प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 211–220

प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 211–220

पृष्ठ 211

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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण अल्पता से इसमें हैं । केवल नाममात्र में अन्तर है- जैसा कि ' कठोपनिषत् ' के ' ब्रह्मसत्य- देव सत्य प्रकररण ' में बड़े विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । जैसे वहाँ पहले सूर्य में सबका लय होता है - पश्चात् सब पर अक्षर में जाकर प्रतिष्ठित होते हैं, एवमेव यहाँ पहले सब कलाएँ सूर्य्यस्थानीय विज्ञान में जाती हैं- अनन्तर उस पर अक्षर में प्रतिष्ठित होती हैं- जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट हो जाएगा । शरीर पाञ्च भौतिक है । पाँच भूत हैं । पाँचों के साथ पाँचों तन्मात्राएँ हैं । प्रश्न के प्रारम्भ में दस वैदिक इन्द्रियों का निरूपण किया जा चुका है । इन्द्रियज्ञान में प्रज्ञा, प्राण, भूत - तीन मात्राएँ रहती हैं । प्रज्ञान के सम्बन्ध से १० ही इन्द्रिएँ होती हैं । परन्तु यहाँ ऋषि को विज्ञानकलाओं का निरूपण करना है । विज्ञान षोडशकल है- जैसे रथनाभि में आरे अर्पित रहते हैं, एवमेव ग्रागे बतलाई जाने वाली १६ कलाएँ विज्ञानपुरुष में अर्पित रहती हैं । जैसे प्रतिसंचरक्रम में विज्ञानघन सूर्य्यं अपनी सोलह कलाओं को लेकर उस महदक्षररूप अमृतात्मा में प्रतिष्ठित हो जाता है - एवमेव सुषुप्त्यवस्था में अपनी सोलह कलाओं को लेकर वह विज्ञान उस अक्षर में प्रतिष्ठित हो जाता है । १६ कलाएँ प्रधान हैं । इन १६ कलाओं का आयतन शरीर है । शरीर पञ्चकल है । यदि मात्राओं को भी मिला लिया जाता है तो १० कलाएँ हो जाती हैं । १० शरीर कलाएँ, ५ ज्ञानेन्द्रिएँ, ५ कर्मेन्द्रिएँ, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार- यह अन्तःकरण चतुष्टयी, तेज, पञ्चप्राणात्मक प्राण- कुल २६ कलाएं हो जाती हैं । इन २६ कलाओं में से पहले शारीर १० कलानों को ही लीजिए । ये असल में विज्ञान की कलाएँ नहीं हैं अपि तु भूतात्मा की कलाएँ हैं । अध्यात्मप्रविष्ट वैश्वानर, हिरण्यगर्भ, सर्वज्ञरूप ईश्वरीय देवसत्य वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ नाम से प्रसिद्ध हो जाता है । इन तीनों की समष्टि भूतात्मा है । तीनों अग्नि, वायु, इन्द्ररूप हैं । तीनों अमृतपृथिवी की वस्तु हैं । पञ्चीकृत अतएव पञ्चभूतमयी पिण्डपृथिवी से शरीर बना है । शरीर मर्त्याग्निरूप है एवं शरीरप्रविष्ट भूतात्मा अमृताग्निरूप है । अमृताग्नि ही मर्त्याग्नि की प्रतिष्ठा है । जब तक अमृताग्निरूप भूतात्मा शरीर में रहता है, तभी तक शरीर स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित रहता है । जब वह निकल जाता है तो शरीर उसी क्षण प्रतिष्ठाशून्य हो जाता है । चूंकि पञ्चभूतमय शरीर की प्रतिष्ठा भूतात्मा में है, अतएव इसकी १० कलाओं को हम इस भूतात्मा की कलाएँ बतलाने के लिए तय्यार हैं । जैसे शब्दादि विषयों को लेकर ही इन्द्रियवर्ग स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित रहने में समर्थ होता है, एवमेव पञ्चभूतात्मक शरीर स्वस्व पाँचों मात्रानों को लेकर ही स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित रह सकता है । ' द्रष्टव्यं श्रोतव्यम् ' इत्यादि के स्थान में यहाँ ' मात्राएँ ' हैं । यदि इस प्रकार विषयरूपकलाओं का भी समन्वय कर लिया जाता है तो कुल ४२ कला हो जाती हैं । अस्तु, कहना यही है कि पृथिवी आदि १० का सम्बन्ध ' भूतात्मा ' से है । ये उसकी १० कलाएँ हैं । अब चलिए दशकल इन्द्रियवर्ग ( विषययुक्त २० कल ) की ओर । इन सबका उक्थ प्रज्ञान है, अतएव संकल्पविकल्पात्मक इस प्रज्ञानमन को ' सर्वेन्द्रियमन ' कहा जाता हैं । इसीलिए तो पूर्व में - ' एवं वै सर्वं परदेवे मनस्येकीभवन्ति ' यह कहा है । इस प्रकार इन इन्द्रियों का मन की कला होना तत् सिद्ध हो जाता है । [ १ ९ ७ ]

पृष्ठ 212

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प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार ये चारों महान् की कलाएँ हैं । महान् की रश्मि ही मन को मन बनाए रखती है, बुद्धि को बुद्धि बनाए रखती है, अहं को श्रहं बनाए रखती है । स्वस्व सत्त्वचित्त को स्वप्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित रखती है एवं तेज और प्राण दोनों सौरप्राणरूप विज्ञान की कलाएँ हैं । हमारे में अव्ययमित मद्दान् विज्ञान, प्रज्ञान, भूतात्मा चार प्रधान खण्डात्मा हैं । चारों की पूर्वोक्त मित्र - मिन कलाएँ हैं- जैसाकि निम्नलिखित तालिका से स्पष्ट हो जाता है-१ - भूतात्मा ( वैश्वानर - तेजस - प्राज्ञमय ) - १० कलः-= १- पृथिवी -१- पृथिवीमात्रा २- प्रापः २- आपोमात्रा ३- तेज ३- तेजोपात्रा +१० ४- वायु ४- दायुमात्रा ५- श्राकाश ५- प्राकाशमात्रा २- प्रज्ञानात्मा = ( मनः ) सर्वेन्द्रियमनः - विशतिकल: -१ - चक्षु २ - धोत्र ३- घ्राण ४- रस ५ - वक् ६ - वाक् ७- हस्त ८ - उपस्थ ह - पायु १०- पाद - १- द्रष्टव्य ------२- श्रोतव्य ३ - घ्रातव्य ४- रसयितव्य ५- स्पर्शयितव्य ६ - वक्तव्य ७- आदातव्य - श्रानन्दयितव्य - ६ - विसर्जयितव्य -- १०- गन्तव्य +२० [ ११८ ]

पृष्ठ 213

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चतुर्थ प्रश्न ३- महानात्मा-- अष्टकल: -१- मनः १ - मन्तब्यम् २- बुद्धिः -२- बोद्धव्यम् प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण ३ - चित्तम् - ३ - चेतयितव्यम् ४ – अहंकारः – ४ - अहंकर्तव्यम् ४ - विज्ञानात्मा चतुष्कलः-१ - तेजः २- प्राणः 1११- विद्योतयितव्यम् २ - विधारयितव्यम् संकलनेन – द्वाचत्वारिंशत् ' ४२ ' परन्तु यहाँ ऋषि का सब कलाओं का विज्ञान के साथ सम्बन्ध अपेक्षित है । इस उपनिषत् का प्रधान लक्ष्य ' अक्षर ' ( विज्ञानाक्षर ) तत्त्व है । अक्षरतत्त्व का पूर्ण विकास इसी में होता है । हिरण्यगर्भ विद्यामूलक इसी अक्षर को बतलाना ही इस उपनिषत् को अभीष्ट है । जैसा कि छठे प्रश्न में विस्तार के साथ बतलाया जाएगा । इसीलिए भिन्न - भिन्न आत्माओं से सम्बन्ध रखने वाली तत्तत्कलात्रों का ऋषि ने मध्यपतित विज्ञान के साथ ही सम्बन्ध माना है । यह मानना भी कोरी कल्पना नहीं है अपि यथार्थ है । महानात्मा श्रमृतमण्डल की वस्तु है । प्रज्ञानात्मा भूतात्मा मर्त्यमण्डल की वस्तु हैं । मध्य- तु, पतित सूर्य्यस्थानीय विज्ञानात्मा- ' निवेशयन्नमृतं मत्यं च'- के अनुसार दोनों का अनुग्राहक है । दोनों दोनों पर इसकी व्याप्ति है । प्रज्ञान में जो प्रज्ञानपना है- वह इसी विज्ञान की महिमा है । विज्ञान- तेज से प्रज्ञान प्रकाशित हो रहा है । प्रज्ञान से निकलने वाली रश्मिएँ इन्द्रिएँ । ये रश्मि असल में विज्ञान की हैं । वही तो प्रज्ञानरूप में परिणत होकर बाहर निकलता हुआ इन्द्रियरूप में परिणत हो रहा है । प्रज्ञान अपनी रश्मियों से वैश्वानर - तैजस - प्राज्ञ में व्याप्त हो रहा है । यह व्याप्ति भी विज्ञान की ही है । वही विज्ञान प्रज्ञानरूप में परिणत होकर इन्द्रिएँ बना है- वही भूतात्मा बना है - वही प्रज्ञान बना है । सूय्यांशभूत विज्ञान में ज्योति, गौ, आयु तीन भाग हैं । ज्योतिभाग से इन्द्रियदेवतानों का विकास हुआ है । भूतभाग से पञ्चभूत का विकास हुआ है । श्रायुभाग से प्रज्ञानात्मा और भूतात्मा का स्वरूप बना है । इस प्रकार प्रज्ञान और प्रज्ञान की बीसों कलाएँ, भूतात्मा और उसकी दसों कलाएँ परमार्थतः ज्योतिगौरायुधंन विज्ञान की ही कलाएँ हैं । [ १६६ ]

पृष्ठ 214

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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण अब चलिए अमृतरूप महान् की ओर । मन - बुद्धि - चित्त - अहंकार चार महान् की कलाएं बतलाई गई हैं । चित्त महान् का सत्त्वभाग है । मन प्रज्ञान है । बुद्धि विज्ञान है । अहंकार श्रात्मभाव है । विज्ञान के दर्शपूर्णमास से महान् में आकृति प्रकृति अहंकृति- तीन माव उत्पन्न होते हैं । जैसा कि ' या प्राणेन संभवत्यदितिर्देवतामयी ' में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । इसमें अहंकृति का उदय इस विशुद्ध विज्ञान से होता है । प्रकृति का उदय प्रज्ञानगमित विज्ञान से होता है एवं प्रकृति का उदय भूतसंपरिष्वक्त विज्ञान से होता है । अपि च- इसी विज्ञानसूर्य के सम्बन्ध से उसमें सत्त्व, रज, तमोरूप त्रैगुण्य उत्पन्न होता है । सत्त्व चित्त है । इसका उदय भी विज्ञान पर निर्भर है । महान् सोममय है । प्रज्ञान मन भी सोमरूप है । प्रज्ञानसोमरूप चन्द्रमा महत्सोमरूप परमेष्ठी का अंश है- इसीलिए तो प्रज्ञानमन महान् की कला कही जाती है । चित्तरूप सत्त्व भी सोम ही है, अतः वह भी महान् की कला कही जाती है । विज्ञानरूप बुद्धि में जो चैतन्य आया है वह सोम पर ( जो कि चिन्मय सोम ' केनोपनिषत् ' में हैमवती उमा नाम से व्यवहृत किया गया है ) ही आया है । सोम चूंकि महान् का भाग है, अतः इस सम्बन्ध को लक्ष्य में रखकर बुद्धिरूप विज्ञान को भी महान् की कला मानली जाती है । महान् का ' अहं ' भाग ही अहंकृतिरूप विज्ञानसम्बन्ध से अहंकृतिरूप में परिणत होता है, अतः इसे भी उसकी कला मानली जाती है । परन्तु परमार्थतः ये चारों कलाएँ उस विज्ञान की हैं । यदि विज्ञान न होता तो चित्तरूप सत्त्व का उदय असंभव था । प्रज्ञान का प्रज्ञानपना असंभव था । श्रहंकृतिभाव अनुपपन्न था एवं बुद्धि तो स्वयं वह है ही । उसी की तो ये सारी कलाएँ हैं । इतर सारी कलाएँ इसकी गौण हैं । एवं तेज और प्राण दो कलाएँ मुख्य हैं । बुद्धि से वहाँ विज्ञानात्मा अभिप्रेत नही हैं - अपि तु विज्ञान से निकलने वाली रश्मियाँ अभिप्रेत हैं | विज्ञान उक्थ है । बुद्धि अर्क है । बुद्धि का बोद्धव्य के साथ सम्बन्ध है । विषय बोद्धव्य ( ज्ञेय ) है । वहाँ पर बुद्धि जाती है । विज्ञान उक्थरूप से प्रतिष्ठित है । हम पूर्व के उपनिषदों में यह कई बार कह चुके हैं कि प्रज्ञान विना विषय के कभी अपना व्यापार नहीं कर सकता । परन्तु विज्ञान दोनों भावों से सम्बन्ध रखता है । जब विज्ञान प्रज्ञान के साथ विषय पर जाता है तब तो उसका व्यापार विषयसहकृत है । परन्तु स्वतन्त्र विज्ञान विना विषय के नई नई कल्पनाएँ करता रहता है, उसका बोद्धव्यविषय नहीं है केवल ज्ञानीयविषय है । विज्ञान ही प्रकाशक बन रहा है । उसी का भाग प्रकाश्य बन रहा है । यहाँ विषयापेक्षा नहीं है । प्रज्ञान के द्वारा जो विज्ञान रश्मि विषय पर जाती हैं - वैज्ञानिकों ने उसका नाम ' बुद्धि ' रखा है । इस समय विज्ञान से निकलने वाली बुद्धिरूप रश्मियों में क्रमिक आने वाले महदक्षररूप चैतन्य का सम्बन्ध है - जो कि महान् से विज्ञान में आया - बुद्धिरूप ( रश्मिरूप ) में परिणत होकर प्रज्ञान में आया तद्द्द्वारा विषय पर गया यह क्रम है । इस प्रकार प्रज्ञानसं परिष्वक्त, अतएव बुद्धिनाम से प्रसिद्ध ' इदमित्थमेव ' - यह निश्चय ज्ञान करवाने वाली विज्ञान रश्मिएँ क्रमिक चिदावतार ( सम्बन्ध से महानात्मा की कला मानली जाती हैं । परन्तु यह कोरा मानना ही मानना है । यथार्थ में विज्ञान से निकलने वाली रश्मिरूपा बुद्धि विज्ञान की ही कला है । अब चलिए शुद्ध विज्ञान की ओर । शुद्ध विज्ञान का विषय से सम्बन्ध नहीं रहता । वहाँ केवल स्वप्रकाश से नया विषय बनाकर वह उसे प्रकाशित किया करता है । शुद्ध विज्ञान से निकलने वाला प्रकाश.. [ २०० ]

पृष्ठ 215

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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण उसकी प्रातिविक कला है । विज्ञान में ज्ञान - क्रिया दो भाग हैं । जिनका कि ' ईशोपनिषत् ' के विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह ' - इत्यादि मन्त्र में विशद निरूपण किया जा चुका है । सूर्य्यं ज्ञानघन भी है - इसलिए तो उसके लिए - धियो यो नः प्रचोदयात् यह कहा जाता है । सूर्य का जो प्रकाश है - जिससे सारा विश्व प्रकाशित हो रहा है - वह तेज है । वह उसकी प्रातिस्विक कला है । सूर्य्यं क्रियाघन है, अतएव उसके लिए इसी उपनिषत् में- ' प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ' यह कहा जाता है । प्राण क्रियातत्त्व है । प्रकाश ज्ञानतत्त्व है । सूर्य्यं ज्ञानक्रियामय उक्थ है । ज्ञानोक्थ भाग से तेजोरूप अर्क निकलते हैं एवं क्रियोक्थ भाग से प्राणरूप अर्क निकलते हैं । विषय विद्योतयितव्य ( जानने योग्य ) है । इसको जानना प्रज्ञान का काम है । परन्तु जानने योग बनता है उसी तेज के कारण । देखती है हमारी आँख, परन्तु देखने लायक बनाता है, सौर तेज । दूसरा काम है - विधरण करना । ' सर्व बृहत्या प्राणेन विष्टब्धम् ' ' अहमेवैतत् पञ्चधाऽऽत्मानं प्रविभज्य एतद् बाणमवष्टभ्य विधारयामि ' - इत्यादि पूर्वप्रपञ्च के अनुसार सौर प्राण ही सब का विवर्त्ता है । आध्यात्मिक विज्ञान आध्यात्मिक सूय्यं है । जो उसकी कला एवं कौशल ( कार्य्यं ) है - वही कला - कौशल इसका है । भूतात्मा सम्बन्ध से पृथिवी आदि दसों ( १० ) कलाएँ, प्रज्ञान - सम्बन्ध से, बीसों चक्षु आदि कलाएँ, महान् के सम्बन्ध से मन आदि आठों कलाएँ विज्ञान से सम्बन्ध रखती हैं । एवं तेज आदि शुद्ध विज्ञान की अपनी प्रातिस्विक कला हैं । सविषय अतएव महान् कलाभूत बुद्धिरूप विज्ञान का विषय से सम्बन्ध होने के कारण उसके लिए ' बुद्धिश्च बोद्धव्यं च ' कहा है । निविषयक अतएव स्वतन्त्र विज्ञान के लिए ' तेजश्च विद्योतयितव्यश्च ' कहा है? इस प्रकार विज्ञान के साथ सारी कलाओं का सम्बन्ध हो जाता है । चक्षु, श्रोत्र, घाण ( नासा ), रस, ( रसना - जिह्वा ), त्वक् - ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं । देखने योग्य पदार्थ, सुनने योग्य सारे शब्द, सूंघने योग्य सारे गन्ध, स्वाद लेने योग्य सारे स्वाद ( स्वादमय पदार्थ ), स्पर्श करने योग्य सारे ( वायु, स्थूल पदार्थ ) - इन पाँचों ज्ञानेन्द्रियों के विषय हैं । पाँचों का इन्द्रियों द्वारा श्रात्मा पर ( विज्ञानसंपरिष्वक्त प्रज्ञान पर ) संस्कार होता है । वाक् ( मुख ), हस्त, उपस्थ, पायु, पाद - ये कर्मेन्द्रिएँ हैं । बोलने योग्य सारे शब्द, लेने योग्य सारे पदार्थ, आनन्द देने योग्य रति - क्रीड़ा, त्याग करने योग्य मल अपानवायु आदि, चलने योग्य मार्ग-ये इन पाँचों के विषय हैं । मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार - चार अन्तःकरण हैं । मनन करने योग्य विषय, जानने योग्य विषय, ' चेतयितव्य, ' ' मया इदं कर्त्तव्यम् ' ' ग्रहमस्मि'- ग्रादिरूप ग्रहकर्त्तव्यता, ये चारों इनके विषय है । तेज, प्राण, ( ज्ञान, क्रिया ) विज्ञान की दो प्रातिस्विक कला हैं । अनुभव में आने योग्य निर्विषयक ज्ञान, विधारण करने योग्य पदार्थ इन दोनों के विषय हैं । इन सबके संकलन से विज्ञान ' द्वाचत्वारिंशत्कल ' । हो जाता है— २०१ /

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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण १- पृथिवी १ - पृथिवीमात्रा ( गन्धतन्मात्रा ) २ - प्रापः ३- तेज २- प्रापोमात्रा ( रसतन्मात्रा ) पञ्चकलं पञ्चभूतात्मकं ३ - तेजोमात्रा ( रूपतन्मात्रा ) ' मोबावनभूतं- ' शरीरम् ' ४- वायु ४- बायुमात्रा ( स्पर्शतन्मात्रा ) ५- आकाश ५ - श्राकाशमात्रा ( शब्दतन्मात्रा ) १ - चक्षुः १- द्रष्टव्य -( रूप ) २- श्रोत्रम् २- श्रोतव्य ( शब्द ) - सुने जाने वाले ३ - घ्राणम् ३ - घ्रातव्य ( गन्ध ) + ज्ञानेन्द्रिएँ -५ ४- रसः ( ना ) ४- रसयितव्य — ५- त्वक् ५- स्पर्शयितव्य ( रस ) - स्वाद लिए जाने वाला ( वायु ) - वायु, इतर भूतपदार्थ ६ - वाक् ६ - वक्तव्य - बोले जाने वाला ७- हस्ती ७- आदातव्य - प्राह्य पदार्थ ८ - उपस्थ-८- आनन्दयितव्य-- रतिविषय → कम्र्मेन्द्रिऍ - ५ ६- पायुः ६ - विसर्जयितव्य - मल अपान त्याग १०- पादौ १०- गन्तव्य -मागंगति १- मन २- बुद्धि -१- मन्तव्य २- बोद्धव्य - ( विषय, ज्ञानसम्बन्धी विषय ) अन्तः कररण-→ ३- अहंकार ३- प्रहंकर्तव्य चतुष्टयी -४ ४- चित्त ४- चेतयितव्य [ २०२ ]

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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य १- तेजः १- विद्योतयितव्य २- विधारयितव्य भूतप्राणनिरूपण + प्रातिस्विके कले- २ २- प्राणः वस्तुतः कलाएँ कुल सोलह ही हैं । १६ कलाओं के १६ विषय तो विषय हैं । ५ ज्ञानेन्द्रिएँ, ५ कर्मेन्द्रिएँ, ४ अन्तःकरण, २ प्रातिस्विक कलाएँ- कुल १६ कलाएँ हो जाती हैं । छठे प्रश्न में प्रकारान्तर से १६ कलाओं का निरूपण किया जाएगा । वहीं ' खं ' वायुः, ज्योतिराषः - इत्यादि से पृथिवी आदि का भी समावेश कर लिया गया है - जैसा कि वहीं स्पष्ट हो जाएगा । यहाँ ' खं वायुः ' आदि को आयतन मानकर शेष १६ कलाएँ विवक्षित हैं । ईश्वर पूर्णेन्द्र है परन्तु जीव अर्धेन्द्र है । वह सर्वशक्तिमान् है - सर्वज्ञ है - सर्वधर्मोपपन्न है । पूर्णज्ञान की अपेक्षा से वह सर्वज्ञ है । पूर्णक्रिया - सम्बन्ध से सर्वशक्तिमान् है एवं अर्थमात्र का अधिष्ठाता होने से ' सर्वधर्मोपपन्न ' है । ' तस्यैव मात्रामुपादाय सर्वे उपजीवन्ति'- इस सिद्धान्त के अनुसार सारे जीव उस घन के अंशमात्र हैं, अतएव यह अल्पज्ञ, अल्पशक्ति नियतधर्मा है । सबको देखना, सुनना - यह सर्वतः पाणिपाद उसका काम है, न कि इन नियतेन्द्रिय जीवों का । इसी विज्ञान को बतलाने के लिए ' द्रष्टव्य: ' - इत्यादि कहा है । देखने योग्य ही देख सकता है-सुनने योग्य ही सुन सकता है - इत्यादि का तात्पर्य यही है कि वह जीव परिच्छिन्न है- पाप्मानों से संसृष्ट है । बस, ८ वाँ मन्त्र इसी अर्थ का ( विज्ञान की कलाओं का ) ही निरूपण करता है । ' एतत् ' से कौन कलाएँ अभिप्रेत हैं - वृक्ष में प्रतिष्ठित होने वाले ' वयांसि ' कौन हैं? इसका यही उत्तर है । जैसा कि ऋषि कहते हैं-" पृथिवो च पृथिवोमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा चाकाशश्चाकाशमात्रा च चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं च घ्राणं च घ्रातव्यं च रसश्च रसयितव्यं च त्वक् च स्पर्शयितव्यं च वाक् च वक्तव्यं च हस्तौ चादातव्यं चोपस्थश्चानन्दयितव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च पादौ च गन्तव्यं च मनश्च मन्तव्यं च बुद्धिश्च बोद्धव्यं चाहङ्कारश्चाहंकर्तव्यं च चित्तं च चेतयितव्यं च तेजश्च विद्योतयितव्यं च प्राणश्च विधारयितव्यं च " ॥६ ॥

५- पाँचवां प्रश्न है-॥ ४ ॥

--" कस्मिन्नु सर्वे संप्रतिष्ठिता भवन्ति "? अव्यय, अक्षर, क्षर - आत्मा त्रिकल है । तीनों क्रमश: पर, परावर, अवर नाम से प्रसिद्ध हैं । स्वयम्भू परमेष्ठी - सूर्य - चन्द्रमा पृथिवीरूप विश्व का स्वयम्भू - परमेष्ठिभाग अमृत है । इसमें अव्यय की [ २०३ ]

पृष्ठ 218

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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण प्रधानता है । चन्द्रमा पृथिवी दोनों मर्त्यभाग हैं । इनमें क्षर की प्रधानता है । मध्यपतित सूर्य्य अक्षर-प्रधान है । यह अमृतमृत्युमय है । अर्थात् इसके साथ अर्वाचीन मर्त्यक्षर का भी सम्बन्ध है - परार्ध्य अमृताव्यय का भी सम्बन्ध है । इस प्रकार अक्षर का दोनों से सम्बन्ध रहता है । पूर्वोक्त सारी कलाएँ अवरक्षर से सम्बन्ध रखती हैं, अतएव जब तक विज्ञान इनसे संश्लिष्ट रहता है- दूसरे शब्दों में जब इनकी प्रधानता में रहती है तो वह मध्यपतित परावर अक्षर ' अवर ' कहलाने लगता है । परन्तु वही कलाभेद का परित्याग करता हुया जब पर अव्यय की ओर झुक जाता है तो स्वयं भी निष्कल होता हुआ पररूप में ( अव्ययरूप में ) परिणत होता हुआ पराक्षर बन जाता है । पराक्षर को महदक्षर कहा जाता है, क्योंकि महदक्षर पर अव्यय से संश्लिष्ट है । विज्ञानाक्षर कलाहीन बनकर महदक्षरमय होता हुआ स्वयं भी परअक्षर बन जाता है । गार्ग्य का पाँचवाँ प्रश्न था - ' कस्मिन्नु सर्वे संप्रतिष्ठिता भवन्ति ' - यह । ' पृथिवीमात्रा ० ' आदि मन्त्र से प्रतिष्ठित होने वालों का स्वरूप बतलाया । अब जिसमें ये प्रतिष्ठित होते हैं- उनका स्वरूप बतलाते हैं । पूर्व में १० इन्द्रिएँ बतलाई हैं । चार अन्तःकरण बतलाए हैं । दो विज्ञान की प्रातिस्विक कलाएँ बतलाई हैं । कुल १६ कलाएं हो जाती हैं । यद्यपि कहीं कहीं इन्द्रियों को दस भी माना जाता है, परन्तु अन्ततोगत्वा पाँच इन्द्रियों में ही सबका अन्तर्भाव मान लिया जाता है । वे वाक्, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन ( इन्द्रियमन ) - इन नामों से प्रसिद्ध हैं । त्वक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ, आदि का मन में अन्तर्भाव मान लिया जाता है । यहाँ प्रकारान्तर से पाँच में सबका अन्तर्भाव माना है । चक्षु, श्रोत्र, घ्राण, रसना, त्वक्-ये पाँच ज्ञानेन्द्रिएँ हैं । वाक् आदि पाँच कर्मेन्द्रिएँ हैं । विज्ञानात्मा ज्ञानप्रधान है । इसमें कर्म्म गौण है एवं प्रज्ञान में कर्म्मभाग प्रधान है । ज्ञानभाग गौण है, अतएव कर्मेन्द्रियों का प्रधानरूप से प्रज्ञान के साथ सम्बन्ध रहता है एवं ज्ञानेन्द्रियों का प्रधानरूप से विज्ञान के साथ सम्बन्ध रहता है एवं मन, बुद्धि ( विज्ञान की विषयरूपा विषयज्ञानसम्बन्धिनी रश्मि ), चित्त, अहंभाव का भी इसी के साथ सम्बन्ध है । चक्षुः सम्बन्ध से वह द्रष्टा है, त्वक्सम्बन्ध से स्प्रष्टा है, श्रोत्रसम्बन्ध से वह श्रोता है, घ्राण है । सम्बन्ध से घ्राता है । रस ( रसना ) सम्बन्ध से रसयिता है । मन ( प्रज्ञानमन ) सम्बन्ध से मन्ता बुद्धिसम्बन्ध से बोद्धा है | चिदावेशिष्ट अहं सम्बन्ध से कर्त्ता है । तेजःप्राणरूप वह स्वयं हैं । चित्त सत्त्व का नाम है । सत्त्व महत् का अपना भाग है, अतः उसका प्रधानरूप से महान् के साथ ही सम्बम्ध होता है । शेष तीन ( मन - बुद्धि- अहंकार ) का, पाँच ज्ञानेन्द्रियों का इससे सम्बन्ध है । वह स्वयं तेजःप्राणरूप ( ज्ञानक्रियारूप ) है, अतः उन दोनों का स्व - स्वरूप में ही अन्तर्भाव है— १- द्रष्टा चक्षुरपेक्षया । ५ - रसयिता २ - स्प्रष्टा वगपेक्षया । ६ - मन्ता रसनापेक्षया । प्रज्ञानमनोऽपेक्षया । ३- श्रोत्रा श्रोत्रापेक्षया । ७ - बोद्धा बुद्धयपेक्षया । ४- घाता घ्राणापेक्षया । -कर्ता अहंकारापेक्षया । [ २०४ ]

पृष्ठ 219

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चतुर्थ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य विज्ञानात्मा ( रूप ) चित्तस्य- महदात्मन्यन्तर्भावः कम्मेन्द्र०- प्रज्ञानात्मनि अन्तर्भावः -५ तेजः प्रारणयो: स्वस्वरूपेऽन्तर्भावः -२ ८ ऐसा वह विज्ञानात्मा पुरुष इस सुषुप्त्यवस्था में सारी कलाओं को अपने में लीन कराता हुआ उसी पर अक्षर में ( अव्ययसंश्लिष्ट अतएव ' पर ' नाम से प्रसिद्ध महदक्षर में ) प्रतिष्ठित हो जाता है । विज्ञानाक्षर यदि वहां चला जाता है तो सबको लेता हुआ स्वयं तद्रूप हो जाता है यही इसका ' पर - अक्षर में प्रतिष्ठित होना है । ' परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ' के अनुसार एकीभाव विना अव्यय के प्राप्त नहीं हो सकता । श्रव्ययानुगृहीत अक्षर ही ' द्वैतातीतत्व ' का कारण है, अतएव ऋषि को ' परे अक्षरे आत्मनि संप्रतिष्ठते ' - यह कहना पड़ा है । जैसा कि ऋषि कहते हैं--" एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्त्ता

विज्ञानात्मा पुरुषः । स परेऽक्षर श्रात्मनि संप्रतिष्ठते ॥६ ॥

बस, पाँचवें प्रश्न का यही संक्षिप्त उत्तर है—-॥ ५ ॥

--फलश्रुतिप्रकरणम्-विज्ञानाक्षर सौर होने से रोहित है । रोहित सुनहरी वर्ण है । सौरमण्डल हिरण्मयमण्डल है । इससे संश्लिष्ट अक्षर भी रोहित ( लोहित - हिरण्मय ) बन रहा है । जब तक विज्ञान विज्ञानरूप में रहता है - कलाओं के अधीन रहता हुआ क्षर की तरफ झुका रहता है, तब तक वह वास्तव में लोहित है-एवं क्षररूपमयैवस्तु के आक्रमण से अपनी स्वच्छता खोए रहता है । पाप्मा एक प्रकार की छाया है- आवरण है । यदि विज्ञान क्षरप्रपञ्च को छोड़ता हुआ उस पराक्षर को प्राप्त कर लेता है-तो स्वयं भी वैसा ही हो जाता है । महदक्षर परअक्षर है । ' हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्मनिष्कलम् ' के अनुसार वह अलोहित - प्रच्छाय है, अतएव शुभ्र है । तद्रूप बना जाना ही वित्ति है । ऐसा प्रक्षरज्ञ सर्वज्ञ बनता हुआ सर्वव्यापक बन जाता है - जैसा कि ' मुण्डकोपनिषत् ' में स्पष्ट हो जाएगा । जैसा कि ऋषि कहते हैं-" परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्रमक्षरं

वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वो भवति । तदेष श्लोकः ” ॥१० ॥

[ २०५ ]

पृष्ठ 220

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प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य भूतप्राणनिरूपण उपनिषत् प्रधानरूप से विज्ञानक्षर को लक्ष्य बनाकर उस पराक्षररूप अव्ययात्मा पर ले जाता है - इसी का स्पष्टीकरण करते हुए अन्त में ऋषि कहते हैं—

" विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्रारणा भूतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र ।

तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ” ॥११ ॥

पञ्चमात्रायुक्त पञ्चभूत का ' भूतानि ' से ग्रहण है । पञ्च वायव्य प्राणों का ' प्रारणाः ' से ग्रहण है । शेष इन्द्रियादि का ' बेवैश्च सर्वे: ' - से ग्रहण है । सुषुप्ति में सबका विज्ञान में लय होता है । विज्ञान सब-को लेकर उसमें प्रतिष्ठित हो जाता है । -8 एक बात और बतला कर हम इस उपनिषत् के चतुर्थ प्रश्न को समाप्त करते हैं— हमने इसे भूतप्राणरूप भूतात्मा का निरूपक बतलाया है । कारण इसका यही है कि इस प्रश्न में जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति - तीन अवस्थाओं का निरूपण है । इन तीनों अवस्थाओं का प्रधानरूप से वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ से सम्बन्ध है । तीनों की समष्टि ही भूतात्मा है । यह पृथिवी की ( अमृता

पृथिवी की ) वस्तु है ।

॥ इति भूतप्राणनिरूपणात्मकः चतुर्थ प्रश्नः ॥

॥ ४ ॥

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