प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 181–190

प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 181–190

पृष्ठ 181

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चतुर्थ प्रश्न ११- २ - प्रत्रिमरीची १-२ - वसिष्ठागस्त्यौ १-२ ऋतुदक्ष १-२ - मृग्वङ्गिरसौ १- विश्वामित्रः १-मत्स्यः १-२ - पुलस्त्य पुलहौ १- शत ० ब्रा ० ८।५।१।१२ । भूतप्राणनिरूपण प्रश्नोपनिषद्विज्ञानमाष्य २ - ऋग्वेद म ० १।१।६४।१५ । [ १६७ ] इनमें पुलस्त्य मूल पुलह आसुरी सृष्टि के हैं । शेष १० ( दस ) ऋषि दिव्यसृष्टि के मूल हैं, श्रतएव वेद में इन्हीं १० की प्रधानता है । वेदोपबृंहक पुराणशास्त्र इन्हीं १० का निरूपण करता है । ब्रह्माग्निरूप इन्हीं दस ब्रह्माओं के लिए ' दश ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः ' - यह कहा जाता है । इन १० ( दश ) प्राणों का भी प्रकृत में सम्बन्ध नहीं है । इस प्रपञ्च से तो हमें केवल यही बतलाना है कि ऋषिप्राण स्वयम्भू की वस्तु है । ऋषियों से पितर पैदा होते हैं । पितरों से देवसृष्टि होती है । जिस देवसत्य का पूर्व में निरूपण किया जा चुका है वही देवसृष्टि है । जैसे ऋषिप्राण अग्निमय हैं-एवमेव यह देवसृष्टि भी अग्निमय ही है । दोनों ही वेदाग्नि हैं । अन्तर केवल इतना ही है कि ब्रह्माग्नि का स्वयम्भू के ब्रह्मनिःश्वसित वेद से सम्बन्ध है एवं देवाग्नि का सूर्य्यं के गायत्रीमात्रिक वेद से सम्बन्ध है । ' अग्निवें ब्रह्म " से ब्रह्माग्नि अभिप्रेत है । ' अर्कममितो विविधे ' के प्रर्काग्नि से देवाग्नि अभिप्र ेत है । जैसे ब्रह्माग्नि के अवान्तर सारे विभाग ' ऋषि ' कहलाते हैं - एवमेव देवाग्नि के सारे विभाग ' देवता ' नाम से प्रसिद्ध हैं । देवाग्निविद्या ' अपराविद्या ' है । यही अपरब्रह्म है । ब्रह्माग्निविद्या ' परविद्या ' है । यही अक्षरसाधक परब्रह्म है । दोनों का समुच्चय ही ' ओंकार ' है । यही सत्यतत्त्व है, अतएव सत्यकामना ( परापरब्रह्म की कामना ) करने वाले, अतएव ' सत्यकाम ' नाम से प्रसिद्ध शैव्य के लिए पिप्पलाद ने ' एतद्वै सत्यकाम! परं चापरं च ब्रह्म यदोंकार ' द्वारा इसी सत्य का निरूपण किया है - जैसा कि पाँचवें प्रश्न में स्पष्ट हो जाएगा । स्वयम्भू के मौलिक ऋषिप्राण से क्रमशः देवाग्नि उत्पन्न होती है । देवाग्नि उसी का रूपान्तर है । इस देवाग्नि से अध्यात्मप्रपञ्च का निरूपण होता है । अध्यात्म में आकर वही देवाग्नि सप्तऋषिप्राणरूप से प्रकट होता है । बस, देवभाव से उल्बण होने वाले सात प्रकार के ऋषिप्राण ही मन्त्र के सप्तऋषि हैं । जो प्राधिदैविक ऋषिप्राण देवताओंों के पितामह थे वे ही अध्यात्म में आकर देवताओं के पुत्र बन जाते हैं । इसी विज्ञान का निरूपण करती हुई ऋग्वेद श्रुति कहती है-" साकञ्जानां सप्तथमाहुरेकजं षळिद्यमा ऋषयो देवजा इति । तेषामिष्टानि विहितानि धामशः स्थात्रे रेजन्ते विकृतानि रूपशः " ॥ ’

पृष्ठ 182

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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण अकेला सातों आध्यात्मिक ऋषिप्राण साथ रहते । साथ रहने वाले इन सातों में ' सातवाँ नाम से प्रसिद्ध है, ६ जोड़ले हैं । ये प्राध्यात्मिक ऋषिप्राण देवताओं से उत्पन्न होने के कारण ' देवज हटते एवं हैं । इन सातों के विषय अपने - अपने स्थान पर नियत हैं । ये स्वयं अपने स्थान से नहीं सातों को स्वस्थान में ही विभक्त नियत अन्न मिलता है । एक दूसरे के स्थान पर न दूसरे का आक्रमण हैं- इसका है, न सातों को मिलने वाला अन्न ही समान है । ये सातों ऋषिप्राण किन नामों से प्रसिद्ध उत्तर देते हुए — " अर्वाग् विलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नस्तस्मिन् यशो निहितं विश्वरूपम् । तस्यासत ऋषयः सप्त तीरे वागष्टमी ब्रह्मणा संविदानेति " ॥ " - इस मन्त्र का व्याख्यान करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं— शिर ( कपाल ) एक कटोरा है । इस कटोरे का पैंदा ऊपर है । मध्य का बिलभाग नीचे की । इसके तीर पर थोर है । सम्पूर्ण अध्यात्म का यशोरूप श्रीभाग इसी ज्ञानमय कटोरे में प्रतिष्ठित है, कश्यप, ( छोर पर ) सात ऋषि हैं । वे सातों ऋषि गोतम, भारद्वाज, विश्वामित्र, जमदग्नि, वसिष्ठ में लिख अत्रि नाम से प्रसिद्ध हैं । इन सातों का वैज्ञानिकस्वरूप हम ऋषिरहस्य नाम के निबन्ध देना चुके हैं, अतः विस्तरभयात् इसके निरूपण के झगड़े में न पड़कर हम केवल यही बतला से नीचे दो चाहते हैं कि मस्तक में सबसे ऊपर दो श्रोत्र प्राण हैं ये ही गोतम भरद्वाज वसिष्ठ हैं । श्रोत्र हैं । ' षडिद्यमाः ' चक्षुप्राण हैं । ये ही विश्वामित्र जमदग्नि हैं ॥ दो नासाप्राण हैं- ये ही कश्यप में सात के अनुसार ये ६ों जोड़ले हैं । वाक्रूप अत्रि सातवाँ अकेला प्राण हैं । इस प्रकार शिरोगुहा अन्नगर्भित अन्नाद ऋषिप्राणों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । इन सातों का प्रभव प्रतिष्ठा परायण ( देवाग्नि ) है | अन्नगर्भित ( अन्नाहुति से युक्त ) अग्नि की अग्नि वायु आदित्य तीन अवस्था सर्वज्ञ कहा हो है जाती एवं हैं । इन्हीं तीनों को हमने आधिदैविकमण्डल की अपेक्षा से ' कठ ' में वैश्वानर - हिरण्यगर्भ अध्यात्म की अपेक्षा से वैश्वानर- तेजस प्राज्ञ कहा है । अग्नि से अत्रि ऋषि ( वाक् ) का सम्बन्ध है । वायु प्राणों से कश्यपवसिष्ठरूप दोनों नासाप्राणों का उद्भव है । आदित्य से विश्वामित्र जमदग्निरूप दोनों चाक्षुष इन्द्र का सम्बन्ध है । विश्वामित्र प्राण का आदित्येन्द्र से घनिष्ठ सम्बन्ध है, अतएव आदित्यरूप इस तदा अत्तैवाख्यायते को वैश्वामित्र कहा जाता है । बाकी बचता है - अग्निमय सोम । ' यौ सह गच्छतः श्रोत्रप्राण का निर्माण नाद्यम्'- इस सिद्धान्त के अनुसार यह प्रग्निमय सोम भी अग्नि ही है । इससे : ( अग्निना होता है । ये ही दोनों गोतम, भरद्वाज हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ' ऋषयो देवजा पर उत्पन्नाः ' ) - यह कहा है । इन सातों के मूलरूप श्रदेवज हैं । परन्तु अध्यात्म में यह अग्न्याधार उन प्रतिष्ठित होते हैं, अतएव इन्हें ' देवजाः ' कह दिया जाता है । श्रोत्र, चक्षु, नासा, मुख- ये इन्द्रिएँ ३ - शत ० ब्रा ० १४।५।२।४ । 1815 १- द्रष्टव्य - ऐ ० आ ० १।२।२६ । [ १६८ ]

पृष्ठ 183

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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण सातों प्राणों के आयतनमात्र हैं । ये प्राण नित्य हैं । सारा विश्व इन्हीं से चल रहा है । इसी अभिप्राय से -' सप्तसु प्रारणायतनेषु । सप्त हिरण्यशकलान् प्रत्यस्यति " । " -यह कहा जाता है । ' पाङ्क्तो वै यज्ञः ' वाली पञ्चावयवता, ' त्रिःसत्या वे देवा: ' -से सम्बन्ध रखने वाला त्रित्ववाद, ' षोडशकलं वा इदं सर्वम् ' - से सम्बन्ध रखने वाला षोडशकलवाद, ' चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' से सम्बन्ध रखने वाला चतुष्टयवाद - जैसे असंख्य भावों से सम्बन्ध रखते है-एवमेव हमारे इस ऋषिसप्तक का भी अनन्त भावों से सम्बन्ध है । आधिदैविक, आधिभौतिक प्रपञ्च को थोड़ी देर के लिए जाने दीजिए, केवल प्राध्यात्मिक प्रपञ्च को ही लीजिए । इन सातों प्राणों का स्थूलरूप से शिरोगुहा, उरोगुहा, उदरगुहा, बस्तिगुहा भेद से चार जगह सात - सात रूप से प्रसार है । जैसा कि मुण्डकोपनिषत् में स्पष्ट हो जाएगा । सात धातु हैं । सात में प्रत्येक धातु में सात - सात स्तर हैं । त्वचा में सात रस हैं । रस सप्तविध हैं । हरितवर्णं-युक्त श्रोज सप्तावयव है । ज्ञान सप्तावयव है । इस प्रकार ज्ञानक्रियार्थमय आध्यात्मिक - प्रपञ्च सात-सात भावों से दशाक्रमवत् व्याप्त है । यह उसी ऋषिप्राण की महिमा है । केवल मस्तक में ही सात हों - यह बात नहीं है । शरीरमात्र में प्रवान्तरस्वरूप से इस सप्तर्षिप्राण का राज्य है । इसी अभिप्राय से ' सप्तऋषयः प्रतिहिताः शरीरे ' कहा है । सात समुद्र, सात द्वीप, सात लोक, सातमरुद्गण, आवह - प्रवह संवहभेदभिन्न भूवायु के सात स्तर, भूः भुवः स्वः आदि सात लोक, सप्तपाताल, सप्तसर्ग, सप्तनकं, सात सौर रश्मि, सात रस, सात उपरस, सात धातु - उपधातु, सातविष, सात उपविष, सप्तभूमिका, सप्त-भंगीनय, सप्ताह, सप्त होता, सप्ताचि, सप्तसमिध, सप्तऋतु - श्रादि कहाँ तक गिनायें? संसार में जितनी भी सप्तक सृष्टिएँ हैं - सबका प्रभवप्रतिष्ठापरायण यही तत्त्व है । इस बाहर के प्रपञ्च से सम्बन्ध रखने वाले सप्तवाद का प्रकृत में कोई सम्बन्ध नहीं है । यहाँ हमें केवल आध्यात्मिक सप्तवाद पर दृष्टि डालनी है जैसे शिर में सात प्राण हैं, एवमेव सर्वाङ्गशरीर में सात श्राग्नेयप्राण हैं । ये सातों आग्नेयप्राण गार्हपत्याग्निरूप अपानप्राण, तद्रूप ही समानाग्निप्राण, दक्षिणाग्निरूप व्यानाग्निप्राण, आहवनीयाग्निरूप प्राणाग्नि, एवं उदानाग्निप्राण, सथ्याग्निप्राण, आवसथ्याग्निप्राण - इन नामों से प्रसिद्ध हैं । ये सातों आग्नेयप्राण सप्तर्षिप्राण-मूलक हैं । सप्तर्षिमूलक प्रतएव उन्हीं नामों से प्रसिद्ध ये सातों ऋषिप्राण सदा जागते रहते हैं । ' कान्यस्मिन् जाग्रति '? का ' सप्तरक्षन्ति सदमप्रमादम् - यही उत्तर है । इन प्राणाग्नियों को जरा भी आलस्य नहीं रहता । जीवनसत्र के सदोमण्डपरूप शरीर में ये सातों सदा जागते रहते हैं । शरीर दुर्ग में अनेक शत्रु ( सड़ान आदि दोष ) घुसना चाहते हैं, परन्तु ये सातों दुर्गरक्षक सदा अपने पहरे पर १- शत ० ब्रा ० १२।५।२।६ । [ १६६ ]

पृष्ठ 184

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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण मुस्तैदी के साथ खड़े हुए इस दुर्ग की रक्षा किया करते हैं । जिसके लिए पिप्पलाद - ' प्राखाग्नय एवै-तस्मिन् पुरे जाग्रति'- यह उत्तर देना चाहते हैं - उसी के लिए यहाँ - ' सप्त रक्षन्ति सदमप्रमादम्'-यह कहा है । ( २ ) - दूसरा प्रश्न था - ' कानि स्वपन्ति '? इसका उत्तर है - ' सप्तापः स्वपतो लोकमीयुः ' -जैसे शरीर-प्रतिहित सप्तप्राण ( ऋषिप्राण ) सप्ताग्निरूप में परिणत होकर सदा जागृत रहकर शरीर - दुर्ग की रक्षा करते हैं - एवमेव वही सातों प्राण शिरोगुहागत प्राणायतनभूत चक्षुरादि में प्रतिष्ठित होकर सुषुप्ति के कारण बनते हैं । इन्द्रियों में वाक् अग्निप्रधान है । नासा वायुप्रधान है । चक्षु श्रादित्यप्रधान है । अग्नि, , आदित्य की समष्टि का नाम अंगिरा है । इसी को प्रथम प्रश्न में प्राणशब्द वायु, से व्यवहृत किया है । श्रोत्र सोममय है । सोम ही भृगु है । इसे ही इस प्रश्न में रयि कहा है । रयिप्राण कहो, भृगु अङ्गिरा कहो-श्रग्नीषोम कहो एक ही बात है । रयिप्राणरूप भृग्वङ्गिरा की समष्टि ही इन्द्रिएँ हैं । हृदय से ब्रह्म-रन्ध्र तक भृगुधरातल हैं । इस पर आग्नेय इन्द्रिएँ प्रतिष्ठित हैं - जैसा कि पूर्व प्रश्नों में सात ( ७ ) प्रकार के त्रैलोक्य के व्यूहन में बतलाया जा चुका है । इस प्रपञ्च से यह मलीभाँति सिद्ध हो जाता है कि सातों इन्द्रियप्राण ' भृग्वङ्गिरोमय ' हैं । ऋषिप्राण भृगुगमित अंगिरारूप श्राग्नेय भाग पर ही प्रतिष्ठित हैं । इसीलिए तो ' तेऽग्ने परि जज्ञिरे तेऽङ्गिरसः सूनवः ' यह कहा जाता है । भृग्वङ्गिरोमय इन इन्द्रियप्राणों को हम-" श्रापो भृग्वङ्गिरोरूपमापो भृग्वङ्गिरोमयम् । अन्तरते त्रयो वेदा भृगूनङ्गिरसोऽनुगाः " ॥ ' — के अनुसार अवश्य ही ' आप ' कहने के लिए तय्यार हैं । बस, सुप्रसिद्ध सप्त इन्द्रियप्राण ही मन्त्र के ' सप्तापः ' हैं । प्राज्ञगमित प्रज्ञान जब पुरीतति नाड़ी में चला जाता है तो इसका सारा व्यापार तिरोहित हो जाता है- यही सुप्तावस्था है । बस, जब प्राज्ञगभित प्रज्ञानपुरुष सो जाता है-विज्ञान द्वारा महदक्षररूप स्व ( आत्मा ) में अपीत हो जाता है - उस समय ये सातों श्रापोभाग उसी के साथ उसी लोक में चले जाते हैं - जैसा कि इस ' चतुर्थ प्रश्न ' में पूछे गये चौथे प्रश्न में स्पष्ट हो जायगा । कौन सोते हैं? इसका उत्तर है - ' इन्द्रियाणि ' । ' कानि स्वपन्ति '? का पिप्पलाद ने ' यथा गार्ग्य मरीचय: ' -इत्यादि उत्तर दिया है । अर्क ये ही इन्द्रिएँ हैं । ये उस श्रात्मलोक में चली जाती हैं - तभी सुषुप्ति होती है । जब तक इनका लय नहीं, तब तक सुषुप्ति नहीं । न इस समय यह देखता, न सुनता, न सूंघता, न बोलता है । वायु से यहाँ गन्धग्रहणरूप घ्राणेन्द्रिय अभिप्र ेत है । इस प्रकार सातों आप सोने वाले प्रज्ञान के लोक में चले जाते हैं । महदक्षर-मय विज्ञान ही प्रज्ञान का लोक है । वही स्वप्नद्रष्टा है । जैसे सात अग्निप्राण सदा जागते रहते हैं, एवमेव उन सातों प्राणों में से दो नासा प्राण भी अस्वप्नज ही हैं ।, सदा सत्र में खड़े रहते हैं । सातों १ - गोपथ ब्रा ० पूर्व १।३ । [ १७० ]

पृष्ठ 185

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चतुर्थं प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माध्य भूतप्राणनिरूपण इन्द्रियों में जो वायु था, वह गन्धग्रहणरूप घ्राणेन्द्रिय था । यह तो सो ही जाता है, परन्तु उसी स्थान पर श्वासप्रश्वासरूप दो प्राण और रहते हैं । ये भी सातों प्राणाग्नियों की तरह नहीं सोते । इस प्रकार जागना सोना - सारी विभूति उपाधिभेदभिन्न उसी सप्तर्षिप्राण की है । आगे का ' चतुर्थ प्रश्न ' इस मन्त्र का उपबृंहणमात्र है । ४- भूतप्राणौ कौसल्य श्राश्वलायन ने जो ६ प्रश्न किये थे, महर्षि पिप्पलाद ने उनका बडे विशदरूप से समा-घान कर दिया । आश्वलायन पूर्ण सन्तुष्ट हो गए । अनन्तर सौर्य्यायणि गार्ग्य सामने आए और इन्होंने विनीत भाव से पूछा कि भगवन्! १ - " एतस्मिन् पुरुषे कानि स्वपन्ति "? ( इस पुरुष में कौन सोते हैं? ) २ - " कान्यस्मिन् जाग्रति "? ( इसमें कौन जागते है? ) ३- ' कतर एष देवः स्वप्नान् पश्यति ”? [ ( आध्यात्मिक देवताओं में से ) कौन देवता स्वप्न देखता है? ] ४- " कस्यैतत् सुखं भवति "? [ ( सुषुप्ति ) सुख किसे होता हैं? ] ५ - " कस्मिन्नु सर्वे संप्रतिष्ठिता भवन्ति "? [ ये ( सोने, जागने, स्वप्न देखने वाले ) सब किसमें प्रतिष्ठित हैं? ] सचमुच गायं के पाँचों ही प्रश्न बडे मार्मिक हैं । इन पाँचों प्रश्नों का प्रकारान्तर से ' कठोपनिषत् ' में निरूपण आ चुका है, अतएव यहाँ पर इनके विषय में हम अधिक कुछ नहीं कहेंगे । केवल पूर्वस्वरूप का स्मरणमात्र कराना ही प्रकृत में पर्याप्त होगा ॥ १ ॥

( १ ) प्रथम प्रश्न है-" एतस्मिन् पुरुषे कानि स्वपन्ति "? [ १७१ ]

पृष्ठ 186

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प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण श्रव्यक्तात्मा और महानात्मा दोनों की समष्टि ' महदक्षर ' है । इस महदक्षररूप महानात्मा के पेट में विज्ञानात्मा है । महदक्षररूप चित् के प्रकाश से विज्ञानसूर्य्यं प्रकाशित हो रहा है । विज्ञान के नीचे प्रज्ञानात्मा है । चान्द्रभाग ही प्रज्ञानात्मा है - यही सर्वेन्द्रिय मन है । इस पर विज्ञानप्रकाश प्रति-बिम्बित होता है । सोममय मन सर्वथा जड़ है । वह इस विज्ञानप्रकाश से ही प्रज्ञामय ( ज्ञानमय ) बन रहा है । इस प्रज्ञानमन में प्रज्ञा और प्राण दो भाग हैं । प्रज्ञा ज्ञानशक्ति है, प्राण क्रियाशक्ति है । दोनों का उक्थ उभयात्मक प्रज्ञानात्मा है । इस प्रज्ञानरूप चन्द्रमा के एवं चित्यपृथिवीरूप शरीर के मध्य में देवसत्यरूप वैश्वानर- तैजस - प्राज्ञात्मक भोक्तात्मा है । इस भोक्तात्मा का जो ' प्राज्ञ ' भाग है, वह और ब्रह्मसत्यांशभूत प्रज्ञाप्राणात्मक प्रज्ञानात्मा दोनों सजातीयभाव के कारण परस्पर में मिले रहते हैं, अतएव प्राज्ञ और प्रज्ञान दोनों एक वस्तु मान ली जाती हैं । वस्तुतः प्रज्ञानमन विभिन्न है - प्राज्ञ दूसरी वस्तु है । विज्ञान द्वारा प्रज्ञान पर जो चेतना श्राती है - प्रज्ञान द्वारा प्राज्ञभाग पर भी आती है - इसी का नाम चिदाभास है | यह है चिदाभास का क्रमिक अवतार । इसमें जो प्रज्ञानात्मा है उसी की ओर हम आपका विशेषरूप से ध्यान आकर्षित करते हैं - क्यों कि सुषुप्ति का इसी से सम्बन्ध है । महान्, विज्ञान, प्रज्ञान भेद से एक ही ज्ञानरूप चिदात्मा के तीन खण्ड हो जाते हैं । दूसरे शब्दों में अध्यात्म में तीन प्रकार के ज्ञान हो जाते हैं । तीनों ज्ञान प्रायतनभेद से सर्वथा विभिन्नधर्म्मा बने हुए हैं । हम रास्ते में जा रहे हैं । इस गति में हम तीन व्यापार कर रहे हैं । चलना पहला व्यापार है । मार्ग में थाने वाले आपणस्थ पदार्थों को, मनुष्यों को, प्रासादों को और दृश्यों को देखते हुए जाना दूसरा व्यापार है । एवं भीतर ही भीतर नई बातें सोचते जाना, नई - नई कल्पना करते जाना तीसरा व्यापार है । तीनों व्यापार सर्वथा भिन्न हैं । तीनों एक साथ हो रहे हैं । चल रहे हैं - देख सुन रहे हैं - सोच रहे हैं । व्यापार किया है । क्रिया विना ज्ञान के असम्भव है । ज्ञान ही क्रिया का आधार है । साथ ही में एक ज्ञान एक समय में एक ही व्यापार करने में समर्थ होता है । हम यहाँ तीन पृथक् व्यापार देख रहे हैं । यह पृथक्त्व एक ज्ञान से असम्भव है, प्रतएव मानना पड़ता है कि हमारे शरीर में इन तीन व्यापारों का संचालन करने वाले अवश्य ही तीन ज्ञान हैं । बस, वही हमारे तीनों ज्ञान क्रमशः महान्ज्ञान, विज्ञानज्ञान, प्रज्ञानज्ञान नाम से प्रसिद्ध हैं । महान् ज्ञान ही प्राकृतिकज्ञान नाम से प्रसिद्ध है । विज्ञान बुद्धि है । प्रज्ञान मन है । पैर चलना महानुज्ञान का काम है । विचार करना विज्ञान का काम है । दृश्य देखना मन का धर्म है । इस प्रकार हम तीनों ज्ञानों का बिलकुल पार्थक्य देख लेते हैं । इससे यह भी सिद्ध हो जाता है कि प्रज्ञानज्ञान बाहर के विषयों की अपेक्षा रखता हुआ इन्द्रियों के अधीन रहता है । दूसरे शब्दों में इन्द्रियों के द्वारा विषय प्रज्ञान पर आते हैं एवं बुद्धि विषय पर जाया करती है । इन तीनों ज्ञानों में से प्रज्ञानज्ञान ही सुषुप्ति का अधिष्ठाता है । इन्द्रियों के द्वारा प्रज्ञान विषयज्ञान में समर्थ होता है, प्रतएव सबसे पहले इन्द्रियों का स्वरूप जान लेना आवश्यक होगा । इन्द्रप्राण की वृत्ति का नाम ही इन्द्रिय है । प्रज्ञानात्मा प्रज्ञाप्राणमय है । इसमें प्रज्ञाभाग सोम है । प्राणभाग इन्द्र है । दोनों अविनाभूत हैं । यह प्रज्ञात्मक प्राण ' प्रारणोऽस्मि प्रज्ञात्मा ' के अनुसार साक्षात् इन्द्र है - यही उक्थ है । तीसरे प्रश्न में यह विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है कि उक्थ विना अर्क के नहीं रहता । अर्क विना अशिति के नहीं रहता । उक्थ श्रात्मा है, अर्क प्राण है, अशिति पशु है । [ १७२ ]

पृष्ठ 187

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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भुतप्राणनिरूपण तीनों की समष्टि पशु है । हमारा इन्द्ररूप प्रज्ञानात्मा उक्थ है - बिम्ब है । इसमें से रमिमएँ निकलती हैं । बस, उक्थ- प्रज्ञान से निकलने वाली रश्मिएँ ही इन्द्रालम्बनता के कारण इन्द्रिएँ कहलाती हैं । इन इन्द्रियों में विषय बद्ध रहता है । इन्द्रियरूप अर्क द्वारा उक्थरूप प्रज्ञानात्मा विषयरूप अशिति को खाया करता है । विषय प्रशिति है- इन्द्रिएँ अर्क हैं एवं प्रज्ञानमन उक्थ है । तीनों की समष्टि प्रज्ञापति है । प्रज्ञानमन से निकलने वाली इन्द्रियरूप रश्मियों के स्वरूप में दार्शनिकों में बडा मतभेद है । उस मतवाद की प्रकृति में हमें समालोचना नहीं करनी । यहाँ हमें केवल वैदिक सिद्धान्तमात्र का प्रतिपादन करना है । हमारे दार्शनिकों ने पृथिवी, जल, तेज, वायु आकाश ये पांच तत्त्व माने हैं । ' तत्त्व ' शब्द के लिए पाश्चात्य भाषा में ' एलीमेन्टस् ' प्रयोग आया करता है । ' तत्त्व ' वह पदार्थ है जिसमें किसी दूसरे पदार्थ का संसर्ग न हो । विशुद्ध मौलिकभाव ही तत्त्व है । यही ' फिजिक्स ' है । विजातीय अवान्तर मौलिक तत्त्वों के रासायनिक संयोग से यौगिक पदार्थ उत्पन्न होते हैं । यही ' केमेस्ट्री ' है । बस, संसार में मौलिक यौगिक भेद से दो ही प्रकार के पदार्थ हैं । मौलिक पदार्थ तत्त्व हैं । यौगिक पदार्थ तत्त्वसमष्टि हैं । हमारे ऋषियों ने पृथिवी - जल आदि पाँचों को तत्त्व माना है । इस तत्त्व रहस्य को न समझकर कितने ही ना समझ अपनी ना समझी से ऋषियों पर आक्षेप करते हैं कि - ' जब कि हम पाँचों को एनेलाइज ( विशकलन ) करते हैं तो पाँचों को यौगिक पाते हैं । प्रत्येक में अनेक पदार्थों का संमिश्रण है । पृथिवी के एक ढेले का विशुकलन करने पर हम उसमें जल, अग्नि आदि अनेक वस्तुएँ प्राप्त करते हैं - यही अवस्था जल - तेज आदि की है । ऐसी अवस्था में भारतीय दार्शनिकों का पृथिवी जलादि पाँचों यौगिकों को तत्व ( मौलिक पदार्थ ) मानना नितान्त अशुद्ध हैं । ' भारतीयों की फिलोसफी भले ही किसी अंश में बढी चढी हो, परन्तु साइन्स से तो वे कोसों दूर हैं । पाश्चात्त्यविद्वान् ' ६५ ' तत्त्व मानते हैं । भारतीय पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश पाँच तत्त्व मानते हैं एवं यूनानदेशवासी यवन पृथिवी, जल, तेज, वायु - ये चार ही तत्त्व मानते हैं । इस पर पाश्चात्त्यों का पूर्वकथनानुसार कहना है कि पाँच तत्त्व नहीं माने जा सकते । सुवर्णं, रजत, पारदादि पदार्थों की समष्टिमात्र पृथिवी है । इसलिए पृथिवी तत्त्व नहीं हो सकती । हाइड्रोजन ऑक्सिजन के संयोग से उत्पन्न पानी भी तत्त्व नहीं माना जा सकता । एवमेव प्रॉक्सिजन नाइट्रोजन दोनों की नियतमात्रा का संश्लेष ही वायु है, अतएव यह भी योगज ही है । अग्नि तो पदार्थ ही नहीं है । यदि ' तप ' को अग्नि माना जाता है तब तो वह पदार्थों की अवस्थामात्र है । स्वतन्त्र पदार्थ नहीं है । यदि अग्नि एक स्वतन्त्र पदार्थ मान भी लिया जाता है, तब भी उसकी तात्त्विकता तो कथमपि सिद्ध नहीं हो सकती । ऐसा तापधर्म्मा अग्नि- भूवायुस्थ ऑक्सिजन, और अङ्गिरा नाम से प्रसिद्ध कार्बन के योग से उत्पन्न होने वाला यौगिक तत्त्व ही होगा । अब चलिए - आकाश की ओर । आकाश भी कोई पदार्थ नहीं है । पृथिवीजलादि पदार्थ जिस खाली स्थान में प्रतिष्ठित हैं- उस शून्यप्रदेश का नाम ही आकाश है । आकाश में जो नीलिमा दीखती है - वह भी घनीभूत वायु की नीलिमा है । बस, इन्हीं सब कारणों के आधार पर हम कह सकते हैं कि भारतीयों का यह पश्ञ्चतत्त्ववाद सर्वथा अवैज्ञानिक अतएव केवल काल्पनिक है, अतएव सर्वथा उपेक्षणीय ही है । हम कह चुके है कि इस सारी भ्रान्ति का एकमात्र कारण अज्ञान है । अभी इनका विज्ञान अधूरा है । शताब्दियों तक शिष्य बने रहने के बाद भी वे जगद्गुरु भारतवर्ष के गुरुत्व को पहचान सकेंगे कि [ १७३ ]

पृष्ठ 188

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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण नहीं - इसमें सन्देह है । ग्रस्तु, भारतीयों के वे पाँच तत्त्व कौन मे हैं? इस प्रश्न के समाधान के लिए हम भ्रापके सामने गुण, अणु, रेणु, महा, सत्त्व - इन पाँच विभागों को सामने रखेंगे । गुणभूत, अणुभूत, महाभूत, रेणुभूत सत्त्वभूत - भेद से भूतप्रपञ्च पञ्चधा विभक्त है । इन पाँचभूतों के रहस्य को न जानने के कारण ही ऐसी भ्रान्ति हुई है । पहला विभाग गुणभूत का है । रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द - ये पाँच तन्मात्राएँ ही गुणभूत हैं । ये पाँचों ही तन्मात्राएँ सर्वथा मौलिक हैं । सर्वथा अमूर्त हैं । साँख्यदर्शन के ये ही पाँच तत्त्व हैं । प्राजापत्य प्राण के समन्वय से ये ही पाँचों गुणभूत अणुभूत में परिणत हो जाते हैं । गुणभूतों के सजातीय सम्बन्ध से ही अणुभूत उत्पन्न होता है । बडा चमत्कार है । जैसे प्रजापति से ही उत्पन्न विश्व के आधार पर प्रजापति रहता है- एवमेव गुणभूत से उत्पन्न अणुभूत गुणभूत का श्रालम्बन है । प्रणुभूत उक्थरूप है, अर्थात् केन्द्र में रहता है एवं गुणभूत अर्क है । चारों ओर व्याप्त रहता है । दोनों अविनाभूत हैं । इन्ही अणुओं का नाम परमाणु है । जैसे सांख्यदर्शन गुणभूत को प्रधानता देता है एवमेव वैशेषिकदर्शन प्रणुवाद को अपना लक्ष्य बनाता है । ऐसे - ऐसे विजातीय ३०-३० परमाणुओंों के मेल से रेणुभूत का प्रादुर्भाव होता है । प्रत्येक रेणु में ३०-३० परमाणु हैं । अधिक भी परमाणु हो सकते हैं । परन्तु प्रत्येक रेणु में कम से कम ३०-३० परमाणु तो अवश्यमेव रहते हैं । इन रेणुभूतों का हम प्रत्यक्ष कर लेते हैं । जालान्तर्गत भानुरश्मि में रेणुभूत का नाम से प्रसिद्ध हैं एवं प्रणु भर प्रत्यक्ष हो जाता है - बस, यहाँ तक तात्त्विक सृष्टि है । गुणभूत रूपादि रेणुभूत पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश नाम से प्रसिद्ध हैं । गुणभूत अणुभूत में परिणत होते हैं । अणुभूत रेणुभूत में परिणत होते हैं । ये तीनों ही भूत हैं । ये एकद्रव्यरूप हैं, अतएव हम इन तीनों को ' तत्त्व ' मानने के लिए तय्यार । भागे जाकर रेणुभूत के पश्वीकरण से महाभूत उत्पन्न होते हैं । ये महाभूत यौगिक हैं । भारतीय दार्शनिक स्वयं इनको पश्वीकृत मानते हुए यौगिक मान रहे हैं । इन महाभूतों से सत्वभूत उत्पन्न होते हैं । प्रचेतन, भर्द्धचेतन, चेतन भेदभिन्न त्रिविध सत्त्वसृष्टि इन्हीं पञ्चमहाभूतों से होती है । तात्त्विक, लोक, जीवभेद से तीन प्रकार की सृष्टिएँ हैं । इनमें गुण, प्रणु, रेणु - ये तीन तात्विक सृष्टि हैं । पञ्चमहाभूत लोकसृष्टि है एवं सत्त्वसगं जीवसृष्टि है -१- गुणभूत - गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द । २- मणुभूत = पृथिवी, जल, तेज, वायु, प्राकाश । ३ - रेणुभूत = पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश । ४ - महाभूत = पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश । ५- सत्त्वभूत = धातु, वृक्षादि, अस्मदादि । गन्धतन्मात्रा से पृथिवी अणुभूत उत्पन्न होता है । रसतन्मात्रा से जल प्रणु उत्पन्न होता है । रूपतन्मात्रा से तेज अणु उत्पन्न होता है । स्पर्शतन्मात्रा से वायु अणु उत्पन्न होता है एवं शब्दतन्मात्रा से आकाशाणु उत्पन्न होता है । यही भागे के भूतों में समझना चाहिए । अणुभूत, रेणुभूत भी पृथिवी आदि नाम से ही प्रसिद्ध हैं । इसी भ्रम में पड़कर काल्पनिक अपने उद्गार निकालने का साहस कर [ १७४ ]

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चतुर्थं प्रश्न वैदिक दस इन्द्रिएँ-१- वाक् २- प्राण ३ - चक्षु ४- श्रोत्र ५- जिह्वा ६- हस्त ७- शरीर ( त्वक् ) ८- उपस्थ ६- पाद १०- प्रज्ञा ( मन ) प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य सांख्य की ११ इन्द्रिएँ-१- वाक् ' पाय्वादि तु कर्मेन्द्रियं ' २- पाणि ३ - पाद ४- पायु ५- उपस्थ ६- श्रोत्र ७- त्वक् ' धीन्द्रियम् मनोनेत्रादि- ' ८ - चक्षु ६- जिह्वा १०- प्राण ( प्राण ) ११- मन [ १७५ ] भूतप्राणनिरूपण - + कर्मेन्द्रिएँ + ज्ञानेन्द्रिएँ ] → उभयात्मकं मनः बैठते हैं । अस्तु, इस अप्राकृत विषय को हम यहाँ अधिक नहीं बढाना चाहते । यहाँ हमें केवल पाँच प्रकार के भूतों में से गुणभूतों की ओर श्रापका लक्ष्य दिलवाना है । इन गुणभूतों का नाम ही ' भूतमात्रा ' है । इन्हीं को अर्थमात्रा भी कहा जाता है । इन अर्थमात्राओं की कृपा से ही हमारे उस प्रज्ञाप्राणमय प्रज्ञा और प्राण के १०-१० टुकड़े हो जाते हैं । ये ही तीनों विभाग प्रज्ञामात्रा, प्राणमात्रा: भूतमात्रा इन नामों से प्रसिद्ध हैं । इन तीनों मात्राओं का श्रालम्बन वही प्रज्ञानात्मा है । कौषीतकि उपनिषद् की परिमरविद्या में इन ३० मात्राओं का विस्तार से निरूपण किया है । यहाँ हम उनके नाममात्र बतला देना ही पर्याप्त समझते हैं-१- वाक्, २ - प्राण ( घ्राण ), ३ - चक्षु, ४ - श्रोत्र, ५ - जिह्वा, ६ - हस्त, ७ - शरीर, ८ - उपस्थ, - पाद, १० - प्रज्ञा - ये १० ( दस ) इन्द्रिएँ हैं । शरीर से त्वगिन्द्रिय अभिप्रेत है । प्रज्ञा से इन्द्रियमन अभिप्रेत है । इन्हीं दस इन्द्रियों के सांख्यशास्त्र में १ - बाक्, २- पाणि, ३ - पाद, ४ - पायु, ५ - उपस्थ, ६- श्रोत्र, ७ - त्वक्, ८ - चक्षु, ६- जिह्वा, १० - घ्राण- ये नाम हैं । इस सांख्यविभाग में मन को अलग छाँट दिया है एवं उसके स्थान में पायु मान लिया है । इधर उपनिषत् ने पायु का पादरूप पार्थिवभाग में अन्तर्भाव मानकर प्रज्ञा को १० वीं इन्द्रिय मान ली है--

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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण अन्य उपनिषदों ने वाक्प्राणादि इन्द्रियों का बाक, प्राण, चक्षु, घोष, मन - इन पाँच इन्द्रियों में ही अन्तर्भाव माना है । इसका रहस्य यही है कि वाक् इन्द्रिय के रस, शब्द दो भेद हो जाते हैं । वागिन्द्रिय में आदान -विसगं दोनों हैं विसर्गकाल में वह शब्दात्मिका है एवं आदानकाल में वही रसात्मिका है । रसभाव, शब्दभाग दोनों जिल्लारूप वागिन्द्रिय से युक्त हैं । इस प्रकार रसनारूप जिल्ला का वागिन्द्रिय में ही अन्तर्भाव हो जाता है । इसी प्रकार प्राणेन्द्रिय में भी आदान विसर्ग दोनों हैं । आदानभाग से श्वास का और गन्ध का ग्रहण है । विसर्ग का प्रश्वास से सम्बन्ध है । दोनों का प्राणेन्द्रिय में अन्तर्भाव है एवं पायु, उपस्थ, पाद, पाणि त्वक् - इन पांचों का शरीररूप त्वमिन्द्रिय से ग्रहण है । त्वगिन्द्रिय स्पर्श का अधिष्ठाता है । स्पर्श का अनुभव होना प्रज्ञान है । प्रज्ञान मन है, अतएव अन्ततोगत्वा क्रियाप्रधान पाणि, पाद, पायु, उपस्थ, त्वक् - सबका मन में अन्तर्भाव हो जाता है । मन सेवा का प्रादुर्भाव है । वाकू से प्राण का प्रादुर्भाव है । प्राण से चक्षु का प्रादुर्भाव है । चक्षु से श्रोत्र का प्रादुर्भाव है । क्षेत्र से कर्म का ( कम्र्मेन्द्रियों का ) प्रादुर्भाव है । इस प्रकार १० में से बाकू, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, प्रशा - पांच रह जाती हैं । शेष का मन में ही अन्तर्भाव हो जाता है । दसों में से पाँच में ज्ञानप्रधान है - क्रिया गौण है । इन्हीं ज्ञानप्रधान इन्द्रियों को सांख्य ने ज्ञानेन्द्रिय कहा है एवं पायूपस्वादि पाँच इन्द्रियों में क्रिया की प्रधानता है, ज्ञान गौण है । ये ही सांख्य की कम्मेन्द्रएँ हैं । यही विभाग हमारी वैदिक १० इन्द्रियों में समझना चाहिए-उन १० इन्द्रियों के साथ १० ही विषय बद्ध रहते हैं । मन प्रज्ञाप्राणमय है, अतएव मानना पड़ेगा कि इसकी रश्मिरूप १० इन्द्रिएँ भी उभयात्मक ही हैं । सुतरां १० प्रज्ञाभाग हो जाते हैं, १० प्राणभाग हो जाते हैं । १० इन्द्रियों में पृथक् - पृथक् प्रज्ञा है, पृथक् - पृथक् प्राण है । पृथक् - पृथक् भूतमात्रा है । इस प्रकार प्रत्येक इन्द्रिय के साथ प्रज्ञामात्रा, प्राणमात्रा, भूतमात्रा इन तीन - तीन मात्राओं की सत्ता सिद्ध हो जाती है । ऐसी कोई भी इन्द्रिय नहीं जिसमें व्यापार न हो । यह व्यापारभाग ही प्राणमात्रा है । प्राण - व्यापार विना प्रज्ञाज्ञान के अनुपपन्न है - चाहे हम इसे समझें या न समझें । श्रोत्रादि में तो ज्ञानमात्रा का प्रत्यक्ष ही दर्शन है । इसी प्रकार इस्तादि के व्यापार में भी ज्ञान समझना चाहिए । क्योंकि विना इच्छा के हाथ - पैर हिलते चलते नहीं हैं । इच्छा ' ज्ञानजन्या ' है सुतरां क्रियाप्रधान कम्र्मेन्द्रियों में भी प्रज्ञाभाग की सत्ता सिद्ध हो जाती है । इन १० प्राण प्रशामात्राओं की १० भूतमात्राएँ उपनिषदों में क्रमशः १ - नाम, २- गन्ध, ३- रूप, ४- शब्द, ५ - अन्नरस ६ - कम्मं, ७ - सुख - दुःख, ८- आनन्द, रति प्रजाति, ६- इत्या ( गमन ), १० विषयज्ञान- इन नामों से प्रसिद्ध हैं । सच पूछा जाए तो इन १० अर्थमात्राओं के कारण- प्रज्ञाप्राणात्मक प्रज्ञानात्मा के प्रज्ञा और प्राण के १०-१० टुकड़े हो जाते हैं । इन तीसों की समष्टि का उक्य यही प्रज्ञानात्मा है ये इन्द्रिऍ इसी की रश्मि हैं । इन्हीं रश्मियों से यह विषयज्ञान करने में समर्थ होता है सारी इन्द्रियों के जितने धम्मं हैं - वे सब परमार्थतः इस मन के ही धर्म हैं । इसी विज्ञान के आधार पर - ' सर्वं मन एव ' - ' प्रज्ञानेत्रो लोकः'-' प्रज्ञा प्रतिष्ठा ० ' इत्यादि कहा जाता है— १- शत ० ब्रा ० १०।५।३।७-८ । [ १७६ ]