प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 161–170
प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 161–170
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण तीसरी है निद्रा-और प्यास है, मनएव इन दोनों वृत्तियों को हम असा करने के लिए तप्यार चतुर्थ हैं प्रश्न । में बड़े विस्तार वृत्ति । तेज ( सौर तेज के ) प्रबल आक्रमण से ही निद्रा होती है, जैसा कि मानने के लिए तय्यार के साथ बतलाया जा चुका है, अतएव निद्रा का भी हम तेज में ही अन्तर्भाव सिद्ध हो जाता है । प्रत्येक के । इस प्रकार क्षुधा, पिपासा, निद्रा तीनों का ' तेजोभूतत्व ' भलीभाँति हो जाती हैं । इनका साथ ४८०० तेजोनाड़ियों का सम्बन्ध है । संकलन से १४४०० नाड़िएँ रस तीक्ष्ण है, वर्ण लाल है - स्पर्श ऊष्म है । इतनी ही वायुनाड़िए हैं । , बोलना- तीनों गतिधर्म्मा घावन ( दौड़ ), चलन, भाषण- तीन वायुधातुएँ हैं । दौड़ना, चलना कहने के लिए तय्यार हैं । जो नाड़ी-वायु के व्यापार हैं, श्रतएव हम इन तीनों व्यापारों को वायुधातु विभाग पूर्व में था, वही यहाँ है । सम्बन्ध है । लज्जा इतनी ही व्योमनाड़िएँ हैं । द्वेष, लज्जा, भय - तीन भावों का श्राकाश से है एवं द्वेष में दूसरे से मैं प्रकाश संकुचित होता है । भय में प्रतिष्ठा से गिरता है सम्बन्ध - जगह रखते छोड़ता हैं । इन तीनों के साथ भी अपने को हटाता है । तीनों व्यापार अन्तरिक्षरूप आकाश से जाता बही विभाग है । इन पाँचों प्रकार की नाड़ियों का यदि संकलन किया तो कुल ७२ हजार पर विभक्त हैं । इसी विज्ञान को नाड़िएँ हो जाती हैं । पाँच जगह समान संख्या से तीन तीन स्थानों लक्ष्य में रखकर अनुगम - श्रुति कहती है-" यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति । यस्तद्वेद स वेद सर्वं सर्वा विशो बलिमस्मै हरन्ति " - इति ॥ ' का रस कटु है । वायुनाड़ियों का रस अम्ल है । वर्णं चित्र है । स्पशं सम है । व्योमनाड़ियों वर्णं श्याम है- स्पर्श कटु है । में वह एक ही सौर इन पाँचों नाड़ियों की पुष्टि प्राणादि पांच प्राणों से होती हैं । इस शरीर , अपान- इन पांच भागों में प्राण - ' पञ्चधाऽऽत्मानं प्रविभज्य ' के अनुसार प्राण, उदान, व्यान प्राण , समान हृदय में प्रतिष्ठित है । अपान विभक्त होकर प्रतिष्ठित रहता है । ' हृदि एष आत्मा ' के अनुसार । उदान कण्ठदेश में प्रतिष्ठित है एवं मूलद्वार में प्रतिष्ठित है । समान नाभिप्रदेश में प्रतिष्ठित काम है हैं । नाड़ियों को पुष्ट करना - तत्त-व्यान सर्वंशरीर में प्रतिष्ठित है । इन पाँचों प्राणों के दो दो रखना पहला काम है । हृत्प्रदेश द्भुतरसोपजनित - तत्तद्भूतमय तत्तन्नाड़ियों को तत्तद्भूतों से सुरक्षित में प्रतिष्ठित अपानप्राण जलनाड़ियों में प्रतिष्ठित प्राण पृथिवीनाड़ियों को पुष्ट करता है । मूलद्वार को पुष्ट करता है । नामिप्रदेश में पुष्ट करता है । कण्ठप्रदेश में प्रतिष्ठित उदान तेजोनाड़ियों सर्वशरीर- प्रतिष्ठित ब्यानप्राण व्योम-प्रतिष्ठित समानप्राण वायुनाड़ियों को पुष्ट करता है एवं नाड़ियों का पोषण करता है । १- छान्दोग्योप ० २।२२।३ । [ १४७ 1
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण हमारे शरीर में पाँच ज्ञानेन्द्रिएँ हैं, पांच कर्मेन्द्रिएँ हैं । चक्षु, घाण, श्रोत्र, रसना, त्वक् - ये पाँच ज्ञानेन्द्रिएँ हैं । वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ- पाँच कर्मेन्द्रिएँ हैं । इन दसों इन्द्रियों के भी प्रभव-प्रतिष्ठा -परायण ( शरीरवत् ) पाँच भूत ही हैं । नासेन्द्रिय गन्ध से सम्बन्ध रखने के कारण - ' पृथिवी-प्रिय ' है, क्योंकि गन्धतन्मात्रा का पृथिवी से ही सम्बन्ध है - जैसा कि छठे प्रश्न में बड़े विस्तार से बतलाया जाएगा । रसना ( जिह्वा ), शिश्न ( उपस्थ ) दोनों जलेन्द्रिय हैं । रसना सदा श्रार्द्र रहती है । शिश्न से ही मूत्रविसर्जन होता है, अतएव इन दोनों को अवश्य ही हम ' जलेन्द्रिय ' कह सकते हैं । नेत्र, पाद- दोनों तेज इन्द्रिय हैं । नेत्र आदित्यतेज से निष्पन्न हैं । पाद भूमि से बने हैं । भूमण्डल अग्निमय भूतात्मा का प्रवेश इस पाद के प्रपदस्थान से होता है । पाणि, नाभि, त्वक् - तीनों वायव्य इन्द्रिएँ हैं । श्रोत्र, वाक् - दोनों व्योमेन्द्रिएं हैं-नासा पृथिवीन्द्र पृथिवी । जिह्वा - शिश्न जलेन्द्रिएँ जल । नेत्र- पाद तेज - इन्द्रिएँ तेज । पाणि, नाभि वायव्येन्द्रिएँ वायु । श्रोत्र, वाक् व्योमेन्द्रिएँ आकाश । नासा ( घाण ) - ज्ञानेन्द्रिय • पृथिवीन्द्रिय ] पृथिवी जिह्वा ( रसना ) - ज्ञानेन्द्रिय अलेन्द्रिय + जल शिश्न ( उपस्थ ) - कर्मेन्द्रिय -जलेन्द्रिय पाणि - कर्मेन्द्रिय -वायव्येन्द्रिय नाभि • कर्मेन्द्रिय वायव्येन्द्रिय → बायु वक् ज्ञानेन्द्रिय वायव्येन्द्रिय घोष - ज्ञानेन्द्रिय व्योमेन्द्रिय → श्राकाश वाक् - कर्मेन्द्रिय व्योमेन्द्रिय नेत्र - ज्ञानेन्द्रिय तेज इन्द्रिय → तेज पाद - कम्र्मेन्द्रिय तेज इन्द्रिय इनमें और तो सब इन्द्रिएँ आ जाती हैं - केवल पायु ( मूलद्वार ) छूट जाता है । ' पायूपस्थे ' के अनुसार इसका उपस्थ में ही अन्तर्भाव है । इसके अलावा यहाँ ' नामिदंशमी ' के अनुसार नाभिरिन्द्रिय [ १४८ ]
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण और मानली गई है । नासेन्द्रिय का काय्यं है - नाड़ी द्वारा गन्धग्रहण, गन्धविसर्जन । अच्छी गन्ध ले लेना, बुरी को छोड देना - दो काम इसके हैं । शिश्न धौर जिल्ह्वा का रसग्रहण, रसपरित्याग - दो घमं हैं । जिह्वा स्वादरस को लेती है । शिश्न रतिरस को लेता है । जिह्वा रसरूप थूक का परित्याग करती है । शिश्न मूत्रविसर्जन करता है । नेत्रों में, पादों में सौर तेज आता रहता है - जाता रहता है । गति इन्द्र का धम्मं है । इन्द्र में प्रकाश एवं गति दोनों हैं । प्रकाशभाग ज्ञानसम्बन्धी है । गतिभाग किया सम्बन्धी है । दोनों की समष्टि तेज है । पाद से क्रिया तेज का आदान - विसगं होता है । चक्षु से ज्ञान-मय रूपतेज का आदान - विसर्ग होता है । पाणि, नाभि, त्वक् से वायु का आदान - विसर्ग होता है । पारिण से जो क्रिया होती है - वह वायव्या ही है । श्रोत्र वाक् से शब्द का आदान - विसर्ग होता है । श्रोत्र शब्द लेता है, वाक् निकालती है । इन इन्द्रिय विषयों के आगमन - निर्गमन के अधिष्ठाता भी बे ही पाँचों प्राण । तत्तदिन्द्रियसम्बन्धी नाड़ियों का पोषण करना इनका पहला काम था एवं नाड़ीपोषण द्वारा तत्तद्विषयों की प्रगति -निर्गति करना दूसरा काम है । ( २ ) - प्राण हृदय में प्रतिष्ठित है । इसकी व्याप्ति नान्दनद्वार ( ब्रह्मरन्ध्र ) तक है । वहीं से यह आता है । नान्दन इसकी योनि है । हृदय प्रतिष्ठा है । हृत्प्रतिष्ठ प्राण अपनी योनिरूप नान्दन से सूय्यं तक अपना सम्बन्ध रखता है । ब्रह्मरन्ध्र से निकलकर निमेषमात्र में तीन बार सूर्य में जाता है - आता है । गुदप्रतिष्ठ अपान प्राण ( पार्थिव देवता ) गुद से निकलकर भूकेन्द्र तक जाता आता रहता है । व्यान प्राण हृदय से ऊपर नान्दन तक, हृदय से नीचे गुदा तक सर्वाङ्ग शरीर में चक्कर लगाया करता है । कण्ठस्थ उदान तेज द्वारा आधिदैविक सौर प्राण देवताओं को इन्द्रियों में परिणत कर शरीर में प्रतिष्ठित रखता है । जब तक तेजरूप उदान है तभी तक वे देवता इन्द्रियरूप में परिणत होकर अध्यात्म में प्रविष्ट हैं । उपशान्ततेजा के इन्द्रियदेवता मन से युक्त हो- शरीर से उत्क्रान्त हो जाते हैं एवं समान भूतप्रपञ्च को देह में प्रविष्ट रखता है । अन्नाहुति से भूतसत्ता रहती है । इस ग्राहुति को समभाव में परिणत कर तद्द्द्वारा भूतों को प्रतिष्ठित रखने वाला वही समान है - जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है । नाड़ी सम्बन्ध से प्रत्येक के साथ १४४०० नाड़ियों का सम्बन्ध हो जाता है । संकलन से कुल ७२ हजार नाड़िएँ हो जाती हैं । ( ३ ) - ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र इन तीन देवताओं से ही आधिदैविक प्रपञ्च का संचालन हो रहा है । इन्हीं तीन पर अध्यात्मजगत् प्रतिष्ठित है । ब्रह्मा स्थितितत्त्व है । इस प्रतिष्ठा पर विष्णु और इन्द्र-ये दो अक्षर प्रतिष्ठित हैं । हमारे में पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यो - इन तीनों लोकों का रस निरन्तर माता रहता है । इस त्रैलोक्य अन्न को हम निरन्तर खाते रहते हैं । परन्तु साथ ही में तीनों भाग खर्च भी होते रहते हैं । यदि ऐसा न हो तो भूख ही न लगे । बस, इसमें जितना अन्न का श्रागमन होता है वह आगतिरूप प्रशनाया -युक्त विष्णु की कृपा है । ब्रह्माक्षर प्रतिष्ठित विष्णु अशनाया द्वारा त्रैलाक्य के अन्न को लिया करते हैं, परन्तु विक्षेपणधर्म्मा इन्द्र अपने विक्षेषण के प्रभाव से आये हुए प्रश्न को निकाल देते हैं । सूर्य्य से जो भाग भाता है वह प्राण कहलाता है । इसका आगमन नान्दनद्वार से होता है । यह श्रागमन विष्णु द्वारा होता है । साथ ही में आया हुआ प्राण निकल भी जाता है । वह [ १४१ ]
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माध्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण । यह आया हुआ प्राण आध्यत्मिक सूर्य्यं था । वही सूर्य्यं निकलता हुआ उदान नाम धारण कर लेता है निर्गमन - विक्षेपणम् इन्द्र के द्वारा होता है । इस प्रकार इन्द्र विष्णु की स्पर्धा के कारण नान्दन, कण्ठ - स्थान में प्रतिष्ठित आध्यात्मिक सूर्य की ( सौर प्राण की ) प्राण, उदान दो संज्ञाएँ हो जाती हैं । यह हुई भूलोक के अन्न के आदान - विसर्ग की व्यवस्था । अब चलिए- पार्थिव अन्न की ओर । मूलद्वारा विष्णु जिस पार्थिव रस को लाकर ( पार्थिव प्राण को लाकर ) नाभि में प्रतिष्ठित करते हैं - वह ' समान ' कहलाता है । इन्द्र द्वारा गुदमार्ग से निकलता हुआ वही समान ' प्रपान ' नाम धारण कर लेता है एवं अन्तरिक्ष से वायव्यमाग भाता है । इसी का नाम व्यान है । इन सारे द्यावापृथिवी के रसों को सर्वाङ्गशरीर में अपनी क्रियाशक्तिद्वारा यथास्थान का प्रतिष्ठित करना इस व्यान का काम है । यदि व्यान न हो तो किसी रस का संचार न हो । रस संचार न हो तो न शरीर में प्राणोदानरूप सौर देवता रहें एवं न समानापानरूप पार्थिव देवता रहें, अतएव प्रादेशमित अतएव च वामन नाम से प्रसिद्ध मध्यस्थ व्यानरूप विष्णु के लिए-" उध्वं प्राणमुन्नयति अपानं प्रत्यगस्यति । मध्ये वामनमासीनं सर्वे देवा उपासते " ॥ ' — यह कहा जाता है । प्राणोदान द्युलोक का अन्न है । समानापान पार्थिव अन्न है । व्यान श्रान्तरिक्ष्य है । मध्य व्यान ही दोनों का संचालक है । यही जीवन का कारण है - जैसा कि पूर्व के उपनिषदों में कई स्थानों पर बताया जा चुका है । ये पांचों असल में सौर प्राण हैं । सूर्य्यं ही त्रैलोक्य में परिणत होकर पाँच स्थानों में परिणत हो रहा है । इन्हीं को हमने गार्हपत्यादि नाम से व्यवहृत किया है । पांचों प्राणाग्नि हैं । इन्हीं के लिए चौथे प्रश्न में- ' प्राणाग्नय एवंतस्मिन् पुरे जाग्रति ' - यह: -कहा गया है । वहीं सौर सत्यप्राण ( मुक्यप्राण ) - पञ्चधा आत्मानं प्रविनश्य के, समान अनुसार , अपानरूप क्रमश नान्दन, कण्ठ, हृदय, नाभि, मूलद्वार- इन पाँच स्थानों में क्रमशः प्राण, उदान, व्यान में परिणत होकर प्रतिष्ठित हुआ है । सौर प्राण प्रादित्याग्निरूप होने से सत्य है क्योंकि अग्नि स्वस्व सत्य हुआ करती है, अतएव तद्रूप इन पांचों को हम सत्य कहने के लिए तम्बार है । पांचों हैं प्राण । प्रतिष्ठा में सत्यरूप से ( उक्थरूप से ) प्रतिष्ठित होकर अर्करूप से सर्वत्र व्याप्त हो रहे ( ४ ) - इन पाँचों में चार सन्धिभाग हैं । इन चार सन्धियों में चार प्रकार का वायव्य ( अतएव ऋत ) प्राण प्रतिष्ठित है । इन पाँचों के ऊपर सर्वत्र एक ऋतप्राण और भरा रहता है । इस प्रकार सत्यवत् में जो ऋत पाँच ही प्रकार के प्राण हो जाते हैं । मूलद्वार से नाभि तक एक प्रादेश है । इस अन्तरिक्ष सम्बन्ध है । प्राण भरा रहता है वह ' कू ' नाम से प्रसिद्ध है । सुप्रसिद्ध तान्त्रिक कुम्मचक्र का इसी से नाभि से हृदय तक के एक प्रादेश में जो ऋतप्रारण भरा रहता है - वह ' नाग ' नाम से प्रसिद्ध है । हृदय से कष्ठ तक के एक प्रादेश में व्याप्त ॠतप्राण ' कूकल ' नाम से प्रसिद्ध है । कण्ठ से ब्रह्मरन्ध्र तक के १ - कठोप • २०२३ । [ १५० ]
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण एक प्रादेश में व्याप्त ॠतप्राण ' देवदत ' नाम से प्रसिद्ध है । ये चारों ऋतप्राण सत्य से वेष्टित हैं । उपक्रम में नान्दनस्थानीय प्राण नाम से प्रसिद्ध सत्यतत्त्व है । उपसंहार में मूलद्वारस्थानीय अपान नाम से प्रसिद्ध सत्यतत्त्व है । परन्तु इन पांचों सत्यों पर व्याप्त एक ऋतप्राण धौर है । ' ऋते भूमिरियं श्रिता ' के अनुसार ऋतचतुष्टयीगमित सत्यपञ्चक उस ऋत के पेट में हैं । इसीलिए अन्त में ऋषि को ' ऋतं नात्येति किञ्चन ' यही कहना पड़ता है । इस सर्वव्यापक ऋतप्राण का नाम है - ' धनञ्जय ' । प्राणापानरूप सत्य से शरीर प्रतिष्ठित है । दोनों अध्यात्मप्रपञ्च की संपत्ति ( धन ) हैं । परन्तु उस सर्वव्यापक ऋतप्राण ने इन पर भी अपना प्रभुत्व रख रखा है, प्रतएव वैज्ञानिकों ने इसे ' धनञ्जय ' नाम से व्यवहृत किया है । ( ५ ) - जैसे निद्रामयादि उन सत्यप्रारणों के काम नियत हैं- एवमेव इन पाँचों ऋतप्राणों के कार्य्यं भी नियत हैं । नाग से उद्गार निकलता है । मनुष्य में जो उद्गार वायु निकलता है - उसका प्रभव नागवायु है । नेत्रों में जो निमेषोन्मेष हुआ करता है वह ' कू ' से सम्बन्ध रखता है । क्षुधा पिपासा का जैसे उदान से सम्बन्ध है, तथैव इन दोनों का कृकलास से भी सम्बन्ध है । जंभाई ( जृम्भा ) देवदत्त से निकलती है । मृतशरीर में जो शोथ ( सूजन ) आ जाती है - वह धनञ्जय की महिमा है । इन पाँचों से युक्त पाँचों सत्यप्राणों में प्रत्येक के साथ १४४०० नाड़ियों का सम्बन्ध है । संकलनया ७२ हजार नाड़िएँ हो जाती हैं । यह है - ७२ हजार नाड़ियों का स्वरूपनिदर्शन । शरीर में ७२ हजार क्रियानों का ऋषियों ने प्रत्यक्ष किया है । उन्हीं के आधार पर ७२ हजार नाड़ियों का अपनी आर्षदृष्टि से पता लगाया है । प्रत्येक क्रिया की भिन्न - भिन्न नाड़ी है । उन ७२ ( बहत्तर ) हजार नाड़ियों में प्रविष्ट, अतएव ७२ हजार स्वरूप धारण करने वाले उस व्यानवायु ने ही सबका संचालन कर रखा है । पूर्वोक्त सारे विषयों का निर्दिष्ट संख्याक्रम से आगे बतलाए जाने वाली तालिकाओंों से भली-भाँति स्पष्टीकरण हो जाता है--[ १५१ ]
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1-8 प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण ( १ ) - नाड्यश्चतुर्दशसहस्रचतुःशतानि ( १४४०० ) पञ्चधा प्रगुणितानि = ७२,००० १४४०० पृथिवीनाड्य: -४५०० मधुरो रसः १- पृथिवी ( e ) मांसे ४८०० पीतो वर्णः त्वचि ४८०० समस्पर्शः १४४०० प्राणो हृदये पृथिवीगृहे वसन् पृथिवीनाडीः पुष्णाति । पृथिवीन्द्रिये नासामू पृथिवोतन्मात्रां गन्धं प्रवेशयति निर्गमयति च । 7-88 १४४०० जलनाड्यः-शुक्र ४८०० ॐ शिवो रसः २- प्रापः शोणिते ४५०० श्वेतो वर्णः मज्जायाम् ४८०० शीतस्पर्शः 1508 Pe १४४०० ३-४ अपानो गुवे तिष्ठन् जलनाडीः पुष्णाति । जिह्वाशिश्ने जलेन्द्रिये रसं प्रवेशयति निर्गमयति च । १४४०० तेजोनाड्यः --क्षुधायाम् -४८०० तीक्ष्णो रसः ३- तेजः पिपासायाम् ४८०० रक्तो वर्णः निद्रायाम् ४८०० उष्णः स्पर्शः १४४०० उदानः कण्ठे तिष्ठन् तेजोनाडीः पुष्णाति । नेत्रं पादं च तेज इन्द्रियं प्रवेशाय निर्गमाय च । [ १५२ ] क्रमशः
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानमाध्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण 8-8 १४४०० वायुनाड्यः-घावने ४५०० अम्लो रसः ४- वायुः चलने ४८०० चित्रो वर्णः भाषणे -४८०० समः स्पर्शः ५-१४४०० समानो नामो वायुनाडी: पोषयति, पाणिर्नाभिरिन्द्रिये स्व - प्रवेशाय निर्गमाय च । १४४०० व्योमनाङयः-द्वेषे ४८०० कटुरस: ५- आकाशः लज्जायाम्- ४५०० श्यामो वर्णः भये ४८०० कटुस्पर्श: १४४०० -pige व्यानः सर्वशरीरे व्योमनाडीः पोषयति, भोत्रं बागिन्द्रियं शब्दस्य प्रवेशाव निर्गमाय च । [ [ ५३ ]
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तृतीय श् प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य • प्रज्ञाप्राणनिरूपण सूय्यं प्रवेशयति विष्णुः नान्दनः ( २ ) [ प्राण: [ १४४०. सूयं निर्गमयति इन्द्रः कण्ठः ऋतम् ' - १ f उद्यान f १४८०० देहे रसान् संनिवेशयति हृदयः ऋतम् ' - २ J ध्यानः f १४४०० पृथिवीं प्रवेशयति विष्णुः नाभिः ' ऋतम् ' - ३ समानः १४४०० पृथिवीं निर्गमयति इन्द्रः ' ऋतम् ' - ४ J भवान: [ १४४०० गुद: J सम्भूय ७२००० नाडघः → सत्यम् - १ ' प्राणः ' किंगर द्यौ: -३ सत्यम् - २ ' उदानः ' → सत्यम् - ३ ' व्यान् ' -अन्तरिक्षम् - २ + सत्यम् - ४ ' समानः ' ' सत्यम् - ५ ' अपानः ' - → पृथिवी - १ सत्यम् ऋतम् सत्यम देवदत्तः ० ५ - घ . ५- ऋ . .त . ऋतम् कृकल : सत्यम् ऋतम् O नाग : सत्यम् ० ऋतम् कर्म्मः सत्यम् ० स [ १५४ ]
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प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माध्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण नाडीषु पञ्चप्रारणाः नान्दनात् — सूर्य्यान्तः । [ १४४०० - प्राणः -। १४४० ० – अपान: गुदाव——-भूकेन्द्रान्तः । [ १४४० ० – ध्यानः नान्दनात् - गुदान्तः । १४४०० - उदानः + देवान् देहे निवेशयति । • १४४०० - समान: + भूतानि देहे निवेशयति । ७२००० चलाः - ऋतानि पञ्च ' हृदयान्नाभ्यन्ते वितस्तिमात्रप्रदेशे ' । ' नाभेर्मूलान्ते जलगृहे वितस्तिमात्रदेशे ' । ' हृदयात् कण्ठान्ते तेजोगृहे वितस्तिमात्र देशे ' । ' नाभेः पार्श्वे वामे वितस्तिमात्र प्रदेशे ' । नाभेः पार्श्वे दक्षिणे वितस्तिमात्रदेशे ' । ( १ ) नागः 1 ऋतम् ( २ ) कूर्म्मः ऋतम् ( ३ ) कृकलः ऋतम् ( ४ ) देवदत्तः ऋतम् -( ५ ) धनञ्जयः -ऋतम् सत्याः- अचलाः पञ्च १- प्राणः सत्यः । २- श्रपानः सत्यः । ३- व्यानः सत्यः । ४- समानः सत्यः । ५- उदानः सत्यः । [ १५५ ]
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य १- नागात् - उद्गारः । २ - कूर्म्मात् — नेत्रनिमेषोन्मेषो । - क्षुधापिपासे । ३- कृकलात् ४- देवदत्तात् — जृम्भा । --श्वयथुः ५- धनञ्जयात् ॥ इति नाडी - तालिका - प्रदर्शनम् ॥ प्रज्ञाप्राणनिरूपण होती हैं । इनमें प्रतिनाड़ी इस प्रकार व्यान वायु की आधारभूता ७२ हजार मूलनाड़िएँ इतनी नाड़िएँ हो जाती हैं-शाखाओं का संकलन और करा दिया जाता है तो कुल - ७२७२१०१०१ हजार मूलनाड़ियों का पूर्व में निरूपण जैसा कि मन्त्रार्थं करते समय बतलाया जा चुका है । जिन ७२ हैं— किया गया है - उसमें से निम्नलिखित १० नाड़िएँ मुख्य मानी जाती १- इडा वामनासायाम् वायुमयी वायुस्वरसम्बन्धिनी २- पिङ्गला दक्षिणनासायाम् सौरप्राणमयी सूर्य्यस्वरसम्बन्धिनी ३- सुषुम्णा उभयोर्मध्ये चान्द्रप्राणमयी चन्द्रस्वरसम्बन्धिनी ४ - गान्धारी वामनेत्रे ५- हस्तिजिह्वा दक्षनेत्रे ६ - पूषा दक्षकर्णे ७- यशस्विनी वामकर्णे ८- अलम्बुसा E- कुहूः १० - शंखिनी ॥ लिङ्गे मूले [ १५६ ]