प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 201–210

प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 201–210

पृष्ठ 201

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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण का जाग्रदवस्था में जो सम्बन्ध होता है स्वप्न में यही संस्कार पुनः पुनः उद्बुद्ध होकर क्रीड़ा किया करते हैं-" यद् दृष्टं ( जाग्रदवस्थायां तदेव ) दृष्टं ( स्वप्नावस्थायां ) अनुपश्यति । ( जाग्रदवस्थायां यत् ) श्रुतं ( स्वप्नावस्थायां तत् ) श्रुतमेवार्थमनुशृणोति, देशदिगन्तरैश्च ( जाग्रववस्थायां यत् ) प्रत्यनुभूतं ( ( स्वप्नावस्थायां ) पुनः पुनः प्रत्यनुभवति " ॥ इसीलिए तो शृणोति पश्यति, अनुभवति न कहकर अनुशृणोति, अनुपश्यति, प्रत्यनुभवति कहा है । एक बार देखने, सुनने, अनुभव करने के अनन्तर जो उसी का लक्ष्य बनाकर पुनः देखा, सुना, अनु-भव किया जाता है, उसी के लिए ' अनु ' का प्रयोग होता है । ' अनु ' का अर्थ है पश्चात् । जाग्रदवस्था में यह शृणोति, पश्यति, अनुभवति का अधिकारी है । परन्तु स्वप्नावस्था में वह इन्हीं को पुनः देखता-सुनता अनुभव करता है । ऐसी अवस्था में अवश्य ही हमारे पूर्वसिद्धान्त की सिद्धि हो जाती है । जिन भावनावासना संस्कारों की अब तक हम गाथा गाते आ रहे हैं वही संस्कारपुञ्ज हमारे जन्म के प्रधान बीज हैं । संस्कार ही जन्मान्तर के कारण बनते हैं । प्रज्ञानात्मा संस्कारों का जन्म - जन्म में भोग करता है एवं साथ ही में नई कमाई कर करके भविष्य के लिए जन्मबन्धन की सामग्री इकट्ठा करता रहता है । इस जन्म में इसी जन्म के संस्कार स्वप्न में दीखें - यह बात नहीं है अपितु, समय - समय पर स्वप्नावस्था में पूर्वजन्मों के संस्कार भी दीखा करते हैं । परोवरीणविज्ञान ऐहिक, पूर्वदेहिक दोनों संस्कारों को देखा करता है । इस जन्म के संस्कारों को तो हमने इसी जन्म में इन्द्रियों द्वारा इकट्ठे किए हैं, अतः इनके लिए तो ' दृष्टं श्रुतं - अनुभूतं ' कह सकते हैं । परन्तु जन्मान्तरगत संस्कारों को बहिर्जगत् में इस वर्तमान शरीर की इन्द्रियों को देखने, सुनने, अनुभव करने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ है । इस वर्त्तमान परिस्थिति के लिए तो जन्मान्तरीय त्रिविध संस्कार अदृष्ट, प्रश्रुत, अनुभूत ही हैं । हमारा यह विज्ञान दृष्ट ( इस वर्त्तमान जन्म में दृष्ट ) अदृष्ट ( जन्मान्तर की अपेक्षा दृष्ट किन्तु इस वर्त्तमान जन्म की अपेक्षा से ग्रदृष्ट ) श्रुत, अश्रुत, अनुभूत, अननुभूत सदसत् - सबको देखा करता है । दृष्ट, श्रुत, अनुभूत एवं प्रदृष्ट, अश्रुतं, अननुभूत - ६ ओं ही अच्छे भी होते हैं - बुरे भी होते हैं । अर्थात् स्वप्न सुखद भी हैं, दुःखद भी हैं । कितने ही दृश्य, शब्द, एवं अनुभूतियों से आनन्द प्राप्त होता है । किन्तु कितने ही दृष्ट, श्रुत, अनुभव घोर दुःखसागर में आत्मा को डुबो देते हैं— १- दृष्टम् --- - वर्तमानजन्मनि - दृष्टं-२- अदृष्टम् - - अस्मिन् जन्मनि - अदृष्टं - जन्मान्तरे ' दृष्टम् ' । ३- श्रुतम् - अस्मिन् जन्मनि - श्रुतम्, [ १८७ ]

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प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य ४- अश्रुतम्- - अस्मिन् जन्मनि - अश्रुतम् - जन्मान्तरे ' श्रुतम् ' । ५- अनुभूतम् - अस्मिन् जन्मनि - अनुभूतम् -६- श्रननुभूतम् - अस्मिन् जन्मनि – अननुभूतम् — जन्मान्तरे - ' अनुभूतम् ' । भूतप्राणनिरूपण ' दृष्टश्रुताभ्यां मनसानुचिन्तयेत् ' के अनुसार दृष्टश्रुत का जो संस्कार होता है - उसकी जो स्मृति है - वही अनुभूति है । ६ ओं ही सदसत् भेद से दो भागों में विभक्त हैं । यहाँ के अदृष्ट- अश्रुत - अननुभूत पद से कोई अदृष्टपूर्व, अश्रुतपूर्व, अननुभूतपूर्वं न समझले- इसीलिए ऋषि ने पहले ही - ' दृष्टं दृष्ट-मनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थं शृणोति ' इत्यादि कह दिया है । प्रसंगागत एक बात और समझ लेनी चाहिए-इन्द्रियों में स्वप्न और जाग्रदवस्था निष्पन्न करने वाली जो भूतमात्राएँ आती हैं वे वायु, सौर रश्मि, स्पर्श, प्रज्ञानसंस्कार द्वारा आती हैं । वायु द्वारा गन्धादि का आगमन होता है । सौर रश्मि द्वारा रूपादि का आगमन होता है । स्पर्शं द्वारा सुखदुःखादि विषयों का आगमन होता है । सबसे बडी आमद संस्कार से है । पूर्वजन्म के स्वसंस्कार ही गुणभूतरूप - रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्दरूपभूतमात्राओं के आगमन का कारण है । जिसके पूर्वजन्म के संस्कार में जो भूतमात्रा नहीं होती- इस जन्म में भी उसका तिरोभाव ही रहता है । कितने ही मनुष्यों को गन्ध का अनुभव नहीं होता । कितनों की को लाल मिर्च की तिक्तता का अनुभव नहीं होता । इसका यही रहस्य है । जैसा कि ऋषि कहते हैं--" दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्च सवं पश्यति सर्वः पश्यति " ॥५ ॥

निष्कर्ष यही हुआ कि इन्द्रियों के प्रज्ञान में विलीन हो जाने पर प्रज्ञान पर स्थित संस्कारजगत् को विज्ञानात्मा देखा करता है । विज्ञान स्वप्नद्रष्टा है । प्रज्ञान बहिर्जगत् से अलग हटा है - इसलिए तो इसे जागता हुआ नहीं बतलाया जा सकता एवं अन्तर्जगत् का लय हुआ नहीं है - इसलिए इसे सुप्त भी नहीं बतलाया जा सकता । मध्यपतित है । इसी सान्ध्य अवस्था का नाम स्वप्नावस्था है । इसके

अन्तर्जगत् का द्रष्टा वही विज्ञान है । बस, तीसरे प्रश्न का यही समाधान है ॥ ५ ॥

॥ ३ ॥

( ४ ) - चौथा प्रश्न है-" कस्यैतत् सुखं भवति ” ॥

स्वप्नावस्था के प्रतिक्रान्त हो जाने पर पुरीतति नाड़ियों में जाता हुआ प्रज्ञान विज्ञान द्वारा महदक्षर में डूबता हुआ सुषुप्ति में चला जाता है । प्रातःकाल जब मनुष्य सोकर उठता है - उस समय [ १८८ ]

पृष्ठ 203

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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण इसके मुँह से ' सुखमहमस्वाप्सम् ' ( अहा! आज मैं बड़े श्रानन्द से सोया ) ये अक्षर निकल पड़ते हैं । गार्ग्य के प्रश्न का अभिप्राय यही प्रतीत होता है कि स्वप्नावस्था में प्रज्ञान सुप्त है - विज्ञान जागृत है । स्वप्न तभी तक आते हैं- जब तक कि द्रष्टाविज्ञान जागृत है । सुषुप्ति में स्वप्न का अभाव है, अतएव मानना पड़ता है कि यहाँ प्रज्ञानज्ञानवत् विज्ञान की भी अपीति ( लय ) है । विना ज्ञान के ' मैं सुख से सोया ' - यह अनुभव किसको हुआ? बस, सुषुप्ति - सुख के विषय में गार्ग्य का यही प्रश्न है । इस प्रश्न का कठोपनिषत् में प्रकारान्तर से उत्तर दिया गया है । वहाँ बतलाया गया है कि विज्ञान का महान् में लय रहता है । महान् का अहंकृतिभाग ही ' अहंकार ' है । यह सदा जागृत रहता है । यही इस सुषुप्त्यानन्द का अनुभव करता है । विज्ञान के दर्शपूर्णमास से ही महान् में त्रैगुण्य उत्पन्न होता है । इस सुषुप्ति में त्रैगुण्योत्पादक विज्ञान का लय है, अतएव इस अवस्था में शुद्धसत्स्वोपेत महानात्मा रह जाता है । शुद्धसत्त्व श्रानन्द है । इसी का अनुभव होता रहता है । वागिन्द्रियादि द्वारा प्रातःकाल यही महान् ज्ञान- ' सुखमहमस्वाप्सम् ' इस रूप से अपने आनन्दानुभव को प्रकट करता है । इस प्रकार वहाँ पर महान को ही इस सुषुप्ति - सुख का अधिकारी बतलाया है । परन्तु यहाँ महर्षि पिप्पलाद विज्ञानात्मा को - स्वप्नद्रष्टा को सुख का अधिकारी बताते हैं । दृष्टिकोणमात्र में अन्तर है । वस्तुस्थिति समान है । जैसा कि निम्नलिखित प्रकरण से स्पष्ट हो जाता है— सुषुप्ति क्यों होती है? क्यों इन्द्रिएं प्रज्ञान में सिमटती हैं? प्रज्ञान क्यों विज्ञान में लीन होता है? पहले ऋषि इसी प्रश्न का समाधान करते हैं— प्रज्ञान चान्द्रभाग है - विज्ञान सोरभाग है । चान्द्रभाग ही अन्न में परिणत होता हुआ क्रमिक विशकलन से ' मन ' बनता है । प्रातःकाल सूर्योदय होता है । सूर्योदय होते ही विज्ञानप्राण प्रबल हो पड़ता है । प्रबल होते ही मनुष्य जग पड़ता है । धियो यो नः प्रचोदयात् ' - के अनुसार ' धीः ' को प्रेरित करने वाला यही सौर प्राण है । इसी सौर प्राण का नाम ' तेज ' है । इस तेज का उस चान्द्र प्रज्ञान पर आक्रमण होने लगता है । विज्ञान कारयिता है - क्षेत्रज्ञ है । प्रज्ञान कर्त्ता है । सुषुप्तिकाल में जो प्रज्ञान सर्वथा शान्त था वही जाग्रदवस्था में विज्ञान के प्राक्रमण से कार्य में प्रवृत्त हो जाता है । प्रवृत्त होता हुआ प्रज्ञान क्रमशः थकने लगता है । प्रज्ञान में ' प्रज्ञा - प्राण - भूत ' नाम से ये तीन मात्राएँ प्रसिद्ध हैं । ये तीनों मात्राएँ कार्य्यं में प्रवृत्त होने से खर्च होती रहती हैं । जैसे - आवश्यकता से अधिक चलने वाला पथिक चलन - क्रिया द्वारा अधिक मात्रा में खर्च हो जाने वाले प्राणबल से निर्बल होता हुआ थककर एक स्थान पर बैठ जाता है - आगे नहीं चल सकता, एवमेव दिन भर कार्य में प्रवृत्त रहने वाला प्रज्ञान ( सौर तेज के आक्रमण में फँसता हुआ अतएव कार्य्यं में प्रवृत्त रहता हुआ प्रज्ञान ) अपनी प्रज्ञा - प्राण- भूतमात्रा अधिक मात्रा में खर्च कर डालता है - उसी समय यह थककर बाहर के विषयों से सम्बन्ध तोड़ देता है - अन्तर्मुख हो जाता है । उस समय भी इसके पास संस्कार रहते हैं, अतः अन्तर्मुख होने पर भी विज्ञान इसे चैन नहीं लेने देता । यहाँ भी वह अपना आक्रमण करता है । इसी अवस्था का नाम ' स्वप्नावस्था ' है । बाहर के जगत् का व्यापार छूट गया परन्तु विज्ञान की कृपा से इसे अन्तर्जगत् पर इस समय भी दौड़ लगानी पड़ती है । जब उतना बल भी खर्च हो जाता है तो वेबस होता हुआ प्रज्ञान उस महदक्षर में [ १८६ ]

पृष्ठ 204

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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण डूब जाता है । इसी का नाम ' सुषुप्ति ' है । यदि सोरतेजरूप विज्ञान का आक्रमण न होता तो न इसमें जाग्रदवस्था होती न स्वप्नावस्था होती न सुषुप्ति होती । विना विज्ञान के यह कुछ भी न रहता । इस विज्ञान के आक्रमण को जब तक इसमें सहने का सामर्थ्य रहता है, तब तक तो जाग्रदवस्था रहती है, अधिक आक्रमण से अधिक मात्रा खर्च होने के कारण थककर भीतर घुस जाता है । यहाँ भी इसमें कुछ बल रहता है, अतः यहाँ संस्कारों पर दौड़ा करता है । परन्तु जब तेज से एकान्ततः अभिभूत हो जाता है तो असमर्थ होकर यह उसी देवता में ( महदक्षर में ) डूब जाता है । उदाहरण के लिए एक ' मिल ' के नौकर को तो प्रज्ञान समझिए । मिल के अधिपति को ' विज्ञान ' समझिए । यह काम करवाने वाला है । वह करने वाला है । वह बार बार - ' यह करो वह करो इसे रखो इसे उठाओ ' यह आज्ञा देता है । तदनुकूल इसे दिन - भर काम करना पड़ता है । जब उस स्वामी की आज्ञा पराकाष्ठा पर पहुँच जाती है तो इस सेवक का बल दिन भर के आक्रमण से खर्च हो जाता है एवं अन्ततोगत्वा अभिभूत होकर यह उस काम को दूसरे दिन के लिए छोड़ देता है । बस, ठीक यही बात यहाँ भी है । यही कारण है कि जो मनुष्य आवश्यकता से अधिक परिश्रम करता है - उसे उतनी ही अधिक निद्रा आती है, चाहे वह परिश्रम मानसिक हो या शारीरिक हो क्योंकि शारीरिक परिश्रम में भी प्रज्ञान ही तो अनुस्यूत रहता है । अभिभूत मन पुरीतति में चला जाता है, उसके साथ सारे संस्कार भी वहीं विलीन हो जाते हैं । विज्ञान तो कारयिता था । प्रज्ञान पर इसकी हुकूमत चलती थी । प्रज्ञान के संस्कारों पर शासन चलता था । श्राज दोनों ही प्रपीत हैं । ऐसी अवस्था में विज्ञान को अपने आप चुप बैठना पड़ता है । जब तक नौकर दृष्टि के सामने रहता है तब तक मालिक उस पर प्राज्ञा करता है । जब नौकर ही चला जाय तो फिर कोरा मालिक किस पर व्यापार करे? यही हालत यहाँ होती है । विज्ञान की दर्शनशक्ति आक्रमणशक्ति अब भी है । परन्तु जब दृश्य ही नहीं तो देखे किसे? इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर बृहदारण्यकोपनिषत् श्रुति कहती है-“ यद्वै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति । न हि द्रष्टुर्दृष्टेविपरिलोपो विद्यते श्रविनाशित्वात् । न तु तद् द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यत्पश्येत् " । ' द्रष्टाविज्ञान, दृश्यसंस्कारयुक्त उपद्रष्टाप्रज्ञान- दोनों आज इसी महदक्षर में डूब रहे हैं । ऐसी भवस्था में यह भी कहा जा सकता है कि प्रज्ञान विज्ञान को साथ लेते हुए महदात्मा में लीन होता है । कह क्या सकते हैं - बास्तव में ऐसा ही है । विना विज्ञान के तो प्रज्ञान रहता ही नहीं । दोनों संपरिष्वक्त हैं । महदक्षर अद्वैतत्व है । उसमें जाने से विज्ञान प्रज्ञान का द्वैतभाव हट जाता है । ऐसी अवस्था में-' यत्र वा अस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन कं पश्येत् २ - के अनुसार सारा भोक्तृभाव जाता रहता है । विज्ञान संपरिष्वक्त - प्रज्ञान क्यों आत्मा में जाता है? इस विद्या को समझाने के लिए उपनिषत् श्रुति कहा करती है कि जैसे एक पक्षी दिनभर घूमघाम कर थककर सायंकाल पुनः अपने घोंसले में प्रा जाता है-एवमेव विज्ञानसंपरिष्वक्त प्रज्ञान दिनभर विषयों में रत रहकर थकता हुआ रात्रि में अपने भ्रायतनरूप १- बृहदा ० उप ० ४।३।२३ । २- बृहदा ० उप ० २।४।१४ । [ १ ९ ० ]

पृष्ठ 205

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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण अपने आप उसमें जा गिरता है । यह उसी महानात्मा में आ जाता है- जानकर नहीं आता । थककर पर गिरता है, क्योंकि उसी का अंश है । इसी विज्ञान को सामने रखते हुए हम विज्ञान को भी सुख-कारण मान सकते हैं, क्योंकि विज्ञान द्वारा ही तो प्रज्ञान महत् - सुख का भोग करने में समर्थ होता है । परन्तु विज्ञान परम्परया कारण है । वस्तुतस्तु सुख का कारण महान् ही है । वासनाभावनासंस्कार से सत्त्वरूप महान् मलिन रहता है, अतएव इस अवस्था में शान्त्यानन्द नहीं आता । परन्तु संस्कारों सहित इसका अप्यय हो जाता है तो प्रज्ञान स्वयं शुद्ध होता हुआ - ' यथोदकं शुद्ध शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति १ – के अनुसार उस शुद्ध सत्त्व में डूबकर तद्रूप बन जाता है । प्रज्ञान को सत्वरूप महत् सुख प्राप्त नहीं होता — अपि तु, यह स्वयं वही बन जाता है । सुखमय बन जाता है । महदात्मा एक वृक्ष है । विज्ञान, प्रज्ञान, वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ, इन्द्रियाँ आदि पक्षी हैं । संस्काररूप अन्तर्जगत् के विषय एवं बाहर के घटपटादि सारे पदार्थ इन पक्षियों का दाना है । इसे चुगने के लिए ये वृक्ष से बाहर जाते हैं । अनन्तर सब उसी वृक्ष पर आके बैठ जाते हैं । ऋषि बड़े दयालु हैं । ऐसा सरल दृष्टान्त बतलाते हैं कि जिससे मूर्ख से मूर्ख भी इन अवस्थाओंों के स्वरूप को समझ जाए । महान् की ओर से बाहर की प्रोर रुख करना ही इनका बाहर जाना है । महान् अक्षर-रूप है । अक्षर अव्यय से अविनाभूत है । क्षरसम्बन्ध से अक्षर में कलाएँ होती हैं- जैसा कि छठे प्रश्न में बतलाया जायगा । प्रज्ञानादि सारे क्षर यदि महदक्षर में चले जाते हैं तो उस समय अक्षर निष्कल होता हुआ निष्कल अव्यय में लीन हो जाता है । अव्ययपुरुष के लिए ' पर ' शब्द नियत है । महदक्षर आ हुए प्रज्ञानादि सारे पक्षी उसी ' पर ' में लीन हो जाते हैं, प्रतएव सुषुप्त्यानन्द को ' आत्मानन्द ' कहा जाता है । इस अवस्था को यथार्थरूप से समझ लेने पर एक बडा भारी प्रश्न हल हो जाता है । कितने ही मनुष्य पूछा करते हैं कि आत्मा को जान लेने पर कैसा आनन्द आता है? हम संसार के किसी भी विषयानन्द से आत्मानन्द की तुलना कर सकते हैं । हम कहेंगे - हाँ, अवश्य तुम उस श्रानन्द को जान सकते हो । सुषुप्ति में तुम्हें जो आनन्द आता है- बतलाओ क्या किसी सांसारिक विषयानन्द से तुम उसकी तुलना कर सकते हो? कदापि नहीं । कह नहीं सकते - जानते हो । तभी तो प्रातःकाल उठते ही कहते हो कि - ' आहा! आज तो बड़े ग्रानन्द से सोए ' - आनन्द जीवन का कारण है । इसकी प्राप्ति सुषुप्ति में है । यही कारण है कि जिस मनुष्य को निद्रा कम आती है उसका स्वास्थ्य खराब रहता है । जिस रोगी को नींद नहीं आती - समझ लो वह थोड़े ही दिन का मेहमान ( पाहुना ) है । अस्तु, यह सब कथान्तर है । यहाँ इस सारे प्रपञ्च से हमें केवल यही बतलाना है कि सौर तेज से अभिभूत होकर विज्ञान संपरिष्वक्त प्रज्ञानदेव महदक्षर में चला जाता है । वहाँ जाकर स्वयं सत्त्व ( सुख ) रूप बन जाता है । इस समय प्रज्ञान का प्रज्ञानपना जाता रहता है- केवल महान् ही महान् शेष रह जाता है । यही सुख भोक्ता है । ' कस्यैतत् सुखं भवति '? - का यही उत्तर है । इसी उत्तर को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है-१ - कठोप ० २।१।१५ । [ १ ९ १ ]

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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण " स ( प्रज्ञानात्मा ) यदा तेजसा ( सौरविज्ञानतेजसा ) अभिभूतो भवति अत्रैष देवः ( विज्ञानात्मा ) स्वप्नान्न पश्यति । अथ तदा एतस्मिञ्छरीरे-एतत् ( सर्वं प्रपञ्चं ) सुखं भवति - ( महद्रूपेण परिणतं सत् - सुखमनुभूयते ) स यथा सोम्य! वयांसि वासोवृक्षं ( श्रावासरूपं वृक्षं ) संप्रतिष्ठन्ते एवं ह वै तत् सर्व पर श्रात्मनि ( अक्षराविनाभूते निष्कले ग्रव्यये ) संप्रतिष्ठते " ॥ स्वप्नद्रष्टा विज्ञान है । दृश्य पदार्थ प्रज्ञानप्रतिष्ठित संस्कार है । जब तक यह संस्कार रहते हैं, तब तक विज्ञानदेव स्वप्न देखता है । जब दृश्याधिष्ठाता प्रज्ञान तेज से अभिभूत हो जाता है तो विज्ञान दृश्य के अभिभूत हो जाने से नहीं देखता । सुख केवल प्रज्ञान या विज्ञान को नहीं होता । सुख होता है - सारे प्रपञ्च को । परन्तु कब? जब कि ये सब उसमें लीन होकर स्वस्वभेद छोडते हुए तद्रूप हो जाते हैं तब । इसी अभिप्राय से ' तदा एतस्मिञ्छरीरे एतत् सुखं भवति ' यह कहा है । चूंकि सब सुख महद्रूप में परिणत होकर ही सुखमय बनते हैं, अतएव ' कस्यैतत् सुखं भवति ' का हम - ' महत एतत् , क्योंकि भवति ' - यही कहेंगे । श्रुति के अक्षर बड़े टेढ़े मेढे हैं । ' कमेतत् सुखं भवति ' - यह प्रश्न में प्रज्ञानविज्ञानादि नहीं किया को महान् स्वयं सत्त्वरूप है । सुखरूप है । उसको सुख को सुख क्या हो? साथ ही ही नहीं बनता । मी विना महत् में आए सुखरूपता नहीं होती, अतः ' कमेतत् सुखं भवति '? यह प्रश्न है । होता है - इन्द्रिय-सुषुप्ति में जिस सुख का अनुभव होता है- वह सुख किसका होता है '? यह प्रश्न गर्भित विज्ञानसंपरिष्वक्त प्रज्ञान को । परन्तु सत्त्व द्वारा, महान् द्वारा । महान् का सुख इनको प्राप्त होता है । महत् बनकर ये सुख भोगते हैं । भोग वस्तुतस्तु ' कस्यैतत् सुखं भवति? ' का उत्तर है- ' प्राज्ञस्यैतत् सुखं भवति ' - यह । सुखभोग शब्दों में है । भोग करना भोक्तात्मा का काम है । वैश्वानरतैजसयुक्त प्राज्ञ ही भोक्तात्मा है । दूसरे केबल ' देवसत्य ' ही मोक्तात्मा है । तीनों कलाभों का समष्टिरूप प्रज्ञान तुरीय है । विना मन और इन्द्रियों के भोग अनुपपन्न है, श्रतएव - ' आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ' यह कहा जाता है है- । प्रज्ञान - प्राज्ञ, तैजस, वैश्वानर'- तीनों में अनुस्यूत रहता है । जब तक प्रज्ञान वैश्वानर के साथ रहता । प्रज्ञान तब तक जाग्रदवस्था है । प्रज्ञानसंपरिष्वक्त जाग्रदवस्थापन्न वैश्वानर ही ' स्थूलभुक् ' है स्वप्नावस्थापन्न तैजस - प्रविविक्तभुक् ( संस्कारमुक् ) है एवं प्रज्ञानसंपरिष्वक्त सुषुप्त्यवस्थापन्न नहीं रहता, अतः प्राज्ञ आनन्दभुक् है । इस अवस्था में क्रियार्थरूप विजातीय तैजस- वैश्वानर का सम्बन्ध ' सुखभोक्ता ' कह सकते शुद्धप्राज्ञ प्रज्ञान में डूबकर प्रज्ञानमय बन जाता है । इसलिए हम प्रज्ञान को में हैं । इस अवस्था में प्रज्ञान ही नहीं अपि तु वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ, प्रज्ञान, विज्ञान सबका महदक्षर श्रप्यय है । वैश्वानर पार्थिव है, तेजस वायव्य है एवं प्राज्ञ ऐन्द्र है । इन्द्रिएँ - अग्नि, वायु, इन्द्र, दिक्-मास्वर सोममय हैं । प्रज्ञान चान्द्रसोममय है । विज्ञान सौर तेज है । यह सारा प्रपञ्च इस अवस्था में वहाँ विलीन होकर अपने - अपने नाम रूप - कम्मं छोडता हुधा तद्रूप हो जाता है । सब में अनुस्यूत चेतनांश भिन्न - भिन्न स्थानों पर जाके भिन्न - भिन्न कार्य्यं करता हुआ भिन्न - भिन्न नाम धारण किए हुए [ १ ९ २ ]

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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण था । वह सिमटता हुआ जब घन में आ जाता है तो सब के नामरूप गायब हो जाते हैं । कहने को प्राज्ञ ' आनन्दमुक् ' है - यह कहना ही कहना है । भोक्तृदृष्टि से यह कहना सच है, परन्तु आत्मदृष्टि से न यहाँ प्रज्ञान का प्रज्ञानपना है, न प्राश का प्राज्ञपना है । सब सत्त्वरूप बन रहे हैं । बस, सत्त्वरूप में परि-णत- यह सारा प्रपञ्च सुख का अधिकारी बनता है । परन्तु इस अध्यात्मसंस्था में प्राज्ञ असली जीवात्मा है । इसी का सारा तन्त्र है । इस विज्ञान को लक्ष्य में रखकर प्राज्ञ को ' आनन्दमुक् ' बतला दिया जाता है । परन्तु यह भी इस समय सत्त्वरूप है, अतएव अन्ततोगत्वा हम कह सकते हैं कि सत्त्वरूप में परिणत, अतएव उसी नाम से प्रसिद्ध प्राज्ञ सुखभोक्ता है । यहाँ यह सुख किसका है? इसका उत्तर है - सत्य महान् का । किसे होता है? कौन भोगता है? इसका उत्तर है - सत्त्वरूप विज्ञानप्रज्ञानसंपरिष्वक्त प्राज्ञ को । इस विषय का विशद विवेचन हम आगे आने वाले माण्डूक्योपनिषद् में करने वाले हैं । अतः यहाँ इसे अधिक नहीं बढाकर दो चार बातें और कहकर चौथे प्रश्न के इस अवान्तर चौथे प्रश्न को समाप्त करते हैं । जिस अवस्था के आ जाने पर कुछ भी होश नहीं रहता, उस अवस्था का निरूपण यदि जटिल हो जाय तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है । ' सुषुप्ति ' में महान् का सुख महान् को ही होता है - यह भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह भोक्ता नहीं । महान् का सुख प्राज्ञ को प्रज्ञान को होता है- यह भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि दोनों का अध्यय है । परन्तु सुख होता अवश्य है । प्रज्ञानविज्ञानादि लुप्त हैं । परन्तु प्रातः ' खूब सोया ' ये अक्षर निकलते हैं । यह ज्ञान किसको हुआ? -उत्तर वही ज्ञानांश महान् है । महान् ज्ञान उस समय भी रहता है - जैसा कि पूर्व के प्रकरण में बतलाया जा चुका है । प्राज्ञ का महान् का है - इसलिए महान् को भी अलग नहीं किया जा सकता । भोगांश प्रज्ञानसंपरिष्वक्त हो है इसलिए इसे भी अलग नहीं किया जा सकता । ऐसी अवस्था में यदि इस प्रश्न का कोई उत्तर किसको सकता है तो - ' एतत् सुखं भवति ' यह गोल - गोल उत्तर ही हो सकता है । किसका सुख नहीं होता है? यह प्रश्न भी नहीं बन सकता । अमुक को अमुक का सुख होता है- यह उत्तर भी बन सकता । इसीलिए ऋषि को ' कस्य एतत् सुखं भवति '? - यह गोल - गोल ही प्रश्न करना पड़ता है-एवं ' अथ तदेतस्मिञ्छरीरे एतत् सुखं भवति - यह गोल - गोल ही उत्तर देना पड़ता है, क्योंकि वाक्य वह श्रवस्था ही ऐसी है । द्वैतातीत भवस्था के लिए निश्चितरूप से ' कस्य कं ' - आदि भेदविषयक निकल ही नहीं सकते जैसा कि ऋषि कहते हैं— “ स यदा तेजसाभिभूतो भवत्यत्रैष देवः स्वप्नान्त्र पश्यत्यथ तदैत स्मि-ञ्छरीरे एतत्सुखं भवति " ॥६ ॥

यही कारण है कि आगे जाकर ऋषि को ' वर्यासि ' कहना पड़ा है । विज्ञान, इन्द्रिएँ, प्रज्ञान, प्रतिष्ठित होकर वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ आदि - आदि सब वयांसि हैं । इस अवस्था में विज्ञान द्वारा सब उसमें कहा ' एतत् ' नाम धारण कर लेते हैं । ' कठ ' में जिस आत्मा के लिए बार - बार ' एतद्वै तत् एतद्वै तत् ' - यह [ १६३ ]

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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण है । उसी अर्थ में यहाँ ' एतत् ' प्रयोग है । किसको किसका सुख होता है? यह कुछ नहीं सारा प्रपञ्च एतद्रूप में ( ग्रात्मरूप में ) परिणत होकर सुखरूप हो जाता है । भोक्तृभोग्यभाव कहा जा सकता नहीं । है । वही भोक्ता है - वही भोग्य है । प्रश्न था - ' कस्यैतत् सुखं भवति? कस्य- एतत्सुखं भवति '? - ये खण्ड कीजिए | ‘ कस्य ' का अर्थ है- ' किसका ', ' एतत्सुखं ' - का अर्थ है - आत्मरूप सुख -'भवति तीन होता है । इस प्रकार सबको मिलाकर - ' किसका आत्मरूप सुख होता है? - यह वाक्य बन ' का जाता अर्थ है-इसका उत्तर है - महान् का आत्मरूप सुख होता हैं । अर्थात् सुषुप्ति में जो सुख होता है वह महान् है । है । इस अवस्था में सारा प्रपञ्च ' एतत् ' बनकर तन्मय जाता है । जैसा कि ऋषि कहते हैं- का " स यथा सोम्य वयांसि वासोवृक्षं संप्रतिष्ठन्ते । एवं ह वै तत्सर्वं पर आत्मनि संप्रतिष्ठते " ॥७ ॥

---' वयांसि ' दृष्टान्त से ऋषि ' एतत् ' रूप में जाने वाले अनेक भाग समझते हैं । वे अनेक पक्षी कौन से हैं जो ' एतत् ' रूप सुखमय बनते हैं? बस, आगे का दव मन्त्र इसी प्रश्न का समाधान हमारे सामने आगे आता है । करता हुआ प्रश्न के प्रारम्भ में पाश्चात्त्यमत की समालोचना करते हुए हमने गुण, अणु, रेणु, भूत, भेद से पाँव प्रकार के भूतों का निरूपण किया है । आठवें मन्त्र के अर्थ का स्पष्टीकरण करने के मौतिक लिए यहाँ भी उसी विषय का स्मरण करना आवश्यक होगा । शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध - ये पाँचतन्मात्राएँ हैं । इन्हीं को हमने ' गुणभूत ' कहा है । गुणभूत अणुभूत कैसे बने, अणुभूत रेणु कैसे बने? -अभी इस प्रश्न को जाने दीजिए । अभी केवल यही समझिए कि गुणभूत- अणु - रेणुरूप में परिणत होते हुए क्रमशः आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी - इन पाँच महाभूतों के स्वरूप में परिणत हो गए । शब्दतन्मात्रा से श्रणुरेणु द्वारा आकाशभूत उत्पन्न हुआ । इसीलिए शब्द को आकाश का गुण ( गुणभूत ) माना जाता है । स्पर्शगुण वायु का जनक बना । रूपगुण तेज का जनक बना । रसगुण जल का जनक बना एवं गन्धगुण पृथिवी का जनक बना? १ - पृथिवी का गुण ( उपादानरूप गुणभूत - दर्शनानुसार- गन्धतन्मात्रा नाम से प्रसिद्ध ) गन्ध है । २- जल का गुण ( उपादानरूप गुणभूत - दर्शनानुसार रसतन्मात्रा नाम से प्रसिद्ध ) रस है । ३- तेज का गुण ( उपादानरूप गुणभूत - दर्शनानुसार रूपतन्मात्रा नाम से प्रसिद्ध ) रूप है । ४ -- वायु का गुण ( उपादानरूप गुणभूत- दर्शनानुसार स्पर्शतन्मात्रा नाम से प्रसिद्ध ) स्पर्श है । ५ - आकाश का गुण ( उपादानरूप गुणभूत - दर्शनानुसार - शब्दतन्मात्रा नाम से प्रसिद्ध ) शब्द है । एक बात और । उत्तरोत्तर के भूत में पूर्व - पूर्व के भूतों का समन्वय रहता है, अतएव उत्तरोत्तर भूत में पूर्व - पूर्व के गुणों का भी समन्वय रहता है । [ १६४ ]

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प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण आकाश में केवल शब्दमात्रा है । वायु में - वायुः खातशब्दस्तत् ' - इस प्रातिशाख्य - सिद्धान्त के अनुसार शब्द - स्पर्श- दोनों तन्मात्राएँ हैं । तेज में शब्द, स्पर्श, रूप - तीन मात्राएँ हैं । इसीलिए तो तेजोमय इन्द्र के लिए ' वागिन्द्रः ' कहा जाता है । जल में शब्द, स्पर्श, रूप, रस- ये चार मात्राएँ हैं एवं पृथिवी में शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध - पाँचों तन्मात्राएँ हैं । ऐसा होने पर भी चूंकि पांचों में क्रमशः प्रधानता शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध - इन पाँच मात्राओं की ही है, अतएव वे तत्तन्मात्राओं से युक्त ही कहलाता | आकाश शब्दप्रधान है । वायु स्पर्शप्रधान है, तेज रूपप्रधान है । जल रसप्रधान है एवं पृथिवी गन्धप्रधान है । श्राकाशादि पांचों महाभूतों की उपादानभूता ये पांचों मात्राएँ इन पाँचों नामों से ही व्यवहृत होने लगती हैं । गन्धमात्रा - ' पृथिवीमात्रा ' कहलाती है । रसमात्रा ' श्रापोमात्रा ' नाम से व्यवहृत होती है । रूपमात्रा ' तेजोमात्रा ' नाम से प्रसिद्ध है । स्पर्शमात्रा ' वायुमात्रा ' कहलाने लगती है । एवं शब्दमात्रा ' आकाशमात्रा ' नाम से पुकारी जाती है । पाँच भूत क्रमश: - पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश- इन नामों से प्रसिद्ध हैं । पाँचों अपनी - अपनी मात्राओं से युक्त हैं । यह सारा भौतिक प्रपञ्च-' क्षरः सर्वाणि भूतानि ' के अनुसार उस षोडशी के ' क्षर ' भाग से सम्बन्ध रखता है । बाकी बच जाते हैं- अक्षर और ग्रव्यय । दोनों आलम्बन निमित्तरूप आत्मा हैं । इनके साथ उपादानभूत वही तीसरा आत्मक्षर है । बस, क्षराक्षराव्ययविशिष्ट श्रात्मा से ( अपने अव्ययाधार पर अक्षर द्वारा क्षर से ) पहले पाँच तन्मात्राएँ उत्पन्न होती हैं । अनन्तर वे अणु रेणु में परिणत होती हुई पांच महाभूतों में परिणत हो जाती हैं । इसी भूतसृष्टि को लक्ष्य में रखकर ऋषि कहते हैं— " तस्माद्वा एतस्मादात्मन श्राकाशः सम्भूतः । श्राकाशाद्वायुः वायोरग्निः । अग्नेरापः । श्रद्द्भ्यः पृथिवी " - इति ॥ ' इन पाँचों में जो गन्धमात्रावाली पृथिवी है - वह मर्त्यामृत भेद से दो प्रकार की है । इसमें पिण्डपृथिवीम पृथिवी है एवं उख्या पृथिवी अमृता पृथिवी है । उख्या पृथिवी में ε- १५-२१ तीन स्तोम आग्नेय हैं । २७-३३ दो स्तोम सौम्य हैं । ६ तक अग्नि है । १५ तक वायु है २१ तक इन्द्र है । २७ तक भास्वरसोम है एवं ३३ तक दिक्सोम है । इस प्रकार उस पार्थिवभाग में अग्नि, वायु, आदित्य, भास्वरसोम, दिक्सोम - इन पाँच देवताओं की सत्ता सिद्ध हो जाती है । इन पाँचों में जो अग्नि है, वही अष्टावयव है । ये ही प्राठ वसु हैं । वायु एकादशावयव है । ये ही ११ रुद्र हैं एवं आदित्य द्वादशावयव हैं । ये ही १२ आदित्य हैं एवं दो सान्ध्यप्राण हैं । वे ही अश्विनीकुमार नाम से प्रसिद्ध हैं । इस प्रकार एक अग्नि के तीन - तीन के तैंतीस देवता हो जाते हैं । पार्थिव वस्वग्नि की प्रतिष्ठा-रूप पार्थिव त्रिवृत्स्थानीय श्रग्नि वैश्वानर कहलाता है । अन्तरिक्ष्य रुद्राग्नि की प्रतिष्ठारूप श्रान्तरिक्ष्य वायव्याग्नि ' हिरण्यगर्भ ' नाम से प्रसिद्ध हे एवं दिव्य आदित्याग्नि की प्रतिष्ठारूप दिव्यादित्याग्नि ' सर्वज्ञ ' नाम से प्रसिद्ध है । सर्वज्ञ में वह ऊपर के दोनों सोम युक्त रहते हैं । सोमसम्बन्ध से ही ज्ञानयुक्त १- तैत्ति ० उप ० २।१ । [ १ ९ ५ ]

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& I .१ हिरण्य . ३ ० वैश्वा भूमिः सर्वज्ञः चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण होता हुआ वह आदित्यभाग ' सर्वज्ञ ' कहलाने लगता है । सर्वज्ञ के ऊपर वही प्रज्ञान है । प्रज्ञान पर विज्ञानमय सूर्य है । ऊपर महान् है । ऊपर अव्यक्त है । ऊपर षोडशी है । अव्ययात्मक्षरगर्भित अक्षर तत्त्व है । उसकी व्याप्ति ' महाकमक्षरम् ' के अनुसार प्रधानरूप से ' महद्रूप परमेष्ठी ' तक है । इसी के आधार पर सारा प्रपञ्च प्रतिष्ठित है । इसी अभिप्राय से-" गुहाचरं नाम महत्पदमन्त्रैतत्समर्पितम् ” । ' -यह कहा जाता है । यह सारा प्रपञ्च उसी से निकला है । अन्त में उसी में विलीन हो जाएगा । सूर्य में पहले सबका लय होता है । इन सबको लिए हुए सूयं उसमें विलीन हो जाता है । यह है - ब्राह्मी ( आधिदैविकी ) स्थिति । ईश्वर - प्रजापति का संक्षिप्त स्वरूप निदर्शन-१ - षोडशी पुरुष - अमृतात्मा ' श्रमृतम् ' १ - आकाशः ( आकाशमात्रा ) ( शब्दः ) १- स्वयम्भूः १ २- वायुः ( वायुमात्रा ) ( स्पर्शः ) २- परमेष्ठी २ > महदक्षरः अमृतात्मा ' अत्रैतत् समर्पितम् ' ३- तेजः ( तेजोमात्रा ) ( रूपम् ) ३- सूर्य्यः ३ → मध्यस्थः सेतुः ४ -- जलम् ( जलमात्रा ) ( रसः ) ४- चन्द्रमाः ४ ५- दिक्सोमः ३३ सौम्या देवाः ६- भास्वरसोमः २७ सौम्या देवाः ७- द्वादशादित्यमय इन्द्रः २१ → अमृता पृथिवी आदित्याः ५- पृथिवी ( गन्धः ) ५ ८- एकादश रुद्रमयो वायुः १५ रुद्राः - प्राणाः ६- अष्टवसुमयोऽग्निः & वसवः १०- पृथिवी चित्य पृथिवी भूतानि इस पूर्वोक्त ईश्वर से जीवसृष्टि होती है । जीव उसका अंश है, अतएव - ' पूर्णमदः पूर्णमिदं ', ' यदेवेह तवमुत्र यवमुत्र तदन्विह ' इस सिद्धान्त के अनुसार जो कुछ पदार्थ उसमें हैं सो सब मात्रा की १ - मुण्डकोप ० २।२।१ । [ १ ९ ६ ]