषि ने ' तेज ' है । तैजसात्मा पृथक् है - वैकारिक है । व्यानरूप उदान मौलिक । अान्तरिक्ष्य वायव्यतेज ही विद्युत् - तेज अथवा - ' तेज ' शब्द से यहाँ विद्युत् - तेज समझना चाहिए व्यानभाग है । दोनों । यही इन्द्र तेजोभाग है । वायु है । वायु में एक भाग इन्द्र का रहता है । इन्द्र विद्युत् है १ - कौषी • उप ० ३।३ । [ १३८ ]
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण अविनाभूत हैं । वायुमय यह आन्तरिक्ष्य इन्द्ररूपतेजोभाग ही अध्यात्म में प्रतिष्ठित होकर ' उदान ' नाम से प्रसिद्ध होता है । उदान प्रान्तररूप है, तेज बाह्यरूप है । श्वास - प्रश्वास उदान का रूप है । चूंकि उदान तेजोमय है, अतएव जब मनुष्य उपशान्ततेजा हो जाता है, तब उसकी सारी इन्द्रिएँ तेजःशून्य हो जाती हैं । जब उदानवायु बड़े वेग से चलने लगता है तो समझलो वह शीघ्र ही मरने वाला है । अर्थात् उदान ही श्रात्मा की उत्क्रान्ति का मुख्य कारण है - जैसा कि पूर्व में बतलाया जा चुका है । वह उदान जब जाने लगता है तो बडा प्रबल जाता है । जब श्वास - प्रश्वास बड़े जोर से चलने लगता है तो थोड़ी देर बाद वह मनुष्य उपशान्ततेजा हो जाता है । उपशान्ततेजपने में मुख्यकारण उदान है । उदानोपलक्षित प्राणोदानरूप श्वासप्रश्वास ही तेजः सत्ता के कारण हैं । जिसमें श्वासप्रश्वास नहीं, उसमें तेज नहीं, अतएव हम तेजोभाग को उदान कह सकते हैं । जब आत्मा उपशान्ततेजा हो जाता है - उस समय वह आत्मा ' संवेष्टितो गच्छति भूतसूक्ष्मैः - के अनुसार मन में संवलित इन्द्रियवर्ग, प्राण ( पाँचों वायव्यप्राण ) तैजसात्मा से युक्त होकर शरीरान्तर को प्राप्त हो जाता है । मन हृदय में प्रतिष्ठित | जब मनुष्य मरने लगता है उस समय सर्वाङ्ग शरीर में व्यापक चैतन्य सिमटकर मन में आ जाता है । ऐसी अवस्था से सारा शरीर शिथिल रहता है । केवल हृदय पर धड़कन रहती है । इन्द्रिय, प्राण, तेज के अलावा, पूर्वप्रज्ञा, विद्या, कर्म आदि भी इसके साथ रहते हैं । इस प्रकार मन में संपद्यमान इस सारे प्रपञ्चों से युक्त हो कर यह भोक्तात्मा शरीरान्तर को प्राप्त होता है । ' अन्ते मतिः सा गतिः ' के अनुसार यह मनुष्य मृत्यु-काल में जिस ओर अपना मन रखता है, उस समय अपने संकल्पमन के द्वारा इन्द्रियों सहित यह आत्मा प्राण में लीन हो जाता है । प्राण द्वारा उसी उदान रूप तेजोभाग में युक्त होता है । उससे युक्त होता हुआ यह आत्मा के साथ उसी उदान द्वारा यथासंकल्पित लोक में जाता है । सारे प्रपञ्च का निष्कर्ष यही हुआ कि प्रकृति में रोदसी विश्व का - रोदसी त्रिलोकी का मूलाधार सूर्य है एवं अध्यात्म त्रिलोकी का मूलाधार चक्षु ( विज्ञानात्मा - परिद्रष्टा नाम से प्रसिद्ध ) है । ' धियो द्वारा निरन्तर आता हुआ सर्वप्रति-यो नः प्रचोदयात् ' के अनुसार वह प्राकृतिक सौर विज्ञानप्राण ब्रह्मरन्ध्र ष्ठाभूत विज्ञानात्मा नाम से प्रसिद्ध चक्षुप्राण के ऊपर अनुग्रह किया करता है । जब तक वह श्राता रहता है, तभी तक यह अध्यात्म में प्रविष्ट रहता है । सौरप्राण इन्द्र है । इन्द्र वाक् है । वाक् - तत्त्व विना मन - प्राण के अनुपपन्न है । सुतरां सौरप्राण की मनःप्राणवाङ्मयता सिद्ध हो जाती है । मनः प्राणवाङ्मय सूर्य्यं का अंशभूत अध्यात्मजगत् का सूर्य्य ( विज्ञानात्मा ) भी मनःप्राणवाङ्मय है । यह अपनी इन तीनों कलानों की सत्ता के लिए प्रतिदिन सूर्य्यं से तीनों लेता रहता है । ' शतधा वर्धमानः - इस प्रथम प्रश्न के मन्त्रभाग के विज्ञान के अनुसार उस खजाने में से इसे ३६००० ( छत्तीस हजार ) मन मिलते हैं । इतने ही प्राण मिलते हैं । इतनी ही वाक् मिलती है । प्रतिदिन एक वाक्, एक प्राण, एक मन मिलता है । ३६००० दिन तक यह अन्नागमन होता रहता है । इसी आधार पर ' शतायुर्वे पुरुष: ' - यह श्रोतसिद्धान्त प्रचलित है । इस चक्षु पर उसका यही अनुग्रह है । उसके अनुग्रह से ही यह स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित है । दूसरे शब्दों में जीवित है । विज्ञान इतर प्राणों की प्रतिष्ठा कैसे है? इसका उत्तर चौथे प्रश्न में दिया जाएगा । [ १३ ९ ]
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण ही प्राण के पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौः भेद चाक्षुष ( विज्ञान ) प्राण ही श्रायु का अधिष्ठाता है । उस इसी एक अभिप्राय से तो इस मुख्य सौर विज्ञानमय से प्राणोदानसमानव्यानापान - ये पांच भेद हो जाते हैं । - एतद्द्वारणमवष्टभ्य विद्यारयामि'- यह प्राण के लिए प्रथम प्रश्न में - ' ग्रहमेवैतत् पञ्चधाऽऽत्मानं प्रविभज्य नाम से प्रसिद्ध होता है । सौर अग्नि सावित्राग्नि कहा गया है । सूर्य्यं से ही रोदसी त्रिलोकी का निर्माण उसकी प्रातिस्विक वस्तु बनता हुआ ' गायत्राग्नि ' है - वह पृथिवी में अन्तर्य्यामसम्बन्ध से प्रविष्ट होकर अन्तरिक्ष में प्रतिष्ठित होकर ' वायु ' कहलाने नाम से प्रसिद्ध हो जाता है । वही प्रवर्ग्यंभूत सौर अग्नि है । गायत्राग्निप्राण ( जो कि पृथिवी में लगता है । सावित्राग्निप्राण अध्यात्म में प्राण नाम से प्रसिद्ध से प्रविष्ट होता है । अपान का अवष्टम्भन श्राकर पृथिवी का देवता बन गया है ) अध्यात्म में अपानरूप आकाश ( ग्रन्तरिक्ष ) है - वहाँ आने वाला इसी पृथिवीदेवता के आधार पर है । पायु के ऊपर नाभिरूप में बतलाया जा चुका है एवं आन्तरिक्ष्य वायु यही अपान समान नाम धारण कर लेता है - जैसा कि पूर्व से प्रसिद्ध हो जाता है । इस प्रकार वह एक ही श्रध्यात्म में ( हृदयप्रदेश में ) प्रतिष्ठित होकर व्यान नाम गायत्र वायु नाम धारण कर अध्यात्म में पृथिवी अन्तरिक्ष- द्यौ तीन भागों में विभक्त होकर वहाँ लेता सावित्र है । आता हुआ अपान ही समान नाम प्रविष्ट होकर अपान - व्यान प्राण नाम धारण कर ऋषि कहते हैं-धारण कर लेता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर " श्रादित्यो ह वै बाह्यः प्राण उदयति । एष ह्येनं चाक्षुषं प्राणमनु-( प्रपानरूपेण परिणतः-गृह्णानः । पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्य - इतिशेषः ) ( अथ यत् ) अन्तरा यदाकाशः पायूपस्थाने प्रतितिष्ठति ) वायुर्व्यानः " ॥ ८ । ( नाभिप्रदेशः ) स समान: ( हृदयस्थः श्रान्तरिक्ष्यः ऊपर जाती हैं । उनमें एक नाड़ी बाकी बचता है - उदान । हृदय से १०१ नाड़ी निकलकर । इनमें १०० पूर्व में बतलाया जा चुका है सीधी जाती है । वह सुषुम्णा नाम से प्रसिद्ध है - जैसा कि द्वारा सीधी जाने वाली नाड़ी ) उदान तो व्यान की प्रतिष्ठा हैं । एक सीधी जाने वाली ( कण्ठनलिका साथ अन्तर्य्यामसम्बन्ध हुआ सौर तेज उदान के की प्रतिष्ठा है । कण्ठनलिका में ब्रह्मरन्ध्र से आया अध्यात्म की वस्तु बनकर प्राण कहलाने लगता से बद्ध रहता है । सौर तेज प्रवग्यं बनकर आता हुआ से सौर है । इस उदान में वहिर्य्यामसम्बन्ध है । वही वापस जाता हुआ उदान कहलाने लगता प्रतिबिम्बित सूर्य्यं को लीजिए । सौरप्राणघना रश्मि तेज और प्रविष्ट होता है । उदाहरणार्थ पानी में सूय्यं प्राणधन है । इससे भी सूय्यंवत् स्वतन्त्र पानी में श्राकर सूर्य्यरूप में परिणत हो गई है । वह प्रतिबिम्बित है । इसमें वह व्यापक सौर तेज भी घुसा रहता रश्मि निकलती है । यह निकलता हुआ रश्मिप्राण उदान है । चौथे प्रश्न में जहाँ सुषुप्ति के निरूपण करते है । बस, तथैव जाते हुए उदान में वह सौर तेज घुस जाता पश्यति १ - यह कहा गया है । वहाँ का ' तेज ' समय- स यदा तेजसा अभिभूतो भवति - प्रत्रैष देवः स्वप्नान्न १- प्रश्नो ० ४१६ । [ १४० ]
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण उदान में प्रविष्ट यही सौर तेज है - जैसा कि वहाँ भलीभाँति स्पष्ट कर दिया जाएगा । उदान तेजोयुक्त है - प्रागत सौर तेज से अविनाभूत है, अतएव हम इस तेजोमय उदान को ' तेज ' नाम से व्यवहृत करने के लिए तय्यार हैं । आत्मा जब शरीर को छोड़ता है- दूसरे शब्दों में जब शरीर से उत्क्रान्त होता है-तब इसी के द्वारा होता है, अतएव ' उत्क्रमते येनात्मा'- इस व्युत्पत्ति से इसे ' उदान ' कहा जाता है । इसी पाँचवें तेजोमय उदान का स्वरूप लक्ष्य में रखकर ऋषि कहते हैं— " तेजो ह वै उदानः " ॥ तेजोरूप उदान उदान है । उत्क्रमण का साधन है, अतएव जब सौरप्राण का अनुग्रह बन्द हो जाता है- दूसरे शब्दों में उसके प्राण का आगमन बन्द हो जाता है तो तेजोमय उदान उपशान्ततेजा हो जाता है । जब तक वह सौर तेज उदान में आता रहता है तब तक तो ' यावद्ध्यस्मिन् शरीरे प्राणो वसतितावदायुः ' १- के अनुसार तेजोयुक्त हुआ उदानसंपरिष्वक्त प्राण श्रायु ( जीवन ) का कारण बना रहता है । यही उदानतेज सारी इन्द्रियों में सर्वाङ्गशरीर में व्याप्त रहता है । परन्तु तैल समाप्त हो जाने से जैसे वतिकागत परमाणुरूप से शेष बचा तैल सिमटकर एक स्थान पर या जाता है एवमेव शरीर इन्द्रियों का सारा तेज ( चैतन्य ) सिमट कर हृदयस्थ मन में आ जाता है । मरणावस्थापन्न मनुष्य का सारा शरीर - सारी इन्द्रिएँ अपना अपना काम छोड़ देती हैं । सब उपशान्ततेजा हो जाते हैं । केवल हृदय पर वह तेज रहता है । यह एक टिमटिमाती दीपशिखा है जो कि अभी बुझने वाली है । इस समय केवल हृदय पर घड़कन रहती है । इस क्रम से इन्द्रियों द्वारा मन में ( हृदयस्थ मन में ) सिमटता हुआ वह तैजसात्मा उपशान्ततेजा होता हुआ उसी मार्ग द्वारा पुनर्भव को प्राप्त हो जाता है । ' भव ' नाम शरीर का है । पुनर्भव नाम शरीरान्तर का है । वस्तुतः भवनाम संसार का है । इस अवस्था में यह इस बार संसार छोडता हुआ पुनः भव में आने के लिए संसार छोड देता है । ' पुनर्भव ' का यही तात्पय्यं है । उदान के साथ ही पुनर्भव का ( उत्क्रान्ति का - तत्सम्बन्धी शरीरान्तर धारण करने का ) सम्बन्ध है, अतएव उदानस्वरूप निरूपण करते समय ऋषि ने इस पुनर्भव का भी निरूपण कर दिया है—
" तेजो ह वा उदानस्तस्मात् - उपशान्ततेजाः ।
पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि संपद्यमानैः ” ॥
" तेजो ह वै उदानः । तस्मात् मनसि संपद्यमानैरिन्द्रियैः सह ( स भोक्तात्मा ) उपशान्ततेजो भूत्वा पुनर्भवं प्राप्नोति " - इत्यन्वयः " ॥६ ॥
१- कौषी ० उप ० ३।२ । [ १४१ ]
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण उदान द्वारा उत्क्रान्त होने वाला आत्मा ' भोक्तात्मा ' है । श्रात्मेन्द्रियमनोयुक्तं एवं उक्थप्रज्ञान भोक्तेत्याहुमनीषिणः- से निकलने के अनुसार वंश्वानर, तैजस, प्राज्ञरूप देवसत्य, प्राज्ञसंपरिष्वक्त प्रज्ञानमन उत्क्रान्त होने वाले आत्मा में वाला अकंरूप इन्द्रियवर्ग - भोक्तात्मा है । यही उत्कान्त होता है । - वासनारूप ये प्राज्ञसंपरिष्वक्त प्रज्ञान ही मुख्य है । क्योंकि संस्कार इसी पर प्रतिष्ठित रहते हैं ॥ भावना इसीलिए हमने इस संस्काररूप कर्म्म ही जन्ममरण के कारण हैं । इन्हीं का पुनर्भव से सम्बन्ध माना है है । इसीलिए ऋषि ने तीसरे प्रश्न को प्रज्ञान से सम्बन्ध रखने वाले ' प्रज्ञान प्राण ' का निरूपक है? इसके जाने का ' मनसि संपद्यमानः ' कहा है । उदान द्वारा उत्क्रान्त होकर यह किस लोक करने में के जाता लिए १० वीं मन्त्र हमारे कैसा क्रम है? प्रसंगात् इन पुनर्भवसम्बन्धी विषयों का समाधान नाम से प्रसिद्ध हैं । इन्द्रिएँ बहिः सामने आता है । मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार ये चारों ' अन्तःकरण ' कि आगे आने वाले चौथे प्रश्न करण हैं - ये चारों अन्तःकरण हैं । ये चारों महान् की कलाएँ हैं । जैसा की और आपका ध्यान में स्पष्ट हो जाएगा । इनमें बुद्धि अहंकार को छोडते हैं । मन ओर चित्त है । वही चिन्मय महत् सोम श्राकर्षित करते हैं । क्योंकि पुनर्भव में प्रधानरूप से इन्हीं दोनों का सम्बन्ध लगता है एवं उसी का ( ज्ञानमय महानात्मा - अंशरूप से ) संकल्पविकल्पात्मक बनकर- ' मन ' ही कहलाने उससे अभिन्न सत्त्वात्मक चित्त-अंशभूत सत्त्वभाग ' चित्त ' कहलाता है । पहले मन है । मन के साथ चित्त मन से माग है । मन में जो संकल्पविकल्प होता है - वह चित्त द्वारा ही होता है । प्रज्ञाप्राणवत् चित्त और प्रज्ञानमन ( प्रज्ञानमन से ) अविनाभूत है, अतएव ' यत्प्रज्ञानमुत चेतः " जब इत्यादिरूप तक संकल्पविकल्पात्मक से चेतोरूप ( प्रज्ञान ) मन को एक ही वस्तु बतलाया गया है । चित्त सत्त्वात्मक है । बद्ध रहता है । मन के लय होने पर का प्राबल्य रहता है - तब महदंशभूत यह चित्त मन के साथ तक संकल्पात्मक मन है - जब सत्वरूप चित्त का भी उसी घन में ( महान् में ) लय हो जाता है । जब है-तक तो चित्त इसी में ओतप्रोत है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती “ यस्मश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु " - इति ॥ 2 जाकर ऋषि बतलाने ' सत्त्वात्मकं चित्तम् ' के अनुसार चित्त को सत्त्वरूप बतलाया है । आगे लोक में बाला हैं कि ' धन्ते मतिः सा गतिः ' के अनुसार जैसा अन्तकाल में संकल्प होता यही है - वह है कि तदनुरूप मन में अच्छे ही जाता है । ऐसी अवस्था में हमारे सामने एक प्रश्न श्राता है । वह प्रश्न है? क्यों बुरा संकल्प होता बुरे संकल्प उत्पन्न होने का क्या कारण है? क्यों इसमें अच्छा संकल्प होता किया है । चित्त सत्त्वरूप है? इस प्रश्न का समाधान करने के लिए ही ऋषि ने मन्त्र में चित्त शब्द उपात्त है तो अविद्यासंस्कार से वह है । यदि मनुष्य अविद्या अस्मिता रागद्वेषादिमूलक प्रवृत्तिरूप कर्म्म करता एक दीपक है । उस सत्त्वरूप चित्तभाग मलिन हो जाता है । कल्पना कर लीजिए कि चित्त आ जाता है तो पर चारों ओर से व्याप्त संकल्पविकल्पात्मक मन काच है । इस काच पर अविद्यामल मैली रोशनी निकली? - इसका सत्वरूप दीपशिखा की रश्मिएँ भी मलिन हो जाती हैं । काच में से क्यों १ - यजुर्वेद ३४।३ । २ - यजुर्वेद ३७।५ । [ १४२ ]
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण उत्तर है- मलिनता । बस, यही उत्तर यहाँ भी है । मन ही अविद्या को लाकर उस सत्त्वभाग को मलिन कर डालता है । इस मलिन सत्त्व पर प्रतिष्ठित मन से बुरे ही संकल्प होते हैं । परन्तु निवृत्तिकर्म्म से वह चित्तसत्त्व विशुद्ध होता हुआ अच्छे संकल्प का कारण बन जाता है । सुसंकल्प के लिए विशुद्धसत्त्वा बनना आवश्यक है । क्योंकि संकल्प सत्त्वरूपचित्त के ही अधीन है । निकलता हुआ, अतएव उदान नाम से प्रसिद्ध मुख्यप्राण को हमने उत्क्रान्ति का कारण माना है । भोक्तात्मा जैसे चित्त से युक्त रहता है यच्चित्त रहता है ( अर्थात् मरणकाल में चित्त जैसा शुद्ध या मलिन ) रहता है - ऐसे चित्त से ( चित्तयुक्त मन से ) युक्त होकर ( उत्क्रान्ति के लिए ) उसी मुख्यप्रारणरूप उदान के पास आता है । वहाँ तेजोभाग रहता है । उस तेज से युक्त होकर चित्तयुक्त प्रज्ञानमन उस वैश्वानर - तं जस - प्राज्ञरूप आत्मा के साथ युक्त होता हुआ अपने यथासंकल्पित लोक में उस आत्मा को ले जाता है । भोक्तात्मा अच्छे बुरे लोक में जाय, मुक्त हो या बन्धन में पड़े इन सबका एकमात्र कारण चित्त पर प्रतिष्ठित संकल्पविकल्पात्मक मन ही है । वही प्राणरूप तेज से इन्द्रियों से संस्कार से भूतानुशय से इस सारे प्रपञ्च से युक्त हो उसे स्वसंकल्पित लोक में ले जाता है । इसी अभिप्राय से यह कहा जाता है-" न देहो न च जीवात्मा नेन्द्रियाणि परंतप । मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः " ॥ मन का आधारभूत चित्त ( सत्त्व ) जैसा होता है - मन में वैसा ही संकल्प होता है । बस, जैसा मी चित होता है - अर्थात् मन जैसे चित्त से युक्त होता है - वैसे चित्त के द्वारा वह प्राण में आता है । वहीं के तेज से युक्त होकर देवसत्य नाम से प्रसिद्ध श्रात्मा से युक्त होता है । उसे साथ लेकर स्वसंकल्पित लोक में उसे ले जाता है । पुण्यसंकल्प द्वारा देवलोक में ले जाता है । पापसंकल्प द्वारा यमलोक में ले जाता है तथा दोनों की साम्यावस्था में वापस मनुष्ययोनि में ले आता है । जैसा कि --" अथैकयोर्ध्व उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नयति । पापेन पापम्-उभाभ्यामेव मनुष्यलोकम् " ॥ -इत्यादिरूप से पूर्व में कहा जा चुका है । इसी गतिविज्ञान को लक्ष्य में रखकर ऋषि कहते हैं-" यच्चित्तः ( मनः - यादृशचित्तयुक्तम् ) तेन ( तादृशेन चित्तेन युक्तं ) एष ( मनः ) प्राणं ( उदानाख्यं ) श्रायाति । ( तत्रस्थित सौर ) -तेजसा युक्तः ( भूत्वा ) सह श्रात्मना ( वैश्वानरतैजसप्राज्ञरूपभूतात्मना युक्तः तं ) यथासंकल्पितं लोकं नयति " ॥१० ॥
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण फलश्रुति: -यह सारा प्रपञ्च उस मुख्य विज्ञानप्राण की महिमा है । वह अमृतभावापन्न है - अक्षररूप है । यदि प्रज्ञान उस प्राण को जान लेता है- तन्मय हो जाता है तो वह मृत्युपाश से विमुक्त हो जाता है । इस उपनिषत् का प्रधान लक्ष्य विज्ञानाक्षर है- जैसा कि आगे के प्रश्नों से स्पष्ट हो जाएगा । यहाँ प्राण से यही अक्षररूप विज्ञानप्राण है जो कि अध्यात्म में आकर पञ्चधा विभक्त हो रहा है । उस विज्ञान को प्राप्त कर लेने पर मत्यबन्धन टूट जाता है । जो विद्वान् इस प्राण के स्वरूप को जान जाता है - प्रजाओं के प्राणभूत प्रजापतिरूप षोडशकल सौरप्राण को जान लेता है - उसका वंश कभी नष्ट नहीं होता । क्योंकि उसे जान लेने से प्रजोत्पत्ति का अधिष्ठाताभूत प्राजापत्य प्राण इसके शुक्र में प्रतिष्ठित हो जाता है । एवं यह स्वयं शरीरपरित्याग करता हुआ उसी प्राणरूप श्रमृताक्षर में लीन होता हुआ अतएव पुनर्भव से छूटता हुआ अमृतभाव को प्राप्त हो जाता है इसी अभिप्राय से ऋषि कहते है— " य एवं विद्वान्प्राणं वेद न
श्लोकः ” ॥११ ॥
हास्य प्रजा हीयतेऽमृतो भवति तदेष आश्वलायन ने जो ६ प्रश्न किए थे उनका यहाँ ५ प्रश्नों में ही अन्तर्भाव समझना चाहिये । आश्वलायन द्वारा किये गये सभी प्रश्नों का निरूपण हो चुका । अब उन पाँचों को " सिंहावलोकन-न्याय ' से उपसंहत करते हुए ऋषि कहते हैं-" उत्पत्तिमार्यात स्थानं विभुत्वं चैव पञ्चधा । अध्यात्मं चैव प्रारणस्य विज्ञायामृतमश्नुते विज्ञायामृतमश्नुते ” ॥१२ ॥
वह विज्ञानाक्षर प्राणरूप से प्रकृति में कैसे उत्पन्न हुभ्रा? यह पहला प्रश्न था । उत्पन्न होकर शरीर में कैसे श्राया? यह दूसरा प्रश्न था । आकर कैसे किस स्थान पर प्रतिष्ठित हुआ? यह तीसरा प्रश्न था । किसके द्वारा इस शरीर को छोडकर - ' तेजः परस्यां देवतायाम् ' के अनुसार उत्क्रान्त होकर अपने विभुभाव में व्याप्त हो गया? यह चौथा प्रश्न था एवं अध्यात्म और अधिदैवत में किस रूप से प्रतिष्ठित है? -यह पाँचवाँ प्रश्न था । उत्पत्ति, आयति, स्थान, विभुत्व, पञ्चधा अध्यात्मशब्द - इन पाँचों का पाँचों प्रश्नों से सम्बन्ध है । इस रहस्य को जो जान जाता है - उसे यह मालूम हो जाता है कि यह सब विज्ञानाक्षर की ही महिमा है जिसे कि अन्तर्य्यामिरूप से अन्तः प्रविष्ट रहने पर भी अविद्या में ग्रस्त न देखने वाले मनुष्य दंद्रम्यमाण हो रहे हैं । उसे जानो - जानकर अमृतत्व प्राप्त करो – इस प्राणनिरूपण से हमें केवल यही बतलाया है ॥१२ ॥
॥ इति प्रज्ञाप्राणनिरूष रणात्मकस्तृतीयप्रश्नः ॥ ॥ ३ ॥
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माध्य नाड़ीस्वरूप परिचय * प्रज्ञाप्राणनिरूपण उपनिषत् का तृतीय प्रश्न समाप्त हो चुका है जिस प्राण की हृदय में प्रतिष्ठा बतलाई है-उसके लिए-" तदेकशतं नाडीनाम् । तासां शतं शतमेकैकस्यां द्वासप्ततिद्वसप्ततिः प्रतिशाखानाडीसहस्राणि भवन्ति । श्रासु व्यानश्चरति " ॥ ' — यह कहा है । केवल भौतिक सायन्स को ही प्रधान मानने वाला एवं केवल इसी को पहचानने वाला आधुनिक वैज्ञानिक जगत् श्रुति के इन प्रक्षरों पर विश्वास करे या न करे - किन्तु भारतीय सन्तान के लिए तो वेद ईश्वर का वाक्य है । ईश्वर के अस्तित्व को मानने वाला भारतीय जगत् वेद को उसका नि: श्वास समझता है । वेद को उससे अभिन्न अतएव तत्सम पूज्य समझता है, अतः उसके मुख से सुनी हुई व्यान-सम्बन्धी ७२ हजार नाड़ियों के विषय में कम से कम इस जगत् को तो न कभी सन्देह हुआ था, न है-न होगा । इसका विश्वास है कि ऋषियों ने अपनी योगज दृष्टि से जिन इन्द्रियातीत पदार्थों का प्रत्यक्ष किया है - लोककल्याणार्थं उन्हीं तत्त्वों का उन्होंने ' शब्द ' ब्रह्म को आधार मानकर निरूपण किया है । यह सच है कि डाक्टर ऑपरेशन द्वारा ७२ हजार नाड़ियों का प्रत्यक्ष नहीं कर सकते । सूक्ष्मातिसूक्ष्म अणुवीक्षण यन्त्र द्वारा उनका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता । परन्तु इन्द्रिय एवं यन्त्रागम्य होने पर भी जैसे अब वे धीरे धीरे निराकार अन्तः प्रविष्ट देहातिरिक्त आत्मतत्त्व की सत्ता स्वीकार करने लगे हैं-एवमेव कोई समय आवेगा कि आज ७२ हजार शिराओं का उपहास करने वाला वही पाश्चात्त्य जगत् इनकी सत्ता मानेगा और अवश्य मानेगा । आज उन्हीं शिराओं का संक्षिप्त स्वरूप हम अपने उपनिषत्-प्रेमी पाठकों के सामने रखना चाहते हैं । पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश - ये पाँचभूत अतिसुप्रसिद्ध हैं । पांचों भूतों से ही हमारा शरीर बना है, सप्तधातु, शिरा, धमनी, स्नायु श्रादि यादि सारा शरीरप्रपञ्च इन्हीं पांच भूतों में अन्तर्भूत है । पञ्चीकृत पाँच भूतों से शरीर बना है, अतएव शरीर को ' महाभूतसमष्टि ' कहा जाता है । ७२ हजार नाड़ियों का इन्हीं पाँचभूतों से सम्बन्ध है । ७२ हजार के पाँच समान विभाग कर डालिए । इस विभाग से प्रत्येक विभाग में १४४०० ( चौदह हजार चार सौ ) नाड़िएँ हो जाती हैं । पाँचों भूतों में प्रत्येक में इतनी इतनी नाड़ियों का सम्बन्ध है । शिरा स्नायु धमनी - तीन प्रकार की नाड़िए आयुर्वेदशास्त्र में सुप्रसिद्ध हैं । रसवाहिनी नाड़िएँ- ' शिरा ' नाम से प्रसिद्ध हैं । ज्ञानवाहिनी नाड़िएँ ' स्नायु ' नाम से प्रसिद्ध हैं, अतएव स्नायुनाड़िएँ-' ज्ञानतन्तु ' भी कहलाती हैं एवं वायुवाहिनी नाड़िएँ ' धमनी ' ( धौंकनी नाम से लोकभाषा में प्रसिद्ध ) नाम से प्रसिद्ध हैं । जिन ७२ हजार नाड़ियों का यहाँ निरूपण हो रहा है- उनका केवल इसी धमनी से वायुवाहिनी धमनियों का ही ग्रहण सकता है । सम्बन्ध है । व्यान वायु है । ' आासु व्यानश्चरति से * पृष्ठ संख्या १३४ पर उल्लिखित तृतीय प्रश्न के छठे मन्त्र का परिशिष्टात्मक नाड़ीविषयक विवेचन । १- प्रश्नोप ० ३।६ । [ १४५ ]
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रज्ञाप्राण निरूपण केवल ये ही ७२ हजार हैं । यदि शिरा - स्नायु की संख्या मिलादी जाती है तो तिगुनी नाड़िएँ ( २१६००० दो लाख सोलह हजार ) हो जाती हैं । जहाँ व्यानवायु है वहाँ रस भी अवश्य है एवं जहाँ रस है वहीं-' पावानु वे रसस्तावानात्मा'- इस सिद्धान्त के अनुसार ज्ञान ( चेतना ) भी अवश्य है । वायु, रस, ज्ञान-तीनों अविनाभूत हैं । वायुसंचार से रसनिर्माण होता है । रस पर ज्ञान प्रतिष्ठित रहता है । इस प्रकार घमनी, शिरा, स्नायु - तीनों नाड़ियों का अविनाभाव सिद्ध हो जाता है । उपनिषन्मात्र अक्षर-विद्या का निरूपण करते हैं । अक्षर अभ्यय के प्राण से सम्बन्ध रखने वाला क्रियाशक्तिमय तत्त्व है । यही देवसत्य में आकर ' हिरण्यगम ' नाम से प्रसिद्ध होता है । व्यानवायु ही हिरण्यगर्भं है । चूंकि उपनिषद् प्रधानरूप से इसी का निरूपण करते हैं, अतएव उपनिषदों में हिरण्यगर्भ वायु से ( व्यानवायु से ) सम्बन्ध रखने वाली घमनी नाम से प्रसिद्ध ७२ हजार नाड़ियों का ही निरूपण किया गया है । अप्राकृत होने से स्नायु और शिरा को उपनिषदों में छोड दिया गया है । हां, कहीं कहीं ( क्षुरि-कोपनिषदादि में ) योग के सम्बन्ध से शिराओं का निरूपण किया गया है, परन्तु गौणरूप से, अतएव हम मी यहाँ उपनिषत् सम्बन्धी केवल ७२ हजार वायव्य ( व्यान ) नाड़ियों का ही निरूपण करेंगे । ( १ ) - पञ्चभूतात्मक शरीर में एक ही प्रकार की व्याननाड़िएँ - पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश इन पञ्चधा विभक्त पाँच भूतों के सम्बन्ध से पाँच स्थानों पर विभक्त होकर १- पृथिवीनाड़ी, २ - जल-नाड़ी, ३ - तेजोनाड़ी, ४ - वायुनाड़ी, ५- व्योमनाड़ी इन नामों से प्रसिद्ध हो जाती हैं । इन नाड़ियों के सम्बन्ध से हृदय में उक्थरूप से प्रतिष्ठित व्यानवायु प्रकंरूप से सर्वाङ्गशरीर में व्याप्त हो जाता है, श्रतएव इसके लिए- ' व्यानः सर्वशरीरगः ' यह कहा जाता है । इन पञ्चधा विभक्त नाड़ियों का शरीरगत भिन्न - भिन्न भावों से सम्बन्ध है एवं भायतन भेद से रस, वर्णं, स्पर्श भी पाँचों के भिन्न - भिन्न हैं । पहले पृथिवी - नाड़ियों को ही लीजिए । अस्थि, मांस, त्वचा - तीनों घनद्रव्य हैं । ' यत् कठिनं सा पृथिवी " के अनुसार तीनों का पृथिवीभाग से सम्बन्ध है । इन तीन स्थूल घातुओं के कारण १४४०० पार्थिव नाड़िएँ क्रमश: ४८०० ( चार हजार म्राठ सौ ) संख्या में तीनों में विभक्त हैं । अस्थि, मांस, त्वचा- तीनों में प्रत्येक के साथ ४८०० का सम्बन्ध है । संकलनया कुल १४४०० नाड़िएँ हो जाती हैं । इनका रस मधुर है, वर्ण पीत ( पीला ) है । स्पशं सम ( न उन - न मृदु ) है । इतनी ही जल नाड़िएँ हैं । शुक्र, शोणित, मज्जा तीन तरल धातु हैं । कफ, लाला आदि का इन्हीं में अन्तर्भाव है । ' यद् द्रवं तबापः २ - के अनुसार ये तीनों आपः भूत हैं । इन तीनों में वे जल नाड़िए- ४८०० क्रम से तीन भागों में. विभक्त हैं । संकलनया १४४०० हो जाती हैं । रस इनका शिव है । वर्णं श्वेत है । स्पर्श ठण्डा है । इतनी ही तेजोनाड़िए हैं । क्षुषा, तृषा, निद्रा तीन प्राग्नेय धातु हैं । अन्न की आहुति से शरीराग्नि शान्त होता हुमा शिव बन जाता है, अतएव रुद्राग्नि को शान्त करने वाले इस अन्न का नाम वैज्ञानिकों ने ' शान्तरुत्रिय ' रखा है । ' शान्तरुद्रिय ' को ही परोक्षप्रिय भूसुर ' शतरुद्रिय ' कहा करते हैं । शतपथ के मकाण्ड के संचिति प्रकरण में इस विषय का विशद विवेचन देखना चाहिए । विना अन्न के अग्नि प्रज्वलित हो जाता है । प्रज्वलित अग्नि क्षुब्ध हो जाता है । इस अग्नि के इस क्षोभ का ही नाम भूख १ - गर्मोपृ ० १ । २ - गर्भोप ० १ । १४६ ]