प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 191–200
प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 191–200
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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य प्रज्ञामात्रा प्राणमात्रायुक्त १० इन्द्रिएँ-१- वाक् ( प्राणप्रधान प्रतएव कर्मेन्द्रिय ) २- प्राण ( ज्ञानप्रधान अतएव ज्ञानेन्द्रिय ) ३ - चक्षु ( ज्ञानप्रधान अतएव ज्ञानेन्द्रिय ) ४- श्रोत्र ( ज्ञानप्रधान अतएव ज्ञानेन्द्रिय ) ५- जिह्वा ( ज्ञानप्रधान श्रतएव ज्ञानेन्द्रिय ) ६ - हस्त ( प्राणप्रधान अतएव कर्मेन्द्रिय ) ७- शरीर ( स्वक् ) ( ज्ञानप्रधान अतएव ज्ञानेन्द्रिय ) ८- उपस्थ ( प्राणप्रधान अतएव कर्मेन्द्रिय ) ६ - पाद ( प्राणप्रधान अतएव कर्मेन्द्रिय ) भूतप्राणनिरूपण अर्थमात्रा भूतमात्रा नाम व्यवहार गन्ध ज्ञान रूप ज्ञान शब्द ज्ञान अन्नरस ज्ञान कम्मं व्यापार सुख - दुःखानुभव-ज्ञान प्रानन्दादि प्राणव्यापार गमन प्राणव्यापार विषयज्ञान प्राणव्यापार १० - प्रज्ञानमन ( उमयप्रधान ) हमने बतला दिया है कि प्रज्ञान उक्थ है एवं दसों इन्द्रिएँ प्रर्क हैं । सब प्रज्ञाप्राणात्मक प्रज्ञानात्मा की रश्मिएँ हैं । सबका आधार प्राणात्मक इन्द्र ही है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि हम जब किसी एक इन्द्रिय से अवधानपूर्वक काम लेते रहते हैं तो उस समय इतर विषय की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता । समीपस्थ मनुष्य पूछता है कि कहो जी! तुमने भी वह आवाज सुनी या नहीं । हमारे मुंह से निकल पड़ता है कि नहीं, क्षमा कीजिए । मेरा मन दूसरी ओर लग रहा था । इससे सिद्ध है कि बिना प्रज्ञानमन के कोई भी इन्द्रिय - व्यापार संभव नहीं है । ' केनोपनिषत् ' में विस्तार के साथ इसका निरूपण किया जा चुका है । यहाँ पर केवल तत्सम्बन्धी प्रमाण बतलाकर हम इस प्रकरण को समाप्त करते हैं । प्रज्ञाप्राणात्मक इन्द्रमय प्रज्ञानात्मा की रश्मिएँ ही इन्द्रिएँ हैं । इसी रश्मिभाव को लक्ष्य में रखकर महर्षि कहते हैं-" वागेवास्या एकमङ्गमदूह्ळं तस्यै नाम परस्तात् प्रतिविहिता भूतमात्रा -इत्यादि " । " " प्रज्ञया वाचं समारुह्य वाचा सर्वारिण नामान्याप्नोति । प्रज्ञया प्रारणं समारुह्य प्राणेन सर्वान् गन्धानाप्नोति ० - इत्यादि " । " " न हि प्रज्ञापेता वाङ्नाम किंचन प्रज्ञापयेत् । श्रन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह । नाहमेत शाम प्राज्ञासिषमिति - इत्यादि " । " १- कौषी ० उप ० ३।५ । २- कौषी ० उप ० ३।६ । ३- कौषी ० उप ० ३।७ । [ १७७ ]
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प्रश्नोपनिषद्विज्ञानमाध्य चतुर्थ प्रश्न १- महान, विज्ञान, प्रज्ञान की जाग्रदवस्था २- महान, विज्ञान की जाग्रदवस्था, प्रज्ञान की सुषुप्ति-३- महान् की जाग्रदवस्था, विज्ञान- प्रज्ञान की सुपुप्ति-४- तीनों की सुपुष्यवस्था १ - कोषी ० उप ० ३३८ । [ १७८ ] भूतप्राणनिरूपण जाग्रदवस्था । स्वप्नावस्था | सुपुष्यवस्था । मृत्यु । इस प्रकार अर्थमात्रा के भेद से १० ही प्रज्ञामात्राएँ हो जाती हैं एवं १० ही भूतमाषाएँ हो जाती हैं । दोनों अविनाभूत हैं । प्रज्ञा - प्राण - भूत तीनों मात्राओं के समन्वय से विषयज्ञान होता है । प्रज्ञा - प्राणमात्राएँ उस उक्थरूप प्रज्ञानात्मा से पृथक् वस्तु उसी प्रकार नहीं है जैसे कि रश्मिएँ सूर्य से विभिन्न पदार्थ नहीं हैं । इसी अभिप्राय से ' - इन्द्रियं प्रज्ञामन्तरेणानुपलभ्यमानं प्रज्ञात्मकम् -यह कहा जाता है । रथचक्र में अर्पित घरे और नेमिवतु तीनों घविनाभूत हैं । रथचक्र में एक तो वर्तुलवृत्ताकार मध्य में पत्र है । इसमें से चारों ओर काष्ठखण्ड बाहर निकल रहे हैं । उन चारों ओर व्याप्त खण्डों को पकड़े हुए गोलचक्र है । यह बाहर का गोलचक्र ' नेमि ' है । भीतर के खण्ड ' अरे ' हैं | जिसमें परे हैं यह नाभि है । तीनों अविनाभूत हैं । एक के बिना दूसरा निरर्थक है । बस यही स्थिति यहाँ समझनी चाहिए । नाभिस्थानीय प्रज्ञाप्राणात्मक उक्थरूप प्रज्ञानात्मा है । यह मध्य में प्रतिष्ठित है एवं स्थानीय प्रज्ञाप्राणमाषारूप दस इन्द्रिएँ हैं एवं मिस्थानीय दस भूतमात्राएँ हैं । नेमिरूप भूतमात्रा प्रज्ञानात्रा इन्द्रियों में प्रति है एवं इन्द्रियरूप प्रज्ञामात्राएँ नाभिरूप प्राणात्मक प्रज्ञानात्म में अपित हैं । प्रज्ञानात्मा उक्थ है । प्रज्ञामात्रा- प्राणमात्रा अर्क हैं एवं भूतमात्रा अशिति है । उक्थ आत्मा है, अर्क प्राण है, अशिति पशु है । तीनों की समष्टि ही प्रजापति है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है- ' ता वा एता दर्शव भूतमात्रा अधिप्रज्ञं, दश प्रज्ञामात्रा अधिभूतम् - इत्यादि ' ।'0 $ बस, भूत - प्राण - प्रशायुक्त इन्द्रियवर्गसहित प्रज्ञानात्मा उसी विज्ञान के आधार से चमक रहा है । विज्ञान महदक्षर से चमक रहा है । प्रज्ञान को सूर्य्यं समझिए । प्रज्ञाप्राणभूतमात्राओं को रम्मिएँ समझिए । जब तक सूर्य्य है, तब तक रश्मिएँ हैं । अस्त होता हुआ सूर्य्यं सारी रश्मियों को जैसे अपने में समेट लेता है - इसी प्रकार विज्ञान द्वारा महदक्षर में लीन होता हुआ प्रज्ञान सारी इन्द्रियों को अपने में लीन कर लेता है । प्रज्ञान की इसी अवस्था का नाम सुषुप्ति है । विज्ञान द्वारा महान् में लय होने पर ही सुषुप्ति होती है । कारण इसका यही है कि जब तक विज्ञान जाग्रत् है तब तक सुषुप्ति नहीं होती । इस समय स्वप्नावस्था होती है जैसा कि अनुपद में ही बतलाने वाले हैं । महान् विज्ञान, प्रज्ञान- तीनों की जाग्रदवस्था हमारी जाग्रदवस्था है । प्रज्ञान की सुषुप्ति तथा महान् विज्ञान की जाग्रदवस्था हमारी स्वप्नावस्था है एवं महान् की जागृति तथा विज्ञान प्रज्ञान दोनों की सुषुप्ति हमारी सुषुप्त्यवस्था है एवं तीनों की सुषुप्ति मृत्यु अवस्था है । महदक्षर ' स्व ' का रूप है श्रात्मस्वरूप है । जब तक इसमें प्रज्ञान का अध्ययनहीं, तब तक - ' स्वे अपिति ' नहीं । जब तक ' स्वे अपिति ' नहीं, तब तक हमारे साथ- ' स्वपिति ' 1. शब्द लागू नहीं-
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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य सुषुप्ति में होता क्या है? इसका उत्तर देते हुए कौषीतकि कहते हैं-भूतप्राणनिरूपण जिस समय सुप्तग्रात्मा स्व - स्वप्नजगत् से दूर जाता हुआ स्व - स्वरूप महदक्षर में अपीत हो जाता है, उस समय सारे नामों को साथ लिए वाक् इसमें डूबी रहती है । इसी प्रकार रूप, शब्द, ध्यान आदि को लिए हुए चक्षु, श्रोत्र, मन ( इन्द्रियमन ) आदि उसी प्रज्ञान में डूबे रहते हैं । प्रज्ञान इन सबको साथ लिए महान् में डूबा रहता है । अनन्तर जब यह जाग्रदवस्था में आता है तो जैसे प्रज्वलित अग्नि में से चारों ओर अग्निविस्फुलिङ्ग निकलने लगते हैं उसी प्रकार जाग्रत् प्रज्ञान में से चारों ओर विस्फुलिङ्गरूप इन्द्रिएँ उबुद्ध हो पड़ती हैं । प्रज्ञान में प्रज्ञामय प्राण इन्द्र है एवं विज्ञान द्वारा श्रागत चित् अमृत हैं । इस चिदाभासरूप अमृततत्त्व को लक्ष्य में रखकर ही प्रज्ञानात्मा के लिए-" तद्यथा रथस्यारेषु नेमिरपितो, नाभौ धरा श्रपिता, एवमेवैता भूत-मात्रा प्रज्ञामात्रास्वपिताः प्रज्ञामात्राः प्राणेऽपिताः । स एष प्राण ( इन्द्र ) एव प्रज्ञात्मा श्रानन्दः, अजरः, श्रमृतः - इत्यादि " ॥ ' - यह कहा जाता है । यह अमृतमय प्रज्ञानात्मरूप प्राणेन्द्र जब तक इस चिदंश को नहीं पहचानता-अमृतानन्द को प्राप्त नहीं करता तब तक ही यह इस पर इन्द्रियों द्वारा होने वाले भावनावासना-संस्काररूप श्रावरणधर्म्मा तमोमय आसुरभाव से माक्रान्त होकर दुःख पाया करता है । जिस दिन यह अपने प्राधाररूप चित् - तत्त्व का स्वरूप पहचाना जाता है उस दिन-" श्रात्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुषः । किमिच्छन्कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ” । ” अनुसार सारे दुःखों से विनिर्मुक्त होता हुआ स्वाराज्य - पद को प्राप्त हो जाता है । यह है - सुषुप्ति के अधिष्ठाता प्रज्ञानात्मा का संक्षिप्त स्वरूप । इसे सामने रखते हुए पिप्पलाद ऋषि के निम्नलिखित अक्षरों पर दृष्टि डालिए— इस अध्यात्मजगत् में कौन देवता सोते हैं? इसका उत्तर देते हुए पिप्पलाद गार्ग्य से कहने लगे कि हे गार्ग्य! जिस प्रकार रश्मिएँ ग्रस्त होते हुए सूर्य के तेजोमण्डल में एकीभाव को प्राप्त होती हुई विलीन हो जाती हैं एवं प्रातःकाल सूर्योदय होते ही वे रश्मिएँ पुनः निकलकर चारों ओर व्याप्त हो जाती हैं- इसी प्रकार यह सारा प्रपञ्च ( इन्द्रियग्राम ) उस अपने परदेवरूप सर्वेन्द्रिय नाम से प्रसिद्ध प्रज्ञानमन में विलीन हो जाता है । ऐसी अवस्था में यह पुरुष न सुनता है, न देखता है, न सूंघता है, न स्वाद लेता है, न स्पर्शानुभव करता है, न बोलता है, न हस्तादि से किसी वस्तु के ग्रहण १- कौषी ० उप ० ३८ । २- बृहदा ० उप ० ४।४।१२ । [ १७६ ]
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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण में समर्थहोता न वीर्य्यादि का परित्याग करता है, न चलता है - इस अवस्था में वह ' स्वपिति ' नाम से पुकारा जाता है । जैसा कि ऋषि कहते हैं— " तस्मै स होवाच, यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मि-स्तेजोमण्डल एकीभवन्ति ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत्सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति ॥ तेन तोष पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नादसे नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपिती-त्याचक्षते " ॥२ ॥
१- श्रृणोति -श्रोत्र ६- नाभिवदते -वाक् २- न पश्यति -चक्षु ७ - नादत्ते -पाणि १३- न जिघ्रति -प्राण ( धारण ) दन विसृजते - उपस्थ ४- न रसयते -जिह्वा ६- नेयायते -पाद १०- मनः ५- न स्पृशते - त्वक् श्रोत्र दिक्सोम है । चक्षु श्रादित्य है । घ्राण वायु है । वाक् अग्नि है । मन भास्वरसोम है । दसों इन्द्रियों का इन पाँच देवताओं में अन्तर्भाव है । शरीर में ये पाँच देवता सो जाते हैं । बस, ' एत-स्मिन् पुरुषे कानि स्वपन्ति '? इस प्रथम प्रश्न का यही समाधान है । ऐसा होता क्यों है? क्यों इन्द्रिएँ परदेवता में जाकर सुषुप्ति का कारण बनती हैं? एकमात्र यह प्रश्न बच जाता है । इस प्रश्न का उत्तर तीसरे प्रश्न के समाधान करते समय दिया जायगा । ( २ ) - दूसरा प्रश्न है— ॥ १ ॥
" कान्यस्मिन् जाग्रति ”? ' यज्ञेश्वर मधुसूदन कहते हैं--१- गीता ३।१० । “ सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ” ॥ ' [ १८० ]
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चतुर्थं प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण प्रजापति ने यज्ञ द्वारा ही प्रजा उत्पन्न की है । दूसरे शब्दों में यज्ञात्मक यज्ञप्रजापति ही सृष्टि का प्रमव प्रतिष्ठा -परायण है । कैसे है? इसके लिए दो - चार पङ्क्तियों में प्राकृतयज्ञ का स्वरूप समझ लेना आवश्यक होगा । ' पाङ्क्तो वं यज्ञः ' के अनुसार प्राकृतिक यज्ञ अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, चातुर्मास्य, अयन, सोम भेद से पाँच यज्ञों में विभक्त है । पांचों ही यज्ञ पार्थिव हैं । ग्रहः श्रग्नि में रात्रि के सोम की आहुति पड़ती रहती है । यही अहोरात्रात्मक प्राजापत्य अग्निहोत्र है । पक्षाग्नि में चान्द्रसोम की आहुति पड़ती रहती है- यही पक्षात्मक दर्शपूर्णमास यज्ञ है एवं ब्रीहि, यव, श्यामाक - भेदभिन्न तीनों अन्नरसों की आहुति से चातुर्मास्य यज्ञ रहा है । ३३ अहर्गणात्मक वषट्कारमण्डल होता है । इसमें १६ तक पूर्वाद्धभाग में अग्नि ( प्राणाग्नि ) है एवं १७ के ऊपर ३३ तक सोम है । इस सोम की १७ वें प्राजापत्य अग्नि में जो आहुति होती है वही संवत्सरयज्ञ है । यही सोमयज्ञ है, एवं षाण्मासिक यज्ञ पशुबन्ध है । ये पांचों ही वितानयज्ञ हैं । एक ही अग्नि का तीन भागों में वितान होता है, अतएव इस पाङ्क्तयज्ञ को वितान कहा जाता है । अग्निहोत्र - दर्शपूर्णमास दोनों हवियंज्ञ हैं । हवियंज्ञ का वेदीरूप चित्य पृथिवीपिण्ड से सम्बन्ध है एवं सोमयज्ञ का महावेदीरूप अमृता पृथिवी से सम्बन्ध है । पहले हविर्वेदी को ही लीजिए - पिण्डपृथिवी के पृष्ठभाग का अग्नि गार्हपत्य है एवं सूय्यं के सम्मुख रहने वाला प्राधा पार्थिव पिण्डाग्नि आहवनीय है एवं पृथिवी के दक्षिणभांग का अग्नि दक्षिणाग्नि है, उत्तरभाग में सोम है । पृथिवीपिण्ड वेदी है । यही पहली हविर्यज्ञसंस्था है । अब पृथिवी के अग्नि को गार्हपत्य अग्नि समझिए । हविर्वेदी का ग्राहवनीयभाग गार्हपत्य समझिए एवं १७ वें ग्रहणवाले अग्नि को आहवनीय समझिए । मध्य के अन्तरिक्ष्य अग्नि को दक्षिणाग्नि समझिए एवं पृष्ठ से २१ तक महावेदी समझिए । एकविंशस्थ सूर्य को यूप समझिए । इस महावेदी पर वितत ग्राहवनीय में जो कि महावेद्यन्तर्गत उत्तरावेदी में प्रतिष्ठित है - उस १७ ग्रहण से ऊपर वाले सोम की आहुति होती है । जैसे घृताहुति से प्रज्वलित होता हुआ श्रग्नि अधिक प्रायतन बना लेता है, तथैव इस सोमाहुति से १७ वें स्थानवाला अग्नि २१ तक चला जाता है । २१ पर सूर्य्यरूप स्वर्गस्थान है । श्राहवनीय यहाँ तक व्याप्त रहता है, अतएव १७ वें ग्राहवनीयाग्नि के लिए- ' आहवनीयो वै स्वर्गलोकः ' यह कहा जाता है । इस सोमाहुति के प्रभाव से वही पार्थिव अमृतरूप प्राणाग्नि २१ तक व्याप्त होता हुआा - घन, तरल, विरल - इन तीन अवस्थाओं में परिणत हो जाता है । इनमें 8 तक घनाग्नि है- यह पार्थिव अग्नि है । १५ तक तरलाग्नि ( वायु ) है - यही आन्तरिक्ष्य अग्नि है । २१ तक विरलाग्नि ( आदित्य ) है - यही दिव्याग्नि है । चित्य पृथिवीपिण्ड इन तीनों की प्रतिष्ठा है । चित्य पृथिवीपिण्ड का ग्राहवनीय और ६ तक रहने वाला प्राणाग्नि अभिन्न है, अतएव महायज्ञ में दोनों की समष्टि को गार्हपत्य मान लिया जाता है । पृथिवीपृष्ठ से २१ तक पार्थिव स्तोमाग्नि है । अग्नि, वायु, आदित्य तीन भेदों से युक्त यह पार्थिव अग्नि स्तोम्यत्रिलोकी में व्याप्त हो रहा है । पार्थिव अग्नि गायत्राग्नि है, दिव्य अग्नि सावित्राग्नि है । मध्याग्नि आन्तरिक्ष्य धिष्ण्याग्नि है । पार्थिव गायत्राग्नि गार्हपत्याग्नि है । दिव्य सावित्राग्नि आहव-नीयाग्नि है । मध्य का अग्नि दक्षिणाग्नि है । गार्हपत्याग्नि श्रपानाग्नि है । ग्राहवनीयाग्नि प्राणाग्नि है । गार्हपत्याग्नि ही वहाँ जाकर प्रणीत होकर आहवनीय नाम धारण करता है, अतएव उसे हम अवश्य ही प्राणाग्नि कहने के लिए तय्यार हैं । मध्य में दक्षिणाग्नि है - यही व्यानाग्नि है । इस व्यान के आधार [ १८१ ]
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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण पर पार्थिव प्रपान, दिव्य प्राणाग्नि का उपांशुसवन होता है । इससे वैकारिक वैश्वानर, हिरण्यगर्भ, सर्वज्ञ - तीन श्रग्नि और उत्पन्न हो जाते हैं जिनका कि विशद निरूपण पूर्व के उपनिषदों में या चुका है । पार्थिव अपानाग्नि ऊपर जाता है उस समय वही समान कहलाने लगता है एवं मध्यस्थ व्यानाग्नि से धक्का खाकर नीचे की ओर लौटता हुआ वही अपान कहलाने लगता है । एवमेव इसी प्रादान - विसर्ग के कारण प्राण के भी प्राणोदान दो भेद हो जाते हैं । इस प्रकार तीन के पाँच अग्निप्राण हो जाते हैं-१- पार्थिव प्रपानाग्निः २- पार्थिव समानाग्निः - पार्थिवाग्निः पृथिवी ३ - प्रान्तरिक्ष्य व्यानाग्निः ] - श्रान्तरिक्ष्य वायुः १५ अन्तरिक्षम् ४- दिव्य प्राणाग्निः --दिव्यादित्यः २१ द्योः ५- दिव्य उदानाग्निः → स्तौम्य त्रिलोकी यह है - प्राकृतिक यज्ञप्रजापति का संक्षिप्तस्वरूप । इसी यज्ञप्रजापति की प्रतिकृति पर अध्यात्मयज्ञ प्रतिष्ठित है एवं इसी पर अधिभूत ( मनुष्यकृत ) वैधयज्ञ प्रतिष्ठित हैं । उदान - समान के स्थान में मनुष्यकृत वैधयज्ञ में - आवसथ्याग्नि और सथ्याग्नि को स्थापित किया जाता है । प्रकृतिवत् अग्नियों हविर्वेदी के आहवनीय को गार्हपत्य माना जाता है । मध्य के सदोमण्डप में प्रान्तरिक्ष्य आठ की प्रतिकृति पर आठ धिष्ण्याग्नि प्रतिष्ठित किए जाते हैं । ग्राहवनीय के आगे सूर्य की प्रतिकृतिरूप श्रात्मा स्वर्ग यूप गाड़ा जाता है । यूप ही एक प्रकार से उदान है । इसी के द्वारा यज्ञकर्त्ता यजमान का में जाता है । अस्तु, इस अधिभूतयज्ञ के विषय में हम अधिक नहीं कहना चाहते । हमारा लक्ष्य प्रकृत में अध्यात्मयज्ञ है, अतः उसी की ओर आपका ध्यान आकर्षित करते हैं । अध्यात्म में पायुपस्थरूप पृथिवी में अपानाग्नि है । हृदयरूप अन्तरिक्ष्य में व्यानाग्नि है । मस्तकरूप द्युलोक में प्राणाग्नि है । मूलाधार मध्य में से ब्रह्मरन्ध्र तक महावेदी है । इस महावेदी में मस्तकमाग उत्तरावेदी है । इस उत्तरावेदी के मुखरूप श्राहवनीयाग्नि है । अध्यात्म देवताओं के लिए इसी ग्राहवनीय में अन्नाहुति दी ' जाती कहने है के, श्रतएव - ' आहूयते यत्र अन्नं ' - इस व्युत्पत्ति से हम इस मुखाग्नि को अवश्य ही ' आहवनीयाग्नि हैं - जैसा कि लिए तय्यार हैं । इनमें अपान के अपान समान दो भेद हैं । प्राण के प्राणोदान दो भेद में तृतीय प्रश्न में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । पायूपस्थ में अपानाग्नि है, नाभिप्रदेश समानाग्नि | हृदय में व्यानाग्नि है । कण्ठ से ब्रह्मरन्ध्र तक प्राणाग्नि है । कण्ठनलिकास्थ सुषुम्णा में उदानाग्नि है । वैकारिक वैश्वानराग्नि का समानाग्नि से सम्बन्ध है । यह नाभि से दक्षिणभाग में है । वैकारिक प्राज्ञात्मा का व्यानाग्नि से सम्बन्ध है । यह हृदय में है एवं वैकारिक तैजसात्मा का प्राणा-ग्निमय उदानाग्नि से सम्बन्ध है । इसीलिए तो तीसरे प्रश्न में- ' तेजो ह वै उदान: ' - यह कहा है । अपानाग्नि का काम मलोत्सर्ग करना है । समानाग्नि का काम वैश्वानराग्नि में हुत अन्न को समुन्नयन [ १८२ ]
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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण द्वारा सप्ताचि में परिणत करना है । इसी समुन्नयन से श्वास - प्रश्वास की सत्ता है । श्वास - प्रश्वास समीभाव से तभी तक चलते रहते हैं, जब तक कि अन्न के रस का समुन्नयन समभाव से हुआ करता है । अन्नाहुति ही श्वास - प्रश्वासरूप दोनों जीवनयज्ञ की रक्षा करने वाली आहुति की रक्षा करती है एवं अन्ना-हुति को प्राहुतिरूप में परिणत कर प्रज्वलित करना इसी नाभिदेशस्थ समानाग्नि का काम अतएव हम समान को ही श्वास - प्रश्वास की समानता का कारण मानने के लिए तय्यार हैं । इस प्रकार-' समुन्नयति अन्नाहुति, समुन्नयनद्वारा समं नयति- उच्छवासनिश्वासौ'- इन दो प्रकार की व्युत्पत्तियों से हम इसे ' समान ' कहने के लिए तय्यार हैं । तीसरा है - व्यान । प्रपान, प्राणु के उपांश्वन्तर्य्याम द्वारा वैश्वानर- तैजस - प्राज्ञरूपभोक्तात्मा को उत्पन्न कर -७२ सहस्र नाड़ियों द्वारा शरीरगत यच्चयावत् चेष्टाओं के संचालन द्वारा श्रात्मस्वरूप रक्षा करना इसी व्यान का काम है । इस व्यान के स्थान में प्रज्ञानात्मा प्रतिष्ठित है । इसी के दक्षिणभाग में दक्षिणाग्नि रहता है । यद्यपि पूर्व में हमने व्यानाग्नि को दक्षिणाग्नि बतलाया है, परन्तु वस्तुतः व्यानाग्नि- अन्नपरिपाक करने वाला समानाग्नि के दक्षिण-भागस्य वैश्वानर अग्नि है एवं पित्त बढाने वाला व्यानस्थ ( व्यानसमीपस्थ ) दक्षिणाग्नि है । प्राणापान की योगावस्था समान है । फलावस्था वैश्वानर है । यह वैश्वानर दक्षिणाग्नि है । सात प्रकार की त्रिलोकी - व्यूहन में हृदय और नाभि दोनों व्यानस्थान पड़ते हैं । समानवायु, व्यानवायु- दोनों व्यान हैं । दोनों के दक्षिणभाग में अग्नि है, अतएव यहाँ व्यान को अन्वाहार्यपचन बतला दिया गया है । ये दोनों ही क्रमशः नाभि और हृदय में प्रतिष्ठित होते, परन्तु नाभिस्थान समानाग्नि से घिर जाता है एवं हृदयस्थान प्रज्ञानात्मा से घिर जाता है, अतएव उभयविध अन्वाहार्यं पचन को दोनों से दक्षिणभाग में अपना आवास बनाना पड़ता है । हृदयस्थ प्रज्ञानात्मा मन है । यह विज्ञानसंपरिष्वक्त प्रज्ञान ही यजमान है - यज्ञ का अधिष्ठाता है । ब्रह्मरन्ध्र द्वारा विज्ञानप्राण आया करता है - जैसा कि तीसरे प्रश्न में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । वह विज्ञान प्रज्ञानमन से बद्ध है । प्रज्ञा में जो प्राणभाग है वही इन्द्र है- इन्द्र विद्युत् है । विज्ञानविद्युत् प्रज्ञानविद्युत् दोनों अविनाभूत हैं । यह विद्युत् ( मन ) उसी उदान द्वारा निरन्तर स्वर्ग में जाया करता है । उदान ही तैजस द्वारा- सुषुम्णा द्वारा इस यजमान ब्रह्म को स्वर्ग में ले जाया करता है । तात्पर्य यही है कि यज्ञफल है स्वर्गप्राप्ति । अध्यात्म में अन्नाहुति द्वारा प्राणाग्नियों के आधार पर प्रज्ञानात्मा यज्ञ कर रहा है । इस अन्नाहुतिरूप यज्ञ से इसका स्वरूप स्थिर है । अन्नयज्ञ से ही मन का स्वरूप बना हुआ है । इसी यज्ञ द्वारा इस विद्युत् का अहरहः सूर्य्य में गमन है । इष्ट ( यज्ञ ) फल उदान है । इसी के द्वारा मनोमय ऐन्द्रविद्युत् सूर्य में जाया करती है - आया करती है । जिस दिन यज्ञ बन्द हो जाता है - स्वर्गसम्बन्ध टूट जाता है । इस सारे प्रपञ्च में प्रकृत में हमें केवल यही बतलाना है कि इस शरीर में पूर्वोक्त प्राणाग्नियाँ २४ घण्टे जागृत रहती हैं । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण शरीर की गर्मी और श्वासोच्छ्वास हैं । प्राणेन्द्रिय में हमने गन्धग्रहण और श्वास - प्रश्वास - दो काम बतलाए हैं । गन्धग्रहण का इन्द्रियों में समावेश है, श्वास-प्रश्वास का व्यानाग्निरूप प्राणाग्नि में अन्तर्भाव है । इन्द्रिएँ सौम्यप्राणरूपा हैं- ये सुप्त हैं, किन्तु [ १८३ ]
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प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण है । गर्मी सदा पाते हैं, प्रत-प्राणाग्निभाग जागृत है । गर्मी प्राणोदानादि के उपांश्वन्तर्य्याम पर निर्भर । एव हम सदा ही इन प्राणाग्नियों को जागृत मानने के लिए तय्यार हैं पृथिवी है । ये पाँचों प्राणाग्नि पूर्वकथनानुसार स्तोम्यत्रिलोकी की वस्तु हैं । स्तोम्यत्रिलोकी अविनाभूत हैं । जब तक पृथिवी भूतप्राणमयी है । भूत शरीरपिण्ड है । प्राण पाँचों अग्नि हैं है । दोनों शरीर नष्ट हो जाता है । प्राणाग्नि है तभी तक शरीरसत्ता है । जिस दिन प्राणाग्नि सो जाता इसी प्राणाग्निविज्ञान को लक्ष्य में रखकर प्राणाग्नि की सुप्तावस्था ही मनुष्य की मृत्यु - अवस्था है । भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-" प्राणौ वं स्वयमातृष्णा । श्रादित्यो लोकम्पूरणा । प्राणं तदावित्येन समिन्द्धे । सर्व एवात्मोष्णः । तद्धेतदेव जीविष्यतश्च मरिष्यतश्च विज्ञानम् । उष्ण एव जीषिष्यन् -'शीतो मरिष्यन् " ॥ ' इस समाधान को लक्ष्य में रखते हुए महर्षि पिप्पलाद कहते हैं-" प्राणाग्नय एवंतस्मिन् पुरे जाग्रति । गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानः, व्यानो-ऽन्वाहार्यपचनः, यद् गार्हपत्यात् प्ररणीयते प्ररणयनादाहवनीयः प्राणः " ॥३ ॥
“ यदुच्छ्वासनिःश्वासौ - एतौ श्राहुती समं नयति इति स समानः । मनो ( प्रज्ञानात्मा ) ह वाव यजमानः । इष्टफलमेबोदानः स एनं यजमानं - प्रहरहर्ब्रह्म गमयति ॥४ ॥
॥ २ ॥
३- तीसरा प्रश्न है-" कतर एष देवः स्वप्नान् पश्यति "? ' कानि स्वपन्ति '? उत्तर है— ' इन्द्रियाणि ' । ' कानि जाग्रति '? उत्तर है- ' प्राणाग्नयः ' । इन्द्रिएँ सो चुकी हैं । पञ्च प्राणाग्नि जाग रहे हैं । बस, इसी सान्ध्य अवस्था में हमारा वही सुप्रसिद्ध विज्ञानदेव स्वप्न देखा करता है । स्वप्न में बहिर्जगत् का व्यापार बन्द है । अन्तर्जगत् का काम १- शत ० ब्रा ० ८।७।२।११ । [ १८४ ]
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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माध्य भूतप्राणनिरूपण चल रहा है । हम बतला आए हैं कि प्रज्ञानमन इन्द्रियों द्वारा विषयों में आसक्त रहता है । इन्द्रिय द्वारा इन्द्रियों के प्राज्ञभाग से इसमें भावनासंस्कार पैदा होता है एवं प्राणभाग से वासनासंस्कार पैदा होता है । एक अनुभवाहित संस्कार है, दूसरा वासनाहित संस्कार है । इन दोनों संस्कारों की कमाई यह उसी प्रकार कर लेता है - जैसे कोई सेठ अपने दलालों द्वारा सम्पत्ति इकट्ठी कर अपनीदुकान में जमा किया करता है । इन संस्कारों के लिए स्वयं श्रुति ने यही दृष्टान्त दिया है । क्योंकि यही दृष्टान्त ठीक बैठता है । रकम लगती है व्यापार में सेठ की, काम करते हैं दलाल । असली फायदा होता है । सेठ को, दलालों को मिलती है- दलाली । सेठजी रहते हैं दुकान में, दलाल फिर - फिर कर व्यापार करते हैं । बस, ठीक यही बात यहाँ है । प्राज्ञ प्राण दोनों भाग हैं- प्रज्ञानमन के ये ही साधनभूत द्रव्य हैं । इनके द्वारा इन्द्रिएँ व्यापार करके रूपरसादिस्वरूप वित्त को उसी श्रेष्ठी मन को सौंपती हैं । आप मी थोड़ी देर के लिए रूपादि से युक्त रहती हैं । श्रेष्ठी मन अपने स्थान में रहता है । इन्द्रिय-रश्मिएँ व्यापार करती हैं । इस व्यापार से श्रेष्ठी मन धनवान् हो रहा है । साथ ही में मन के द्वारा इन्द्रियों के स्वरूप की रक्षा हो रही है । मन से इन्द्रिएँ कमाती हैं, इन्द्रियों से मन कमाता है । सेठ न हो तो दलाल कैसे? दलाल न हों तो सेठ का व्यापार कैसा? दोनों में परस्पर भोग्य भोक्तृत्व है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ऋषि कहते हैं-" तमेतमात्मानं ( प्रज्ञानात्मानं ) एत आत्मानो ( इन्द्रियारिण ) अन्वय-स्यन्ति । यथा श्रेष्ठिनं स्वाः ( उपजीवकाः ) । तद्यथा श्रेष्ठी स्वैर्भुङ्क्ते, यथा वा स्वाः श्रेष्ठिनं भुञ्जन्ति एवमेवैष प्रज्ञात्मा - एतैरात्मभिर्भुङ्क्ते । एवं वै तमा-त्मानमेत आत्मानं भुञ्जन्ति " - इति ॥ ' कहना यही है कि मन इन्द्रियों द्वारा ज्ञानमय भावनासंस्कार एवं क्रियामय वासनासंस्कार दोनों को अपने खजाने में रख लेता है । कदाचित् कहो कि थोड़े से मन पर इतने भूतसंस्कार कैसे समा जाते हैं? इस प्रश्न का उत्तर पदार्थमात्र को धामच्छद ( जगह रोकने वाला पदार्थ ) मानने वाला पाश्चात्य जगत् भले ही न दे सके, परन्तु हमारा विज्ञानशास्त्र ऐसे उत्तरों का कोई महत्त्व नहीं रखता? आँख की छोटी से छोटी कृष्णकनीनिका में पर्वत, प्रासाद, सूर्य्य - चन्द्रमा पृथिवी आदि महामहा पदार्थ यदि समा सकते हैं, एक ही कमरे में एक ही स्थान पर यदि १० दीपप्रभाएँ असंग रहती हुई समा सकती हैं तो मन में भी सारे संस्कार विना किसी विरोध के परस्पर में अनासक्त होते हुए समा सकते हैं । तेज अधामच्छद है । तेज साक्षात् इन्द्र है । प्रज्ञानात्मा इन्द्र है, अतः इस विषय में ' कैसे सारे संस्कार इस मन में बैठें - यह प्रश्न ही नहीं हो सकता । ऊपर के निरूपण से पाठक यह भली - भाँति मान गए होंगे कि इन्द्रियाधिष्ठाता हमारा यह मन दो विश्वों का उपभोग करता है । जाग्रदवस्था में इन्द्रियों द्वारा यह बहिर्जगत् का उपभोग करता है एवं स्वप्नावस्था में संस्काररूप से आगत बहिविषयों का अनुभव करता १- कौषी ० उप ० ४।२० । [ १८५ ]
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श् प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माध्य भूतप्राणनिरूपण है । मान लीजिए - प्रज्ञाभूतमात्रायुक्त १० सों इन्द्रिएँ मन में डूब गईं । इस समय बाहर के द्वार अन्त- बन्द हैं । ऐसी अवस्था में द्रष्टा विज्ञानात्मा के पास देखने के लिए मन पर संस्काररूप से प्रतिष्ठित जगत् ही रह जाता है । विज्ञान द्वारा महान् में विलयन होने पर तो संस्कारजगत् भी नहीं रहता । परन्तु अभी प्रज्ञान विज्ञान में टूवा है । विज्ञान अभी जागृत है, अतएव इस अवस्था में यह इन्हीं संस्कारों को ले लेकर नई सृष्टि बनाया करता है । यही स्वप्नावस्था है - जैसा कि कठोपनिषत् में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । स्वप्न में वही वस्तुएँ दीखती हैं जिन्हें प्रज्ञान द्वारा विज्ञान जाग्रदवस्था में देखता है यह सिद्धान्त पूर्वोपनिषत् में ही बतलाया जा चुका है । स्वप्न में संस्कारजगत् के सम्बन्धवैचित्र्य से श्रद्भुतस्वरूप दीखने लगता है । इस असम्बन्ध का कारण वही प्राणवायु है । प्राणो-दानसमानव्यानापानाग्नियों के साथ इन्हीं नामों से विभक्त वायु भी जागता रहता है । गतिधर्मा यह वायु ही उन संस्कारों में उथल - पुथल मचाया करता है । इसलिए स्वप्नजगत् में अष्टपूर्वता मालूम होती है । वस्तुतः ऐसा है नहीं । प्रज्ञानात्मा विज्ञान की अपनी महिमा है । विज्ञानतेज ने ही प्रज्ञान को ज्ञानमय बना रखा है । इन्द्रियसम्बन्धी बहिर्जगत् के विषय प्रज्ञान की स्वमहिमा हैं । इस समय ( जाग्रद-वस्था में ) यह स्वमहिमा को नहीं देखता - प्रज्ञान महिमा को देखता है । परन्तु स्वप्नावस्था में प्रज्ञानमहिमा प्रज्ञान में डूब जाती है । उस समय यह प्रज्ञानगत विषयों को ही देखा करता है । निष्कर्ष यही हुआ कि विज्ञानात्मा ही स्वप्नद्रष्टा है । इसी अभिप्राय से पिप्पलाद कहते हैं-" अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति " ॥ स्वप्न में वही वस्तु दीखती है जो कि जाग्रदवस्था में देखी जाती है । इसका स्पष्टीकरण करते हुए मागे जाकर पिप्पलाद कहते हैं जो कुछ जाग्रदवस्था में देखा गया है वही दृष्ट पदार्थ स्वप्नावस्था में जो श्रुत ( सुना हुआ ) रहता है, स्वप्नावस्था में उसी श्रुत को संस्काररूप से देखा जाता है । जाग्रदवस्था में ( सुने हुए को ) सुनता है एवं देश - दिशा उपदिशाओं से जाग्रदवस्था में जो अनुभूत होता है, स्वप्न में वही पुनः पुनः अनुभूत होता रहता है । राष्ट, बुत, अनुभूत इन्द्रियविषय तीन भागों में विभक्त हैं । चक्षुरिन्द्रिय का धर्म्म देखना है । श्रोत्रेन्द्रिय का धर्मं सुनना है । उपस्थ, जिह्वा से अनुभव होता है । वस्तुतस्तु-दृष्टं श्रुतं मात्र से ही सारी इन्द्रियों का ग्रहण हो जाता है जैसा कि ' भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम ' - इत्यादि पूर्वोक्त मङ्गलाचरणरहस्य में ही विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । दृष्टविषय, चक्षुरूप प्रादित्य-प्राण और वाक्रूप वायु अग्नि का उपलक्षण है एवं दिक्सोमरूप घोष मास्वरसोमरूप मन का उपलक्षण है । इन पांचों के अलावा एक धनुभूति घोर होती है । रामचन्द्र के चित्र से रामचन्द्रस्वरूप का अनुभव होने लगता है । रामचन्द्रकाल में न हमने रामचन्द्र को देखा था, न सुना था । परन्तु चित्र द्वारा वह हमारे लिए देखे सुने से हो जाते हैं । यह इस तीसरी अनुभूति का ही चमत्कार है । अनुभूतियाँ देश और काल से सम्बन्ध रखते हैं । प्रमुक देश में रामचन्द्र हुए थे उनकी यह तस्वीर है यह देशानुभूति है, है । इस देशकालानुभूति से भ्रष्ट, अश्रुत अबूत भी दृष्टश्रुतसम अमुक समय में उत्पन्न हुए थे यह कालानुभूति डाले जाते हो जाता है । इसी अनुभूति के आधार पर सर्वथा अदृष्ट - प्रश्रुत रामकृष्णादि के चित्र बना हैं । यही नहीं उनका उपासनाकोटि में समावेश कर लिया जाता है । बस दृष्ट, श्रुत, अनुभूत तीनों [ १८६ ]