प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 231–240

प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 231–240

पृष्ठ 231

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 231 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पंचम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माध्य अव्यक्तप्राणनिरूपण श्रश्वमेध है । अकं अश्वमेध की समष्टि ही ' अर्काश्वमेध ' है । बृहदारण्यक ने प्रारम्भ में इसी का ' उषा वा श्रश्वस्य मेध्यस्थ शिरः - इत्यादिरूप से बड़े विस्तार के साथ निरूपण किया है । यह अर्का श्वमेध क्या है? इसका उत्तर है- ' मृत्यु ' । सूर्य्याश्व साक्षात् मृत्यु है । सूर्य्य का अधोमण्डल मृत्यु है । ऊपर अमृत है । इस मृत्युमय सौरमण्डल के पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौः - तीन खण्ड हैं । इन्हीं के लिए ' तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ताः ' - यह कहा जाता है । जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट हो जाएगा । सारे प्रपञ्च का निष्कर्ष यही हुआ कि जो वारुणभाग सौरतेज से संसक्त हो जाता है - वही ' अश्व ' है । इसका मूल परमेष्ठी है । तुल ( विकासरूप ) सौरमण्डल है । परमेष्ठी महान् और स्वयम्भू अव्यक्त - दोनों को अभिन्न माना जाता है । दोनों ' परमेष्ठी ' शब्द से गृहीत होते हैं । ऐसी अवस्था में सौरमण्डल में विकासभाव को प्राप्त होने वाले इस अश्व की सारे विश्व में सत्ता सिद्ध हो जाती है । वरुणभाग परार्ध्यं है । सौरभाग अवराध्यं है । दोनों की समष्टि विश्व है । सारा विश्वयज्ञ ' अश्व ' रूप है । सौर अश्वप्राण जिस पशु का आत्मा बनता है वह भी पशुओंों में ' अश्वपशु ' कहलाता है । इस विश्वात्मक दिव्याश्व पर रहने वाला जो तत्त्व है वही ' अश्वस्थ ' कहलाता है । वह तत्त्व और कोई नहीं - वही षोडशी आत्मा है । षोडशी का अव्ययभाग अपनी परापर प्रकृतियों से युक्त होकर सम्पूर्ण विश्व में प्रतिष्ठित हो रहा है, अतएव इसे ' अश्वत्थ ' कहा जाता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर - ' ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ' - यह कहा जाता । ' अश्वाधारे तिष्ठन्-अव्ययः - अश्वत्थ: ' - ' अश्वत्थ ' शब्द का यही निर्वचन है । इस अश्वत्थवृक्ष के मूल, मध्य, अन्त- तीन भाग हैं । स्वयम्भू - परमेष्ठी मूलभाग है, सूर्य्यं मध्यभाग है । इसीलिए इसके लिए ' बृहद्ध तस्थौ भुवनेष्वन्तः'-यह कहा जाता है एवं अन्तरिक्ष, चन्द्रमा पृथिवी - अन्तभाग हैं । ऊपर का मूलभाग है । मूलभाग जड़ ( ऊर्ध्व ) में है, अतः वह हमें नहीं दिखलाई देता । मध्य का सूर्य्य उसकी शाखा प्रशाखा हैं । दृष्टप्रपञ्च है, अत: इसे हम देख रहे हैं एवं नीचे का प्रपञ्च फलपुष्प हैं । मत्यंप्रपञ्च फलपुष्प हैं । वे टूट - टूट कर गिरते रहते हैं - परिवर्तनशील हैं । सूर्य्यं स्कन्ध है । ऊपर का भाग मूल है । मूलभाग सुसूक्ष्म होने से ' अ ' है । मध्य का स्थूलसूक्ष्म होने से ' उ ' है । अन्त का स्थूल होने से ' म् ' है । तीनों की समष्टि परम श्रोंकार है । यही ' अश्वत्थ ' है । इसी का निरूपण करता हुआ पुराण - शास्त्र कहता है-" अकारमूलरूपाय उकारस्कन्धशालिने । मकार फलपुष्पाय वृक्षराजायते नमः ” ॥ १- स्वयम्भू - परमेष्ठी= अ २- सूर्य्य = उ ३ - पृथिवी चन्द्रमा म् → ' ओम् ' ' अश्वत्थवृक्षः ' [ २१७ ]

पृष्ठ 232

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 232 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पंचम प्रश्न १ - ऋग्वेद मं ० १०।६७।१ । ३ - ऋग्वेद मं ० १०।६७।१६ । अव्यक्तप्राणनिरूपण प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य २ - ऋग्वेद मं ० १०६७।५ । [ २१८ ] • वृक्ष का नाम अश्वत्थ क्यों है? अश्वत्थ के वृक्ष में विष्णु का निवास क्यों माना जाता है? सनातनधर्मीजगत् क्यों इस जड़वृक्ष की पूजा कर अपने को धन्य मानता है? इत्यादि प्रश्नों का समाधान ' कठोपनिषत् ' के अश्वत्थप्रकरण में किया जा चुका है । अश्वत्थ का निरूपण हो चुका । अब प्रासङ्गिक प्रौषधिविज्ञान का दो चार अक्षरों में निरूपण कर प्रकृत का अनुसरण करते हैं । ' औषधि ' की सत्ता परमेष्ठिमण्डल में है । अश्वत्थ नाम है अव्यय का जैसा कि पूर्व में बतलाया जा चुका है । यद्यपि इस अश्वत्थाव्यय की सत्ता सारे विश्व में ( सातों लोकों में ) है, तथापि इसका उल्बणरूप सूर्य्य से ऊपर ही रहता है । नीचे मर्त्यभाग की प्रधानता रहने से उसका स्वरूप श्रभिभूत हो जाता है । महदक्षररूप सूर्य्यं के ऊपर का अश्वत्थ स्वस्वरूप से उल्बण रहता है, अतएव नीचे के भाग को अश्वत्थ न कहकर ऊपर के पारमेष्ठ्य भाग को ही प्रधानता दी जाती है । परमेष्ठिमण्डल के इडा, ऊ, गौ - तीन मनोता हैं । तीनों में ' गौ ' हजार हैं । संसारभर के पदार्थमात्र इसी से उत्पन्न होते हैं । यह गौतत्त्व क्या है? इसका स्पष्टीकरण आगे जाकर हो जाएगा । यहाँ पर केवल यही समझ लेना पर्याप्त होगा कि परमेष्ठी में ब्रह्मणस्पति नाम का सोम है । यह सोम ही औषधि है । अश्वत्थवृक्ष में ही इस औषधिप्राण की सत्ता है । श्रोषधि गो सोमरूप है । इससे हजार रस उत्पन्न होते हैं । वही संसार का स्वरूप बनाए हुए हैं । भिन्न - भिन्न औषधियों में भिन्न - भिन्न गौरस हैं । वह रसगर्भित सोम ही हमारा जीवन है । इस प्रकार पारमेष्ठ्य वारुण अश्वत्थ पर ही गोमय ब्रह्मणस्पतिरूप औषधिप्राण प्रतिष्ठित रहता है । इसी औषधिविज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है-" या श्रोषधीः पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा । मनै नु बभ्रूणामहं शतं धामानि सप्त च ॥ १ ॥ '

अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता । गोभाज इत् किलासथ यत् सनवथ पूरुषम् ॥२ ॥ `

या श्रोषधीः सोमराज्ञीविष्ठिताः पृथिवीमनु ॥ बृहस्पतिप्रसूता अस्यै सं दत्त वीर्यम् " ॥३ ॥

- इस सूक्त में इसी औषधि का स्वरूप प्रतिपादित है । सूय्यं के ऊपर बृहस्पति है । उसी से प्रसूत होकर वह औषधिप्राण हमारे लोक में आकर भूतसंपरिष्वक्त होकर स्थूलरूप धारण करता हुआ मनुष्यों में रहने वाले आग्नेय वैश्वानरपुरुष की परिचर्य्या ( रक्षा ) करता है । इसकी प्रतिष्ठा वही अश्वत्थपत्र है । यह पत्र वही है जिसका गायत्री ने अपहरण किया था । वह पत्र और कोई नहीं - वही सोम है । वह सौर ऊष्मा को धारण करता हुआ ही भूमण्डल पर आता है, अतएव श्रोषं धत्ते ' इस

पृष्ठ 233

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 233 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य पंचम प्रश्न पुरुषापेक्षया ब्रह्मसत्यापेक्षया प्रकृत्यपेक्षया वाङ्मयः १ - स्वयम्भू २- परमेष्ठी प्राणमयः आपोमयः प्राणवाङ्मयः ' मनः प्राणवाङ्मयः ३ - सूर्य्यं वाङ्मयः [ २१ ९ ] श्रव्यक्तप्राणनिरूपण लोकापेक्षया वाग्लोकः प्राणलोकः प्राण वाग्लोकः अपोलोकः= वाक्लोकः मनः प्राण वाग्लोकः = व्युत्पत्ति से वह ब्राह्मणस्पत्य सोमात्मक प्राण ' औषधी ' नाम से प्रसिद्ध है । इस सारे प्रपञ्च से बतलाना हमें यही है कि विश्व श्रश्व है । इस पर प्रतिष्ठित पुरुष अश्वत्थ है । अश्व ( विश्व ) विशिष्ट षोडशी ही प्रजापति है - यही ईश्वर है । इसके ' अ उ म् ' तीन भाग है । प्रणव ही इसका स्वरूप-परिचायक है । इस प्रणवस्वरूप को यथावत् समझने के लिए निम्नलिखित प्रकरण को ध्यान में रखना आवश्यक होगा । सृष्टि का प्रधानमूल ' वाक् ' तत्त्व है । वाक् मनः प्राणगभिता है । मनःप्राणगभिता वाक् ही सृष्टिसाक्षिणी है । मन काममय है । प्राण तपोमय है । वाक् श्रममयी है । यही कारण है कि सृष्टि-निरूपण करने वाली यच्चयावत् श्रुतियों के उपक्रम में ' सोऽकामयत, स तपोऽतप्यत, सोऽश्राम्यत् ' - यह उल्लिखित रहता है । षोडशी प्रजापति का आधार इसी का पञ्चकल अव्यय है । वह पञ्चकोशरूप है । इन पाँचों कोशों का निरूपण ' तैत्तिरीयोपनिषत् ' में किया जाएगा । श्रानन्द सर्वान्तरतम है । विज्ञान ऊपर है । यह मन उसके ऊपर है । प्राण उसके ऊपर है । वाक् सर्वोपरि है । इसमें आनन्द-विज्ञान - मन मुक्तिसाक्षी हैं । सृष्टि में इनका गौणरूप से सहकारीरूप से समावेश है एवं मन - प्राण-वाक् सृष्टिसाक्षी हैं । ये सृष्टि में प्रधान हैं । आत्मक्षर की ' प्राण, आपः, वाक्, अन्न, अन्नाद ' - ये पाँच कला हैं । इन पाँचों कलाओं के पञ्चीकरण से क्रमशः प्राणमय स्वयम्भू, श्रापोमय परमेष्ठी, वाङ्मय सूर्य, अन्नमय चन्द्रमा, अन्नादमयी पृथिवी - ये पाँच पिण्ड उत्पन्न होते हैं । इन पाँचों की समष्टि को ही हमने पूर्व के उपनिषदों में ' ब्रह्मसत्य ' कहा है । ये ही पांचों ' प्राकृतात्मा ' नाम से प्रसिद्ध हैं । इन पांचों प्राकृत सृष्टियों का मूल वही अव्यय का मनप्राणवाक्माग है । यद्यपि पाँचों में तीनों हैं- तथापि इन तीनों का पूर्णविकास केवल सूर्य्यं में ही होता है । क्योंकि सूर्य्यं चितिरूप है- जैसा कि ' ईशोप-निषत् ' में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । सूर्य्य में मन, प्राण, वाक् - तीनों विकसित हैं । पर-मेष्ठी में प्राण, वाक् दो भागों का विकास है । स्वयम्भू में केवल वाक् का विकास है । सूर्य्य से नीचे चान्द्र अन्तरिक्ष में प्राण - वाक् दो का विकास है । पृथिवी में केवल वाक् है । इस प्रकार पाँचों में क्रमशः वाक् वाक्प्राण, वाक् - प्राण - मन, वाक्प्राण, वाक् - यह व्यवस्था हो जाती है । इस प्रकार जो स्वयम्भू प्रकृति की अपेक्षा से प्राणरूप है, वही इस पुरुष ( अव्यय ) के वाक्माग की अपेक्षा से वाक्रूप है । परमेष्ठी प्रकृत्यपेक्षया श्रापोरूप है । पुरुषापेक्षया वाक्प्राणरूप है । सूर्य्यं प्रकृत्यपेक्षया वाक्रूप है, पुरुषापेक्षया मनःप्राणवाक्रूप है । चान्द्रान्तरिक्ष प्रकृत्यपेक्षया अन्नरूप है । पुरुषापेक्षया वाक्प्राण रूप है एवं पृथिवी प्रकृत्यपेक्षया अन्नादमयी है । पुरुषापेक्षया वाङ्मयी है ।

पृष्ठ 234

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 234 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पवन प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य अव्यक्तप्राणनिरूपण ४- चान्द्रान्तरिक्ष अन्नमयः प्राणवाङ्मयः अन्नलोकः = प्राण वाग्लोकः अन्नादमयः वाङ्मयः ५- पृथिवी अन्नादलोकः = वाग्लोकः इस प्रकरण से यह भी सिद्ध हो जाता है कि वागभाग पाँचों स्थानों पर है । इसी अभिप्राय से ‘ अथो वागेवेदं सर्वम्’- यह कहा जाता है । स्वयम्भू ब्रह्मा भी वाक् है । इसलिए- ' वाग् वै ब्रह्म'- यह कहा जाता है । परमेष्ठी विष्णु भी वाङ्मय है- इसलिए- ' वाग् वै विष्णु: - यह कहा जाता है । सूर्य्य भी वाङ्मय है - इसलिए- ' वागिन्द्र: - यह कहा जाता है । चान्द्रान्तरिक्ष भी वाङ्मय है-इसलिए- ' सोमो वै वाक् ' यह कहा जाता है एवं अग्नि भी वाक् है, अतएव ' तस्य वा एतस्याग्नेर्वागे-वोपनिषत् ' - ' वाग् वा अग्निः ' इत्यादि कहा जाता है । इस प्रकार इस वाग्विज्ञान को समझने के अनन्तर सारे विरोध हट जाते हैं । इन सबमें स्वयम्भू की वाक् सर्वमूलभूता है । यह वाक् सत्यावाक् नाम से प्रसिद्ध है । वेद सत्य है । तद्रूपा होने से ही यह वेदमयी नाम से प्रसिद्ध है । पारमेष्ठिनी वाक् प्रापोमयी होने से - ' आम्भृणी वाक् ' - कहलाती है । ऋग्वेद के ' आम्भृणी सूक्त ' में जिस वाक् - तत्त्व का निरूपण है - वह यही पारमेष्ठिनी वाक् है । सौरी वाक् ' बृहती ' ' स्वर ' ' गौरीविता, गौरवीता ' आदि नाम से प्रसिद्ध है । चान्द्र वाक् ' सुब्रह्मण्या ' नाम से प्रसिद्ध है । पार्थिवी वाक् ' अनुष्टुप् ' नाम से प्रसिद्ध है । एक ही पुरुषवाक् भिन्न - भिन्न स्थानों में आकर भिन्न - भिन्न नामरूपकर्म्म धारण कर लेती है । ये पाँचों वाक् क्रमशः क्षर - ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, सोम, अग्नि की जननी हैं । स्वयम्भू वाक्तत्त्व की प्रतिष्ठा है । वाक्तत्त्व में ' वाक्, प्राण ' दो हैं । प्राकृतप्राण, पौरुषी वाक् दोनों मिलकर एक वाक्तत्त्व है । परमेष्ठी गौतत्त्व की जननी है । प्राकृत आप:, पौरुषप्राण और वाक्- तीनों की समुच्चित अवस्था का नाम गौतत्त्व है । गौतत्त्व का यदि विशकलन किया जाएगा तो उसमें ये तीन पदार्थं मिलेंगे । इसकी उत्पत्ति परमेष्ठी है । इसी के सम्बन्ध से पारमेष्ठ्य गोसव नाम से प्रसिद्ध पञ्चदशाह नामक स्वाराज्य यज्ञ होता है । इसी के सम्बन्ध से तत्रस्थ विष्णु गोलोकनाथ नाम से प्रसिद्ध हैं । परमेष्ठी में तीन भृगु हैं - तीन अङ्गिरा हैं एवं ऋक्, साम, यत्, जू - ये चार ब्रह्मभाग हैं । दसों के स्वरूप से गौ का स्वरूप निष्पन्न होता है । १० अक्षर के छन्द को विराट् कहते हैं, अतएव इसे ' विराट ' कहा जाता है । द्योतत्त्व सूर्य में उत्पन्न होता है । प्राकृती वाक्, पौरुष मन, प्राण, वाक्- इन चारों के मेल से द्यौतत्त्व उत्पन्न होता है । वायुतत्त्व अन्तरिक्ष में उत्पन्न होता है । प्राकृत अन्न ( सोम ), पौरुष वाक् प्राण - इन तीन के मेल से वायुतत्त्व उत्पन्न होता है एवं अग्नितत्त्व पृथिवी में उत्पन्न होता है । प्राकृत अन्नाद, पौरुषी वाक् - दोनों के मेल से अग्नितत्त्व उत्पन्न होता है । बाक् आकाश है । गौतत्त्व वायुमय श्राप: है । द्यो-तत्त्व तेज है । वायुतत्त्व पार्थिव अबाधार प्रप्तत्त्व है । अग्नितत्त्व पृथिवी है । प्राकृत- पौरुषभाग । १ - सत्या वाक्-- ( प्रारण वाक्संयोगात् वाक्तत्त्वम् ) -२ - ग्राम्भृणी वाक् – ( प्रापः - प्राणवाक्संयोगात् गौतत्त्वम् ). - श्राकाशात्मकम् - श्राकाशः । - वाय्वात्मकम् – वायुः । ३- बृहती वाक् --- - ( वाक् - मनः प्राणवाक्संयोगात् द्योतत्त्वम् ) – तेजसात्मकम् - तेजः । [ २२० ]

पृष्ठ 235

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 235 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पश्चम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य अव्यक्तप्राणनिरूपण ' सर्वम् वागेवेदं ' अथो ४- सुब्रह्मण्या वाक् – ( अन्न- प्राणवाक्रांयोगात् तत्त्वम् ) -५- अनुष्टुप् वाक् ~~ ( अन्नाद- वाक्संयोगात् अग्नितत्त्वम् ) -- जलात्मकम् - जलम् । - पृथिव्यात्मकम् - पृथिवी । १ - स्वायम्भुवी सत्यावेदमयीवाक् - क्षरब्रह्मणो जननी - ' वाग्वै ब्रह्म ' - ब्रह्मा २- पारमेष्ठिनी आम्भृणी वाक् –— क्षरविष्णोर्जननी– ' वाग्वै विष्णुः ' - विष्णुः १३- सौरी बृहतीवाक्- ----- क्षरेन्द्रस्य जननी - ' वागिन्द्रः ' इन्द्रः ४- चान्द्री सुब्रह्मण्यावाक् -क्षरसोमस्य जननी- ' सोमो वै वाक् – सोमः ५- पार्थिवी अनुष्टुप्वाक्क्षराग्नेर्जननी -- ' वागग्निः ' -- अग्निः → ' वाक् ' एक बात और वाङ्मय स्वयम्भूमण्डल वेदमय है । वेदवाक् उसी अव्ययवाक् का विकास है । वाक् यजुः है । यजुः में यत् और जू दो भाग । ये ही वाक्प्राणो हैं । इनमें प्राणव्यापार से - वाक् भाग से आपोमय परमेष्ठी का जन्म होता है । अक्षरब्रह्मा वेदवाक् को उत्पन्न कर उसके द्वारा सर्वप्रथम पानी ही उत्पन्न करते हैं । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है-" सोऽयं पुरुषः प्रजापतिरकामयत । भूयान्त्स्यां प्रजायेयेति । सोऽश्राम्यत् । स तपोऽतप्यत स श्रान्तस्तेपानो ब्रह्मव प्रथममसृजत - त्रयीमेव विद्यां सैवास्मै प्रतिष्ठाभवत् । सोऽपोऽसृजत । वाच एव लोकात् । वागेव साऽसृज्यत " । ' यह आपः वही परमेष्ठी है । इसे उत्पन्न कर त्रयीमय वह ब्रह्म इसमें प्रविष्ट हो जाता है । आपोमण्डल में प्रविष्ट वेदमय ब्रह्मा सत्यवेद के प्रभाव से उस ऋत पानी को मण्डल ( सत्य ) रूप में परिणत कर देते हैं । जहाँ तक वेदव्याप्ति होती है- वहाँ तक एक मण्डल बन जाता है । इसी अभिप्राय से श्रागे जाकर - ' सोऽनया त्रय्या विद्यया सहापः प्राविशत् । तत श्राण्डं समवर्त्तत ' २ - यह कहा जाता है । पुनश्च - इसके पेट में अग्नि उत्पन्न होता है । वही अग्नि संघातावस्था को प्राप्त होकर पिण्डरूप में परिणत हो जाता है - उसी का नाम सूर्य्य है । परमेष्ठी का अङ्गिराभाग ही वेदव्यापार से सूय्यंरूप में परिणत होता है । इसमें नया वेद उत्पन्न होता है । यही वेद उस पुरुष ब्रह्म से उत्पन्न होने के कारण ' पौरुषेय ' वेद कहलाता है । यही ' गायत्री मात्रिक ' नाम से प्रसिद्ध है । सूर्य्यं इसी पर प्रतिष्ठित है । यह सूर्य रोदसी ब्रह्माण्ड में सबसे पहले उत्पन्न होता है, अतएव इसे ' अग्नि ' कहा जाता है । परोक्षप्रियदेवता ' अग्रि ' को ही ' अग्नि ' कहते हैं । स्वयम्भू वेद भी अग्नि ही था, परन्तु वह ब्रह्माग्नि था एवं अपौरुषेय-१- शत ० ब्रा ० ६।१।११८६ | २- शत ० ब्रा ० ६।१।१।१० । [ २२१ ]

पृष्ठ 236

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 236 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पश्चम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य अव्यक्तप्राणनिरूपण भावापन्न था एवं यह देवाग्नि है एवं पौरुषेय वेद है । इसके बाद सौर अग्नि के परस्पर के घर्षण से मरीचिपानी उत्पन्न हुआ । जैसे पारमेष्ठ्य पानी ' अम्मः ' नाम से प्रसिद्ध है- एवमेव यह पानी ऐतरेयादि में ' मरीचि ' नाम से प्रसिद्ध । इसी मरीचिपानी से त्रैलोक्यरूप द्यावापृथिव्यात्मक कूर्म्मप्रजापति का जन्म होता । कूर्म्म ही कश्यप है । इसकी उत्पत्ति मरीचिपानी से है, अतएव इसके लिए- ' कश्यपो वै मारीच: ' - यह कहा जाता है । इस कूर्म्मरूप मरीचिपानी से आगे जाकर आपः, फेन, उषा, सिकता, शर्करा, अश्मा, अयस्, हिरण्यरूप भू - पिण्ड का जन्म होता है । यह है क्रमिक सृष्टिधारा । आकाशरूप स्वयम्भू से वायुरूप पारमेष्ठ्य अम्भः पानी पैदा हुआ । इससे सूर्य्यरूप अग्नि उत्पन्न हुआ । उससे मरीचिरूप पानी उत्पन्न हुआ उससे पृथिवी उत्पन्न हुई । आकाश को उत्पन्न करने वाला वही पुरुषरूप श्रात्मप्रजापति हुआ । इसी प्राकृत सृष्टिविज्ञान को लक्ष्य में रखकर --" तस्माद् वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः । श्राकाशाद्वायुः । वायोरग्निः । अग्नेरापः । अद्भ्यः पृथिवी " ॥ " — यह कहा जाता है । इस प्रपञ्च से बतलाना हमें यही है कि सृष्टि की ये पाँच संस्था हैं । संस्था वह कहलाती है- जिसमें उत्तर - उत्तर के भाग में पूर्व पूर्व का सम्बन्ध हो । इससे पृथिवी में ऊपर के चारों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । चन्द्रमा में चार की सत्ता है । सूर्य्य में तीन हैं । परमेष्ठी दो हैं, है । स्वयम्भू एक है । स्वयम्भू वाङ्मय है । परमेष्ठी प्रापोमय वाङ्मय है । आपोमय परमेष्ठी मध्य में ऊपर प्रवर्ग्यभूत वाक्स्तर है । सूय्यं वाङ्मय, आपोमय, वाङ्मय है । मध्य में वाङ्मय सूर्य्यं है । ऊपर आपःस्तर है । ऊपर वाक्स्तर है । चन्द्रमा अन्नमय, वाङ्मय, आपोमय, वाङ्मय है एवं पृथिवी श्रन्नादमयी, अन्नमयी, वाङ्मयी प्रापोमयी वाक् भी है । इस प्रकार केवल पृथिवी में पांच स्तर हो जाते हैं । शेष चारों का प्रवर्ग्यभाग पृथिवी को प्रातिस्विक वस्तु बनकर पृथिवी के चारों ओर व्याप्त रहते हैं । इस प्रकार पृथिवी पञ्चलोकात्मिका है । पाँचों का भोग है । सबके केन्द्र में पृथिवी है । पृथिवी को केन्द्र मानिए । इसके ऊपर पन्द्रहवें अहर्गण तक सोममय प्राणस्तर है । यही आपःस्तर है एवं पृथिवी को है । इसी को केन्द्र मानकर ३३ तक आपःस्तर । पृथिवी को केन्द्र केन्द्र मानकर २१ तक अग्निस्तर मानकर ४८ तक वाक्स्तर है । यह स्तर सर्वाधार है । इस पर चार स्तर हैं । इसी अभिप्राय से- ' यावद् ब्रह्म विष्ठितं तावती वाकू ' यह कहा जाता है । पृथिवी पञ्चलोकात्मिका है । पहला वाग्लोक है । दूसरा गौलोक है । यही प्राणमय अन्तरिक्ष है । तीसरा द्योलोक है । चौथा श्रापोलोक है । वाक् वाङ्मयी है । गौ वाक्प्राणमयी है । यो वाक्प्राणमनोमयी है । आपः वाक्प्राणमय है । पांचवा वेद वाङ्मय है । उपक्रम में वाक् है । उपसंहार में वाक् है । पृथिवी अन्तरिक्ष- द्यो - आपः वेद- पाँचों मिलकर एक पृथिवीमण्डल है— १- तैत्ति ० उप ० २।१ । [ २२२ ]

पृष्ठ 237

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 237 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रपश्च वाङ्मय पश्चम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य अव्यक्तप्राणनिरूपण ५- वेदमय स्वयम्भू – बाक्स्तररूप वेण्ड - वेद । ४- प्रापोमय लोक परमेष्ठी - वाक्प्राणस्तररूप प्रापोमण्डल - श्रापः । ३ - अग्निरूप द्यौः - मनःप्राणवाक्स्तररूप तेजोमण्डल - - द्यौः । २ - वायुरूप अन्तरिक्ष- वाक्प्राणस्तररूप आपोमण्डल - - - अन्तरिक्षम् । १- पृथिवीपिण्ड - वाक्स्तररूप वाङ्मण्डल-- पृथिवी । ' पृथिवी लोकात्मिका पञ्च ' सेयं इन पांचों का पृष्ठ की अपेक्षा से भी विचार किया जाता है । ' चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' - के अनुसार इस पृथिवी में चार पृष्ठ हैं । वे चारों पृष्ठ - ' हृत् ', अन्तः, बहिः, ब्रह्म - इन नामों से प्रसिद्ध हैं । पृथिवी का हृदयस्थान हृत्पृष्ठ है - इसी को अनिरुक्त पृष्ठ कहते हैं । भूपिण्ड अन्तःपृष्ठ है - इसे हम नहीं देखते, अतएव इसे अन्तःपृष्ठ कहा जाता है एवं भूपृष्ठ से ३३ तक बहिः- पृष्ठ है - इसे ही ' पारावत-पृष्ठ ' कहते हैं । ४८ तक ब्रह्मपृष्ठ है । इसमें बहिःपृष्ठ में अग्नि, सोम ( आपः ) भेद से दो भेद हो जाते हैं । २१ तक अग्निपृष्ठ है । ३३ तक आपोपृष्ठ है । इस प्रकार ४ के पाँच पृष्ठ हो जाते हैं । १- ब्रह्मपृष्ठ -४८ तक २ - आप: ( सोम ) पृष्ठ - ३३ तक ३- चितेनिधेयाग्निपृष्ठ – २१ तक ४- चित्याग्निपृष्ठभूपिण्ड → निरुक्त पृष्ठ - ' निरुक्तप्रजापति ' - पृथिवी - प्रपञ्च ५ - हृत्पृष्ठ -केन्द्र → अनिरुक्तपृष्ठ-' अनिरुक्तप्रजापतिरूप ' ] —ब्रह्मपृष्ठ —– ४ - बहिः पृष्ठ -३ ११- ब्रह्मपृष्ठ ४८ तक २- प्रापः पृष्ठ --- ३३ तक १३- चिते ० अग्नि- २१ तक ४- चित्याग्निपृष्ठ - भूपिण्ड ५ - हृत्पृष्ठ केन्द्र ] ] - अन्तः पृष्ठ- २ ] - हृत्पृष्ठ - १ - निरुक्तपृष्ठ - निरुक्तप्रजापतिरूप ] - अनिरुक्त पृष्ठ प्रनिरुक्तप्रजापतिरूप - प्रपञ्च पृथिवी [ २२३ ]

पृष्ठ 238

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 238 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पश्चम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माध्य श्रव्यक्तप्राणनिरूपण प्राणः ४८ - प्राणमयी आपः ३३ – आपोमयी द्यौः २१ - मनोमयी → पृथिवी प्रपञ्च गौः १५ – प्राणपृथिवी वाक् — पिण्डपृथिवी ऋक्, यजुः साम भेद से वेद त्रिधा विभक्त है । इन तीनों के लिए ' महदुक्थं ऋक्, महाव्रतं साम, अग्निर्यजुः ' - ये लक्षण किए जाते हैं । महदुक्थरूप ऋक् छन्दोवेद है । इसमें भी पुनः ऋक्, यजुः, साम-तीन भेद हैं । मूत्ति ( वस्तुपिण्ड ) महदुक्थ है - यही ऋक् है यही छन्दोवेद है । ऋगुरूप इस छन्दोवेद - विष्कम्भ, परिणाह, वय - तीन अवयव हैं । लम्बाई, चौड़ाई, मोटाई - विष्कम्भ है । व्यास ( डायमिटर ) को भी विष्कम्भ कहते हैं । यही व्यासापरपर्य्यायक विष्कम्भक इस महदुक्थरूप ऋग्वेद का ' ऋ ' भाग है । वस्तु का घेर ( मण्डल ) परिणाह है । इसी का नाम ' साम ' है । तीन विष्कम्भ को मिलाने से वस्तु का परिणाह बन जाता है । गोलवस्तु का व्यास नाप लीजिए । उसे तिगुना करने पर वह वस्तु का घेर बन जाएगा । इसी अभिप्राय से ' तृचं साम ' कहा है । ' ऋचां परिणाहः अचिः अचः साम ' - साम का यही लक्षण है । इसी सामविज्ञान को लक्ष्य में रखकर ' अथ यदेतदचिदप्यते ' - ' तानि सामानि स साम्नां लोक: ' - यह कहा जाता है । परिणाहरूप साम, विष्कम्भरूप ऋक् - दोनों वयोनाघ ( आयतन-छन्द ) मात्र हैं । इनसे जो वस्तु छन्दित रहती है । वही वय है । इसी को यजुः कहते हैं । तीनों की समष्टि छन्दोवेद है एवं यही मूर्ति है । ' ऋग्म्यो जातां सर्वशो मूर्तिमाहु: ' के अनुसार यही ' ऋक् ' है । महाव्रत सामवेद है । इसे ही ' वितानवेद ' कहते हैं । इसमें भी ऋग्यजुः साम - तीन भेद है । श्रग्नि यजु: है - इसे ही ' रसवेद ' कहते हैं । इसमें भी ऋग्यजुः साम तीन वेद हैं । इनमें रसवेद को छोडते है एवं महाव्रतरूप सामवेद की ओर श्रापका ध्यान आकर्षित करते हैं । यह सामवेद वितानवेद है । मूर्ति के ऊपर से इसका तनन होता है । ये साम कुल हजार हैं । हजार गो के कारण यह साम सहस्रधा विभक्त हो जाता है । वस्तुपिण्ड को बीच में रखकर उसके चारों भोर मण्डल बनाइए । ऐसे हजार मण्डल बना डालिए । ये मण्डल ऋक् मूर्ति के ही मण्डल हैं । ये मण्डल मूर्तिरूप ऋक् के चारों ओर समभाव से उत्पन्न होते हैं, अतएव ' ऋचा समं मेने ' - ' तस्मात् साम ' - इस व्युत्पत्ति से इन्हें ' साम ' कहा जाता है । इसमें साम, ऋक् यजुः - तीन श्रवयव हैं । प्रधि से केन्द्र की ओर आने वाला सूचीमुख तत्त्व ' साम ' है । केन्द्र से प्रधि की ओर जाने वाला तत्त्व सूच्यग्रतत्त्व ' ऋ ' है । विष्कम्भ से आगे - आगे ऋक् तीन - तीन बिन्दु छोटी होती जाती है, अतएव उत्तरोत्तर वस्तुमूत्ति छोटी प्रतीत होने लगती है । [ २२४ ]

पृष्ठ 239

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 239 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पश्चम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य अव्यक्तप्राणनिरूपण ऋक् यजुः [ २२५ ]

पृष्ठ 240

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 240 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पश्चम प्रश्न १- त्रिवृत्स्तोम-२- पञ्चदशस्तोम-३ - एकविंशस्तोम-४- त्रिणवस्तोम-५- त्रयस्त्रिशस्तोम-प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य अव्यक्तप्राणनिरूपण साम ( १ ) ( १५ ) → पृष्ठ्यस्तोम नाम से प्रसिद्ध – ' अयुग्मस्तोम ' ( २१ ) ( २७ ) ( ३३ ) [ २२६ } इन तीनों में से प्रकृत में केवल साम का सम्बन्ध है । हम बतला चुके हैं कि सहस्र साम का सम्बन्ध सहस्र गौ से है । सहस्र गौ के ३०-३० के ३३ विभाग होते हैं । ये ही ३३ विभाग ३३ अहर्गण कहलाते हैं । १० गौ शेष बच जाती हैं । वही ३४ वाँ प्राजापत्यभाग होता है । ३३ में ६-६ अहर्गण का एक - एक स्तोम होता है । पहले तीन में ६ मिलाने से त्रिवृत्स्तोम होता है । ६ मिलाने से पञ्चदश-स्तोम होता है । ६ और मिलाने से एक विशस्तोम होता है फिर ६ और मिलाने से त्रिणवस्तोम होता है एवं ६ और मिलाने से त्रयस्त्रिशस्तोम होता है । ये पाँचों अयुग्मस्तोम हैं । इसके ऊपर छन्दोमा स्तोम है । ऊपर से नहीं है - पृथिवी के केन्द्र से ही यह प्रारम्भ होता है एवं ४८ तक व्याप्त रहता है । छन्दोमासाम के २४-४४-४८ तीन विभाग हैं । इन तीन का कारण गायत्री, त्रिष्टुप् जगती- ये तीन छन्द ही हैं । गायत्र साम २४ तक है । त्रैष्टुमसाम ४४ तक है एवं जागतसाम ४८ तक है । छन्दः सम्बन्ध से ये साम छन्दोमा-साम कहलाते हैं - ये ही तीन स्तोम प्रकरण में ' छन्दोमास्तोम ' नाम से प्रसिद्ध हैं- ये ही युग्मस्तोम कहलाते हैं—