प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 171–180

प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 171–180

पृष्ठ 171

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प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माध्य तृतीय प्रश्न एते नाडीसहस्रेषु वर्तन्ते जीवरूपिणः । १- ध्यानबिन्दू ० ५१-५८ एवं ६० । [ १५७ ] प्रज्ञाप्राणनिरूपण fapoy IPP TATIO शि निम्नलिखित श्लोकों से इन नाड़ियों का स्वरूप ज्ञान मलीभांति हो जाता है--॥ तत्र नाड्यः समुत्पन्नाः सहस्राणि द्विसप्ततिः । तेषु नाडीसहस्रेषु द्विसप्ततिरुदाहृताः ॥ १ ॥

प्रधानाः प्रारणवाहिन्यो भूयस्तत्र दश स्मृताः ।

इडा च पिङ्गला चैव सुषुम्ना च तृतीयका ॥२ ॥

गान्धारी हस्तिजिह्वा च पूषा चैव यशस्विनी ।

अलम्बुसा कुहूरत्र शङ्खिनी दशमी स्मृता ॥३ ॥

एवं नाडीमयं चक्रं विज्ञेयं योगिना सदा ।

सततं प्रारणवाहिन्यः सोमसूर्याग्निदेवताः ॥ ४ ॥

इडापिङ्गलासुषुम्नास्तिस्रो नाड्यः प्रकीर्तिताः ।

इडा वामे स्थिता भागे पिङ्गला दक्षिणे स्थिता ॥ ५ ॥

सुषुम्ना मध्यदेशे तु प्रारणमार्गास्त्रयः स्मृताः ।

प्राणोऽपानः समानश्चोदानो व्यानस्तथैव च ॥६ ॥

नागः कूर्मः कृकरेको देवदत्तो धनञ्जयः ।

प्रारणाद्याः पञ्च विख्याता नागाद्याः पञ्च वायवः ॥ ७ ॥

प्राणापानवशो जीवो ह्यधश्चोर्ध्वं प्रधावति ॥८ ॥

प्राणापानसमाक्षिप्तस्तद्वज्जीवो न विश्रमेत् । पानात्कर्षति प्राणोऽपानः प्राणाच्च कर्षति - इत्यादि " ॥ '

पृष्ठ 172

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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण का काय्यं देवता - स्थान-कितने ही वैज्ञानिक १४ नाड़ी प्रधान मानते हैं । इन चौदह नाड़ियों बतलाया है एवं जिन पार्थिवादि परिमाण सब भिन्न - भिन्न हैं । पूर्व में देवदत्तादि का जो जो कार्य्यं हमने के श्लोकों से स्पष्ट हो जाता है । नाड़ियों का शुक्रादि धातुओं से सम्बन्ध बतलाया है वह सब आगे ( प्रमाणपरतन्त्र ) महानु-यद्यपि श्लोक उद्धृत करने की आवश्यकता न थी, तथापि लक्षणैकचक्षुष्क

भावों के सन्तोष के लिए ऐसा करना पड़ता है-शरीरं तावदेव स्यात्षण्णवत्यगुलात्मकम् ।

देहमध्ये शिखिस्थानं तप्तजाम्बूनदप्रभम् ॥१ ॥

त्रिकोणं मनुजानां तु सत्यमुक्तं हि सांकृते ।

गुदात्तु द्व्यङ्गुलादूर्ध्वं मेद्रात्तु द्व्यङ्गुलादधः ॥ २ ॥

देहमध्यं मुनिप्रोक्तमनुजानीहि सांकृते ।

कन्दस्थानं मुनिश्रेष्ठ मूलाधारान्नवाङ्गुलम् ॥३ ॥

चतुरङ्गुलमायामविस्तारं मुनिपुङ्गव ।

कुक्कुटाण्डसमाकारं भूषितं तु त्वगादिभिः ॥ ४ ॥

तन्मध्ये नाभिरित्युक्तं योगज्ञैर्मुनिपुङ्गव ।

कन्दमध्यस्थिता नाडी सुषुम्नेति प्रकीर्तिता ॥५ ॥

तिष्ठन्ति परितस्तस्या नाड्यो हि मुनिपुङ्गव ।

द्विसप्ततिसहस्राणि तासां मुख्याश्चतुर्दश ॥६ ॥

सुषुम्ना पिङ्गला तद्वदिडा चैव सरस्वती ।

पूषा च वरुरणा चैव हस्तिजिह्वा यशस्विनी ॥ ७ ।

अलम्बुसा कुहूश्चैव विश्वोदरी तपस्विनी ।

शङ्खिनी चैव गान्धारा इति मुख्याश्चतुर्दश ॥ ८ ॥

श्रासां मुख्यतमास्तिस्त्रस्तिसृष्वेकोत्तमोत्तमा ।

ब्रह्मनाडीति सा प्रोक्ता मुने वेदान्तवेदिभिः ॥६ ॥

[ १५८ ] 187

पृष्ठ 173

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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य

पृष्ठ मध्यस्थितेनास्थ्ना वीरणादण्डेन सुव्रत ।

सह मस्तकपर्यन्तं सुषुम्ना सुप्रतिष्ठिता ॥ १० ॥

सुषुम्नाया इडा सव्ये दक्षिणे पिङ्गला स्थिता ॥११ ॥

सरस्वती कुहूश्चैव सुषुम्ना पार्श्वयोः स्थिते ।

गान्धारा हस्तिजिह्वा च इडायाः पृष्ठपार्श्वयोः ॥१२ ॥

पूषा यशस्विनी चैव पिङ्गला पृष्ठपूर्वयोः ।

कुहोश्च हस्तिजिह्वाया मध्ये विश्वोदरी स्थिता ॥ १३ ॥

यशस्विन्याः कुहोर्मध्ये वरुणा सुप्रतिष्ठिता ।

पूषायाश्च सरस्वत्या मध्ये प्रोक्ता यशस्विनी ॥१४ ॥

गान्धारायाः सरस्वत्या मध्ये प्रोक्ता च शङ्खिनी । अलम्बुसा स्थिता पायुपर्यन्तं कन्दमध्यगा ” ॥१५ ॥ '

॥ इति परिशिष्टसहितस्तृतीयप्रश्नः ॥ १- श्रीजाबालदर्शनोप ० ४।१-१० एवं १३-१७ । [ १५६ ] प्रज्ञाप्राणनिरूपण

पृष्ठ 174

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अथ भूतप्राणनिरूपणात्मकः चतुर्थप्रश्नः ४-४ - पृथिवी - भोक्तात्मा

“ त्रिषु धामसु यद्भोग्यं भोक्ता भोगश्च यद्भवेत् ।

तेभ्यो विलक्षणः साक्षी चिन्मात्रोऽहं सदाशिवः ” ॥

( कैवल्योप ० १८ ) “ आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ” । ( कठोप ० ११३२४ )

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श्रथ प्रश्नोपनिषदि -चतुर्थः प्रश्नः [ मूलपाठः ] अथ हैनं सौर्यायरणी गार्ग्यः पप्रच्छ ॥ भगवन्नेतस्मिन्पुरुषे भवति कानि स्वपन्ति कान्यस्मिन् जाग्रति कतर एष देवः स्वप्नान्पश्यति कस्यैतत्सुखं कस्मिन्नु सर्वे संप्रतिष्ठिता भवन्तीति ॥१ ॥

तस्मै स होवाच, यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्म-परे देवे स्तेजोमण्डल एकीभवन्ति ताः पुन पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत्सर्वं न मनस्येकीभवति ॥ तेन तर्ह्येष पुरुषो न श्रृणोति न पश्यति न जिघ्रति नेयायते रसयते न स्पृशते नाभिवदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते स्वपितीत्याचक्षते ॥२ ॥

व्यानो-प्राणाग्नय एवैतस्मिम्पुरे जाग्रति । गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो ऽन्वाहार्यपचनो यद्गार्हपत्यात्प्ररणीयते प्ररणयनादाहवनीयः प्राणः ॥३ ॥

ह यदुच्छ्वासनिःश्वासावेतावाहुती समं नयतीति स समानः ॥४ ॥ ॥ मनो वाव यजमान इष्टफलमेवोदानः स एनं यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति, यद्द्दष्टं दृष्टमनुपश्यति, श्रुतं श्रुत-, दृष्टं मेवार्थमनुशृणोति, देशदिगन्तरैश्व प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति सर्वं पश्यति चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्च सर्वः पश्यति ॥५ ॥।

स यदा तेजसाभिभूतो भवत्यत्रैष देवःस्वप्नान्न पश्यत्यथ तदेतस्मिञ्छरीर एतत्सुखं भवति ॥ ६ ॥

[ १६३ ]

पृष्ठ 178

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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण स यथा सोम्य वयांसि वासोवृक्षं संप्रतिष्ठन्ते ॥ एवं ह वै तत्सवं पर श्रात्मनि संप्रतिष्ठते ॥७ ॥

पृथिवी च पृथिवीमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा चाकाशश्चाकाशमात्रा च चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं च घ्राणं च घ्रातव्यं च रसश्च रसयितव्यं च त्वक् च स्पर्शयितव्यं च वाक् च वक्तव्यं च हस्तौ चादातव्यं चोपस्थश्वानन्दयितव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च पादौ च गन्तव्यं च मनश्च मन्तव्यं च बुद्धिश्च बोद्धव्यं चाहङ्कारश्चाहंकर्तव्यं च चित्तं च चेतयितव्यं च तेजश्च विद्योतयितव्यं च प्रारणश्च विधारयितव्यं च ॥८ ॥

एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञा-नात्मा पुरुषः ॥ स परेऽक्षर श्रात्मनि संप्र तिष्ठते ॥ ६ ॥

परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्रमक्षरं

वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वो भवति । तदेष श्लोकः ॥१० ॥

विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्रारणा भूतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥११ ॥

॥ इति चतुर्थप्रश्नस्य मूलपाठः ॥ 118 11 ----[ १६४ ]

पृष्ठ 179

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अथ भूतप्राणनिरूपणात्मकः चतुर्थ प्रश्नः [ विज्ञानभाष्य ] प्रत्येक उपनिषत् के कई कई मूलमन्त्र होते हैं । उन मन्त्रों के आधार पर उपनिषद् - विद्या आगे चलती है । विस्तारभय से हम सभी स्थानों पर उनका निरूपण नहीं कर सकते । उपनिषत् का विषय ही बहुत विस्तृत हो जाता है । ऐसी अवस्था में यदि मूलमन्त्रों का निरूपण श्रौर करने लगें तो विस्तार का ठिकाना ही न रहे । जिस चौथे प्रश्न का आगे निरूपण करने वाले हैं-उसके विषय में निम्नलिखित मूलमन्त्र हमारे सामने आता है --" सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे सप्त रक्षन्ति सदमप्रमादम् । सप्तापः स्वपतो लोकभीयुस्तत्र जागृतो अस्वप्नजौ सत्रसदौ च देवौ " ॥ ' अध्यात्मजगत् का निरूपण करने वाला यह जगती ( छन्द से छन्दित ) मन्त्र - आगे के चतुर्थ प्रश्न में बतलाई जाने वाली - ' जाग्रत् - स्वप्न सुषुप्ति- इन तीनों अवस्थाओं का मूल है । सौर्य्यायणी गार्ग्य, पिप्पलाद से पाँच प्रश्न करने वाले हैं । उन पाँचों में से पूर्व के तीन प्रश्नों का क्रमशः यह स्वरूप है— १ - ' एतस्मिन् पुरुषे कानि स्वपन्ति? ' २ - ' कान्यस्मिन् जाग्रति? ' ३- ' कतर एष देवः स्वप्नान् पश्यति? ' पूर्वोक्त मन्त्र इन तीनों प्रश्नों का भली प्रकार से समाधान करता है । प्रश्नत्रयी के उत्तरभूत मन्त्रगत ' ऋषि ' क्या पदार्थ है? इसके लिए निम्नलिखित संक्षिप्त ऋषिनिरूपण पर ध्यान देना आवश्यक होगा । ' तदेव शुक्र ं तद् ब्रह्म - तदेवामृतमुच्यते ' के अनुसार वह ब्रह्मतत्त्व ( जिसे कि प्रजापति कहा जाता है ) क्रमशः - ' अमृत ब्रह्म शुक्र ' - इन तीन भागों में विभक्त है । इन्हीं तीनों का आगे जाकर हम क्रमशः - आत्मयोनि, प्राणयोनि, पशुयोनिरूप से निरूपण करने वाले हैं । इनमें शुक्र यज्ञ का मूल है । प्राण सत्य का मूल है एवं अमृत आत्मा का मूल है । यज्ञ अप्राकृत वस्तु है । आत्मा भी अप्राकृत है, १ - यजुर्वेद ३४।५५ । [ १६५ ]

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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माध्य भूतप्राणनिरूपण ही आपका ध्यान आकर्षित करते हैं । इस अतएव इन दोनों को छोड़कर मध्यपतित सत्य की ओर ब्रह्म श्रौर देव- दो विवर्त हैं । ब्रह्मविवर्त-प्राणरूपसत्यत्व के - ' यदस्य त्वं यदस्य च देवेषु ' के अनुसार है । देवप्रपञ्च - वैश्वानर - हिरण्यगर्भ - सर्वज्ञ स्वयम्भू, परमेष्ठी - सूर्य्यं चन्द्र पृथिवी - इन पांच भागों में विभक्त है । इसके पाँच अवयव हैं, अतएव - ' पाङ्क्तो तीन भागों में विभक्त है । ब्रह्मसत्य अधियज्ञ कहलाता ' - यह कहा है, अतएव ' त्रिःसत्या नै देवा: वै यज्ञः ' - यह कहा जाता है । देवसत्य भागत्रय में विभक्त परायण है । ब्रह्मसत्य के भी पाँच अवयव हैं । जाता है । इनमें ब्रह्मसत्य देवसत्य का प्रभव - प्रतिष्ठा प्रतिष्ठा- परायण है । स्वयम्भू के प्राण का इनमें जो स्वयम्भूसत्य है वह शेष सारे प्रपञ्च का प्रभव ' सत्य ' है । इसके पर और अवर- दो भेद हो नाम ही ऋषितत्व है । ब्रह्मसत्य देवसत्य की समष्टि- जाएगा । इस पराचीन ( पर ) अर्वाचीन जाते हैं । जैसा कि पाँचवें प्रश्न में विस्तार के साथ बतलाया है । वह विज्ञान शब्दावच्छिन्न होकर ( अवर ) ब्रह्मसत्य का जो विज्ञान है - उसी का नाम ' वेदशास्त्र होकर ' विद्या है । शब्द, विषय, संस्कार- इन वेद है । विषयावच्छिन्न होकर ब्रह्म है एवं संस्कारावच्छिन्न अवस्थानों में - विद्या, ब्रह्म, वेद - इन तीन तीन उपाधियों के भेद से वह एक ही परावर ब्रह्मसत्य विज्ञान से सम्बन्ध रखता है । वेद-परिणत हो जाता है । इन तीनों में हमारा वेदशब्द शब्दावच्छिन्न वेद-। एवमेव तत्प्रतिपादक शब्दब्रह्मरूप मूर्ति परावरब्रह्मसत्यरूप अर्थ का मूलतत्त्व ऋषिप्राण से ऋषिप्राण है तत्प्रतिपादक वेदमन्त्र की अभिन्नता शास्त्र का भी मूलतत्त्व ऋषि ही है । इसी अभिप्राय मैथुनीसृष्टि जब न थी तो क्या था? लक्ष्य में रखकर ' ऋषिर्वेदमन्त्रः ' कहा जाता है । आपोमयी विश्व बनता - तप - श्रम द्वारा आगे का सारा इसका उत्तर यही ऋषिप्राण है । इसी ऋषिप्राण से इच्छा से वह असत्प्राण वैज्ञानिक जगत् है, अतएव - ' सर्गस्मादिदमिच्छन्तः श्रमेण तपसा भरिषन्'- इस प्राण व्युत्पत्ति वेद रूप है । ऋग्यजुः सामभेद से में ' ऋषि ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । स्वयम्भू का वह से प्रसिद्ध वेदतत्त्व ' ब्रह्मनिःश्वसित ' नाम वेद तीन प्रकार का है । स्वयम्भू का यह अपौरुषेय सृष्टि में अनुपयुक्त किन्तु सहकारी हैं । है - जैसा कि कई बार बतलाया जा चुका है । इसमे ऋक्साम वा एतस्याग्नेर्वागेवोपनिषत् १– के अनुसार यजुः में ' यत् - जू ’ दो भाग हैं । इसमें ' जू ' भाग वाक् है । ' तस्य यह प्राण ही ( ब्रह्माग्निमय प्राण ही ) यही वाक् ब्रह्माग्नि है । ' यत् ' भाग प्राण है । बस, वाङ्मय ' ऋषि ' हैं । ब्रह्माग्नि प्राणों का ( ऋषि - प्राणों ऋषितत्त्व है । इस ब्रह्माग्नि के अवान्तर सारे विभाग ऋषि कहते हैं—– का ) उक्थ है । इनकी अनन्तता एवं दुर्विज्ञेयता बतलाते हुए " विरूपास इऋषयस्त इद्गम्भीरवेपसाः । ' ते अङ्गिरसः सूनवस्ते श्रग्नेः परि जज्ञिरे " ॥ में उपयुक्त समझा है । वे १२ उन अनन्त ऋषियों ( प्राणों ) में से वैज्ञानिकों ने १२ प्राणों को सृष्टि प्राण वेद में इन नामों से प्रसिद्ध हैं-१- शत ० ब्रा ० १०।५।१।१ । २ - ऋग्वेद मं ० १०।६२।५ । [ १६६ ]