प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 31–40

प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 31–40

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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रविप्राणनिरूपण अथ अधिकारिस्वरूप रहस्यम्-प्राचीन भारत की वैदिककालीन सभ्यता की एवं सभ्यता में प्रचलित व्यवस्थाओं की यदि आज इस २० वीं शताब्दी की सभ्यता एवं व्यवस्था के साथ तुलना करने लगते हैं तो अहोरात्र का अन्तर पाते हैं । आज का भारतवर्ष विज्ञानशून्य है, असभ्य है - जंगली है - अकर्मण्य है । आज हम भारतीयों में जो कुछ सभ्यता का अंश विद्यमान है यह पाश्चात्त्यों की दयादृष्टि का फल है । यदि उन देशों के साथ हमारा संसर्ग न होता तो हम एकान्ततः जंगली ही बने रहते । यह है वर्तमान स्थिति, परन्तु हमारा प्रतीत कैसा था? हम आज इस प्रश्न का उत्तर देने में भी लज्जित होते हैं । अतीत का स्मरण हमारे चित्त को व्याकुल कर देता है । इसलिए इस प्रश्न के उत्तर में अधिक न कहकर यही कहना पर्याप्त होगा कि पाश्चात्त्यों ने हमारे इतिहास से अपरिचित रहकर अथवा परिचय प्राप्त करके भी हमारे प्रतीत अभ्युदय के स्मरण से होने वाली योग्यता से हमें वञ्चित रखने की अभिलाषा रखकर हमें एकान्ततः असभ्य बतलाया है । उन सत्यवादियों के प्रति हमें कुछ नहीं कहना । कहना केवल भारतीयों से है । उसमें भी हमारे लक्ष्य प्रधानरूप से भूसुर हैं । इन्हीं मूसुरों के पूर्वज असभ्य नहीं थे, पूर्ण सभ्य थे । संसार की तत्तत्सभ्यताओं को, तत्तद्देशवासियों को सिखाने वाले गुरु ही नहीं, परमगुरु थे । पूर्ण वैज्ञानिक थे, कर्मण्य थे । उसी के फलस्वरूप प्राज हमारे सामने उपनिषद् ब्राह्मणादि उपस्थित हैं । उपनिषदों और ब्राह्मणग्रन्थों में वह विज्ञान भरा हुआ है कि उसके सामने मेटीरियल सायन्स को ही सर्वेसर्वा मानने वाले प्राधुनिक वैज्ञानिकों के विज्ञान बुरी तरह से परास्त होते हैं । आजकल का सायन्स मनः प्राणवाङ्मय आत्मा के तीसरे वाङ्मय भूतभाग का निरूपण करता है । मेटिरियल जगत् पर सायन्स की इतिश्री है । परन्तु हमारा विज्ञान वाङ्मयजगत् के आधारभूत प्राण, प्राणप्रपञ्च के आधारभूत मन तक दौड़ लगाता है । भूतसायन्स को हमारे ऋषि रद्दी चीज समझते हैं । वाक् से प्राणविज्ञान को वे अधिक माहात्म्य देते हैं । प्राण से अधिक माहात्म्य मनोविज्ञान ( साइकोलॉजी ) को देते हैं । यद्यपि आजकल भी ' साइकोलॉजी ' नाम से प्रसिद्ध मनोविज्ञान प्रचलित है, परन्तु हमारा मनोविज्ञान इस साइ कोलॉजी से भिन्नतत्त्व है । श्वोवसीयसमन, प्रज्ञाननामक सर्वेन्द्रियमन एवं सुख - दुःखभोक्ता इन्द्रियमन तीनों में से पहला मन आत्ममय है । ऋषियों का लक्ष्य यही है । शेष दो मन तो वाक्रूप भूतप्रपञ्च के ही अन्तर्गत हैं । दोनों अन्नमय हैं । अन्न साक्षात् भूत है । ऐसी अवस्था में इन वैज्ञानिकों की साइको-लॉजी मेटिरियल सायन्स में ही घुस जाती है । हमारे शास्त्रों में इन दोनों भौतिक मनों के जो लक्षण-जो कर्म बतलाए हैं, करीब करीब उन्हीं को साइकोलॉजी ने अपनाया है । परन्तु वे इन्हें अनमेटिरियल बतलाते हैं जो कि पूर्वकथनानुसार सर्वथा मेटिरियल हैं । अस्तु, कौन कितना समझता है? यह शास्त्रार्थं अप्राकृत है । हमें यहाँ अपनी कहनी है । उपनिषत् आत्मा का स्वरूप बतलाता है । आत्मा मन - प्राण-वाक् भेद से त्रिकल है । यह प्रात्मा का सृष्टिसाक्षीभाग है । इनके भीतर आनन्द - विज्ञान शुद्ध ( निर्विषयक मन ) मनोरूप मुक्तिभाग है । उपनिषत् इस मुक्तिसाक्षीभाग की ओर लक्ष्य रखता हुआ [ १७ ]

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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रयिप्राणनिरूपण सृष्टिसाक्षी आत्मा का निरूपण करता है । मन असली उद्देश्य है । यह प्राण वाक् के विना अनुपपन्न है, अतएव उपनिषत् को गोणरूप से इसका भी निरूपण करना पड़ता है । श्रात्मा आत्मा है, प्राण प्राण है, वाक् पशु है । तीनों की समष्टि प्रजापति है । आत्मा, प्राण, प्रजापति उपनिषत् के ये ही तीन विषय हैं । किसी उपनिषत् में आत्मा का निरूपण मुख्य है, किसी में प्राण की प्रधानता है, किसी में वाक् की प्रधानता है । इसमें हमारा ' पिप्पलाद ' उपनिषत् प्राणप्रधान है । प्राण अनन्त हैं । कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, मरीचि, पुलस्त्य आदि श्रनन्त ऋषि - प्राण हैं । इन ऋषिप्राणों की विद्या को प्रकट करने वाले मनुष्य ऋषि उन - उन नामों से ही प्रसिद्ध हुए हैं । भिन्न - भिन्न ऋषि भिन्न - भिन्न प्राण की परीक्षा करते थे । वहाँ से तत्तत्प्राणविद्या देश में प्रचलित होती थी । प्राचीन भारत में प्राणविद्या की परीक्षाएँ करने वाली यों तो अनेक विज्ञानशालाएँ थीं, परन्तु उन सब में मुख्य १० ही थीं । वे दसों शालाएँ ब्राह्मणादि ग्रन्थों में ' ब्रह्मपत् ' नाम से प्रसिद्ध थीं । अप्राकृत होने पर भी उनका नामोल्लेख कर देना उचित नहीं तो अनुचित भी नहीं होगा-( १ ) - तत्कालीन वेदविद्या ' आसुर और देव'- दो भागों में विभक्त थी । श्रासुरविद्या के प्राचार्य बलख नाम से प्रसिद्ध बाल्हीक में रहने वाले पश्चिम दिशा के लोकपाल ' वरुण ' थे । ये ही आसुरी-वारुणी ( मद्य ) के श्राविष्कारक थे । इनके औरस पुत्र भृगु को आगे जाकर पुष्कर में पैदा होने वाले एवं प्राङ्मेरु पर ज्योतिष्मती नगर में रहने वाले कान्तिमती सभा के अध्यक्ष भगवान् ब्रह्मा ने अपना दत्तक पुत्र बना लिया था । कहना यही है कि आसुरवेद वरुणप्रधान था । इस आसुरी वेदविद्या के प्रवर्त्तक सुप्रसिद्ध पुलस्त्य पुलह ऋषि थे । यद्यपि किलात, श्राकुली, स्लाव आदि और और भी आसुर वारुण ब्राह्मण थे- जिनके कि वंशज आज भी केल्ट - स्लाव आदि नामों से प्रसिद्ध हैं- तथापि उन सब में मुख्य पुलस्त्य और पुलह दो ही प्रधान थे । जर्मन रूस के मध्य में जो स्थान श्राज ' पोलेण्ड ' नाम से प्रसिद्ध है - यही इन दोनों आसुर ऋषियों की ' ब्रह्मपर्षत् ' थी । पुलस्त्य ही निरुक्तक्रमशः पोलेण्ड बन गया होगा - यह सम्भावना की जा सकती है । बस, ग्रासुरपर्षत् के विषय में अधिक कहना श्रनधिकार चेष्टा है, अतः इसे यहीं समाप्त कर दिव्यपर्षदों की ओर आपका ध्यान आकर्षित करते हैं । ( २ ) - दिव्यपत् कुल ६ थीं । इन 8 में एक पर्षत् तो भौमस्वर्ग में थी । एक अन्तरिक्ष में थी । शेष आठ इसी भारतवर्ष में थी । स्वर्ग में कश्यपपर्षत् थी । इसके ब्रह्मा महर्षि कश्यप थे । इस गद्दी पर जो जो प्रतिष्ठित हुए - सब कश्यप कहलाए । प्राङ्मेरु के ऊपर हिरण्यशृंग पर्वत है । यहीं ब्रह्मा की कान्तिमती पुरी है । यही स्वर्गप्रदेश था । इस हिरण्यशृंग पर्वत के समीप तिब्बत है । तिब्बत से उत्तरभाग में ही हमारी यह दूसरी कश्यपपर्षत् थी । इस पर्षत् में प्रधानरूप से ' कश्यप ' प्राण की परीक्षा होती थी । ( ३ ) - तीसरी अत्रिपर्षत् थी । सांख्यभौमभेद से अत्रिवंश दो भागों में विभक्त हुआ । इनमें भौमत्रि के पुत्र चन्द्रमा थे । यही चन्द्रमा ब्रह्मा द्वारा उत्तर दिशा के लोकपाल बनाए गए एवं इन्होंने ही तारा - हरण किया । इन्हीं की कृपा से सोमवल्ली का ध्वंस हुआ । असुरों [ १८ ]

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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रयिप्राणनिरूपण का भारतवर्ष में प्राधिपत्य हुआ । इसीलिए ग्राज भी असुर - सम्प्रदाय में चान्द्रतिथि को ही प्रधानता दी जाती है । चन्द्रमा से इला के गर्भ में बुध पैदा हुए । इन्हीं से सुप्रसिद्ध पौराणिक सोमवंश चला । इसी वंश के लिए पुराणों में ' ऐलप्रकृतिरुच्यते ' यह कहा जाता है । दूसरे सांख्य अत्रि के पुत्र ' शांखायन ' हुए । यह परम अधार्मिक हुए । मौम ने बहुत रोका, पर यह न माने । प्रप्त में भौमअत्रि दुःखी हो इसे एवं इसके अन्य दुराचारी भाईयों को छोडकर सिन्धुदेश के ' देवनिकाय ' ( सुलेमान पर्वत ) पर जाकर वहीं रहने लगे एवं इधर शांखायन एवं इसके माई और वंशधर म्लेच्छप्राय हो गए जो कि पुराणों में आज भी ' यवन ' नाम से प्रसिद्ध हैं । जिसे आज ईरान कहते हैं - यही हमारा आर्य्यायण नाम से प्रसिद्ध पश्चिम भारतवर्ष है । सिन्धु से पूर्व ' यलो सी ' ( पीत समुद्र ) तक पूर्वीय भारत है । सिन्धु से पश्चिम रेड सी तक पश्चिम भारतवर्ष है । पश्चिम भारत की अन्तिम सीमा ' मेडिटरेनीयेन सी ' है । यही पुराणों में ' महीसागर ' नाम से प्रसिद्ध है । यही स्वर्ग की सन्धि थी । यहीं हमारे भौम अत्रि रहते थे । यहीं इनकी ब्रह्मपत् थी । सुप्रसिद्ध महर्षि काप्य की ब्रह्मपत् की भी यहीं स्थिति थी । प्रसंगागत एक बात और समझ लेनी चाहिए । आज जिस ' ग्रीक ' को यूनान कहा जाता है-वह असली यूनान नहीं है । असली यूनान ' अर्थ ' में है जिसमें कि सांख्य अत्रि के वंशज रहते थे । अर्ब में, जिसे कि पुराणों में वनायु कहा है, कुल ६ खण्ड हैं । इन श्रों खण्डों में एक खण्डविशेष ही प्राचीन यवन था । यहाँ पर शांखायन के वंशज आसुरधर्मानुयायी अतएव असुर नाम से प्रसिद्ध ' हेलि ' नाम के असुर यहीं रहते थे । इनके कारण ही यह देश ' यवन ' कहलाया । इन यवनों को अर्थों ने परास्त किया एवं इनका देश छीन लिया । ये यवन यहाँ से भागकर यूरोप के जिस खण्ड में जाकर रहने लगे वह स्थान ' यूनान ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । यही नया यूनान आज यूनान नाम से प्रसिद्ध हो गया है एवं प्रबंस्थानीय असली यूनान को आज हम भूल गए हैं । प्राचीन यूनान श्राज पाश्चात्त्य भाषा में ' पोलेस्टाइन ' कहलाता है । यही यूरोपियनों का तीर्थं स्थान है । कालनेमि, मय आदि सुप्रसिद्ध असुर यहीं रहते थे । हमारे भारतीय ज्योतिषाचार्य्यं ' वराहमिहिर ' ने यहीं आकर मयासुरखानदान से ज्योतिषविद्या का अध्ययन किया था । ( ४ ) - चौथी शिविपत् थी - यह काठियावाड़ में थी । ( ५ ) - पाँचवीपर्यंत् - अंगिरापंथी । पञ्चनद ( पञ्जाब ) पय्र्य्यन्त त्रिगर्त्त देश में यह पर्वत् थी । ( ६ ) - छठी याज्ञवल्क्यपर्यंत् थी । यह ' पर्षत् ' मिथिलादेशस्थ सुप्रसिद्ध धनुषा के पास थी । ( ७ ) - सातवीं उद्दालकपर्षत् थी । श्रयोध्या में एक वाहुदा नदी है । यहीं पर अति सुप्रसिद्ध उद्दालक पर्षत् थी । यहीं सुप्रसिद्ध धर्माचार्य शंखलिखित का आश्रम था । ( ८ ) - भाठवीं प्रवाहपत् थी । पाञ्चालदेशान्तर्गत कन्नौज में यह पर्वत् बी । ( e ) - नौवीं प्रश्वपति महाराज की अश्वपतिपर्षत् थी । पञ्जाब में जो केकयदेश है वहीं इसकी सत्ता थी । [ १६ ]

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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रयिप्राणनिरूपण PRETEER ( १० ) - दसवीं काशिराज प्रतर्द्दनपत् थी । इन दस ( १० ) पर्षदों में १ आसुर पर्षत् थी, ७ ( सात ) ब्रह्मपर्षत् थीं एवं अन्त की दो क्षत्र-पत् थीं । हमारे इस उपनिषत् के आचार्य पिप्पलाद की यद्यपि कोई स्वतन्त्र पत् न थी, तथापि पीपल खाकर कठोर तपश्चर्या द्वारा यह महापुरुष तत्कालीन सभी पर्षदों के ब्रह्माओं से श्रेष्ठ बन गए । इनकी श्रेष्ठता यहाँ तक बढी कि उस समय के सर्वश्रेष्ठ - सुकेशा भारद्वाज, शैब्य सत्यकाम, सौर्य्यायणी गार्ग्य, कौशल्य प्राश्वलायन, भार्गव वैदर्भि, कबन्धी कात्यायन, उद्दालक जैसे माने हुए परमवैज्ञानिक तक समय समय पर इनसे प्रश्न पूछने आने लगे । श्राज मंगलाचरण के अनन्तर इसी महापुरुष के द्वारा श्राविष्कृत उपनिषत् - तत्त्व को अपने उपनिषत्प्रेमी पाठकों के सम्मुख रखना चाहते हैं-इस उपनिषत् का प्राचीन नाम ' पिप्पलाद - उपनिषत् ' ही है । शंकराचार्य ने प्रश्नोत्तरमय होने से इसे आगे जाकर ' प्रश्न ' नाम दे दिया है । इस उपनिषत् में पूर्वकथनानुसार प्राणतत्त्व का प्रधान रूप से निरूपण है, अतएव इस यौगिक अर्थ की अपेक्षा से हम इसे ' प्राणोपनिषत् ' नाम से भी व्यवहृत करने के लिए तय्यार हैं । उपनिषत् - सम्बन्धी सभी बहिरङ्ग वक्तव्य समाप्त हो चुका, अब एक बात और बतलाकर उपनिषत् - रहस्य प्रारम्भ किया जाता है— उपनिषत् पढने का अधिकारी कौन है? उपनिषत् - तत्त्व को आत्मसात् करने के लिए किन-किन नियमों का पालन करना आवश्यक है? गुरु को किस समय उपनिषत् - तत्त्व बतलाना चाहिए? -इत्यादि प्रश्नों का समाधान करते हुए भगवान् पिप्पलाद कहते हैं-“ ॐ सुकेशा च भारद्वाजः, शैब्यश्च सत्यकामः, सौर्यायरणी च गार्ग्यः, कौशल्यश्चाश्वलायनः, भार्गवो वैदभिः, कबन्धी कात्यायनः -ते हैते ब्रह्मपराः, ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमारणाः - ' एष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यति ' इति ( अनुलक्ष्य ) ते ह समित्पाणयो भगवन्तं पिप्लादमुपसन्नाः " ॥१ ॥

' द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे शब्दब्रह्म परं च यत् " - इत्यादि श्रुति के अनुसार ब्रह्म के शब्द और पर भेद से दो विवर्त्त हैं । इनमें उपनिषत् प्रधानरूप से ' परब्रह्म ' का निरूपण करता है । उपनिषदों में एक ऐतरेय उपनिषत् ही ऐसा है जो प्रधानरूप से बड़े विस्तार के साथ ' शब्दब्रह्म ' का निरूपण करता है । दूसरे परब्रह्म के अवर और पर भेद से पुनः दो भेद हो जाते हैं । स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूर्य्य - चन्द्रमा-पृथिव्यात्मक ब्रह्मसत्य नाम से प्रसिद्ध क्षरतत्त्व अवरब्रह्म है एवं आत्मक्षर, अक्षर, अव्यय, परात्पर विशिष्ट षोडशीपुरुष ' परब्रह्म ' है । इन दोनों में से उपनिषत् का प्रधान लक्ष्य परब्रह्म ( षोडशी १- बृहदा ० उप ० २।३।१ एवं ब्रह्मबिन्दू उप ० १७ । ↓ २० ]

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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रयिप्राणनिरूपण आत्मा ) है । उसी की इन ६ ओं ने जिज्ञासा की है । इन वैज्ञानिकों ने अवरब्रह्म समझ लिया था एवं परब्रह्म की ओर ये आकृष्ट हो चुके थे । ब्रह्मविद्या की ओर झुक पड़े थे । न केवल झुक ही पड़े थे, अपितु, उसे प्राप्त करने के लिए सन्नद्ध हो गए ॥ न केवल सन्नद्ध ही हो गए थे - अपि तु उसे खोजने निकल पड़े थे । ब्रह्म की ओर झुकना पहला कम है । झुककर विश्वासपूर्वक उस पर आरूढ हो जाना दूसरा कर्म्म है एवं श्रारूढ होकर उसके ज्ञान के लिए ब्रह्मज्ञानियों की शरण में जाना तीसरा कर्म है । इन तीन व्यापारों के अनन्तर ब्रह्मज्ञान प्राप्ति होती है । ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' से पहले ब्रह्मजिज्ञासा है । इसी के लिए ' ब्रह्मपरा: ' कहा है । जिज्ञासानन्तर उस पर आरूढ होना दूसरा व्यापार है । इसके लिए ' ब्रह्मनिष्ठाः ' कहा है । विश्वासानन्तर ही उसे प्राप्त करने की - खोजने की इच्छा होती है । यही तीसरा व्यापार है । इसके लिए ' परं ब्रह्मान्वेषमाणाः ' कहा है । ये तीनों काम हैं, परन्तु यदि बतलाने वाला कोई योग्य गुरु नहीं है, तब भी कुछ नहीं, अतः ब्रह्म को ढूंढने वालों का सबसे पहला यही कर्त्तव्य होना चाहिए कि वे खूब सोच - समझकर इस बात का निर्णय कर लें कि वह व्यक्ति आज इस धरातल पर ऐसा है जो अपनी शंका का समाधान कर सकता है जो चपलधी हठात् चाहे जिसको गुरु बना लेता है - वह आगे जाकर पछताता है । कारण इसका यही है कि यदि गुरु मामूली होता है तो वह इस शिष्य का समाधान करने में असमर्थं रहता है । ऐसी अवस्था में इसमें गुरु के प्रति अश्रद्धा का उदय हो जाता है । यह अश्रद्धा इसका अनिष्ट करती है । इसलिए सबसे पहले यह निर्णय कर लेना आवश्यक हो जाता है कि यह गुरु अपने प्रश्नों का समाधान कर सकता है । बस, ' गुरु कैसा होना चाहिए'- इस प्रश्न का समाधान करते हुए आगे जाकर पिप्पलाद कहते हैं— " एष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीति " - इति ॥ यह एक प्राचीन सम्प्रदाय था कि जब कोई किसी का शिष्यत्व स्वीकार करने जाता था तो वह समिधा ( प्रादेशमात्र लकड़ी ) हाथ में ले जाता था । तीनों वर्णों के लिए क्रमशः पालाश, खदिर, अश्वत्थ समिधाएं नियत थीं । क्योंकि तीनों क्रमशः ब्रह्म, क्षत्र, विड् - वीर्य्यप्रधान हैं । इस समिधा का ग्रहण निदान - रहस्य से सम्बन्ध रखता है । यज्ञाग्नि में जिन प्रादेशमित ( १०३ अंगुल ) लकड़ियों की आहुति दी जाती है - वे समिध कहलाती हैं । इध्म और समिध - दो नाम हैं । साधारण लौकिक अग्नि को प्रज्वलित करने वाला काष्ठ इध्म कहलाता है, किन्तु मन्त्रपूत अतएव यज्ञाग्नि द्वारा यज्ञिय आत्माओं का समिन्धन करने वाली लकड़िएँ ' समिधा ' कहलाती हैं । समिधाएँ जिन मन्त्रों से आहुत होती हैं - वे मन्त्र याज्ञिक परिभाषा में ' सामिधेनी ' नाम से प्रसिद्ध हैं । इनके द्वारा प्रज्वलित अग्नि आत्माग्नि का समिन्धन करती हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ब्राह्मणश्रुति कहती है-" इन्धे ह वा एतदध्वर्युः । इध्मेनाग्निम् तस्मादिध्मो नाम । समिन्धे सामिधेनीभिर्होता तस्मात् सामिधेन्यो नाम " । ' १ - शत ० ब्रा ० १।३।५।१ । [ २१ ]

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प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रथम प्रश्न

अपि च--बस, प्रथम कण्डिका का यही संक्षिप्त अर्थ है ।

॥१ ॥

---२-० ब्रा ० ३।२।४।१ । १- शत ० ब्रा ० १।४।५।१ । [ २२ ] प्राणनिरूपण में ३- शत ० ब्रा ० ७।४।१।६ । “ यो ह वा श्रग्निः सामिधेनीभिः समिद्धः । अतितरां ह वै स इतरस्मादग्ने-स्तपति । अनवधूष्यो हि भवति श्रनवमृश्यः " ॥। ' कहने का तात्पय्यं यही है कि सामिधेनी ऋङ्मन्त्रित समिधा निदान से आत्माग्नि को प्रज्वलित करने वाली है । सुप्त श्रात्मा इसकी ग्राहुति से प्रज्वलित हो जाता है । श्राज उस इस समिधा समिधा को द्वारा हाथ मेरी रखकर गुरु के सामने खड़ा हुआ जिज्ञासु यह भाव प्रकट कर रहा है कि- " आप - मर्थात् सुप्त आत्मा को प्रज्वलित कीजिए । मैं प्रज्ञानान्धकार में पड़ा हुआ हूँ - प्राप विज्ञानसिद्ध उसे दूर कीजिए संप्रदाय का उपदेश दीजिए - तद्द्वारा आत्मज्ञान करवाइए " बस, इसी प्राचीन किन्तु स्वरूप बतलाते हुए ऋषि कहते हैं -" ते ह ते समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः " ॥ विद्वान् पिप्पलाद के सामने हाथ में समिधा लिए बड़े विनीतभाव से खड़े हैं - पिप्पलाद उनकी जिज्ञासा को देखकर कहते हैं ---" तान् ह स ऋषिरुवाच भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ यथाकामं प्रश्नान् पृच्छत । यदि विज्ञास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्याम इति ॥२ ॥

इस मन्त्र ने शिष्य के अधिकार का निरूपण किया है । गुरु मुख्य हैं- प्रथम हैं, अतः प्रथम मन्त्र में ' एष वं तत्सर्वं वक्ष्यति ' इत्यादिरूप से गुरु के अधिकार का स्वरूप बतलाया है । अब क्रमप्राप्त का सीखकर उसे द्वितीय श्रेणित शिष्य का शिष्यत्व बतलाते हैं - ज्ञानप्रधान उपनिषत् तत्त्व के सीखने व्रतों का आत्मसात् करने का अधिकारी वही हो सकता है जो कि ब्रह्मचर्य, सत्य, तप इन तीन ही-पालन करता है । पहले ब्रह्मचर्य है अनन्तर तप है, सर्वान्त में श्रद्धारूप सत्य है । सत्यत्वधारण ' 3. इदमित्यमेव ' - यह विश्वास ही श्रद्धा है । यही साक्षात् सत्य है । ' श्रद्धा वा आपः २ - ' आपो वै सत्यम् तपश्चर्या इत्यादि श्रुतियें स्पष्ट ही श्रद्धा को ' सत्य ' बतला रही हैं । शुक्ररक्षा ब्रह्मचर्य है । प्राणरक्षा तप से सम्बन्ध है हैं । मनोरक्षा सत्य है । श्रद्धारूप मन का सत्य से सम्बन्ध है । तपोरूप प्राण का एवं शुक्र का ब्रह्मचर्य से सम्बन्ध है । हमने आत्मा को मनःप्राणवाङ्मय बतलाया है । ब्रह्म, तप, श्रद्धा-

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प्रथम प्रश्न ज्ञानशक्ति: १ मन मन श्रात्मा उक्थ सोममयः कारण शरीर प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य क्रियाशक्तिः २ प्राण प्रोज प्राण अर्क श्रापोमयः सूक्ष्मशरीर रयिप्राणनिरूपण अर्थशक्तिः ३ वाक शुक्रात्मक सप्तधातवः पशुः प्रशिति: स्थूलशरीर आत्मा का असली रूप श्रानन्द है । इस पर पहला वेष्टन कारणशरीररूप मन का है । दूसरा वेष्टन सूक्ष्मशरीररूप प्राण है । तीसरा वेष्टन स्थूलशरीरस्वरूप शुक्र है । इन तीनों के भीतर औपनिषत् पुरुष है । उसे देखने के लिए पहले इन तीनों का आश्रय लेना आवश्यक हो जाता है । तीनों में क्रमशः स्थूलशरीररूप शुक्र, सूक्ष्मशरीररूप तप, कारणशरीररूप श्रद्धा ये विभाग हैं, अतएव यहाँ भी ऋषि ने वही क्रम रखा है । अपि च- कारण सूक्ष्म दोनों का आधार शुक्र है, अतएव इसे शरीर का अधिपति माना जाता है । ओज एवं मन दोनो शुक्र से बनते हैं । मन पर विज्ञान चमकता है । विज्ञानचक्षु ही उस आनन्दघन के दर्शन कराने में समर्थ हैं । यदि शुक्र प्रबल है तो प्राण प्रबल है । प्राण प्रबल है तो मन प्रबल है । मन प्रबल है तो विज्ञान प्रबल है । विज्ञान प्रबल है तो ग्रात्मसाक्षात्कार हुआा हुआया है । मात्मसाक्षात्कार विज्ञानसापेक्ष है । विज्ञान की प्रबलता मन - प्राण वाक्रूप श्रद्धा, तप, शुक्र रक्षा पर निर्भर है, अतः उपनिषत् में प्रतिपादित आत्मस्वरूप की स्थिरता के लिए इन तीनों की रक्षा करना परमावश्यक है । शुक्ररक्षा ब्रह्मचय्यं से होती है । भोज - रक्षा तप से होती है 1 । जो आलसी [ २३ ] इन तीनों के राहित्य से आत्मा के ये तीनों भाग सर्वथा निर्बल रहते हैं । अन्न वाक् हैं । सौर - तेज प्राण है । चान्द्र - सोम मन है । अन्न प्राण का आधार है । प्राण मन का आधार है । ग्राप जिसे अन्न कहते हैं - उसके भीतर तीनों हैं । जब अन्न खाया जाता है तो रस - मल के क्रमिक विकलन से वह क्रमशः ' रस, असृक्, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा, शुक्र- इन सात धातुओं के स्वरूप में परिणत होता है । यहाँ तक का भाग पार्थिव है । यह वाक् भूत है । इस शुक्र में से जब पार्थिव भाग निकल जाता है तो अन्त में रहने वाला अन्न का विवर्ता वही प्रान्तरिक्ष्य सूक्ष्म प्राण रह जाता है । इसी का नाम प्रोज है । इसमें दिव्य सोम और प्रान्तरिक्ष्य प्राणात्मक वायु रहते हैं । यह वायु भी जब निकल जाता है तो शुद्ध दिव्यसोम रह जाता है । इसी का नाम ' मन ' है । शुक्रभाग पार्थिव होने से अर्थप्रधान है । श्रोज माग प्रान्तरिक्ष्य वायुमय होने से क्रियाप्रधान है एवं मन दिव्य होने से ज्ञानप्रधान है । ज्ञान, क्रिया, अर्थ - ये तीन तत्त्व हैं । ' मन, प्राण, वाक्'- ' मन, श्रोज, शुक्र ' - ' आत्मा, प्राण, पशु ' - ' उक्थ - अकं प्रशिति ' - कुछ भी कहो, एक ही बात है-

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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्राणनिरूपण होता है - अकर्मण्य होता है उसमें जरा भी भोज नहीं रहता । ऐसे सालस के मुख पर निरन्तर मक्खिएँ भिनभिनाया करती हैं । एवं मन की रक्षा का साधन श्रद्धा है । यदि श्रद्धासूत्र नहीं तो सारा उपदेश व्यर्थ है । एक संवत्सर में हमारे श्रात्मा का एक मोग हो जाता है । नवीनता में बन्धन नहीं होने पाता । अभी गुरु का आग्नेय आत्मा और शिष्य का आत्मा भिन्न - भिन्न है- असम्बद्ध है । यदि गुरु - ' आज से तुम मेरे शिष्य हुए ' - यह कह देता है तो वाग्विद्युत् के कारण दोनों का श्रात्मा ( भूतात्मा ) मिल जाता है | इनका यह सहमिलन एक वर्ष में जाकर पूरा होता है । एक वर्ष में पूरी परिक्रमा से आत्माग्नि दोनों ओर से परिपक्व हो जाता है । दूसरे शब्दों में दोनों के आत्मा परस्पर ओतप्रोत हो जाते हैं । अभिन्न हो जाते हैं | अब तक न दोनों में तुल्यफलत्व था- न आशौच था परन्तु संवत्सरानन्तर ' आवयोस्तुल्यफलदो भव ' - इस तन्त्रसिद्धान्त के अनुसार एक दूसरे के फल का एक दूसरे के साथ नित्य सम्बन्ध रहता है । दोनों में परस्पर आशोचसम्बन्ध रहता है । यह वंश - ' विद्या - वंश ' नाम से प्रसिद्ध होता है । तात्यय्यं सारे प्रपञ्च का केवल यही है कि गुरुशिष्य के आत्माग्नियों का एक वर्ष में ( पृथिवी द्वारा सूर्य की पूरी परिक्रमा करने के कारण ) पूर्ण सम्बन्ध होता है । इसके बाद जो कुछ कहा जाता है उसका दृढ संस्कार हो जाता है । बस, ब्रह्मचर्य्यं द्वारा बल बढाओ, आत्मसमर्पणरूप तप द्वारा प्राणमात्रा को बढाओ, श्रद्धा द्वारा मन को बलवद् बनाओ - इन तीनों नियमों का वर्ष भर तक पालन करो । अनन्तर तुम उपनिषत् के अधिकारी बनोगे । इसके अनन्तर वापस लौटकर तुम जो कुछ पूछोगे जहाँ तक मैं

जानता हूँ - बतलाने की चेष्टा करूँगा ॥। इति अधिकारिस्वरूप रहस्यम् ॥

अथ उपनिषद् - रहस्यम् उपनिषद् - रहस्य प्रारम्भ करते हुए आज हम अपने पाठकों का ध्यान कौषीतकि ब्राह्मण के अतिसुप्रसिद्ध- ' बोडशकलं वा इदं सर्वम् - इस निगम की ओर आकर्षित करते हैं । संसार में जो कुछ ' अस्ति ' कहने लायक है, वह सब षोडशकल है । एक छोटे से छोटे सर्षप में भी १६ कलाएँ हैं एवं बड़े से बड़े विश्व में भी वे ही १६ कलाएँ हैं । इन कलानों की समष्टि को ही ' प्रजापति ' कहते हैं । ' षोडशकलं वा इदं सर्वम् ' ' कहो या ' सर्वमुह्येवेदं प्रजापति: २ कहो - एक ही बात है । यह षोडशी प्रजापति प्रजासापेक्ष है, प्रजा से युक्त होकर ही प्रजापति ' प्रजापति ' कहलाता है । इसी षोडशी प्रजापति का स्वरूप बतलाती हुई श्रुति कहती है-“ यस्मान्न जातः परो अन्यो अस्ति य प्रविवेश भुवनानि विश्वा । प्रजापतिः प्रजया संरराणस्त्रीणि ज्योतींषि सचते स षोडशी " -इति ॥ " १- शत ० ब्रा ० १३।२।२।१३ । २- शत ० ब्रा ० ५।१।१।४ । ३ - यजुर्वेद ८।३६ । [ २४ ]

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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य रयिप्राणनिरूपण संसार में जो कुछ जातप्रपञ्च है - उत्पन्न वस्तुमात्र है वह उससे भिन्न नहीं है- अर्थात् प्रजापति ही पदार्थ स्वरूपों में परिणत हो रहा है एवं वह अपने एक भाग से सृष्टरूप में परिणत होकर उन सब में प्रविष्ट हो रहा है । सृष्ट भी वही है प्रविष्ट भी वही है । वह प्रजापति प्रजा से मेल करता हुआ तीन ज्योतियों से युक्त हो रहा है । ऐसा यह प्रजाविशिष्ट प्रजापति ' षोडशी ' है । सूय्यं, अग्नि, चन्द्रमा तीन ही उसकी ज्योतिएँ हैं - अथवा अव्यय, अक्षर, क्षर - ये तीन ज्योति हैं - प्रथवा श्रात्मा, प्राण, पशु रूप से वह तीन स्वरूपों से प्रकाशित हो रहा है । इस ज्योतित्रयोपेत षोडशी प्रजापति की १६ कलाओं को भिन्न - भिन्न रूप से निश्चित किया जा सकता है, क्योंकि ' वोडशकलं वा इदं सर्वम् ' - यह निगमश्रुति है । पञ्चकल अव्यय, पञ्चकल अक्षर, पञ्चकल आत्मक्षर, परात्पर ये भी १६ कलाएँ हैं । निविशेष, परात्पर, अव्यय, अक्षर, आत्मक्षर, विश्वसृट्, पञ्चजन, पुरञ्जन, ५ पुर, जीव, ईश्वर, प्रजापति भेद से भी १६ कलाएँ हो सकती हैं । जीव, ईश्वर, सत्य, अमृत, परात्पर, पाँच प्राण, पाँच पशु प्रजापति- इस रूप से भी सोलह कलाएँ हो सकती हैं । बस, आज इसी तीसरे विभाग की १६ कलाओं को आपके सामने रखा जाता है-पूर्व के प्रकरणों में यह विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है कि प्रजापति में प्रात्मा, प्राण, पशु - ये तीन धातुएं हैं । तीनों का समन्वय ही ' प्रजापति ' कहलाता है । यह प्रजापति पुर में रहने के कारण ' पुरुषप्रजापति ' कहलाता है । ' प्राणव्यूढः, पशुग्रामः पुरम्'- इस लक्षण के अनुसार पञ्चप्राणयुक्त जो पशुग्राम है, उसी का नाम पुर है एवं ' पुरपरिग्रहः पुरुषः प्रजापतिः- इस लक्षण के अनुसार पुरपरिच्छिन्न पुरुष ही प्रजापति है । इसमें ५ आत्मा हैं । पाँच प्राण हैं इन्हीं पांचों प्राणों के लिए आगे आने वाले ' मुण्डकोपनिषत् ' में-" एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन् प्राणः पञ्चधा संविवेश " ॥ ' —यह कहा है एवं पाँच ही पशु हैं । १५ ( पन्द्रह ) की समष्टिरूप १६ वाँ प्रजापति है । आत्मा, प्राण, पशु - तीनों में से पहले आत्मा को ही लीजिये । आत्मा पाँच नहीं हैं - अपि तु, एक आत्मा के पाँच विवर्त हैं । ' एकः सन् पञ्चधा व्यभवत् ' - इस निगमश्रुति के अनुसार वह एक ही रसबलात्मक श्रात्मतत्त्व पञ्चसंस्थ बन रहा है । उन पाँचों संस्थानों में सबसे प्रथम एवं मुख्य सर्वालम्बनभूता निरालम्बना ' परात्पर ' संस्था है । सर्वबलविशिष्ट रस का नाम ही परात्पर है । यह असीम है, अतएव अभय है- एक है - व्यापक है । इस परात्पर के उदर में रहने वाले अनन्तबलों में से इस अनन्तबलों को अपने उदर में रखने वाला एक अन्यतम सर्वप्रधान मायाबल है । इस मायाबल से उस व्यापक परात्पर ॐ का यत्किञ्चित्प्रदेश परिच्छिन्न हो जाता है, । बस, माया से सीमित जो परात्पर का भाग है - उसी को ' अमृतात्मा ' कहते हैं- यही अव्ययपुरुष कहलाता है । इसके साथ इसकी अन्तरङ्गरूपा अक्षर मौर आत्मक्षर- ये दो प्रकृतिएँ अविनाभाव से इसके साथ रहती हैं । बस, सप्रकृतिक इस अव्ययपुरुष का ही नाम अमृतात्मा है । यही दूसरी आत्मसंस्था है । संस्था में उत्तर - उत्तर विभाग में पूर्व पूर्व विभाग का सम्बन्ध रहता है । परात्पर पहली संस्था है- पञ्चदशकल पुरुष दूसरी संस्था है । इनमें वह पहली 9129 १- मुण्डकोप ० ३।१।६ । [ २५ ]

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प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्राणनिरूपण संस्था है, अतएव उस अमृतात्मा को षोडशी मान लिया जाता है । इस षोडशी का श्रात्मक्षर विपरि णामी है । इसकी मर्त्य ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि, सोम - इन पाँच कलाओं से क्रमशः - प्राण, आप:, वाक्, अन्न, अन्नाद - ये पांच विकारक्षर उत्पन्न होते हैं । इन्हीं को ' विश्वसृट् ' कहा जाता है । ये पाँचों विश्वसृट् पञ्चीकरण द्वारा पञ्चजन कहलाने लगते हैं । पांचों पञ्चजनों के सर्वहुत यज्ञ से वेद, लोक, प्रजा, भूत, पशु - ये पाँच पुरञ्जन पैदा होते हैं । पाँचों पुरञ्जनों से ( जिनमें कि प्रत्येक में प्राण, प्रापः, वागादि पाँचों हैं ) स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य्य, चन्द्र, पृथिवी - ये पाँच पुर पैदा होते हैं । ये ही पाँचों प्रकृति विकृतियाँ हैं । संसार की प्रकृति होने से ये प्रकृतियाँ हैं, षोडशी की विकृति होने से ये विकृतियाँ हैं । इस प्रकार वह षोडशी अपने क्षरभाग से क्रमशः विश्वसृद्, पञ्चजन, पुरञ्जन, पुर उत्पन्न करता हुआ-के ' तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ' के अनुसार इन पाँचों अधियज्ञरूप पुरों में प्रविष्ट हो जाता है । इसी लिए ' यवस्य त्वम् ' कहा जाता है । यही आत्मतत्त्व की तीसरी संस्था है । यह संस्था - ' सत्यात्मा ' एवं ब्रह्मसत्य नाम से प्रसिद्ध है । ब्रह्म मौलिक तत्त्व है । इससे यौगिक तत्त्व पैदा होता है । दो विजातीय ब्रह्मों के मेल से यज्ञतत्त्व उत्पन्न होता है । ब्रह्मसत्यरूप सत्यात्मा के चन्द्रमा और पिण्ड पृथिवी इन दोनों के बीच में - चित्यपृथिवी के अमृतभाग से यज्ञतत्त्व पैदा होता है । यह यज्ञ त्रैलोक्यव्यापक होता है, अतएव इसे ' परमयज्ञ ' कहा जाता है । सत्यात्मा ही इस यज्ञात्मा की प्रतिष्ठा है । इस महायज्ञ के भीतर अनन्त अवान्तर क्षुद्रक्षुद्रातिक्षुद्र यज्ञ होते रहते हैं । अग्नीषोमसम्बन्ध ही यज्ञ है । प्राप जितने भी पदार्थ देख रहे हैं - सब श्रग्नीषोमात्मक हैं । यह पदार्थ असंज्ञ अन्तः संज्ञ - ससंज्ञ - इन तीन भागों में विभक्त हैं । ये तीनों तीन प्रकार की जीवसृष्टि हैं । इस जीव - यज्ञ को ' विश्वदानि ' यज्ञ कहा जाता है । विश्वदानि यज्ञ उसी परमयज्ञ का अंश है । परमयज्ञ ईश्वर है- सर्वभूतान्तरात्मा है । विश्वदानी-रूप सारे भूतयज्ञ इस परम यज्ञ में आहुत होते रहते हैं, अतएव इस ईश्वररूप परमयज्ञ को ' सर्वहुतयज्ञ ' भी कहा जाता है । यह सर्वहुत यज्ञेश्वर विश्वदानियज्ञमात्र में व्याप्त रहता है, प्रतएव इसके लिए ' ईशा वास्यमिदं सर्वम् ' ( इदं सर्व - त्रिविधजीवस्वरूपविश्वदानियज्ञकुलम् - ईशा सर्व हुतयज्ञरूपप रमयज्ञात्मक-देव सत्यमयेश्वरेण - आवास्यम् ) - इत्यादि कहा जाता है । इस प्रकार ईश्वरीय देवसत्य, जैवीय देवसत्य-भेद से यज्ञ और परमयज्ञ- ये दो संस्थाएं हो जाती हैं । इस प्रकार यज्ञ ( जैवीयदेवसत्य ), परमयज्ञ ( ईश्वरीय देवसत्य ), सत्य ( ब्रह्म - सत्य ), अमृत ( षोडशी ), परात्पर भेद से आत्मा के पाँच स्वरूप हो जाते हैं । यह है प्रजापति के आत्मा, प्राण, पशु - तीनों में से आत्मभाग का निरूपण । श्रात्मा के अनन्तर है- प्राण । प्राण भी कुल पाँच ही हैं । वे पाँचों प्राण परोरजा, आग्नेय, सौम्य, वायव्य, प्राप्य इन नामों से प्रसिद्ध हैं । श्रात्मा और पशु - ये दो तत्त्व भी यद्यपि झगड़े से खाली नहीं हैं, परन्तु मध्यपतित प्राण तो बडा ही झगड़ाभरा तत्त्व है । प्राण के विषय में बडा मतभेद है - जैसा कि निम्नलिखित निगमानुगत वचनों से स्पष्ट हो जाता है— १ - प्राणो व सावित्रग्रहः । २- प्रारण एव सविता । २- कौ ० ब्रा ० १६।२ । १-० उप ० २।६।१ । ३- शत ० ब्रा ० १२।९ ।१।१६ । [ २६ ]