प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 221–230

प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 221–230

पृष्ठ 221

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अथ श्रव्यक्तप्राणनिरूपणात्मकः पञ्चमप्रश्नः ५ ५- स्वयम्भूः - अव्यक्तम्

" स एव सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यं सनातनम् ।

ज्ञात्वा तं मृत्युमत्येति नान्यः पन्था विमुक्तये " ॥

( कैवल्योप ० १।६ | ) " ओमित्येवं ध्यायथ श्रात्मानं स्वस्ति वः पाराय तमसः परस्तात् " । ( मुण्डकोप ० २।२।६ | )

पृष्ठ 222

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करीना क

पृष्ठ 223

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श्रथ प्रश्नोपनिषदि -पञ्चमः प्रश्नः [ मूलपाठः ] अथ हैनं शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ ॥ स यो ह वै तद्भगव-न्मनुष्येषु प्रायणान्तमोङ्कारमभिध्यायीत ॥ कतमं वाव स तेन लोकं जयतीति ॥१ ॥

तस्मै स होवाच एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोंकारस्तस्माद्वि-द्वानेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति ॥२ ॥

स यद्येकमात्रमभिध्यायीत स तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्यामभिसंपद्यते ॥ तमृचो मनुष्यलोकमुपनयन्ते स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संपन्नो महिमानमनु-भवति ॥ ३ ॥

श्रथ यदि द्विमात्रेरण मनसि संपद्यते सोऽन्तरिक्षं यजुभिरुनीयते सोम-लोकम् ॥ स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते ॥४ ॥

यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये संपन्नः ॥ यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीवधनात्परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते ॥ तदेतौ श्लोकौ भवतः ॥ ५ ॥

तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता अन्योन्यसक्ता श्रनविप्रयुक्ताः ॥ क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु सम्यक्प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः ॥६ ॥

[ २०६ ]

पृष्ठ 224

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पञ्चम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य अव्यक्तप्राणनिरूपण ऋग्भिरेतं यजुभिरन्तरिक्षं स सामभिर्यत्तत्कवयो वेदयन्ते तमोंकारेणैवा-यतनेनान्वेति विद्वान्यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परं चेति ॥७ ॥

॥ इति पञ्चमप्रश्नस्य मूलपाठः ॥ || [ २१० ।

पृष्ठ 225

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अथ श्रव्यक्तप्राणनिरूपणात्मकः पञ्चमप्रश्नः [ विज्ञानभाष्य ] रयिप्राणरूप पारमेष्ठ्य प्राण, विषणाप्राणरूप सौरप्राण, प्रज्ञाप्राणरूप चुका चान्द्र- है । प्राण एवं भूतप्राणरूप पार्थिवप्राण का क्रमश: - १, २, ३, ४ प्रश्नों में निरूपण किया जा में इसी प्राण का निरूपण अब केवल वाक्प्राणरूप स्वायम्भुव अव्यक्तप्राण शेष रह जाता है । इस प्रश्न है । और और प्राण परिच्छिन्न थे यह प्राण व्यापक है । अव्यक्तप्राणमय स्वयम्भू को इसके ही ' प्रभू लिए ' प्रजापति कहा जाता है । यही ईश्वर है । ईश्वर ही अश्वत्थरूप ' श्रोंकार ' है । इसीलिए तो । विज्ञान-' तस्य वाचकः प्रणवः ' यह कहा जाता है । अव्यक्त कहो या ओंकार कहो एक ही बात है, उपासना-काण्ड में समझने के लिए वह अव्यक्त स्वयम्भू है एवं उपासनाकाण्ड में वही ' ओम् ' है । बस किया गया है । काण्ड को लक्ष्य में रखते हुए प्रणवरूप से ही इस प्रश्न में इस अव्यक्तप्राण का निरूपण उपनिषदों में एवं गीतादि अव्यक्त स्वयम्भू ईश्वर है । इसे ' वृक्षवत् ' स्तब्ध बतलाया है । वही वृक्ष श्रोती का बड़े विस्तार स्मार्त्ती उपनिषदों में ' अश्वत्थ ' नाम से प्रसिद्ध है । यद्यपि ' कठोपनिषत् ' में हमने अश्वत्थ से निरूपण कर दिया है, तथापि प्रकरणसंगति के लिए यहाँ भी उसका उल्लेख करना आवश्यक हो से उसका जाता है । कठ में दूसरे प्रकार से अश्वत्थ का निरूपण किया था एवं यहाँ दूसरे ही प्रकार इस विषय को देखने का स्वरूप बतलाया जाता है । आशा है - विद्या - प्रेमी पाठक जरा अवधान के साथ कष्ट करेंगे ---' अश्वत्थ ' - स्वरूप के लिए पहले ' अश्व ' का स्वरूप जानना आवश्यक हो जाता है, क्योंकि प्रश्व पर रहने वाला प्राण ही ' श्रश्वे तिष्ठति'- इस व्युत्पत्ति से ' अश्वत्थ ' कहलाता है । इस अश्वत्थाधारभूत अश्व का निरूपण करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं— " सोऽकामयत । भूयसा यज्ञेन भूयो यजेयेति । सोऽश्राम्यत् । स तपोऽतप्यत तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य यशो वीर्यमुवक्रामत् । प्राणा वै यशो वीर्य्यम् । तत् प्राणे-षूत्क्रान्तेषु शरीरं श्वयितुमध्रियत । तस्य शरीर एव मन ग्रासीत् । सोऽकामयत मेध्यं म इदं स्यात् आत्मन्वी अनेन स्यामिति । ततोऽश्वः समभवत् । यदश्वत्तन्मे-ध्यमभूदिति तदेवाश्वमेधस्याश्वमेधत्वम् । एष ह वा अश्वमेधं वेद य एनमेवं [ २११ ]

पृष्ठ 226

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पञ्चम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य श्रव्यक्तप्राणनिरूपण वेद । एष ह वा श्रश्वमेधो य एष तपति । तस्य संवत्सर श्रात्मा । अयम-निरर्कः । तस्येमे लोका ग्रात्मानः । तावेतावर्काश्वमेधौ । सो पुनरेकैव देवता भवति । मृत्युरेवाप पुनर्मृत्युं जयति, नैनं मृत्युराप्नोति । मृत्युरस्यात्मा भवति । एतासां देवतानामेको भवति " ॥ ' प्रजापति ने अश्व उत्पन्न किया । वह अश्व मृत्युरूप हुआ । जो अश्वालम्भन द्वारा अश्वमेघ कर लेता है - वह अश्वरूप मृत्यु को अपने अधिकार में करता हुआ अमृतभाव को प्राप्त हो जाता है - श्रुति का यही तात्पर्यार्थ है । वह प्रजापति कौनसा है जिसके लिए- ' भूयसा यज्ञेन भूयो यजेय ' कहा? उत्तर हैं- परमेष्ठी प्रजापति । स्वयम्भू के नीचे परमेष्ठिमण्डल है । परमेष्ठी भृगु अंगिरा आपोमय है । आपोमय परमेष्ठी में तेज और स्नेह दो तत्त्व हैं । मृगु स्नेहतत्त्व है - इसे हम ' सोम ' कह सकते हैं । अंगिरा तेजस्-तत्त्व है - इसे हम अग्नि कह सकते हैं । ये ही दोनों सुप्रसिद्ध रयि और प्राण हैं । दोनों के समन्वय का नाम ही ' यज्ञ ' है । यज्ञ का पहला रूप यही है । परमेष्ठी से ऊपर स्वयम्भू में यज्ञ का अभाव है । यज्ञ नाम है - दो वस्तुओंों के रासायनिक मेल का । स्वयम्भू ऋषिप्राणमय है । ऋषिप्राण सर्वथा असंग है, अतएव दोनों का समन्वय नहीं होता, अतएव ऋषि - सृष्टि को ' भावसृष्टि ' कहा जाता है । स्वयम्भू प्रजापति की कामना से परमेष्ठीरूप यज्ञ उत्पन्न होता है । परमेष्ठी स्नेहतत्त्व के कारण यज्ञमय हो जाता है । यज्ञों में सबसे बडा यज्ञ रयिप्राणात्मक पारमेष्ठ्ययज्ञ ही है । इस पारमेष्ठ्ययज्ञ के उदर में सौर, चान्द्र, पार्थिवादि अवान्तर सारे यज्ञ होते रहते हैं, अतएव हम इस पारमेष्ठ्य प्राजापत्य यज्ञ को अवश्य ही भूयान् ' यज्ञ कहने के लिए तय्यार हैं । इसीलिए तो आत्मप्रकरण में पारमेष्ठ्यांशभूत आत्मा ' महान् ' कहलाता है । परमेष्ठिमण्डल यज्ञरूप है । यह यज्ञ ' भूयान् ' है । केन्द्रस्थ षोडशी प्रजापति प्रजापति है । आत्मा - विश्व प्रभिन्न होते हैं । पारमेष्ठ्य आत्मा का परमेष्ठियज्ञ विश्व है, अतएव ' सोऽकामयत ' इसके ' स ' से हम ' परमेष्ठी प्रजापति ' का ग्रहण कर सकते हैं । वह प्रापोमय परमेष्ठिप्रजापति कामना करता है कि मैं अपने इस परमेष्ठीरूप ' भूयान् यज्ञ ' से और यज्ञ करूँ ( एवं यज्ञ द्वारा आगे की सृष्टि उत्पन्न करूँ ) । मनः प्राण वाक् ये सृष्टि के साधारण अनुबन्ध हैं- आत्मा के ( अव्यय के ) सृष्टिसाक्षी ये ही तीन हैं, अतएव विना इन तीन के व्यापार के कोई भी सृष्टि नहीं हो सकती । इनमें मनोव्यापार कामना है । प्राणव्यापार तप है । वाग् व्यापार श्रम है । कामना, तप, श्रम के अनन्तर नई वस्तु का प्रादुर्भाव होता है । ये ही तीनों व्यापार उसमें हुए । इस कामनामय तप से होने वाले श्रम से परमेष्ठिप्रजापति श्रान्त हो गए एवं श्रान्त होते ही उससे यशोवीर्य्य निकल गया । प्राण का ही नाम यशोवीर्य है । वही निकल गया - यथार्थ है । हम यदि किसी नई वस्तु को उत्पन्न करना चाहते है तो उसमें भी यही है । पहले इच्छा होती है, अनन्तर तदनुकूल प्रान्तर व्यापार ( यत्न- चेष्टा ) करते हैं । अनन्तर श्रम ( बहिर्व्यापार ) करते है | बहुत श्रम करने से हमारी प्राणमात्रा निकल जाती है । ' यश ' वह तत्त्व है जिसके रहने से आत्मा १ - बृहदा ० उप ० ११२।६-७ । [ २१२ ]

पृष्ठ 227

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पंचम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य अव्यक्तप्राणनिरूपण विकसित रहता है । वह यश वही प्राण है । शरीर में मन उक्थ है । प्राण अर्क है । जब तक प्राण ( दम ) रहते हैं, तभी तक आत्मा विकसित है । अधिक परिश्रम से प्राण निकल जाता है । उसी समय आत्मा का विकास बन्द हो जाता है । शरीर के अंग - प्रत्यंग शिथिल हो जाते हैं । यही बात वहाँ होती है- क्योंकि वह भी तो मनःप्राणवाङ्मय ही है । उसमें व्यापार होता है । उस व्यापार से प्राणभाग उसके मनोरूप उक्थ से निकल जाता है । हमारा शरीर कामनामय है । कामना मन का व्यापार है । हम ( हमारा शरीर ) मनोमय हैं । इसी अभिप्राय से ' काममय एवायं पुरुषः ' - यह कहा जाता है । अस्तु, कहना यही है कि प्राण के निकल जाने पर प्रजापति का शरीर सूज गया । उसमें सर्वत्र शोथ आ गया । इस शोथ के आने से उसमें एक प्रकार की सड़ान भी पैदा हो गई । इसी सड़ान से वह भाग वरुण कहलाने लग गया एवं यही असुरसृष्टि हुई । ' यद्वै वातो नाभिवाति तत् सर्वं वरुणदेवत्यम् ' - के अनुसार जहाँ वायु का सम्बन्ध नहीं होता वहाँ वरुणदेवता का प्रवेश हो जाता है । वरुण पारमेष्ठ्य आपोमय देवता है । वायु में इन्द्र रहता है । वायु में एक चौथाई भाग विद्युत् ( बिजली ) रहती है वही इन्द्र है । इन्द्र देवप्राण है । वरुण आसुरप्राण है । दोनों में घोर विरोध है । आप्यप्राणप्रधान वरुण, प्रकाशीप्राणप्रधान इन्द्र दोनों एक साथ नहीं रह सकते, अतएव जहाँ वायु रहता है, वहाँ वरुणशक्ति अभिभूत हो जाती है एवं जहाँ वायु नहीं रहता, वहाँ वरुण घुस पड़ता है । वरुण सड़ान कर देता है, क्योंकि वह आप्यप्राणमय है । पावनधर्म्म सौरप्राणरूप इन्द्र का है । इसीलिए तो इसके लिए ' उत्पुनाम्यच्छिद्र र पवित्रेरण ' यह कहा जाता है । यही कारण है कि बन्द मकान, बन्द पानी, बन्द अन्नादि सब सड़ने लगते हैं, क्योंकि वायु के न रहने से इन्द्र की अनुपस्थिति में वहाँ वरुण अपना साम्राज्य जमा लेते हैं । एक दधिपात्र को आप बन्द कमरे में रख दीजिए । थोड़े समय बाद वह फूल जाएगा । उसमें शोथ या जाएगा । सब और फफूंदन छा जाएगी एवं वह सड़ने लगेगा | क्यों? वायव्यप्राण का अभाव । बन्द होने से वायव्यप्राण निकल गया । प्राण के निकलते ही वह दधिशरीर सूज गया सड़ गया । मनुष्यों में भी ऐसा ही होता है । जब तक मनुष्य में प्राण रहते हैं, तब तक शरीरगत वरुणभाग ( प्रापोभाग ) अपना अधिकार नहीं जमाने पाता । परन्तु जिस दिन प्राण निकल जाते हैं, उस दिन वरुणदेवता उल्बण हो पड़ते हैं, अतएव शव ( प्राणरहितशरीर ) फूल जाता है एवं उसमें बुरा गन्ध आने लगता है । अन्तर्य्यामसम्बन्ध से प्रविष्ट पावनप्राण ने इसे पावन बना रखा था वह निकल गया, अतएव यह सूजने एवं सड़ने लग गया । श्रपि च - मनुष्य में जीवितदशा में जो शोथ हो जाता है - उसका कारण भी यही है । प्राणमात्रा की कमी से वरुण की कृपा से ही शोथ होता है । उसका कारण भी है । प्राणमात्रा की कमी से वरुण की कृपा से ही शोथ होता है । गठिया, सूजन, जुकाम आदि रोग - वारुण रोग हैं । शीत में प्राणाग्नि निर्बल रहता है । है । बरसात में भी निर्बल रहता है । अतः ये बीमारियाँ इन्हीं दिनों में अधिक आक्रमण करती हैं । सड़ान आत्मविरोधी है, अतएव हम इसे असुर कहने के लिए तय्यार हैं । यह आसुरभाग वारुण है । वरुण पारमेष्ठ्य प्राण है, अतएव असुरसृष्टि वारुणी ' पारमेष्ठिनी ' नाम से प्रसिद्ध है । परमेष्ठी के भृगुप्रापोभाग से असुरसृष्टि होती है । इनका विकास वहीं हो जाता है एवं अंगिरा से देवसृष्टि होती है । दोनों प्रजापति की सन्तान होने से ' प्राजापत्य ' नाम से प्रसिद्ध हैं । परन्तु [ २१३ ]

पृष्ठ 228

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पंचम प्र न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य अव्यक्तप्राणनिरूपण देवप्राण का विकास सूर्य्य में होता है, अतएव असुरों को ज्येष्ठपुत्र माना जाता है एवं देवताओं को कनिष्ठपुत्र माना जाता है । प्राण के निकल जाने से शरीर सूज जाता है । शरीर आपोमय है । इसीलिए जो ' पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति " - यह कहा जाता है । पानी विकासधर्मा है । यह वस्तु को फुला देता है । आटे में पानी डाल दिया जाता है तो वह फूल जाता है । उदाहरण के लिए - घटसृष्टि को ही लीजिए । कुम्हार अनुष्णाशीतरूप मिट्टी में पानी डालता है । उसी समय पार्थिव परमाणु • शोथभाव को प्राप्त हो जाते हैं । कारण इसका यही है कि पार्थिव परमाणुओं के बीच - बीच में जलीय परमाणु व्याप्त हो जाते । घड़ा जब बन जाता है तो उसे रख दिया जाता है । अनन्तर वह जलभाग शिववायुरूप में ( भार्गववायुरूप में ) परिणत हो जाता है । जब तक घड़ा सूखता नहीं तब तक उसमें जल है । सूखने पर जलीय वायु है । अनन्तर अग्निसम्बन्ध से आग्नेय वायु उस जलीय वायु पर आक्रान्त हो अन्तर्य्यामसम्बन्ध से उसमें व्याप्त हो जाता है । अग्निसम्बन्ध होते ही जलीय परमाणु - तद्गत पार्थिव परमाणु अलग - अलग होते हैं । अनन्तर उस स्थान में विधरणधर्मा प्राणाग्नि उनका पुनःविधरण करता है, अतएव परिपाकावस्था में दार्शनिक घटध्वंस मानते हैं । पूर्व घटविनाश ही घट के परिपाक का कारण है । मृत्तिका में जो पानी था, वह वारुणभाग था । वही रौद्रवायुसम्बन्ध से आग्नेय बन जाता है । वारुणभाग पारमेष्ठ्य है । रौद्रभाग सौर है । दोनों के समन्वय से एक विजातीय अबग्निरूप योगजप्राण उत्पन्न होता है । बस, इसी का नाम ' अश्व ' है - जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट हो जाएगा । इस प्रपञ्च से अभी केवल यही बतलाना है कि पारमेष्ठ्य भृगुभाग शरीरस्थानीय है । भृगु सोम है । मन सोममय है, अतएव श्रुति ने इसे ' मनः ' कहा है । इस भृगु से वह अंगिराभाग अलग हो जाता है । अंगिरा ही प्राण है । प्रथम प्रश्न के रयि प्राण ही यहाँ के मन - प्राण हैं । मनसोम भृगु है । प्राणअग्नि अंगिरा है । वह अलग हो जाता है तो शुद्ध वारुणभाग रह जाता है । विना प्राणसम्बन्ध के वह विकास को प्राप्त होता है सड़ानयुक्त हो जाता है । प्राण के निकल जाने पर भी मन तो रहता ही है । हमारी प्राणमात्रा खर्च हो जाती है । परन्तु मन रह जाता है । वही प्राणभाग अलग निकलकर आदित्यरूप ( सूर्य्य ) में परिणत होता है । वारुणभाग परमेष्ठी है - यह शरीर है - मन है । इसका प्राण सूर्य्य है । वह उक्थ था यह अर्क है । प्राणरूप सूर्य्यं अंगिराग्निरूप है । इसीलिए-' प्राणो वा अंगिरा: ३ - यह कहा जाता है । यह उसी परमेष्ठी प्रजापति का यशोवीर्य्य है, अतएव सूर्य्य के लिए- ' यशो हिरण्यम् ' 3 ' यशोदेवाः ४ - इत्यादि कहा जाता है एवं वह रयिभाग पोषयुक्त है । फूला हुआ है, अतएव उसके लिए ' पुष्ट नै रयिः ५ - कहा जाता है । वही रयि ( सोम ) वीर्य्य बनता १- छान्दोग्योप ० ५।६।१ । ३ - ऐ ० ब्रा ० ७।१८ । ५ - शत ० ब्रा ० २।३।४।१३ । २ - शत ० ब्रा ० ६।१।२।२६ । ४- शत ० ब्रा ० २।१।४।६ | [ २१४ ]

पृष्ठ 229

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पंचम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य अव्यक्तप्राणनिरूपणं हैं । वही अन्न बनता है । अन्न मोग्य होने से ' पशु ' कहलाता है, श्रतएव ' वीयं वै रयिः " ' पशवो वै रयिः २ - यह कहा जाता है । प्रजापति के भूयसा यज्ञ से उत्पन्न होने वाला यही प्राणात्मक सूर्य्यं यज्ञ है । प्राण अर्क है । यह उसी का अर्क है, अतएव इसके लिए ' प्रर्कश्चक्षुः । तदसौ सूर्य: ' 3 - यह कहा जाता है । जब तक यह प्राण परमेष्ठी में रहता है- परमेष्ठी शरीर के भीतर रहता है तब तक यह आपोरूप ही है । इसीलिए - ' प्रापो भृग्वङ्गिरोरूपम् ' - इत्यादि गोपथ श्रुतिवचन भृगुवत् अंगिरा को भी आपः ही बतलाते हैं । आपः वरुण है । इससे सिद्ध हो जाता है कि परमेष्ठिगर्भित प्राण ( अंगिरा ) आपोरूप होने से वरुण ही है । इसीलिए- ' स वा एष ( सूर्य्यः ) अपः प्रविश्य वरुणो भवति ' ' यह कहा जाता है । यह अंगिरा सूर्य - आदित्य, वायु, अग्नि - इन तीन कलाओं में परिणत होता है । आदित्य सूर्य्यं है । वायु अन्तरिक्ष है । अग्नि पृथिवी है । पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौरूप रोदसी अंगिरामयी है - प्राणमयी है । यही मर्त्य विश्व है । इसका आत्मा वही परमेष्ठी है । आत्मा - विश्व की समष्टि ' श्रात्मन्वी ' कहा जाता है । प्रजापति ने अपने अंगिरारूप प्राण से काम - तप- श्रम द्वारा सूर्य्य - वायु - प्रग्निरूप त्रैलोक्यात्मक विश्वयज्ञ उत्पन्न किया । ' भूयान् ' यज्ञ से यह त्रैलोक्यरूप ' भूयान् ' ही यज्ञ उत्पन्न हुआ । उत्पन्न होकर वह इससे युक्त हो- ' आत्मन्वी ' बन गया । जो वारुण भाग इस सौरभाग से मिला, वही ' अश्व ' हुआ । प्रजापति वरुण था । उसकी आपोमयी रश्मि उसकी आँख है । वह भाग सौर अग्नि से युक्त होता है । बस, जो वारुणभाग रश्मिरूप से प्रवर्ग्य बनकर सौर अग्नि में आमिलता है वही ' अश्व ' कहलाता है । सोरा-ग्निगर्भित वारुणभाग ही ' अश्व ' है । दोनों की योगजावस्था ही ' अश्व ' है । इसीलिए ' प्रजापते ( वरुण-प्रजापते ) रक्ष्यश्वयत् - तदश्वोऽभवत् ' - यह कहा जाता है । अश्व का आत्मा वरुण है - इसी सारे विज्ञान को लक्ष्य में रखते हुए निम्नलिखित श्रुतिवचन हमारे सामने आते हैं—

१ - " प्रजापतेरक्ष्यश्वयत् । तत् परापतत् । तदश्वोऽभवत् " ॥

२ - " वरुणो ह वै सोमस्य राज्ञोऽभीवाक्षि प्रतिपिपेष । तदश्वयत् ततोऽश्वः समभवत् । तद् - यत्- श्वयथात् समभवत् तस्मादश्वो नाम " । ' ३ - " अथ यदश्रु संक्षरितमासीत् सोऽश्रुरभवत् । श्रश्रुर्ह वै तमश्व इत्याचक्षते परोऽक्षं । परोऽक्षकामा हि देवाः " । " ४- " अप्सुजा उ वा अश्वः " 15 १- शत ० ब्रा ० १३।४।२।१३ । ३- तैत्ति ० ब्रा ० १।१।७।२ । ५- तै ० ब्रा ० १।१।५।४ । ७- शत ० ब्रा ० ६।१।१।११ । २- तै ० ब्रा ० १।४।४।६ । ४ - कौ ० ब्रा ० १८।६ । ६- शत ० ब्रा ०४।२।१।११ । ८- शत ० ब्रा ० ७।५।२।१८ । [ ११५ ]

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पंचम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य ५- " अप्सुयोनिर्वा श्रश्वः ” । ' ६- " अद्द्भ्यो ह वा अग्रे श्रश्वः सम्बभूव " । " ७- " वारुरणो हि देवतयाऽश्वः " 13 श्रव्यक्तप्राणनिरूपण अश्व की योनि पानी अवश्य है, परन्तु इसका स्वरूप सौर अग्नि से मिलने पर ही बनता है । अश्व में वारुण पानी और सौर तेज दोनों हैं । इसीलिए पूर्वश्रुतिएँ जहाँ अश्व को प्रापोमय एवं वारुण बतलाती हैं - वहाँ निम्नलिखित श्रुतिएँ उसे सौर बतलाती हैं-१- " सौर्यो वा श्रश्वः "१४ २ - " अग्निरेष यदश्वः " ५ ३- ' अथ योऽसौ तपति एषोऽश्वः " । " ४- " असो वा आदित्योऽश्वः " । " ५ - " इन्द्रो वा प्रश्वः " । " ६- " ते ( देवाः ) अश्वं श्वेतं दक्षिणां निन्युरेतमेव य एष तपति-इत्यादि " । प्रजापति से अश्व उत्पन्न हुआ । विना अश्व के ( प्राण के ) वह अमेध्य था । आज इससे युक्त होकर वही वारुण प्रजापति मेध्य हो गया । सोरतापयुक्त पानी पवित्र एवं मेध्य हो जाता है । तात्पय्यं यही है कि सूर्य्य अश्व है । इसमें आया हुआ वारुणभाग मेध्य है, अतएव सूर्य को किंवा सौय्यं अश्व को ' अश्वमेध ' कहा जाता है । इस अश्वमेवरूप सूय्यं का संवत्सरमण्डल आत्मा है । पार्थिव अग्नि अर्क है । तीनों लोकों में यह अश्वमेधरूप अश्व खड़ा है । पार्थिव अग्नि अर्क है । सौर वारुणाग्नि १- ते ० ब्रा ० ३।८।४।३ । ३- तै ० ब्रा ० १।७।२।६ । ५- शत ० ब्रा ० ६।३।३।२२ । ७- तै ० ब्रा ० ३।६।२३।२ । ६ - को ० ब्रा ० ३०।६ । २- शत ० ब्रा ० ५ १।४।५ । ४- गोपथ ब्रा ० उ ० ३।१६ । ६- ऐ ० ब्रा ० ६।३५ । ८- कौ ० ब्रा ० १५।४ । १० - इसी वारुणभाग के कारण सूर्य्यं के लिए- ' त्वं वरुण पश्यसि - यह कहा जाता है । [ २१६ ]